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                <title>सनातन संस्कृति - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>सनातन संस्कृति RSS Feed</description>
                
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                <title>श्रीराम कथा में राम की बाल लीलाओं का वर्णन</title>
                                    <description><![CDATA[<div>
<div>
<div style="text-align:justify;"><strong>सिद्धार्थनगर।</strong> बिस्कोहर कस्बे से सटे जनपद बलरामपुर सीमा पर स्थित मधुपुर पकड़ी गांव में चल रहे नौ दिवसीय श्री राम कथा के छठवें दिन रविवार की रात श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा।यज्ञाचार्य दुर्गेश कुमार शास्त्री अयोध्या से आए हुए जगत गुरु स्वामी राम दिनेशाचार्य ने  श्रीराम  के बाल लीलाओं बारे में कथा सुनाई। जगत गुरु स्वामी राम दिनेशाचार्य ने  प्रभु श्रीराम की मनमोहक बाल लीलाओं का वर्णन कर भक्तों को भाव विभोर कर दिया।</div>
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<div style="text-align:justify;"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-04/1777291160824.jpg" alt="श्रीराम कथा में राम की बाल लीलाओं का वर्णन" width="1200" height="800" /></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">कथा के दौरान उन्होंने उस प्रसंग का  वर्णन किया, जब भगवान भोलेनाथ बालक राम के दर्शन की लालसा में भेष बदलकर अयोध्या पहुंचे थे। उन्होंने संदेश</div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177412/description-of-rams-childhood-activities-in-shri-ram-katha"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/1777291160841.jpg" alt=""></a><br /><div>
<div>
<div style="text-align:justify;"><strong>सिद्धार्थनगर।</strong> बिस्कोहर कस्बे से सटे जनपद बलरामपुर सीमा पर स्थित मधुपुर पकड़ी गांव में चल रहे नौ दिवसीय श्री राम कथा के छठवें दिन रविवार की रात श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा।यज्ञाचार्य दुर्गेश कुमार शास्त्री अयोध्या से आए हुए जगत गुरु स्वामी राम दिनेशाचार्य ने  श्रीराम  के बाल लीलाओं बारे में कथा सुनाई। जगत गुरु स्वामी राम दिनेशाचार्य ने  प्रभु श्रीराम की मनमोहक बाल लीलाओं का वर्णन कर भक्तों को भाव विभोर कर दिया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-04/1777291160824.jpg" alt="श्रीराम कथा में राम की बाल लीलाओं का वर्णन" width="1200" height="800"></img></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कथा के दौरान उन्होंने उस प्रसंग का  वर्णन किया, जब भगवान भोलेनाथ बालक राम के दर्शन की लालसा में भेष बदलकर अयोध्या पहुंचे थे। उन्होंने संदेश देते हुए कहा श्रीराम कथा केवल श्रवण का माध्यम नहीं है बल्कि यह जीवन की पाठशाला है। हमें भगवान राम के आदर्शों और उनके चरित्र को अपने वास्तविक जीवन में उतारना चाहिए तभी ऐसी कथाओं की सार्थकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस दौरान मुख्य यजमान धनीराम प्रजापति, सीताराम प्रजापति, विजय प्रजापति,पंकज प्रजापति,दयाराम प्रजापति, विजय कुमार, धर्मेन्द्र शुक्ला, मनीराम प्रजापति, डॉ मधुसूदन शुक्ला, विजय शरण मिश्रा, संजय सिंह, मोना पाण्डेय, रक्षा राम प्रजापति, विजय कुमार अग्रहरि चेयरमैन प्रतिनिधि ,कृपा शंकर प्रजापति सहित भारी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।</div>
</div>
</div>
<div class="yj6qo" style="text-align:justify;"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ख़बरें</category>
