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                <title>कोर्ट आदेश - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>कोर्ट आदेश RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>हाईकोर्ट का आदेश- वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से कोर्ट में उपस्थित हों न्यायिक मजिस्ट्रेट</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>प्रयागराज के झूंसी थाना क्षेत्र निवासी याची ने 2023 से लंबित चेक बाउंस से जुड़े मामले के शीघ्र निस्तारण की मांग करते हुए हाईकोर्ट में अर्जी दायर की थी। 10 दिसंबर 2025 को हाईकोर्ट ने संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट से परिवाद के निस्तारण में हो रही देरी का स्पष्टीकरण मांगा गया था। इस पर अब तक कोई जवाब प्राप्त नहीं हुआ है। </p>
<p style="text-align:justify;">ईकोर्ट के कार्यालय की ओर से मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, प्रयागराज को इस संबंध में औपचारिक पत्र भी भेजा गया था, लेकिन ट्रायल कोर्ट की ओर से अनुपालन की कोई रिपोर्ट नहीं मिली। कोर्ट ने संबंधित अदालत के</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174644/high-courts-order-judicial-magistrate-should-appear-in-the-court"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/allahabad-high-court9.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>प्रयागराज के झूंसी थाना क्षेत्र निवासी याची ने 2023 से लंबित चेक बाउंस से जुड़े मामले के शीघ्र निस्तारण की मांग करते हुए हाईकोर्ट में अर्जी दायर की थी। 10 दिसंबर 2025 को हाईकोर्ट ने संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट से परिवाद के निस्तारण में हो रही देरी का स्पष्टीकरण मांगा गया था। इस पर अब तक कोई जवाब प्राप्त नहीं हुआ है। </p>
<p style="text-align:justify;">ईकोर्ट के कार्यालय की ओर से मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, प्रयागराज को इस संबंध में औपचारिक पत्र भी भेजा गया था, लेकिन ट्रायल कोर्ट की ओर से अनुपालन की कोई रिपोर्ट नहीं मिली। कोर्ट ने संबंधित अदालत के पीठासीन अधिकारी को वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कार्यालय को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि पिछला और वर्तमान आदेश संबंधित अधिकारी तक समय पर पहुंच जाए ताकि आवश्यक अनुपालन सुनिश्चित किया जा सके।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ख़बरें</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 30 Mar 2026 22:13:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>गुजरात में छह जजों को समय से पहले रिटायर होने का आदेश</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>राज्य सरकार ने छह जजों को "जनहित में" न्यायपालिका से "समय से पहले रिटायर" होने का निर्देश दिया है, जो तत्काल प्रभाव से लागू होगा। यह आदेश गुजरात हाई कोर्ट की इस संबंध में की गई सिफ़ारिशों के बाद जारी किया गया।इनमें से पाँच ज़िला जज हैं, जबकि एक सीनियर सिविल जज हैं। गुजरात सरकार के विधि विभाग ने 16 मार्च को इस संबंध में अधिसूचनाएँ जारी कीं।</p>
<p style="text-align:justify;">जिन पाँच ज़िला जजों को समय से पहले रिटायर होने के लिए कहा गया है, वे हैं: प्रथमेश श्रीवास्तव, प्रधान ज़िला जज, मोरबी; प्रशांत जोशी, प्रधान जज, फ़ैमिली कोर्ट, मोरबी;</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173879/order-for-premature-retirement-of-six-judges-in-gujarat"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/judges.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>राज्य सरकार ने छह जजों को "जनहित में" न्यायपालिका से "समय से पहले रिटायर" होने का निर्देश दिया है, जो तत्काल प्रभाव से लागू होगा। यह आदेश गुजरात हाई कोर्ट की इस संबंध में की गई सिफ़ारिशों के बाद जारी किया गया।इनमें से पाँच ज़िला जज हैं, जबकि एक सीनियर सिविल जज हैं। गुजरात सरकार के विधि विभाग ने 16 मार्च को इस संबंध में अधिसूचनाएँ जारी कीं।</p>
