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                <title>NCERT controversy - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>NCERT controversy RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>डांसिंग गर्ल: जिसे ढककर हम खुद को उजागर कर बैठे</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इतिहास बदलने के लिए बड़े फैसलों की जरूरत नहीं होती</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी-कभी एक छोटी-सी शेडिंग ही काफी है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सिंधु घाटी सभ्यता की कांस्य प्रतिमा "डांसिंग गर्ल" आज इसी कारण विवाद में है। मोहनजोदड़ो से प्राप्त लगभग </span>4500 <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्ष पुरानी (</span>2500-2300 <span lang="hi" xml:lang="hi">ईसा पूर्व) यह प्रतिमा भारतीय पुरातत्व की महत्वपूर्ण धरोहरों में गिनी जाती है। एक हाथ कमर पर रखे आत्मविश्वास से खड़ी यह किशोरी केवल कलाकृति नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उस सभ्यता की सहजता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कलाबोध और आत्मविश्वास का प्रमाण है। हाल ही में एनसीईआरटी</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की कक्षा </span>9 <span lang="hi" xml:lang="hi">की कला शिक्षा पुस्तक ‘मधुरिमा’ में उसके नग्न धड़</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181457/the-dancing-girl-whom-we-covered-and-exposed-ourselves-to"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/dancing-girl.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इतिहास बदलने के लिए बड़े फैसलों की जरूरत नहीं होती</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी-कभी एक छोटी-सी शेडिंग ही काफी है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सिंधु घाटी सभ्यता की कांस्य प्रतिमा "डांसिंग गर्ल" आज इसी कारण विवाद में है। मोहनजोदड़ो से प्राप्त लगभग </span>4500 <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्ष पुरानी (</span>2500-2300 <span lang="hi" xml:lang="hi">ईसा पूर्व) यह प्रतिमा भारतीय पुरातत्व की महत्वपूर्ण धरोहरों में गिनी जाती है। एक हाथ कमर पर रखे आत्मविश्वास से खड़ी यह किशोरी केवल कलाकृति नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उस सभ्यता की सहजता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कलाबोध और आत्मविश्वास का प्रमाण है। हाल ही में एनसीईआरटी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की कक्षा </span>9 <span lang="hi" xml:lang="hi">की कला शिक्षा पुस्तक ‘मधुरिमा’ में उसके नग्न धड़ को शेडिंग से ढक दिया गया। मामूली दिखने वाला यह बदलाव राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया। सवाल प्रतिमा का नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस दृष्टि का है जिससे हम अपने अतीत को देख रहे हैं। क्या हम इतिहास को उसके वास्तविक रूप में स्वीकार कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या उसे अपने समय की नैतिक कसौटियों के अनुरूप बदल रहे हैं</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">डांसिंग गर्ल केवल प्रतिमा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक सभ्यता का आत्मविश्वास है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लॉस्ट-वैक्स तकनीक से बनी यह </span>10.5 <span lang="hi" xml:lang="hi">सेंटीमीटर कांस्य मूर्ति दिखाती है कि सिंधु सभ्यता धातु-कला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सौंदर्य-बोध और रचनात्मकता में कितनी विकसित थी। उसकी मुद्रा उस समाज की सहजता का प्रमाण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ शरीर संकोच का विषय नहीं था। दशकों तक यह प्रतिमा एनसीईआरटी की पुस्तकों में बिना बदलाव प्रकाशित होती रही और लाखों विद्यार्थियों ने इसे इतिहास के प्रमाण के रूप में देखा। ऐसे में अचानक इसे "उम्र के अनुकूल" बनाने की जरूरत क्यों महसूस हुई</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्या इतिहास को इतिहास की तरह दिखाना अब पर्याप्त नहीं है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यह बदलाव केवल चित्र का नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उस सोच का है जो अतीत को उसकी वास्तविकता से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि वर्तमान की असहजताओं से परिभाषित करती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह बदलाव केवल संपादन नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इतिहास की पुनर्रचना जैसा है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इतिहासकार मिशेल डैनिनो ने इसकी कड़ी आलोचना करते हुए इसे "सेंसरशिप" और "फर्जी कलाकृति" का निर्माण बताया। उनका तर्क था कि किसी ऐतिहासिक वस्तु का मूल रूप बदलने पर विद्यार्थी वास्तविक इतिहास नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उसका संपादित संस्करण देखते हैं—यह बौद्धिक अन्याय है। उन्होंने इसे प्राचीन भारत पर विक्टोरियन नैतिकता थोपने की कोशिश भी कहा। विडंबना यह है कि जिस सभ्यता ने कला को सहज स्वीकार किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके प्रतीकों पर आज कृत्रिम शालीनता लादी जा रही है। जबकि इतिहास का काम सुविधा के अनुसार बदलना नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि असुविधाजनक सच्चाइयों से रूबरू कराना है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह विवाद भारतीय सांस्कृतिक परंपरा की समझ पर सवाल खड़ा करता है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">खजुराहो के मंदिर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोणार्क का सूर्य मंदिर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अजंता-एलोरा की चित्रकला और गुप्तकालीन मूर्तिशिल्प बताते हैं कि भारतीय कला में मानव शरीर सदैव सौंदर्य और अभिव्यक्ति का माध्यम रहा है। यहाँ नग्नता को अश्लीलता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि स्वाभाविकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सृजन और सौंदर्य का प्रतीक माना गया। कामसूत्र की परंपरा वाली इस सभ्यता में यदि आज अपनी ही कलात्मक विरासत पर असहजता होने लगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो प्रश्न उठता है—बदल इतिहास रहा है या हमारी दृष्टि</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">डांसिंग गर्ल की नग्नता अश्लीलता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस युग की सांस्कृतिक सहजता का प्रमाण है। उसे ढकने का प्रयास उस समझ को ढकने जैसा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने उस कला को जन्म दिया था।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस विवाद की एक और परत भीतर का विरोधाभास खोलती है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एनसीईआरटी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की कक्षा </span>6 <span lang="hi" xml:lang="hi">की सामाजिक विज्ञान पुस्तक में यही प्रतिमा अपने मूल रूप में है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि कक्षा </span>9 <span lang="hi" xml:lang="hi">की कला शिक्षा पुस्तक में उसका संशोधित रूप दिखाया गया है। एक ही संस्था की दो पुस्तकों में एक ही ऐतिहासिक वस्तु के दो अलग-अलग रूप शिक्षा की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाते हैं। क्या हम छात्रों को इतिहास पढ़ा रहे हैं या उसे अपने वर्तमान मानकों के अनुसार ढाल रहे हैं</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यह केवल एक चित्र का मामला नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उस प्रवृत्ति का संकेत है जहाँ पाठ्यक्रम संशोधन के नाम पर इतिहास और पुरातत्व पर वैचारिक दबाव दिखने लगता है। जब तथ्य बदलते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो शिक्षा का आधार कमजोर पड़ता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सांस्कृतिक संवेदनशीलता का तर्क नकारा नहीं जा सकता।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ अभिभावक और शिक्षक मानते हैं कि किशोर विद्यार्थियों के सामने नग्नता का प्रदर्शन सावधानी से होना चाहिए। लेकिन सवाल यह है—समाधान समझाना है या छिपाना</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा का दायित्व संदर्भ देना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि तथ्य बदलना। यदि किसी कलाकृति में नग्नता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो छात्रों को बताया जा सकता है कि प्राचीन कला में उसका अर्थ आधुनिक दृष्टि से अलग था—वह शक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सौंदर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्रता और स्वाभाविकता का प्रतीक भी हो सकती है। हर असहज तथ्य पर शेडिंग चढ़ाते रहेंगे तो अगली पीढ़ी इतिहास नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका सुविधाजनक संस्करण पढ़ेगी। तब पाठ्यपुस्तकें दस्तावेज़ कम और कल्पना अधिक बन जाएँगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा मंत्रालय के स्पष्टीकरण और सार्वजनिक आलोचना के बाद एनसीईआरटी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ने मूल छवि बहाल करने का निर्णय लिया।