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                <title>भारतीय न्यायपालिका - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>भारतीय न्यायपालिका RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>सबरीमाला: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- धर्म में अंधविश्वास क्या है, इसका फैसला करने का हमें अधिकार; सरकार का विरोध</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े 2018 के फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट अब धर्म के भीतर अंधविश्वास की परिभाषा तय करने के अधिकार क्षेत्र पर विचार कर रहा है। बुधवार को एक नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष हुई सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण अवलोकन किया कि किसी धर्म में कौन सी प्रथा अंधविश्वास है, यह तय करने का अधिकार और अधिकार क्षेत्र रखता है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह टिप्पणी केंद्र सरकार की उस दलील के जवाब में आई, जिसमें सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि एक धर्मनिरपेक्ष अदालत इस मुद्दे पर फैसला</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175584/sabarimala-supreme-court-said-we-have-the-right-to-decide"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/supream-court1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े 2018 के फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट अब धर्म के भीतर अंधविश्वास की परिभाषा तय करने के अधिकार क्षेत्र पर विचार कर रहा है। बुधवार को एक नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष हुई सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण अवलोकन किया कि किसी धर्म में कौन सी प्रथा अंधविश्वास है, यह तय करने का अधिकार और अधिकार क्षेत्र रखता है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह टिप्पणी केंद्र सरकार की उस दलील के जवाब में आई, जिसमें सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि एक धर्मनिरपेक्ष अदालत इस मुद्दे पर फैसला नहीं कर सकती, क्योंकि न्यायाधीश कानून के विशेषज्ञ होते हैं, न कि धर्म के। मेहता ने तर्क दिया कि यदि कोई प्रथा अंधविश्वास मानी भी जाती है, तो यह तय करना अदालत का काम नहीं है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 25(2)(बी) के तहत विधायिका का काम है कि वह सुधार कानून बनाए। उन्होंने कहा कि विधायिका किसी विशेष प्रथा को अंधविश्वास बताकर उसमें सुधार कर सकती है, जैसा कि जादू-टोना और अन्य ऐसी प्रथाओं को रोकने के लिए कई कानून बनाए गए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने मेहता के इस तर्क को बहुत सरल बताते हुए कहा कि अदालत के पास यह तय करने का अधिकार और अधिकार क्षेत्र है कि कोई चीज अंधविश्वास है या नहीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसके बाद क्या होगा, यह विधायिका का काम है, लेकिन अदालत में यह नहीं कहा जा सकता कि विधायिका का निर्णय ही अंतिम होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">सॉलिसिटर जनरल मेहता ने यह भी तर्क दिया कि एक धर्मनिरपेक्ष अदालत यह तय नहीं कर सकती कि कोई धार्मिक प्रथा केवल अंधविश्वास है, क्योंकि अदालत के पास ऐसी विद्वत्तापूर्ण क्षमता नहीं हो सकती। उन्होंने कहा 'आप (न्यायाधीश) कानून के क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं, धर्म के नहीं।' मेहता ने यह भी कहा कि नागालैंड के लिए जो धार्मिक हो सकता है, वह किसी और के लिए अंधविश्वास हो सकता है, क्योंकि समाज अत्यंत विविध है।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;">न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने एक अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए कहा कि किसी आवश्यक धार्मिक प्रथा को निर्धारित करते समय, अदालत को उस विशेष धर्म की फिलॉसफी के लेंस से देखना चाहिए। उन्होंने कहा, 'आप किसी अन्य धर्म के विचारों को लागू नहीं कर सकते और कह सकते हैं कि यह आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं है। अदालत का दृष्टिकोण उस धर्म की फिलॉसफी को लागू करना है, जो स्वास्थ्य, नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन हो।'</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>दिल्ली </strong>ने सीता को नहीं छुआ, जबकि वह ऐसा कर सकता था। राम सीता के लिए खड़े नहीं हुए, जबकि उन्हें ऐसा करना चाहिए था। रावण </p>