<p style="text-align:justify;">जिन पाँच ज़िला जजों को समय से पहले रिटायर होने के लिए कहा गया है, वे हैं: प्रथमेश श्रीवास्तव, प्रधान ज़िला जज, मोरबी; प्रशांत जोशी, प्रधान जज, फ़ैमिली कोर्ट, मोरबी; मोहम्मद इलियास मंडली, प्रधान जज, फ़ैमिली कोर्ट, पोरबंदर; अली हुसैन शेख, तीसरे अतिरिक्त ज़िला जज, राजकोट (धोराजी); और किरीट कुमार दर्जी, अतिरिक्त ज़िला जज, अरावली (मोडासा)।</p>
<p style="text-align:justify;">छठे न्यायिक अधिकारी की पहचान जयेश कुमार पारिख के रूप में हुई है, जो प्रधान सीनियर सिविल जज और अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, ध्रांगध्रा (सुरेंद्रनगर ज़िला) हैं।सूत्रों ने बताया कि इन छह जजों को समय से पहले रिटायर करने का आदेश गुजरात सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 2002 के प्रावधानों के तहत जारी किया गया है, जिसे गुजरात राज्य न्यायिक सेवा नियम, 2005 के नियम 21 के साथ पढ़ा जाता है;  सदस्य को उप-नियम (1) के तहत जनहित में रिटायर किया जाना चाहिए, इस पर कम से कम तीन बार विचार किया जाएगा; यानी, जब वह 50 वर्ष, 55 वर्ष और 58 वर्ष की आयु पूरी करने वाला हो।"</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>अन्य राज्य</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 22 Mar 2026 19:47:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>यूपी गैंगस्टर एक्ट के गंभीर परिणाम होते हैं, इसलिए प्रक्रिया का सख्ती से पालन अनिवार्य: सुप्रीम कोर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>सुप्रीम कोर्ट ने कथित गैंगस्टर गब्बर सिंह के खिलाफ उत्तर प्रदेश गैंगस्टर और असामाजिक गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1986 के तहत चल रही कार्यवाही रद्द की। कोर्ट ने यह फैसला गैंग चार्ट तैयार करने की सिफारिश भेजने की प्रक्रिया में हुई प्रक्रियागत अनियमितताओं का हवाला देते हुए दिया, जिसमें गब्बर सिंह का नाम शामिल है।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्य सरकार का स्पष्टीकरण खारिज करते हुए कोर्ट ने उस स्थापित सिद्धांत को दोहराया कि जब कोई कानून यह निर्धारित करता है कि कोई काम किसी विशेष तरीके से ही किया जाना चाहिए तो उसे उसी तरीके से किया जाना चाहिए, अन्यथा बिल्कुल नहीं;</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173877/up-gangster-act-has-serious-consequences-hence-strict-adherence-to"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/supream-court2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>सुप्रीम कोर्ट ने कथित गैंगस्टर गब्बर सिंह के खिलाफ उत्तर प्रदेश गैंगस्टर और असामाजिक गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1986 के तहत चल रही कार्यवाही रद्द की। कोर्ट ने यह फैसला गैंग चार्ट तैयार करने की सिफारिश भेजने की प्रक्रिया में हुई प्रक्रियागत अनियमितताओं का हवाला देते हुए दिया, जिसमें गब्बर सिंह का नाम शामिल है।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्य सरकार का स्पष्टीकरण खारिज करते हुए कोर्ट ने उस स्थापित सिद्धांत को दोहराया कि जब कोई कानून यह निर्धारित करता है कि कोई काम किसी विशेष तरीके से ही किया जाना चाहिए तो उसे उसी तरीके से किया जाना चाहिए, अन्यथा बिल्कुल नहीं; खासकर तब जब किसी व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता दांव पर हो।  