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                <title>सामाजिक चेतना - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>सामाजिक चेतना RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>जेब में पलता अदृश्य ज़हर: सोशल मीडिया और युवा मन का संकट</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;" align="center">  </p>
<blockquote class="format1">
<p class="MsoNormal" align="center">[<span lang="hi" xml:lang="hi">आभासी सफलता का दबाव और युवा मन का अवसाद</span>]</p>
<p class="MsoNormal" align="center">[<span lang="hi" xml:lang="hi">सोशल मीडिया: मनोरंजन नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक प्रदूषण का नया दौर</span>]</p>
<p class="MsoNormal">  </p>
</blockquote>
<p style="text-align:justify;" align="right">·      <strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">  </p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कभी मानव सभ्यता को खतरा बाहरी प्रदूषणों से था—धुएँ से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्लास्टिक से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रसायनों से। पर आज सबसे घातक प्रदूषण हमारी जेब में रखा हुआ है—मोबाइल की चमकती स्क्रीन और उस पर दौड़ती सोशल मीडिया की दुनिया। यह प्रदूषण दिखाई नहीं देता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर मन और चेतना को भीतर से क्षीण कर देता है। यह शरीर को नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मविश्वास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मसम्मान और आशा को खा जाता है। यही कारण है</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173029/the-invisible-poison-growing-in-the-pocket-of-social-media"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/social_media_collection_2026.png" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;" align="center"> </p>
<blockquote class="format1">
<p class="MsoNormal" align="center">[<span lang="hi" xml:lang="hi">आभासी सफलता का दबाव और युवा मन का अवसाद</span>]</p>
<p class="MsoNormal" align="center">[<span lang="hi" xml:lang="hi">सोशल मीडिया: मनोरंजन नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक प्रदूषण का नया दौर</span>]</p>
<p class="MsoNormal"> </p>
</blockquote>
<p style="text-align:justify;" align="right">·      <strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"> </p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कभी मानव सभ्यता को खतरा बाहरी प्रदूषणों से था—धुएँ से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्लास्टिक से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रसायनों से। पर आज सबसे घातक प्रदूषण हमारी जेब में रखा हुआ है—मोबाइल की चमकती स्क्रीन और उस पर दौड़ती सोशल मीडिया की दुनिया। यह प्रदूषण दिखाई नहीं देता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर मन और चेतना को भीतर से क्षीण कर देता है। यह शरीर को नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मविश्वास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मसम्मान और आशा को खा जाता है। यही कारण है कि बीते कुछ वर्षों में युवाओं में अवसाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अकेलापन और आत्महत्या की घटनाओं के पीछे सोशल मीडिया की भूमिका तेजी से चर्चा में आई है। यह तकनीक सुविधा का साधन बनकर आई थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन अनियंत्रित उपयोग ने इसे मानसिक विष में बदल दिया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सोशल मीडिया का सबसे गहरा असर युवा मन की तुलना करने की प्रवृत्ति पर पड़ता है। यह मंच एक ऐसा आभासी संसार रच देता है जहाँ हर व्यक्ति अपनी जिंदगी का सबसे चमकदार पक्ष ही दिखाता है। महंगी कारें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शानदार यात्राएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आकर्षक चेहरे और लगातार मिलती सफलता—इन दृश्यों को देखकर एक सामान्य युवा अनजाने में स्वयं को असफल समझने लगता है। उसे लगने लगता है कि बाकी सब लोग जीवन की दौड़ में उससे बहुत आगे निकल चुके हैं। यही निरंतर तुलना धीरे-धीरे आत्मविश्वास को कमजोर कर देती है और व्यक्ति को भीतर से तोड़ने लगती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि सोशल मीडिया पर मिलने वाली प्रतिक्रिया—लाइक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कमेंट और शेयर—एक प्रकार की मनोवैज्ञानिक लत पैदा करती है। हर बार जब किसी पोस्ट पर प्रतिक्रिया मिलती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो मस्तिष्क में डोपामिन नामक