<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://www.swatantraprabhat.com/tag/49654/judicial-reforms" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>Swatantra Prabhat RSS Feed Generator</generator>
                <title>Judicial reforms - Swatantra Prabhat</title>
                <link>https://www.swatantraprabhat.com/tag/49654/rss</link>
                <description>Judicial reforms RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>आजादी के 79 साल: और आम आदमी का सपना</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal">15<span lang="hi" xml:lang="hi">  अगस्त </span>1947<span lang="hi" xml:lang="hi">  केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं थी। वह भारत के इतिहास का वह क्षण था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब सदियों की गुलामी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संघर्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बलिदान और अनगिनत सपनों के बाद देश ने स्वतंत्रता की सांस ली थी। आजादी के आंदोलन में शामिल लोगों ने केवल विदेशी शासन से मुक्ति का सपना नहीं देखा था। उनके सपने में ऐसा भारत था जहां नागरिक सम्मान के साथ जी सके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां भूख और गरीबी मजबूरी न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां शिक्षा हर बच्चे तक पहुंचे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां न्याय पैसे और प्रभाव का मोहताज न हो और जहां लोकतंत्र में आम आदमी</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/186149/79-years-of-independence-and-the-dream-of-the-common"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/hindi-divas13.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal">15<span lang="hi" xml:lang="hi"> अगस्त </span>1947<span lang="hi" xml:lang="hi"> केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं थी। वह भारत के इतिहास का वह क्षण था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब सदियों की गुलामी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संघर्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बलिदान और अनगिनत सपनों के बाद देश ने स्वतंत्रता की सांस ली थी। आजादी के आंदोलन में शामिल लोगों ने केवल विदेशी शासन से मुक्ति का सपना नहीं देखा था। उनके सपने में ऐसा भारत था जहां नागरिक सम्मान के साथ जी सके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां भूख और गरीबी मजबूरी न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां शिक्षा हर बच्चे तक पहुंचे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां न्याय पैसे और प्रभाव का मोहताज न हो और जहां लोकतंत्र में आम आदमी की आवाज सबसे महत्वपूर्ण हो।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज हम स्वतंत्रता के </span>79<span lang="hi" xml:lang="hi">वें वर्ष में हैं। भारत ने इन दशकों में लंबी यात्रा तय की है। देश ने विज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तकनीक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृषि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंतरिक्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुनियादी ढांचे और लोकतांत्रिक संस्थाओं के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। भारत आज दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और वैश्विक स्तर पर उसकी भूमिका लगातार बढ़ रही है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इस उपलब्धि के बीच एक बुनियादी सवाल आज भी खड़ा है—क्या वह आम आदमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके नाम पर लोकतंत्र की पूरी व्यवस्था खड़ी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वास्तव में उतना स्वतंत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन जी पा रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका सपना स्वतंत्रता सेनानियों ने देखा था</span>? 1947<span lang="hi" xml:lang="hi"> में भारत को राजनीतिक स्वतंत्रता मिली। संविधान ने नागरिकों को समानता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्रता और न्याय के अधिकार दिए। हर वयस्क नागरिक को मतदान का अधिकार मिला। यह अपने आप में ऐतिहासिक उपलब्धि थी। लेकिन राजनीतिक स्वतंत्रता के बाद सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता की चुनौती सामने आई। किसी गरीब परिवार का बच्चा अगर अच्छी शिक्षा नहीं पा सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी युवा को अपनी योग्यता के बावजूद रोजगार के लिए वर्षों इंतजार करना पड़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी किसान को अपनी उपज का उचित मूल्य पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है या किसी गरीब व्यक्ति को इलाज के लिए अपनी जमीन और संपत्ति तक बेचनी पड़ती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो सवाल उठता है कि स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ उसके जीवन में कितना उतर पाया है। आजादी का मतलब केवल यह नहीं कि देश पर विदेशी शासन न हो। वास्तविक आजादी का अर्थ यह भी है कि नागरिक भय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अशिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेरोजगारी और अन्याय से मुक्त होकर अपना जीवन चुन सके। यह स्वीकार करना होगा कि भारत ने </span>79<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्षों में अभूतपूर्व विकास किया है। गांवों तक सड़कें पहुंची हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिजली और संचार का विस्तार हुआ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल तकनीक ने आम नागरिक के जीवन को बदला है और करोड़ों लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ मिला है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन विकास का दूसरा चेहरा भी है। एक तरफ आधुनिक शहर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊंची इमारतें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक्सप्रेसवे और डिजिटल अर्थव्यवस्था है तो दूसरी तरफ ऐसे परिवार भी हैं जिनके लिए रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना आज भी चुनौती है। विकास का मूल्यांकन केवल बड़े प्रोजेक्टों से नहीं होना चाहिए। असली कसौटी यह होनी चाहिए कि देश का सबसे कमजोर नागरिक कितना बेहतर जीवन जी रहा है। अगर आर्थिक विकास बढ़ता है लेकिन अवसर कुछ वर्गों तक सीमित रह जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो विकास की गति के साथ सामाजिक असमानता भी बढ़ सकती है। इसलिए आने वाले वर्षों की सबसे बड़ी चुनौती विकास को अधिक समावेशी बनाना है। भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में से एक है। युवा आबादी देश की सबसे बड़ी ताकत हो सकती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इसके लिए पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण रोजगार जरूरी है। आज लाखों युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में वर्षों लगा देते हैं। कई नौकरियों के लिए लाखों आवेदन आते हैं जबकि पदों की संख्या सीमित होती है। दूसरी ओर निजी क्षेत्र में भी रोजगार के स्वरूप तेजी से बदल रहे हैं। तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विस्तार ने रोजगार के नए अवसर पैदा किए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन