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                <title>रंगों का त्योहार - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>रंगों का त्योहार RSS Feed</description>
                
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                <title>कहीं श्मशान की राख कहीं फूलों से खेली जाती है होली!</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">समूचे देश समेत विशेषकर उत्तर भारत में मनाया जाने वाला होली पर्व आस्था विश्वास ऋतु परिवर्तन और सामाजिक एकता का लोकपर्व है। होली के दिन समूचा समाज सवर्ण असवर्ण गरीब अमीर सबल निर्बल राजा प्रजा ऊंच नीच के दायरे से बाहर आकर एक दूसरे को रंग गुलाल लगा कर सामाजिक समरसता व सौहार्द का सूत्रपात करता है यह लोकपर्व इतना सजीव व सामाजिक वैज्ञानिक आधार से जुड़ा है कि इस की प्रासंगिकता कभी खत्म नहीं हो सकती है। इस लोकपर्व के संबंध में प्रहलाद और होलिका की कथा सबसे ज्यादा प्रचलित है। पुराने समय में हिरण्यकश्यपु का</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172340/holi-is-played-with-ashes-of-crematorium-and-flowers-at"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/कहीं-श्मशान-की-राख-कहीं-फूलों-से-खेली-जाती-है-होली!.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">समूचे देश समेत विशेषकर उत्तर भारत में मनाया जाने वाला होली पर्व आस्था विश्वास ऋतु परिवर्तन और सामाजिक एकता का लोकपर्व है। होली के दिन समूचा समाज सवर्ण असवर्ण गरीब अमीर सबल निर्बल राजा प्रजा ऊंच नीच के दायरे से बाहर आकर एक दूसरे को रंग गुलाल लगा कर सामाजिक समरसता व सौहार्द का सूत्रपात करता है यह लोकपर्व इतना सजीव व सामाजिक वैज्ञानिक आधार से जुड़ा है कि इस की प्रासंगिकता कभी खत्म नहीं हो सकती है। इस लोकपर्व के संबंध में प्रहलाद और होलिका की कथा सबसे ज्यादा प्रचलित है। पुराने समय में हिरण्यकश्यपु का पुत्र प्रहलाद विष्णु जी का परम भक्त था। ये बात हिरण्यकश्यपु को पसंद नहीं थी। इस वजह से वह प्रहलाद को मारना चाहता था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">असुर राज हिरण्यकश्यपु ने बहुत कोशिश की, लेकिन प्रहलाद को मार नहीं सका। तब असुरराज की बहन होलिका प्रहलाद को लेकर आग में बैठ गई। होलिका को आग में न जलना का वरदान मिला हुआ था, लेकिन भगवान विष्णु जी की कृपा से होलिका जल गई और प्रहलाद बच गया। तभी से सत्य और धर्म की जीत के रूप में होली दहन का पर्व मनाया जाता है।।युगों पहले जिस तरह भक्त प्रहलाद के सकुशल बच जाने पर लोगों ने रंग गुलाल लगा कर खुशी मनाई थी आज भी उसी तरह खुशी मनाने का सिलसिला बदस्तूर जारी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>गालियों से होली</strong></div>
<div style="text-align:justify;">होली के गीतों में वैसे भी गालियां पिरोई होती हैं. शब्दों का प्रयोग कुछ इस प्रकार किया गया होता है कि लोग उसे सुन कर मस्ती करते हैं और उन्हें भीतर तक गुदगुदी होती है. वाराणसी, मिथिलांचल, कुमाऊं, राजस्थान, हरियाणा में होली पर गाली की अनोखी परंररा है। होली एक ऐसा त्योहार है, जो रंगों की मस्ती के साथ-साथ गालियों और गुदगुदाते गीतों के लिए भी खूब जाना जाता है. इसीलिए इस त्योहार को सबसे अनूठा कहते हैं. साल भर लोगों को इसका इंतजार रहता है. लोग गालियों और गीतों के जरिए अपनी भड़ास निकालते हैं. जैसा प्रदेश, वैसे गीत और वैसी ही वहां की गालियां. बहुरंगी होली की ये छटा दुनिया भर में निराली है। काशी की परंपराएं इसलिए अनूठी हैं क्योंकि यहां होली पर गालियों का भी अपना एक अलग संस्कार देखने को मिलता है. दूसरे शहरों में गाली देने पर मार हो जाए, लेकिन यहां होली पर गालियां मनभावन लगती हैं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>तलवारबाजी से होली</strong> </div>
