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                <title>इलाहाबाद हाईकोर्ट - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>इलाहाबाद हाईकोर्ट RSS Feed</description>
                
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                <title>हाईकोर्ट का आदेश- वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से कोर्ट में उपस्थित हों न्यायिक मजिस्ट्रेट</title>
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                        <![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>प्रयागराज के झूंसी थाना क्षेत्र निवासी याची ने 2023 से लंबित चेक बाउंस से जुड़े मामले के शीघ्र निस्तारण की मांग करते हुए हाईकोर्ट में अर्जी दायर की थी। 10 दिसंबर 2025 को हाईकोर्ट ने संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट से परिवाद के निस्तारण में हो रही देरी का स्पष्टीकरण मांगा गया था। इस पर अब तक कोई जवाब प्राप्त नहीं हुआ है। </p>
<p style="text-align:justify;">ईकोर्ट के कार्यालय की ओर से मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, प्रयागराज को इस संबंध में औपचारिक पत्र भी भेजा गया था, लेकिन ट्रायल कोर्ट की ओर से अनुपालन की कोई रिपोर्ट नहीं मिली। कोर्ट ने संबंधित अदालत के</p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174644/high-courts-order-judicial-magistrate-should-appear-in-the-court"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/allahabad-high-court9.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>प्रयागराज के झूंसी थाना क्षेत्र निवासी याची ने 2023 से लंबित चेक बाउंस से जुड़े मामले के शीघ्र निस्तारण की मांग करते हुए हाईकोर्ट में अर्जी दायर की थी। 10 दिसंबर 2025 को हाईकोर्ट ने संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट से परिवाद के निस्तारण में हो रही देरी का स्पष्टीकरण मांगा गया था। इस पर अब तक कोई जवाब प्राप्त नहीं हुआ है। </p>
<p style="text-align:justify;">ईकोर्ट के कार्यालय की ओर से मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, प्रयागराज को इस संबंध में औपचारिक पत्र भी भेजा गया था, लेकिन ट्रायल कोर्ट की ओर से अनुपालन की कोई रिपोर्ट नहीं मिली। कोर्ट ने संबंधित अदालत के पीठासीन अधिकारी को वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कार्यालय को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि पिछला और वर्तमान आदेश संबंधित अधिकारी तक समय पर पहुंच जाए ताकि आवश्यक अनुपालन सुनिश्चित किया जा सके।</p>]]>
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                                                            <category>ख़बरें</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 30 Mar 2026 22:13:51 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]>
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                <title>इलाहाबाद हाईकोर्ट से स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को राहत, ।</title>
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                        <![CDATA[<div class="ii gt">
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<div>
<div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात।</strong></div>
<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">इलाहाबाद हाईकोर्ट से जुड़ी एक अहमखबर है, जहां चर्चित संत स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को बड़ी राहत मिली है। हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ दर्ज यौन शोषण के मामले में अग्रिम जमानत याचिका को मंजूरी दे दी है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">
<blockquote class="format1">इसी मामले में सह-आरोपी और उनके शिष्य मुकुंदानंद को भी कोर्ट ने अग्रिम जमानत प्रदान की है। </blockquote>
</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">दोनों के खिलाफ प्रयागराज के झूंसी थाना में एफआईआर दर्ज की गई थी, जिसमें शिविर के दौरान बटुकों के यौन शोषण के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। जानकारी के अनुसार, इस मामले में हाईकोर्ट में सुनवाई 27 फरवरी को पूरी हो गई थी,</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जिसके</div></div></div></div></div>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174363/relief-to-swami-avimukteshwarananda-from-allahabad-high-court"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/img-20260325-wa01931.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div>
<div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात।</strong></div>
<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इलाहाबाद हाईकोर्ट से जुड़ी एक अहमखबर है, जहां चर्चित संत स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को बड़ी राहत मिली है। हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ दर्ज यौन शोषण के मामले में अग्रिम जमानत याचिका को मंजूरी दे दी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">
<blockquote class="format1">इसी मामले में सह-आरोपी और उनके शिष्य मुकुंदानंद को भी कोर्ट ने अग्रिम जमानत प्रदान की है। </blockquote>
</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दोनों के खिलाफ प्रयागराज के झूंसी थाना में एफआईआर दर्ज की गई थी, जिसमें शिविर के दौरान बटुकों के यौन शोषण के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। जानकारी के अनुसार, इस मामले में हाईकोर्ट में सुनवाई 27 फरवरी को पूरी हो गई थी,</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जिसके बाद अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करते हुए यह निर्णय सुनाया। कोर्ट ने आरोपियों को गिरफ्तारी से राहत देते हुए अग्रिम जमानत दे दी, हालांकि मामले की जांच जारी रहेगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह मामला सामने आने के बाद क्षेत्र में काफी चर्चा का विषय बना हुआ है। जहां एक ओर समर्थक इस फैसले को न्यायिक राहत मान रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पीड़ित पक्ष न्याय की मांग पर कायम है।</div>
</div>
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<div class="adL" style="text-align:justify;"> </div>
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                                            <category>सांस्कृतिक और धार्मिक</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 27 Mar 2026 21:01:51 +0530</pubDate>