जब कोई विशेष कार्य किया जाना हो, तो उसे उसी तरीके से किया जाना चाहिए जैसा कि निर्धारित है—यहां कानून द्वारा निर्धारित—अन्यथा उसे बिल्कुल नहीं किया जाना चाहिए। विशेष रूप से तब, जब किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता दांव पर हो; एक ऐसी स्वतंत्रता जो सभी के लिए अनमोल है और जिसका उल्लंघन केवल कानून के अनुसार ही किया जा सकता है। </p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला रद्द किया, जिसमें उसने FIR को खारिज करने से इनकार किया था। बेंच ने अपने फैसले में कहा कि गैंग चार्ट को तैयार करने और उसे आगे भेजने की प्रक्रिया में हुई स्पष्ट प्रक्रियागत अनियमितताओं ने FIR की पूरी बुनियाद को ही कमजोर (दोषपूर्ण) बना दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा, "गैंग चार्ट के लिए यह अनिवार्य है कि उसमें नोडल अधिकारी और अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक की सिफारिशें शामिल हों, जिन्हें पुलिस अधीक्षक और जिला मजिस्ट्रेट द्वारा अनुमोदित किया गया हो। ये सिफारिशें लिखित रूप में होनी चाहिए और अनुमोदन पर हस्ताक्षर होने चाहिए। इस मामले में न तो अनिवार्य सिफारिशें उपलब्ध हैं और न ही किसी के हस्ताक्षर मौजूद हैं।"</p>
<p style="text-align:justify;">यह मामला बहराइच में 1986 के अधिनियम की धारा 3(1) के तहत दर्ज एक FIR से जुड़ा है। इस FIR में आरोप लगाया गया कि अपीलकर्ता (आरोपी) एक ऐसे गिरोह का हिस्सा था, जो जमीन पर अवैध कब्जा, रंगदारी वसूली और जालसाजी जैसे गंभीर अपराधों में लिप्त था। अभियोजन पक्ष ने कानून के कड़े प्रावधानों को लागू करने के लिए पूरी तरह से इस "गैंग चार्ट" पर ही भरोसा किया था।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 22 Mar 2026 19:44:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जेलों में भीड़भाड़ पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सभी राज्यों-केंद्र शासित प्रदेशों से मांगा ताजा डाटा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>देशभर की जेलों में बढ़ती भीड़भाड़ को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे अपनी-अपनी जेलों की वर्तमान स्थिति पर विस्तृत हलफनामा दाखिल करें। यह आदेश जेलों में भीड़भाड़ से संबंधित एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान दिया गया।</p><p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट की ओर से मामले में न्यायमित्र नियुक्त वकील गौरव अग्रवाल ने बताया कि कोर्ट के पास राज्यवार जेलों की ताजा स्थिति से जुड़ा कोई अपडेट आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। इस पर पीठ ने स्पष्ट</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173872/supreme-court-strict-on-overcrowding-in-jails-seeks-latest-data"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/supream-court2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>देशभर की जेलों में बढ़ती भीड़भाड़ को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे अपनी-अपनी जेलों की वर्तमान स्थिति पर विस्तृत हलफनामा दाखिल करें। यह आदेश जेलों में भीड़भाड़ से संबंधित एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान दिया गया।</p><p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट की ओर से मामले में न्यायमित्र नियुक्त वकील गौरव अग्रवाल ने बताया कि कोर्ट के पास राज्यवार जेलों की ताजा स्थिति से जुड़ा कोई अपडेट आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। इस पर पीठ ने स्पष्ट किया कि राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को जेलों की पूरी जानकारी देनी होगी। इसमें हर जेल की क्षमता, वहां बंद कैदियों की कुल संख्या (विचाराधीन और सजायाफ्ता दोनों), तथा प्रत्येक जेल में भीड़भाड़ का प्रतिशत शामिल होगा। इसके अलावा, कोर्ट ने जेलों में भीड़ कम करने के लिए उठाए गए या प्रस्तावित कदमों की जानकारी भी मांगी है।</p><p style="text-align:justify;">अदालत ने महिलाओं की जेलों पर विशेष ध्यान देते हुए वहां उपलब्ध सुविधाओं का ब्योरा भी मांगा । सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ये सभी हलफनामे संबंधित राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के गृह सचिव की ओर से दाखिल किए जाएं। इसके लिए अंतिम तारीख 18 मई 2026 निर्धारित की गई है। इस मामले की अगली सुनवाई 26 मई 2026 को होगी।।