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                <title>Judicial accountability - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Judicial accountability RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>हिरासत में मौत और पुलिसिया हिंसा के मामलों में अभियोजन मंजूरी जरूरी नहीं: ।मध्य प्रदेश हाईकोर्ट।</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज </span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि हिरासत में मौत या पुलिसिया हिंसा के मामलों में पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता (</span>CrPC) <span lang="hi" xml:lang="hi">की धारा 197 के तहत पूर्व सरकारी मंजूरी की आवश्यकता नहीं होती।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने दो पुलिस आरक्षकों की याचिका खारिज करते हुए कहा कि ऐसे कृत्यों का सरकारी कर्तव्य के निर्वहन से कोई उचित संबंध नहीं माना जा सकता। जस्टिस गजेंद्र सिंह की एकल पीठ इंदौर में वर्ष 2015 में हुई एक युवक की कथित हिरासत मौत से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181536/prosecution-sanction-is-not-necessary-in-cases-of-custodial-death"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas6.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज </span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि हिरासत में मौत या पुलिसिया हिंसा के मामलों में पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता (</span>CrPC) <span lang="hi" xml:lang="hi">की धारा 197 के तहत पूर्व सरकारी मंजूरी की आवश्यकता नहीं होती।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने दो पुलिस आरक्षकों की याचिका खारिज करते हुए कहा कि ऐसे कृत्यों का सरकारी कर्तव्य के निर्वहन से कोई उचित संबंध नहीं माना जा सकता। जस्टिस गजेंद्र सिंह की एकल पीठ इंदौर में वर्ष 2015 में हुई एक युवक की कथित हिरासत मौत से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही थी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">याचिकाकर्ता पुलिसकर्मियों ने तर्क दिया कि उनके खिलाफ अभियोजन चलाने से पहले सरकार की मंजूरी आवश्यक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि कथित घटनाएं उनके आधिकारिक कर्तव्यों से जुड़ी हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मामले के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुसूचित जाति समुदाय से संबंध रखने वाले 24 वर्षीय पंकज वैष्णव को 19 दिसंबर 2015 को स्कूटर चोरी के मामले में पूछताछ के लिए इंदौर के एमआईजी थाने लाया गया। उसी रात उसकी पुलिस हिरासत में मौत हो गई। पुलिस ने इसे आत्महत्या बताया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">घटना के बाद </span>CrPC <span lang="hi" xml:lang="hi">की धारा 176 के तहत स्वतंत्र जांच कराई गई। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा की गई जांच में निष्कर्ष निकाला गया कि यह मामला आपराधिक मानव वध का प्रतीत होता है।इसके बाद दो आरक्षकों और एक थाना प्रभारी के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अवैध निरुद्ध करने और झूठे साक्ष्य देने सहित विभिन्न आरोपों में आरोपपत्र दायर किया गया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 197 के संरक्षण का लाभ तभी मिल सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब आरोपित कृत्य और सरकारी कर्तव्य के निर्वहन के बीच स्पष्ट और उचित संबंध हो। लेकिन वर्तमान मामले में ऐसा कोई संबंध नहीं पाया गया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने कहा</span>, “<span lang="hi" xml:lang="hi">यह ऐसा मामला नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें पुलिसकर्मी किसी हिंसक भीड़ को नियंत्रित कर रहे थे और बल प्रयोग करते हुए अपनी सीमा से आगे बढ़ गए हों। यहां आरोपित बल प्रयोग उस समय किया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब मृतक पुलिस हिरासत में था और थाने के नियंत्रण में था। ऐसी स्थिति में बल प्रयोग या शारीरिक हमला करने का कोई औचित्य नहीं था।”