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                <title>Judicial system - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Judicial system RSS Feed</description>
                
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                <title>न्याय या साजिश ? एसडीएम हर्रैया का आदेश सवालों कघेरेमें - ऐसे आदेश ही बनते हैं खूनी संघर्ष का कारण।</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>बस्ती। </strong>बस्ती जिले के तहसील हर्रैया के एसडीएम (न्यायिक) शशिबिंदु कुमार द्विवेदी इन दिनों अपने एक ऐसे कारनामे को लेकर चर्चा में हैं, जिसने न्याय व्यवस्था पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला एक औद्योगिक भूमि का है, जिससे संबंधित भागीदार वर्ष 1992 में ही अपनी लायबिलिटी और एसेट से मुक्त हो चुके थे। लेकिन हैरानी की बात यह है कि 34 साल बाद, 2026 में, उन्हीं को दोबारा नाजायज कब्जा दिलाने की कवायद शुरू कर दी  कि इस कार्रवाई में दो जालसाजों को उक्त औद्योगिक भूमि पर कब्जा दिलाने की मंशा से पहले से लागू स्टे को खत्म</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174998/justice-or-conspiracy-sdm-harraiyas-order-is-in-question"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/img-20260403-wa0028.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>बस्ती। </strong>बस्ती जिले के तहसील हर्रैया के एसडीएम (न्यायिक) शशिबिंदु कुमार द्विवेदी इन दिनों अपने एक ऐसे कारनामे को लेकर चर्चा में हैं, जिसने न्याय व्यवस्था पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला एक औद्योगिक भूमि का है, जिससे संबंधित भागीदार वर्ष 1992 में ही अपनी लायबिलिटी और एसेट से मुक्त हो चुके थे। लेकिन हैरानी की बात यह है कि 34 साल बाद, 2026 में, उन्हीं को दोबारा नाजायज कब्जा दिलाने की कवायद शुरू कर दी  कि इस कार्रवाई में दो जालसाजों को उक्त औद्योगिक भूमि पर कब्जा दिलाने की मंशा से पहले से लागू स्टे को खत्म करने की योजना बनाई गई। और इसके लिए 2016 के एक मुकदमे को ही खारिज करने का रास्ता चुना गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अब जब नीयत पहले से तय हो, तो तर्क जुटाने में भला कितना समय लगता है! साहब ने एक नहीं, कई आधार गढ़े और आनन फानन में मुकदमा खारिज भी कमुकदमे की खारिजी के साथ ही स्टे भी समाप्त हो गया, जो इन कथित जालसाजों के लिए सबसे बड़ी बाधा था। अब आगे क्या होगा ? यह तो किसी घटना के घटित होने के बाद कानून-व्यवस्था ही तय करेगी !</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">और साहब भी इसके लिए याद जरूर किए जाएंगे। लेकिन मुंसिफ बस्ती के आदेश के आधार पर दाखिल इस मुकदमे को खारिज करने के जो आधार दिए गए, वे खुद अपने आप में गम्भीर सवाल खड़े करते हैंअपने आदेश में साहब लिखते हैं, "खतौनी में पक्षकारों में किसी भी पक्षकार का नाम फर्म के पार्टनर के रूप में अंकित नहीं है। इस प्रकार इस वाद बिन्दु का निस्तारण वादी के पक्ष में नकारात्मक रूप में किया जाता है।अब सवाल यह उठता है कि, क्या किसी भी खतौनी में भूमिधर के नाम के साथ “किसान” या “मकान मालिक” आदि लिखा रहता है? जमीन का स्वरूप और उपयोग तो स्वतः स्पष्ट होता है, यह एक सामान्य समझ की बात है। लेकिन जब नीयत ही कुछ और हो, तो सामान्य समझ भी बेअसर हो जाती आगे आदेश में उल्लेख है, "प्रतिवादी श्री प्रवीश चन्द्र धर द्विवेदी द्वारा शपथ पत्र के साथ अवगत कराया है कि, प्रकीर्ण वाद संख्या 76/11/2024 श्रीश चंद्र धर द्विवेदी बनाम प्रवीश चन्द्र धर द्विवेदी को निरस्त किया जा चुका है।"