कुछ पारंपरिक कामों के भविष्य को लेकर चिंता भी बढ़ी है। इसलिए केवल रोजगार की संख्या नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि रोजगार की गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण है। ऐसा रोजगार चाहिए जिससे युवा सम्मानपूर्वक अपना भविष्य बना सके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवार चला सके और अपनी आकांक्षाओं को पूरा कर सके। स्वतंत्र भारत ने शिक्षा के क्षेत्र में लंबी दूरी तय की है। स्कूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कॉलेज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वविद्यालय और तकनीकी संस्थानों का विस्तार हुआ है। लेकिन शिक्षा में गुणवत्ता और अवसर की समानता आज भी बड़ी चुनौती है। एक संपन्न परिवार का बच्चा महंगे स्कूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोचिंग और डिजिटल संसाधनों का लाभ उठा सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि गरीब परिवार का बच्चा कई बार मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष करता है। आजादी का सपना तभी पूरा होगा जब किसी बच्चे का भविष्य उसके माता-पिता की आर्थिक स्थिति से तय न हो। शिक्षा केवल नौकरी पाने का माध्यम नहीं है। यह नागरिक को अपने अधिकार समझने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सवाल पूछने और सही-गलत में अंतर करने की क्षमता देती है। इसलिए शिक्षा में निवेश वास्तव में लोकतंत्र में निवेश है। भारत की अर्थव्यवस्था और समाज में किसान की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। कृषि में तकनीक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिंचाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाजार और सरकारी सहायता के विस्तार से किसानों के जीवन में कई बदलाव आए हैं। फिर भी खेती आज भी जोखिम से भरा व्यवसाय है। मौसम की अनिश्चितता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लागत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाजार मूल्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्ज और भंडारण जैसी समस्याएं किसान के सामने बनी रहती हैं। किसान की वास्तविक स्वतंत्रता तभी होगी जब उसे अपनी मेहनत का उचित मूल्य मिले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राकृतिक आपदा में प्रभावी सुरक्षा मिले और खेती आर्थिक रूप से टिकाऊ व्यवसाय बन सके।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">किसान को केवल चुनावी भाषणों में सम्मान देने के बजाय उसकी आय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुरक्षा और भविष्य पर गंभीरता से काम करना होगा। लोकतंत्र में नागरिक का सबसे बड़ा भरोसा न्याय व्यवस्था पर होता है। संविधान ने नागरिकों को अधिकार दिए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उन अधिकारों की रक्षा तभी संभव है जब न्याय समय पर मिले।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">लंबित मुकदमे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महंगी कानूनी प्रक्रिया और वर्षों तक चलने वाली अदालती लड़ाई आम नागरिक के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है। किसी निर्दोष व्यक्ति के लिए वर्षों तक मुकदमा झेलना भी एक प्रकार की पीड़ा है। किसी पीड़ित के लिए वर्षों तक न्याय की प्रतीक्षा करना भी न्याय व्यवस्था की परीक्षा है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए न्याय केवल अदालत का फैसला नहीं है। न्याय का वास्तविक अर्थ है—समय पर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्पक्ष और सुलभ न्याय। भारत की सबसे बड़ी उपलब्धियों में लोकतंत्र का लगातार कायम रहना शामिल है। सत्ता परिवर्तन चुनावों के माध्यम से होता रहा है। जनता सरकारों को चुनती और बदलती रही है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन लोकतंत्र की गुणवत्ता केवल चुनाव कराने से तय नहीं होती। लोकतंत्र में संवाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असहमति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारदर्शिता और जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब राजनीतिक बहस जनता के वास्तविक मुद्दों से हटकर केवल आरोप-प्रत्यारोप में बदल जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब आम नागरिक के सवाल पीछे छूट जाते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">जनता को रोजगार चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेहतर शिक्षा चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुरक्षित सड़कें चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सस्ती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसानों को बेहतर बाजार चाहिए और युवाओं को अवसर चाहिए।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">राजनीति का केंद्र यदि इन सवालों से हट जाता है तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होती है। किसी भी समाज की प्रगति का वास्तविक मूल्यांकन उसकी महिलाओं की स्थिति से किया जा सकता है। भारत में महिलाओं ने शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजनीति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्योग और सेना सहित लगभग हर क्षेत्र में अपनी क्षमता साबित की है। लेकिन सुरक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समान अवसर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक स्वतंत्रता और सामाजिक भेदभाव से जुड़े सवाल अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक महिला तभी वास्तव में स्वतंत्र है जब वह बिना भय के घर से बाहर निकल सके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी शिक्षा और करियर का फैसला स्वयं कर सके और समाज में उसे समान सम्मान मिले। इसलिए महिलाओं की स्वतंत्रता को केवल कानूनों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। सामाजिक सोच में बदलाव भी उतना ही जरूरी है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज का भारत डिजिटल भारत भी है। मोबाइल फोन और इंटरनेट ने सूचना तक पहुंच को आसान बनाया है। नागरिक सरकार की अनेक सेवाएं ऑनलाइन प्राप्त कर सकता है। डिजिटल भुगतान ने आर्थिक व्यवहार का तरीका बदल दिया है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन डिजिटल युग ने नई चुनौतियां भी पैदा की हैं।साइबर अपराध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऑनलाइन धोखाधड़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फर्जी खबरें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निजता और डिजिटल साक्षरता जैसे सवाल लगातार महत्वपूर्ण हो रहे हैं। आज नागरिक को केवल राजनीतिक और सामाजिक रूप से ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल रूप से भी जागरूक होना पड़ेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">असली आजादी किसे कहेंगे</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">आखिर आजादी का अर्थ क्या है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्या केवल विदेशी शासन से मुक्ति आजादी है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">निश्चित रूप से नहीं। आजादी का अर्थ है—भय से मुक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूख से मुक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अशिक्षा से मुक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्याय से मुक्ति और अवसरों की असमानता से मुक्ति। एक गरीब व्यक्ति यदि अपनी मेहनत से आगे बढ़ सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक युवा अपनी