<div style="text-align:justify;">पंजाब में सिखों के 10वें गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा शुरू की गई यह होलीवीर रस से भरी होती है। इसमें निहंग सिख पारंपरिक पोशाक पहनकर तलवारबाजी और घुड़सवारी (गतका) का प्रदर्शन करते हैं। पश्चिमी बंगाल व ओडिशा में यहाँ होली को डोल जात्रा के रूप में मनाया जाता हैजिसमें राधा-कृष्ण की मूर्तियों को झूलों (डोल) पर रखकर जुलूस निकाला जाता है और रंगों से पूजा की जाती है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>लठ्ठमार होली</strong> </div>
<div style="text-align:justify;">श्रीकृष्ण की जन्मभूमि मथुरा से करीब 50 किमी दूर बरसाना की होली बहुत खास होती है। बरसाना में कई दिनों तक लट्ठमार होली खेली जाती है। फाल्गुन पूर्णिमा से पहले ही लोग यहां होली खेलना शुरू कर देते हैं। पास के नंदगांव के पुरुष बरसाना आते हैं और बरसाना के पुरुष नंदगांव जाते हैं। इन गांवों की महिलाएं पुरुषों को लट्ठ मारती हैं और पुरुष ढाल से बचने की कोशिश करते हैं। ये होली देखने देश-विदेश से लाखों लोग यहां आते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>फूलों से होली </strong></div>
<div style="text-align:justify;">मान्यता है कि मथुरा-वृंदावन में श्रीकृष्ण ने राधा और गोपियों के साथ होली खेली थी। इसी वजह से इन जगहों पर होली की अच्छी खासी धूम होती है। मथुरा-वृंदावन में श्रीकृष्ण के भक्त बड़ी संख्या में होली खेलने पहुंचते हैं। यहां के मंदिरों में फूलों से होली खेली जाती है।बांके बिहारी मंदिर में फूलों की होली अवर्णनीय है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>लड्डूमार होली </strong></div>
<div style="text-align:justify;">बरसाना के राधा रानी मंदिर में लड्डू मार होली खेली जाती हैजहाँ एक-दूसरे पर लड्डू फेंके जाते हैं और उन्हें प्रसाद के रूप में खाया जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>मसाने की होली </strong></div>
<div style="text-align:justify;">वाराणसी(काशी) के मणिकर्णिका घाट पर खेली जाने वाली होली विश्व प्रसिद्ध है। यहां शमशान की राख से होली खेली जाती है। मान्यता है कि शिव जी ने यहां अपने गणों के साथ चिता की राख से होली खेली थी। इसी मान्यता की वजह से आज भी शिव भक्त यहां मसाने की होली खेलते है। देश दुनिया में यह एकमात्र ऐसी होली है जिसमें चिता भस्म को रंग गुलाल की तरह इस्तेमाल करते हुए होली खेलते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>अंगारों में होली </strong></div>
<div style="text-align:justify;">एक ऐसी भी होली है जहां जलती होली की लपटों के बीच पंडा नंगे पांव निकल जाता है लेकिन खरोंच तक नहीं आती है। मथुरा से करीब 50 किमी दूर एक गांव है फालैन। इसे प्रहलाद का गांव भी कहते हैं। फालैन गांव की होली की खास बात ये है कि यहां जलती हुई होली के बीच में से एक पंडा चलकर गुजरता है। होली ऊंची-ऊंची लपटों से निकलने के बाद भी पंडे का बाल तक नहीं जलता है। ये चमत्कार देखने के लिए देश-दुनिया से काफी लोग यहां पहुंचते हैं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>गीतों की होली </strong></div>
