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                <title>इलाहाबाद हाईकोर्ट - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>इलाहाबाद हाईकोर्ट RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>संगमरमर मस्जिद मामले में हाईकोर्ट की सुनवाई, 6 जुलाई तक ध्वस्तीकरण पर रोक बरकरार।</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
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<div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात।</strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>प्रयागराज। </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">बइलाहाबाद हाईकोर्ट में शुक्रवार को प्रयागराज जंक्शन सिटी साइड स्थित संगमरमर मस्जिद को लेकर दाखिल याचिका पर महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। मस्जिद कमेटी की ओर से ध्वस्तीकरण कार्रवाई को चुनौती देते हुए कोर्ट में अपना पक्ष रखा गया। मामले की सुनवाई के बाद अदालत ने अगली तारीख 6 जुलाई निर्धारित करते हुए तब तक ध्वस्तीकरण कार्रवाई पर अंतरिम रोक जारी रखने का आदेश दिया।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष की ओर से अदालत में कहा गया कि यदि रेलवे परियोजना के तहत मस्जिद को हटाना आवश्यक है, तो प्रशासन पहले मस्जिद के लिए वैकल्पिक भूमि उपलब्ध कराए। साथ</div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/179331/the-ban-on-demolition-remains-in-place-till-july-6"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/img-20260515-wa0110.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div>
<div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात।</strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>प्रयागराज। </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बइलाहाबाद हाईकोर्ट में शुक्रवार को प्रयागराज जंक्शन सिटी साइड स्थित संगमरमर मस्जिद को लेकर दाखिल याचिका पर महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। मस्जिद कमेटी की ओर से ध्वस्तीकरण कार्रवाई को चुनौती देते हुए कोर्ट में अपना पक्ष रखा गया। मामले की सुनवाई के बाद अदालत ने अगली तारीख 6 जुलाई निर्धारित करते हुए तब तक ध्वस्तीकरण कार्रवाई पर अंतरिम रोक जारी रखने का आदेश दिया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष की ओर से अदालत में कहा गया कि यदि रेलवे परियोजना के तहत मस्जिद को हटाना आवश्यक है, तो प्रशासन पहले मस्जिद के लिए वैकल्पिक भूमि उपलब्ध कराए। साथ ही यह भी मांग की गई कि मस्जिद हटाए जाने की स्थिति में क्षतिपूर्ति के रूप में दूसरी उपयुक्त जमीन दी जाए, ताकि धार्मिक स्थल को दूसरी जगह स्थापित किया जा सके।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि संगमरमर मस्जिद लंबे समय से इलाके में मौजूद है और स्थानीय लोगों की आस्था का केंद्र रही है। उनका कहना था कि बिना उचित पुनर्वास व्यवस्था के ध्वस्तीकरण कार्रवाई करना न्यायोचित नहीं होगा। वहीं प्रशासन और रेलवे से जुड़े पक्षों ने परियोजना की आवश्यकता और विकास कार्यों का हवाला देते हुए अपना पक्ष रखा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">गौरतलब है कि प्रयागराज जंक्शन के सिटी साइड क्षेत्र में रेलवे परियोजना और यातायात विस्तार कार्यों को लेकर कई निर्माण चिह्नित किए गए हैं। इन्हीं के बीच संगमरमर मस्जिद का मामला भी विवाद का विषय बना हुआ है। मस्जिद को हटाने की संभावित कार्रवाई के खिलाफ मस्जिद कमेटी ने हाईकोर्ट की शरण ली थी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अदालत के अंतरिम आदेश के बाद फिलहाल मस्जिद पर किसी प्रकार की ध्वस्तीकरण कार्रवाई नहीं की जाएगी। अब सभी पक्षों की नजर 6 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी है, जहां मामले में आगे की कानूनी दिशा तय हो सकती है। </div>
</div>
<div class="yj6qo" style="text-align:justify;"> </div>
<div class="adL" style="text-align:justify;"> </div>
</div>
</div>
</div>
<div class="hq gt"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 16 May 2026 17:43:33 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title> स्व गणना अभियान में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश, सहित  कई न्याय मूर्तियों ने स्व-गणना की और सभी को स्व-गणन के लिए प्रेरित किया ।</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div>
<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>स्व गणना अभियान में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली, न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा, न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह, न्यायमूर्ति एम.सी. त्रिपाठी एवं न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन द्वारा स्व-गणना की गई एवं इसी दौरान सभी को स्व-गणना करने के लिए प्रेरित किया गया।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">इस अवसर पर निदेशक एवं मुख्य प्रधान जनगणना अधिकारी, जिलाधिकारी / प्रमुख जनगणना अधिकारी प्रयागराज, नगर आयुक्त / अपर प्रमुख जनगणना अधिकारी प्रयागराज, अपर नगर आयुक्त / नगर जनगणना अधिकारी तथा अपर जिलाधिकारी (एफ/आर) / जिला जनगणना अधिकारी प्रयागराज  की उपस्थिति रही एवं आभार व्यक्त किया गया।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">साथ ही सभी प्रदेशवासियों से अपील की गई कि</div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/179093/under-the-self-enumeration-campaign--the-chief-justice-and-several-justices-of-the-allahabad-high-court-completed-their-self-enumeration-and-encouraged-everyone-to-do-the-same"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/img-20260511-wa0105.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div>