</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"> </p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हाईकोर्ट ने कहा कि कानून पुलिस को कुछ विशेष परिस्थितियों में बल प्रयोग की अनुमति देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे हिंसक भीड़ को तितर-बितर करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गिरफ्तारी</span><span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों का भी उल्लेख किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें कहा गया कि हिरासत में हिंसा और मौत सभ्य समाज में सबसे गंभीर अपराधों में से हैं तथा यह व्यक्ति के मूल मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने आरक्षकों की पुनरीक्षण याचिका खारिज की और स्पष्ट किया कि हिरासत में मौत या पुलिसिया हिंसा जैसे मामलों में धारा 197 के तहत अभियोजन मंजूरी का संरक्षण उपलब्ध नहीं होगा।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 13:57:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>नया न्यायिक सवेरा – जब न्याय समय पर मिले, तो हर घाव भर जाता है</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय न्याय व्यवस्था में कुछ फैसले केवल कानूनी आदेश नहीं होते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि बदलाव की नई दिशा तय करते हैं। </span>29 <span lang="hi" xml:lang="hi">मई </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">को सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी निर्देश ऐसा ही एक ऐतिहासिक हस्तक्षेप है। न्यायमूर्ति सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सभी हाईकोर्टों को स्पष्ट किया कि सुनवाई पूरी होने के बाद सुरक्षित (रिजर्व) रखा गया कोई भी फैसला सामान्यतः तीन महीने से अधिक लंबित नहीं रहना चाहिए। संविधान के अनुच्छेद </span>142 <span lang="hi" xml:lang="hi">के तहत जारी यह निर्देश महज प्रशासनिक व्यवस्था नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि न्याय की मूल भावना को सशक्त करने का प्रयास है। वर्षों</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180348/new-judicial-dawn-%E2%80%93-when-justice-is-delivered-on-time"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/images11.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय न्याय व्यवस्था में कुछ फैसले केवल कानूनी आदेश नहीं होते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि बदलाव की नई दिशा तय करते हैं। </span>29 <span lang="hi" xml:lang="hi">मई </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">को सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी निर्देश ऐसा ही एक ऐतिहासिक हस्तक्षेप है। न्यायमूर्ति सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सभी हाईकोर्टों को स्पष्ट किया कि सुनवाई पूरी होने के बाद सुरक्षित (रिजर्व) रखा गया कोई भी फैसला सामान्यतः तीन महीने से अधिक लंबित नहीं रहना चाहिए। संविधान के अनुच्छेद </span>142 <span lang="hi" xml:lang="hi">के तहत जारी यह निर्देश महज प्रशासनिक व्यवस्था नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि न्याय की मूल भावना को सशक्त करने का प्रयास है। वर्षों से न्यायालयों में गूंज रही “तारीख पर तारीख” की संस्कृति पर इसे एक निर्णायक और दूरगामी प्रहार माना जा रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">न्याय की सबसे बड़ी कसौटी केवल निर्णय नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उसका समय पर मिलना है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह न्यायिक प्रक्रिया की उस गंभीर खामी पर प्रहार करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे लाखों मुकदमेबाज वर्षों से प्रभावित होते रहे हैं। अनेक मामलों में बहस पूरी होने के बाद फैसले सुरक्षित रख लिए जाते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उन्हें महीनों या वर्षों तक सुनाया नहीं जाता था।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">परिणामस्वरूप पक्षकार कानूनी अनिश्चितता में जीने को विवश हो जाते थे और उनका रोजगार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवसाय तथा भविष्य अदालत के निर्णय की प्रतीक्षा में अटक जाता था। इसी वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि न्यायिक फैसलों का अनिश्चितकाल तक लंबित रहना स्वीकार्य नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि न्याय का अर्थ केवल सुनवाई नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समय पर निर्णय भी है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस आदेश की शक्ति उसके संवैधानिक आधार में निहित