                                            <category>सांस्कृतिक और धार्मिक</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 18:03:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>परंपरा और आधुनिकता के बीच त्रिशंकु बना समाज</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">वर्तमान समय का मनुष्य एक विचित्र द्वंद्व में जी रहा है। आधुनिकता की अंधी दौड़ में वह इतनी तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है कि उसकी अपनी सनातनी परंपराएँ धीरे-धीरे धुंधलाने लगी हैं। परिणामस्वरूप वह न पूर्णतः आधुनिक बन पाया है, न ही अपने संस्कारों से पूर्णतः जुड़ा रह सका है—वह त्रिशंकु की भाँति दो ध्रुवों के बीच झूलता हुआ एक असंतुलित अस्तित्व बन गया है।भारतीय वैदिक और सनातनी संस्कृति हमें हमारी जड़ों से जोड़ती है, हमें हमारे ‘भारतीय’ होने का गहन बोध कराती है। यह संस्कृति केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं, बल्कि मनुष्यता, करुणा, सह-अस्तित्व और जीवन</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174763/society-becomes-hung-between-tradition-and-modernity"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/hindi-divas.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">वर्तमान समय का मनुष्य एक विचित्र द्वंद्व में जी रहा है। आधुनिकता की अंधी दौड़ में वह इतनी तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है कि उसकी अपनी सनातनी परंपराएँ धीरे-धीरे धुंधलाने लगी हैं। परिणामस्वरूप वह न पूर्णतः आधुनिक बन पाया है, न ही अपने संस्कारों से पूर्णतः जुड़ा रह सका है—वह त्रिशंकु की भाँति दो ध्रुवों के बीच झूलता हुआ एक असंतुलित अस्तित्व बन गया है।भारतीय वैदिक और सनातनी संस्कृति हमें हमारी जड़ों से जोड़ती है, हमें हमारे ‘भारतीय’ होने का गहन बोध कराती है। यह संस्कृति केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं, बल्कि मनुष्यता, करुणा, सह-अस्तित्व और जीवन के उच्च आदर्शों की वाहक है। </p><p style="text-align:justify;">‘अतिथि देवो भव’ और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ जैसे सूत्र केवल वाक्य नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन हैं, जो समस्त विश्व को एक परिवार के रूप में देखने की दृष्टि प्रदान करते हैं। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति को अध्यात्म प्रधान कहा गया है—यह भौतिकता से परे आत्मा के उत्कर्ष की बात करती है किन्तु दूसरी ओर, पाश्चात्य संस्कृति ने मानव जीवन को तार्किकता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और व्यावहारिकता का नया आयाम दिया है।</p><p style="text-align:justify;"> उसने मनुष्य को प्रश्न करना सिखाया, प्रमाण और तर्क के आधार पर सत्य को परखने की प्रवृत्ति विकसित की। विज्ञान और तकनीक के अद्भुत विकास ने जीवन को सुविधाजनक, सुगम और व्यापक बना दिया है। आज मानव चंद्रमा से आगे बढ़कर सूर्य के रहस्यों को जानने की चेष्टा कर रहा है, और सृजन के नए आयाम खोजते हुए प्रकृति को चुनौती देने का साहस भी दिखा रहा है।<br /></p><p style="text-align:justify;">यहीं से द्वंद्व उत्पन्न होता है। एक ओर अध्यात्म की गहराई है, तो दूसरी ओर भौतिकता की व्यापकता। एक ओर परंपरा की स्थिरता है, तो दूसरी ओर आधुनिकता की गतिशीलता। यदि मनुष्य केवल परंपरा से चिपका रहे, तो वह जड़ता का शिकार हो सकता है; और यदि केवल आधुनिकता को अपनाए, तो वह अपनी पहचान और संवेदनाओं से दूर हो सकता है।