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                <title>Holi 2026 - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>कहीं श्मशान की राख कहीं फूलों से खेली जाती है होली!</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">समूचे देश समेत विशेषकर उत्तर भारत में मनाया जाने वाला होली पर्व आस्था विश्वास ऋतु परिवर्तन और सामाजिक एकता का लोकपर्व है। होली के दिन समूचा समाज सवर्ण असवर्ण गरीब अमीर सबल निर्बल राजा प्रजा ऊंच नीच के दायरे से बाहर आकर एक दूसरे को रंग गुलाल लगा कर सामाजिक समरसता व सौहार्द का सूत्रपात करता है यह लोकपर्व इतना सजीव व सामाजिक वैज्ञानिक आधार से जुड़ा है कि इस की प्रासंगिकता कभी खत्म नहीं हो सकती है। इस लोकपर्व के संबंध में प्रहलाद और होलिका की कथा सबसे ज्यादा प्रचलित है। पुराने समय में हिरण्यकश्यपु का</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172340/holi-is-played-with-ashes-of-crematorium-and-flowers-at"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/कहीं-श्मशान-की-राख-कहीं-फूलों-से-खेली-जाती-है-होली!.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">समूचे देश समेत विशेषकर उत्तर भारत में मनाया जाने वाला होली पर्व आस्था विश्वास ऋतु परिवर्तन और सामाजिक एकता का लोकपर्व है। होली के दिन समूचा समाज सवर्ण असवर्ण गरीब अमीर सबल निर्बल राजा प्रजा ऊंच नीच के दायरे से बाहर आकर एक दूसरे को रंग गुलाल लगा कर सामाजिक समरसता व सौहार्द का सूत्रपात करता है यह लोकपर्व इतना सजीव व सामाजिक वैज्ञानिक आधार से जुड़ा है कि इस की प्रासंगिकता कभी खत्म नहीं हो सकती है। इस लोकपर्व के संबंध में प्रहलाद और होलिका की कथा सबसे ज्यादा प्रचलित है। पुराने समय में हिरण्यकश्यपु का पुत्र प्रहलाद विष्णु जी का परम भक्त था। ये बात हिरण्यकश्यपु को पसंद नहीं थी। इस वजह से वह प्रहलाद को मारना चाहता था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">असुर राज हिरण्यकश्यपु ने बहुत कोशिश की, लेकिन प्रहलाद को मार नहीं सका। तब असुरराज की बहन होलिका प्रहलाद को लेकर आग में बैठ गई। होलिका को आग में न जलना का वरदान मिला हुआ था, लेकिन भगवान विष्णु जी की कृपा से होलिका जल गई और प्रहलाद बच गया। तभी से सत्य और धर्म की जीत के रूप में होली दहन का पर्व मनाया जाता है।।युगों पहले जिस तरह भक्त प्रहलाद के सकुशल बच जाने पर लोगों ने रंग गुलाल लगा कर खुशी मनाई थी आज भी उसी तरह खुशी मनाने का सिलसिला बदस्तूर जारी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>गालियों से होली</strong></div>
<div style="text-align:justify;">होली के गीतों में वैसे भी गालियां पिरोई होती हैं. शब्दों का प्रयोग कुछ इस प्रकार किया गया होता है कि लोग उसे सुन कर मस्ती करते हैं और उन्हें भीतर तक गुदगुदी होती है. वाराणसी, मिथिलांचल, कुमाऊं, राजस्थान, हरियाणा में होली पर गाली की अनोखी परंररा है। होली एक ऐसा त्योहार है, जो रंगों की मस्ती के साथ-साथ गालियों और गुदगुदाते गीतों के लिए भी खूब जाना जाता है. इसीलिए इस त्योहार को सबसे अनूठा कहते हैं. साल भर लोगों को इसका इंतजार रहता है. लोग गालियों और गीतों के जरिए अपनी भड़ास निकालते हैं. जैसा प्रदेश, वैसे गीत और वैसी ही वहां की गालियां. बहुरंगी होली की ये छटा दुनिया भर में निराली है। काशी की परंपराएं इसलिए अनूठी हैं क्योंकि यहां होली पर गालियों का भी अपना एक अलग संस्कार देखने को मिलता है. दूसरे शहरों में गाली देने पर मार हो जाए, लेकिन यहां होली पर गालियां मनभावन लगती हैं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>तलवारबाजी से होली</strong> </div>