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                <title>इलाहाबाद हाईकोर्ट से स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को राहत</title>
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                        <![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> इलाहाबाद हाईकोर्ट से जुड़ी एक अहमखबर है, जहां चर्चित संत स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को बड़ी राहत मिली है। हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ दर्ज यौन शोषण के मामले में अग्रिम जमानत याचिका को मंजूरी दे दी है।इसी मामले में सह-आरोपी और उनके शिष्य मुकुंदानंद को भी कोर्ट ने अग्रिम जमानत प्रदान की है। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">दोनों के खिलाफ प्रयागराज के झूंसी थाना में एफआईआर दर्ज की गई थी, जिसमें शिविर के दौरान बटुकों के यौन शोषण के गंभीर आरोप लगाए गए हैं।जानकारी के अनुसार, इस मामले में हाईकोर्ट में सुनवाई 27 फरवरी को पूरी हो गई थी, जिसके बाद अदालत ने दोनों</div>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174186/relief-to-swami-avimukteshwarananda-from-allahabad-high-court"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/img-20260325-wa0193.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> इलाहाबाद हाईकोर्ट से जुड़ी एक अहमखबर है, जहां चर्चित संत स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को बड़ी राहत मिली है। हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ दर्ज यौन शोषण के मामले में अग्रिम जमानत याचिका को मंजूरी दे दी है।इसी मामले में सह-आरोपी और उनके शिष्य मुकुंदानंद को भी कोर्ट ने अग्रिम जमानत प्रदान की है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दोनों के खिलाफ प्रयागराज के झूंसी थाना में एफआईआर दर्ज की गई थी, जिसमें शिविर के दौरान बटुकों के यौन शोषण के गंभीर आरोप लगाए गए हैं।जानकारी के अनुसार, इस मामले में हाईकोर्ट में सुनवाई 27 फरवरी को पूरी हो गई थी, जिसके बाद अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करते हुए यह निर्णय सुनाया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कोर्ट ने आरोपियों को गिरफ्तारी से राहत देते हुए अग्रिम जमानत दे दी, हालांकि मामले की जांच जारी रहेगी।यह मामला सामने आने के बाद क्षेत्र में काफी चर्चा का विषय बना हुआ है। जहां एक ओर समर्थक इस फैसले को न्यायिक राहत मान रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पीड़ित पक्ष न्याय की मांग पर कायम है।</div>]]>
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                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 25 Mar 2026 20:24:48 +0530</pubDate>
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                <title>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पूछा- चाइनीज मांझे पर रोक को लेकर क्या कार्रवाई की गई</title>
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                        <![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चाइनीज मांझे पर रोक को लेकर की गई कार्रवाई पर मुख्य स्थायी अधिवक्ता को सरकार से एक महीने में निर्देश प्राप्त कर जवाब दाखिल करने के लिए कहा है। न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल की एकल पीठ ने यह आदेश देवरिया निवासी अधिवक्ता प्रदीप पांडे की ओर से दाखिल अवमानना याचिका पर दिया है। इसमें गृह विभाग के प्रमुख सचिव और डीजीपी को पक्षकार बनाया गया है।</p><p style="text-align:justify;">कहा गया है कि हाईकोर्ट ने 2015 में जनहित याचिका अनुराग मिश्रा बनाम राज्य मामले में चाइनीज मांझे के निर्माण, बिक्री और उपयोग पर सख्ती से रोक लगाने के</p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173870/allahabad-high-court-asked-what-action-was-taken-regarding-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/allahabad-high-court4.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चाइनीज मांझे पर रोक को लेकर की गई कार्रवाई पर मुख्य स्थायी अधिवक्ता को सरकार से एक महीने में निर्देश प्राप्त कर जवाब दाखिल करने के लिए कहा है। न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल की एकल पीठ ने यह आदेश देवरिया निवासी अधिवक्ता प्रदीप पांडे की ओर से दाखिल अवमानना याचिका पर दिया है। इसमें गृह विभाग के प्रमुख सचिव और डीजीपी को पक्षकार बनाया गया है।</p><p style="text-align:justify;">कहा गया है कि हाईकोर्ट ने 2015 में जनहित याचिका अनुराग मिश्रा बनाम राज्य मामले में चाइनीज मांझे के निर्माण, बिक्री और उपयोग पर सख्ती से रोक लगाने के निर्देश दिए थे। 14 जनवरी 2026 को एक और जनहित याचिका हिमांशु श्रीवास्तव बनाम राज्य में भी कोर्ट ने पुराने आदेशों को दोहराते हुए सख्ती से पालन कराने के लिए कहा था। इसके बावजूद प्रतिबंधित मांझा खुलेआम बिक रहा है।</p><p style="text-align:justify;">याची ने दलील दी है कि अधिकारियों की लापरवाही और आदेशों की अवहेलना से कई घटनाएं हो चुकी हैं। 22 जनवरी 2026 को प्रयागराज में गले में मांझा फंसने से अधिवक्ता अनूप श्रीवास्तव घायल हो गए थे। जौनपुर, उन्नाव, मेरठ और लखनऊ सहित कई जिलों में एक साल में कई लोगों की मौत और कई के घायल होने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं।</p><p style="text-align:justify;">अधिवक्ता ने दलील दी कि यह मांझा न सिर्फ दुकानों पर, बल्कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भी आसानी से उपलब्ध है। यह अनुच्छेद-21 के तहत जीवन के अधिकार का उल्लंघन है। कोर्ट ने याची को निर्देश दिया है कि वे 48 घंटे के भीतर मुख्य स्थायी अधिवक्ता को याचिका की प्रति उपलब्ध कराएं। एक माह बाद अगली सुनवाई होगी।</p>]]>
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                <pubDate>Sun, 22 Mar 2026 19:33:03 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>पंचायत चुनाव पर हाईकोर्ट सख्त, सवाल – समय पर क्यों नहीं हो रहे चुनाव, देरी क्यों?</title>