रसायन सक्रिय होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो क्षणिक खुशी देता है। लेकिन यही खुशी व्यक्ति को बार-बार उसी प्रतिक्रिया की तलाश में बाँध देती है। जब अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं मिलती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो निराशा और बेचैनी बढ़ जाती है। धीरे-धीरे यह मानसिक निर्भरता व्यक्ति के आत्मसम्मान को पूरी तरह बाहरी स्वीकृति पर आश्रित बना देती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस समस्या का दूसरा गंभीर पक्ष है साइबर बुलिंग। सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इसके साथ ही अपमान और उत्पीड़न के नए रास्ते भी खोल दिए। गुमनाम पहचान के पीछे छिपकर लोग दूसरों का मजाक उड़ाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपमानजनक टिप्पणियाँ करते हैं या निजी तस्वीरों को वायरल कर देते हैं। किशोर और युवा उम्र में आत्मसम्मान बेहद संवेदनशील होता है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे में सार्वजनिक अपमान मानसिक आघात बन जाता है। कई मामलों में यह अपमान इतना गहरा होता है कि पीड़ित युवा स्वयं को समाज के सामने असहाय महसूस करने लगता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि सोशल मीडिया युवाओं के वास्तविक संबंधों को कमजोर कर रहा है। पहले दुख या तनाव के समय व्यक्ति परिवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मित्रों या समाज के बीच समाधान खोजता था। अब वही व्यक्ति अपनी भावनाएँ स्क्रीन पर उकेर देता है। लेकिन वर्चुअल दुनिया में संवेदनशीलता का स्थान अक्सर प्रतिक्रिया और मनोरंजन ने ले लिया है। कई बार गंभीर पीड़ा को भी लोग हल्के में लेते हैं या उसे मजाक बना देते हैं। परिणामस्वरूप पीड़ित व्यक्ति और अधिक अकेला महसूस करता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल लत का प्रभाव युवाओं की दिनचर्या पर भी स्पष्ट दिखाई देता है। देर रात तक मोबाइल पर सक्रिय रहने से नींद प्रभावित होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद आवश्यक है। नींद की कमी से चिड़चिड़ापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिंता और ध्यान की कमी बढ़ती है। पढ़ाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करियर और सामाजिक जीवन पर इसका नकारात्मक असर पड़ता है। जब व्यक्ति बार-बार असफलता या असंतुलन महसूस करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसके भीतर निराशा की भावना और गहरी होने लगती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सोशल मीडिया की एक और खतरनाक प्रवृत्ति है “परफेक्ट लाइफ” का भ्रम। यह मंच वास्तविक जीवन की जटिलताओं को छिपाकर केवल आकर्षक क्षणों को सामने लाता है। संघर्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असफलता और साधारण जीवन के पल लगभग गायब रहते हैं। परिणामस्वरूप देखने वाले युवाओं को लगता है कि बाकी सभी लोग खुश और सफल हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल वही संघर्ष कर रहे हैं। यही भ्रम धीरे-धीरे आत्मसम्मान को कमजोर करता है और जीवन के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण पैदा करता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हाल के वर्षों में कई देशों में किए गए अध्ययन यह संकेत देते हैं कि सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग और युवाओं में बढ़ती मानसिक समस्याओं के बीच स्पष्ट संबंध दिखाई देता है। चिंता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अवसाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्महीनता और अकेलापन—ये सभी समस्याएँ अनियंत्रित सोशल मीडिया उपयोग से और बढ़ सकती हैं। जब व्यक्ति लगातार आभासी दुनिया में डूबा रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वास्तविक जीवन की चुनौतियों से जूझने की उसकी क्षमता धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस समस्या का समाधान केवल तकनीक से दूरी बनाने में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उसके विवेकपूर्ण उपयोग में छिपा है। युवाओं को यह समझाना आवश्यक है कि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली दुनिया पूरी सच्चाई नहीं होती। यह जीवन का केवल चुना हुआ और सजाया हुआ हिस्सा होता है। यदि युवा इस अंतर को समझ लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वे तुलना और निराशा के जाल से बच सकते हैं। इसके साथ ही डिजिटल अनुशासन भी उतना ही आवश्यक है—सीमित समय तक उपयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नियमित विश्राम और वास्तविक जीवन की गतिविधियों में भागीदारी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परिवार और शिक्षा संस्थानों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। माता-पिता को बच्चों के साथ संवाद बनाए रखना चाहिए