योग्यता के आधार पर रोजगार पा सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक किसान अपनी फसल का उचित मूल्य प्राप्त कर सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक महिला सुरक्षित होकर अपने निर्णय ले सकती है और एक नागरिक बिना भय के सरकार से सवाल पूछ सकता है—तभी लोकतांत्रिक आजादी का अर्थ वास्तविक जीवन में दिखाई देगा। भारत ने </span>1947 <span lang="hi" xml:lang="hi">से </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">तक लंबी यात्रा तय की है। इसलिए केवल कमियों की चर्चा करना भी उचित नहीं होगा। देश ने अनेक क्षेत्रों में असाधारण उपलब्धियां हासिल की हैं। लेकिन उपलब्धियां मंजिल नहीं होतीं। वे अगली मंजिल की नींव होती हैं। आजादी की </span>79<span lang="hi" xml:lang="hi">वीं वर्षगांठ हमें उत्सव के साथ आत्ममंथन का अवसर भी देती है। हमें यह पूछना चाहिए कि अगले कुछ वर्षों में भारत को कैसा बनाना है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/186149/79-years-of-independence-and-the-dream-of-the-common</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/186149/79-years-of-independence-and-the-dream-of-the-common</guid>
                <pubDate>Sat, 22 Aug 2026 21:39:01 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-08/hindi-divas13.jpg"                         length="173958"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[अजय यादव]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बाईस वर्षों की कैद, एक निर्दोष की चीख और न्याय का मौन</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">भारत की न्याय व्यवस्था का एक मूल सिद्धांत है कि सौ अपराधी छूट जाएं, लेकिन एक भी निर्दोष व्यक्ति को दंड नहीं मिलना चाहिए। यह सिद्धांत केवल कानून की किताबों में लिखी गई पंक्ति नहीं, बल्कि सभ्य समाज की आत्मा है। किंतु जब यही आत्मा घायल हो जाती है, तब केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरे न्याय तंत्र की विश्वसनीयता कठघरे में खड़ी हो जाती है। ओडिशा के अर्जुन जानी का मामला इसी कड़वी सच्चाई का आईना है। हत्या के आरोप में बाईस वर्षों तक जेल की अंधेरी कोठरी में रहने के बाद जब सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें निर्दोष घोषित</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184844/twenty-two-years-of-imprisonment-the-scream-of-an-innocent-and"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/10021187521.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">भारत की न्याय व्यवस्था का एक मूल सिद्धांत है कि सौ अपराधी छूट जाएं, लेकिन एक भी निर्दोष व्यक्ति को दंड नहीं मिलना चाहिए। यह सिद्धांत केवल कानून की किताबों में लिखी गई पंक्ति नहीं, बल्कि सभ्य समाज की आत्मा है। किंतु जब यही आत्मा घायल हो जाती है, तब केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरे न्याय तंत्र की विश्वसनीयता कठघरे में खड़ी हो जाती है। ओडिशा के अर्जुन जानी का मामला इसी कड़वी सच्चाई का आईना है। हत्या के आरोप में बाईस वर्षों तक जेल की अंधेरी कोठरी में रहने के बाद जब सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें निर्दोष घोषित किया, तब यह केवल एक व्यक्ति की रिहाई नहीं थी, बल्कि न्याय व्यवस्था की उस पीड़ा का स्वीकार था जिसे स्वयं सर्वोच्च न्यायालय ने "न्याय व्यवस्था की सामूहिक विफलता" कहा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कल्पना कीजिए, एक ऐसा युवक जिसने कोई अपराध नहीं किया, फिर भी अपनी जवानी जेल की सलाखों के पीछे गुजार दी। हर सुबह यह उम्मीद लेकर जागा कि शायद आज उसकी बेगुनाही साबित होगी, लेकिन हर शाम निराशा के साथ लौटती रही। वह लगातार कहता रहा कि वह निर्दोष है, मगर उसकी आवाज अदालतों की फाइलों, पुलिस की जांच और कानूनी प्रक्रियाओं के शोर में कहीं दब गई। उसकी चीखें किसी के कानों तक नहीं पहुंचीं। आखिरकार जब न्याय मिला, तब तक उसके जीवन के बाईस वर्ष उससे छिन चुके थे। यह न्याय था या केवल एक देर से स्वीकार की गई भूल?</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि निचली अदालत ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया और उच्च न्यायालय भी अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रहा। यह टिप्पणी केवल दो अदालतों पर नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न है, जिसका उद्देश्य निर्दोष की रक्षा करना और दोषी को दंड देना है। यदि जांच निष्पक्ष होती, यदि साक्ष्यों की गंभीरता से समीक्षा की जाती और यदि अपीलों पर समय रहते सुनवाई होती, तो शायद अर्जुन जानी को अपनी जिंदगी के इतने बहुमूल्य वर्ष जेल में नहीं बिताने पड़ते।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि इस त्रासदी का दोषी कौन है? क्या वह व्यक्ति जिसने झूठा आरोप लगाया? क्या पुलिस, जिसने निष्पक्ष जांच नहीं की? क्या अदालतें, जिन्होंने साक्ष्यों का सही परीक्षण नहीं किया? या फिर वह धीमी न्यायिक प्रक्रिया, जिसने एक निर्दोष को वर्षों तक अंधेरे में कैद रखा? सच तो यह है कि इस घटना में किसी एक व्यक्ति को दोषी ठहराकर हम अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते। यह एक ऐसी श्रृंखला थी, जिसमें हर कड़ी ने अपनी भूमिका निभाई और अंततः उसका सबसे बड़ा शिकार एक निर्दोष इंसान बना।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अर्जुन जानी जब अपने गांव लौटे तो वहां उनका घर नहीं था। जिस झोपड़ी में उनका बचपन बीता था, वहां अब केवल झाड़ियां थीं। मां इस दुनिया में नहीं रहीं। परिवार बिखर चुका था। न कोई भाई, न बहन, न जीवनसंगिनी और न ही ऐसा कोई अपना, जिसके कंधे पर सिर रखकर वह अपने बाईस वर्षों का दर्द बयान कर सकें। जेल से वे भले ही बाहर आ गए, लेकिन जिंदगी अब भी एक कैद की तरह ही उनके सामने खड़ी है। जिन सपनों के साथ उन्होंने युवावस्था में जीवन की शुरुआत की होगी, वे सब समय की धूल में दफन हो चुके हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रश्न यह भी है कि क्या केवल बरी हो जाना ही पर्याप्त न्याय है? क्या अदालत का एक आदेश अर्जुन जानी के खोए हुए बाईस वर्ष लौटा सकता है? क्या उनकी मां वापस आ सकती हैं? क्या उनका उजड़ा हुआ घर फिर बस सकता है? क्या उनकी अधूरी रह गई जिंदगी दोबारा शुरू हो सकती है? इन प्रश्नों का उत्तर निस्संदेह 'नहीं' है। इसलिए ऐसे मामलों में केवल रिहाई पर्याप्त नहीं, बल्कि सम्मानजनक पुनर्वास, आर्थिक मुआवजा और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी उतनी ही आवश्यक है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह मामला हमें न्याय व्यवस्था में व्यापक सुधार की आवश्यकता की भी याद दिलाता है। जांच एजेंसियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। झूठे साक्ष्य या लापरवाह जांच के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए। अदालतों में लंबित मामलों का समयबद्ध निपटारा सुनिश्चित होना चाहिए और विशेष रूप से उन मामलों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए, जिनमें कोई व्यक्ति वर्षों से जेल में बंद है। न्याय केवल सही निर्णय का नाम नहीं, बल्कि समय पर दिए गए सही निर्णय का नाम है। विलंबित न्याय कई बार अन्याय से भी अधिक पीड़ादायक बन जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अर्जुन जानी की कहानी केवल उनकी व्यक्तिगत त्रासदी नहीं है। यह उन अनगिनत लोगों की पीड़ा का प्रतीक है, जो वर्षों तक मुकदमों की भूलभुलैया में भटकते रहते हैं। कुछ लोग निर्दोष होते हुए भी जेल में जीवन बिताते हैं, जबकि कुछ मामलों में दोषी कानूनी कमियों का लाभ उठाकर बच निकलते हैं। ऐसी स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए चिंता का विषय है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज आवश्यकता इस बात की है कि इस घटना को केवल एक समाचार बनाकर भुला न दिया जाए। इसे न्यायिक सुधार की दिशा में एक चेतावनी के रूप में देखा जाए। यदि सर्वोच्च न्यायालय स्वयं इसे न्याय व्यवस्था की विफलता मान रहा है, तो यह पूरे तंत्र के लिए आत्ममंथन का अवसर है। न्यायालयों, पुलिस, अभियोजन पक्ष और सरकार—सभी को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में किसी अर्जुन जानी को अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए जीवन के बाईस वर्ष न गंवाने पड़ें।