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                        <![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पंचायत चुनाव में देरी को लेकर सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने सरकार से सवाल पूछा कि समय सीमा के भीतर चुनाव क्यों नहीं करवाए जा रहे हैं? क्या वह संवैधानिक समयसीमा के भीतर चुनाव प्रक्रिया पूरी कर पाएंगे या नहीं। यह सुनवाई अधिवक्ता इम्तियाज हुसैन की जनहित याचिका पर हुई। याचिका में मांग की गई थी कि पंचायत चुनाव की पूरी प्रक्रिया के लिए समयबद्ध कार्यक्रम पहले से तय कर रिकॉर्ड पर रखा जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">योगी सरकार ने हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में हलफनामा दाखिल कर बताया था कि स्थानीय निकाय चुनाव से पहले एक</p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173558/high-court-strict-question-on-panchayat-elections-%E2%80%93-why-elections"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/o9bskg98_up-panchayat-election-date-2026_625x300_01_december_25.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पंचायत चुनाव में देरी को लेकर सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने सरकार से सवाल पूछा कि समय सीमा के भीतर चुनाव क्यों नहीं करवाए जा रहे हैं? क्या वह संवैधानिक समयसीमा के भीतर चुनाव प्रक्रिया पूरी कर पाएंगे या नहीं। यह सुनवाई अधिवक्ता इम्तियाज हुसैन की जनहित याचिका पर हुई। याचिका में मांग की गई थी कि पंचायत चुनाव की पूरी प्रक्रिया के लिए समयबद्ध कार्यक्रम पहले से तय कर रिकॉर्ड पर रखा जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">योगी सरकार ने हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में हलफनामा दाखिल कर बताया था कि स्थानीय निकाय चुनाव से पहले एक समर्पित पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आयोग का गठन किया जाएगा। इसी आयोग की रिपोर्ट के आधार पर पंचायत सीटों पर आरक्षण तय होगा, जिसके बाद ही चुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">मामले की सुनवाई जस्टिस राजन राय और जस्टिस अवधेश चौधरी की पीठ कर रही थी। दरअसल, हाईकोर्ट में दाखिल एक याचिका में मौजूदा पिछड़ा वर्ग आयोग के अधिकारों को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता ने सवाल उठाया था कि वर्तमान आयोग को स्थानीय निकाय चुनावों में आरक्षण निर्धारण का कानूनी अधिकार नहीं है। इसके जवाब में सरकार ने स्पष्ट किया कि नया समर्पित आयोग गठित कर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप कार्रवाई की जाएगी। अभी तक OBC आयोग गठन पर कोई रिपोर्ट नहीं आई है।</p>
<p style="text-align:justify;">पंचायत चुनाव 2026 को लेकर सरकार के भीतर ही अलग-अलग बयान सामने आ रहे हैं। एक तरफ उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य चुनाव समय पर होने को मुश्किल बता रहे हैं, वहीं पंचायती राज मंत्री ओपी राजभर का कहना है कि चुनाव तय समय पर ही कराए जाएंगे। इन बयानों के बाद सियासी हलकों में चर्चा तेज हो गई है।</p>]]>
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                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 18 Mar 2026 21:21:28 +0530</pubDate>
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                <title>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गर्भवती नाबालिग की असंवेदनशील काउंसलिंग के लिए मेडिकल बोर्ड को फटकारा</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज। </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले हफ़्ते मेडिकल बोर्ड और चीफ मेडिकल ऑफिसर (सीएएमओ), हाथरस को तब फटकारा, जब वे एक समय-संवेदनशील रिट याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। इस याचिका में लगभग 30 हफ़्ते की गर्भावस्था के उन्नत चरण में गर्भपात की मांग की गई थी, जिस पर कोर्ट ने नाबालिग पीड़िता के प्रति उनकी असंवेदनशीलता पर नाराज़गी जताई।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने यह टिप्पणी की: "आज, याचिकाकर्ता के वकील ने अपने मुवक्किल से मिले निर्देशों के आधार पर कोर्ट को सूचित किया कि मेडिकल बोर्ड बस उसके पास गया और उससे कहा,</p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173554/allahabad-high-court-reprimands-the-medical-board-for-insensitive-counseling"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/allahabad-high-court3.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज। </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले हफ़्ते मेडिकल बोर्ड और चीफ मेडिकल ऑफिसर (सीएएमओ), हाथरस को तब फटकारा, जब वे एक समय-संवेदनशील रिट याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। इस याचिका में लगभग 30 हफ़्ते की गर्भावस्था के उन्नत चरण में गर्भपात की मांग की गई थी, जिस पर कोर्ट ने नाबालिग पीड़िता के प्रति उनकी असंवेदनशीलता पर नाराज़गी जताई।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने यह टिप्पणी की: "आज, याचिकाकर्ता के वकील ने अपने मुवक्किल से मिले निर्देशों के आधार पर कोर्ट को सूचित किया कि मेडिकल बोर्ड बस उसके पास गया और उससे कहा, 'आपका ख्याल रखा जाएगा'। इसके अलावा कुछ नहीं कहा; और अब उपर्युक्त रिपोर्ट जमा कर दी गई, जो मेडिकल बोर्ड की असंवेदनशीलता को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।"</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने पहले सीएमओ, हाथरस को 'युद्ध स्तर' पर एक मेडिकल बोर्ड गठित करने का निर्देश दिया था। इस बोर्ड को याचिकाकर्ता को गर्भपात की स्थिति में उसके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले परिणामों के बारे में परामर्श देना था। साथ ही यह भी समझाना था कि यदि वह बच्चे को जन्म देने का विकल्प चुनती है तो उस पर न तो चिकित्सा खर्च की कोई ज़िम्मेदारी होगी और न ही बच्चे की, जिसे गोद दे दिया जाएगा; और इसकी पूरी ज़िम्मेदारी राज्य की होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने गौर किया कि विशिष्ट निर्देशों के बावजूद, "मेडिकल बोर्ड की जो रिपोर्ट हमारे सामने रखी गई, उसमें हीमोग्लोबिन, ब्लड ग्रुप, HIV, HBs, Ag, और HCV से संबंधित जांचों के अलावा; और भ्रूण की गर्भावस्था की अवधि से संबंधित जांचों के अलावा, कहीं भी यह संकेत नहीं मिलता कि याचिकाकर्ता ने गर्भपात करवाने या गर्भावस्था जारी रखने की अपनी इच्छा के बारे में क्या कहा था।"</p>
<p style="text-align:justify;">यह देखते हुए कि पहले याचिकाकर्ता के वकील ने इस बात पर चिंता जताई कि यदि हाईकोर्ट द्वारा कोई सदस्य नामित नहीं किया जाता है तो पैनल असंवेदनशील हो सकता है, कोर्ट ने पाया कि मेडिकल बोर्ड ने वास्तव में असंवेदनशील तरीके से काम किया।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने जे एन  कॉलेज अस्पताल, अलिगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय , अलीगढ़ के प्रिंसिपल को एक आवश्यक पक्ष के रूप में शामिल करने का निर्देश दिया। इसने DALSA, हाथरस के सचिव को तत्काल एक बैठक आयोजित करने और पहले से गठित मेडिकल बोर्ड में J.N. कॉलेज, अलीगढ़ के प्रिंसिपल के परामर्श से मनोवैज्ञानिक को शामिल करने का निर्देश दिया</p>