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 22 Mar 2026 19:36:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>न्यायपालिका के आत्मावलोकन की जरूरत को स्वीकार करें मीलार्ड! </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">एनसीईआरटी की कक्षा आठ की एक किताब में न्यायपालिका से जुड़ी विवादित सामग्री पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा आपत्ति जताने के बाद सरकार द्वारा न्यायिक भ्रष्टाचार से संबंधित विवादास्पद अंशों को हटाने का निर्णय लिया है।गुरुवार सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी की कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित अध्याय पर कड़ा रुख अपनाते हुए पुस्तक पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है।सवाल उठता है कि माननीय शीर्ष अदालत ने जिस तरह इस मामले में तत्परता दिखाते हुए तथ्यपरक अध्याय पर गंभीर आपत्ति और कारवाई की है क्या ऐसी ही तत्परता न्यायपालिका की साख</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/171886/millard-accepts-the-need-for-introspection-of-the-judiciary"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/supream-court7.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एनसीईआरटी की कक्षा आठ की एक किताब में न्यायपालिका से जुड़ी विवादित सामग्री पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा आपत्ति जताने के बाद सरकार द्वारा न्यायिक भ्रष्टाचार से संबंधित विवादास्पद अंशों को हटाने का निर्णय लिया है।गुरुवार सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी की कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित अध्याय पर कड़ा रुख अपनाते हुए पुस्तक पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है।सवाल उठता है कि माननीय शीर्ष अदालत ने जिस तरह इस मामले में तत्परता दिखाते हुए तथ्यपरक अध्याय पर गंभीर आपत्ति और कारवाई की है क्या ऐसी ही तत्परता न्यायपालिका की साख पर धब्बा लगाने वाले न्यायिक व्यवस्था से जुड़े भ्रष्टाचारियों के खिलाफ भी अमल में लायी गयी। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको बता दें कि शीर्ष अदालत ने बाजार में उपलब्ध सभी प्रतियां जब्त करने और डिजिटल संस्करण हटाने के साथ ही पुस्तक को सार्वजनिक पहुंच से हटाने के आदेश दिए हैं। इतना ही नहीं कोर्ट ने अध्याय तैयार करने वाली कमेटी के सदस्यों का ब्योरा तलब किया हैं। एनसीईआरटी के निदेशक और स्कूल शिक्षा सचिव को कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा है कि बताएं क्यों न जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। दो सप्ताह में अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश देते हुए मामले को 11 मार्च को फिर सुनवाई के लिए लगाने का निर्देश दिया है।</div>
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<div style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि यह न्यायपालिका को कमजोर करने और उसकी गरिमा को ठोस पहुंचाने की सुनियोजित साजिश है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने माफी मांगते हुए कहा कि इस अध्याय को तैयार करने वाले दो लोग अब कभी भी एनसीईआरटी या किसी भी मंत्रालय में काम नहीं करेंगे तो चीफ जस्टिस सूर्यकांत की टिप्पणी थी कि तब तो ये बहुत आसान हो जाएगा और वो बरी हो जाएंगे। उन्होंने गोली चलाई है, न्यायपालिका आज खून से लथपथ है।चीफ जस्टिस ने कहा कि पुस्तक की प्रतियां बाजार में हैं। ये एक सोची समझी चाल है। पूरे शिक्षण समुदाय को बताया जाएगा कि भारतीय न्यायपालिका भ्रष्ट है और मामले लंबित हैं।</div>
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<div style="text-align:justify;">यह स्वीकार्य तथ्य है कि देश की न्यायपालिका केवल एक संवैधानिक संस्था नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा है। जब इस संस्था की छवि, भूमिका या विश्वसनीयता से जुड़ा कोई प्रश्न उठता है, तो उसका असर पूरे समाज और आने वाली पीढ़ियों की सोच पर पड़ता है। आम नागरिक जब अन्य सभी दरवाजों से निराश हो जाता है, तब वह अदालत की चौखट पर दस्तक देता है। ऐसे में यदि स्कूली पाठ्यपुस्तकों में न्यायपालिका को 'भ्रष्टाचार' जैसी गंभीर चुनौती के संदर्भ में प्रस्तुत किया जाए, तो हो सकता है कि बच्चों का विश्वास न्यायपालिका पर से बचपन में ही डगमगा जाएगा। </div>