आज की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि हमने पाश्चात्य संस्कृति के सार को नहीं, बल्कि उसके बाह्य आवरण को अपनाया है। </p><p style="text-align:justify;">परिणामस्वरूप संयुक्त परिवारों का विघटन हो रहा है, संबंधों में ऊष्मा कम होती जा रही है, बुजुर्गों के प्रति सम्मान घट रहा है और जीवन एक यांत्रिक प्रक्रिया बनता जा रहा है। भौतिक सुख-सुविधाओं की अंधी चाह ने मनुष्य को भीतर से रिक्त कर दिया है। परिवारों में अलगाव, अकेलापन और तनाव की स्थितियाँ बढ़ रही हैं।<br /></p><p style="text-align:justify;">फिर भी यह एकांगी दृष्टिकोण नहीं होना चाहिए। पाश्चात्य प्रभाव ने समाज में अनेक सकारात्मक परिवर्तन भी किए हैं। स्त्री सशक्तिकरण इसका प्रमुख उदाहरण है। जो महिलाएँ कभी घर की चारदीवारी तक सीमित थीं, आज वे शिक्षा, व्यवसाय और नेतृत्व के क्षेत्र में नई ऊँचाइयाँ छू रही हैं। सामाजिक खुलापन, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अवसरों की समानता ने समाज को अधिक गतिशील और प्रगतिशील बनाया है।<br /></p><p style="text-align:justify;">अतः आवश्यकता इस बात की है कि हम किसी एक ध्रुव के प्रति अंध-आसक्ति न रखें। न तो अतीत की रूढ़ियों में जकड़े रहें, और न ही आधुनिकता के अंधानुकरण में अपनी पहचान खो दें। विवेक का मार्ग ही यहाँ संतुलन प्रदान कर सकता है। जैसा कि एक संतुलित वीणा के तार ही मधुर संगीत उत्पन्न करते हैं।न अत्यधिक कसाव, न अत्यधिक ढील वैसे ही जीवन में भी परंपरा और आधुनिकता का संतुलित समन्वय आवश्यक है।<br /></p><p style="text-align:justify;">हमें अपनी संस्कृति के उन मूल्यों को संजोकर रखना होगा, जो मानवता को ऊँचा उठाते हैं, और साथ ही पाश्चात्य विचारधारा की उन विशेषताओं को अपनाना होगा, जो जीवन को तार्किक, वैज्ञानिक और प्रगतिशील बनाती हैं। यही समन्वय हमें त्रिशंकु की स्थिति से निकालकर एक संतुलित, समृद्ध और सार्थक जीवन की ओर ले जा सकता है।<br /></p><p style="text-align:justify;">अंततः यही कहा जा सकता है कि जीवन की सफलता न अतीत में पूरी तरह छिपी है, न भविष्य में पूरी तरह निहित है।वह वर्तमान में संतुलन स्थापित करने की कला में निहित है। जो इस संतुलन को साध लेता है, वही सच्चे अर्थों में विकसित और जागरूक मानव बन पाता।<br /></p><p style="text-align:justify;"><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Apr 2026 18:12:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>राम मय हो जीवन हमारा</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
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<div style="text-align:justify;"><strong>प्रो.(डा.) मनमोहन प्रकाश </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">सनातन संस्कृति में श्रीराम केवल एक ऐतिहासिक पात्र या धार्मिक प्रतीक मात्र नहीं हैं, बल्कि वे प्रत्येक भारतीय के लिए मर्यादा, आदर्श और मानवीय मूल्यों के शाश्वत स्रोत हैं। जब हम "राममय जीवन" की परिकल्पना करते हैं, तो इसका अर्थ केवल कर्मकांड या नाम-जप तक सीमित नहीं है, अपितु इसका वास्तविक अर्थ अपने विचारों, कर्तव्यों, संबंधों और आचरण में राम के आदर्शों को स्थान देना है। राममय जीवन का तात्पर्य उस सत्य, करुणा, न्याय, समरसता और कर्तव्यपरायणता से युक्त जीवन को जीना है जो दूसरों के लिए भी प्रेरणा का पुंज बन सके।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">​श्रीराम का जीवन हमें</div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174145/may-our-life-be-blessed-by-ram"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/images11.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div>