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अर्जुन जानी आज आजाद हैं, लेकिन उनकी आजादी अधूरी है। उनके चेहरे पर उम्र से पहले आई झुर्रियां, आंखों में बसी वीरानी और जीवन की उजड़ी हुई कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि न्याय की सबसे बड़ी कीमत आखिर किसने चुकाई। उन्होंने वह अपराध नहीं किया था, जिसकी सजा उन्हें मिली, लेकिन फिर भी उन्होंने वह सब कुछ खो दिया, जो किसी भी इंसान के जीवन की सबसे बड़ी पूंजी होती है—यौवन, परिवार, सम्मान, सपने और अपनों का साथ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जब भी न्याय व्यवस्था की सफलता का जश्न मनाया जाए, तब अर्जुन जानी जैसे लोगों की कहानी भी याद रखनी चाहिए। क्योंकि किसी भी राष्ट्र की असली पहचान केवल उसके कानूनों से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपने निर्दोष नागरिकों के साथ कितना न्याय करता है। अर्जुन जानी को अंततः अदालत ने निर्दोष घोषित कर दिया, लेकिन उनके जीवन का जो हिस्सा समय निगल गया, उसका फैसला आज भी बाकी है। सबसे बड़ा प्रश्न अब भी वही है—आखिर अर्जुन जानी के खोए हुए बाईस वर्षों का हिसाब कौन देगा?</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/184844/twenty-two-years-of-imprisonment-the-scream-of-an-innocent-and</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/184844/twenty-two-years-of-imprisonment-the-scream-of-an-innocent-and</guid>
                <pubDate>Thu, 06 Aug 2026 22:00:25 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-08/10021187521.jpg"                         length="52027"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>फर्जी मुकदमों की बढ़ती चुनौती: एससी-एसटी और पॉक्सो कानूनों के कथित दुरुपयोग पर उठे गंभीर सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">भारतीय न्याय व्यवस्था में देरी तो है ही पर इसके साथ बहुत से मामले ऐसे हैं जिनका दुरुपयोग बड़ी तेजी से हो रहा है। हम बात कर रहे हैं एससी-एसटी एक्ट और पॉक्सो मामलों की जिनमें आदमी अगर सतर्क नहीं रहा तो बहुत बुरी तरह से घिर जाता है। एससी-एसटी एक्ट और पॉक्सो एक्ट के बढ़ते मुकदमे इसकी गवाही दे रहे हैं। कुछ ऐसे संगठित गिरोह भी हैं जो महिलाओं के द्वारा आदमियों को फंसवाते देखे गए हैं। हालांकि उन गिरोहों का पर्दाफाश होता है लेकिन तब तक आरोपी को सज़ा काटनी ही पड़ती है। इसी तरह एससी-एसटी एक्ट के</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184359/growing-challenge-of-fake-cases-serious-questions-raised-on-alleged"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/rajeev.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारतीय न्याय व्यवस्था में देरी तो है ही पर इसके साथ बहुत से मामले ऐसे हैं जिनका दुरुपयोग बड़ी तेजी से हो रहा है। हम बात कर रहे हैं एससी-एसटी एक्ट और पॉक्सो मामलों की जिनमें आदमी अगर सतर्क नहीं रहा तो बहुत बुरी तरह से घिर जाता है। एससी-एसटी एक्ट और पॉक्सो एक्ट के बढ़ते मुकदमे इसकी गवाही दे रहे हैं। कुछ ऐसे संगठित गिरोह भी हैं जो महिलाओं के द्वारा आदमियों को फंसवाते देखे गए हैं। हालांकि उन गिरोहों का पर्दाफाश होता है लेकिन तब तक आरोपी को सज़ा काटनी ही पड़ती है। इसी तरह एससी-एसटी एक्ट के कानून का दुरुपयोग वर्षों से हो रहा है लेकिन आज तक कितनी ही सरकारें आईं हों इनमें संसोधन नहीं हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को समान न्याय का अधिकार देता है। इसी उद्देश्य से समय-समय पर ऐसे विशेष कानून बनाए गए जो समाज के कमजोर और संवेदनशील वर्गों को सुरक्षा प्रदान कर सकें। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम और पॉक्सो कानून भी इसी सोच का परिणाम हैं। इन कानूनों ने अनेक पीड़ितों को न्याय दिलाने का मार्ग प्रशस्त किया है और समाज में अपराधियों के विरुद्ध कठोर संदेश दिया है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एक दूसरा पक्ष भी लगातार चर्चा में रहा है। कई लोग आरोप लगाते हैं कि व्यक्तिगत दुश्मनी, संपत्ति विवाद, राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता या पारिवारिक संघर्ष में इन कानूनों का दुरुपयोग कर झूठे मुक़दमे दर्ज कराए जाते हैं। यह मुद्दा अदालतों, विधि विशेषज्ञों और समाज के बीच लगातार बहस का विषय बना हुआ है। क्या सचमुच फर्जी मुकदमों की बाढ़ है?</p>
<p style="text-align:justify;"><br />यह कहना कि अधिकांश एससी-एसटी या पॉक्सो के मामले फर्जी हैं, उपलब्ध आधिकारिक आँकड़ों के आधार पर उचित नहीं होगा। कई मामलों में जांच के बाद आरोप सिद्ध नहीं हो पाते, लेकिन इसका कारण हमेशा झूठा मुकदमा नहीं होता। कमजोर जांच, पर्याप्त साक्ष्यों का अभाव, गवाहों का मुकर जाना, समझौते का दबाव या लंबी न्यायिक प्रक्रिया भी इसके कारण हो सकते हैं। हालाँकि, विभिन्न उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय ने अलग-अलग मामलों में यह भी स्वीकार किया है कि कुछ मामलों में कानूनों का दुरुपयोग होने की शिकायतें सामने आई हैं। इसलिए यह विषय संतुलित दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है। निर्दोष व्यक्ति पर मुकदमे का प्रभाव- यदि कोई व्यक्ति वास्तव में झूठे मुकदमे में फँस जाता है, तो उसका प्रभाव केवल अदालत तक सीमित नहीं रहता। उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा प्रभावित होती है, नौकरी पर संकट आ सकता है, आर्थिक बोझ बढ़ जाता है और पूरा परिवार मानसिक तनाव से गुजरता है। वर्षों तक मुकदमा चलने के बाद यदि वह निर्दोष साबित भी हो जाए, तब भी खोया हुआ समय और सम्मान आसानी से वापस नहीं आता। दूसरी ओर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि एससी-एसटी कानून और पॉक्सो अधिनियम लाखों वास्तविक पीड़ितों की सुरक्षा के लिए बनाए गए हैं। भारत में जातीय उत्पीड़न और बच्चों के साथ यौन अपराध आज भी गंभीर समस्या हैं। यदि इन कानूनों को कमजोर किया जाए या हर शिकायत को संदेह की दृष्टि से देखा जाए, तो वास्तविक पीड़ित न्याय पाने से वंचित हो सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />इसलिए चुनौती यह नहीं है कि कानून समाप्त कर दिए जाएँ, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि उनका सही और निष्पक्ष उपयोग हो। देश की अदालतों में करोड़ों मुकदमे लंबित हैं। विशेष कानूनों के अंतर्गत दर्ज मामलों की संख्या बढ़ने से न्यायिक व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। सुनवाई में देरी के कारण न तो पीड़ित को समय पर न्याय मिल पाता है और न ही निर्दोष व्यक्ति को शीघ्र राहत। तेज और वैज्ञानिक जांच, पर्याप्त न्यायाधीशों की नियुक्ति तथा समयबद्ध सुनवाई इस समस्या के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। सरकार की जिम्मेदारी केवल कठोर कानून बनाना नहीं है, बल्कि उनकी निष्पक्ष क्रियान्वयन व्यवस्था सुनिश्चित करना भी है। यदि कहीं झूठे मुकदमे दर्ज होते हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। वहीं यदि वास्तविक पीड़ित न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं तो उन्हें भी समय पर न्याय मिलना चाहिए। इस विषय पर कई विधि विशेषज्ञ निम्न सुधारों की आवश्यकता बताते हैं— निष्पक्ष और वैज्ञानिक पुलिस जांच। फॉरेंसिक साक्ष्यों का अधिक उपयोग। विशेष अदालतों की संख्या बढ़ाना।