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<div style="text-align:justify;">आपको बता दें कि एनसीईआरटी की कक्षा आठ की किताब में विवादित अध्याय 'हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका' शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। पहले के संस्करणों में जहां न्यायालयों की संरचना, कार्यप्रणाली और न्याय तक पहुंच पर ध्यान केंद्रित था, वहीं नये संस्करण में व्यवस्था की चुनौतियों पर भी चर्चा की गयी है। 'न्यायपालिका में भ्रष्टाचार' शीर्षक खंड में कहा गया है कि विभिन्न स्तरों पर लोगों को भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ सकता है और गरीब तथा वंचित वर्गों के लिए इससे न्याय तक पहुंच और कठिन हो सकती है।</div>
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<div style="text-align:justify;">पुस्तक में यह भी लेख है कि राज्य और केंद्र स्तर पर पारदर्शिता बढ़ाने तथा तकनीक के उपयोग से सुधार के प्रयास किये जा रहे हैं। पुस्तक में लंबित मुकदमों के आंकड़े भी दिये गये हैं। इसमें बताया गया है कि उच्चतम न्यायालय में लगभग 81 हजार मामले लंबित हैं, उच्च न्यायालयों में लगभग 62.40 लाख और जिला तथा अधीनस्थ न्यायालयों में करीब 4.70 करोड़ मामले लंबित हैं। ये आंकड़े न्याय प्रणाली पर बढ़ते बोझ को दर्शाते हैं। पुस्तक में केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण और निगरानी प्रणाली के जरिये प्राप्त शिकायतों का भी अलेख है और बताया गया है कि 2017 से 2021 के बीच 1600 से अधिक शिकायतें दर्ज की गयीं।</div>
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<div style="text-align:justify;">नयी पुस्तक के "न्यायपालिका में भ्रष्टाचार" खंड में कहा गया है कि न्यायाधीश एक आचार संहिता से बंधे होते हैं जो न केवल अदालत में उनके व्यवहार को नियंत्रित करती है, बल्कि अदालत के बाहर उनके आचरण को भी नियंत्रित करती है। इस अध्याय में भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई का कथन भी उद्धृत किया गया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि न्यायपालिका के भीतर भ्रष्टाचार और कदाचार की घटनाएं जन विश्वास पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं, किंतु त्वरित और पारदर्शी कार्रवाई से इस विश्वास को पुन स्थापित किया जा सकता है। </div>
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<div style="text-align:justify;">हाल ही में यह मामला मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष लाकर वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने इस पर गंभीर आपत्ति जताई। सिब्बल ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि स्कूली बच्चों को न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बारे में पढ़ाया जाना न केवल अनुचित है, बल्कि निंदनीय भी है। । मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने तत्काल संज्ञान लिया। </div>
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<div style="text-align:justify;">आपको बता दें कि लोकतंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही आवश्यक तत्व हैं। न्यायपालिका भी इससे अछूती नहीं है। समय-समय पर अदालतों ने स्वयं यह कहा है कि आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, बशर्ते यह तथ्यात्मक और मर्यादित हो। बेशक न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर एक पाठ्यपुस्तक के आलेख पर न्याय के देवता बुरी तरह बिफर रहें हैं इससे न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का प्रश्न ओझल होने वाला नहीं है। न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के अनेक मामले सामने आ चुके हैं और उन पर व्यापक चर्चा भी होती रहती है। हाल में सबसे अधिक चर्चा हुई दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश रहे यशवंत वर्मा के भ्रष्टाचार की। उनके आवास से करोड़ों के अधजले नोट बरामद किए गए थे। चूंकि उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हो सकी है, इसलिए वे अपने पद पर बने हुए हैं।</div>