और उनकी भावनात्मक स्थिति को समझने का प्रयास करना चाहिए। विद्यालयों में मानसिक स्वास्थ्य और डिजिटल साक्षरता को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि युवा ऑनलाइन दुनिया के खतरों को पहचान सकें। यदि समाज समय रहते संवेदनशीलता और समर्थन का वातावरण बना सके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कई दुखद घटनाओं को रोका जा सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज तकनीक को नकारना संभव नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि वह हमारे जीवन की धड़कनों में शामिल हो चुकी है। प्रश्न यह नहीं कि सोशल मीडिया रहे या नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह है कि हम उसका उपयोग किस विवेक और जिम्मेदारी के साथ करते हैं। यदि इसका संतुलित और सजग उपयोग हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यही माध्यम ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रचनात्मकता और संवाद का सशक्त सेतु बन सकता है। लेकिन यदि नियंत्रण खो जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यही चमकती स्क्रीन धीरे-धीरे मानसिक विष बनकर हमारी युवा पीढ़ी की ऊर्जा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मविश्वास और आशा को भीतर ही भीतर निगल सकती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज आवश्यकता है कि समाज इस अदृश्य खतरे को गंभीरता से समझे। प्लास्टिक पर्यावरण को प्रदूषित करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन सोशल मीडिया का असंतुलित प्रभाव मन और विचारों को प्रदूषित कर सकता है। यदि हम युवाओं को सुरक्षित और सशक्त भविष्य देना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो हमें उन्हें आभासी चमक से अधिक वास्तविक जीवन के मूल्य सिखाने होंगे। तभी यह पीढ़ी निराशा के अंधेरे में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि आत्मविश्वास और संतुलन की रोशनी में आगे बढ़ सकेगी।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>टेक्नोलॉजी</category>
                                            <category>सोशल मीडिया</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 09 Mar 2026 21:31:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सामाजिक बदलाव में किताब की भूमिका' विषय पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय द्वारा विशेष व्याख्यान का आयोजन</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">दया शंकर त्रिपाठी की रिपोर्ट</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>आज इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रो. धीरेन्द्र वर्मा शताब्दी सभागार में विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया. जिसका विषय 'सामाजिक बदलाव में किताब की भूमिका' था. मुख्य वक्ता प्रो. अर्चना सिंह थी तथा अध्यक्षता हिंदी विभाग की अध्यक्ष प्रो. लालसा यादव ने की. मुख्य अतिथि के रुप में कला संकाय के डीन प्रो. वी. के. राय उपस्थित थे.कार्यक्रम का कुशल संचालन एवं प्रस्तावना डॉ. दीनानाथ मौर्य ने रखी , कार्यक्रम का संयोजन हिंदी विभाग के वरिष्ठ आचार्य प्रो. संतोष भदौरिया ने किया.</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">कार्यक्रम के प्रारम्भ में संयोजक प्रोफेसर संतोष भदौरिया ने</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/171833/special-lecture-organized-by-allahabad-university-on-the-role-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/1001619430.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">दया शंकर त्रिपाठी की रिपोर्ट</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>आज इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रो. धीरेन्द्र वर्मा शताब्दी सभागार में विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया. जिसका विषय 'सामाजिक बदलाव में किताब की भूमिका' था. मुख्य वक्ता प्रो. अर्चना सिंह थी तथा अध्यक्षता हिंदी विभाग की अध्यक्ष प्रो. लालसा यादव ने की. मुख्य अतिथि के रुप में कला संकाय के डीन प्रो. वी. के. राय उपस्थित थे.कार्यक्रम का कुशल संचालन एवं प्रस्तावना डॉ. दीनानाथ मौर्य ने रखी , कार्यक्रम का संयोजन हिंदी विभाग के वरिष्ठ आचार्य प्रो. संतोष भदौरिया ने किया.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कार्यक्रम के प्रारम्भ में संयोजक प्रोफेसर संतोष भदौरिया ने एक परिचयात्मक वक्तव्य दिया। उन्होंने बताया कि सं 2024 में प्रेमचंद की जयंती पर 'किताबें कुछ कहना चाहती हैं 'पुस्तकालय की शुरुआत निजी प्रयास से हुई थी। पुस्तकालय का कुशल संचालन शोधार्थियों द्वारा अबाधित रूप से किया जाता रहा है। इस पुस्तकालय में सभी विधाओं की पुस्तकें उपलब्ध हैं। प्रोफेसर भदौरिया ने पुस्तकालय के लिए शुभचिंतक शिक्षकों व विद्यार्थियों का आभार ज्ञापित करने के क्रम में बताया कि प्रो.