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                <title>भारत की वीरता एवं बलिदान के प्रतीक हैं – शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>भारत की वीरता एवं बलिदान के प्रतीक हैं – शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद RSS Feed</description>
                
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                <title>भारत की वीरता एवं बलिदान के प्रतीक हैं – शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश की आज़ादी के लिए अपने हाथों से अपने प्राणों की आहुति देने वाले अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद की आज </span>27 <span lang="hi" xml:lang="hi">फरवरी को </span>95<span lang="hi" xml:lang="hi">वीं पुण्यतिथि है। आज़ाद एक ऐसे दीवाने का नाम है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी अपने देश के प्रति दीवानगी के किस्से सुनकर ही हर मस्तक अपने आप नतमस्तक हो जाता है। आज के आधुनिक एआई के इस युग में जब पचास बरस के आदमी या नेता को युवा माना जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आप कल्पना करें जब एक दस</span>–<span lang="hi" xml:lang="hi">बारह साल का अबोध बालक देश की आज़ादी के लिए सुदूर आदिवासी अंचल अभिजात्य झाबुआ</span>–<span lang="hi" xml:lang="hi">अलीराजपुर जिले के</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/171481/martyr-chandrashekhar-azad-is-a-symbol-of-indias-bravery-and"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/भारत-की-वीरता-एवं-बलिदान-के-प्रतीक-हैं – शहीद-चन्द्रशेखर-आज़ाद.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश की आज़ादी के लिए अपने हाथों से अपने प्राणों की आहुति देने वाले अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद की आज </span>27 <span lang="hi" xml:lang="hi">फरवरी को </span>95<span lang="hi" xml:lang="hi">वीं पुण्यतिथि है। आज़ाद एक ऐसे दीवाने का नाम है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी अपने देश के प्रति दीवानगी के किस्से सुनकर ही हर मस्तक अपने आप नतमस्तक हो जाता है। आज के आधुनिक एआई के इस युग में जब पचास बरस के आदमी या नेता को युवा माना जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आप कल्पना करें जब एक दस</span>–<span lang="hi" xml:lang="hi">बारह साल का अबोध बालक देश की आज़ादी के लिए सुदूर आदिवासी अंचल अभिजात्य झाबुआ</span>–<span lang="hi" xml:lang="hi">अलीराजपुर जिले के अपने जन्मस्थली भाबरा गाँव की गलियों में बचपन की मौज</span>–<span lang="hi" xml:lang="hi">मस्ती को छोड़कर भूख</span>–<span lang="hi" xml:lang="hi">प्यास की परवाह किए बिना अपनी भारत माता की आज़ादी के लिए निकल पड़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसकी उम्र वर्तमान संदर्भ में क्या मानी जाएगी </span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश की आज़ादी का सर पर जुनून लिए निकले बालक आज़ाद ने </span>1921 <span lang="hi" xml:lang="hi">में महात्मा गांधी द्वारा चलाए जा रहे असहयोग आंदोलन में भाग लिया और अंग्रेज़ों के खिलाफ आजादी के दीवानों के साथ अपना सुर बुलंद करते हुए गिरफ्तार किए गए। जब अंग्रेज़ जज के सामने आज़ाद को पेश किया गया और जब जज ने नाम पूछा तो निडर होकर रौबदार आवाज में अपना नाम </span>“<span lang="hi" xml:lang="hi">आज़ाद</span>” <span lang="hi" xml:lang="hi">बताया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पिता का नाम </span>“<span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्र</span>” <span lang="hi" xml:lang="hi">बताया और अपना घर </span>“<span lang="hi" xml:lang="hi">जेल</span>” <span lang="hi" xml:lang="hi">बताया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो जज साहब झल्ला गए और उन्होंने बालक आजाद के देशभक्ति के अदम्य साहस से घबराकर पंद्रह बेंत मारने की सजा सुनाई। अपनी सजा पर बालक आजाद मुस्कुराए और हर बेंत की मार के साथ </span>“<span lang="hi" xml:lang="hi">भारत माता की जय</span>” <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>“<span lang="hi" xml:lang="hi">वंदे मातरम्</span>” <span lang="hi" xml:lang="hi">के जयघोष से पूरे वातावरण में ओज भर दिया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस घटना के बाद एक अदम्य साहसी