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<div style="text-align:justify;">यहां गौर तलब है कि भ्रष्टाचार के कारण अन्य अनेक न्यायाधीश भी कठघरे में खड़े हो चुके हैं। इनमें से कई न्यायाधीशों के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन किसी के भी विरुद्ध वह अंजाम तक नहीं पहुंच सकी। इसका यह मतलब नहीं हो सकता कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है ही नहीं।एनसीईआरटी की पहले की पुस्तक में भी न्यायपालिका के बारे में उल्लेख था, लेकिन वह न्यायालयों की संरचना और भूमिका तक सीमित था।</div>
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<div style="text-align:justify;">लेकिन इस पूरे प्रकरण में कुछ बुनियादी प्रश्न उठते हैं। पहला, क्या पाठ्यपुस्तकों में संस्थागत भ्रष्टाचार जैसे विषयों का उल्लेख पूरी तरह से प्रतिबंधित होना चाहिए? दूसरा, यदि आलोचना हो, तो उसका स्वर, संदर्भ और प्रस्तुति कैसी होनी चाहिए? और तीसरा, बच्चों को संवैधानिक संस्थाओं के बारे में किस प्रकार की समझ दी जानी चाहिए ? यह स्वीकार करना चाहिए कि कक्षा आठ के विद्यार्थी किशोरावस्था की दहलीज पर होते हैं जटिल संस्थागत संदर्भों को पूरी गहराई से समझने की स्थिति में नहीं होते। ऐसे में यदि उन्हें यह बताया जाए कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है, तो यह आवश्यक है कि साथ ही यह भी बताया जाए कि भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच की व्यवस्था क्या है, न्यायिक जवाबदेही की प्रणाली कैसे काम करती है, और कैसे अधिकांश न्यायाधीश निष्पक्षता व ईमानदारी से अपना दायित्व निभाते हैं।</div>
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<div style="text-align:justify;">ऐसे में न्यायपालिका को लेकर कोई भी कथन संवेदनशील हो जाता है। मुख्य न्यायाधीश की यह टिप्पणी कि चाहे वह कितना भी ऊंचा पद पर हो, कानून अपना काम करेगा, यह संकेत देती है कि यदि किसी ने जानबूझकर संस्था की छवि धूमिल करने का प्रयास किया है, तो उसके विरुद्ध कार्रवाई हो सकती है।   न्यायपालिका देश की आशा और विश्वास का केंद्र है। उसकी प्रति अक्षुण्ण रहनी चाहिए, पर वह प्रतिष्ठा तथ्यों आलोचना या समीक्षा को दबाने से नहीं, बल्कि सत्य का साहसपूर्वक सामना करने से और भी सुदृढ़ होती है।</div>
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<div style="text-align:justify;">सवाल है कि क्या इस चैप्टर को स्नातक या परास्नातक के पाठ्यक्रम में शामिल करने पर अपनी स्वीकृति मीलार्ड देंगे अथवा उन्हें न्यायपालिका की वास्तविकता पर कोई विश्लेषण स्वीकार नही है? सरकार बैकफुट पर है सफाई में कहा गया है कि एनसीईआरटी एक स्वायत्त संस्था है, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा है कि एनसीईआरटी की पुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर अध्याय शामिल करना दुर्भाग्यपूर्ण है और सरकार इस मामले को गंभीरता से ले रही । इस मामले पर खेद व्यक्त करते हुए प्रधान ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय का जो भी आदेश होगा।</div>
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<div style="text-align:justify;">मंत्रालय उसका पालन करेगा। उन्होंने कहा कि विभाग के सचिव को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है कि एनसीईआरटी की पुस्तक में इस तरह का गैर-जिम्मेदाराना अध्याय जोड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।जाहिर है आगामी दिनों मे कुछ लोगों को कटु सच बयानी की सजा मिलेगी न्याय के शिखर का अहम तुष्ट होगा लेकिन भ्रष्टाचार का सवाल यथावत बना रहेगा।</div>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Sat, 28 Feb 2026 18:19:18 +0530</pubDate>
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