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                <title>लखनऊ बेंच - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>लखनऊ बेंच RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>मुकदमों की पेंडिंग लिस्ट बढ़ने का सबसे बड़ा कारण जजों की संख्या है.।</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</strong></p>
<p style="text-align:justify;">इलाहाबाद हाईकोर्ट में केवल 110 जज हैं. इन जजों के भरोसे ये 12 लाख पेंडिंग केस हैं. केस निपटाने को लेकर जजों पर प्रेशर भी है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के तहत केसों की पेंडिंसि खत्म करनी है.</p>
<p style="text-align:justify;">इन्हीं दबावों के बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस सुभाष विद्यार्थी का बयान भी चर्चा में है. हाल ही में जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने एक सुनवाई के दौरान कहा था-मुझे भूख लग रही है, थकान महसूस हो रही है और मैं शारीरिक रूप से निर्णय देने में असमर्थ हूं. इसलिए फैसले की सुरक्षित रखा जाता है.</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसी बात कहने</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173065/the-biggest-reason-for-increasing-the-pending-list-of-cases"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/allahabad-high-court.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</strong></p>
<p style="text-align:justify;">इलाहाबाद हाईकोर्ट में केवल 110 जज हैं. इन जजों के भरोसे ये 12 लाख पेंडिंग केस हैं. केस निपटाने को लेकर जजों पर प्रेशर भी है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के तहत केसों की पेंडिंसि खत्म करनी है.</p>
<p style="text-align:justify;">इन्हीं दबावों के बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस सुभाष विद्यार्थी का बयान भी चर्चा में है. हाल ही में जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने एक सुनवाई के दौरान कहा था-मुझे भूख लग रही है, थकान महसूस हो रही है और मैं शारीरिक रूप से निर्णय देने में असमर्थ हूं. इसलिए फैसले की सुरक्षित रखा जाता है.</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसी बात कहने के पीछ जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की मजबूरी यह थी कि 24 फरवरी को ऋण वसूली न्यायाधिकरण (डीआरटी) के एक आदेश के खिलाफ सुनवाई के बाद न्यायाधीश ने तत्काल आदेश पारित करने के बजाय, टिप्पणी के साथ फैसला सुरक्षित रख लिया.</p>
<p style="text-align:justify;">24 फरवरी का दिन जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की अदालत के लिए बेहद व्यस्त रहा. उनकी लिस्ट में कुल 235 मामले लगे थे. इनमें 92 नए केस, 101 नियमित मामले, 39 विविध आवेदन और 3 एडिशनल लिस्ट के मामले शामिल थे. दोपहर 4:15 बजे तक जस्टिस विद्यार्थी केवल 29 नए मामलों की ही सुनवाई कर पाए थे.</p>
<p style="text-align:justify;">इसी बीच उन्हें सूचित किया गया कि अगला मामला सुप्रीम कोर्ट द्वारा रिमांड (वापस भेजा गया) किया गया है और इसकी समय सीमा 24 फरवरी को ही समाप्त हो रही है. इसके बाद जस्टिस विद्यार्थी ने इस विशेष मामले की सुनवाई शुरू की, जो लगातार शाम 7 बजे तक चली.</p>
<p style="text-align:justify;">जज की इस टिप्पणी ने एक नई बहस छेड़ दी है. यह वाकया दर्शाता है कि भारतीय अदालतों में जजों पर काम का कितना दबाव है. एक ही दिन में 200 से अधिक केस लिस्ट होना और फिर देर शाम तक सुनवाई करना किसी भी व्यक्ति के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से चुनौतीपूर्ण होता है.</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल  सुप्रीम कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट तक केस की बड़ी पेंडेंसी है. वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में लगभग 92800 मामले पेंडिंग हैं. जिनमें से 72000 मामले सिविल के हैं और 20800 मामले अपराधिक (फौजदारी) के हैं. पिछले एक साल में सुप्रीम कोर्ट में 10000 से अधिक पेंडेंसी बढ़ी है.</p>
