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                <title>सनातन संस्कृति - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>सनातन संस्कृति RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>विश्व योग दिवस पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा विशाल योग कार्यक्रम का आयोजन</title>
                                    <description><![CDATA[<p><br /></p><blockquote class="format1"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">लखनऊ</span></strong>,  </blockquote><p><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व योग दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उत्तर भाग के महाराजा सुहेलदेव नगर द्वारा श्रीराम शाखा पर भव्य योग कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम श्रीराम अकैडमी इंटर कॉलेज परिसर में संपन्न हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें समाज के सैकड़ों नागरिकों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संघ के स्वयंसेवकों एवं पदाधिकारियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।</span></p><p><span lang="hi" xml:lang="hi">कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं श्रीराम अकैडमी इंटर कॉलेज के प्रबंधक</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रवण मिश्रा</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारत पुनः विश्व गुरु बनने की दिशा में अग्रसर है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि भारत की प्राचीन योग परंपरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग चिकित्सा एवं योग</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181921/rashtriya-swayamsevak-sangh-organizes-huge-yoga-program-on-world-yoga"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/whatsapp-image-2026-06-21-at-15.08.50-(1)-(1).jpeg" alt=""></a><br /><p><br /></p><blockquote class="format1"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">लखनऊ</span></strong>,  </blockquote><p><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व योग दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उत्तर भाग के महाराजा सुहेलदेव नगर द्वारा श्रीराम शाखा पर भव्य योग कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम श्रीराम अकैडमी इंटर कॉलेज परिसर में संपन्न हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें समाज के सैकड़ों नागरिकों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संघ के स्वयंसेवकों एवं पदाधिकारियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।</span></p><p><span lang="hi" xml:lang="hi">कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं श्रीराम अकैडमी इंटर कॉलेज के प्रबंधक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रवण मिश्रा</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारत पुनः विश्व गुरु बनने की दिशा में अग्रसर है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि भारत की प्राचीन योग परंपरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग चिकित्सा एवं योग पद्धति को आज पूरा विश्व अपना रहा है। उन्होंने कहा कि विश्वभर के लोग भारतीय सनातन संस्कृति और उसकी परंपराओं को जानने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समझने और अपनाने के लिए उत्सुक हैं।</span></p><p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-06/whatsapp-image-2026-06-21-at-15.08.50-(1)-(1).jpeg" alt="विश्व योग दिवस पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा विशाल योग कार्यक्रम का आयोजन" width="1080" height="810"></img></span></p><p><span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में समाज को संगठित रहने की आवश्यकता है और योग इस दिशा में एक महत्वपूर्ण माध्यम सिद्ध हो रहा है। योग से तन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन और मस्तिष्क स्वस्थ रहते हैं तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक इस कार्य को कुशलतापूर्वक समाज तक पहुंचा रहे हैं।