<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>स्व गणना अभियान में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली, न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा, न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह, न्यायमूर्ति एम.सी. त्रिपाठी एवं न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन द्वारा स्व-गणना की गई एवं इसी दौरान सभी को स्व-गणना करने के लिए प्रेरित किया गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस अवसर पर निदेशक एवं मुख्य प्रधान जनगणना अधिकारी, जिलाधिकारी / प्रमुख जनगणना अधिकारी प्रयागराज, नगर आयुक्त / अपर प्रमुख जनगणना अधिकारी प्रयागराज, अपर नगर आयुक्त / नगर जनगणना अधिकारी तथा अपर जिलाधिकारी (एफ/आर) / जिला जनगणना अधिकारी प्रयागराज  की उपस्थिति रही एवं आभार व्यक्त किया गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">साथ ही सभी प्रदेशवासियों से अपील की गई कि वे स्व-गणना पोर्टल पर जाकर स्व-गणना कर सकते हैं तथा स्व-गणना उपरांत प्राप्त SEID को सुरक्षित रखें एवं प्रगणक के घर आने पर उनसे साझा करें।</div>
</div>
<div class="yj6qo" style="text-align:justify;"> </div>
<div class="adL"> </div>
</div>
</div>
</div>
<div class="hq gt"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 12 May 2026 20:54:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>गोविंद नगरके ब्लॉक-8 पार्क पर कब्जे की कोशिश के खिलाफ डीएम से कार्यवाही मांग</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>कानपुर।</strong> गोविन्द नगर स्थित ब्लॉक-8 के सार्वजनिक पार्क पर कथित अवैध कब्जों और निर्माण का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। भाजपा नेता एवं सामाजिक कार्यकर्ता प्रकाश वीर आर्य ने जिलाधिकारी कानपुर को शिकायती पत्र देकर हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद पार्क में हो रहे नए निर्माण एवं मूर्ति स्थापना पर तत्काल रोक लगाने की मांग की है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">  शिकायत में आरोप लगाया गया है कि नगर निगम और संबंधित अधिकारियों की लापरवाही के चलते पार्क के लगभग 70% हिस्से पर कब्जा हो चुका है तथा वहां अवैध निर्माण एवं धार्मिक संरचनाएं खड़ी कर दी गई हैं। कई बार IGRS</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ज्ञापन</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178854/demand-for-action-from-dm-against-attempt-to-capture-block-8"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/1001895508.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>कानपुर।</strong> गोविन्द नगर स्थित ब्लॉक-8 के सार्वजनिक पार्क पर कथित अवैध कब्जों और निर्माण का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। भाजपा नेता एवं सामाजिक कार्यकर्ता प्रकाश वीर आर्य ने जिलाधिकारी कानपुर को शिकायती पत्र देकर हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद पार्क में हो रहे नए निर्माण एवं मूर्ति स्थापना पर तत्काल रोक लगाने की मांग की है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> शिकायत में आरोप लगाया गया है कि नगर निगम और संबंधित अधिकारियों की लापरवाही के चलते पार्क के लगभग 70% हिस्से पर कब्जा हो चुका है तथा वहां अवैध निर्माण एवं धार्मिक संरचनाएं खड़ी कर दी गई हैं। कई बार IGRS पर शिकायतें किए जाने के बावजूद नगर निगम द्वारा “पुराना निर्माण” बताकर फर्जी निस्तारण किया जाता रहा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> प्रकाश वीर आर्य ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के 22 अप्रैल 2026 के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि न्यायालय ने स्वयं पार्क भूमि पर हुए निर्माण पर गंभीर टिप्पणी की थी तथा समस्त अतिक्रमण हटाकर पार्क को मूल स्वरूप में बहाल करने के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद वर्तमान में फिर से निर्माण और मूर्ति स्थापना कर कब्जा बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है, जो न्यायालय की अवमानना है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ज्ञापन में मांग की गई है कि पार्क से सभी अवैध कब्जे हटाए जाएं, नगर निगम द्वारा कराई गई इंटरलॉकिंग हटाकर पार्क को हरित क्षेत्र के रूप में विकसित किया जाए तथा दोषी अधिकारियों और अतिक्रमणकारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 10 May 2026 13:16:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, कहा- वकीलों के कब्जे हटाने के लिए दें पर्याप्त पुलिस फोर्स </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने कैसरबाग स्थित जनपद न्यायालय के आसपास वकीलों की ओर से किए गए कब्जों पर सख्त रुख जारी रखा है। कोर्ट ने जिला प्रशासन को निर्देश दिया है कि इन कब्जों को हटाने के लिए नगर निगम को पर्याप्त पुलिस फोर्स उपलब्ध कराए। मामले में 25 मई को होने वाली अगली सुनवाई पर अधिकारियों से कार्रवाई रिपोर्ट भी पेश करने के लिए कहा है। न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति राजीव भारती की खंडपीठ ने यह आदेश अनुराधा सिंह और दो अन्य की याचिका पर दिया।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">मामले में नगर निगम की ओर से दाखिल</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178827/high-courts-big-decision-provide-adequate-police-force-to-remove"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/image-2026-05-08t120542.964.