<div style="text-align:justify;"><strong>प्रो.(डा.) मनमोहन प्रकाश </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सनातन संस्कृति में श्रीराम केवल एक ऐतिहासिक पात्र या धार्मिक प्रतीक मात्र नहीं हैं, बल्कि वे प्रत्येक भारतीय के लिए मर्यादा, आदर्श और मानवीय मूल्यों के शाश्वत स्रोत हैं। जब हम "राममय जीवन" की परिकल्पना करते हैं, तो इसका अर्थ केवल कर्मकांड या नाम-जप तक सीमित नहीं है, अपितु इसका वास्तविक अर्थ अपने विचारों, कर्तव्यों, संबंधों और आचरण में राम के आदर्शों को स्थान देना है। राममय जीवन का तात्पर्य उस सत्य, करुणा, न्याय, समरसता और कर्तव्यपरायणता से युक्त जीवन को जीना है जो दूसरों के लिए भी प्रेरणा का पुंज बन सके।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">​श्रीराम का जीवन हमें सिखाता है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों, मनुष्य को धर्म और कर्तव्य के मार्ग से विचलित नहीं होना चाहिए। पिता के वचनों की रक्षा हेतु सहर्ष राज्य-त्याग, वनवास के कष्टों के बीच भी मित्रों के प्रति अटूट समर्पण, शत्रुओं के प्रति भी मर्यादित व्यवहार और विपरीत परिस्थितियों में भी संयमित आचरण आदि उनके चरित्र की वे विशेषताएँ हैं जो सिद्ध करती हैं कि मनुष्य को हर स्थिति में नैतिक श्रेष्ठता को ही प्राथमिकता देनी चाहिए। आज के युग में, जहाँ स्वार्थ, प्रतिस्पर्धा और नैतिक पतन की चुनौतियाँ प्रबल हैं, वहाँ राममय जीवन की आवश्यकता और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है।​</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस जीवन पद्धति का प्रथम आधार असत्य का परित्याग कर सत्य और शुचिता का वरण करना है। यदि मनुष्य अपने व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में सत्य को प्रतिष्ठापित करता है, तो परिवार और राष्ट्र में परस्पर विश्वास का वातावरण निर्मित होता है। वर्तमान दौर में प्रशासन, शिक्षा और राजनीति जैसे तमाम क्षेत्रों में भी इसी राममय दृष्टिकोण को अपनाने की आवश्यकता है, ताकि नैतिकता और पारदर्शिता की जड़ें मजबूत हो सकें।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके साथ ही, कर्तव्य और मर्यादा का पालन राममय जीवन का अनिवार्य अंग है। श्रीराम ने राजा होने के बावजूद स्वयं को मर्यादा के बंधन में रखा और लोकहित को सर्वोपरि माना। यही कारण है कि उनके शासन को 'रामराज्य' के रूप में एक आदर्श व्यवस्था माना गया, जिसका अर्थ किसी संकीर्ण मजहबी शासन से नहीं, बल्कि एक ऐसी न्यायपूर्ण, समतामूलक और लोककल्याणकारी व्यवस्था से है जहाँ अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति को भी सम्मान और सुरक्षा प्राप्त हो।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">​राममय जीवन का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामाजिक समरसता और करुणा है। श्रीराम ने निषादराज को गले लगाकर और शबरी के जूठे बेर खाकर समाज को यह संदेश दिया कि मानवता की सेवा ही सर्वोपरि धर्म है। उन्होंने जाति, वर्ग, भाषा और संप्रदाय की सीमाओं को तोड़कर समावेशी समाज की नींव रखी। आज के खंडित समाज में सांस्कृतिक एकता और राष्ट्रीय सद्भाव के लिए यह दृष्टिकोण अत्यंत आवश्यक है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः, राममय जीवन संयम और आत्मानुशासन की मांग करता है। श्रीराम ने भौतिक सुखों के बजाय त्याग को चुना, जो हमें सिखाता है कि वास्तविक सफलता आत्मबल और चरित्र की शुचिता से प्राप्त होती है। यदि हम अपने आचरण में राम के इन गुणों को सूक्ष्म रूप में भी स्थान दे सकें, तो व्यक्तिगत सुख और राष्ट्रीय उत्थान का मार्ग स्वतः प्रशस्त हो जाएगा।</div>
</div>
</div>
</div>
</div>