<p style="text-align:justify;">अक्टूबर 2014 में, अय्यूब ने अली सरदार जाफ़री का एक शेर कोट किया, जिसमें लिखा था, "गरीब सीता के घर पर कब तक रहेगी रावण की हुकूमत, द्रौपदी का लिबास उसके बदन से कब तक छीना करेगा।"</p>
<p style="text-align:justify;">इसके अलावा, 2015 में, अय्यूब ने सावरकर के बारे में एक ट्वीट किया।उस ट्वीट में कहा गया था, "तो वीर सावरकर ने बलात्कार को हिंदू राष्ट्रवाद का एक ज़रूरी हिस्सा बताया था।" सावरकर पर एक और ट्वीट में, अय्यूब ने कहा, "मैं नाथूराम गोडसे का सावरकर के बारे में लिखा विवरण पढ़ रही थी और सोच रही थी कि क्या हमें इस आतंकवादी समर्थक का सम्मान करना जारी रखना चाहिए।"</p>
<p style="text-align:justify;">2016 में, अय्यूब ने एक ट्वीट पोस्ट किया जिसमें एक लड़के की तस्वीर थी, जिसके चेहरे पर चोट के निशान थे।उस ट्वीट में लिखा था, "प्रिय भारतीय सेना, मेरा अंदाज़ा है कि यह छोटा बच्चा भारत की संप्रभुता के लिए इतना बड़ा खतरा था कि उसे ज़िंदगी भर के लिए अंधा कर दिया गया।"</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 08 Apr 2026 22:22:10 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कॉलेजियम सही जजों की रक्षा करने में नाकाम रहा है: जस्टिस दीपांकर दत्ता</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता ने शनिवार को टिप्पणी की कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम अतीत में उन जजों की रक्षा करने में नाकाम रहा है जिन्होंने साहस और ईमानदारी दिखाई; उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसी घटनाओं से जज अपने करियर की तरक्की के बजाय नैतिकता को प्राथमिकता देने से हतोत्साहित हो सकते हैं।"</p>
<p>जस्टिस दत्ता 'न्यायिक शासन की नई कल्पना' (Reimagining Judicial Governance) विषय पर आयोजित 'पहले सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन राष्ट्रीय सम्मेलन 2026' में बोल रहे थे। उन्होंने आग्रह किया कि कॉलेजियम के सदस्यों को इस मौके पर आगे आना चाहिए और अपने साथी जजों की</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173874/justice-dipankar-dutta-says-collegium-has-failed-to-protect-true"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/images-(1)5.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता ने शनिवार को टिप्पणी की कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम अतीत में उन जजों की रक्षा करने में नाकाम रहा है जिन्होंने साहस और ईमानदारी दिखाई; उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसी घटनाओं से जज अपने करियर की तरक्की के बजाय नैतिकता को प्राथमिकता देने से हतोत्साहित हो सकते हैं।"</p>
<p>जस्टिस दत्ता 'न्यायिक शासन की नई कल्पना' (Reimagining Judicial Governance) विषय पर आयोजित 'पहले सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन राष्ट्रीय सम्मेलन 2026' में बोल रहे थे। उन्होंने आग्रह किया कि कॉलेजियम के सदस्यों को इस मौके पर आगे आना चाहिए और अपने साथी जजों की रक्षा करनी चाहिए। </p>
<p>जस्टिस दत्ता सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बी.वी. नागरत्ना के एक भाषण का ज़िक्र कर रहे थे, जिसमें उन्होंने कहा था कि जजों को सही फैसला लेने में हिचकिचाना नहीं चाहिए, भले ही इसकी कीमत उन्हें अपने प्रमोशन (पदोन्नति) के रूप में चुकानी पड़े या इससे सत्ता में बैठे लोग नाराज़ हो जाएं।</p>
<p>हाल ही में केरल हाई कोर्ट में आयोजित 'दूसरे टी.एस. कृष्णमूर्ति अय्यर स्मारक व्याख्यान' में बोलते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा था: "भले ही जजों को पता हो कि अलोकप्रिय फैसलों की कीमत उन्हें अपने प्रमोशन, कार्यकाल में विस्तार (एक्सटेंशन) के रूप में चुकानी पड़ सकती है, लेकिन यह बात उनके फैसलों के आड़े नहीं आनी चाहिए।</p>