<p style="text-align:justify;">जहाँ गर्भपात से जुड़े मुद्दों पर विचार किया जाना हो। या (ii) क्या लीगल सर्विसेज़ कमेटी के किसी पैनल वकील को नियुक्त करना संभव है, जो उपर्युक्त कमेटी के कार्यों का समन्वय करे और उसकी अध्यक्षता करे। साथ ही सीधे संबंधित अदालत को रिपोर्ट करे? यह उन मामलों में किया जा सकता है, जहां गर्भपात के लिए याचिकाएं विचाराधीन हों और मेडिकल बोर्ड से रिपोर्ट मांगने का निर्देश जारी किया गया हो।"</p>]]>
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                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 18 Mar 2026 21:09:58 +0530</pubDate>
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                <title>नाबालिग से दुष्कर्म के आरोप में दर्ज मुकदमे में हाईकोर्ट से राहत, गिरफ्तारी पर लगी रोक</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[<div style="text-align:justify;">बस्ती।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">बस्ती जिले केगौर थाना क्षेत्र के शिवपुर ग्राम निवासी विपिन कुमार, विनय कुमार, राधिका देवी तथा रामपाल उर्फ बागेदु के खिलाफ दर्ज नाबालिग से छेड़छाड़, मारपीट, अश्लील फोटो बनाने और दुष्कर्म के आरोपों से जुड़े मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट से अंतरिम राहत मिली है। हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए आरोपितों की गिरफ्तारी पर फिलहाल रोक लगा दी है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">बताया जाता है कि एक महिला ने थाना गौर में तहरीर देकर आरोप लगाया था कि उसकी नाबालिग पुत्री के साथ विपिन कुमार व अन्य आरोपितों ने छेड़छाड़, मारपीट करते हुए अश्लील फोटो बनाए और दुष्कर्म किया। इस मामले</div>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173249/relief-from-high-court-in-the-case-registered-for-raping"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-01/allahabad-high-court.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">बस्ती।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बस्ती जिले केगौर थाना क्षेत्र के शिवपुर ग्राम निवासी विपिन कुमार, विनय कुमार, राधिका देवी तथा रामपाल उर्फ बागेदु के खिलाफ दर्ज नाबालिग से छेड़छाड़, मारपीट, अश्लील फोटो बनाने और दुष्कर्म के आरोपों से जुड़े मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट से अंतरिम राहत मिली है। हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए आरोपितों की गिरफ्तारी पर फिलहाल रोक लगा दी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बताया जाता है कि एक महिला ने थाना गौर में तहरीर देकर आरोप लगाया था कि उसकी नाबालिग पुत्री के साथ विपिन कुमार व अन्य आरोपितों ने छेड़छाड़, मारपीट करते हुए अश्लील फोटो बनाए और दुष्कर्म किया। इस मामले में पुलिस ने धारा 65(1), 333, 64(2)(m), 308(2), 115(2), 76, 110, 351(3) तथा 3/4 पॉक्सो एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज की थी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यदि पुराने आईपीसी प्रावधानों के अनुसार देखा जाए तो यह मामला धारा 376, 452, 376(2), 383, 323, 354B, 308, 506 तथा 3/4 पॉक्सो एक्ट से संबंधित बताया गया है। मुकदमा दर्ज होने के बाद पुलिस विपिन कुमार व अन्य आरोपितों की गिरफ्तारी के लिए लगातार दबिश दे रही थी। पुलिस ने विपिन के खिलाफ कुर्की की कार्रवाई की नोटिस भी जारी कर दी थी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसी बीच आरोपितों ने अधिवक्ता रमन पांडेय के माध्यम से इलाहाबाद हाईकोर्ट में एफआईआर को चुनौती दी। 9 मार्च 2026 को हुई सुनवाई के दौरान माननीय न्यायमूर्ति सिद्धार्थ एवं न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ के समक्ष बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने दलील दी कि दर्ज एफआईआर निराधार है और पुलिस एकतरफा कार्रवाई कर रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बचाव पक्ष का यह भी कहना था कि पीड़िता पक्ष के खिलाफ पहले ही विपिन कुमार की माता राधिका देवी की ओर से मुकदमा दर्ज कराया गया था। उसी मुकदमे में दबाव बनाने और समझौता कराने के उद्देश्य से नाबालिग को आधार बनाकर यह मुकदमा दर्ज कराया गया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने फिलहाल आरोपितों की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी। उधर, बताया जा रहा है कि इस प्रकरण के दौरान मारपीट की घटना को लेकर पुलिस ने विपिन के कुछ रिश्तेदारों के खिलाफ भी अलग से मुकदमा दर्ज किया है। हाईकोर्ट से राहत मिलने के बाद आरोपितों का परिवार जल्द ही अपने घर लौटने की तैयारी में है।</div>]]>
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                                                            <category>ख़बरें</category>
                                            <category>अपराध/हादशा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 13 Mar 2026 19:45:00 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Swatantra Prabhat]]>
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                            </item>
            <item>
                <title>मुकदमों की पेंडिंग लिस्ट बढ़ने का सबसे बड़ा कारण जजों की संख्या है.।</title>
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                        <![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</strong></p>
<p style="text-align:justify;">इलाहाबाद हाईकोर्ट में केवल 110 जज हैं. इन जजों के भरोसे ये 12 लाख पेंडिंग केस हैं. केस निपटाने को लेकर जजों पर प्रेशर भी है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के तहत केसों की पेंडिंसि खत्म करनी है.</p>
<p style="text-align:justify;">इन्हीं दबावों के बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस सुभाष विद्यार्थी का बयान भी चर्चा में है. हाल ही में जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने एक सुनवाई के दौरान कहा था-मुझे भूख लग रही है, थकान महसूस हो रही है और मैं शारीरिक रूप से निर्णय देने में असमर्थ हूं. इसलिए फैसले की सुरक्षित रखा जाता है.</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसी बात कहने</p>...]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173065/the-biggest-reason-for-increasing-the-pending-list-of-cases"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/allahabad-high-court.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</strong></p>
<p style="text-align:justify;">इलाहाबाद हाईकोर्ट में केवल 110 जज हैं. इन जजों के भरोसे ये 12 लाख पेंडिंग केस हैं. केस निपटाने को लेकर जजों पर प्रेशर भी है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के तहत केसों की पेंडिंसि खत्म करनी है.</p>