<div style="text-align:justify;">उत्तराखंड में होली संगीत और गायन के साथ मनाई जाती हैजिसे 'बैठकी होली' कहा जाता हैजहाँ शास्त्रीय और पारंपरिक गीतों का गायन होता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>हल्दी से होली</strong></div>
<div style="text-align:justify;">केरल के कोंकणी और कुडुंबी समुदाय के लोग इस दिन रंगों के बजाय हल्दी (मंजल) मिले पानी का उपयोग करते हैंजो शुद्धिकरण का प्रतीक है</div>
<div style="text-align:justify;">महाराष्ट्र और गोवा में यहाँ होली को रंग पंचमी या शिग्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है जो बसंत पंचमी से शुरू होता है </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>हम्पी होली </strong></div>
<div style="text-align:justify;">कर्नाटक के हम्पी की होली भी दुनियाभर में प्रसिद्ध है। ये जगह यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज में शामिल है। इस जगह का संबंध त्रेतायुग की वानर सेना से है। मान्यता है कि सुग्रीव अपनी वानर सेना के साथ इसी क्षेत्र में रहते थे। यहां होली पर बड़ा आयोजन होता है। हजारों लोग यहां होली खेलने आते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>शाही होली</strong></div>
<div style="text-align:justify;">राजस्थान की होली उदयपुर और पुष्कर में आज भी शाही तौर तरीकों से होली खेली जाती है। इस मौके पर राजपुताना आन बान शान देखने को मिलती है।कई दूसरे एशियाई देशों में भी होली के प्रतिरूप रंगों का पर्व मनाया जाता है लेकिन भारतीय होली यकीनन आज भी अनूठी मस्ती से भरी है यह समाज को एक सूत्र में पिरो कर उमंग व उत्साह का संचार करती है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 03 Mar 2026 18:13:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>होली एआई रे…</title>
                                    <description><![CDATA[जानिए कैसे डिजिटल युग में रंगों से ज़्यादा फ़िल्टर और डेटा का त्योहार बन गई है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/171996/holi-ai-re%E2%80%A6"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/img_20260301_114028.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:left;"><strong>      होली <span style="color:rgb(224,62,45);">एआई</span> रे… </strong></h1>
<h5 style="text-align:center;"><span style="background-color:rgb(241,196,15);"><strong>रंगों से ज़्यादा <span style="color:rgb(224,62,45);">फ़िल्टर</span> का त्योहार</strong></span></h5>
<p style="padding-left:40px;"> </p>
<p>होली आई रे… नहीं साहब, इस बार होली <span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>एआई</strong></span> रे!</p>
<p>अब न पिचकारी असली रही, न रंग असली—सब कुछ “अपडेटेड वर्ज़न” में आ गया है। मोहल्ले की गली में अबीर-गुलाल कम और मोबाइल के कैमरे ज़्यादा उड़ते दिखाई देते हैं। पहले लोग होली पर गले मिलते थे, अब “फेस रिकॉग्निशन” से पहचानते हैं—“अरे तुम ही हो न? वही जो पिछले साल मेरे ऊपर पक्का रंग डालकर भाग गए थे?” अब बदला भी डिजिटल हो गया है। एआई बता देता है कि किसने किस पर कितना रंग लगाया और किसने फोटो में कितनी मुस्कान एडिट की।कहते हैं होली बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। भक्त प्रह्लाद की भक्ति और होलिका के दहन की कथा हम बचपन से सुनते आए हैं। पर आजकल लगता है कि असली होलिका तो हमारी प्राइवेसी है, जो हर साल सोशल मीडिया की अग्नि में स्वाहा हो जाती है।