हकीकत यह है कि ऐसा कोई मुकदमा अस्तित्व में ही नहीं है। और न ही इस कथित मुकदमे का इस आदेश से कोई सीधा संबंध ही हो सकता है। लेकिन "निरस्त" शब्द का जादू ऐसा चला कि उसे भी आधार बना लिया गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">साहब आगे लिखते हैं, "वास्तव में एक ऐसे आदेश के आधार पर अनुतोष की मांग की गई है जो वर्तमान में माननीय न्यायालय में विचाराधीन है।" जबकि विधि का सामान्य सिद्धांत है कि किसी न्यायालय का आदेश तब तक प्रभावी रहता है, जब तक उस पर कोई नया आदेश पारित न हो जाए। केवल मुकदमे का विचाराधीन होना, आदेश को निष्प्रभावी नहीं करता। यहां जिस मुकदमे को आधार बताया गया, पात्रता के मुताबिक वह 2017 से अब तक केवल एडमिट अवस्था में ही पड़ा हुआ है। लेकिन आदेश लिखने के लिए आधार तो चाहिए थे, सो गढ़ लिएसाहब ने अपने आदेश में तर्क दिया कि, "वास्तव में प्रश्नगत वाद उभय पक्षों के मध्य भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 के तहत साझेदारी विवाद से संबंधित है और वादी ने अभिलेखीय राजस्व दस्तावेजों से अपना कब्जा सिद्ध नहीं किया है।" साहब का यह तर्क स्पष्ट करता है कि, वे भी विपक्षियों की राह पर चलते हुए 'मुंसिफ बस्ती' के उस मूल आदेश को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं जो इस पूरे मुकदमे की बुनियाद है। ऐसे में साहब यह साबित करने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं कि, सच चाहे जो भी हो वे उसे हरगिज नहीं देखेंगे। और विपक्षियों के हित में इस मुकदमे का गला घोंटकर ही मानेंसाहब ने आधार गढ़ते समय प्रतिवादी का हवाला देते हुए राजस्व संहिता की सीमाओं से बाहर निकलकर इंडियन पार्टनरशिप एक्ट 1932 आदि पर भी लंबा व्याख्यान दे डाला।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एक्ट की धारा 63 का बाकायदा उल्लेख किया गया और प्रतिवादी की भाषा में यह स्थापित करने की कोशिश की गई कि रिटायरमेंट की सूचना सार्वजनिक नहीं की गई।  आदेश पढ़ते समय कई जगह ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रतिवादी बोल रहा हो और साहब केवल उसे लिख रहे हों। हैरत की बात यह है कि न तो यह जांचने की जरूरत समझी गई कि मूल मुकदमा क्या है? ना ही 27 अगस्त 2025 को फर्म आदि से संबंधित नामांतरण के लिए जारी "परिषदादेश" का अनुपालन करने की जरूरत समझी गई। और ना ही वाद के आधार, मुंसिफ के आदेश/ डिग्री को तरजीह दी गई। और न ही यह देखा गया कि, जिन आधारों पर साहब का आदेश टिका है, वे प्रासंगिक भी हैं या नहीं। सबसे अहम सवाल यह कि, प्रतिवादी सच बोल रहा है या झूठ ? इस पर तो मानो विचार करना भी जरूरी नहीं समझा गया। विडंबना यह भी है कि जिस प्रतिवादी के नाम के आगे साहब “श्री” लगाते नहीं थक रहे, उन्हीं पर आरोप है कि, उन्होंने मुकदमे के दौरान ही खतौनी में दर्ज अपने नामों का जमकर दुरुपयोग किया। फर्म की विवादित जमीन का नामांतरण कराया, खारिज-दाखिल कराया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">और यहां तक कि समानांतर न्यायालय में बंटवारे का मुकदमा दाखिल कर एकपक्षीय प्राइमरी डिग्री तक हासिल कर ली। लेकिन इन सब तथ्यों का जिक्र आदेश में कहीं नहीं मिलता। कार्रवाई तो दूर की बात है।स्पष्ट है कि, आदेश की शुरुआत ही मुकदमे को खारिज करने की मंशा से हुई थी। और अंत तक प्रतिवादी के पक्ष को साधते हुए वही परिणाम हासिल भी कर लिया गया। अदालत अपनी थी, अधिकार अपने थे, तो परिणाम भी मनमाफिक ही आया। कुल मिलाकर साहब ने वही कहा और किया, जिसकी उम्मीद जालसाज विपक्षी करते रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वादी के पक्ष में तो सिर्फ कृत्रिम कमियां ही गिनाई गईं। और उसके द्वारा प्रस्तुत तमाम साक्ष्यों को भी दबाकर साक्ष्यों का अभाव बता दिया जिला अदालत के कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने इस आदेश को देखकर मुंह बिचकाते हुए इसे “पूर्व नियोजित ऑर्डर” तक कह डाला।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">और अंत में वही पुरानी बात याद आती है, "जब पैसे से वास्ता हो जाए, तो फिर इज्जत आबरू, न्याय अन्याय की चिंता भला कौन करता खैर, जीवन और जीविका की लड़ाई हर व्यक्ति पूरी ताकत से लड़ता है, और वादी भी लड़ेगा ही। यह जरूरी नहीं कि हर जगह ऐसे ही चेहरे बैठे हों। लेकिन असली चिंता इस बात की है कि, आखिर ये साहब कब तक न्यायिक चोला ओढ़कर न्याय का यूँ ही चीरहरण करते रहेंगे, और व्यवस्था देखती रहेगी ?