है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद </span>21 <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि समय पर न्याय की अपेक्षा का भी संरक्षक है। जब किसी व्यक्ति का सम्मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोजगार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भविष्य या स्वतंत्रता किसी फैसले पर निर्भर हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब निर्णय में अनावश्यक देरी उसके मौलिक अधिकारों को प्रभावित करती है। इसलिए न्यायालय ने समयबद्ध न्याय को महज प्रशासनिक आवश्यकता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि संवैधानिक दायित्व माना है। न्यायमूर्ति सूर्य कांत का यह कथन कि उन्होंने अपने लगभग पंद्रह वर्षों के हाईकोर्ट कार्यकाल में कभी किसी रिजर्व फैसले को तीन महीने से अधिक लंबित नहीं रखा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूरी न्यायपालिका के लिए एक प्रेरक मानक प्रस्तुत करता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट ने सबसे स्पष्ट और कड़ा संदेश दिया है। अदालत ने निर्देश दिया कि जमानत याचिकाओं पर आदेश आदर्श रूप से उसी दिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अथवा अधिकतम अगले दिन जारी हो तथा इसकी सूचना तत्काल जेल प्रशासन तक पहुंचे। यह उन हजारों विचाराधीन कैदियों के लिए बड़ी राहत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो दोषसिद्धि के बिना लंबे समय से कारावास में हैं। न्यायालय का स्पष्ट मत है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रक्रियागत देरी की भेंट नहीं चढ़ाया जा सकता। जमानत मंजूर होने के बाद उसका त्वरित लाभ मिलना ही वास्तविक न्याय है। इससे न केवल जेलों का बोझ घटेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि न्यायपालिका में जनविश्वास भी और मजबूत होगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस ऐतिहासिक निर्देश की सबसे बड़ी ताकत उसका जवाबदेह निगरानी तंत्र है। सुप्रीम कोर्ट ने केवल समय-सीमा तय नहीं की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उसके पालन की ठोस व्यवस्था भी सुनिश्चित की है। तीन महीने के भीतर फैसला न आने पर मामला मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जाएगा और आवश्यकता पड़ने पर दूसरी पीठ को सौंपा जा सकेगा। साथ ही लंबित रिजर्व मामलों की निगरानी के लिए डिजिटल ट्रैकिंग प्रणाली विकसित करने के निर्देश दिए गए हैं। यह व्यवस्था पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करेगी। वहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जटिल मामलों के लिए सीमित छूट का प्रावधान रखकर न्यायालय ने व्यावहारिक संतुलन भी बनाए रखा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह पहल केवल लंबित फैसलों के निस्तारण का उपाय नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि न्याय व्यवस्था की कार्यसंस्कृति में बदलाव का स्पष्ट संकेत है। देश में करोड़ों मुकदमे लंबित हैं और लगातार स्थगन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लंबी सुनवाई तथा निर्णयों में देरी ने आम नागरिक के मन में न्याय को एक थकाऊ और अंतहीन प्रक्रिया बना दिया था। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम बताता है कि शीर्ष अदालत अब केवल अंतिम फैसले सुनाने तक सीमित नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पूरे न्यायिक तंत्र को अधिक उत्तरदायी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभावी और परिणामोन्मुख बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। समयबद्ध निर्णयों की संस्कृति विकसित होने से न्यायालयों की कार्यक्षमता बढ़ेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा और मुकदमों के निस्तारण की गति को नई ऊर्जा मिलेगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बेशक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस सुधार की राह पूरी तरह आसान नहीं है। कई हाईकोर्ट न्यायाधीशों की कमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बढ़ते मुकदमों के बोझ और जटिल मामलों की चुनौती से जूझ रहे हैं। कुछ मामलों में गहन अध्ययन के कारण निर्णय में अतिरिक्त समय भी स्वाभाविक है। फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने व्यावहारिक संतुलन बनाए रखा है। अतिरिक्त पीठों का गठन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल तकनीक का विस्तार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक केस मैनेजमेंट और प्रशासनिक दक्षता में सुधार इस बदलाव को गति दे सकते हैं। इन उपायों के प्रभावी क्रियान्वयन से न्यायिक प्रक्रिया की रफ्तार और गुणवत्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों में उल्लेखनीय सुधार संभव है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">किसी भी न्यायिक सुधार की असली कसौटी उसका प्रभाव आम नागरिक के जीवन पर होता है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश मुकदमेबाजों को भरोसा देता है कि सुनवाई पूरी होने के बाद उनका मामला अनिश्चित प्रतीक्षा में नहीं रहेगा। किसान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मध्यमवर्ग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्योग जगत और समाज के कमजोर वर्गों के लिए समयबद्ध न्याय नई उम्मीद लेकर आएगा। समय पर मिला न्याय कानून की प्रतिष्ठा और लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनविश्वास को मजबूत करता है। यदि इस निर्देश का प्रभावी पालन हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो “तारीख पर तारीख” की संस्कृति अतीत बन सकती है और “समय पर न्याय” भारतीय न्याय व्यवस्था की नई पहचान।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 30 May 2026 22:40:55 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>न्यायपालिका के आत्मावलोकन की जरूरत को स्वीकार करें मीलार्ड! </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">एनसीईआरटी की कक्षा आठ की एक किताब में न्यायपालिका से जुड़ी विवादित सामग्री पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा आपत्ति जताने के बाद सरकार द्वारा न्यायिक भ्रष्टाचार से संबंधित विवादास्पद अंशों को हटाने का निर्णय लिया है।गुरुवार सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी की कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित अध्याय पर कड़ा रुख अपनाते हुए पुस्तक पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है।सवाल उठता है कि माननीय शीर्ष अदालत ने जिस तरह इस मामले में तत्परता दिखाते हुए तथ्यपरक अध्याय पर गंभीर आपत्ति और कारवाई की है क्या ऐसी ही तत्परता न्यायपालिका की साख</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/171886/millard-accepts-the-need-for-introspection-of-the-judiciary"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/supream-court7.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एनसीईआरटी की कक्षा आठ की एक किताब में न्यायपालिका से जुड़ी विवादित सामग्री पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा आपत्ति जताने के बाद सरकार द्वारा न्यायिक भ्रष्टाचार से संबंधित विवादास्पद अंशों को हटाने का निर्णय लिया है।गुरुवार सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी की कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित अध्याय पर कड़ा रुख अपनाते हुए पुस्तक पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है।सवाल उठता है कि माननीय शीर्ष अदालत ने जिस तरह इस मामले में तत्परता दिखाते हुए तथ्यपरक अध्याय पर गंभीर आपत्ति और कारवाई की है क्या ऐसी ही तत्परता न्यायपालिका की साख पर धब्बा लगाने वाले न्यायिक व्यवस्था से जुड़े भ्रष्टाचारियों के खिलाफ भी अमल में लायी गयी। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको बता दें कि शीर्ष अदालत ने बाजार में उपलब्ध सभी प्रतियां जब्त करने और डिजिटल संस्करण हटाने के साथ ही पुस्तक को सार्वजनिक पहुंच से हटाने के आदेश दिए हैं। इतना ही नहीं कोर्ट ने अध्याय तैयार करने वाली कमेटी के सदस्यों का ब्योरा तलब किया हैं। एनसीईआरटी के निदेशक और स्कूल शिक्षा सचिव को कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा है कि बताएं क्यों न जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। दो सप्ताह में अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश देते हुए मामले को 11 मार्च को फिर सुनवाई के लिए लगाने का निर्देश दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि यह न्यायपालिका को कमजोर करने और उसकी गरिमा को ठोस पहुंचाने की सुनियोजित साजिश है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने माफी मांगते हुए कहा कि इस अध्याय को तैयार करने वाले दो लोग अब कभी भी एनसीईआरटी या किसी भी मंत्रालय में काम नहीं करेंगे तो चीफ जस्टिस सूर्यकांत की टिप्पणी थी कि तब तो ये बहुत आसान हो जाएगा और वो बरी हो जाएंगे। उन्होंने गोली चलाई है, न्यायपालिका आज खून से लथपथ है।चीफ जस्टिस ने कहा कि पुस्तक की प्रतियां बाजार में हैं। ये एक सोची समझी चाल है। पूरे शिक्षण समुदाय को बताया जाएगा कि भारतीय न्यायपालिका भ्रष्ट है और मामले लंबित हैं।</div>