अब देखिए, पहले मथुरा-वृंदावन की होली की चर्चा होती थी, लोग मथुरा और वृंदावन जाने का सपना देखते थे। अब सपना यह होता है कि “रील” वायरल हो जाए। रंग से ज्यादा फिक्र इस बात की होती है कि वीडियो पर कितने व्यूज़ आए। कोई गुलाल लगाने से पहले पूछता है—“भाई, कैमरा ऑन है न?”एआई का कमाल देखिए—अब होली की शुभकामनाएँ भी इंसान नहीं, “चैटबॉट” लिखते हैं। एक क्लिक में सौ लोगों को एक जैसा संदेश—“रंगों का त्योहार आपके जीवन में खुशियों की बहार लाए।” बहार तो ठीक है, पर मौलिकता का क्या?मोहल्ले के शर्मा जी ने इस बार “स्मार्ट पिचकारी” खरीदी है। कहते हैं इसमें सेंसर लगा है—जो सामने वाले के कपड़ों की कीमत पहचानकर उसी हिसाब से रंग की मात्रा तय करता है। महंगे कपड़े पर हल्का गुलाल, सस्ते पर पूरा टैंक खाली! तकनीक का न्याय भी बड़ा विचित्र है।बच्चे अब कीचड़ में नहीं कूदते, वे “वर्चुअल होली गेम” खेलते हैं। स्क्रीन पर रंग उड़ाते हैं और असली कपड़े साफ रखते हैं। मां-बाप भी खुश—न कपड़े धुलेंगे, न गली में शिकायत आएगी।</p>
<p>और नेताओं की होली? वह भी एआई-प्रूफ हो गई है। भाषण पहले से ही “डेटा एनालिसिस” से तैयार—किस मोहल्ले में कितनी मिठास घोलनी है, किस वर्ग पर कितना रंग डालना है, सब एल्गोरिद्म तय करता है।पर इस व्यंग्य के बीच एक सच भी छिपा है—तकनीक ने सुविधाएँ दी हैं, पर त्योहार की आत्मा अभी भी दिलों में बसती है। होली का असली रंग तब चढ़ता है जब रूठे मन मान जाते हैं, जब बिना फिल्टर की हँसी गूंजती है, जब रिश्तों की पिचकारी सच्चे स्नेह से भीगती है।तो आइए, इस बार “होली एआई रे…” कहते हुए भी इंसानियत का रंग फीका न पड़ने दें। तकनीक का आनंद लें, पर रिश्तों को ऑफलाइन ही रखें। क्योंकि असली होली वही है, जो दिल से खेली जाए—बिना डेटा पैक और बिना एडिट के।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>विचारधारा</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Mar 2026 11:57:06 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sachin Bajpai]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>होली: परिवार, समाज और राष्ट्र का हो लेने का पर्व</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
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<div style="text-align:justify;"><strong>प्रो.(डा.) मनमोहन प्रकाश </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">होली केवल रंगों का त्योहार नहीं है, बल्कि यह भारतीय जीवन-दर्शन का जीवंत उत्सव है। यह ऐसा पर्व है जो व्यक्ति को परिवार से, परिवार को समाज से और समाज को राष्ट्र की व्यापक चेतना से जोड़ देता है। ‘हो लेना’ अर्थात् स्वयं को अहंकार, भेदभाव और संकीर्णताओं से मुक्त कर समष्टि के साथ एकात्म कर लेना।होली इसी भाव की अभिव्यक्ति है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">परिवार के स्तर पर होली स्नेह, क्षमा और पुनर्संयोजन का पर्व है। वर्षभर की व्यस्तता, मतभेद और मौन इस दिन रंगों में घुलकर समाप्त हो जाते हैं। बड़े-बुजुर्गों के चरणों में गुलाल, बच्चों की खिलखिलाहट,</div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/171876/holi-is-the-festival-of-coming-together-of-family-society"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/download-(1).jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div>