</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 04 Apr 2026 19:53:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>न्यायपालिका के आत्मावलोकन की जरूरत को स्वीकार करें मीलार्ड! </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">एनसीईआरटी की कक्षा आठ की एक किताब में न्यायपालिका से जुड़ी विवादित सामग्री पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा आपत्ति जताने के बाद सरकार द्वारा न्यायिक भ्रष्टाचार से संबंधित विवादास्पद अंशों को हटाने का निर्णय लिया है।गुरुवार सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी की कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित अध्याय पर कड़ा रुख अपनाते हुए पुस्तक पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है।सवाल उठता है कि माननीय शीर्ष अदालत ने जिस तरह इस मामले में तत्परता दिखाते हुए तथ्यपरक अध्याय पर गंभीर आपत्ति और कारवाई की है क्या ऐसी ही तत्परता न्यायपालिका की साख</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/171886/millard-accepts-the-need-for-introspection-of-the-judiciary"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/supream-court7.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एनसीईआरटी की कक्षा आठ की एक किताब में न्यायपालिका से जुड़ी विवादित सामग्री पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा आपत्ति जताने के बाद सरकार द्वारा न्यायिक भ्रष्टाचार से संबंधित विवादास्पद अंशों को हटाने का निर्णय लिया है।गुरुवार सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी की कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित अध्याय पर कड़ा रुख अपनाते हुए पुस्तक पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है।सवाल उठता है कि माननीय शीर्ष अदालत ने जिस तरह इस मामले में तत्परता दिखाते हुए तथ्यपरक अध्याय पर गंभीर आपत्ति और कारवाई की है क्या ऐसी ही तत्परता न्यायपालिका की साख पर धब्बा लगाने वाले न्यायिक व्यवस्था से जुड़े भ्रष्टाचारियों के खिलाफ भी अमल में लायी गयी। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको बता दें कि शीर्ष अदालत ने बाजार में उपलब्ध सभी प्रतियां जब्त करने और डिजिटल संस्करण हटाने के साथ ही पुस्तक को सार्वजनिक पहुंच से हटाने के आदेश दिए हैं। इतना ही नहीं कोर्ट ने अध्याय तैयार करने वाली कमेटी के सदस्यों का ब्योरा तलब किया हैं। एनसीईआरटी के निदेशक और स्कूल शिक्षा सचिव को कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा है कि बताएं क्यों न जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। दो सप्ताह में अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश देते हुए मामले को 11 मार्च को फिर सुनवाई के लिए लगाने का निर्देश दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि यह न्यायपालिका को कमजोर करने और उसकी गरिमा को ठोस पहुंचाने की सुनियोजित साजिश है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने माफी मांगते हुए कहा कि इस अध्याय को तैयार करने वाले दो लोग अब कभी भी एनसीईआरटी या किसी भी मंत्रालय में काम नहीं करेंगे तो चीफ जस्टिस सूर्यकांत की टिप्पणी थी कि तब तो ये बहुत आसान हो जाएगा और वो बरी हो जाएंगे। उन्होंने गोली चलाई है, न्यायपालिका आज खून से लथपथ है।