</span></p><p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-06/whatsapp-image-2026-06-21-at-15.08.50.jpeg" alt="विश्व योग दिवस पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा विशाल योग कार्यक्रम का आयोजन" width="1080" height="810"></img></span></p><p><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह जिला बौद्धिक प्रमुख</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">त्रियुगी नाथ</span></strong>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नगर संघ चालक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संतोष</span></strong>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सह नगर संघ चालक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">श्यामू</span></strong>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाग सद्भाव संयोजक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सुधीर</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तथा नगर समरसता प्रमुख</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विनोद</span></strong><strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।</span></p><p><span lang="hi" xml:lang="hi">कार्यक्रम में नगर समरसता प्रमुख</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विनोद </span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ने उपस्थित सभी आगंतुकों को विभिन्न योगासन एवं प्राणायाम का अभ्यास कराया तथा योग के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। कार्यक्रम का समापन स्वस्थ एवं जागरूक समाज के निर्माण के संकल्प के साथ हुआ।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ख़बरें</category>
                                            <category>सांस्कृतिक और धार्मिक</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 16:20:10 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>विख्यात कथावाचक राज ऋषि माधव मुकुंद महाराज को मिली महामंडलेश्वर की उपाधि</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>कानपुर। </strong>अपनी ओजस्वी वाणी, मधुर कथा शैली एवं आध्यात्मिक प्रवचनों से देशभर के श्रद्धालुओं को भक्ति रस में सराबोर करने वाले विख्यात कथावाचक राज ऋषि माधव मुकुंद महाराज को अंतरराष्ट्रीय संत ऋषि अखाड़ा द्वारा महामंडलेश्वर की उपाधि से सम्मानित किया गया है। यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी अंतरराष्ट्रीय संत ऋषि अखाड़ा के प्रमुख जगद्गुरु श्री सच्चिदानंदन बाल प्रभु जी महाराज ने उन्हें प्रदान की।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इस अवसर पर आयोजित धार्मिक समारोह में संत समाज, श्रद्धालुओं एवं गणमान्य लोगों की उपस्थिति में यह घोषणा की गई। संत समाज ने इसे सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार और आध्यात्मिक चेतना के क्षेत्र में राज ऋषि माधव मुकुंद</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180918/famous-storyteller-raj-rishi-madhav-mukund-maharaj-got-the-title"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/1001988605.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>कानपुर। </strong>अपनी ओजस्वी वाणी, मधुर कथा शैली एवं आध्यात्मिक प्रवचनों से देशभर के श्रद्धालुओं को भक्ति रस में सराबोर करने वाले विख्यात कथावाचक राज ऋषि माधव मुकुंद महाराज को अंतरराष्ट्रीय संत ऋषि अखाड़ा द्वारा महामंडलेश्वर की उपाधि से सम्मानित किया गया है। यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी अंतरराष्ट्रीय संत ऋषि अखाड़ा के प्रमुख जगद्गुरु श्री सच्चिदानंदन बाल प्रभु जी महाराज ने उन्हें प्रदान की।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इस अवसर पर आयोजित धार्मिक समारोह में संत समाज, श्रद्धालुओं एवं गणमान्य लोगों की उपस्थिति में यह घोषणा की गई। संत समाज ने इसे सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार और आध्यात्मिक चेतना के क्षेत्र में राज ऋषि माधव मुकुंद महाराज द्वारा किए गए उल्लेखनीय कार्यों का सम्मान बताया।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">राज ऋषि माधव मुकुंद महाराज वर्षों से श्रीमद्भागवत कथा, धार्मिक प्रवचनों एवं आध्यात्मिक कार्यक्रमों के माध्यम से समाज को धर्म, संस्कृति और नैतिक मूल्यों का संदेश देते आ रहे हैं। उनकी कथाओं में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं और उनके विचारों से प्रेरणा प्राप्त करते हैं। उनकी लोकप्रियता देश के विभिन्न राज्यों तक फैली हुई है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">महामंडलेश्वर की उपाधि मिलने के बाद उनके अनुयायियों और भक्तों में हर्ष का माहौल है। श्रद्धालुओं ने इसे उनके आध्यात्मिक जीवन, धर्म सेवा और समाज के प्रति समर्पण का परिणाम बताया। इस अवसर पर उपस्थित संतों ने कहा कि राज ऋषि माधव मुकुंद महाराज के नेतृत्व में सनातन संस्कृति के संरक्षण, धार्मिक जागरण और समाज में आध्यात्मिक मूल्यों के प्रसार को नई गति मिलेगी।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">उपाधि ग्रहण करने के पश्चात राज ऋषि माधव मुकुंद महाराज ने सभी संतों, गुरुजनों और श्रद्धालुओं का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह सम्मान उनके लिए सेवा, साधना और धर्म प्रचार की जिम्मेदारी को और अधिक बढ़ाता है। उन्होंने सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार एवं मानव कल्याण के कार्यों को निरंतर आगे बढ़ाने का संकल्प भी व्यक्त किया।<br /></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ख़बरें</category>