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने कैसरबाग स्थित जनपद न्यायालय के आसपास वकीलों की ओर से किए गए कब्जों पर सख्त रुख जारी रखा है। कोर्ट ने जिला प्रशासन को निर्देश दिया है कि इन कब्जों को हटाने के लिए नगर निगम को पर्याप्त पुलिस फोर्स उपलब्ध कराए। मामले में 25 मई को होने वाली अगली सुनवाई पर अधिकारियों से कार्रवाई रिपोर्ट भी पेश करने के लिए कहा है। न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति राजीव भारती की खंडपीठ ने यह आदेश अनुराधा सिंह और दो अन्य की याचिका पर दिया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मामले में नगर निगम की ओर से दाखिल रिपोर्ट के अनुसार संबंधित क्षेत्र में 72 अतिक्रमण पाए गए हैं। इनमें ज्यादातर अधिवक्ताओं के चैंबर और अवैध दुकानें हैं। इससे पहले कोर्ट ने नगर निगम को आदेश दिया था कि इन कब्जों को हटाने के लिए जो भी आवश्यक कदम उठाए गए हैं, उन्हें तार्किक अंत तक पहुंचाया जाए। यह भी कहा था कि इसके लिए पुलिस बल की जरूरत हो तो नगर निगम को तत्काल उपलब्ध कराया जाए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बुधवार को हुई सुनवाई में राज्य सरकार के मुख्य स्थायी अधिवक्ता शैलेंद्र कुमार सिंह ने डीसीपी (मुख्यालय) और डीसीपी ( पश्चिम) समेत लखनऊ के अतिरिक्त पुलिस आयुक्त (पश्चिमी) के पत्र पेश किए। इनमें वे कारण बताए गए थे, जिनकी वजह से अतिक्रमण हटाने के लिए नगर निगम के अफसरों को पुलिस बल उपलब्ध नहीं कराया जा सका।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नगर निगम की ओर से अतिक्रमण हटाने के लिए 12 मई की नई तारीख तय करने की जानकारी कोर्ट को दी गई। इस पर अदालत ने कहा कि इन पत्रों से स्पष्ट है कि कुछ अपरिहार्य वजहों से 25 अप्रैल को पुलिस बल मुहैया नहीं कराया जा सका, लेकिन अगली तय तिथि पर अवैध निर्माण, अतिक्रमण हटाने के लिए नगर निगम को समुचित पुलिस बल मुहैया कराया जाएगा। अदालत ने इसके लिए जरूरी कदम उठाने और कार्रवाई से अवगत कराने के लिए 15 दिन का समय दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मामले में अदालत ने पहले कहा था कि जनपद न्यायालय, पुराना हाईकोर्ट परिसर, कलेक्ट्रेट, राजस्व परिषद, पुराना सदर तहसील परिसर, उप-निबंधक कार्यालय, मंडलायुक्त कार्यालय, रेजिडेंसी पावर सब स्टेशन, बलरामपुर अस्पताल, कैसरबाग बस अड्डा व टेढ़ी कोठी के आसपास रहने वाले लोग वकीलों के कब्जों से बुरी तरह त्रस्त हैं। न्यायालय ने संज्ञान में लाई गई घटना का भी जिक्र किया था, जिसमें इस इलाके में अतिक्रमण के कारण एंबुलेंस नहीं निकल सकी थी। इस कारण एंबुलेंस में मौजूद मरीज की मौत हो गई थी।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 09 May 2026 22:17:48 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>'प्रयागराज में समानांतर मेडिकल इंडस्ट्री चला रहे हैं सरकारी डाॅक्टर'- इलाहाबाद हाईकोर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज। </strong>इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्राइवेट प्रैक्टिस करने वाले मोतीलाल नेहरू (एमएलएन) मेडिकल काॅलेज प्रयागराज के डाॅक्टरों की उच्च स्तरीय जांच करा कर कार्रवाई करने का निर्देश मुख्य सचिव को दिया है। साथ ही कहा है कि मुख्य सचिव स्वरूपरानी नेहरू (एसआरएन) अस्पताल में फंड की उपलब्धता के बावजूद पिछले 20 साल से निर्माणाधीन कार्डियोलॉजी भवन की मानीटरिंग करें।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने टिप्पणी की कि स्वरूपरानी नेहरू अस्पताल की हालत फंड व सुविधाओं की कमी के कारण नहीं बल्कि प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर व लेक्चररों के अस्पताल में मरीजों का इलाज करने के बजाय प्राइवेट अस्पतालों में करने के कारण खराब</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178553/government-doctors-are-running-parallel-medical-industry-in-prayagraj"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/399626--.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज। </strong>इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्राइवेट प्रैक्टिस करने वाले मोतीलाल नेहरू (एमएलएन) मेडिकल काॅलेज प्रयागराज के डाॅक्टरों की उच्च स्तरीय जांच करा कर कार्रवाई करने का निर्देश मुख्य सचिव को दिया है। साथ ही कहा है कि मुख्य सचिव स्वरूपरानी नेहरू (एसआरएन) अस्पताल में फंड की उपलब्धता के बावजूद पिछले 20 साल से निर्माणाधीन कार्डियोलॉजी भवन की मानीटरिंग करें।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने टिप्पणी की कि स्वरूपरानी नेहरू अस्पताल की हालत फंड व सुविधाओं की कमी के कारण नहीं बल्कि प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर व लेक्चररों के अस्पताल में मरीजों का इलाज करने के बजाय प्राइवेट अस्पतालों में करने के कारण खराब है। ये सरकारी डाक्टर प्रयागराज में समानांतर मेडिकल इंडस्ट्री चला रहे हैं। प्राइवेट नर्सिंग होम में ले जाकर मरीजों की सर्जरी करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">याचिका की अगली सुनवाई की तिथि 26 मई नियत करते हुए कोर्ट ने मुख्य सचिव से कृत कार्रवाई की जानकारी मांगी है। यह आदेश न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल ने मोतीलाल नेहरू मेडिकल काॅलेज के डाॅक्टर अरविंद गुप्ता की याचिका की सुनवाई करते हुए दिया है। इनके खिलाफ प्राइवेट प्रैक्टिस में लापरवाही बरतने को लेकर उपभोक्ता फोरम ने कार्यवाही की थी, जिसे याचिका में चुनौती दी गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने अपर मुख्य स्थाई अधिवक्ता से कहा है कि अस्पताल के पक्ष में जमीन स्थानांतरित करने संबंधी कैबिनेट के अनुमोदन की जानकारी दें। अपर मुख्य स्थाई अधिवक्ता सुरेश सिंह ने कोर्ट को बताया कि स्वरूपरानी नेहरू अस्पताल के लिए 31,314 वर्गमीटर जमीन स्थानांतरित करने के लिए सभी विभागों से अनापत्ति प्राप्त हो गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्राचार्य डा विनोद कुमार पांडेय ने ब्वायज व गर्ल्स हास्टल के बारे में बताया कि भवन जर्जर है। खाली करने की नोटिस दी गई है। भवन ध्वस्त कर पुनर्निर्माण कराया जायेगा।