<p style="text-align:justify;">इन्हीं दबावों के बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस सुभाष विद्यार्थी का बयान भी चर्चा में है. हाल ही में जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने एक सुनवाई के दौरान कहा था-मुझे भूख लग रही है, थकान महसूस हो रही है और मैं शारीरिक रूप से निर्णय देने में असमर्थ हूं. इसलिए फैसले की सुरक्षित रखा जाता है.</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसी बात कहने के पीछ जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की मजबूरी यह थी कि 24 फरवरी को ऋण वसूली न्यायाधिकरण (डीआरटी) के एक आदेश के खिलाफ सुनवाई के बाद न्यायाधीश ने तत्काल आदेश पारित करने के बजाय, टिप्पणी के साथ फैसला सुरक्षित रख लिया.</p>
<p style="text-align:justify;">24 फरवरी का दिन जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की अदालत के लिए बेहद व्यस्त रहा. उनकी लिस्ट में कुल 235 मामले लगे थे. इनमें 92 नए केस, 101 नियमित मामले, 39 विविध आवेदन और 3 एडिशनल लिस्ट के मामले शामिल थे. दोपहर 4:15 बजे तक जस्टिस विद्यार्थी केवल 29 नए मामलों की ही सुनवाई कर पाए थे.</p>
<p style="text-align:justify;">इसी बीच उन्हें सूचित किया गया कि अगला मामला सुप्रीम कोर्ट द्वारा रिमांड (वापस भेजा गया) किया गया है और इसकी समय सीमा 24 फरवरी को ही समाप्त हो रही है. इसके बाद जस्टिस विद्यार्थी ने इस विशेष मामले की सुनवाई शुरू की, जो लगातार शाम 7 बजे तक चली.</p>
<p style="text-align:justify;">जज की इस टिप्पणी ने एक नई बहस छेड़ दी है. यह वाकया दर्शाता है कि भारतीय अदालतों में जजों पर काम का कितना दबाव है. एक ही दिन में 200 से अधिक केस लिस्ट होना और फिर देर शाम तक सुनवाई करना किसी भी व्यक्ति के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से चुनौतीपूर्ण होता है.</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल  सुप्रीम कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट तक केस की बड़ी पेंडेंसी है. वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में लगभग 92800 मामले पेंडिंग हैं. जिनमें से 72000 मामले सिविल के हैं और 20800 मामले अपराधिक (फौजदारी) के हैं. पिछले एक साल में सुप्रीम कोर्ट में 10000 से अधिक पेंडेंसी बढ़ी है.</p>
<p style="text-align:justify;">पूरे देश में सबसे ज्यादा पेंडेंसी इलाहाबाद हाईकोर्ट में है. इलाहाबाद हाईकोर्ट में लगभग 12 लाख केस पेंडिंग हैं. बड़ी बात यह है कि पूरे देश में हाईकोर्ट में जितने केस पेंडिंग हैं उसका 20% यानी की पांचवां हिस्सा अकेले इलाहाबाद हाईकोर्ट में है. इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में 22265 मामले पेंडिंग हैं.</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट में जजों के 34 पद हैं, जिनमें से 33 पदों पर वर्तमान में नियुक्तियां हैं, एक पद खाली है. निर्धारित पदों के सापेक्ष जजों की नियुक्ति होने के बावजूद भी पेंडेंसी 92828 है, जो यह दर्शाती है कि कोर्ट में आने वाले केसों की रफ्तार काफी तेज है. इलाहाबाद हाईकोर्ट की बात करें तो कुल 160 जजों के पद हैं, जिनमें से 110 पदों पर नियुक्ति है. 50 पद खाली हैंं. यानि इलाहाबाद हाईकोर्ट में 31% जजों के पद खाली हैं.</p>
<p style="text-align:justify;">अगर पूरे देश के हाईकोर्ट की बात करें तो सभी 25 हाईकोर्ट में कुल 1114 पद सृजित हैं, जिनमें से 804 पदों पर जज नियुक्त हैं. पूरे देश में हाईकोर्ट के 310 पदों पर जजों की नियुक्ति नहीं है. इसका मतलब पूरे देश में हाईकोर्ट के 27.8 प्रतिशत जजों के पद खाली हैं.</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट ही नहीं जिला कोर्ट में भी केस की संख्या अधिक होने के चलते जज पर काम का प्रेशर होता है. वहीं पक्षकारों को भी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. कोर्ट पर अधिक दबाव होने के चलते मुकदमे की सुनवाई समय से नहीं हो पाती है. एक दिन में अधिक मामले सुनाने पड़ते हैं जिसके चलते केस पर जज अधिक समय नहीं दे पाते और तारीख पर तारीख का खेल चलता रहता है.</p>
<p style="text-align:justify;">आपराधिक मामलों में कोर्ट पर ओवर बर्डन होने के चलते बेल मिलने में समस्या होती है. एक हियरिंग के लिए लिस्टिंग करने के बाद दूसरी हियरिंग की लिस्टिंग होने में महीनों का समय लग जाता है. ऐसे में अगर एक हियरिंग पर किन्ही कारणों से बेल रिजेक्ट होती है, तो दूसरी बेल का मौका मिलने में कई बार महीनों का समय लगता है.</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]>
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                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 09 Mar 2026 23:01:09 +0530</pubDate>
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                <title>जजों को भी नहीं पता कि कॉलेजियम कहाँ बैठता है: सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता।</title>
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                        <![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</strong></p><p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता ने शनिवार को कॉलेजियम के कामकाज में पारदर्शिता न होने पर चिंता जताई, जो हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों को अपॉइंट करता है। उन्होंने कहा कि ज्यूडिशियल अपॉइंटमेंट आखिरकार जेंडर के आधार पर नंबरों के आधार पर नहीं, बल्कि मेरिट के आधार पर होने चाहिए।वह महिला दिवस मनाने के लिए इंडियन वीमेन इन लॉ (IWiL) द्वारा आयोजित एक कॉन्फ्रेंस में बोल रहे थे।</p><p style="text-align:justify;">जस्टिस दत्ता ने कहा कि ट्रांसपेरेंसी की कमी इतनी है कि जजों को भी अक्सर इस बारे में बहुत कम क्लैरिटी होती है कि कॉलेजियम</p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173063/even-judges-do-not-know-where-the-collegium-sits-supreme"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/supreme-court-4.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</strong></p><p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता ने शनिवार को कॉलेजियम के कामकाज में पारदर्शिता न होने पर चिंता जताई, जो हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों को अपॉइंट करता है। उन्होंने कहा कि ज्यूडिशियल अपॉइंटमेंट आखिरकार जेंडर के आधार पर नंबरों के आधार पर नहीं, बल्कि मेरिट के आधार पर होने चाहिए।वह महिला दिवस मनाने के लिए इंडियन वीमेन इन लॉ (IWiL) द्वारा आयोजित एक कॉन्फ्रेंस में बोल रहे थे।</p><p style="text-align:justify;">जस्टिस दत्ता ने कहा कि ट्रांसपेरेंसी की कमी इतनी है कि जजों को भी अक्सर इस बारे में बहुत कम क्लैरिटी होती है कि कॉलेजियम कैसे काम करता है और यह कहाँ मिलता है।उन्होंने कहा, "आपको यह जानकर हैरानी होगी कि न केवल हम जानते हैं कि क्या हो रहा है... हमें यह भी नहीं पता कि कॉलेजियम कहाँ बैठ रहा है।"