                                            <category>सांस्कृतिक और धार्मिक</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 15:43:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मैं सूतपुत्र कर्ण से नहीं करूंगी विवाह – द्रोपद पुत्री द्रौपदी</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>पाकुड़िया, पाकुड़, झारखण्ड:-</strong> द्रौपदी के स्वयंवर सभा में जब अंगराज कर्ण ने नीचे पात्र में रखे तेल की छाया में मछली की आंख में निशान लगाने के लिए धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाना चाहा तभी पांचाली बोल पड़ी—मैं नहीं करूंगी सूतपुत्र से विवाह। इस पर तर्क-वितर्क होने पर धृष्टद्युम्न ने कहा—स्वयंवर की घोषणा में बताया गया है कि कन्या की इच्छा पर निर्भर है कि वह किसे वरण करना चाहती है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">      पांचाली पांचाल देश के राजा द्रोपद की कन्या थी और वह अग्निकुंड से प्रकट हुई थी। इस कारण इन्हें अग्निसूता भी कहा जाता है। स्वयंवर सभा में वीर-महावीरों ने</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
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<div style="text-align:justify;">   </div>
<div style="text-align:justify;">श्रीकृष्ण</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178243/i-will-not-marry-sutaputra-karna-%E2%80%93-draupada-daughter-draupadi"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/news-2.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>पाकुड़िया, पाकुड़, झारखण्ड:-</strong> द्रौपदी के स्वयंवर सभा में जब अंगराज कर्ण ने नीचे पात्र में रखे तेल की छाया में मछली की आंख में निशान लगाने के लिए धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाना चाहा तभी पांचाली बोल पड़ी—मैं नहीं करूंगी सूतपुत्र से विवाह। इस पर तर्क-वितर्क होने पर धृष्टद्युम्न ने कहा—स्वयंवर की घोषणा में बताया गया है कि कन्या की इच्छा पर निर्भर है कि वह किसे वरण करना चाहती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">   पांचाली पांचाल देश के राजा द्रोपद की कन्या थी और वह अग्निकुंड से प्रकट हुई थी। इस कारण इन्हें अग्निसूता भी कहा जाता है। स्वयंवर सभा में वीर-महावीरों ने भरपूर प्रयत्न करने के बाद भी प्रत्यंचा चढ़ाने में विफल रहे। तब ब्राह्मण वेषधारी कौंतेय ने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर मछली की आंख को भेदते हुए सभी को अचंभित कर दिया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">   कर्ण महावीर थे और मछली की आंख आसानी से भेद सकते थे, पर पांचाली ने विवाह नहीं करने की बात क्यों कही? क्या सूत होने के कारण ही द्रौपदी ने मना किया या इसके पीछे कई गूढ़ रहस्य छिपे हैं? यद्यपि उक्त प्रसंग हजारों वर्ष पूर्व का है, परन्तु प्रमाणिक तथ्यों की अनदेखी कर लोग, विशेषकर भारतीय ज्ञानपरक व राष्ट्रीय हितों की उपेक्षा कर, उन गूढ़ रहस्यों को स्वार्थवश नहीं कहते और राष्ट्रीय जनजीवन को भ्रमित करते रहे हैं। इससे देश ही नहीं, भारत विरोधी तत्व भी देश की मान्य छवि को धुंधला करते रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">   सनातन संस्कृति, धर्म एवं परम्पराओं में सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग में, ईसा की सातवीं सदी अर्थात भारत पर विदेशी आक्रांताओं के आक्रमण से पूर्व तक, किसी प्रकार की जातीयता का प्रमाणिक उल्लेख नहीं मिलता। सनातन सांस्कृतिक मूल्य कर्म आधारित रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">   कर्ण के संदर्भ में उल्लेखनीय है कि वे कौंतेय थे। गुरु द्वारा प्रदत्त सूर्य मंत्र का परीक्षण करने हेतु कुंती ने आह्वान किया और सूर्य भगवान प्रकट हुए। वहीं वरदान स्वरूप पुत्र की प्राप्ति हुई, लेकिन उन्होंने कुंती को आशीर्वाद दिया कि वे कुमारी ही रहेंगी। लोकलाज के कारण उन्होंने बालक को गंगा में प्रवाहित कर दिया। कर्ण कवच-कुंडल लेकर जन्मे थे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">   दूसरी ओर कर्ण का पालन-पोषण एक सूत परिवार में हुआ और राधेय इनकी माता कही गईं। इसी कारण कर्ण राधेय भी कहलाए। उन दिनों रथ चलाने वाले को सूत कहा जाता था। जिस प्रकार आज वाहन चलाने वाले को चालक या ड्राइवर कहा जाता है, चाहे वह किसी भी वर्ग का हो।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">   उपमा के तौर पर आज भी कोई सम्पन्न या रईस व्यक्ति किसी चालक से अपनी सुकन्या का विवाह करना पसंद नहीं करता। लोग कहते हैं कि द्रौपदी ने श्रीकृष्ण के संकेत से ऐसा किया। पांचाली को कृष्णा भी कहा जाता है और भाई होने के नाते वे बहन के हित की ही सोचते।</div>