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल संस्करण में तुरंत संशोधन हुआ और भविष्य की मुद्रित प्रतियों में भी मूल प्रतिमा प्रकाशित करने की घोषणा की गई। यह कदम स्वागत योग्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन सवाल छोड़ता है कि शुरुआत में यह परिवर्तन क्यों किया गया। यह निर्णय दिखाता है कि पाठ्यपुस्तकें अब केवल शैक्षणिक सामग्री नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि वैचारिक संघर्ष का भी हिस्सा बन चुकी हैं। यह घटना याद दिलाती है कि संवेदनशीलता और सेंसरशिप की रेखा बहुत पतली है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और उसे पार करने पर संस्थाओं पर भरोसा कमजोर पड़ सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">डांसिंग गर्ल विवाद किसी प्रतिमा का नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे आत्मविश्वास का है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय संग्रहालय में रखी यह डांसिंग गर्ल हर वर्ष असंख्य विद्यार्थी और पर्यटक देखते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और कोई उसे अश्लीलता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भारतीय सभ्यता की उपलब्धि मानता है। यदि हम अपनी विरासत को उसके वास्तविक रूप में स्वीकार नहीं कर सकते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसके गौरव पर गर्व भी अधूरा है। इतिहास को ढक देने से वह बदलता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल हमारी समझ सीमित होती है। पाठ्यपुस्तकें ज्ञान की खिड़कियाँ हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नैतिकता की दीवारें नहीं। डांसिंग गर्ल को उसकी पूर्ण वास्तविकता के साथ स्वीकार करना ही उस सभ्यता का सच्चा सम्मान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने हजारों वर्ष पहले आत्मविश्वास को कांस्य में ढाल दिया था।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 17:40:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>न्यायपालिका के आत्मावलोकन की जरूरत को स्वीकार करें मीलार्ड! </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">एनसीईआरटी की कक्षा आठ की एक किताब में न्यायपालिका से जुड़ी विवादित सामग्री पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा आपत्ति जताने के बाद सरकार द्वारा न्यायिक भ्रष्टाचार से संबंधित विवादास्पद अंशों को हटाने का निर्णय लिया है।गुरुवार सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी की कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित अध्याय पर कड़ा रुख अपनाते हुए पुस्तक पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है।सवाल उठता है कि माननीय शीर्ष अदालत ने जिस तरह इस मामले में तत्परता दिखाते हुए तथ्यपरक अध्याय पर गंभीर आपत्ति और कारवाई की है क्या ऐसी ही तत्परता न्यायपालिका की साख</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/171886/millard-accepts-the-need-for-introspection-of-the-judiciary"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/supream-court7.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एनसीईआरटी की कक्षा आठ की एक किताब में न्यायपालिका से जुड़ी विवादित सामग्री पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा आपत्ति जताने के बाद सरकार द्वारा न्यायिक भ्रष्टाचार से संबंधित विवादास्पद अंशों को हटाने का निर्णय लिया है।गुरुवार सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी की कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित अध्याय पर कड़ा रुख अपनाते हुए पुस्तक पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है।सवाल उठता है कि माननीय शीर्ष अदालत ने जिस तरह इस मामले में तत्परता दिखाते हुए तथ्यपरक अध्याय पर गंभीर आपत्ति और कारवाई की है क्या ऐसी ही तत्परता न्यायपालिका की साख पर धब्बा लगाने वाले न्यायिक व्यवस्था से जुड़े भ्रष्टाचारियों के खिलाफ भी अमल में लायी गयी। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको बता दें कि शीर्ष अदालत ने बाजार में उपलब्ध सभी प्रतियां जब्त करने और डिजिटल संस्करण हटाने के साथ ही पुस्तक को सार्वजनिक पहुंच से हटाने के आदेश दिए हैं। इतना ही नहीं कोर्ट ने अध्याय तैयार करने वाली कमेटी के सदस्यों का ब्योरा तलब किया हैं। एनसीईआरटी के निदेशक और स्कूल शिक्षा सचिव को कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा है कि बताएं क्यों न जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। दो सप्ताह में अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश देते हुए मामले को 11 मार्च को फिर सुनवाई के लिए लगाने का निर्देश दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि यह न्यायपालिका को कमजोर करने और उसकी गरिमा को ठोस पहुंचाने की सुनियोजित साजिश है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने माफी मांगते हुए कहा कि इस अध्याय को तैयार करने वाले दो लोग अब कभी भी एनसीईआरटी या किसी भी मंत्रालय में काम नहीं करेंगे तो चीफ जस्टिस सूर्यकांत की टिप्पणी थी कि तब तो ये बहुत आसान हो जाएगा और वो बरी हो जाएंगे। उन्होंने गोली चलाई है, न्यायपालिका आज खून से लथपथ है।चीफ जस्टिस ने कहा कि पुस्तक की प्रतियां बाजार में हैं। ये एक सोची समझी चाल है। पूरे शिक्षण समुदाय को बताया जाएगा कि भारतीय न्यायपालिका भ्रष्ट है और मामले लंबित हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह स्वीकार्य तथ्य है कि देश की न्यायपालिका केवल एक संवैधानिक संस्था नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा है। जब इस संस्था की छवि, भूमिका या विश्वसनीयता से जुड़ा कोई प्रश्न उठता है, तो उसका असर पूरे समाज और आने वाली पीढ़ियों की सोच पर पड़ता है। आम नागरिक जब अन्य सभी दरवाजों से निराश हो जाता है, तब वह अदालत की चौखट पर दस्तक देता है। ऐसे में यदि स्कूली पाठ्यपुस्तकों में न्यायपालिका को 'भ्रष्टाचार' जैसी गंभीर चुनौती के संदर्भ में प्रस्तुत किया जाए, तो हो सकता है कि बच्चों का विश्वास न्यायपालिका पर से बचपन में ही डगमगा जाएगा। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको बता दें कि एनसीईआरटी की कक्षा आठ की किताब में विवादित अध्याय 'हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका' शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। पहले के संस्करणों में जहां न्यायालयों की संरचना, कार्यप्रणाली और न्याय तक पहुंच पर ध्यान केंद्रित था, वहीं नये संस्करण में व्यवस्था की चुनौतियों पर भी चर्चा की गयी है। 'न्यायपालिका में भ्रष्टाचार' शीर्षक खंड में कहा गया है कि विभिन्न स्तरों पर लोगों को भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ सकता है और गरीब तथा वंचित वर्गों के लिए इससे न्याय तक पहुंच और कठिन हो सकती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पुस्तक में यह भी लेख है कि राज्य और केंद्र स्तर पर पारदर्शिता बढ़ाने तथा तकनीक के उपयोग से सुधार के प्रयास किये जा रहे हैं। पुस्तक में लंबित मुकदमों के आंकड़े भी दिये गये हैं। इसमें बताया गया है कि उच्चतम न्यायालय में लगभग 81 हजार मामले लंबित हैं, उच्च न्यायालयों में लगभग 62.40 लाख और जिला तथा अधीनस्थ न्यायालयों में करीब 4.70 करोड़ मामले लंबित हैं। ये आंकड़े न्याय प्रणाली पर बढ़ते बोझ को दर्शाते हैं। पुस्तक में केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण और निगरानी प्रणाली के जरिये प्राप्त शिकायतों का भी अलेख है और बताया गया है कि 2017 से 2021 के बीच 1600 से अधिक शिकायतें दर्ज की गयीं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नयी पुस्तक के "न्यायपालिका में भ्रष्टाचार" खंड में कहा गया है कि न्यायाधीश एक आचार संहिता से बंधे होते हैं जो न केवल अदालत में उनके व्यवहार को नियंत्रित करती है, बल्कि अदालत के बाहर उनके आचरण को भी नियंत्रित करती है। इस अध्याय में भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई का कथन भी उद्धृत किया गया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि न्यायपालिका के भीतर भ्रष्टाचार और कदाचार की घटनाएं जन विश्वास पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं, किंतु त्वरित और पारदर्शी कार्रवाई से इस विश्वास को पुन स्थापित किया जा सकता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हाल ही में यह मामला मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष लाकर वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने इस पर गंभीर आपत्ति जताई। सिब्बल ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि स्कूली बच्चों को न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बारे में पढ़ाया जाना न केवल अनुचित है, बल्कि निंदनीय भी है। । मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने तत्काल संज्ञान लिया। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको बता दें कि लोकतंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही आवश्यक तत्व हैं। न्यायपालिका भी इससे अछूती नहीं है। समय-समय पर अदालतों ने स्वयं यह कहा है कि आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, बशर्ते यह तथ्यात्मक और मर्यादित हो। बेशक न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर एक पाठ्यपुस्तक के आलेख पर न्याय के देवता बुरी तरह बिफर रहें हैं इससे न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का प्रश्न ओझल होने वाला नहीं है। न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के अनेक मामले सामने आ चुके हैं और उन पर व्यापक चर्चा भी होती रहती है। हाल में सबसे अधिक चर्चा हुई दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश रहे यशवंत वर्मा के भ्रष्टाचार की। उनके आवास से करोड़ों के अधजले नोट बरामद किए गए थे। चूंकि उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हो सकी है, इसलिए वे अपने पद पर बने हुए हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यहां गौर तलब है कि भ्रष्टाचार के कारण अन्य अनेक न्यायाधीश भी कठघरे में खड़े हो चुके हैं। इनमें से कई न्यायाधीशों के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन किसी के भी विरुद्ध वह अंजाम तक नहीं पहुंच सकी। इसका यह मतलब नहीं हो सकता कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है ही नहीं।एनसीईआरटी की पहले की पुस्तक में भी न्यायपालिका के बारे में उल्लेख था, लेकिन वह न्यायालयों की संरचना और भूमिका तक सीमित था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लेकिन इस पूरे प्रकरण में कुछ बुनियादी प्रश्न उठते हैं। पहला, क्या पाठ्यपुस्तकों में संस्थागत भ्रष्टाचार जैसे विषयों का उल्लेख पूरी तरह से प्रतिबंधित होना चाहिए? दूसरा, यदि आलोचना हो, तो उसका स्वर, संदर्भ और प्रस्तुति कैसी होनी चाहिए? और तीसरा, बच्चों को संवैधानिक संस्थाओं के बारे में किस प्रकार की समझ दी जानी चाहिए ? यह स्वीकार करना चाहिए कि कक्षा आठ के विद्यार्थी किशोरावस्था की दहलीज पर होते हैं जटिल संस्थागत संदर्भों को पूरी गहराई से समझने की स्थिति में नहीं होते। ऐसे में यदि उन्हें यह बताया जाए कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है, तो यह आवश्यक है कि साथ ही यह भी बताया जाए कि भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच की व्यवस्था क्या है, न्यायिक जवाबदेही की प्रणाली कैसे काम करती है, और कैसे अधिकांश न्यायाधीश निष्पक्षता व ईमानदारी से अपना दायित्व निभाते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ऐसे में न्यायपालिका को लेकर कोई भी कथन संवेदनशील हो जाता है। मुख्य न्यायाधीश की यह टिप्पणी कि चाहे वह कितना भी ऊंचा पद पर हो, कानून अपना काम करेगा, यह संकेत देती है कि यदि किसी ने जानबूझकर संस्था की छवि धूमिल करने का प्रयास किया है, तो उसके विरुद्ध कार्रवाई हो सकती है।   न्यायपालिका देश की आशा और विश्वास का केंद्र है। उसकी प्रति अक्षुण्ण रहनी चाहिए, पर वह प्रतिष्ठा तथ्यों आलोचना या समीक्षा को दबाने से नहीं, बल्कि सत्य का साहसपूर्वक सामना करने से और भी सुदृढ़ होती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सवाल है कि क्या इस चैप्टर को स्नातक या परास्नातक के पाठ्यक्रम में शामिल करने पर अपनी स्वीकृति मीलार्ड देंगे अथवा उन्हें न्यायपालिका की वास्तविकता पर कोई विश्लेषण स्वीकार नही है? सरकार बैकफुट पर है सफाई में कहा गया है कि एनसीईआरटी एक स्वायत्त संस्था है, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा है कि एनसीईआरटी की पुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर अध्याय शामिल करना दुर्भाग्यपूर्ण है और सरकार इस मामले को गंभीरता से ले रही । इस मामले पर खेद व्यक्त करते हुए प्रधान ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय का जो भी आदेश होगा।</div>
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<div style="text-align:justify;">मंत्रालय उसका पालन करेगा। उन्होंने कहा कि विभाग के सचिव को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है कि एनसीईआरटी की पुस्तक में इस तरह का गैर-जिम्मेदाराना अध्याय जोड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।जाहिर है आगामी दिनों मे कुछ लोगों को कटु सच बयानी की सजा मिलेगी न्याय के शिखर का अहम तुष्ट होगा लेकिन भ्रष्टाचार का सवाल यथावत बना रहेगा।</div>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Sat, 28 Feb 2026 18:19:18 +0530</pubDate>
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