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />लंबित मामलों का समयबद्ध निस्तारण। यदि अदालत यह पाए कि शिकायत जानबूझकर झूठी और दुर्भावनापूर्ण थी, तो कानून के अनुसार उचित कार्रवाई। पुलिस और अभियोजन अधिकारियों का नियमित प्रशिक्षण। "सरकार और अदालतें धृतराष्ट्र बनी हुई हैं" जैसी अभिव्यक्ति एक राजनीतिक और भावनात्मक टिप्पणी हो सकती है, लेकिन वास्तविक समाधान तथ्यों और संस्थागत सुधारों में निहित है। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में दो सिद्धांत समान रूप से महत्वपूर्ण हैं—दोषी को दंड मिले और निर्दोष को अनावश्यक दंड या उत्पीड़न न झेलना पड़े। इसलिए आवश्यकता न तो कानूनों को कमजोर करने की है और न ही हर शिकायत को झूठा मानने की। आवश्यकता ऐसी न्याय व्यवस्था की है जो वास्तविक पीड़ितों को शीघ्र न्याय दिलाए, निर्दोष लोगों के अधिकारों की रक्षा करे और न्याय प्रणाली पर जनता का विश्वास मजबूत बनाए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/184359/growing-challenge-of-fake-cases-serious-questions-raised-on-alleged</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/184359/growing-challenge-of-fake-cases-serious-questions-raised-on-alleged</guid>
                <pubDate>Thu, 30 Jul 2026 22:55:39 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-07/rajeev.jpg"                         length="77904"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>नया न्यायिक सवेरा – जब न्याय समय पर मिले, तो हर घाव भर जाता है</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय न्याय व्यवस्था में कुछ फैसले केवल कानूनी आदेश नहीं होते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि बदलाव की नई दिशा तय करते हैं। </span>29 <span lang="hi" xml:lang="hi">मई </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">को सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी निर्देश ऐसा ही एक ऐतिहासिक हस्तक्षेप है। न्यायमूर्ति सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सभी हाईकोर्टों को स्पष्ट किया कि सुनवाई पूरी होने के बाद सुरक्षित (रिजर्व) रखा गया कोई भी फैसला सामान्यतः तीन महीने से अधिक लंबित नहीं रहना चाहिए। संविधान के अनुच्छेद </span>142 <span lang="hi" xml:lang="hi">के तहत जारी यह निर्देश महज प्रशासनिक व्यवस्था नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि न्याय की मूल भावना को सशक्त करने का प्रयास है। वर्षों</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180348/new-judicial-dawn-%E2%80%93-when-justice-is-delivered-on-time"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/images11.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय न्याय व्यवस्था में कुछ फैसले केवल कानूनी आदेश नहीं होते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि बदलाव की नई दिशा तय करते हैं। </span>29 <span lang="hi" xml:lang="hi">मई </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">को सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी निर्देश ऐसा ही एक ऐतिहासिक हस्तक्षेप है। न्यायमूर्ति सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सभी हाईकोर्टों को स्पष्ट किया कि सुनवाई पूरी होने के बाद सुरक्षित (रिजर्व) रखा गया कोई भी फैसला सामान्यतः तीन महीने से अधिक लंबित नहीं रहना चाहिए। संविधान के अनुच्छेद </span>142 <span lang="hi" xml:lang="hi">के तहत जारी यह निर्देश महज प्रशासनिक व्यवस्था नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि न्याय की मूल भावना को सशक्त करने का प्रयास है। वर्षों से न्यायालयों में गूंज रही “तारीख पर तारीख” की संस्कृति पर इसे एक निर्णायक और दूरगामी प्रहार माना जा रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">न्याय की सबसे बड़ी कसौटी केवल निर्णय नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उसका समय पर मिलना है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह न्यायिक प्रक्रिया की उस गंभीर खामी पर प्रहार करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे लाखों मुकदमेबाज वर्षों से प्रभावित होते रहे हैं। अनेक मामलों में बहस पूरी होने के बाद फैसले सुरक्षित रख लिए जाते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उन्हें महीनों या वर्षों तक सुनाया नहीं जाता था।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">परिणामस्वरूप पक्षकार कानूनी अनिश्चितता में जीने को विवश हो जाते थे और उनका रोजगार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवसाय तथा भविष्य अदालत के निर्णय की प्रतीक्षा में अटक जाता था। इसी वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि न्यायिक फैसलों का अनिश्चितकाल तक लंबित रहना स्वीकार्य नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि न्याय का अर्थ केवल सुनवाई नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समय पर निर्णय भी है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस आदेश की शक्ति उसके संवैधानिक आधार में निहित है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद </span>21 <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि समय पर न्याय की अपेक्षा का भी संरक्षक है। जब किसी व्यक्ति का सम्मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोजगार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भविष्य या स्वतंत्रता किसी फैसले पर निर्भर हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब निर्णय में अनावश्यक देरी उसके मौलिक अधिकारों को प्रभावित करती है। इसलिए न्यायालय ने समयबद्ध न्याय को महज प्रशासनिक आवश्यकता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि संवैधानिक दायित्व माना है। न्यायमूर्ति सूर्य कांत का यह कथन कि उन्होंने अपने लगभग पंद्रह वर्षों के हाईकोर्ट कार्यकाल में कभी किसी रिजर्व फैसले को तीन महीने से अधिक लंबित नहीं रखा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूरी न्यायपालिका के लिए एक प्रेरक मानक प्रस्तुत करता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट ने सबसे स्पष्ट और कड़ा संदेश दिया है। अदालत ने निर्देश दिया कि जमानत याचिकाओं पर आदेश आदर्श रूप से उसी दिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अथवा अधिकतम अगले दिन जारी हो तथा इसकी सूचना तत्काल जेल प्रशासन तक पहुंचे। यह उन हजारों विचाराधीन कैदियों के लिए बड़ी राहत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो दोषसिद्धि के बिना लंबे समय से कारावास में हैं। न्यायालय का स्पष्ट मत है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रक्रियागत देरी की भेंट नहीं चढ़ाया जा सकता। जमानत मंजूर होने के बाद उसका त्वरित लाभ मिलना ही वास्तविक न्याय है। इससे न केवल जेलों का बोझ घटेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि न्यायपालिका में जनविश्वास भी और मजबूत होगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस ऐतिहासिक निर्देश की सबसे बड़ी ताकत उसका जवाबदेह निगरानी तंत्र है। सुप्रीम कोर्ट ने केवल समय-सीमा तय नहीं की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उसके पालन की ठोस व्यवस्था भी सुनिश्चित की है। तीन महीने के भीतर फैसला न आने पर मामला मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जाएगा और आवश्यकता पड़ने पर दूसरी पीठ को सौंपा जा सकेगा। साथ ही लंबित रिजर्व मामलों की निगरानी के लिए डिजिटल ट्रैकिंग प्रणाली विकसित करने के निर्देश दिए गए हैं। यह व्यवस्था पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करेगी। वहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जटिल मामलों के लिए सीमित छूट का प्रावधान रखकर न्यायालय ने व्यावहारिक संतुलन भी बनाए रखा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह पहल केवल लंबित फैसलों के निस्तारण का उपाय नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि न्याय व्यवस्था की कार्यसंस्कृति में बदलाव का स्पष्ट संकेत है। देश में करोड़ों मुकदमे लंबित हैं और लगातार स्थगन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लंबी सुनवाई तथा निर्णयों में देरी ने आम नागरिक के मन में न्याय को एक थकाऊ और अंतहीन प्रक्रिया बना दिया था। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम बताता है कि शीर्ष अदालत अब केवल अंतिम फैसले सुनाने तक सीमित नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पूरे न्यायिक तंत्र को अधिक उत्तरदायी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभावी और परिणामोन्मुख बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। समयबद्ध निर्णयों की संस्कृति विकसित होने से न्यायालयों की कार्यक्षमता बढ़ेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा और मुकदमों के निस्तारण की गति को नई ऊर्जा मिलेगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बेशक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस सुधार की राह पूरी तरह आसान नहीं है। कई हाईकोर्ट न्यायाधीशों की कमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बढ़ते मुकदमों के बोझ और जटिल मामलों की चुनौती से जूझ रहे हैं। कुछ मामलों में गहन अध्ययन के कारण निर्णय में अतिरिक्त समय भी स्वाभाविक है। फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने व्यावहारिक संतुलन बनाए रखा है। अतिरिक्त पीठों का गठन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल तकनीक का विस्तार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक केस मैनेजमेंट और प्रशासनिक दक्षता में सुधार इस बदलाव को गति दे सकते हैं। इन उपायों के प्रभावी क्रियान्वयन से न्यायिक प्रक्रिया की रफ्तार और गुणवत्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों में उल्लेखनीय सुधार संभव है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">किसी भी न्यायिक सुधार की असली कसौटी उसका प्रभाव आम नागरिक के जीवन पर होता है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश मुकदमेबाजों को भरोसा देता है कि सुनवाई पूरी होने के बाद उनका मामला अनिश्चित प्रतीक्षा में नहीं रहेगा। किसान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मध्यमवर्ग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्योग जगत और समाज के कमजोर वर्गों के लिए समयबद्ध न्याय नई उम्मीद लेकर आएगा। समय पर मिला न्याय कानून की प्रतिष्ठा और लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनविश्वास को मजबूत करता है। यदि इस निर्देश का प्रभावी पालन हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो “तारीख पर तारीख” की संस्कृति अतीत बन सकती है और “समय पर न्याय” भारतीय न्याय व्यवस्था की नई पहचान।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/180348/new-judicial-dawn-%E2%80%93-when-justice-is-delivered-on-time</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/180348/new-judicial-dawn-%E2%80%93-when-justice-is-delivered-on-time</guid>
                <pubDate>Sat, 30 May 2026 22:40:55 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-05/images11.jpg"                         length="118852"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मुकदमों की पेंडिंग लिस्ट बढ़ने का सबसे बड़ा कारण जजों की संख्या है.।</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</strong></p>
<p style="text-align:justify;">इलाहाबाद हाईकोर्ट में केवल 110 जज हैं. इन जजों के भरोसे ये 12 लाख पेंडिंग केस हैं. केस निपटाने को लेकर जजों पर प्रेशर भी है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के तहत केसों की पेंडिंसि खत्म करनी है.</p>
<p style="text-align:justify;">इन्हीं दबावों के बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस सुभाष विद्यार्थी का बयान भी चर्चा में है. हाल ही में जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने एक सुनवाई के दौरान कहा था-मुझे भूख लग रही है, थकान महसूस हो रही है और मैं शारीरिक रूप से निर्णय देने में असमर्थ हूं. इसलिए फैसले की सुरक्षित रखा जाता है.</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसी बात कहने</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173065/the-biggest-reason-for-increasing-the-pending-list-of-cases"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/allahabad-high-court.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</strong></p>
<p style="text-align:justify;">इलाहाबाद हाईकोर्ट में केवल 110 जज हैं. इन जजों के भरोसे ये 12 लाख पेंडिंग केस हैं. केस निपटाने को लेकर जजों पर प्रेशर भी है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के तहत केसों की पेंडिंसि खत्म करनी है.</p>
<p style="text-align:justify;">इन्हीं दबावों के बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस सुभाष विद्यार्थी का बयान भी चर्चा में है. हाल ही में जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने एक सुनवाई के दौरान कहा था-मुझे भूख लग रही है, थकान महसूस हो रही है और मैं शारीरिक रूप से निर्णय देने में असमर्थ हूं. इसलिए फैसले की सुरक्षित रखा जाता है.</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसी बात कहने के पीछ जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की मजबूरी यह थी कि 24 फरवरी को ऋण वसूली न्यायाधिकरण (डीआरटी) के एक आदेश के खिलाफ सुनवाई के बाद न्यायाधीश ने तत्काल आदेश पारित करने के बजाय, टिप्पणी के साथ फैसला सुरक्षित रख लिया.</p>
<p style="text-align:justify;">24 फरवरी का दिन जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की अदालत के लिए बेहद व्यस्त रहा. उनकी लिस्ट में कुल 235 मामले लगे थे. इनमें 92 नए केस, 101 नियमित मामले, 39 विविध आवेदन और 3 एडिशनल लिस्ट के मामले शामिल थे. दोपहर 4:15 बजे तक जस्टिस विद्यार्थी केवल 29 नए मामलों की ही सुनवाई कर पाए थे.</p>
<p style="text-align:justify;">इसी बीच उन्हें सूचित किया गया कि अगला मामला सुप्रीम कोर्ट द्वारा रिमांड (वापस भेजा गया) किया गया है और इसकी समय सीमा 24 फरवरी को ही समाप्त हो रही है. इसके बाद जस्टिस विद्यार्थी ने इस विशेष मामले की सुनवाई शुरू की, जो लगातार शाम 7 बजे तक चली.</p>