<div style="text-align:justify;">श्रीकृष्ण भगवान थे और पांचाली के पूर्व जन्मों के सभी कर्मों व इच्छाओं को भली-भांति जानते थे कि उनका परिणय किनके साथ होगा तथा भविष्य में कौन-कौन सी घटनाएं घटेंगी और उनका समाधान कैसे होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">   कहा जाता है कि कौरव दल में भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा और कर्ण जैसे महारथी थे। इसे ध्यान में रखते हुए संजय ने धृतराष्ट्र से कहा—महाराज, विजय दुर्योधन की होगी, परन्तु दुर्योधन सहित पांच को छोड़कर सभी मारे जाएंगे और अंततः भारी पराजय होगी। इस पर धृतराष्ट्र ने कहा—संजय, तुमने मुझसे कभी झूठ नहीं कहा, पर ऐसा कैसे हो सकता है?</div>
<div style="text-align:justify;">इस पर संजय ने विनम्र होकर कहा—महाराज, ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इसके मूल में श्रीकृष्ण थे और वे सदैव सत्य और धर्म का पक्ष लेते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">   सनातन धर्म और संस्कृति कर्म आधारित रही है और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की अवधारणा के साथ विश्व कल्याण की कामना करती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>बिहार/झारखंड</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 05 May 2026 20:53:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>भक्तिमय वातावरण  हुआ विशाल भंडारा </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>नवाबगंज/ </strong>क्षेत्र के पंडरी में सुप्रसिद्ध प्रकाण्ड विद्वान, विप्र शिरोमणि एवं ज्योतिषाचार्य परम आदरणीय पंडित जगदीश मिश्रा  के पैतृक ग्राम पंडरी में उनके परिजनों द्वारा नवनिर्मित भव्य  जगदीश्वर राम जानकी मंदिर में आयोजित प्राण प्रतिष्ठा का भव्य महोत्सव श्रद्धा, भक्ति और सनातन संस्कृति की दिव्य अनुभूति के तहत मनाया गया।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">तीन दिवसीय वैदिक अनुष्ठान, पूजन, हवन एवं मंत्रोच्चारण के उपरांत रविवार को भव्य प्राण प्रतिष्ठा समारोह सम्पन्न हुआ।</div>
<div style="text-align:justify;">वैदिक ऋचाओं और मंत्रों की पावन ध्वनि के माध्यमसे भगवान श्रीराम, माता जानकी,  अनुज लक्ष्मण  संकटमोचन हनुमान  तथा भगवान भोलेनाथ एवं उनके परिवार की दिव्य प्रतिमाओं को पूर्ण विधि-विधान के साथ मंदिर</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178085/devotional-atmosphere"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/1.------अ.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>नवाबगंज/ </strong>क्षेत्र के पंडरी में सुप्रसिद्ध प्रकाण्ड विद्वान, विप्र शिरोमणि एवं ज्योतिषाचार्य परम आदरणीय पंडित जगदीश मिश्रा  के पैतृक ग्राम पंडरी में उनके परिजनों द्वारा नवनिर्मित भव्य  जगदीश्वर राम जानकी मंदिर में आयोजित प्राण प्रतिष्ठा का भव्य महोत्सव श्रद्धा, भक्ति और सनातन संस्कृति की दिव्य अनुभूति के तहत मनाया गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तीन दिवसीय वैदिक अनुष्ठान, पूजन, हवन एवं मंत्रोच्चारण के उपरांत रविवार को भव्य प्राण प्रतिष्ठा समारोह सम्पन्न हुआ।</div>
<div style="text-align:justify;">वैदिक ऋचाओं और मंत्रों की पावन ध्वनि के माध्यमसे भगवान श्रीराम, माता जानकी,  अनुज लक्ष्मण  संकटमोचन हनुमान  तथा भगवान भोलेनाथ एवं उनके परिवार की दिव्य प्रतिमाओं को पूर्ण विधि-विधान के साथ मंदिर में विराजमान किया गया है </div>
<div style="text-align:justify;">पूरे आयोजन के दौरान मंदिर परिसर में।</div>
<div style="text-align:justify;">“<img class="an1" src="https://fonts.gstatic.com/s/e/notoemoji/17.0/1f6a9/32.png" alt="🚩"></img> जय श्रीराम <img class="an1" src="https://fonts.gstatic.com/s/e/notoemoji/17.0/1f6a9/32.png" alt="🚩"></img>”</div>
<div style="text-align:justify;">और</div>
<div style="text-align:justify;">“<img class="an1" src="https://fonts.gstatic.com/s/e/notoemoji/17.0/1f531/32.png" alt="🔱"></img> हर हर महादेव <img class="an1" src="https://fonts.gstatic.com/s/e/notoemoji/17.0/1f531/32.png" alt="🔱"></img>”</div>
<div style="text-align:justify;">के उद्घोषों से गुंजायमान रहा वातावरण।</div>
<div style="text-align:justify;">सुप्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित जगदीश मिश्रा  के सानिध्य में सम्पन्न इस दिव्य आयोजन में क्षेत्र सहित दूर-दराज से पहुंचे श्रद्धालुओं ने दर्शन-पूजन अर्चना कर आशीर्वाद प्राप्त किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भक्ति और आस्था से ओतप्रोत वातावरण ने सभी श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया ऐसा प्रतीत हुआ अब कहीं स्वर्ग है तो यहीं पर है</div>