<p style="text-align:justify;">पूरे देश में सबसे ज्यादा पेंडेंसी इलाहाबाद हाईकोर्ट में है. इलाहाबाद हाईकोर्ट में लगभग 12 लाख केस पेंडिंग हैं. बड़ी बात यह है कि पूरे देश में हाईकोर्ट में जितने केस पेंडिंग हैं उसका 20% यानी की पांचवां हिस्सा अकेले इलाहाबाद हाईकोर्ट में है. इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में 22265 मामले पेंडिंग हैं.</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट में जजों के 34 पद हैं, जिनमें से 33 पदों पर वर्तमान में नियुक्तियां हैं, एक पद खाली है. निर्धारित पदों के सापेक्ष जजों की नियुक्ति होने के बावजूद भी पेंडेंसी 92828 है, जो यह दर्शाती है कि कोर्ट में आने वाले केसों की रफ्तार काफी तेज है. इलाहाबाद हाईकोर्ट की बात करें तो कुल 160 जजों के पद हैं, जिनमें से 110 पदों पर नियुक्ति है. 50 पद खाली हैंं. यानि इलाहाबाद हाईकोर्ट में 31% जजों के पद खाली हैं.</p>
<p style="text-align:justify;">अगर पूरे देश के हाईकोर्ट की बात करें तो सभी 25 हाईकोर्ट में कुल 1114 पद सृजित हैं, जिनमें से 804 पदों पर जज नियुक्त हैं. पूरे देश में हाईकोर्ट के 310 पदों पर जजों की नियुक्ति नहीं है. इसका मतलब पूरे देश में हाईकोर्ट के 27.8 प्रतिशत जजों के पद खाली हैं.</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट ही नहीं जिला कोर्ट में भी केस की संख्या अधिक होने के चलते जज पर काम का प्रेशर होता है. वहीं पक्षकारों को भी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. कोर्ट पर अधिक दबाव होने के चलते मुकदमे की सुनवाई समय से नहीं हो पाती है. एक दिन में अधिक मामले सुनाने पड़ते हैं जिसके चलते केस पर जज अधिक समय नहीं दे पाते और तारीख पर तारीख का खेल चलता रहता है.</p>
<p style="text-align:justify;">आपराधिक मामलों में कोर्ट पर ओवर बर्डन होने के चलते बेल मिलने में समस्या होती है. एक हियरिंग के लिए लिस्टिंग करने के बाद दूसरी हियरिंग की लिस्टिंग होने में महीनों का समय लग जाता है. ऐसे में अगर एक हियरिंग पर किन्ही कारणों से बेल रिजेक्ट होती है, तो दूसरी बेल का मौका मिलने में कई बार महीनों का समय लगता है.</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 09 Mar 2026 23:01:09 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
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                <title>कैदी की आत्महत्या पर पूरी तरह से राज्य की ज़िम्मेदारी</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने हाल ही में कहा कि राज्य अपनी कस्टडी में किसी कैदी की अप्राकृतिक मौत के लिए पूरी तरह से ज़िम्मेदार है, भले ही मौत साफ़ तौर पर अप्राकृतिक आत्महत्या हो।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस शेखर बी सराफ और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने फैसला सुनाया कि भारत के संविधान के आर्टिकल 21 के तहत गारंटी वाला जीवन और इंसानी गरिमा का अधिकार एक अंदरूनी, अलंघनीय और हर जगह मौजूद अधिकार है, जो उस व्यक्ति को भी दिया जाता है जिसे राज्य ने गैर-कानूनी तरीके से गिरफ्तार और हिरासत में लिया हो।</p>
<p style="text-align:justify;">खंडपीठ ने प्रेमा देवी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/170786/full-state-responsibility-for-prisoner-suicide"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/allahabad-high-court2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने हाल ही में कहा कि राज्य अपनी कस्टडी में किसी कैदी की अप्राकृतिक मौत के लिए पूरी तरह से ज़िम्मेदार है, भले ही मौत साफ़ तौर पर अप्राकृतिक आत्महत्या हो।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस शेखर बी सराफ और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने फैसला सुनाया कि भारत के संविधान के आर्टिकल 21 के तहत गारंटी वाला जीवन और इंसानी गरिमा का अधिकार एक अंदरूनी, अलंघनीय और हर जगह मौजूद अधिकार है, जो उस व्यक्ति को भी दिया जाता है जिसे राज्य ने गैर-कानूनी तरीके से गिरफ्तार और हिरासत में लिया हो।</p>