</p><p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि ज्यूडिशियल अपॉइंटमेंट आखिरकार जेंडर के आधार पर नंबरों के आधार पर नहीं, बल्कि मेरिट के आधार पर होने चाहिए।वह महिला दिवस मनाने के लिए इंडियन वीमेन इन लॉ (IWiL) द्वारा आयोजित एक कॉन्फ्रेंस में बोल रहे थे।</p><p style="text-align:justify;">जस्टिस दत्ता, जो पहले बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रह चुके हैं, ने कहा कि उनके कार्यकाल के दौरान, ऑब्जेक्टिव क्राइटेरिया की कमी का मतलब था कि जजों को अपने सामने पेश होने वाले वकीलों के अपने असेसमेंट पर निर्भर रहना पड़ता था।उन्होंने कहा, “बॉम्बे हाई कोर्ट में, क्योंकि कोई ऑब्जेक्टिव क्राइटेरिया नहीं था, इसलिए हमने अपने सामने वकीलों के परफॉर्मेंस का असेसमेंट किया।”</p><p style="text-align:justify;">बाद में जज बनी महिलाओं का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा:“जस्टिस शंपा सरकार, जस्टिस अमृता सिन्हा, जस्टिस मौसमी भट्टाचार्य, जब मैं वहां (कलकत्ता हाई कोर्ट) था तो मैंने जिस तरह की पूछताछ की… अब मुझे यकीन है कि वे सभी वकीलों को संभाल सकती हैं।”जस्टिस दत्ता ने ज्यूडिशियरी में महिलाओं के रिप्रेजेंटेशन पर बातचीत को सिर्फ नंबरों तक सीमित करने के खिलाफ चेतावनी दी।</p><p style="text-align:justify;">“जब  समय का एक किस्सा भी सुनाया जब उन्होंने एक महिला वकील के प्रमोशन के सुझाव को मना कर दिया था।“एक जज ने मुझे फ़ोन किया और कहा कि छह लोगों के नाम रिकमेंड किए जा रहे हैं। महिला के नाम क्यों नहीं? मैंने उस जज से कहा नहीं। मैंने कहा कि वह वकील मेरे सामने पेश हुई और वह नासमझ है और मुझे उसे मैच्योर होने के लिए समय देना होगा।”</p><p style="text-align:justify;">जम्मू और कश्मीर हाई कोर्ट की पूर्व चीफ जस्टिस गीता मित्तल ने रविवार को खुलकर उन चुनौतियों के बारे में बात की जिनका सामना महिलाओं को ज्यूडिशियरी में आने और आगे बढ़ने में करना पड़ता है।</p><p style="text-align:justify;">सरकार ने कहा, "एक पुराना क्लाइंट आया और जब मैं आगे बढ़ी तो उसने कहा 'अरे यह सब लड़की दुल्हन मत दीजिए'। फिर एक पुरुष सहकर्मी उसके साथ चला गया। अगर मैंने तब आपत्ति जताई होती, तो यह खत्म हो गया होता।"</p><p style="text-align:justify;">सरकार ने आगे कहा कि महिला वकीलों को मेंटरशिप की कमी, सैलरी में अंतर और कोर्टरूम के अंदर के रवैये जैसी दूसरी रुकावटों का भी सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा, “मेंटरिंग की कमी है और उन्हें अच्छे सीनियर नहीं मिलते। फिर स्ट्रक्चरल पेमेंट का मुद्दा है। उनसे पूछा जाता है ‘कितना काम लेती हो? इतना तो पॉकेट मनी देंगे’। तो यह एक और मुद्दा है। फिर कोर्टरूम बायस आता है। जजों ने भी कई बार हमें गंभीरता से नहीं लिया है।”</p><h4 style="text-align:justify;"><strong> 12 लाख पेंडिंग केस, जज महज 110, 'भूखा और थका हूं' कहने वाले जज की क्या है मजबूरी</strong></h4><p style="text-align:justify;">इलाहाबाद हाईकोर्ट मुकदमों के बोझ तले दबा हुआ है. यहां नए-पुराने करीब 12 लाख केसेज पेंडिंग हैं. इनमें कई पुराने मुकदमे ऐसे हैं जिनका नए मुकदमों के बीच नंबर ही नहीं आ रहा है. मतलब साफ है न्याय के लिए लंबी वेटिंग चल रही है.<br /></p>]]>
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                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>जन समस्याएं</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 09 Mar 2026 22:57:42 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>छह साल तक फैसला न सुनाने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, इलाहाबाद हाइकोर्ट से तीन मामले अपने पास मंगाए</title>
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                        <![CDATA[<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाइकोर्ट द्वारा छह साल तक फैसला सुरक्षित रखने के बावजूद निर्णय न सुनाए जाने पर कड़ा रुख अपनाते हुए तीन आपराधिक पुनर्विचार याचिकाएं अपने पास स्थानांतरित कर ली हैं। इन मामलों के लंबित रहने के कारण वर्ष 1994 के एक हत्या मामले की सुनवाई वर्षों से ठप पड़ी हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 139ए का प्रयोग करते हुए कहा कि सामान्यतः अदालतें अनुच्छेद 32 की याचिका में इस तरह की असाधारण शक्ति का उपयोग नहीं करतीं लेकिन इस मामले में न्याय में हो रही असाधारण देरी से</p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172572/supreme-court-strict-on-not-giving-verdict-for-six-years"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/supream-court1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाइकोर्ट द्वारा छह साल तक फैसला सुरक्षित रखने के बावजूद निर्णय न सुनाए जाने पर कड़ा रुख अपनाते हुए तीन आपराधिक पुनर्विचार याचिकाएं अपने पास स्थानांतरित कर ली हैं। इन मामलों के लंबित रहने के कारण वर्ष 1994 के एक हत्या मामले की सुनवाई वर्षों से ठप पड़ी हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 139ए का प्रयोग करते हुए कहा कि सामान्यतः अदालतें अनुच्छेद 32 की याचिका में इस तरह की असाधारण शक्ति का उपयोग नहीं करतीं लेकिन इस मामले में न्याय में हो रही असाधारण देरी से पीड़ित पक्ष के त्वरित न्याय के अधिकार पर सीधा असर पड़ रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">पीठ ने कहा कि संबंधित तीनों आपराधिक पुनर्विचार याचिकाओं पर इलाहाबाद हाइकोर्ट में 5 फरवरी 2020 को सुनवाई पूरी हो चुकी थी और उसी दिन फैसला सुरक्षित रख लिया गया। इसके बाद अब तक कोई निर्णय नहीं दिया गया और मामले बार-बार सूचीबद्ध होकर टलते रहे। हाल ही में 4 फरवरी 2026 को भी मामले सूची में आए, लेकिन फिर स्थगित कर दिए गए।</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इन याचिकाओं पर लगी रोक के कारण ट्रायल कोर्ट में चल रहा मुकदमा आगे नहीं बढ़ सका, जिसके चलते 30 मई 1994 की घटना से जुड़ी आपराधिक कार्यवाही दशकों से रुकी हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">पीठ ने कहा, “इन मामलों का लंबित रहना केवल पक्षकारों का निजी विवाद नहीं रह गया। यह इस बात से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है कि मुकदमों में लंबी देरी न्याय प्रक्रिया की विश्वसनीयता को कैसे प्रभावित करती है और इससे अपूरणीय क्षति हो सकती है।”</p>
<p style="text-align:justify;">इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 139ए के तहत इलाहाबाद हाइकोर्ट में लंबित तीनों पुनर्विचार याचिकाओं को अपने पास मंगाने का आदेश दिया और उन्हें वर्तमान रिट याचिका के साथ जोड़कर सुनवाई करने का निर्णय लिया। अदालत ने इलाहाबाद हाइकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि तीन सप्ताह के भीतर सभी अभिलेख सुप्रीम कोर्ट भेजे जाएं।</p>