<div style="text-align:justify;">कार्यक्रम के समापन पर विशाल भण्डारे एवं प्रसाद वितरण का आयोजन किया गया, जिसमें हजारों श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण कर धर्मलाभ प्राप्त किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह नव निर्मित देवालय आने वाले समय में सनातन संस्कृति, धर्म एवं आध्यात्मिक चेतना का प्रेरणास्रोत बने — यही प्रभु श्रीराम एवं देवाधिदेव महादेव से प्रार्थना की गई है।</div>
<div> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ख़बरें</category>
                                            <category>सांस्कृतिक और धार्मिक</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 04 May 2026 16:49:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>श्रीराम कथा में राम की बाल लीलाओं का वर्णन</title>
                                    <description><![CDATA[<div>
<div>
<div style="text-align:justify;"><strong>सिद्धार्थनगर।</strong> बिस्कोहर कस्बे से सटे जनपद बलरामपुर सीमा पर स्थित मधुपुर पकड़ी गांव में चल रहे नौ दिवसीय श्री राम कथा के छठवें दिन रविवार की रात श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा।यज्ञाचार्य दुर्गेश कुमार शास्त्री अयोध्या से आए हुए जगत गुरु स्वामी राम दिनेशाचार्य ने  श्रीराम  के बाल लीलाओं बारे में कथा सुनाई। जगत गुरु स्वामी राम दिनेशाचार्य ने  प्रभु श्रीराम की मनमोहक बाल लीलाओं का वर्णन कर भक्तों को भाव विभोर कर दिया।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-04/1777291160824.jpg" alt="श्रीराम कथा में राम की बाल लीलाओं का वर्णन" width="1200" height="800" /></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">कथा के दौरान उन्होंने उस प्रसंग का  वर्णन किया, जब भगवान भोलेनाथ बालक राम के दर्शन की लालसा में भेष बदलकर अयोध्या पहुंचे थे। उन्होंने संदेश</div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177412/description-of-rams-childhood-activities-in-shri-ram-katha"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/1777291160841.jpg" alt=""></a><br /><div>
<div>
<div style="text-align:justify;"><strong>सिद्धार्थनगर।</strong> बिस्कोहर कस्बे से सटे जनपद बलरामपुर सीमा पर स्थित मधुपुर पकड़ी गांव में चल रहे नौ दिवसीय श्री राम कथा के छठवें दिन रविवार की रात श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा।यज्ञाचार्य दुर्गेश कुमार शास्त्री अयोध्या से आए हुए जगत गुरु स्वामी राम दिनेशाचार्य ने  श्रीराम  के बाल लीलाओं बारे में कथा सुनाई। जगत गुरु स्वामी राम दिनेशाचार्य ने  प्रभु श्रीराम की मनमोहक बाल लीलाओं का वर्णन कर भक्तों को भाव विभोर कर दिया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-04/1777291160824.jpg" alt="श्रीराम कथा में राम की बाल लीलाओं का वर्णन" width="1200" height="800"></img></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कथा के दौरान उन्होंने उस प्रसंग का  वर्णन किया, जब भगवान भोलेनाथ बालक राम के दर्शन की लालसा में भेष बदलकर अयोध्या पहुंचे थे। उन्होंने संदेश देते हुए कहा श्रीराम कथा केवल श्रवण का माध्यम नहीं है बल्कि यह जीवन की पाठशाला है। हमें भगवान राम के आदर्शों और उनके चरित्र को अपने वास्तविक जीवन में उतारना चाहिए तभी ऐसी कथाओं की सार्थकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस दौरान मुख्य यजमान धनीराम प्रजापति, सीताराम प्रजापति, विजय प्रजापति,पंकज प्रजापति,दयाराम प्रजापति, विजय कुमार, धर्मेन्द्र शुक्ला, मनीराम प्रजापति, डॉ मधुसूदन शुक्ला, विजय शरण मिश्रा, संजय सिंह, मोना पाण्डेय, रक्षा राम प्रजापति, विजय कुमार अग्रहरि चेयरमैन प्रतिनिधि ,कृपा शंकर प्रजापति सहित भारी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।</div>
</div>
</div>
<div class="yj6qo" style="text-align:justify;"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ख़बरें</category>
                                            <category>सांस्कृतिक और धार्मिक</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 18:03:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>परंपरा और आधुनिकता के बीच त्रिशंकु बना समाज</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">वर्तमान समय का मनुष्य एक विचित्र द्वंद्व में जी रहा है। आधुनिकता की अंधी दौड़ में वह इतनी तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है कि उसकी अपनी सनातनी परंपराएँ धीरे-धीरे धुंधलाने लगी हैं। परिणामस्वरूप वह न पूर्णतः आधुनिक बन पाया है, न ही अपने संस्कारों से पूर्णतः जुड़ा रह सका है—वह त्रिशंकु की भाँति दो ध्रुवों के बीच झूलता हुआ एक असंतुलित अस्तित्व बन गया है।