<p>आखिरकार, हर जज का अपना दृढ़ विश्वास, साहस और स्वतंत्रता ही सबसे ज़्यादा मायने रखती है।   काबिलियत, ईमानदारी, स्वभाव और मेहनत के आधार पर किया जाना चाहिए।  जुड़ाव, सामाजिक निकटता, लॉबिंग, अनौपचारिक सिफारिशें, या सत्ता में बैठे लोगों के साथ कथित नज़दीकी—चाहे वह न्यायिक हो, राजनीतिक हो या किसी और तरह की—को पूरी तरह से बाहर रखा जाना चाहिए।"</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
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                <pubDate>Sun, 22 Mar 2026 19:40:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>न्यायपालिका के आत्मावलोकन की जरूरत को स्वीकार करें मीलार्ड! </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">एनसीईआरटी की कक्षा आठ की एक किताब में न्यायपालिका से जुड़ी विवादित सामग्री पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा आपत्ति जताने के बाद सरकार द्वारा न्यायिक भ्रष्टाचार से संबंधित विवादास्पद अंशों को हटाने का निर्णय लिया है।गुरुवार सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी की कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित अध्याय पर कड़ा रुख अपनाते हुए पुस्तक पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है।सवाल उठता है कि माननीय शीर्ष अदालत ने जिस तरह इस मामले में तत्परता दिखाते हुए तथ्यपरक अध्याय पर गंभीर आपत्ति और कारवाई की है क्या ऐसी ही तत्परता न्यायपालिका की साख</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/171886/millard-accepts-the-need-for-introspection-of-the-judiciary"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/supream-court7.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एनसीईआरटी की कक्षा आठ की एक किताब में न्यायपालिका से जुड़ी विवादित सामग्री पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा आपत्ति जताने के बाद सरकार द्वारा न्यायिक भ्रष्टाचार से संबंधित विवादास्पद अंशों को हटाने का निर्णय लिया है।गुरुवार सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी की कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित अध्याय पर कड़ा रुख अपनाते हुए पुस्तक पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है।सवाल उठता है कि माननीय शीर्ष अदालत ने जिस तरह इस मामले में तत्परता दिखाते हुए तथ्यपरक अध्याय पर गंभीर आपत्ति और कारवाई की है क्या ऐसी ही तत्परता न्यायपालिका की साख पर धब्बा लगाने वाले न्यायिक व्यवस्था से जुड़े भ्रष्टाचारियों के खिलाफ भी अमल में लायी गयी। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको बता दें कि शीर्ष अदालत ने बाजार में उपलब्ध सभी प्रतियां जब्त करने और डिजिटल संस्करण हटाने के साथ ही पुस्तक को सार्वजनिक पहुंच से हटाने के आदेश दिए हैं। इतना ही नहीं कोर्ट ने अध्याय तैयार करने वाली कमेटी के सदस्यों का ब्योरा तलब किया हैं। एनसीईआरटी के निदेशक और स्कूल शिक्षा सचिव को कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा है कि बताएं क्यों न जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। दो सप्ताह में अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश देते हुए मामले को 11 मार्च को फिर सुनवाई के लिए लगाने का निर्देश दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि यह न्यायपालिका को कमजोर करने और उसकी गरिमा को ठोस पहुंचाने की सुनियोजित साजिश है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने माफी मांगते हुए कहा कि इस अध्याय को तैयार करने वाले दो लोग अब कभी भी एनसीईआरटी या किसी भी मंत्रालय में काम नहीं करेंगे तो चीफ जस्टिस सूर्यकांत की टिप्पणी थी कि तब तो ये बहुत आसान हो जाएगा और वो बरी हो जाएंगे। उन्होंने गोली चलाई है, न्यायपालिका आज खून से लथपथ है।