<div style="text-align:justify;">पंजाब में सिखों के 10वें गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा शुरू की गई यह होलीवीर रस से भरी होती है। इसमें निहंग सिख पारंपरिक पोशाक पहनकर तलवारबाजी और घुड़सवारी (गतका) का प्रदर्शन करते हैं। पश्चिमी बंगाल व ओडिशा में यहाँ होली को डोल जात्रा के रूप में मनाया जाता हैजिसमें राधा-कृष्ण की मूर्तियों को झूलों (डोल) पर रखकर जुलूस निकाला जाता है और रंगों से पूजा की जाती है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>लठ्ठमार होली</strong> </div>
<div style="text-align:justify;">श्रीकृष्ण की जन्मभूमि मथुरा से करीब 50 किमी दूर बरसाना की होली बहुत खास होती है। बरसाना में कई दिनों तक लट्ठमार होली खेली जाती है। फाल्गुन पूर्णिमा से पहले ही लोग यहां होली खेलना शुरू कर देते हैं। पास के नंदगांव के पुरुष बरसाना आते हैं और बरसाना के पुरुष नंदगांव जाते हैं। इन गांवों की महिलाएं पुरुषों को लट्ठ मारती हैं और पुरुष ढाल से बचने की कोशिश करते हैं। ये होली देखने देश-विदेश से लाखों लोग यहां आते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>फूलों से होली </strong></div>
<div style="text-align:justify;">मान्यता है कि मथुरा-वृंदावन में श्रीकृष्ण ने राधा और गोपियों के साथ होली खेली थी। इसी वजह से इन जगहों पर होली की अच्छी खासी धूम होती है। मथुरा-वृंदावन में श्रीकृष्ण के भक्त बड़ी संख्या में होली खेलने पहुंचते हैं। यहां के मंदिरों में फूलों से होली खेली जाती है।बांके बिहारी मंदिर में फूलों की होली अवर्णनीय है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>लड्डूमार होली </strong></div>
<div style="text-align:justify;">बरसाना के राधा रानी मंदिर में लड्डू मार होली खेली जाती हैजहाँ एक-दूसरे पर लड्डू फेंके जाते हैं और उन्हें प्रसाद के रूप में खाया जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>मसाने की होली </strong></div>
<div style="text-align:justify;">वाराणसी(काशी) के मणिकर्णिका घाट पर खेली जाने वाली होली विश्व प्रसिद्ध है। यहां शमशान की राख से होली खेली जाती है। मान्यता है कि शिव जी ने यहां अपने गणों के साथ चिता की राख से होली खेली थी। इसी मान्यता की वजह से आज भी शिव भक्त यहां मसाने की होली खेलते है। देश दुनिया में यह एकमात्र ऐसी होली है जिसमें चिता भस्म को रंग गुलाल की तरह इस्तेमाल करते हुए होली खेलते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>अंगारों में होली </strong></div>
<div style="text-align:justify;">एक ऐसी भी होली है जहां जलती होली की लपटों के बीच पंडा नंगे पांव निकल जाता है लेकिन खरोंच तक नहीं आती है। मथुरा से करीब 50 किमी दूर एक गांव है फालैन। इसे प्रहलाद का गांव भी कहते हैं। फालैन गांव की होली की खास बात ये है कि यहां जलती हुई होली के बीच में से एक पंडा चलकर गुजरता है। होली ऊंची-ऊंची लपटों से निकलने के बाद भी पंडे का बाल तक नहीं जलता है। ये चमत्कार देखने के लिए देश-दुनिया से काफी लोग यहां पहुंचते हैं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>गीतों की होली </strong></div>
<div style="text-align:justify;">उत्तराखंड में होली संगीत और गायन के साथ मनाई जाती हैजिसे 'बैठकी होली' कहा जाता हैजहाँ शास्त्रीय और पारंपरिक गीतों का गायन होता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>हल्दी से होली</strong></div>
<div style="text-align:justify;">केरल के कोंकणी और कुडुंबी समुदाय के लोग इस दिन रंगों के बजाय हल्दी (मंजल) मिले पानी का उपयोग करते हैंजो शुद्धिकरण का प्रतीक है</div>