कोर्ट ने आश्चर्य प्रकट किया कि दो मंजिला कार्डियोलॉजी भवन का निर्माण 2006 मे शुरू हुआ राजकीय निर्माण निगम निर्माण कर रहा। सरकार ने फंड मुहैया कराया है। अभी भी प्रोजेक्ट पूरा नहीं हो सका। इसपर बताया गया कि अगस्त 26 मे तैयार होकर क्रियाशील हो जायेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट को बताया गया कि प्राइवेट प्रैक्टिस करने वाले एसोसिएट प्रोफेसर डा संतोष कुमार सिंह व उनकी पत्नी डा एलाक्षी शुक्ला के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। जो एक्यूला हास्पिटल की डायरेक्टर हैं। जहां पर डा संतोष कुमार सिंह मरीज लेजाकर सर्जरी करते हैं। जिसे कोर्ट ने गंभीरता से लिया है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 07 May 2026 22:17:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>'फॉर्च्युनर के लिए महिला की जान ले ली और  आरोपी पति को जमानत दे दी'</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज- </strong>दहेज के लिए पत्नी की गला घोंटकर हत्या करने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे गंभीर अपराध के आरोपी पति को जमानत देते वक्त हाईकोर्ट ने तथ्यों को पर गौर नहीं किया और सिर्फ इस आधार पर जमानत दे दी कि एफआईआर दर्ज करने में देरी हुई.</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने इस बात पर भी चिंता जताई कि पिछले कुछ सालों में दहेज की वजह से शादीशुदा महिलाओं के साथ क्रूरता, हत्या और आत्महत्या जैसे मामलों में</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178549/woman-killed-for-fortuner-and-accused-husband-granted-bail"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/images245.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज- </strong>दहेज के लिए पत्नी की गला घोंटकर हत्या करने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे गंभीर अपराध के आरोपी पति को जमानत देते वक्त हाईकोर्ट ने तथ्यों को पर गौर नहीं किया और सिर्फ इस आधार पर जमानत दे दी कि एफआईआर दर्ज करने में देरी हुई.</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने इस बात पर भी चिंता जताई कि पिछले कुछ सालों में दहेज की वजह से शादीशुदा महिलाओं के साथ क्रूरता, हत्या और आत्महत्या जैसे मामलों में बढ़ोतरी हुई है. उन्होंने कहा कि खासतौर पर ऐसे मामले उत्तर प्रदेश में देखे गए हैं. कोर्ट ने कहा कि 2023 के डेटा के अनुसार दुनियाभर में 6,156 मामले दर्ज किए गए, जिनमें से 2,122 उत्तर प्रदेश और 1,143 बिहार के हैं.</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, 'हमें यह देखकर अत्यंत दुख हुआ कि हाईकोर्ट ने दहेज हत्या जैसे संगीन अपराध में आरोपी को जमानत देते वक्त तथ्यों पर गौर नहीं किया. हमारा मानना है कि कोर्ट ने अभियुक्तों के पक्ष में अपने विवेक का प्रयोग करने में घोर त्रुटि की है.' कोर्ट ने कहा कि यह मामला महिलाओं के साथ दहेज को लेकर बढ़ती क्रूरता को दर्शाता है.</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;">यह मामला साल 2024 का है, जब दहेज के लिए गाजियाबाद में एक महिला की हत्या कर दी गई थी. महिला की शादी फरवरी, 2019 में प्रिंस चौधरी नाम के शख्स से हुई थी. महिला के पिता ने एफआईआर में बताया कि उन्होंने शादी में 30 लाख रुपये खर्च किए, जिसमें एक आई20 कार और 10 लाख रुपये कैश शामिल हैं. कार एक एक्सीडेंट में डैमेज हो गई थी, जिसके बाद महिला का पति और ससुराल वाले एक फॉर्च्युनर कार और 10 लाख रुपये की डिमांड करने लगे.</p>
<p style="text-align:justify;">शिकायत के अनुसार जब ये मांग पूरी नहीं हुईं तो ससुरालवालों ने महिला का मारना शुरू कर दिया, उसको मानसिक उत्पीड़न का शिकार बनाया गया. बाद में महिला के पिता ने 10 लाख रुपये की डिमांड पूरी कर दी. उन्होंने पति के रिश्तेदार के अकाउंट में 4 लाख रुपये ट्रांसफर किए और अलग-अलग मौकों पर 5 लाख रुपये कैश भी दिया. फिर भी ससुराल वाले महिला के साथ मारपीट करते रहे.</p>
<p style="text-align:justify;">शिकायत के अनुसार 11 जुलाई, 2024 को सुबह 7 बजे महिला ने रोते हुए पिता को फोन किया और बताया कि ससुराल में उसके साथ बहुत मारपीट हुई और उसको गला घोंटकर या फांसी लगाकर मारने की धमकी दी जा रही है. कुछ घंटे बाद महिला के घरवालों को एक रिश्तेदार ने फोन करके बताया कि उसको गला घोंटकर फांसी लगा दी गई है. जब महिला के पिता ससुराल पहुंचे तो वह वहां नहीं थी, उसको हॉस्पिटल ले जाया गया था, जहां पता चला कि वह मर चुकी है.</p>
<p style="text-align:justify;">हादसे के अगले ही दिन शिकायत दर्ज कर दी गई, जिसमें प्रिंस सहित 8 घरवालों को आरोपी बनाया गया. जांच के बाद प्रिंस और उसके माता पिता के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता और दहेज निषेध अधिनयम के तहत चार्जशीट दाखिल हुई.