भारतीय वैदिक और सनातनी संस्कृति हमें हमारी जड़ों से जोड़ती है, हमें हमारे ‘भारतीय’ होने का गहन बोध कराती है। यह संस्कृति केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं, बल्कि मनुष्यता, करुणा, सह-अस्तित्व और जीवन</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174763/society-becomes-hung-between-tradition-and-modernity"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/hindi-divas.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">वर्तमान समय का मनुष्य एक विचित्र द्वंद्व में जी रहा है। आधुनिकता की अंधी दौड़ में वह इतनी तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है कि उसकी अपनी सनातनी परंपराएँ धीरे-धीरे धुंधलाने लगी हैं। परिणामस्वरूप वह न पूर्णतः आधुनिक बन पाया है, न ही अपने संस्कारों से पूर्णतः जुड़ा रह सका है—वह त्रिशंकु की भाँति दो ध्रुवों के बीच झूलता हुआ एक असंतुलित अस्तित्व बन गया है।भारतीय वैदिक और सनातनी संस्कृति हमें हमारी जड़ों से जोड़ती है, हमें हमारे ‘भारतीय’ होने का गहन बोध कराती है। यह संस्कृति केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं, बल्कि मनुष्यता, करुणा, सह-अस्तित्व और जीवन के उच्च आदर्शों की वाहक है। </p><p style="text-align:justify;">‘अतिथि देवो भव’ और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ जैसे सूत्र केवल वाक्य नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन हैं, जो समस्त विश्व को एक परिवार के रूप में देखने की दृष्टि प्रदान करते हैं। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति को अध्यात्म प्रधान कहा गया है—यह भौतिकता से परे आत्मा के उत्कर्ष की बात करती है किन्तु दूसरी ओर, पाश्चात्य संस्कृति ने मानव जीवन को तार्किकता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और व्यावहारिकता का नया आयाम दिया है।</p><p style="text-align:justify;"> उसने मनुष्य को प्रश्न करना सिखाया, प्रमाण और तर्क के आधार पर सत्य को परखने की प्रवृत्ति विकसित की। विज्ञान और तकनीक के अद्भुत विकास ने जीवन को सुविधाजनक, सुगम और व्यापक बना दिया है। आज मानव चंद्रमा से आगे बढ़कर सूर्य के रहस्यों को जानने की चेष्टा कर रहा है, और सृजन के नए आयाम खोजते हुए प्रकृति को चुनौती देने का साहस भी दिखा रहा है।<br /></p><p style="text-align:justify;">यहीं से द्वंद्व उत्पन्न होता है। एक ओर अध्यात्म की गहराई है, तो दूसरी ओर भौतिकता की व्यापकता। एक ओर परंपरा की स्थिरता है, तो दूसरी ओर आधुनिकता की गतिशीलता। यदि मनुष्य केवल परंपरा से चिपका रहे, तो वह जड़ता का शिकार हो सकता है; और यदि केवल आधुनिकता को अपनाए, तो वह अपनी पहचान और संवेदनाओं से दूर हो सकता है।आज की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि हमने पाश्चात्य संस्कृति के सार को नहीं, बल्कि उसके बाह्य आवरण को अपनाया है। </p><p style="text-align:justify;">परिणामस्वरूप संयुक्त परिवारों का विघटन हो रहा है, संबंधों में ऊष्मा कम होती जा रही है, बुजुर्गों के प्रति सम्मान घट रहा है और जीवन एक यांत्रिक प्रक्रिया बनता जा रहा है। भौतिक सुख-सुविधाओं की अंधी चाह ने मनुष्य को भीतर से रिक्त कर दिया है। परिवारों में अलगाव, अकेलापन और तनाव की स्थितियाँ बढ़ रही हैं।<br /></p><p style="text-align:justify;">फिर भी यह एकांगी दृष्टिकोण नहीं होना चाहिए। पाश्चात्य प्रभाव ने समाज में अनेक सकारात्मक परिवर्तन भी किए हैं। स्त्री सशक्तिकरण इसका प्रमुख उदाहरण है। जो महिलाएँ कभी घर की चारदीवारी तक सीमित थीं, आज वे शिक्षा, व्यवसाय और नेतृत्व के क्षेत्र में नई ऊँचाइयाँ छू रही हैं। सामाजिक खुलापन, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अवसरों की समानता ने समाज को अधिक गतिशील और प्रगतिशील बनाया है।<br /></p><p style="text-align:justify;">अतः आवश्यकता इस बात की है कि हम किसी एक ध्रुव के प्रति अंध-आसक्ति न रखें। न तो अतीत की रूढ़ियों में जकड़े रहें, और न ही आधुनिकता के अंधानुकरण में अपनी पहचान खो दें। विवेक का मार्ग ही यहाँ संतुलन प्रदान कर सकता है। जैसा कि एक संतुलित वीणा के तार ही मधुर संगीत उत्पन्न करते हैं।न अत्यधिक कसाव, न अत्यधिक ढील वैसे ही जीवन में भी परंपरा और आधुनिकता का संतुलित समन्वय आवश्यक है।<br /></p><p style="text-align:justify;">हमें अपनी संस्कृति के उन मूल्यों को संजोकर रखना होगा, जो मानवता को ऊँचा उठाते हैं, और साथ ही पाश्चात्य विचारधारा की उन विशेषताओं को अपनाना होगा, जो जीवन को तार्किक, वैज्ञानिक और प्रगतिशील बनाती हैं। यही समन्वय हमें त्रिशंकु की स्थिति से निकालकर एक संतुलित, समृद्ध और सार्थक जीवन की ओर ले जा सकता है।<br /></p><p style="text-align:justify;">अंततः यही कहा जा सकता है कि जीवन की सफलता न अतीत में पूरी तरह छिपी है, न भविष्य में पूरी तरह निहित है।वह वर्तमान में संतुलन स्थापित करने की कला में निहित है। जो इस संतुलन को साध लेता है, वही सच्चे अर्थों में विकसित और जागरूक मानव बन पाता।<br /></p><p style="text-align:justify;"><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/174763/society-becomes-hung-between-tradition-and-modernity</link>