चीफ जस्टिस ने कहा कि पुस्तक की प्रतियां बाजार में हैं। ये एक सोची समझी चाल है। पूरे शिक्षण समुदाय को बताया जाएगा कि भारतीय न्यायपालिका भ्रष्ट है और मामले लंबित हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह स्वीकार्य तथ्य है कि देश की न्यायपालिका केवल एक संवैधानिक संस्था नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा है। जब इस संस्था की छवि, भूमिका या विश्वसनीयता से जुड़ा कोई प्रश्न उठता है, तो उसका असर पूरे समाज और आने वाली पीढ़ियों की सोच पर पड़ता है। आम नागरिक जब अन्य सभी दरवाजों से निराश हो जाता है, तब वह अदालत की चौखट पर दस्तक देता है। ऐसे में यदि स्कूली पाठ्यपुस्तकों में न्यायपालिका को 'भ्रष्टाचार' जैसी गंभीर चुनौती के संदर्भ में प्रस्तुत किया जाए, तो हो सकता है कि बच्चों का विश्वास न्यायपालिका पर से बचपन में ही डगमगा जाएगा। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको बता दें कि एनसीईआरटी की कक्षा आठ की किताब में विवादित अध्याय 'हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका' शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। पहले के संस्करणों में जहां न्यायालयों की संरचना, कार्यप्रणाली और न्याय तक पहुंच पर ध्यान केंद्रित था, वहीं नये संस्करण में व्यवस्था की चुनौतियों पर भी चर्चा की गयी है। 'न्यायपालिका में भ्रष्टाचार' शीर्षक खंड में कहा गया है कि विभिन्न स्तरों पर लोगों को भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ सकता है और गरीब तथा वंचित वर्गों के लिए इससे न्याय तक पहुंच और कठिन हो सकती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पुस्तक में यह भी लेख है कि राज्य और केंद्र स्तर पर पारदर्शिता बढ़ाने तथा तकनीक के उपयोग से सुधार के प्रयास किये जा रहे हैं। पुस्तक में लंबित मुकदमों के आंकड़े भी दिये गये हैं। इसमें बताया गया है कि उच्चतम न्यायालय में लगभग 81 हजार मामले लंबित हैं, उच्च न्यायालयों में लगभग 62.40 लाख और जिला तथा अधीनस्थ न्यायालयों में करीब 4.70 करोड़ मामले लंबित हैं। ये आंकड़े न्याय प्रणाली पर बढ़ते बोझ को दर्शाते हैं। पुस्तक में केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण और निगरानी प्रणाली के जरिये प्राप्त शिकायतों का भी अलेख है और बताया गया है कि 2017 से 2021 के बीच 1600 से अधिक शिकायतें दर्ज की गयीं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नयी पुस्तक के "न्यायपालिका में भ्रष्टाचार" खंड में कहा गया है कि न्यायाधीश एक आचार संहिता से बंधे होते हैं जो न केवल अदालत में उनके व्यवहार को नियंत्रित करती है, बल्कि अदालत के बाहर उनके आचरण को भी नियंत्रित करती है। इस अध्याय में भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई का कथन भी उद्धृत किया गया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि न्यायपालिका के भीतर भ्रष्टाचार और कदाचार की घटनाएं जन विश्वास पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं, किंतु त्वरित और पारदर्शी कार्रवाई से इस विश्वास को पुन स्थापित किया जा सकता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हाल ही में यह मामला मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष लाकर वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने इस पर गंभीर आपत्ति जताई। सिब्बल ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि स्कूली बच्चों को न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बारे में पढ़ाया जाना न केवल अनुचित है, बल्कि निंदनीय भी है। । मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने तत्काल संज्ञान लिया। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको बता दें कि लोकतंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही आवश्यक तत्व हैं। न्यायपालिका भी इससे अछूती नहीं है। समय-समय पर अदालतों ने स्वयं यह कहा है कि आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, बशर्ते यह तथ्यात्मक और मर्यादित हो। बेशक न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर एक पाठ्यपुस्तक के आलेख पर न्याय के देवता बुरी तरह बिफर रहें हैं इससे न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का प्रश्न ओझल होने वाला नहीं है। न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के अनेक मामले सामने आ चुके हैं और उन पर व्यापक चर्चा भी होती रहती है। हाल में सबसे अधिक चर्चा हुई दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश रहे यशवंत वर्मा के भ्रष्टाचार की। उनके आवास से करोड़ों के अधजले नोट बरामद किए गए थे। चूंकि उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हो सकी है, इसलिए वे अपने पद पर बने हुए हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यहां गौर तलब है कि भ्रष्टाचार के कारण अन्य अनेक न्यायाधीश भी कठघरे में खड़े हो चुके हैं। इनमें से कई न्यायाधीशों के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन किसी के भी विरुद्ध वह अंजाम तक नहीं पहुंच सकी। इसका यह मतलब नहीं हो सकता कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है ही नहीं।एनसीईआरटी की पहले की पुस्तक में भी न्यायपालिका के बारे में उल्लेख था, लेकिन वह न्यायालयों की संरचना और भूमिका तक सीमित था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लेकिन इस पूरे प्रकरण में कुछ बुनियादी प्रश्न उठते हैं। पहला, क्या पाठ्यपुस्तकों में संस्थागत भ्रष्टाचार जैसे विषयों का उल्लेख पूरी तरह से प्रतिबंधित होना चाहिए? दूसरा, यदि आलोचना हो, तो उसका स्वर, संदर्भ और प्रस्तुति कैसी होनी चाहिए? और तीसरा, बच्चों को संवैधानिक संस्थाओं के बारे में किस प्रकार की समझ दी जानी चाहिए ? यह स्वीकार करना चाहिए कि कक्षा आठ के विद्यार्थी किशोरावस्था की दहलीज पर होते हैं जटिल संस्थागत संदर्भों को पूरी गहराई से समझने की स्थिति में नहीं होते। ऐसे में यदि उन्हें यह बताया जाए कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है, तो यह आवश्यक है कि साथ ही यह भी बताया जाए कि भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच की व्यवस्था क्या है, न्यायिक जवाबदेही की प्रणाली कैसे काम करती है, और कैसे अधिकांश न्यायाधीश निष्पक्षता व ईमानदारी से अपना दायित्व निभाते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ऐसे में न्यायपालिका को लेकर कोई भी कथन संवेदनशील हो जाता है। मुख्य न्यायाधीश की यह टिप्पणी कि चाहे वह कितना भी ऊंचा पद पर हो, कानून अपना काम करेगा, यह संकेत देती है कि यदि किसी ने जानबूझकर संस्था की छवि धूमिल करने का प्रयास किया है, तो उसके विरुद्ध कार्रवाई हो सकती है।   न्यायपालिका देश की आशा और विश्वास का केंद्र है। उसकी प्रति अक्षुण्ण रहनी चाहिए, पर वह प्रतिष्ठा तथ्यों आलोचना या समीक्षा को दबाने से नहीं, बल्कि सत्य का साहसपूर्वक सामना करने से और भी सुदृढ़ होती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सवाल है कि क्या इस चैप्टर को स्नातक या परास्नातक के पाठ्यक्रम में शामिल करने पर अपनी स्वीकृति मीलार्ड देंगे अथवा उन्हें न्यायपालिका की वास्तविकता पर कोई विश्लेषण स्वीकार नही है? सरकार बैकफुट पर है सफाई में कहा गया है कि एनसीईआरटी एक स्वायत्त संस्था है, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा है कि एनसीईआरटी की पुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर अध्याय शामिल करना दुर्भाग्यपूर्ण है और सरकार इस मामले को गंभीरता से ले रही । इस मामले पर खेद व्यक्त करते हुए प्रधान ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय का जो भी आदेश होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मंत्रालय उसका पालन करेगा। उन्होंने कहा कि विभाग के सचिव को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है कि एनसीईआरटी की पुस्तक में इस तरह का गैर-जिम्मेदाराना अध्याय जोड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।जाहिर है आगामी दिनों मे कुछ लोगों को कटु सच बयानी की सजा मिलेगी न्याय के शिखर का अहम तुष्ट होगा लेकिन भ्रष्टाचार का सवाल यथावत बना रहेगा।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 28 Feb 2026 18:19:18 +0530</pubDate>
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