<div style="text-align:justify;">महाराष्ट्र और गोवा में यहाँ होली को रंग पंचमी या शिग्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है जो बसंत पंचमी से शुरू होता है </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>हम्पी होली </strong></div>
<div style="text-align:justify;">कर्नाटक के हम्पी की होली भी दुनियाभर में प्रसिद्ध है। ये जगह यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज में शामिल है। इस जगह का संबंध त्रेतायुग की वानर सेना से है। मान्यता है कि सुग्रीव अपनी वानर सेना के साथ इसी क्षेत्र में रहते थे। यहां होली पर बड़ा आयोजन होता है। हजारों लोग यहां होली खेलने आते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>शाही होली</strong></div>
<div style="text-align:justify;">राजस्थान की होली उदयपुर और पुष्कर में आज भी शाही तौर तरीकों से होली खेली जाती है। इस मौके पर राजपुताना आन बान शान देखने को मिलती है।कई दूसरे एशियाई देशों में भी होली के प्रतिरूप रंगों का पर्व मनाया जाता है लेकिन भारतीय होली यकीनन आज भी अनूठी मस्ती से भरी है यह समाज को एक सूत्र में पिरो कर उमंग व उत्साह का संचार करती है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 03 Mar 2026 18:13:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Holi 2026: रंगों के साथ दुर्लभ चंद्र ग्रहण का संयोग, बरतें ये सावधानी</title>
                                    <description><![CDATA[<p>Holi 2026: देशभर में रंगों का पर्व होली (धुलेंडी) 4 मार्च को मनाया जाएगा। इस बार होली का उत्साह सिर्फ रंगों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आसमान में एक दुर्लभ खगोलीय घटना भी देखने को मिलेगी। होलिका दहन के अगले दिन चंद्र ग्रहण लग रहा है। माना जा रहा है कि ऐसा संयोग करीब 122 साल बाद बन रहा है, जिससे यह पर्व और भी खास हो गया है।</p>
<h3>कब लगेगा चंद्र ग्रहण?</h3>
<p>भारत में 3 मार्च को दोपहर 3 बजकर 20 मिनट पर चंद्र ग्रहण शुरू होगा और शाम 6 बजकर 47 मिनट तक रहेगा। ग्रहण शुरू होने से</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172153/holi-2026-take-these-precautions-to-coincide-with-the-rare"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/chander-grahan.jpg" alt=""></a><br /><p>Holi 2026: देशभर में रंगों का पर्व होली (धुलेंडी) 4 मार्च को मनाया जाएगा। इस बार होली का उत्साह सिर्फ रंगों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आसमान में एक दुर्लभ खगोलीय घटना भी देखने को मिलेगी। होलिका दहन के अगले दिन चंद्र ग्रहण लग रहा है। माना जा रहा है कि ऐसा संयोग करीब 122 साल बाद बन रहा है, जिससे यह पर्व और भी खास हो गया है।</p>
<h3>कब लगेगा चंद्र ग्रहण?</h3>
<p>भारत में 3 मार्च को दोपहर 3 बजकर 20 मिनट पर चंद्र ग्रहण शुरू होगा और शाम 6 बजकर 47 मिनट तक रहेगा। ग्रहण शुरू होने से करीब 9 घंटे पहले सूतक काल लागू हो जाएगा, जो सूर्योदय से पहले ही प्रभावी हो जाएगा। सूतक के दौरान किसी भी तरह के शुभ या मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। मंदिरों के कपाट बंद रहेंगे और पूजा-पाठ भी स्थगित रहेगा।</p>
<h3>होलिका दहन आज</h3>
<p>होलिका दहन आज शाम 6 बजे के बाद किया जाएगा। सामान्यतः होलिका दहन पूर्णिमा की रात को होता है, लेकिन इस बार पूर्णिमा पर ग्रहण का प्रभाव होने के कारण दहन एक दिन पहले किया जा रहा है। चंद्र ग्रहण के चलते अगले दिन रंग खेलने की परंपरा में भी बदलाव किया गया है। इसी वजह से धुलेंडी का त्योहार 4 मार्च को मनाया जाएगा।</p>
<h3>1904 में बना था ऐसा संयोग</h3>