</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 07 May 2026 22:12:48 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>तत्कालीन BJP MLA आरसी यादव के खिलाफ 2012 के दंगा मामले को वापस लेने की हाईकोर्ट ने दी अनुमति</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसमें राज्य सरकार के उस आवेदन को खारिज किया गया था, जिसमें 2012 की मूर्ति विसर्जन दंगा घटना के संबंध में BJP विधायक (रुदौली से) राम चंद्र यादव के खिलाफ आपराधिक मुकदमा वापस लेने की मांग की गई थी। मुकदमा वापस लेने के राज्य का अनुरोध स्वीकार करते हुए जस्टिस राजीव सिंह की पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि ट्रायल कोर्ट के समक्ष पब्लिक प्रॉसिक्यूटर का आवेदन "रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री पर सावधानीपूर्वक विचार करने के बाद सद्भावना में" दायर किया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">यह आदेश विधायक</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178543/high-court-gives-permission-to-withdraw-2012-riots-case-against"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/hindi-divas1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसमें राज्य सरकार के उस आवेदन को खारिज किया गया था, जिसमें 2012 की मूर्ति विसर्जन दंगा घटना के संबंध में BJP विधायक (रुदौली से) राम चंद्र यादव के खिलाफ आपराधिक मुकदमा वापस लेने की मांग की गई थी। मुकदमा वापस लेने के राज्य का अनुरोध स्वीकार करते हुए जस्टिस राजीव सिंह की पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि ट्रायल कोर्ट के समक्ष पब्लिक प्रॉसिक्यूटर का आवेदन "रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री पर सावधानीपूर्वक विचार करने के बाद सद्भावना में" दायर किया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">यह आदेश विधायक यादव द्वारा दायर CrPC की धारा 482 के तहत याचिका और उत्तर प्रदेश राज्य द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया गया। संक्षेप में मामला अभियोजन पक्ष के मूल मामले के अनुसार, 24 अक्टूबर, 2012 को मूर्तियां विसर्जन के लिए ले जा रहे कुछ ट्रैक्टरों के कारण रुदौली पुलिस स्टेशन के सामने ट्रैफिक जाम हो गया। हालांकि, पुलिस ने ड्राइवरों को आगे बढ़ने का निर्देश दिया, लेकिन उन्होंने इसका पालन नहीं किया।</p>
<p style="text-align:justify;">यह दावा किया गया कि आवेदक उस समय स्थानीय विधायक थे। उन्होंने उन्हें निर्देश दिया था कि वे मूर्तियों को वहीं रोककर रखें, जब तक कि वह पुलिस स्टेशन के सामने न पहुंच जाएं। इसके कारण, घटनास्थल पर भारी भीड़ जमा हो गई। इसके बाद जब विधायक यादव घटनास्थल पर पहुंचे तो उन्होंने पुलिस को बताया कि जब श्रद्धालु एक मस्जिद के पास से गुजर रहे थे, तो दूसरे समुदाय का एक लड़का गलती से रंग से सराबोर हो गया। कथित तौर पर इसके कारण गाली-गलौज और झगड़ा हुआ, जिसके दौरान एक मूर्ति भी टूट गई।</p>
<p style="text-align:justify;">एफआईआर  में आरोप लगाया गया कि आवेदक ने भड़काऊ बयान दिए। यह मांग की कि जुलूस आगे बढ़ने से पहले दोषियों को दंडित किया जाए। हालांकि, बाद में उनकी सलाह पर ट्रैक्टरों की आवाजाही शुरू हो गई, लेकिन तब तक गाँव में लगभग 2,000 से 3,000 लोग जमा हो चुके थे। इसके बाद आवेदक की कथित उकसाहट पर 250-300 लोग उस गाँव की ओर बढ़ने लगे, जहां दूसरे समुदाय के लोगों के साथ विवाद हुआ था।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;">शुरुआत में, बेंच ने CrPC की धारा 321 के प्रावधानों के साथ-साथ इस प्रावधान पर सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों की जांच करते हुए पाया कि मुकदमा वापस लेने की अनुमति देने के लिए अंतिम मार्गदर्शक विचार हमेशा न्याय प्रशासन का हित ही होना चाहिए। बंसी लाल बनाम चंदन लाल और शिवनंदन पासवान बनाम बिहार राज्य जैसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि एक पब्लिक प्रॉसिक्यूटर को स्वतंत्र रूप से अपने विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए और किसी गलत मकसद से न्याय की सामान्य प्रक्रिया में दखल नहीं देना चाहिए। CrPC की धारा 482 के तहत अर्जी, मुकदमा वापस लेने की अर्जी, और साथ ही आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार की गई।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 07 May 2026 22:04:00 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>सुप्रीम कोर्ट के राडार पर 'इलाहाबाद हाईकोर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>सुप्रीम कोर्ट ने आज इलाहाबाद हाईकोर्ट से सवाल किया कि उसने एक ऐसे व्यक्ति को ज़मानत क्यों दी, जिस पर पहली नज़र में दहेज हत्या के आरोप हैं। कोर्ट ने आरोपी पति की ज़मानत रद्द कर दी और उसे एक हफ़्ते के अंदर सरेंडर करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि ट्रायल एक साल के अंदर पूरा किया जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच, मृतक के पिता द्वारा दायर एक स्पेशल लीव पिटीशन पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा पति को दी गई ज़मानत को चुनौती</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177743/allahabad-high-court-on-the-radar-of-supreme-court"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/images-(3)3.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>सुप्रीम कोर्ट ने आज इलाहाबाद हाईकोर्ट से सवाल किया कि उसने एक ऐसे व्यक्ति को ज़मानत क्यों दी, जिस पर पहली नज़र में दहेज हत्या के आरोप हैं। कोर्ट ने आरोपी पति की ज़मानत रद्द कर दी और उसे एक हफ़्ते के अंदर सरेंडर करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि ट्रायल एक साल के अंदर पूरा किया जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच, मृतक के पिता द्वारा दायर एक स्पेशल लीव पिटीशन पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा पति को दी गई ज़मानत को चुनौती दी गई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">शुरुआत में, कोर्ट ने पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट देखी, जिसमें बताया गया था कि मृतक की गर्दन के आस-पास चोट के निशान थे। जब कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के वकील से इस बारे में पूछा, तो उन्होंने जवाब दिया कि वे एक काउंटर-एफ़िडेविट (जवाबी हलफ़नामा) दायर करेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस पारदीवाला ने कहा: "इस तरह के आरोपों और शादी के सात साल के अंदर हुई मौत के मामले में, आपको ज़मानत क्यों दी जानी चाहिए? वकील साहब, मुद्दे पर बात करें, कमज़ोर दलीलें न दें, वरना हम यहीं और अभी आपकी ज़मानत रद्द कर देंगे। आप पर दहेज हत्या का आरोप है, और आपकी पत्नी आपके ही घर में संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाई गई थी। उसके शरीर पर बाहरी चोट के निशान थे। आप अपनी पत्नी की मौत के बारे में क्या सफ़ाई देंगे?"</p>