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<div style="text-align:justify;">यह स्वीकार्य तथ्य है कि देश की न्यायपालिका केवल एक संवैधानिक संस्था नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा है। जब इस संस्था की छवि, भूमिका या विश्वसनीयता से जुड़ा कोई प्रश्न उठता है, तो उसका असर पूरे समाज और आने वाली पीढ़ियों की सोच पर पड़ता है। आम नागरिक जब अन्य सभी दरवाजों से निराश हो जाता है, तब वह अदालत की चौखट पर दस्तक देता है। ऐसे में यदि स्कूली पाठ्यपुस्तकों में न्यायपालिका को 'भ्रष्टाचार' जैसी गंभीर चुनौती के संदर्भ में प्रस्तुत किया जाए, तो हो सकता है कि बच्चों का विश्वास न्यायपालिका पर से बचपन में ही डगमगा जाएगा। </div>
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<div style="text-align:justify;">आपको बता दें कि एनसीईआरटी की कक्षा आठ की किताब में विवादित अध्याय 'हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका' शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। पहले के संस्करणों में जहां न्यायालयों की संरचना, कार्यप्रणाली और न्याय तक पहुंच पर ध्यान केंद्रित था, वहीं नये संस्करण में व्यवस्था की चुनौतियों पर भी चर्चा की गयी है। 'न्यायपालिका में भ्रष्टाचार' शीर्षक खंड में कहा गया है कि विभिन्न स्तरों पर लोगों को भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ सकता है और गरीब तथा वंचित वर्गों के लिए इससे न्याय तक पहुंच और कठिन हो सकती है।</div>
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<div style="text-align:justify;">पुस्तक में यह भी लेख है कि राज्य और केंद्र स्तर पर पारदर्शिता बढ़ाने तथा तकनीक के उपयोग से सुधार के प्रयास किये जा रहे हैं। पुस्तक में लंबित मुकदमों के आंकड़े भी दिये गये हैं। इसमें बताया गया है कि उच्चतम न्यायालय में लगभग 81 हजार मामले लंबित हैं, उच्च न्यायालयों में लगभग 62.40 लाख और जिला तथा अधीनस्थ न्यायालयों में करीब 4.70 करोड़ मामले लंबित हैं। ये आंकड़े न्याय प्रणाली पर बढ़ते बोझ को दर्शाते हैं। पुस्तक में केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण और निगरानी प्रणाली के जरिये प्राप्त शिकायतों का भी अलेख है और बताया गया है कि 2017 से 2021 के बीच 1600 से अधिक शिकायतें दर्ज की गयीं।</div>
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<div style="text-align:justify;">नयी पुस्तक के "न्यायपालिका में भ्रष्टाचार" खंड में कहा गया है कि न्यायाधीश एक आचार संहिता से बंधे होते हैं जो न केवल अदालत में उनके व्यवहार को नियंत्रित करती है, बल्कि अदालत के बाहर उनके आचरण को भी नियंत्रित करती है। इस अध्याय में भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई का कथन भी उद्धृत किया गया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि न्यायपालिका के भीतर भ्रष्टाचार और कदाचार की घटनाएं जन विश्वास पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं, किंतु त्वरित और पारदर्शी कार्रवाई से इस विश्वास को पुन स्थापित किया जा सकता है। </div>
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<div style="text-align:justify;">हाल ही में यह मामला मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष लाकर वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने इस पर गंभीर आपत्ति जताई। सिब्बल ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि स्कूली बच्चों को न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बारे में पढ़ाया जाना न केवल अनुचित है, बल्कि निंदनीय भी है। । मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने तत्काल संज्ञान लिया। </div>