<div class="hq gt" style="text-align:justify;"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 25 Mar 2026 17:23:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>विष्णु महायज्ञ हेतु भूमि पूजन से लोगों में दिखी उल्लास की झलक</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>पाकुड़िया, पाकुड़, झारखंड:- </strong>यज्ञ सनातन संस्कृति की अमूल्य निधि है। यज्ञ पूर्णत: वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित होते हुए इसके व्यापक अर्थ में संगतिकरण का भाव निहित है। यज्ञ केवल धार्मिक कर्मकांड ही नहीं है अपितु लोक रंजन का सशक्त सेतु भी है। वहीं यज्ञ के वैज्ञानिक पक्ष की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा गया है कि यज्ञ वेदी पर निर्मित हवन कुंड में होमी गई आम, पाकड़ आदि विभिन्न वृक्षों की समिधाएं व हवन सामग्रियों का सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि देव-दानवों के अलावा याज्ञवल्क्य, पराशर, संदीपनी, अगस्त्य, विश्वामित्र सहित ऋषि-महर्षियों ने विधिवत यज्ञ</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/171035/glimpse-of-joy-seen-among-people-after-bhoomi-pujan-for"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/news-311.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>पाकुड़िया, पाकुड़, झारखंड:- </strong>यज्ञ सनातन संस्कृति की अमूल्य निधि है। यज्ञ पूर्णत: वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित होते हुए इसके व्यापक अर्थ में संगतिकरण का भाव निहित है। यज्ञ केवल धार्मिक कर्मकांड ही नहीं है अपितु लोक रंजन का सशक्त सेतु भी है। वहीं यज्ञ के वैज्ञानिक पक्ष की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा गया है कि यज्ञ वेदी पर निर्मित हवन कुंड में होमी गई आम, पाकड़ आदि विभिन्न वृक्षों की समिधाएं व हवन सामग्रियों का सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि देव-दानवों के अलावा याज्ञवल्क्य, पराशर, संदीपनी, अगस्त्य, विश्वामित्र सहित ऋषि-महर्षियों ने विधिवत यज्ञ का अनुष्ठान कर दुर्लभ सिद्धियां प्राप्त कीं। शास्रोक्त रीति-नीति से यज्ञ कर दशानन रावण और बड़े-बड़े राजाओं ने मनोवांछित फल प्राप्त किए। यज्ञ से देवों को बल मिलता है एवं वे प्रसन्न होकर मानव के सारे मनोरथ पूर्ण करते हैं।हालांकि सनातन सांस्कृतिक मूल्यों में उल्लेखित यज्ञ की महत्ता बताना संभव नहीं है। यदि इसके एक पक्ष संगतिकरण को भी हम साकार रूप में लें तो मानवीय हित को संबल मिलता रहेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अस्तु, विगत कई वर्षों के उपरांत प्रखण्ड मुख्यालय पाकुड़िया स्थित रामलल्ला यज्ञ मैदान में पुनः विष्णु महायज्ञ के भव्य आयोजन किए जाने से प्रखण्डवासियों में अपूर्व उत्साह और उल्लास से प्रखण्ड का कण-कण रोमांचित होता दिख रहा है। वहीं दूसरी ओर विष्णु महायज्ञ के आयोजन से पाकुड़िया प्रखण्ड में आध्यात्मिक सुगंध बिखरने से लोगों के मन-मस्तिष्क में अपूर्व उत्साह का संचार होगा जिससे मन प्रसन्न रहेगा। इससे लोगों में सामाजिक सद्भाव की वृद्धि होगी और नकारात्मक भाव का लोप होता दिखेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विष्णु यज्ञ के विशाल आयोजन और मनोरंजन की सामग्री आने तथा संध्या को बंगला, संथाली व लाल मोहन तिवारी की मनोहारी शैली में हिन्दी, बंगला, खोरठा भाषा में श्रीराम विवाह, शिव-पार्वती सहित कई आख्यायिकाओं की प्रस्तुतियों से प्रखण्डवासियों की उत्सुकता बढ़ती दिख रही है और 21 से 29 अप्रैल की वेला की प्रतीक्षा में लोग पलकें बिछाए बैठे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;">यज्ञ समिति के उत्साही तरुणों के प्रति लोगों ने बधाई दी है और विश्वास जताया है कि वे विष्णु महायज्ञ के आयोजन में पूर्णत: सफल होंगे।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>बिहार/झारखंड</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 23 Feb 2026 19:46:54 +0530</pubDate>
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