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                <title>Moral values - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Moral values RSS Feed</description>
                
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                <title>गायत्री साधना से जुड़कर मानव कल्याण का संदेश दे रही कलश यात्रा - अशोक शर्मा </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>शुकुल बाजार अमेठी। </strong>क्षेत्र में भक्ति, संस्कार और जागरूकता का अद्भुत संगम देखने को मिला शांतिकुंज हरिद्वार से निकली ज्योति शक्ति कलश यात्रा यहां पहुंचकर जन-जन में आध्यात्मिक चेतना का संचार कर किया। गायत्री परिवार के तत्वावधान में आयोजित यह यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि समाज में सद्गुणों के विकास और दुर्गुणों के उन्मूलन का प्रेरक अभियान बन चुकी है। मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण की प्रक्रिया को लेकर गांव गांव गायत्री उपासना साधना से जोड़ने का काम और वर्तमान में चल रहे विनाशकारी प्रकृति की नाराज़गी को रोकते हुए मानव मात्र</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176030/kalash-yatra-is-giving-the-message-of-human-welfare-by"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/1-6.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>शुकुल बाजार अमेठी। </strong>क्षेत्र में भक्ति, संस्कार और जागरूकता का अद्भुत संगम देखने को मिला शांतिकुंज हरिद्वार से निकली ज्योति शक्ति कलश यात्रा यहां पहुंचकर जन-जन में आध्यात्मिक चेतना का संचार कर किया। गायत्री परिवार के तत्वावधान में आयोजित यह यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि समाज में सद्गुणों के विकास और दुर्गुणों के उन्मूलन का प्रेरक अभियान बन चुकी है। मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण की प्रक्रिया को लेकर गांव गांव गायत्री उपासना साधना से जोड़ने का काम और वर्तमान में चल रहे विनाशकारी प्रकृति की नाराज़गी को रोकते हुए मानव मात्र के कल्याण को लेकर ज्योति शक्ति कलश यात्रा पूरे उत्तर प्रदेश में चल रही हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सोमवार को जैसे ही कलश यात्रा शुकुल बाजार पहुंची, पूरे क्षेत्र में श्रद्धा और उत्साह का माहौल छा गया। गायत्री परिवार के कार्यकर्ताओं और स्थानीय श्रद्धालुओं द्वारा स्वागत के लिए व्यापक तैयारियां की गई थीं। कलश के आगमन पर वैदिक मंत्रोच्चार के बीच विधि-विधान से पूजन-अर्चन किया गया और भव्य स्वागत किया गया। श्रद्धालुओं ने पुष्प अर्पित कर, दीप प्रज्वलित कर और भक्ति भाव से नतमस्तक होकर कलश का अभिनंदन किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस अवसर पर शांतिकुंज से कलश यात्रा लेकर आए हुए टोली नायक समर बहादुर,धर्मेश्वर किरार, सत्य नारायण पांडेय ने कहा कि यह ज्योति कलश मानव जीवन में आत्मशुद्धि, सदाचार और सेवा भाव का प्रतीक है। यह यात्रा हमें अपने भीतर की नकारात्मक प्रवृत्तियों को त्यागकर सत्य, प्रेम, करुणा और संयम जैसे सद्गुणों को अपनाने की प्रेरणा देती है। समाज में बढ़ती विकृतियों को दूर करने के लिए ऐसे आध्यात्मिक अभियानों की आज अत्यंत आवश्यकता है।कार्यक्रम में शुकुल बाजार ब्लॉक समन्वयक अशोक शर्मा, ब्लॉक मीडिया प्रभारी दीपक पाठक , गुड्डू तिवारी,  दुर्गेश सहित गायत्री परिवार एवं हजारों की संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सभी ने एक स्वर में समाज को नैतिक मूल्यों पर आधारित बनाने और आध्यात्मिक चेतना को जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प लिया।