क्रांतिकारी के रूप में आजाद का राष्ट्रीय पटल पर उदय हुआ और पंडित रामप्रसाद बिस्मिल के विश्वस्त साथी बनकर भारत की आज़ादी का अलख जगाने में खुद को झोंक दिया । यहीं पर देश के लिए मर</span><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="font-family:'Times New Roman', serif;"> </span></span><span lang="hi" xml:lang="hi">मिटने वाले आजादी के सारे दीवानों का मिलन हुआ । आजाद में स्वाभिमान के गुण बचपन से ही विद्यमान थे। अपने माता</span>–<span lang="hi" xml:lang="hi">पिता से विरासत में मिले इन्हीं गुणों की वजह से आजाद जो एक बार सोच लेते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे हर हाल में पूरा करते थे । बिस्मिल द्वारा बनाए गए आजादी के दीवानों के संगठन का नाम हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका उद्देश्य अंग्रेजों से भारत माता को आजादी दिलाना था। आज़ाद स्वयं कहते थे कि दासता जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप है और इसी प्रेरणा से वे जीवन भर इस अभिशाप से लड़ते रहे ।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सन </span>1920 <span lang="hi" xml:lang="hi">से </span>30 <span lang="hi" xml:lang="hi">का एक पूरा दशक ऐसा था जब देश में अंग्रेजी हुकूमत आजादी के इन जवानों के ख़ौफ़ से डरी</span>–<span lang="hi" xml:lang="hi">सहमी हुई थी । उस एक दशक में यदि भारत की आज़ादी के लिए सारे नेता एकमत हो जाते तो देश पच्चीस बरस पहले ही आज़ाद हो गया होता । अंग्रेज़ों से उन्हीं की भाषा में जवाब देने के लिए हथियारों और गोला</span>–<span lang="hi" xml:lang="hi">बारूद हेतु धन के लिए रामप्रसाद बिस्मिल की योजना के तहत सरकारी खजाना लूटने के लिए आजादी के दीवानों ने काकोरी कांड को अंजाम दिया। काकोरी कांड में सरकारी खजाना लूटने से अंग्रेज़ी हुकूमत बुरी तरह बौखला गई और देशभर में बिस्मिल और उनके साथियों की धरपकड़ तेज कर दी गई । इसे विडंबना कहें या फिर देश का दुर्भाग्य कि हज़ारों देशभक्त दीवानों को अंग्रेज़ी हुकूमत तो नहीं खोज पाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन अपने ही लोगों की दगाबाज़ी के चलते अंग्रेज उन्हें फांसी के फंदे पर लटकाने में कामयाब हो गए।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रामप्रसाद बिस्मिल की फांसी के बाद हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन बिखर चुका था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन आज़ाद ने हिम्मत नहीं हारी और कमान अपने हाथों में ली तथा अपने साथियों को पुनः एकजुट कर देश की आज़ादी की फिर से हुंकार भरी। आजादी के दीवानों ने भारत की जेलों में भी आज़ादी का अलख जगाए रखा। अंग्रेज़ों से छिपते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भेष बदलते आजाद ने भगत सिंह के साथ देशभर में फिर से अंग्रेज़ों के खिलाफ गुस्सा पैदा कर दिया था । अंग्रेज़ी हुकूमत हर हाल में आज़ाद और भगत सिंह को गिरफ्तार कर अपने प्रति बढ़ते विद्रोह को दबाना चाहती थी। भगत सिंह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजगुरु और सुखदेव की गिरफ्तारी के बाद भी आज़ाद अपने साथियों के बूते अंग्रेज़ों के खिलाफ देशभर के लोगों में आक्रोश जगाते रहे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज़ाद देश में जहाँ भी जाते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वसनीय साथियों की ऐसी टीम तैयार कर लेते थे जो देश की आज़ादी के लिए मरने</span>–<span lang="hi" xml:lang="hi">मारने का जज़्बा रखती थी। साधन संसाधन विहीन होकर भी आज़ाद उस अंग्रेज़ी हुकूमत से टकराए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका कभी सूरज अस्त नहीं होता था। आज़ाद की गतिविधियों से अंग्रेज़ हुकूमत को यह भय हो गया था कि एक अकेला आज़ाद भी उनकी हुकूमत के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है। इसलिए देशभर में आज़ाद की गिरफ्तारी के लिए जाल बिछा दिया गया और लोगों को सूचना देने पर प्रलोभन की घोषणा की गई। आज़ाद की खोज में उनकी जन्मस्थली भाबरा से लेकर आजादी के दीवानों के हर ठिकाने पर दबिश दी गई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन आज़ाद कहीं नहीं मिले। आज़ाद हमेशा यह पंक्ति गाया करते थे -</span>“<span lang="hi" xml:lang="hi">दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">आजाद ही रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज़ाद ही रहेंगे।