<p style="text-align:justify;">इसके बाद जस्टिस पारदीवाला ने हाई कोर्ट से सवाल किया: "इस हाई कोर्ट में क्या दिक्कत है, यह हमारी समझ से बाहर है। जिन मामलों में ज़मानत नहीं दी जानी चाहिए, उनमें भी ज़मानत दे दी जाती है।"</p>
<p style="text-align:justify;">राज्य सरकार के वकील ने कोर्ट से अनुरोध किया कि वह इस बात पर भी विचार करे कि आरोपी 18 महीने से हिरासत में है। इस पर, जस्टिस पारदीवाला ने मौखिक रूप से टिप्पणी की: "आप कुछ कहना चाहते हैं, मिस्टर वकील साहब? यह हत्या का मामला है। 304B, हाँ। उसकी गला घोंटकर हत्या की गई है; क्या आप चाहते हैं कि हम इसे करके दिखाएँ? पेज 31 [पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का] पर आइए।"</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने ज़मानत रद्द करने का आदेश दिया। अपने आदेश में, कोर्ट ने कहा कि शादी फरवरी 2019 में हुई थी और पत्नी की अप्राकृतिक मौत जुलाई 2024 में हुई। कोर्ट ने आगे कहा कि यह बात निर्विवाद है कि मृतक की मौत शादी के सात साल के अंदर हुई थी और आरोप दहेज से जुड़ी मौत के हैं। ऐसे हालात में, हाई कोर्ट को भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 113B के तहत अनुमान को ध्यान में रखना चाहिए था।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का भी संज्ञान लिया, जिसमें मृतक के शरीर पर मौत से पहले लगी चोटों का ज़िक्र था।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने साफ़ किया कि वह मामले के गुण-दोष पर आगे कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता, क्योंकि अभी मुक़दमा चल रहा है और अब तक सिर्फ़ एक गवाह की ही गवाही हुई है। हालाँकि, कुल मिलाकर हालात को देखते हुए, कोर्ट इस बात से संतुष्ट था कि ज़मानत देने वाला विवादित आदेश क़ानून की नज़र में सही नहीं है। इसलिए, प्रतिवादी को दी गई ज़मानत रद्द कर दी गई।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रतिवादी को निर्देश दिया गया कि वह एक हफ़्ते के अंदर जेल अधिकारियों के सामने आत्मसमर्पण करे। ट्रायल कोर्ट को भी निर्देश दिया गया है कि वह एक साल के अंदर मुक़दमा पूरा करने की कोशिश करे।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी जज ने तब भी निराशा ज़ाहिर की थी, जब हाई कोर्ट ने दहेज से जुड़ी मौत के एक मामले में, पहली नज़र में लगे आरोपों पर विचार किए बिना, अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए ज़मानत दे दी थी। इसके बाद, हाई कोर्ट के उस जज ने हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस से अनुरोध किया कि उन्हें ज़मानत से जुड़े मामलों की ज़िम्मेदारी न दी जाए, और सुप्रीम कोर्ट की आलोचना को "हतोत्साहित करने वाला" बताया।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने पिछले साल एक अनोखा आदेश दिया था। उन्होंने हाई कोर्ट के एक दूसरे जज के आदेश पर आपत्ति जताई थी, जिसमें पैसे की वसूली के लिए सिविल उपाय के प्रभावी न होने के आधार पर एक आपराधिक शिकायत को रद्द करने से इनकार कर दिया गया था। बेंच ने कड़ी टिप्पणियाँ करते हुए कहा कि उक्त जज से उनके रिटायरमेंट तक आपराधिक क्षेत्राधिकार वापस ले लिया जाना चाहिए और उन्हें हाई कोर्ट के किसी अनुभवी वरिष्ठ जज के साथ एक डिवीज़न बेंच में बैठाया जाना चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 23:10:18 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>महाकुंभ भगदड़: हाईकोर्ट ने कहा—मुआवजा दावों का फैसला 30 दिन में जिला प्रशासन करे, आयोग नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><span style="font-family:mangal, serif;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong></span>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जनवरी 2025 के महाकुंभ मेला भगदड़ मामले में स्पष्ट किया है कि पीड़ितों को अनुग्रह (ex gratia) मुआवजा देने के दावों का निपटारा राज्य द्वारा गठित न्यायिक जांच आयोग नहीं, बल्कि जिला प्रशासन और मेला प्राधिकरण द्वारा किया जाएगा, और यह प्रक्रिया 30 दिनों के भीतर पूरी करनी होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस सत्य वीर सिंह की खंडपीठ संजय कुमार शर्मा की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें 29 जनवरी 2025 (मौनी अमावस्या) को हुई भगदड़ में उनके रिश्तेदार की मौत पर मुआवजा मांगा गया था।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने न्यायिक जांच आयोग के सचिव</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177739/mahakumbh-stampede-high-court-said-%E2%80%93-compensation-claims-should-be"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/allahabad-high-court-11.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><span style="font-family:mangal, serif;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong></span>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जनवरी 2025 के महाकुंभ मेला भगदड़ मामले में स्पष्ट किया है कि पीड़ितों को अनुग्रह (ex gratia) मुआवजा देने के दावों का निपटारा राज्य द्वारा गठित न्यायिक जांच आयोग नहीं, बल्कि जिला प्रशासन और मेला प्राधिकरण द्वारा किया जाएगा, और यह प्रक्रिया 30 दिनों के भीतर पूरी करनी होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस सत्य वीर सिंह की खंडपीठ संजय कुमार शर्मा की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें 29 जनवरी 2025 (मौनी अमावस्या) को हुई भगदड़ में उनके रिश्तेदार की मौत पर मुआवजा मांगा गया था।