<div style="text-align:justify;"><strong>प्रो.(डा.) मनमोहन प्रकाश </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">होली केवल रंगों का त्योहार नहीं है, बल्कि यह भारतीय जीवन-दर्शन का जीवंत उत्सव है। यह ऐसा पर्व है जो व्यक्ति को परिवार से, परिवार को समाज से और समाज को राष्ट्र की व्यापक चेतना से जोड़ देता है। ‘हो लेना’ अर्थात् स्वयं को अहंकार, भेदभाव और संकीर्णताओं से मुक्त कर समष्टि के साथ एकात्म कर लेना।होली इसी भाव की अभिव्यक्ति है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">परिवार के स्तर पर होली स्नेह, क्षमा और पुनर्संयोजन का पर्व है। वर्षभर की व्यस्तता, मतभेद और मौन इस दिन रंगों में घुलकर समाप्त हो जाते हैं। बड़े-बुजुर्गों के चरणों में गुलाल, बच्चों की खिलखिलाहट, घर-आंगन में गूंजते फाग आदि सब मिलकर पारिवारिक संबंधों में नई ऊष्मा भर देते हैं। होलिका-दहन की अग्नि प्रतीक है कि ईर्ष्या, क्रोध और कटुता जलकर राख हो जाए और परिवार प्रेम के रंग में रंग जाए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">समाज के स्तर पर होली समानता और समरसता का संदेश देती है। इस दिन रंग जाति, वर्ग, भाषा और आर्थिक भेद नहीं देखते। सब एक-दूसरे को रंग लगाते हैं।यह व्यवहारिक रूप से सामाजिक समता का पाठ है। लोकगीत, नृत्य, ढोल-नगाड़े और सामूहिक उल्लास समाज को जोड़ते हैं। होली यह सिखाती है कि सामाजिक जीवन में संवाद, हास्य और सहभागिता कितनी आवश्यक है; कठोरता नहीं, बल्कि अपनत्व समाज को मजबूत बनाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राष्ट्रीय स्तर पर होली सांस्कृतिक एकता का उत्सव है। विविधताओं से भरे भारत में यह पर्व उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक समान भाव से मनाया जाता है।कहीं फाग, कहीं शिगमो, कहीं रंगपंचमी के रूप में। अलग-अलग परंपराएँ होते हुए भी उत्सव का मूल भाव एक है: आनंद, मेल-मिलाप और नवसृजन। यह सांस्कृतिक एकात्मता ही राष्ट्र की आत्मा है। होली हमें याद दिलाती है कि हमारी विविधता विभाजन नहीं, बल्कि शक्ति है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">होली का आध्यात्मिक संकेत भी उतना ही गहरा है। यह ऋतु परिवर्तन का पर्व है।</div>
<div style="text-align:justify;">वसंत के आगमन के साथ जीवन में नई ऊर्जा का संचार। रंग यहाँ केवल बाह्य नहीं, आंतरिक भी हैं</div>
<div style="text-align:justify;">-विवेक,  करुणा, साहस और सत्य के रंग। होलिका-दहन असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक है; प्रह्लाद की कथा हमें बताती है कि आस्था और नैतिकता अंततः विजयी होती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज के समय में होली का संदेश और भी प्रासंगिक है। जब समाज में वैमनस्य, अविश्वास और तनाव बढ़ रहा हो, तब होली हमें ‘हो लेने’ का मार्ग दिखाती है,परिवार के लिए समय निकालने का, समाज के प्रति संवेदनशील होने का और राष्ट्र के प्रति कर्तव्यनिष्ठ रहने का। यह पर्व हमें संयम, सौहार्द और पर्यावरण-संवेदनशीलता के साथ उत्सव मनाने की प्रेरणा भी देता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः, होली रंग लगाने का नहीं, रंग बनने का पर्व है।</div>
<div style="text-align:justify;">प्रेम का, एकता का और राष्ट्रभाव का। जब व्यक्ति परिवार में, परिवार समाज में और समाज राष्ट्र में ‘हो’ जाता है, तभी होली अपने पूर्ण अर्थ में साकार होती है। यही होली का शाश्वत संदेश है।</div>
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<div class="hq gt" style="text-align:justify;"></div>]]></content:encoded>
                
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                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 28 Feb 2026 17:51:59 +0530</pubDate>
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