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                <pubDate>Wed, 01 Apr 2026 18:12:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>राम मय हो जीवन हमारा</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
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<div style="text-align:justify;"><strong>प्रो.(डा.) मनमोहन प्रकाश </strong></div>
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<div style="text-align:justify;">सनातन संस्कृति में श्रीराम केवल एक ऐतिहासिक पात्र या धार्मिक प्रतीक मात्र नहीं हैं, बल्कि वे प्रत्येक भारतीय के लिए मर्यादा, आदर्श और मानवीय मूल्यों के शाश्वत स्रोत हैं। जब हम "राममय जीवन" की परिकल्पना करते हैं, तो इसका अर्थ केवल कर्मकांड या नाम-जप तक सीमित नहीं है, अपितु इसका वास्तविक अर्थ अपने विचारों, कर्तव्यों, संबंधों और आचरण में राम के आदर्शों को स्थान देना है। राममय जीवन का तात्पर्य उस सत्य, करुणा, न्याय, समरसता और कर्तव्यपरायणता से युक्त जीवन को जीना है जो दूसरों के लिए भी प्रेरणा का पुंज बन सके।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">​श्रीराम का जीवन हमें</div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174145/may-our-life-be-blessed-by-ram"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/images11.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div>
<div style="text-align:justify;"><strong>प्रो.(डा.) मनमोहन प्रकाश </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सनातन संस्कृति में श्रीराम केवल एक ऐतिहासिक पात्र या धार्मिक प्रतीक मात्र नहीं हैं, बल्कि वे प्रत्येक भारतीय के लिए मर्यादा, आदर्श और मानवीय मूल्यों के शाश्वत स्रोत हैं। जब हम "राममय जीवन" की परिकल्पना करते हैं, तो इसका अर्थ केवल कर्मकांड या नाम-जप तक सीमित नहीं है, अपितु इसका वास्तविक अर्थ अपने विचारों, कर्तव्यों, संबंधों और आचरण में राम के आदर्शों को स्थान देना है। राममय जीवन का तात्पर्य उस सत्य, करुणा, न्याय, समरसता और कर्तव्यपरायणता से युक्त जीवन को जीना है जो दूसरों के लिए भी प्रेरणा का पुंज बन सके।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">​श्रीराम का जीवन हमें सिखाता है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों, मनुष्य को धर्म और कर्तव्य के मार्ग से विचलित नहीं होना चाहिए। पिता के वचनों की रक्षा हेतु सहर्ष राज्य-त्याग, वनवास के कष्टों के बीच भी मित्रों के प्रति अटूट समर्पण, शत्रुओं के प्रति भी मर्यादित व्यवहार और विपरीत परिस्थितियों में भी संयमित आचरण आदि उनके चरित्र की वे विशेषताएँ हैं जो सिद्ध करती हैं कि मनुष्य को हर स्थिति में नैतिक श्रेष्ठता को ही प्राथमिकता देनी चाहिए। आज के युग में, जहाँ स्वार्थ, प्रतिस्पर्धा और नैतिक पतन की चुनौतियाँ प्रबल हैं, वहाँ राममय जीवन की आवश्यकता और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है।​</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस जीवन पद्धति का प्रथम आधार असत्य का परित्याग कर सत्य और शुचिता का वरण करना है। यदि मनुष्य अपने व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में सत्य को प्रतिष्ठापित करता है, तो परिवार और राष्ट्र में परस्पर विश्वास का वातावरण निर्मित होता है। वर्तमान दौर में प्रशासन, शिक्षा और राजनीति जैसे तमाम क्षेत्रों में भी इसी राममय दृष्टिकोण को अपनाने की आवश्यकता है, ताकि नैतिकता और पारदर्शिता की जड़ें मजबूत हो सकें।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके साथ ही, कर्तव्य और मर्यादा का पालन राममय जीवन का अनिवार्य अंग है। श्रीराम ने राजा होने के बावजूद स्वयं को मर्यादा के बंधन में रखा और लोकहित को सर्वोपरि माना। यही कारण है कि उनके शासन को 'रामराज्य' के रूप में एक आदर्श व्यवस्था माना गया, जिसका अर्थ किसी संकीर्ण मजहबी शासन से नहीं, बल्कि एक ऐसी न्यायपूर्ण, समतामूलक और लोककल्याणकारी व्यवस्था से है जहाँ अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति को भी सम्मान और सुरक्षा प्राप्त हो।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">​राममय जीवन का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामाजिक समरसता और करुणा है। श्रीराम ने निषादराज को गले लगाकर और शबरी के जूठे बेर खाकर समाज को यह संदेश दिया कि मानवता की सेवा ही सर्वोपरि धर्म है। उन्होंने जाति, वर्ग, भाषा और संप्रदाय की सीमाओं को तोड़कर समावेशी समाज की नींव रखी। आज के खंडित समाज में सांस्कृतिक एकता और राष्ट्रीय सद्भाव के लिए यह दृष्टिकोण अत्यंत आवश्यक है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः, राममय जीवन संयम और आत्मानुशासन की मांग करता है। श्रीराम ने भौतिक सुखों के बजाय त्याग को चुना, जो हमें सिखाता है कि वास्तविक सफलता आत्मबल और चरित्र की शुचिता से प्राप्त होती है। यदि हम अपने आचरण में राम के इन गुणों को सूक्ष्म रूप में भी स्थान दे सकें, तो व्यक्तिगत सुख और राष्ट्रीय उत्थान का मार्ग स्वतः प्रशस्त हो जाएगा।</div>