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने न्यायिक जांच आयोग के सचिव द्वारा दाखिल हलफनामे का अवलोकन करते हुए कहा कि मुआवजा दावों का निपटारा करना आयोग के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। आयोग का कार्य केवल घटना के कारणों और परिस्थितियों की जांच करना, भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम के सुझाव देना और प्रशासनिक समन्वय की समीक्षा करना है।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने यह भी नोट किया कि राज्य सरकार की ओर से एडिशनल एडवोकेट जनरल मनीष गोयल ने भगदड़ की घटना से इनकार नहीं किया और कुछ मृतकों के आश्रितों को पहले ही मुआवजा दिए जाने की बात सामने आई। ऐसे में आयोग द्वारा यह जांच करना कि भगदड़ हुई या नहीं, आवश्यक नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">बेंच में मतभेद प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने के लिए अदालत ने निर्देश दिए कि सभी मुआवजा दावे जिला प्रशासन/मेलाधिकारी के समक्ष प्रस्तुत किए जाएं, जहां प्रत्येक मामले में मृत्यु या क्षति के तथ्यों का सत्यापन किया जाएगा। पुलिस की इनक्वेस्ट रिपोर्ट और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट को, जब तक विपरीत साक्ष्य न हो, प्रमाणिक माना जाएगा। साथ ही, मेलाधिकारी को प्रत्येक दावे पर 30 दिनों के भीतर अंतिम निर्णय लेना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान मामले में अदालत ने पाया कि मृतक की इनक्वेस्ट और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट उपलब्ध हैं और विवादित नहीं हैं। इसलिए कोर्ट ने मेलाधिकारी को तीन सप्ताह के भीतर निर्णय लेने और 7 मई तक अनुपालन हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 23:06:01 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>संगमरमर मस्जिद ध्वस्तीकरण विवाद पहुंचा इलाहाबाद हाईकोर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> प्रयागराज जंक्शन के सिटी साइड सर्कुलेटिंग एरिया में स्थित संगमरमर मस्जिद को लेकर चल रहा विवाद अब न्यायिक दायरे में पहुंच गया है। मस्जिद कमेटी ने रेलवे द्वारा जारी ध्वस्तीकरण नोटिस को चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की है और नोटिस पर तत्काल रोक लगाने की मांग की है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">याचिका में कमेटी की ओर से कहा गया है कि संबंधित संपत्ति वक्फ बोर्ड के रिकॉर्ड में दर्ज है, इसलिए बिना विधिक प्रक्रिया पूरी किए ध्वस्तीकरण का नोटिस जारी करना अवैध है। कमेटी ने अदालत से आग्रह किया है कि मामले की सुनवाई तक किसी भी</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177249/marble-mosque-demolition-dispute-reached-allahabad-high-court"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/img-20260425-wa0263.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> प्रयागराज जंक्शन के सिटी साइड सर्कुलेटिंग एरिया में स्थित संगमरमर मस्जिद को लेकर चल रहा विवाद अब न्यायिक दायरे में पहुंच गया है। मस्जिद कमेटी ने रेलवे द्वारा जारी ध्वस्तीकरण नोटिस को चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की है और नोटिस पर तत्काल रोक लगाने की मांग की है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">याचिका में कमेटी की ओर से कहा गया है कि संबंधित संपत्ति वक्फ बोर्ड के रिकॉर्ड में दर्ज है, इसलिए बिना विधिक प्रक्रिया पूरी किए ध्वस्तीकरण का नोटिस जारी करना अवैध है। कमेटी ने अदालत से आग्रह किया है कि मामले की सुनवाई तक किसी भी प्रकार की कार्रवाई पर रोक लगाई जाए, जिससे धार्मिक स्थल को नुकसान न पहुंचे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वहीं, रेलवे प्रशासन ने अपने पक्ष में कहा है कि उक्त ढांचा रेलवे की भूमि पर स्थित है और स्टेशन क्षेत्र के पुनर्विकास व यातायात व्यवस्था को सुचारु बनाने के लिए इसे हटाना आवश्यक है। रेलवे का कहना है कि सभी प्रक्रियाएं नियमानुसार पूरी की गई हैं और संबंधित पक्ष को पहले ही नोटिस देकर 27 अप्रैल तक परिसर खाली करने का समय दिया गया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मामले के तूल पकड़ने के बाद स्थानीय स्तर पर भी चर्चा तेज हो गई है। दोनों पक्षों के दावों के बीच अब निगाहें अदालत की कार्यवाही पर टिकी हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि वक्फ रिकॉर्ड और भूमि स्वामित्व के दस्तावेज इस मामले में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। अब यह देखना अहम होगा कि अदालत इस संवेदनशील मामले में क्या रुख अपनाती है और क्या फिलहाल ध्वस्तीकरण पर रोक लगाई जाती है या नहीं।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 25 Apr 2026 18:13:59 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सजा माफी और समय पूर्व रिहाई की नीति पर कोर्ट ने सरकार से मांगी जानकारी</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सजा माफी और समय पूर्व रिहाई नीति पर राज्य सरकार से विस्तृत जानकारी मांगी है। 25 मई को मामले की सुनवाई होगी। यह आदेश न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने स्वतः संज्ञान जनहित याचिका पर दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्य सरकार की ओर से दाखिल अनुपालन हलफनामे में कहा गया कि सितंबर 2024 से फरवरी 2026 के बीच 3746 आवेदन आए। इनमें से 3447 विचार के लिए उठाए गए थे, 2570 आवेदन निस्तारित कर दिए गए।शेष 877 आवेदन अभी लंबित हैं, उन पर अंतिम निर्णय नहीं हो सका है।</p>