<p>जानकारों के अनुसार इससे पहले वर्ष 1904 में होली के अवसर पर ऐसा संयोग बना था। होली के दिन चंद्र ग्रहण का लगना बेहद दुर्लभ माना जाता है। हालांकि यह खगोलीय घटना उत्सुकता बढ़ाती है, लेकिन धार्मिक नियमों का पालन करना आवश्यक है।</p>
<h3>सूतक काल में बरतें सावधानी</h3>
<p>सूतक काल के दौरान भोजन बनाना या ग्रहण करना वर्जित माना जाता है। ग्रहण समाप्त होने के बाद घर की साफ-सफाई कर स्नान करना चाहिए। अनाज, वस्त्र आदि का दान करना शुभ माना जाता है। गर्भवती महिलाओं को विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है।</p>
<h3>मंदिरों के पट रहेंगे बंद</h3>
<p>ग्रहण काल में देवी-देवताओं की नियमित पूजा नहीं होगी और मंदिरों के कपाट बंद रहेंगे। ग्रहण समाप्ति के बाद स्नान और दान करना शुभ माना गया है। इस बार होली और चंद्र ग्रहण के संयोग से त्योहार का स्वरूप थोड़ा बदला हुआ रहेगा, इसलिए रंग खेलने से पहले सूतक के नियमों का पालन अवश्य करें।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 02 Mar 2026 10:43:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sandeep Kumar ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>रंग-बिरंगी होली सबको कर देती इक रंग</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">भारत पर्वों और उत्सवों की पावन धरती है। यहाँ वर्ष का कोई भी दिन ऐसा नहीं जाता जब जीवन में उत्साह का कोई न कोई अवसर उपस्थित न हो। इन्हीं उत्सवों में होली एक ऐसा पर्व है जो केवल रंगों का खेल भर नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर और बाहर जमी हुई गंदगी को जलाकर जीवन को नवचेतना से भर देने का संदेश देता है। दीपावली जहाँ प्रकाश का पर्व है, वहीं होली रंगों और उमंगों का उत्सव है। यह वसंत ऋतु के आगमन का स्वागत है, खेतों में पकती हुई रबी की फसलों की खुशी है और समाज में</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/171884/colorful-holi-brings-color-to-everyone"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/images16.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">भारत पर्वों और उत्सवों की पावन धरती है। यहाँ वर्ष का कोई भी दिन ऐसा नहीं जाता जब जीवन में उत्साह का कोई न कोई अवसर उपस्थित न हो। इन्हीं उत्सवों में होली एक ऐसा पर्व है जो केवल रंगों का खेल भर नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर और बाहर जमी हुई गंदगी को जलाकर जीवन को नवचेतना से भर देने का संदेश देता है। दीपावली जहाँ प्रकाश का पर्व है, वहीं होली रंगों और उमंगों का उत्सव है। यह वसंत ऋतु के आगमन का स्वागत है, खेतों में पकती हुई रबी की फसलों की खुशी है और समाज में प्रेम व समानता का उद्घोष है। फाल्गुन की पूर्णिमा से जुड़ा यह पर्व प्रकृति और मानव हृदय दोनों को एक साथ रंग देता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">होली की शुरुआत माघ मास से ही हो जाती है जब पारंपरिक स्थान पर लकड़ी और कंडे एकत्र किए जाते हैं। फाल्गुनी पूर्णिमा की रात्रि को शुभ मुहूर्त में होलिका दहन होता है। यह दहन केवल लकड़ियों का दहन नहीं, बल्कि बुराइयों, अहंकार, वैरभाव और दुराचार का प्रतीकात्मक अंत है। अगले दिन रंगों की होली खेली जाती है। लोग गुलाल लगाकर गले मिलते हैं, आपसी मनमुटाव भूलते हैं और प्रेम का संकल्प लेते हैं। होली का यह बाहरी रूप जितना आकर्षक है, उसका भीतरी अर्थ उससे कहीं अधिक गहरा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">होली के साथ जुड़ी पौराणिक कथा में प्रह्लाद और हिरण्यकश्यप का प्रसंग आता है। भक्त प्रह्लाद सत्य और भक्ति के प्रतीक थे, जबकि हिरण्यकश्यप अहंकार और अत्याचार का प्रतीक। होलिका दहन की कथा हमें बताती है कि दुराचार और अत्याचार चाहे कितने ही शक्तिशाली क्यों न प्रतीत हों, अंततः सत्य और श्रद्धा की