<p style="text-align:justify;">यह याचिका मृतक के कानूनी उत्तराधिकारी द्वारा अनुच्छेद 32 के तहत दायर की गई। याचिका में अनुच्छेद 14 और 21 के तहत त्वरित न्याय के अधिकार के उल्लंघन का मुद्दा उठाया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">मामले की शुरुआत वर्ष 1995 में दर्ज FIR से हुई, जिसमें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 147, 148, 149, 302 और 307 के तहत नौ लोगों को आरोपी बनाया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">एक अन्य आरोपी के खिलाफ मामला वर्ष 2004 में दर्ज हुआ, क्योंकि वह पहले फरार था। वर्ष 2008 में उत्तर प्रदेश सरकार ने आरोपी छोटेय सिंह के खिलाफ मुकदमा वापस लेने का प्रस्ताव दिया और 2012 में CrPC की धारा 321 के तहत आवेदन दाखिल किया। बाद में सरकार ने सभी आरोपियों के खिलाफ मुकदमा वापस लेने की मांग भी की।</p>
<p style="text-align:justify;">19 मई 2012 को ट्रायल कोर्ट ने छोटेय सिंह के खिलाफ अभियोजन वापसी की अनुमति दी, लेकिन अन्य आरोपियों के खिलाफ मुकदमा वापस लेने की मांग खारिज की।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी आदेश को चुनौती देते हुए आरोपियों ने हाइकोर्ट में आपराधिक पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल कीं, जबकि पीड़ित पक्ष ने छोटेय सिंह के खिलाफ मुकदमा वापस लेने के फैसले को चुनौती दी। इन याचिकाओं की सुनवाई इलाहाबाद हाइकोर्ट में पूरी होने के बाद 5 फरवरी 2020 को फैसला सुरक्षित रख लिया गया। उसी दौरान मुकदमे की सुनवाई पर रोक भी लगा दी गई, जो आज तक जारी रही।</p>
<p style="text-align:justify;">इस मामले से जुड़े एक अन्य पहलू पर सुप्रीम कोर्ट ने 15 जुलाई, 2024 को भी हस्तक्षेप किया। उस समय अदालत ने हाइकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए मामले का पुनर्मूल्यांकन करने का निर्देश दिया था और मुकदमे में हो रही देरी पर गंभीर चिंता व्यक्त की थी।</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने अब कहा कि जब तक लंबित पुनरीक्षण याचिकाओं पर निर्णय नहीं होता, तब तक 2024 के आदेश का प्रभावी पालन संभव नहीं है। इसलिए न्याय प्रक्रिया को प्रभावी बनाने और त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के लिए इन मामलों को अपने पास स्थानांतरित करना आवश्यक हो गया।</p>]]>
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                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 05 Mar 2026 22:39:53 +0530</pubDate>
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                <title>कैदी की आत्महत्या पर पूरी तरह से राज्य की ज़िम्मेदारी</title>
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                        <![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने हाल ही में कहा कि राज्य अपनी कस्टडी में किसी कैदी की अप्राकृतिक मौत के लिए पूरी तरह से ज़िम्मेदार है, भले ही मौत साफ़ तौर पर अप्राकृतिक आत्महत्या हो।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस शेखर बी सराफ और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने फैसला सुनाया कि भारत के संविधान के आर्टिकल 21 के तहत गारंटी वाला जीवन और इंसानी गरिमा का अधिकार एक अंदरूनी, अलंघनीय और हर जगह मौजूद अधिकार है, जो उस व्यक्ति को भी दिया जाता है जिसे राज्य ने गैर-कानूनी तरीके से गिरफ्तार और हिरासत में लिया हो।</p>
<p style="text-align:justify;">खंडपीठ ने प्रेमा देवी</p>...]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/170786/full-state-responsibility-for-prisoner-suicide"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/allahabad-high-court2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने हाल ही में कहा कि राज्य अपनी कस्टडी में किसी कैदी की अप्राकृतिक मौत के लिए पूरी तरह से ज़िम्मेदार है, भले ही मौत साफ़ तौर पर अप्राकृतिक आत्महत्या हो।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस शेखर बी सराफ और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने फैसला सुनाया कि भारत के संविधान के आर्टिकल 21 के तहत गारंटी वाला जीवन और इंसानी गरिमा का अधिकार एक अंदरूनी, अलंघनीय और हर जगह मौजूद अधिकार है, जो उस व्यक्ति को भी दिया जाता है जिसे राज्य ने गैर-कानूनी तरीके से गिरफ्तार और हिरासत में लिया हो।</p>
<p style="text-align:justify;">खंडपीठ ने प्रेमा देवी की रिट पिटीशन को मंज़ूरी दे दी, जिसमें उन्होंने पीलीभीत ज़िला जेल में अपने नाबालिग बेटे की अप्राकृतिक मौत के लिए मुआवज़े की मांग की थी। जवाब देने वालों को तीन हफ़्ते के अंदर मृतक के कानूनी वारिसों को दस लाख रुपये का मुआवज़ा देने का निर्देश देते हुए बेंच ने यूपी सरकार से मुआवज़ा तय करने के लिए गाइडलाइन बनाने को भी कहा।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;">याचिकाकर्ता का बेटा POCSO केस में अंडरट्रायल था। वह 20 फरवरी, 2024 को सुसाइड कर गया। वह जेल के टॉयलेट के वेंटिलेटर से लटका हुआ मिला। नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन (NHRC) ने पहले ₹3,00,000/- के मुआवजे की सिफारिश की थी। हालांकि, अधिकारियों के कोई कार्रवाई न करने के कारण यह पेमेंट नहीं किया गया। इसलिए याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।</p>
<p style="text-align:justify;">यह साफ तौर पर दावा किया गया कि मृतक को पुलिस वालों ने टॉर्चर किया, क्योंकि इस तरह के टॉर्चर से राहत के लिए गैर-कानूनी पैसे की मांग पूरी नहीं की गई, जिसके कारण आखिरकार उसकी अननैचुरल मौत हो गई।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरी ओर, राज्य ने तर्क दिया कि मृतक ने खुद को फांसी लगाकर जान दी। यह कहा गया कि यह घटना सुसाइड थी और रिकॉर्ड में ऐसा कोई मटीरियल नहीं था जिससे पता चले कि रेस्पोंडेंट अथॉरिटीज़ की तरफ से कोई लापरवाही, गलत काम या शामिल था। यह भी कहा गया कि एक बार पहचान का प्रोसेस पूरा हो जाने और सरकार से ज़रूरी बजट मिल जाने के बाद मंज़ूर किया गया मुआवज़ा कानून के हिसाब से जारी कर दिया जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि, खंडपीठ  ने ज़िम्मेदारी से बचने की राज्य की कोशिश खारिज की, क्योंकि उसने कहा कि कस्टोडियल डेथ इंडियन जस्टिस सिस्टम में फंडामेंटल राइट्स की सुरक्षा के लिए सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक है।