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<div style="text-align:justify;">आपको बता दें कि लोकतंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही आवश्यक तत्व हैं। न्यायपालिका भी इससे अछूती नहीं है। समय-समय पर अदालतों ने स्वयं यह कहा है कि आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, बशर्ते यह तथ्यात्मक और मर्यादित हो। बेशक न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर एक पाठ्यपुस्तक के आलेख पर न्याय के देवता बुरी तरह बिफर रहें हैं इससे न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का प्रश्न ओझल होने वाला नहीं है। न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के अनेक मामले सामने आ चुके हैं और उन पर व्यापक चर्चा भी होती रहती है। हाल में सबसे अधिक चर्चा हुई दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश रहे यशवंत वर्मा के भ्रष्टाचार की। उनके आवास से करोड़ों के अधजले नोट बरामद किए गए थे। चूंकि उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हो सकी है, इसलिए वे अपने पद पर बने हुए हैं।</div>
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<div style="text-align:justify;">यहां गौर तलब है कि भ्रष्टाचार के कारण अन्य अनेक न्यायाधीश भी कठघरे में खड़े हो चुके हैं। इनमें से कई न्यायाधीशों के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन किसी के भी विरुद्ध वह अंजाम तक नहीं पहुंच सकी। इसका यह मतलब नहीं हो सकता कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है ही नहीं।एनसीईआरटी की पहले की पुस्तक में भी न्यायपालिका के बारे में उल्लेख था, लेकिन वह न्यायालयों की संरचना और भूमिका तक सीमित था।</div>
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<div style="text-align:justify;">लेकिन इस पूरे प्रकरण में कुछ बुनियादी प्रश्न उठते हैं। पहला, क्या पाठ्यपुस्तकों में संस्थागत भ्रष्टाचार जैसे विषयों का उल्लेख पूरी तरह से प्रतिबंधित होना चाहिए? दूसरा, यदि आलोचना हो, तो उसका स्वर, संदर्भ और प्रस्तुति कैसी होनी चाहिए? और तीसरा, बच्चों को संवैधानिक संस्थाओं के बारे में किस प्रकार की समझ दी जानी चाहिए ? यह स्वीकार करना चाहिए कि कक्षा आठ के विद्यार्थी किशोरावस्था की दहलीज पर होते हैं जटिल संस्थागत संदर्भों को पूरी गहराई से समझने की स्थिति में नहीं होते। ऐसे में यदि उन्हें यह बताया जाए कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है, तो यह आवश्यक है कि साथ ही यह भी बताया जाए कि भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच की व्यवस्था क्या है, न्यायिक जवाबदेही की प्रणाली कैसे काम करती है, और कैसे अधिकांश न्यायाधीश निष्पक्षता व ईमानदारी से अपना दायित्व निभाते हैं।</div>
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<div style="text-align:justify;">ऐसे में न्यायपालिका को लेकर कोई भी कथन संवेदनशील हो जाता है। मुख्य न्यायाधीश की यह टिप्पणी कि चाहे वह कितना भी ऊंचा पद पर हो, कानून अपना काम करेगा, यह संकेत देती है कि यदि किसी ने जानबूझकर संस्था की छवि धूमिल करने का प्रयास किया है, तो उसके विरुद्ध कार्रवाई हो सकती है।   न्यायपालिका देश की आशा और विश्वास का केंद्र है। उसकी प्रति अक्षुण्ण रहनी चाहिए, पर वह प्रतिष्ठा तथ्यों आलोचना या समीक्षा को दबाने से नहीं, बल्कि सत्य का साहसपूर्वक सामना करने से और भी सुदृढ़ होती है।</div>
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<div style="text-align:justify;">सवाल है कि क्या इस चैप्टर को स्नातक या परास्नातक के पाठ्यक्रम में शामिल करने पर अपनी स्वीकृति मीलार्ड देंगे अथवा उन्हें न्यायपालिका की वास्तविकता पर कोई विश्लेषण स्वीकार नही है? सरकार बैकफुट पर है सफाई में कहा गया है कि एनसीईआरटी एक स्वायत्त संस्था है, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा है कि एनसीईआरटी की पुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर अध्याय शामिल करना दुर्भाग्यपूर्ण है और सरकार इस मामले को गंभीरता से ले रही । इस मामले पर खेद व्यक्त करते हुए प्रधान ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय का जो भी आदेश होगा।</div>
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<div style="text-align:justify;">मंत्रालय उसका पालन करेगा। उन्होंने कहा कि विभाग के सचिव को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है कि एनसीईआरटी की पुस्तक में इस तरह का गैर-जिम्मेदाराना अध्याय जोड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।जाहिर है आगामी दिनों मे कुछ लोगों को कटु सच बयानी की सजा मिलेगी न्याय के शिखर का अहम तुष्ट होगा लेकिन भ्रष्टाचार का सवाल यथावत बना रहेगा।</div>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Sat, 28 Feb 2026 18:19:18 +0530</pubDate>
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