ही विजय होती है। इसी प्रसंग में भगवान नृसिंह का अवतार अन्याय के विनाश का संदेश देता है। यह कथा हमें अपने भीतर छिपे साहस को जगाने और असत्य के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा देती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जैन परंपरा में भी होली से जुड़ी एक कथा मिलती है जो मानव जीवन के उत्थान और पतन की वास्तविकता को सामने लाती है। इसमें चरित्रहीनता और अहंकार के कारण पतन तथा पश्चाताप के माध्यम से आत्मशुद्धि का मार्ग बताया गया है। इस दृष्टि से होली केवल बाहरी उत्सव नहीं, बल्कि आत्मविश्लेषण और आत्मशुद्धि का अवसर है। यह पर्व हमें बताता है कि यदि मनुष्य अपनी भूलों को स्वीकार कर सुधार का मार्ग अपनाए, तो वह पुनः ऊँचाइयों को छू सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">होली को रंगों का त्योहार कहा जाता है, परंतु रंगों का अर्थ केवल लाल, पीला या हरा नहीं है। रंग का एक लाक्षणिक अर्थ भी है, जो प्रभाव और भावना से जुड़ा है। जब कहा जाता है कि किसी पर प्रेम का रंग चढ़ गया, तो उसका आशय है कि वह व्यक्ति प्रेम और सद्भाव से भर गया। होली पर रंग और गुलाल लगाने की परंपरा इसी भाव को प्रकट करती है कि हम अपने मन को प्रेम, सौहार्द और समानता के रंग में रंगें। तन पर लगा रंग कुछ समय में धुल जाता है, परंतु मन पर चढ़ा प्रेम का रंग जीवनभर साथ रहता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">धूल और कीचड़ उछालने की परंपरा को भी प्रतीकात्मक रूप में समझना चाहिए। धूल और कीचड़ मनुष्य के भीतर जमा बुराइयों के प्रतीक हैं। वर्षभर जो मनमुटाव, ईर्ष्या, द्वेष और कटुता हमारे भीतर जमा हो जाते हैं, उन्हें बाहर निकालकर समाप्त करने का संदेश होली देती है। किंतु जब यह परंपरा मर्यादा की सीमा लांघकर अशिष्टता और अभद्रता में बदल जाती है, तब उसका स्वरूप विकृत हो जाता है। होली का वास्तविक उद्देश्य किसी को अपमानित करना या असुविधा पहुँचाना नहीं, बल्कि हृदयों को जोड़ना है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ब्रज क्षेत्र की लठामार होली इसका एक अनूठा उदाहरण है। नंदगाँव और बरसाना में खेली जाने वाली यह परंपरा हँसी-ठिठोली और सांस्कृतिक आनंद का प्रतीक है। यहाँ महिलाएँ पुरुषों पर लाठी से प्रहार करती हैं और पुरुष ढाल से बचाव करते हैं, परंतु इस पूरे आयोजन में द्वेष का लेशमात्र भी नहीं होता। यह परंपरा दर्शाती है कि होली का खेल प्रेम और सांस्कृतिक उत्साह का माध्यम है, न कि अशिष्ट व्यवहार का।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">होली का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामाजिक समानता है। इस दिन ऊँच-नीच, अमीर-गरीब, जाति और वर्ग के भेदभाव को भुलाकर सभी एक-दूसरे को गले लगाते हैं। यह त्योहार मानवता को एक सूत्र में बाँधने का कार्य करता है। समाज में जो कृत्रिम दीवारें खड़ी हो जाती हैं, होली उन्हें गिराने का अवसर देती है। एक-दूसरे के घर जाकर मिठाई बाँटना और शुभकामनाएँ देना सामाजिक एकता को मजबूत करता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">होली में कूड़ा-कचरा और झाड़-झंखाड़ इकट्ठा कर जलाने की परंपरा भी गहरा संदेश देती है। यह केवल बाहरी सफाई नहीं, बल्कि भीतरी शुद्धि का संकेत है। जिस प्रकार हम अपने आसपास की गंदगी को हटाकर आग में भस्म कर देते हैं, उसी प्रकार हमें अपने भीतर की बुराइयों, संकीर्णताओं और स्वार्थ को भी समाप्त करना चाहिए। यह सामूहिक प्रयास का पर्व है, क्योंकि समाज की सफाई अकेले संभव नहीं। सब मिलकर ही वातावरण को स्वच्छ और स्वस्थ बनाया जा सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कच्चे रंगों का प्रयोग भी जीवन का दर्शन सिखाता है। कच्चा रंग स्थायी