<p style="text-align:justify;">खंडपीठ ने प्रेमा देवी की रिट पिटीशन को मंज़ूरी दे दी, जिसमें उन्होंने पीलीभीत ज़िला जेल में अपने नाबालिग बेटे की अप्राकृतिक मौत के लिए मुआवज़े की मांग की थी। जवाब देने वालों को तीन हफ़्ते के अंदर मृतक के कानूनी वारिसों को दस लाख रुपये का मुआवज़ा देने का निर्देश देते हुए बेंच ने यूपी सरकार से मुआवज़ा तय करने के लिए गाइडलाइन बनाने को भी कहा।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;">याचिकाकर्ता का बेटा POCSO केस में अंडरट्रायल था। वह 20 फरवरी, 2024 को सुसाइड कर गया। वह जेल के टॉयलेट के वेंटिलेटर से लटका हुआ मिला। नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन (NHRC) ने पहले ₹3,00,000/- के मुआवजे की सिफारिश की थी। हालांकि, अधिकारियों के कोई कार्रवाई न करने के कारण यह पेमेंट नहीं किया गया। इसलिए याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।</p>
<p style="text-align:justify;">यह साफ तौर पर दावा किया गया कि मृतक को पुलिस वालों ने टॉर्चर किया, क्योंकि इस तरह के टॉर्चर से राहत के लिए गैर-कानूनी पैसे की मांग पूरी नहीं की गई, जिसके कारण आखिरकार उसकी अननैचुरल मौत हो गई।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरी ओर, राज्य ने तर्क दिया कि मृतक ने खुद को फांसी लगाकर जान दी। यह कहा गया कि यह घटना सुसाइड थी और रिकॉर्ड में ऐसा कोई मटीरियल नहीं था जिससे पता चले कि रेस्पोंडेंट अथॉरिटीज़ की तरफ से कोई लापरवाही, गलत काम या शामिल था। यह भी कहा गया कि एक बार पहचान का प्रोसेस पूरा हो जाने और सरकार से ज़रूरी बजट मिल जाने के बाद मंज़ूर किया गया मुआवज़ा कानून के हिसाब से जारी कर दिया जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि, खंडपीठ  ने ज़िम्मेदारी से बचने की राज्य की कोशिश खारिज की, क्योंकि उसने कहा कि कस्टोडियल डेथ इंडियन जस्टिस सिस्टम में फंडामेंटल राइट्स की सुरक्षा के लिए सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक है।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस सराफ ने बेंच के लिए लिखते हुए कहा कि यह 'हैरान करने वाली' बात है कि हमारे भारतीय संविधान में गैर-कानूनी हिरासत या कस्टोडियल डेथ के लिए मुआवज़ा देने का कोई साफ़ आदेश नहीं है। कोर्ट ने आगे कहा कि अगर कस्टडी में मौत नेचुरली होती है तो राज्य को इसके लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता। हालांकि, अगर मौत अप्राकृतिक हुई है तो राज्य अपने उस काम/चूक के लिए पूरी तरह से ज़िम्मेदार है जिसके कारण किसी व्यक्ति की मौत हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रुदुल साह बनाम बिहार राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले पर भी भरोसा किया, जिसमें कहा गया कि बुनियादी अधिकारों से वंचित करने पर मुआवज़े का आदेश देने से इनकार करना आज़ादी के अधिकार के प्रति सिर्फ़ दिखावटी वादा करना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने नीलाबती बेहरा बनाम उड़ीसा राज्य और डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को भी ध्यान में रखा, जिसमें यह कहा गया कि पैसे की भरपाई स्ट्रिक्ट लायबिलिटी के सिद्धांत पर आधारित एक सही और असरदार उपाय है, जिसके लिए सॉवरेन इम्यूनिटी का बचाव मौजूद नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">खास तौर पर मुआवज़े की रकम तय करते समय कोर्ट ने मेघालय हाईकोर्ट के एक फैसले (सुओ मोटो कस्टोडियल वायलेंस) की जांच की, जिसमें पीड़ित की उम्र के आधार पर मुआवज़े को कैटेगरी में बांटा गया। हालांकि, डिवीजन बेंच ने इसे आधिकारिक मिसाल के तौर पर मानने से यह देखते हुए इनकार किया कि उस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने मेघालय राज्य बनाम किलिंग जाना में रोक लगा दी थी।</p>
<p style="text-align:justify;"> लेकिन मरने वाले की अप्राकृतिक मौत के लिए राज्य पूरी तरह से ज़िम्मेदार है।खंडपीठ ने कहा, "...पुलिस की कस्टडी में किसी कैदी की मौत के लिए राज्य की ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है। कोई भी राज्य कैदियों को बेहतर सुविधाएं देने की अपनी ज़िम्मेदारियों से बच नहीं सकता। इसलिए इस मामले में कस्टोडियल डेथ का मामला बनता है।" इसे देखते हुए कोर्ट ने यह नतीजा निकाला कि यह संवैधानिक सुरक्षा का साफ़ उल्लंघन था, जिसके लिए संविधान के आर्टिकल 226 के तहत दखल देना ज़रूरी है। इसलिए कोर्ट ने रिट पिटीशन मंज़ूर कर ली और राज्य को तीन हफ़्ते के अंदर कानूनी वारिसों को मुआवज़े के तौर पर ₹10,00,000 देने का निर्देश दिया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 21 Feb 2026 22:02:46 +0530</pubDate>
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