चीफ जस्टिस ने कहा कि पुस्तक की प्रतियां बाजार में हैं। ये एक सोची समझी चाल है। पूरे शिक्षण समुदाय को बताया जाएगा कि भारतीय न्यायपालिका भ्रष्ट है और मामले लंबित हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह स्वीकार्य तथ्य है कि देश की न्यायपालिका केवल एक संवैधानिक संस्था नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा है। जब इस संस्था की छवि, भूमिका या विश्वसनीयता से जुड़ा कोई प्रश्न उठता है, तो उसका असर पूरे समाज और आने वाली पीढ़ियों की सोच पर पड़ता है। आम नागरिक जब अन्य सभी दरवाजों से निराश हो जाता है, तब वह अदालत की चौखट पर दस्तक देता है। ऐसे में यदि स्कूली पाठ्यपुस्तकों में न्यायपालिका को 'भ्रष्टाचार' जैसी गंभीर चुनौती के संदर्भ में प्रस्तुत किया जाए, तो हो सकता है कि बच्चों का विश्वास न्यायपालिका पर से बचपन में ही डगमगा जाएगा। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको बता दें कि एनसीईआरटी की कक्षा आठ की किताब में विवादित अध्याय 'हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका' शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। पहले के संस्करणों में जहां न्यायालयों की संरचना, कार्यप्रणाली और न्याय तक पहुंच पर ध्यान केंद्रित था, वहीं नये संस्करण में व्यवस्था की चुनौतियों पर भी चर्चा की गयी है। 'न्यायपालिका में भ्रष्टाचार' शीर्षक खंड में कहा गया है कि विभिन्न स्तरों पर लोगों को भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ सकता है और गरीब तथा वंचित वर्गों के लिए इससे न्याय तक पहुंच और कठिन हो सकती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पुस्तक में यह भी लेख है कि राज्य और केंद्र स्तर पर पारदर्शिता बढ़ाने तथा तकनीक के उपयोग से सुधार के प्रयास किये जा रहे हैं। पुस्तक में लंबित मुकदमों के आंकड़े भी दिये गये हैं। इसमें बताया गया है कि उच्चतम न्यायालय में लगभग 81 हजार मामले लंबित हैं, उच्च न्यायालयों में लगभग 62.40 लाख और जिला तथा अधीनस्थ न्यायालयों में करीब 4.70 करोड़ मामले लंबित हैं। ये आंकड़े न्याय प्रणाली पर बढ़ते बोझ को दर्शाते हैं। पुस्तक में केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण और निगरानी प्रणाली के जरिये प्राप्त शिकायतों का भी अलेख है और बताया गया है कि 2017 से 2021 के बीच 1600 से अधिक शिकायतें दर्ज की गयीं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नयी पुस्तक के "न्यायपालिका में भ्रष्टाचार" खंड में कहा गया है कि न्यायाधीश एक आचार संहिता से बंधे होते हैं जो न केवल अदालत में उनके व्यवहार को नियंत्रित करती है, बल्कि अदालत के बाहर उनके आचरण को भी नियंत्रित करती है। इस अध्याय में भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई का कथन भी उद्धृत किया गया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि न्यायपालिका के भीतर भ्रष्टाचार और कदाचार की घटनाएं जन विश्वास पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं, किंतु त्वरित और पारदर्शी कार्रवाई से इस विश्वास को पुन स्थापित किया जा सकता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हाल ही में यह मामला मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष लाकर वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने इस पर गंभीर आपत्ति जताई। सिब्बल ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि स्कूली बच्चों को न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बारे में पढ़ाया जाना न केवल अनुचित है, बल्कि निंदनीय भी है। । मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने तत्काल संज्ञान लिया। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको बता दें कि लोकतंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही आवश्यक तत्व हैं। न्यायपालिका भी इससे अछूती नहीं है। समय-समय पर अदालतों ने स्वयं यह कहा है कि आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, बशर्ते यह तथ्यात्मक और मर्यादित हो। बेशक न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर एक पाठ्यपुस्तक के आलेख पर न्याय के देवता बुरी तरह बिफर रहें हैं इससे न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का प्रश्न ओझल होने वाला नहीं है। न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के अनेक मामले सामने आ चुके हैं और उन पर व्यापक चर्चा भी होती रहती है। हाल में सबसे अधिक चर्चा हुई दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश रहे यशवंत वर्मा के भ्रष्टाचार की। उनके आवास से करोड़ों के अधजले नोट बरामद किए गए थे। चूंकि उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हो सकी है, इसलिए वे अपने पद पर बने हुए हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यहां गौर तलब है कि भ्रष्टाचार के कारण अन्य अनेक न्यायाधीश भी कठघरे में खड़े हो चुके हैं। इनमें से कई न्यायाधीशों के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन किसी के भी विरुद्ध वह अंजाम तक नहीं पहुंच सकी। इसका यह मतलब नहीं हो सकता कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है ही नहीं।एनसीईआरटी की पहले की पुस्तक में भी न्यायपालिका के बारे में उल्लेख था, लेकिन वह न्यायालयों की संरचना और भूमिका तक सीमित था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लेकिन इस पूरे प्रकरण में कुछ बुनियादी प्रश्न उठते हैं। पहला, क्या पाठ्यपुस्तकों में संस्थागत भ्रष्टाचार जैसे विषयों का उल्लेख पूरी तरह से प्रतिबंधित होना चाहिए? दूसरा, यदि आलोचना हो, तो उसका स्वर, संदर्भ और प्रस्तुति कैसी होनी चाहिए? और तीसरा, बच्चों को संवैधानिक संस्थाओं के बारे में किस प्रकार की समझ दी जानी चाहिए ? यह स्वीकार करना चाहिए कि कक्षा आठ के विद्यार्थी किशोरावस्था की दहलीज पर होते हैं जटिल संस्थागत संदर्भों को पूरी गहराई से समझने की स्थिति में नहीं होते। ऐसे में यदि उन्हें यह बताया जाए कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है, तो यह आवश्यक है कि साथ ही यह भी बताया जाए कि भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच की व्यवस्था क्या है, न्यायिक जवाबदेही की प्रणाली कैसे काम करती है, और कैसे अधिकांश न्यायाधीश निष्पक्षता व ईमानदारी से अपना दायित्व निभाते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ऐसे में न्यायपालिका को लेकर कोई भी कथन संवेदनशील हो जाता है। मुख्य न्यायाधीश की यह टिप्पणी कि चाहे वह कितना भी ऊंचा पद पर हो, कानून अपना काम करेगा, यह संकेत देती है कि यदि किसी ने जानबूझकर संस्था की छवि धूमिल करने का प्रयास किया है, तो उसके विरुद्ध कार्रवाई हो सकती है।   न्यायपालिका देश की आशा और विश्वास का केंद्र है। उसकी प्रति अक्षुण्ण रहनी चाहिए, पर वह प्रतिष्ठा तथ्यों आलोचना या समीक्षा को दबाने से नहीं, बल्कि सत्य का साहसपूर्वक सामना करने से और भी सुदृढ़ होती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सवाल है कि क्या इस चैप्टर को स्नातक या परास्नातक के पाठ्यक्रम में शामिल करने पर अपनी स्वीकृति मीलार्ड देंगे अथवा उन्हें न्यायपालिका की वास्तविकता पर कोई विश्लेषण स्वीकार नही है? सरकार बैकफुट पर है सफाई में कहा गया है कि एनसीईआरटी एक स्वायत्त संस्था है, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा है कि एनसीईआरटी की पुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर अध्याय शामिल करना दुर्भाग्यपूर्ण है और सरकार इस मामले को गंभीरता से ले रही । इस मामले पर खेद व्यक्त करते हुए प्रधान ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय का जो भी आदेश होगा।</div>
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<div style="text-align:justify;">मंत्रालय उसका पालन करेगा। उन्होंने कहा कि विभाग के सचिव को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है कि एनसीईआरटी की पुस्तक में इस तरह का गैर-जिम्मेदाराना अध्याय जोड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।जाहिर है आगामी दिनों मे कुछ लोगों को कटु सच बयानी की सजा मिलेगी न्याय के शिखर का अहम तुष्ट होगा लेकिन भ्रष्टाचार का सवाल यथावत बना रहेगा।</div>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Sat, 28 Feb 2026 18:19:18 +0530</pubDate>
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