नहीं होता, वह कुछ समय बाद धुल जाता है। इसी प्रकार जीवन में आए कटु अनुभव, अपमान या दुख भी स्थायी नहीं होने चाहिए। यदि हम उन्हें मन पर स्थायी रंग की तरह जमा कर लेंगे, तो जीवन की प्रसन्नता फीकी पड़ जाएगी। होली हमें सिखाती है कि कटु स्मृतियों को भुलाकर आगे बढ़ें और नए उत्साह के साथ जीवन को रंगीन बनाएँ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज आवश्यकता है कि होली को विवेक और मर्यादा के साथ मनाया जाए। मदिरापान, अभद्र भाषा और हिंसा इस पर्व की आत्मा के विरुद्ध हैं। यदि होली प्रेम और सौहार्द का संदेश देती है, तो हमें उसी भावना के साथ इसे मनाना चाहिए। पर्व तभी सार्थक होता है जब वह जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाए।अंततः होली केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह हमें सिखाती है कि असत्य और दुराचार का दहन करें, सत्य और सदाचार को अपनाएँ, वैमनस्य की धूल झाड़कर प्रेम के रंग में रंग जाएँ। जब हम अपने भीतर की बुराइयों को जलाकर मन को निर्मल बनाते हैं, तभी होली का वास्तविक आनंद मिलता है। यही इस पावन पर्व का संदेश है कि हम सब मिलकर जीवन को सदाचार, समानता और प्रेम के रंगों से रंग दें और समाज को एक सुंदर, समरस और जागरूक दिशा की ओर अग्रसर करें।</div>
<div style="text-align:justify;">     *कांतिलाल मांडोत*</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 28 Feb 2026 18:13:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>होली पर्व के रंग दिवस पर सभी देशी शराब, विदेशी मदिरा, बियर मॉडल शॉप आदि मादक पदार्थों की बिक्री पूर्णतया रहेगी प्रतिबंधित: जिला मजिस्ट्रेट</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>रायबरेलीः</strong>- जिला मजिस्ट्रेट हर्षिता माथुर ने होली के पर्व पर लोक शांति बनाए रखने के उद्देश्य से संयुक्त प्रान्त आबकारी अधिनियम की धारा-59 के अंतर्गत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए आदेश दिए हैं कि होली पर्व के रंग दिवस 04 मार्च 2026 को सम्पूर्ण दिवस जनपद रायबरेली में संचालित सभी देशी शराब, विदेशी मदिरा, बियर, मॉडल शाप, बार अनुज्ञापन (एफ०एल०-7), भांग, ताड़ी, सी०एल०-2, एफ०एल०-2/एफ०एल० 2बी, एफ०एल०-49, एफ०एल०-16,17 एवं एफ०एल०-09/09ए के अनुज्ञापनों पर मादक पदार्थों की बिक्री पूर्णतया प्रतिबन्धित रहेगी। उन्हेंने कहा है कि इस बन्दी के लिए अनुज्ञापियों को कोई प्रतिफल देय नहीं होगा। इस आदेश का कड़ाई</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/171806/on-the-color-day-of-holi-festival-sale-of-intoxicants"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/463.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>रायबरेलीः</strong>- जिला मजिस्ट्रेट हर्षिता माथुर ने होली के पर्व पर लोक शांति बनाए रखने के उद्देश्य से संयुक्त प्रान्त आबकारी अधिनियम की धारा-59 के अंतर्गत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए आदेश दिए हैं कि होली पर्व के रंग दिवस 04 मार्च 2026 को सम्पूर्ण दिवस जनपद रायबरेली में संचालित सभी देशी शराब, विदेशी मदिरा, बियर, मॉडल शाप, बार अनुज्ञापन (एफ०एल०-7), भांग, ताड़ी, सी०एल०-2, एफ०एल०-2/एफ०एल० 2बी, एफ०एल०-49, एफ०एल०-16,17 एवं एफ०एल०-09/09ए के अनुज्ञापनों पर मादक पदार्थों की बिक्री पूर्णतया प्रतिबन्धित रहेगी। उन्हेंने कहा है कि इस बन्दी के लिए अनुज्ञापियों को कोई प्रतिफल देय नहीं होगा। इस आदेश का कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित किया जाए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 27 Feb 2026 21:35:24 +0530</pubDate>
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