</div>
</div>
</div>
</div>
<div class="hq gt" style="text-align:justify;"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 25 Mar 2026 17:23:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>विष्णु महायज्ञ हेतु भूमि पूजन से लोगों में दिखी उल्लास की झलक</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>पाकुड़िया, पाकुड़, झारखंड:- </strong>यज्ञ सनातन संस्कृति की अमूल्य निधि है। यज्ञ पूर्णत: वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित होते हुए इसके व्यापक अर्थ में संगतिकरण का भाव निहित है। यज्ञ केवल धार्मिक कर्मकांड ही नहीं है अपितु लोक रंजन का सशक्त सेतु भी है। वहीं यज्ञ के वैज्ञानिक पक्ष की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा गया है कि यज्ञ वेदी पर निर्मित हवन कुंड में होमी गई आम, पाकड़ आदि विभिन्न वृक्षों की समिधाएं व हवन सामग्रियों का सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।</div>
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<div style="text-align:justify;">शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि देव-दानवों के अलावा याज्ञवल्क्य, पराशर, संदीपनी, अगस्त्य, विश्वामित्र सहित ऋषि-महर्षियों ने विधिवत यज्ञ</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/171035/glimpse-of-joy-seen-among-people-after-bhoomi-pujan-for"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/news-311.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>पाकुड़िया, पाकुड़, झारखंड:- </strong>यज्ञ सनातन संस्कृति की अमूल्य निधि है। यज्ञ पूर्णत: वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित होते हुए इसके व्यापक अर्थ में संगतिकरण का भाव निहित है। यज्ञ केवल धार्मिक कर्मकांड ही नहीं है अपितु लोक रंजन का सशक्त सेतु भी है। वहीं यज्ञ के वैज्ञानिक पक्ष की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा गया है कि यज्ञ वेदी पर निर्मित हवन कुंड में होमी गई आम, पाकड़ आदि विभिन्न वृक्षों की समिधाएं व हवन सामग्रियों का सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि देव-दानवों के अलावा याज्ञवल्क्य, पराशर, संदीपनी, अगस्त्य, विश्वामित्र सहित ऋषि-महर्षियों ने विधिवत यज्ञ का अनुष्ठान कर दुर्लभ सिद्धियां प्राप्त कीं। शास्रोक्त रीति-नीति से यज्ञ कर दशानन रावण और बड़े-बड़े राजाओं ने मनोवांछित फल प्राप्त किए। यज्ञ से देवों को बल मिलता है एवं वे प्रसन्न होकर मानव के सारे मनोरथ पूर्ण करते हैं।हालांकि सनातन सांस्कृतिक मूल्यों में उल्लेखित यज्ञ की महत्ता बताना संभव नहीं है। यदि इसके एक पक्ष संगतिकरण को भी हम साकार रूप में लें तो मानवीय हित को संबल मिलता रहेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अस्तु, विगत कई वर्षों के उपरांत प्रखण्ड मुख्यालय पाकुड़िया स्थित रामलल्ला यज्ञ मैदान में पुनः विष्णु महायज्ञ के भव्य आयोजन किए जाने से प्रखण्डवासियों में अपूर्व उत्साह और उल्लास से प्रखण्ड का कण-कण रोमांचित होता दिख रहा है। वहीं दूसरी ओर विष्णु महायज्ञ के आयोजन से पाकुड़िया प्रखण्ड में आध्यात्मिक सुगंध बिखरने से लोगों के मन-मस्तिष्क में अपूर्व उत्साह का संचार होगा जिससे मन प्रसन्न रहेगा। इससे लोगों में सामाजिक सद्भाव की वृद्धि होगी और नकारात्मक भाव का लोप होता दिखेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विष्णु यज्ञ के विशाल आयोजन और मनोरंजन की सामग्री आने तथा संध्या को बंगला, संथाली व लाल मोहन तिवारी की मनोहारी शैली में हिन्दी, बंगला, खोरठा भाषा में श्रीराम विवाह, शिव-पार्वती सहित कई आख्यायिकाओं की प्रस्तुतियों से प्रखण्डवासियों की उत्सुकता बढ़ती दिख रही है और 21 से 29 अप्रैल की वेला की प्रतीक्षा में लोग पलकें बिछाए बैठे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;">यज्ञ समिति के उत्साही तरुणों के प्रति लोगों ने बधाई दी है और विश्वास जताया है कि वे विष्णु महायज्ञ के आयोजन में पूर्णत: सफल होंगे।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>बिहार/झारखंड</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 23 Feb 2026 19:46:54 +0530</pubDate>
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