</span>”</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज़ाद ने अंग्रेजी हुकूमत द्वारा जेलों में बंद भगत सिंह सहित सभी साथियों को छुड़वाने का बहुत प्रयास किया। आज़ाद चाहते थे कि देश के सारे बड़े नेता एक बार उनका साथ देकर आज़ादी की लड़ाई में शामिल हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन आजादी के इन नौजवान दीवानों की भला किसी ने नहीं सुनी। </span>27 <span lang="hi" xml:lang="hi">फरवरी </span>1931 <span lang="hi" xml:lang="hi">को इलाहाबाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात वर्तमान प्रयागराज के अल्फ्रेड पार्क में भी आज़ाद अपने साथियों की रिहाई की योजना को लेकर आए थे और एक पेड़ के नीचे खड़े होकर अपने कुछ साथियों का इंतज़ार कर रहे थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन अपने ही एक साथी की दगाबाज़ी के चलते आज़ाद अंग्रेज़ सिपाहियों से घिर चुके थे। चारों ओर से घिरने के बाद भी आजाद आखिरी गोली शेष बचने तक लड़ते रहे और अंतिम गोली कनपटी में स्वयं मारकर आत्मबलिदान कर लिया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज़ादी के इस दीवाने ने अपने रक्त से अपनी मातृभूमि की आज़ादी का अभिषेक कर दिया था। महज़ पच्चीस वर्ष की आयु में चन्द्रशेखर आज़ाद अमर शहीदों की कतार में शामिल हो गए। आजाद की शहादत के बाद देशभर में अंग्रेज़ों के प्रति विद्रोह की भावना पनपने लगी और अंग्रेजी दबदबे को बनाए रखने के लिए आजाद के बलिदान के कुछ ही दिनों बाद चुपचाप भगत सिंह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुखदेव और राजगुरु को भी फांसी दे दी गई। इस प्रकार आजादी के दीवानों ने देश के लिए मुस्कराते हुए मौत को चुन लिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन फिरंगियों और उनके लालच को नहीं चुना। देश की आज़ादी के बाद सरकार द्वारा हर बरस शहीदों की चिताओं पर मेले लगाने का दावा किया गया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन शनैः शनैः शहीदों के नाम पर लगने वाले मेले राजनीतिक दलों या नेताओं के शक्ति</span>–<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रदर्शन के मंच बन गए। अब शहीदों की चिताओं पर महज रस्म अदायगी भर का आयोजन होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शेष सब राजनीति का बखान होता है ।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दुःख इस बात का है कि देश का जनमानस भी आधुनिकता की इस चकाचौंध में आजाद जैसे अमर बलिदानियों को भूलता जा रहा है। अफ़सोस तो यह है कि देश की नई पीढ़ी के लिए आजादी के मायने वर्ष में दो दिन अपने स्टेटस सजाने से अधिक कुछ नहीं रह गए हैं। दुनिया घूमने का दावा करने वाली आधुनिक पीढ़ी ने आजादी के दीवानों की जन्मस्थली को देखने और प्रणाम करने की भी नहीं सोची</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो देशभक्ति उनके जेहन में कैसे जागेगी </span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज एआई के युग में देश के जनमानस को दुनिया</span>–<span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ का ज्ञान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उसकी नव पीढ़ी के अधिकांश लोगों को जिस आज़ादी को वे जी रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके लिए जीवन उत्सर्ग कर देने वाले आधा दर्जन अमर शूरवीरों के नाम तक स्मरण नहीं हैं। देश की आने वाली पीढ़ी को राष्ट्र के प्रति उसके कर्तव्यबोध का ज्ञान करवाना है तो आजादी और उसके दीवानों के बलिदान से अवगत करवाना अत्यंत आवश्यक है । सरकार को चाहिए कि देश की आधुनिक पीढ़ी में आजाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगत सिंह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुखदेव और राजगुरु की तरह राष्ट्र के प्रति जज्बा बनाए रखने हेतु अमर बलिदानियों के जीवन</span>–<span lang="hi" xml:lang="hi">चरित्र को शिक्षा का मूल भाग बनाया जाए और आजादी के अमर शहीदों की चिताओं पर ईमानदारी से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निस्वार्थ राष्ट्रभावना के साथ हर वर्ष मेले सजाए जाएँ। तभी हम आज़ाद की तरह राम सा शौर्य और शंकर सा लोक कल्याण का भाव देश की नई पीढ़ी में देख सकेंगे।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><strong>अरविंद रावल</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 26 Feb 2026 17:48:10 +0530</pubDate>
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