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस सराफ ने बेंच के लिए लिखते हुए कहा कि यह 'हैरान करने वाली' बात है कि हमारे भारतीय संविधान में गैर-कानूनी हिरासत या कस्टोडियल डेथ के लिए मुआवज़ा देने का कोई साफ़ आदेश नहीं है। कोर्ट ने आगे कहा कि अगर कस्टडी में मौत नेचुरली होती है तो राज्य को इसके लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता। हालांकि, अगर मौत अप्राकृतिक हुई है तो राज्य अपने उस काम/चूक के लिए पूरी तरह से ज़िम्मेदार है जिसके कारण किसी व्यक्ति की मौत हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रुदुल साह बनाम बिहार राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले पर भी भरोसा किया, जिसमें कहा गया कि बुनियादी अधिकारों से वंचित करने पर मुआवज़े का आदेश देने से इनकार करना आज़ादी के अधिकार के प्रति सिर्फ़ दिखावटी वादा करना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने नीलाबती बेहरा बनाम उड़ीसा राज्य और डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को भी ध्यान में रखा, जिसमें यह कहा गया कि पैसे की भरपाई स्ट्रिक्ट लायबिलिटी के सिद्धांत पर आधारित एक सही और असरदार उपाय है, जिसके लिए सॉवरेन इम्यूनिटी का बचाव मौजूद नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">खास तौर पर मुआवज़े की रकम तय करते समय कोर्ट ने मेघालय हाईकोर्ट के एक फैसले (सुओ मोटो कस्टोडियल वायलेंस) की जांच की, जिसमें पीड़ित की उम्र के आधार पर मुआवज़े को कैटेगरी में बांटा गया। हालांकि, डिवीजन बेंच ने इसे आधिकारिक मिसाल के तौर पर मानने से यह देखते हुए इनकार किया कि उस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने मेघालय राज्य बनाम किलिंग जाना में रोक लगा दी थी।</p>
<p style="text-align:justify;"> लेकिन मरने वाले की अप्राकृतिक मौत के लिए राज्य पूरी तरह से ज़िम्मेदार है।खंडपीठ ने कहा, "...पुलिस की कस्टडी में किसी कैदी की मौत के लिए राज्य की ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है। कोई भी राज्य कैदियों को बेहतर सुविधाएं देने की अपनी ज़िम्मेदारियों से बच नहीं सकता। इसलिए इस मामले में कस्टोडियल डेथ का मामला बनता है।" इसे देखते हुए कोर्ट ने यह नतीजा निकाला कि यह संवैधानिक सुरक्षा का साफ़ उल्लंघन था, जिसके लिए संविधान के आर्टिकल 226 के तहत दखल देना ज़रूरी है। इसलिए कोर्ट ने रिट पिटीशन मंज़ूर कर ली और राज्य को तीन हफ़्ते के अंदर कानूनी वारिसों को मुआवज़े के तौर पर ₹10,00,000 देने का निर्देश दिया।</p>]]>
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                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 21 Feb 2026 22:02:46 +0530</pubDate>
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                <title>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्राइवेट प्रॉपर्टी पर नमाज़ पढ़ने से रोकने के लिए डीएम और एसएसपी  को अवमानना का नोटिस जारी किया</title>
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                        <![CDATA[<p style="text-align:justify;">इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मोहम्मद गंज गांव में एक प्राइवेट प्रॉपर्टी पर कुछ लोगों को नमाज़ पढ़ने से रोकने के लिए बरेली के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट और सीनियर सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस को कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट्स एक्ट के तहत नोटिस जारी किया है। [तारिक खान बनाम स्टेट ऑफ़ UP &amp; 2 अन्य]</p>
<p style="text-align:justify;">पिछले महीने, बेंच ने फैसला सुनाया था कि उत्तर प्रदेश में एक प्राइवेट प्रॉपर्टी में धार्मिक प्रार्थना सभा करने के लिए किसी परमिशन की ज़रूरत नहीं है। हालांकि, मोहम्मद गंज गांव के एक रहने वाले ने अधिकारियों पर फैसले का पालन न करने का आरोप लगाया।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस</p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/170295/allahabad-high-court-issues-contempt-notice-to-dm-and-ssp"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/इलाहाबाद-हाईकोर्ट.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मोहम्मद गंज गांव में एक प्राइवेट प्रॉपर्टी पर कुछ लोगों को नमाज़ पढ़ने से रोकने के लिए बरेली के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट और सीनियर सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस को कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट्स एक्ट के तहत नोटिस जारी किया है। [तारिक खान बनाम स्टेट ऑफ़ UP &amp; 2 अन्य]</p>
<p style="text-align:justify;">पिछले महीने, बेंच ने फैसला सुनाया था कि उत्तर प्रदेश में एक प्राइवेट प्रॉपर्टी में धार्मिक प्रार्थना सभा करने के लिए किसी परमिशन की ज़रूरत नहीं है। हालांकि, मोहम्मद गंज गांव के एक रहने वाले ने अधिकारियों पर फैसले का पालन न करने का आरोप लगाया।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की डिवीजन बेंच ने राज्य के वकील से उस अर्जी पर निर्देश मांगने को कहा जिसमें अधिकारियों को जगह पर प्रार्थना में दखल देने से रोकने के लिए निर्देश मांगे गए थे।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने आगे आदेश दिया, "इस कोर्ट के 27.01.2026 के आदेश, जो मारानाथा फुल गॉस्पेल मिनिस्ट्रीज़ बनाम स्टेट ऑफ़ यू.पी. और 2 अन्य : 2026:AHC:18364-DB में पास किया गया था, का उल्लंघन करने के लिए कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट्स एक्ट, 1971 के तहत रेस्पोंडेंट नंबर 2 और 3 को नोटिस जारी किया जाए।"</p>
<p style="text-align:justify;">इसने आदेश दिया कि इस केस को 11 मार्च को टॉप टेन केस में नए के तौर पर लिस्ट किया जाए। इसके अलावा, कोर्ट ने पिटीशनर के खिलाफ किसी भी कार्रवाई पर भी रोक लगा दी।बेंच ने निर्देश दिया, "लिस्टिंग की अगली तारीख तक, पिटीशनर के खिलाफ ज़बरदस्ती की कार्रवाई पर रोक रहेगी।"</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने पिछले महीने प्राइवेट जगह के अंदर प्रार्थना करने के अधिकार पर एक अहम फैसला सुनाया था। यह फैसला उत्तर प्रदेश सरकार की इस बात पर ध्यान देने के बाद सुनाया गया था कि कानून में इजाज़त लेने की कोई ज़रूरत नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने फैसला सुनाया कि भारत के संविधान के आर्टिकल 25 के तहत मिले फंडामेंटल राइट का हिस्सा होने वाले काम को करने के लिए कानून के तहत इजाज़त की ज़रूरत नहीं है। हालांकि, इसने यह भी साफ किया कि यह इस बात पर निर्भर करता है कि धार्मिक प्रार्थना सभा सिर्फ़ प्रॉपर्टी की प्राइवेट जगह के अंदर ही की जाए।यह फैसला 27 जनवरी को मारानाथा फुल गॉस्पेल मिनिस्ट्रीज़ और इमैनुएल ग्रेस चैरिटेबल ट्रस्ट की दो ऐसी ही पिटीशन पर सुनवाई करते हुए सुनाया गया था।</p>]]>
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                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 18 Feb 2026 22:45:28 +0530</pubDate>
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