<p style="text-align:justify;">जज की इस टिप्पणी ने एक नई बहस छेड़ दी है. यह वाकया दर्शाता है कि भारतीय अदालतों में जजों पर काम का कितना दबाव है. एक ही दिन में 200 से अधिक केस लिस्ट होना और फिर देर शाम तक सुनवाई करना किसी भी व्यक्ति के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से चुनौतीपूर्ण होता है.</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल  सुप्रीम कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट तक केस की बड़ी पेंडेंसी है. वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में लगभग 92800 मामले पेंडिंग हैं. जिनमें से 72000 मामले सिविल के हैं और 20800 मामले अपराधिक (फौजदारी) के हैं. पिछले एक साल में सुप्रीम कोर्ट में 10000 से अधिक पेंडेंसी बढ़ी है.</p>
<p style="text-align:justify;">पूरे देश में सबसे ज्यादा पेंडेंसी इलाहाबाद हाईकोर्ट में है. इलाहाबाद हाईकोर्ट में लगभग 12 लाख केस पेंडिंग हैं. बड़ी बात यह है कि पूरे देश में हाईकोर्ट में जितने केस पेंडिंग हैं उसका 20% यानी की पांचवां हिस्सा अकेले इलाहाबाद हाईकोर्ट में है. इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में 22265 मामले पेंडिंग हैं.</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट में जजों के 34 पद हैं, जिनमें से 33 पदों पर वर्तमान में नियुक्तियां हैं, एक पद खाली है. निर्धारित पदों के सापेक्ष जजों की नियुक्ति होने के बावजूद भी पेंडेंसी 92828 है, जो यह दर्शाती है कि कोर्ट में आने वाले केसों की रफ्तार काफी तेज है. इलाहाबाद हाईकोर्ट की बात करें तो कुल 160 जजों के पद हैं, जिनमें से 110 पदों पर नियुक्ति है. 50 पद खाली हैंं. यानि इलाहाबाद हाईकोर्ट में 31% जजों के पद खाली हैं.</p>
<p style="text-align:justify;">अगर पूरे देश के हाईकोर्ट की बात करें तो सभी 25 हाईकोर्ट में कुल 1114 पद सृजित हैं, जिनमें से 804 पदों पर जज नियुक्त हैं. पूरे देश में हाईकोर्ट के 310 पदों पर जजों की नियुक्ति नहीं है. इसका मतलब पूरे देश में हाईकोर्ट के 27.8 प्रतिशत जजों के पद खाली हैं.</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट ही नहीं जिला कोर्ट में भी केस की संख्या अधिक होने के चलते जज पर काम का प्रेशर होता है. वहीं पक्षकारों को भी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. कोर्ट पर अधिक दबाव होने के चलते मुकदमे की सुनवाई समय से नहीं हो पाती है. एक दिन में अधिक मामले सुनाने पड़ते हैं जिसके चलते केस पर जज अधिक समय नहीं दे पाते और तारीख पर तारीख का खेल चलता रहता है.</p>
<p style="text-align:justify;">आपराधिक मामलों में कोर्ट पर ओवर बर्डन होने के चलते बेल मिलने में समस्या होती है. एक हियरिंग के लिए लिस्टिंग करने के बाद दूसरी हियरिंग की लिस्टिंग होने में महीनों का समय लग जाता है. ऐसे में अगर एक हियरिंग पर किन्ही कारणों से बेल रिजेक्ट होती है, तो दूसरी बेल का मौका मिलने में कई बार महीनों का समय लगता है.</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/173065/the-biggest-reason-for-increasing-the-pending-list-of-cases</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/173065/the-biggest-reason-for-increasing-the-pending-list-of-cases</guid>
                <pubDate>Mon, 09 Mar 2026 23:01:09 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-02/allahabad-high-court.jpg"                         length="163759"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>न्यायपालिका के आत्मावलोकन की जरूरत को स्वीकार करें मीलार्ड! </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">एनसीईआरटी की कक्षा आठ की एक किताब में न्यायपालिका से जुड़ी विवादित सामग्री पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा आपत्ति जताने के बाद सरकार द्वारा न्यायिक भ्रष्टाचार से संबंधित विवादास्पद अंशों को हटाने का निर्णय लिया है।गुरुवार सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी की कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित अध्याय पर कड़ा रुख अपनाते हुए पुस्तक पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है।सवाल उठता है कि माननीय शीर्ष अदालत ने जिस तरह इस मामले में तत्परता दिखाते हुए तथ्यपरक अध्याय पर गंभीर आपत्ति और कारवाई की है क्या ऐसी ही तत्परता न्यायपालिका की साख</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/171886/millard-accepts-the-need-for-introspection-of-the-judiciary"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/supream-court7.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एनसीईआरटी की कक्षा आठ की एक किताब में न्यायपालिका से जुड़ी विवादित सामग्री पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा आपत्ति जताने के बाद सरकार द्वारा न्यायिक भ्रष्टाचार से संबंधित विवादास्पद अंशों को हटाने का निर्णय लिया है।गुरुवार सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी की कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित अध्याय पर कड़ा रुख अपनाते हुए पुस्तक पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है।सवाल उठता है कि माननीय शीर्ष अदालत ने जिस तरह इस मामले में तत्परता दिखाते हुए तथ्यपरक अध्याय पर गंभीर आपत्ति और कारवाई की है क्या ऐसी ही तत्परता न्यायपालिका की साख पर धब्बा लगाने वाले न्यायिक व्यवस्था से जुड़े भ्रष्टाचारियों के खिलाफ भी अमल में लायी गयी। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको बता दें कि शीर्ष अदालत ने बाजार में उपलब्ध सभी प्रतियां जब्त करने और डिजिटल संस्करण हटाने के साथ ही पुस्तक को सार्वजनिक पहुंच से हटाने के आदेश दिए हैं। इतना ही नहीं कोर्ट ने अध्याय तैयार करने वाली कमेटी के सदस्यों का ब्योरा तलब किया हैं। एनसीईआरटी के निदेशक और स्कूल शिक्षा सचिव को कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा है कि बताएं क्यों न जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। दो सप्ताह में अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश देते हुए मामले को 11 मार्च को फिर सुनवाई के लिए लगाने का निर्देश दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि यह न्यायपालिका को कमजोर करने और उसकी गरिमा को ठोस पहुंचाने की सुनियोजित साजिश है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने माफी मांगते हुए कहा कि इस अध्याय को तैयार करने वाले दो लोग अब कभी भी एनसीईआरटी या किसी भी मंत्रालय में काम नहीं करेंगे तो चीफ जस्टिस सूर्यकांत की टिप्पणी थी कि तब तो ये बहुत आसान हो जाएगा और वो बरी हो जाएंगे। उन्होंने गोली चलाई है, न्यायपालिका आज खून से लथपथ है।चीफ जस्टिस ने कहा कि पुस्तक की प्रतियां बाजार में हैं। ये एक सोची समझी चाल है। पूरे शिक्षण समुदाय को बताया जाएगा कि भारतीय न्यायपालिका भ्रष्ट है और मामले लंबित हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह स्वीकार्य तथ्य है कि देश की न्यायपालिका केवल एक संवैधानिक संस्था नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा है। जब इस संस्था की छवि, भूमिका या विश्वसनीयता से जुड़ा कोई प्रश्न उठता है, तो उसका असर पूरे समाज और आने वाली पीढ़ियों की सोच पर पड़ता है। आम नागरिक जब अन्य सभी दरवाजों से निराश हो जाता है, तब वह अदालत की चौखट पर दस्तक देता है। ऐसे में यदि स्कूली पाठ्यपुस्तकों में न्यायपालिका को 'भ्रष्टाचार' जैसी गंभीर चुनौती के संदर्भ में प्रस्तुत किया जाए, तो हो सकता है कि बच्चों का विश्वास न्यायपालिका पर से बचपन में ही डगमगा जाएगा। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको बता दें कि एनसीईआरटी की कक्षा आठ की किताब में विवादित अध्याय 'हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका' शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। पहले के संस्करणों में जहां न्यायालयों की संरचना, कार्यप्रणाली और न्याय तक पहुंच पर ध्यान केंद्रित था, वहीं नये संस्करण में व्यवस्था की चुनौतियों पर भी चर्चा की गयी है। 'न्यायपालिका में भ्रष्टाचार' शीर्षक खंड में कहा गया है कि विभिन्न स्तरों पर लोगों को भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ सकता है और गरीब तथा वंचित वर्गों के लिए इससे न्याय तक पहुंच और कठिन हो सकती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पुस्तक में यह भी लेख है कि राज्य और केंद्र स्तर पर पारदर्शिता बढ़ाने तथा तकनीक के उपयोग से सुधार के प्रयास किये जा रहे हैं। पुस्तक में लंबित मुकदमों के आंकड़े भी दिये गये हैं। इसमें बताया गया है कि उच्चतम न्यायालय में लगभग 81 हजार मामले लंबित हैं, उच्च न्यायालयों में लगभग 62.40 लाख और जिला तथा अधीनस्थ न्यायालयों में करीब 4.70 करोड़ मामले लंबित हैं। ये आंकड़े न्याय प्रणाली पर बढ़ते बोझ को दर्शाते हैं। पुस्तक में केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण और निगरानी प्रणाली के जरिये प्राप्त शिकायतों का भी अलेख है और बताया गया है कि 2017 से 2021 के बीच 1600 से अधिक शिकायतें दर्ज की गयीं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नयी पुस्तक के "न्यायपालिका में भ्रष्टाचार" खंड में कहा गया है कि न्यायाधीश एक आचार संहिता से बंधे होते हैं जो न केवल अदालत में उनके व्यवहार को नियंत्रित करती है, बल्कि अदालत के बाहर उनके आचरण को भी नियंत्रित करती है। इस अध्याय में भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई का कथन भी उद्धृत किया गया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि न्यायपालिका के भीतर भ्रष्टाचार और कदाचार की घटनाएं जन विश्वास पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं, किंतु त्वरित और पारदर्शी कार्रवाई से इस विश्वास को पुन स्थापित किया जा सकता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हाल ही में यह मामला मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष लाकर वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने इस पर गंभीर आपत्ति जताई। सिब्बल ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि स्कूली बच्चों को न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बारे में पढ़ाया जाना न केवल अनुचित है, बल्कि निंदनीय भी है। । मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने तत्काल संज्ञान लिया। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको बता दें कि लोकतंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही आवश्यक तत्व हैं। न्यायपालिका भी इससे अछूती नहीं है। समय-समय पर अदालतों ने स्वयं यह कहा है कि आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, बशर्ते यह तथ्यात्मक और मर्यादित हो। बेशक न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर एक पाठ्यपुस्तक के आलेख पर न्याय के देवता बुरी तरह बिफर रहें हैं इससे न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का प्रश्न ओझल होने वाला नहीं है। न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के अनेक मामले सामने आ चुके हैं और उन पर व्यापक चर्चा भी होती रहती है। हाल में सबसे अधिक चर्चा हुई दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश रहे यशवंत वर्मा के भ्रष्टाचार की। उनके आवास से करोड़ों के अधजले नोट बरामद किए गए थे। चूंकि उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हो सकी है, इसलिए वे अपने पद पर बने हुए हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यहां गौर तलब है कि भ्रष्टाचार के कारण अन्य अनेक न्यायाधीश भी कठघरे में खड़े हो चुके हैं। इनमें से कई न्यायाधीशों के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन किसी के भी विरुद्ध वह अंजाम तक नहीं पहुंच सकी। इसका यह मतलब नहीं हो सकता कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है ही नहीं।एनसीईआरटी की पहले की पुस्तक में भी न्यायपालिका के बारे में उल्लेख था, लेकिन वह न्यायालयों की संरचना और भूमिका तक सीमित था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लेकिन इस पूरे प्रकरण में कुछ बुनियादी प्रश्न उठते हैं। पहला, क्या पाठ्यपुस्तकों में संस्थागत भ्रष्टाचार जैसे विषयों का उल्लेख पूरी तरह से प्रतिबंधित होना चाहिए? दूसरा, यदि आलोचना हो, तो उसका स्वर, संदर्भ और प्रस्तुति कैसी होनी चाहिए? और तीसरा, बच्चों को संवैधानिक संस्थाओं के बारे में किस प्रकार की समझ दी जानी चाहिए ? यह स्वीकार करना चाहिए कि कक्षा आठ के विद्यार्थी किशोरावस्था की दहलीज पर होते हैं जटिल संस्थागत संदर्भों को पूरी गहराई से समझने की स्थिति में नहीं होते। ऐसे में यदि उन्हें यह बताया जाए कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है, तो यह आवश्यक है कि साथ ही यह भी बताया जाए कि भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच की व्यवस्था क्या है, न्यायिक जवाबदेही की प्रणाली कैसे काम करती है, और कैसे अधिकांश न्यायाधीश निष्पक्षता व ईमानदारी से अपना दायित्व निभाते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ऐसे में न्यायपालिका को लेकर कोई भी कथन संवेदनशील हो जाता है। मुख्य न्यायाधीश की यह टिप्पणी कि चाहे वह कितना भी ऊंचा पद पर हो, कानून अपना काम करेगा, यह संकेत देती है कि यदि किसी ने जानबूझकर संस्था की छवि धूमिल करने का प्रयास किया है, तो उसके विरुद्ध कार्रवाई हो सकती है।   न्यायपालिका देश की आशा और विश्वास का केंद्र है। उसकी प्रति अक्षुण्ण रहनी चाहिए, पर वह प्रतिष्ठा तथ्यों आलोचना या समीक्षा को दबाने से नहीं, बल्कि सत्य का साहसपूर्वक सामना करने से और भी सुदृढ़ होती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सवाल है कि क्या इस चैप्टर को स्नातक या परास्नातक के पाठ्यक्रम में शामिल करने पर अपनी स्वीकृति मीलार्ड देंगे अथवा उन्हें न्यायपालिका की वास्तविकता पर कोई विश्लेषण स्वीकार नही है? सरकार बैकफुट पर है सफाई में कहा गया है कि एनसीईआरटी एक स्वायत्त संस्था है, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा है कि एनसीईआरटी की पुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर अध्याय शामिल करना दुर्भाग्यपूर्ण है और सरकार इस मामले को गंभीरता से ले रही । इस मामले पर खेद व्यक्त करते हुए प्रधान ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय का जो भी आदेश होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मंत्रालय उसका पालन करेगा। उन्होंने कहा कि विभाग के सचिव को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है कि एनसीईआरटी की पुस्तक में इस तरह का गैर-जिम्मेदाराना अध्याय जोड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।जाहिर है आगामी दिनों मे कुछ लोगों को कटु सच बयानी की सजा मिलेगी न्याय के शिखर का अहम तुष्ट होगा लेकिन भ्रष्टाचार का सवाल यथावत बना रहेगा।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/171886/millard-accepts-the-need-for-introspection-of-the-judiciary</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/171886/millard-accepts-the-need-for-introspection-of-the-judiciary</guid>
                <pubDate>Sat, 28 Feb 2026 18:19:18 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-02/supream-court7.jpg"                         length="147661"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        