<p style="text-align:justify;">2570 निस्तारित मामलों में</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176069/court-sought-information-from-the-government-on-the-policy-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/allahabad-high-court2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सजा माफी और समय पूर्व रिहाई नीति पर राज्य सरकार से विस्तृत जानकारी मांगी है। 25 मई को मामले की सुनवाई होगी। यह आदेश न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने स्वतः संज्ञान जनहित याचिका पर दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्य सरकार की ओर से दाखिल अनुपालन हलफनामे में कहा गया कि सितंबर 2024 से फरवरी 2026 के बीच 3746 आवेदन आए। इनमें से 3447 विचार के लिए उठाए गए थे, 2570 आवेदन निस्तारित कर दिए गए।शेष 877 आवेदन अभी लंबित हैं, उन पर अंतिम निर्णय नहीं हो सका है।</p>
<p style="text-align:justify;">2570 निस्तारित मामलों में 1357 कैदियों को रिहाई दी गई है, जबकि 1213 के आवेदन खारिज कर दिए गए। इस पर कोर्ट ने राज्य सरकार को 25 मई तक विस्तृत अनुपालन हलफनामा दाखिल करने का समय दिया है। पूछा है कि रिहा किए गए 1357 कैदियों के पक्ष में किन आधारों पर निर्णय लिया गया, यह स्पष्ट किया जाए। वहीं, 1213 कैदियों के खारिज आवेदन का भी बताए जाएं।।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 13 Apr 2026 21:49:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी और बेटियों पर सेक्स रैकेट चलाने का झूठा आरोप लगाने वाले व्यक्ति को फटकारा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार को व्यक्ति की क्रिमिनल रिट याचिका खारिज की। इस व्यक्ति ने कानपुर नगर में चल रहे कथित सेक्स रैकेट में शामिल लोगों के खिलाफ FIR दर्ज कराने की मांग की। हालांकि, याचिकाकर्ता ने शुरू में अपनी पत्नी और बेटी के अश्लील वीडियो ऑनलाइन अपलोड किए जाने पर चिंता जताई, लेकिन बाद की सुनवाई में उसने अपने परिवार के सदस्यों पर अनैतिकता का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ अपमानजनक और झूठे आरोप लगाए।</p>
<p style="text-align:justify;">स पर कड़ा रुख अपनाते हुए जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की बेंच ने याचिकाकर्ता को कड़ी फटकार लगाई।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175787/allahabad-high-court-reprimands-the-man-who-falsely-accused-his"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/allahabad-high-court1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार को व्यक्ति की क्रिमिनल रिट याचिका खारिज की। इस व्यक्ति ने कानपुर नगर में चल रहे कथित सेक्स रैकेट में शामिल लोगों के खिलाफ FIR दर्ज कराने की मांग की। हालांकि, याचिकाकर्ता ने शुरू में अपनी पत्नी और बेटी के अश्लील वीडियो ऑनलाइन अपलोड किए जाने पर चिंता जताई, लेकिन बाद की सुनवाई में उसने अपने परिवार के सदस्यों पर अनैतिकता का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ अपमानजनक और झूठे आरोप लगाए।</p>
<p style="text-align:justify;">स पर कड़ा रुख अपनाते हुए जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की बेंच ने याचिकाकर्ता को कड़ी फटकार लगाई। बेंच ने कहा कि अपनी ही पत्नी और बेटी के खिलाफ उसके दावे "पूरी तरह से झूठे" हैं। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता "खुद को दूसरों से ज़्यादा पवित्र समझने की मानसिकता" (Holier-Than-Thou Syndrome) से ग्रस्त है और खुद को "समाज की सभी अनैतिकताओं के खिलाफ लड़ने वाला योद्धा" समझता है।</p>
<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने कहा कि यह याचिका असल में पारिवारिक विवाद से जुड़ी थी। अपने ही परिवार पर सेक्स रैकेट चलाने का आरोप लगाना पारिवारिक मामले को कोर्ट के सामने रखने का "सबसे घिनौना" तरीका है। गौरतलब है कि याचिकाकर्ता द्वारा डिजिटल फॉर्मेट में दी गई कई वीडियो फाइलों और स्क्रीनशॉट की प्रामाणिकता की जांच करने के लिए पुलिस ने उन्हें IIT कानपुर के C3iHub को सौंप दिया। हालांकि, IIT कानपुर की रिपोर्ट से पता चला कि याचिकाकर्ता द्वारा दी गई तस्वीरों और बरामद वीडियो में दिख रहे चेहरों में कोई मेल नहीं था।</p>
<p style="text-align:justify;">फोरेंसिक जांच से यह भी पता चला कि बरामद मीडिया फाइलें लगभग 10-12 साल पुरानी थीं। रिपोर्ट में कहा गया कि "उपलब्ध डिजिटल सबूत इस निष्कर्ष का समर्थन करते हैं कि पहचान गलत या भ्रामक तरीके से जोड़ी गई।"इस रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए बेंच ने विशेष रूप से यह टिप्पणी की: "IIT कानपुर की उपरोक्त रिपोर्ट से हमें यह मानने का आधार मिलता है कि याचिकाकर्ता ने अपने परिवार पर सेक्स रैकेट आदि में शामिल होने के जो बेबुनियाद आरोप लगाए हैं, जिन्हें वेबसाइटों पर दिखाया गया, वे पूरी तरह से झूठे हैं।"</p>
<p style="text-align:justify;">बेंच ने यह टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता लगातार अपने ही अहंकार में डूबा हुआ है। उसके परिवार पर सेक्स रैकेट में शामिल होने के जो बेबुनियाद आरोप उसने लगाए, वे बेहद आपत्तिजनक हैं—जिनमें से कुछ तो रिकॉर्ड से हटाए जाने योग्य हैं अतः, इस निष्कर्ष पर पहुंचते हुए कि इन खोखले आरोपों के आधार पर पुलिस को किसी भी प्रकार के सेक्स रैकेट की जाँच करने का निर्देश जारी करने का कोई आधार नहीं है, याचिका खारिज कर दी गई।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Apr 2026 22:38:30 +0530</pubDate>
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