ज्योति कलश यात्रा ने क्षेत्र के विभिन्न गांवों और स्थानों का भ्रमण कर लोगों को आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत किया। यह यात्रा सत्थिन में राजकुमार कौशल के आवास से प्रारंभ होकर पूरे बख्तावर, आसाराम पांडे के यहां, जैनबगंज, अनंतराम, हरखूमऊ स्थित गायत्री मंदिर, जगपाल बाबा, इन्दरिया में राजेंद्र प्रताप सिंह के यहां पहुंची।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके अलावा पूरे रामदीन गांव में अवधेश मिश्रा, शुकुल बाजार में ध्रुव केश शर्मा व राजकुमार कौशल धर्मशाला, पांडेयगंज में मनोज तिवारी, भोजा तिवारी गांव, अंदीपुर के गायत्री मंदिर, हनुमान मंदिर में रमेश शुक्ला, पाली में सुनील साहू, तेंदुआ में रवि गिरी व जीत तिवारी में दिलीप तिवारी तथा पूरे रग्घू सुधीर शुक्ला के यहां श्रद्धापूर्वक कलश का स्वागत किया गया।अंत में दीप यज्ञ, भजन-कीर्तन और सत्संग का आयोजन किया गया, जिससे वातावरण भक्तिमय और ऊर्जावान बना रहा। श्रद्धालुओं को नैतिक जीवन, संयमित आचरण और सेवा भाव अपनाने का संदेश दिया गया। रात्रि प्रवास, भोजन-प्रसाद वितरण और सामूहिक साधना के साथ यह कार्यक्रम अत्यंत सफलतापूर्वक संपन्न हुआ, और सुबह टोली को विदाई दी गई।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 13 Apr 2026 20:52:04 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अध्ययन,मनन से संस्कार और ज्ञान के खुलते चक्षु</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">मनुष्य के जीवन में अध्ययन जितना आवश्यक है उतना ही आवश्यक मनन और चिंतन भी है। केवल पुस्तक पढ़ना ही संपूर्ण मानवीय उद्देश्य ना होकर उससे प्राप्त ज्ञानामृत का मनन एवं चिंतन भी अत्यंत आवश्यक है। किसी भी पुस्तक का अध्ययन मनन एवं उस पर चिंतन मनुष्य के संस्कारों को परिष्कृत करता है एवं जीवन के उच्च आदर्शों को प्राप्त करने में सदैव सहायक सिद्ध होता है। अतः मनुष्य को सदैव निरंतर ज्ञानवर्धक पुस्तकों से न सिर्फ ज्ञान प्राप्त करना चाहिए अपितु  उसका निरंतर मनन तथा चिंतन भी करना होगा तब जाकर हमारे संस्कार,संस्कृति एवं जीवन के उद्देश्य सफल होंगे।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173421/eyes-open-to-values-and-knowledge-through-study-and-meditation"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/asfsd.png" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मनुष्य के जीवन में अध्ययन जितना आवश्यक है उतना ही आवश्यक मनन और चिंतन भी है। केवल पुस्तक पढ़ना ही संपूर्ण मानवीय उद्देश्य ना होकर उससे प्राप्त ज्ञानामृत का मनन एवं चिंतन भी अत्यंत आवश्यक है। किसी भी पुस्तक का अध्ययन मनन एवं उस पर चिंतन मनुष्य के संस्कारों को परिष्कृत करता है एवं जीवन के उच्च आदर्शों को प्राप्त करने में सदैव सहायक सिद्ध होता है। अतः मनुष्य को सदैव निरंतर ज्ञानवर्धक पुस्तकों से न सिर्फ ज्ञान प्राप्त करना चाहिए अपितु  उसका निरंतर मनन तथा चिंतन भी करना होगा तब जाकर हमारे संस्कार,संस्कृति एवं जीवन के उद्देश्य सफल होंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">महात्मा गांधी ने कहा है कि पुराने वस्त्र पहनों पर नई पुस्तकें खरीदोl उन्होंने यह भी कहा कि पुस्तकों का महत्व रत्नों से कहीं अधिक है, क्योंकि पुस्तकें अंतःकरण को उज्जवल करती हैं। सच्चाई भी यही है कि पुस्तकें ज्ञान के अंतःकरण और सच्चाईयों का भंडार होती है। आत्मभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम भी होती हैं। जिन्होंने पुस्तके नहीं पढी हैं या जिन्हें पुस्तक पढ़ने में रूचि नहीं है वे जीवन की कई सच्चाईयों से अनभिज्ञ रह जाते हैं। पुस्तकें पढ़ने का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि हम जीवन की कठिन परिस्थितियों से जूझने की शक्ति से परिचित हो जाते हैं,और समस्या कितनी भी बड़ी हो हम उससे जीतकर निजात पा जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कठिन से कठिन समय पर पुस्तकें हमारा मार्गदर्शन एवं दिग्दर्शन करती है। जिन मनीषियों ने पुस्तक लिखी है और जिन्हें पुस्तकें पढ़ने का शौक है उन्हें ज्ञानार्जन के लिए इधर-उधर भटकने की आवश्यकता नहीं होतीहैं। पूर्व राष्ट्रपति डॉ एपीजे कलाम साहब ने कहा है कि एक पुस्तक कई मित्रों के बराबर होती है और पुस्तकें सर्वश्रेष्ठ मित्र होती हैं। शिक्षाविद चार्ल्स विलियम इलियट ने कहा कि पुस्तके मित्रों में सबसे शांत व स्थिर हैं, वे सलाहकारों में सबसे सुलभ और बुद्धिमान होती हैं और शिक्षकों में सबसे धैर्यवान तथा श्रेष्ठ होती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">निसंदेह पुस्तकें ज्ञानार्जन करने मार्गदर्शन एवं परामर्श देने में में विशेष भूमिका निभाती है। पुस्तकें मनुष्य के मानसिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक,नैतिक, चारित्रिक, व्यवसायिक एवं राजनीतिक विकास में अत्यंत सहायक एवं सफल दोस्त का फर्ज अदा करती हैं। प्राचीन काल से ही बच्चों तथा नौनिहालों के विकास के लिए पुस्तकें लिखे जाने का चलन तथा रिवाज रहा है। 'पंचतंत्र'तथा 'हितोपदेश' इसके बहुत बड़े उदाहरण हैं। पंचतंत्र,हितोपदेश में ज्ञानार्जन के लिए एवं संस्कृति सभ्यता और शिक्षा के उपयोग की बातें जो दैनिक जीवन में अत्यंत प्रभावशाली तथा उपयोगी होती है, लिखी गई हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">और यही पुस्तकें इस देश की सभ्यता संस्कृति के संरक्षण तथा प्रचार प्रसार में अहम भूमिका निभाती आई है। इसी तरह की पुस्तकों ने ज्ञान का विस्तार भी किया है। विश्व की हर सभ्यता मे लेखन सामग्री का बड़ा ही महत्वपूर्ण योगदान रहा है। पुस्तकों के माध्यम से ही धर्म जाति संस्कृति एवं शिक्षा की मार्गदर्शिका से ही समाज आगे बढ़ा है। अच्छी किताबें अच्छे मार्गदर्शक तथा शिक्षित तथा अशिक्षित समाज को चेतना तथा सद्गुणों से संचारित करती है, व्यक्ति के अंदर मानसिक क्षमता का विकास भी होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐतिहासिक किताबें हमें इतिहास, धर्म, राजनीति, संस्कृति के अनेक पहलुओं से अवगत भी कराती है,जिससे व्यक्तित्व विकास में अत्यंत सहायता मिलती है। पुस्तकों के महत्व को देखते हुए डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा कि पुस्तके वह साधन है जिसके माध्यम से हम विभिन्न संस्कृति एवं समाज के बीच सेतु का निर्माण कर सकते हैं। पुस्तके वह मित्र होती हैं जो हर परिस्थिति तत्काल में सहायक होती है, और यही कारण है कि अनेक लोग गुरुवाणी, हनुमान चालीसा अभी अपने पास रखते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान युग डिजिटल युग कहलाता है अब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में प्रिंट मीडिया के स्थान पर अपने पैर जमा लिए हैं। इस डिजिटल युग में इंटरनेट का महत्व काफी बढ़ गया है। पहले हम बचपन में चंदा मामा, नंदन, बालभारती और अन्य किताबों से ज्ञान से लेकर मनोरंजन तक प्राप्त करते थे। आज इंटरनेट के बढ़ते बाजार की दिशा में युवक पुस्तकों को विभिन्न साइटों मैं खंगाल कर पढ़ लेते हैं। अब डिजिटल किताबें भी आ गई है साथ ही डिजिटल लाइब्रेरी भी धीरे-धीरे विकसित हो रही है। पर कई कंपनियां विविध किताबों को साइट पर प्रकाशित कर बच्चों के पढ़ने के लिए उपलब्ध करा रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे बड़ी संख्या में बच्चे पढ़ कर लाभान्वित हो रहे हैं। इस दिशा में भारत सरकार तथा राज्य सरकारों द्वारा डिजिटल कार्यक्रमों के अंतर्गत ई शिक्षा तथा ई पुस्तकों के पुस्तकालयों के माध्यम से उपलब्ध कराई जा रही पठन सामग्रियां बच्चों की जिज्ञासा को शांत करने का काम कर रही है। डिजिटल किताबों तथा पुस्तकालयों से यह लाभ है कि देश विदेश में किसी भी भाग में रहकर लोग अपनी इच्छा के अनुसार पुस्तकों पत्रिकाओं आदि को पढ़ सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इंटरनेट अब अध्ययन का सुलभ साधन बन गया है। पर दूसरी तरफ इससे कुछ नुकसान भी हो रहे हैं, उचित मार्गदर्शन वाली किताबें न पढ़कर भ्रामक पुस्तकों का अध्ययन कर अपने को दिग्भ्रमित कर रहे हैं और इससे बच्चों का भविष्य भी प्रभावित हो रहा है। इसके लिए छोटे बच्चों को अपनी निगरानी में इंटरनेट से किताबें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना अन्यथा दिगभ्रमित साहित्य बच्चों की मानसिकता पर विकृत प्रभाव डाल सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि पुस्तकें ज्ञान देने के साथ मार्गदर्शन तथा चरित्र निर्माण का सर्वोत्तम साधन है। पुस्तकों से राष्ट्र की युवा कर्ण धारों को नई दिशा दी जा सकती है तथा एकता और अखंडता का संदेश देकर एक महान और सशक्त राष्ट्र की पृष्ठभूमि रखी जा सकती है।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 17 Mar 2026 20:01:12 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>मर्यादा लांघकर त्योहार को न करें बदनाम</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>अम्बिका कुशवाहा ‘अम्बी’</strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">होली भारतीय संस्कृति का पारिवारिक प्रेम एवं सामाजिक सौहार्द का त्योहार है, जो वसंत, प्रेम और नई शुरुआत का प्रतीक है। होली का उत्सव केवल आनंद का अवसर नहीं, बल्कि नैतिक मूल्यों, सामाजिक एकता और आध्यात्मिक संदेश का माध्यम भी है। पौराणिक कथाओं में होली होलिका दहन से जुड़ी है, जहाँ भक्त प्रह्लाद की भक्ति ने असत्य पर सत्य की विजय का संदेश दिया। साथ ही राधा-कृष्ण की लीलाएँ होली को प्रेम और भक्ति का उत्सव बनाती हैं। भारतीय परंपरा में होली परिवार और समाज को एक सूत्र में बाँधने वाला पर्व है, जहाँ रिश्तों की मिठास</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/171880/do-not-defame-the-festival-by-crossing-limits"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/hindi-divas50.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>अम्बिका कुशवाहा ‘अम्बी’</strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">होली भारतीय संस्कृति का पारिवारिक प्रेम एवं सामाजिक सौहार्द का त्योहार है, जो वसंत, प्रेम और नई शुरुआत का प्रतीक है। होली का उत्सव केवल आनंद का अवसर नहीं, बल्कि नैतिक मूल्यों, सामाजिक एकता और आध्यात्मिक संदेश का माध्यम भी है। पौराणिक कथाओं में होली होलिका दहन से जुड़ी है, जहाँ भक्त प्रह्लाद की भक्ति ने असत्य पर सत्य की विजय का संदेश दिया। साथ ही राधा-कृष्ण की लीलाएँ होली को प्रेम और भक्ति का उत्सव बनाती हैं। भारतीय परंपरा में होली परिवार और समाज को एक सूत्र में बाँधने वाला पर्व है, जहाँ रिश्तों की मिठास बढ़ती है और वैमनस्य दूर होता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लेकिन आधुनिक समय में इसकी नैतिक और मर्यादित छवि धूमिल होती जा रही है। अश्लील भोजपुरी एवं द्विअर्थी गीत, तेज डीजे, जबरन छूना और महिलाओं के साथ अभद्र व्यवहार ने इसे विवादास्पद बना दिया है। अक्सर देखा जाता है कि जीजा–साली तथा भाभी–देवर