राजेंद्र कुमार ने पुस्तकालय हेतु किताबें दी</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डॉ० सूर्यनारायण सिंह, डॉ० दीनानाथ मौर्य, प्रो.अब्दुल बिस्मिल्लाह, श्री पंकज चतुर्वेदी, श्री असरार गाँधी, श्री संजय पाण्डेय डॉ० जनार्दन आदि ने लाइब्रेरी के लिए बहुमूल्य पुस्तकें तथा मेरे शोध छात्र डॉ० अम्बरीश शुक्ल ने उन्हें सहेजने के लिए आलमारी भेंट की। शोध छात्रा उजाला यादव ने हाल ही में लगभग पांच हजार की नई किताबें भेंट की। प्रदर्शनी सहयोग के लिए प्रोफेसर भदौरिया ने अनु प्रिया , हरिओम कुमार,अभिषेक, धर्मवीर, जगदीश, सोम, रिया, पारस, ज्योति, श्वेता, सृष्टि, पारस के कार्य को सराहा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तत्पश्चात इलाहाबाद विश्वविद्यालय कला संकाय के डीन एवं कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो० वी के राय नेकहा कि दरअसल किताबें जो कहना चाहती हैं और प्रदर्शनी जो कहना चाहती हैं उन दोनों में एक तारतम्यता है। किताबें हमारी सोच को विकसित करने, हमारी काया को अमूर्त से मूर्त रूप देने का कार्य करती हैं। किताबें क्या कहना चाहती हैं इस बात का उत्तर देते हुए वे कहते हैं कि “किताबें कहना चाहती हैं कि यदि तुम मेरे पास आओगे तो मैं तुम्हारे जीवन का दिशा निर्देश करूंगी।” प्रो० वी के राय के अनुसार बड़े सा बड़ा बदलाव लाने में किताबें सक्षम हैं। हमारी सोच में परिवर्तन उसमें क्रांतिकारी भावना लाने का काम भी किताबें करती आ रही हैं। वे अपनी बात को उदाहरण द्वारा पुष्ट करते हुए कहते हैं कि हिंद स्वराज जो 1909 में लिखी गई, उसका स्वतंत्रता आंदोलन में व्यापक प्रभाव पड़ा। इस दृष्टि से पुस्तकें संप्रेषण का सबसे सशक्त माध्यम हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विशेष व्याख्यान की मुख्य वक्ता प्रो. अर्चना सिंह ने कहा कि समाज के बदलाव में किताबों ने बड़ी भूमिका निभाई है। वह सामाजिक परिवर्तन में किताबों की भूमिका एवं महत्व पर अपनी राय रखते हुए कहती हैं कि निश्चित ही इस सामाजिक परिवर्तन के युग में किताबें नए रूप में आएंगी। प्रो.अर्चना 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध की बात करते हुए कहती हैं कि उस समय किताबें तो एक छोटा समुदाय ही लिख रहा था परन्तु एक बड़ा तबका किताबों को पढ़ रहा था। जिससे सामाजिक चेतना के साथ- साथ अस्मिता और आकांक्षा का निर्माण हो रहा था। लेखक इतिहास से प्रतीक को लेकर किताबों में उसे नए अर्थ में प्रयोग कर रहा था। उस समय पाठक पुस्तक की समीक्षा भी करते थे और एक समृद्ध बहस भी होती थी जिससे नया क्रिएशन होता था। उस समय अंबेडकर जो लिख रहे थे उसका निचले तबके तक पहुंच बनाने के लिए अनुवाद किया जा रहा था.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">किताबों द्वारा अस्मिता निर्माण की बात करते हुए उन्होंने कहा कि एक ओर आंबेडकर के विचारों को ट्रांसलेट किया जा रहा था तो दूसरी ओर हमारी अस्मिता के लिए भी लिखा जा रहा था। भारतीय समाज में स्त्री विमर्श से संबंधित कई पुस्तकें लिखी गई.महादेवी वर्मा से लेकर आज तक। हमारे समाज में किताबों ने लोगों के सपनो को जगाया है। सामाजिक परिवर्तन डिजिटलाइजेशन और बाज़ार से भी  हुआ है उसमें किताबों पर बाजार से उतना खतरा नहीं है। गाजीपुर और आजमगढ़ में पुस्तक मेला लगता है तो पाठक किताबों को छूते है जो उनके अंदर क्यूरियोसिटी जगाते हैं। जिस समाज में सेक्सुअलिटी जैसे विषयों पर बातचीत नहीं होती उसको भी अपना विषय बनाती हैं। पढ़ने की संस्कृति पुस्तक पुस्तिकाओं की समाज में हमेशा जरूरत बनी रहेंगी। किताबें कभी अप्रासंगिक नहीं होती हैं, वे नए रूप में हमारे सामने आती रहेंगी ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रोफेसर लालसा यादव ने किताबों के महत्व को प्रतिपादित किया। वे कहती हैं कि - 'पढ़ते समय हो सकता है किताबें बोझिल लगेंगी लेकिन अंततः किताबें आपको सुकून देती हैं, आपकी भाषा को समृद्ध करती हैं।' उन्होंने जोर देकर कहा कि कई बार विद्यार्थी ज्ञान होते हुए भी उत्तर देने में सक्षम नहीं होते हैं, कारण यह कि ज्ञान को वे संयोजित नहीं कर पा रहे हैं। किताबें पढ़ने से बातों को संयोजित करने का गुण आता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस अवसर पर विशेष रुप से विभाग की अध्यक्ष प्रो. लालसा यादव, जी बी पंत संस्थान से प्रो. अर्चना सिंह, संयोजक प्रो. संतोष भदौरिया,प्रो. शिव प्रसाद शुक्ल प्रो. कल्पना वर्मा, प्रो. राकेश सिंह,प्रो राजेश गर्ग,श्री प्रवीण शेखर, श्री संजय पाण्डेय डॉ. दीनानाथ मौर्य, डॉ. अमितेश कुमार,डॉ. जनार्दन सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थी और शोधार्थी शामिल रहे।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 27 Feb 2026 22:11:08 +0530</pubDate>
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