जैसे रिश्तों की मर्यादा भंग करने वाली हरकतें निंदनीय हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भोजपुरी होली गीत ऐसे परोसे जा रहे हैं, जिनमें रिश्तों को यौनिकता के चश्मे से देखा जाता है। इससे परिवारों में शर्मिंदगी फैलती है और भोजपुरी भाषा एवं संस्कृति की बदनामी भी होती है, जो एक बड़ी क्षति है। भोजपुरी में होली के लोकगीतों और होलिका-गायन की मधुर एवं समृद्ध परंपरा रही है, जो अब धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारतीय परंपरा में कुछ रिश्ते हास्य-व्यंग्य और हल्की छेड़छाड़ वाले माने जाते हैं, किंतु यह सब हमेशा सीमित और सम्मानजनक होना चाहिए। भोजपुरी या हिंदी होली गीतों में जीजा–साली या भाभी–देवर के संबंधों को द्विअर्थी, अश्लील और यौनिक संदर्भों में प्रस्तुत किया जाता है। ऐसे गीतों का परिवार में तथा सड़कों पर बजना शर्मिंदगी का कारण बनता है और महिलाएँ असहज महसूस करती हैं। इन दिनों महिलाएँ कहीं भी यात्रा करने से डरती हैं, क्योंकि वे अपने ही समाज में असुरक्षित महसूस करती हैं। होली के बहाने जबरन छूना, अनचाहा गले लगना, शारीरिक छेड़छाड़ या अश्लील टिप्पणी करना घोर निंदनीय है। कई मामलों में यह यौन उत्पीड़न की श्रेणी में आता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज सोशल मीडिया भी अश्लील सामग्री परोसकर युवाओं को भड़काने और रिश्तों की मर्यादा लांघने में बड़ी भूमिका निभा रहा है। यह कोई अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि एक कड़वी सच्चाई है, जो हमारे पवित्र त्योहार को बदरंग बना रही है। दूसरी ओर, शहरीकरण और पश्चिमी प्रभाव से पारंपरिक मूल्यों का क्षरण बढ़ रहा है। जहाँ पहले परिवार में सामूहिक रूप से होली खेली जाती थी, वहीं अब यह कई स्थानों पर सार्वजनिक हुड़दंग और अराजकता का रूप ले लेती है। इन गलत प्रवृत्तियों का प्रभाव बच्चों पर भी पड़ रहा है। बच्चे कच्ची मिट्टी की तरह होते हैं; वे जो देखते और सुनते हैं, वही सीखते हैं। अश्लील गीत और हिंसक व्यवहार उन्हें गलत मूल्य सिखाते हैं, जो भविष्य में समाज के लिए घातक हो सकते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">होली की इस विकृति का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है। महिलाओं की असुरक्षा सबसे बड़ी समस्या बन गई है। अश्लील गीतों और “बुरा न मानो, होली है” जैसे नारों का प्रयोग असहमति की अनदेखी करने का बहाना बन गया है, जो कई बार यौन उत्पीड़न की सीमा पार कर जाता है। लैंगिक वर्चस्व का प्रदर्शन और मर्यादा का उल्लंघन होली जैसे उत्सव की भावना को सबसे अधिक कलंकित करता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसलिए इस होली को उत्साहपूर्वक मनाइए, किंतु मर्यादा की सीमाओं में रहकर। शोर-शराबा, जबरदस्ती रंग लगाना या किसी को असुविधा पहुँचाना त्योहार की भावना के विपरीत है। बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों की भावनाओं का विशेष ध्यान रखें। बिहार पुलिस और महिला आयोग ने इस वर्ष अश्लील गीतों पर प्राथमिकी दर्ज करने तथा ड्रोन निगरानी तक की व्यवस्था की है, जो एक सकारात्मक कदम है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">होली का वास्तविक रंग प्रेम, एकता और पवित्रता में है। इसे विकृतियों से मुक्त रखकर हम न केवल त्योहार की मिठास बचाएँगे, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बेहतर समाज का निर्माण भी करेंगे। इस प्रकार होली की पवित्रता, बंधुत्व और मिठास बनाए रखें।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 28 Feb 2026 18:03:47 +0530</pubDate>
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