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                <title>भारतीय राजनीति - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>भारतीय राजनीति RSS Feed</description>
                
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                <title>टूटती तृणमूल कांग्रेस और ममता: संगठनात्मक कमजोरी और जनविश्वास का संकट</title>
                                    <description><![CDATA[<blockquote class="format1"><strong>राजीव शुक्ल-संपादक </strong></blockquote>
<p>पश्चिम बंगाल की राजनीति में तीन दशक से छाई तृणमूल कांग्रेस आज अंदरूनी दरारों और संगठनात्मक टूटन के दौर से गुजर रही है। 2011 में 34 साल पुराने वाम मोर्चे को उखाड़ फेंकने वाली पार्टी अब खुद अपने ही वजन तले डगमगा रही दिखती है। तृणमूल की सबसे बड़ी समस्या बन गई है नेताओं की लगातार नाराजगी और दल-बदल। 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद भी कई विधायक, सांसद और जिला स्तर के नेता पार्टी छोड़कर भाजपा, कांग्रेस और वाम दलों में चले गए। शुभेंदु अधिकारी, मुकुल रॉय, राजीव बनर्जी जैसे कद्दावर नेताओं का जाना संगठन में भरोसे</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181935/disintegrating-trinamool-congress-and-mamta-organizational-weakness-and-crisis-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/images-(4).jpeg" alt=""></a><br /><blockquote class="format1"><strong>राजीव शुक्ल-संपादक </strong></blockquote>
<p>पश्चिम बंगाल की राजनीति में तीन दशक से छाई तृणमूल कांग्रेस आज अंदरूनी दरारों और संगठनात्मक टूटन के दौर से गुजर रही है। 2011 में 34 साल पुराने वाम मोर्चे को उखाड़ फेंकने वाली पार्टी अब खुद अपने ही वजन तले डगमगा रही दिखती है। तृणमूल की सबसे बड़ी समस्या बन गई है नेताओं की लगातार नाराजगी और दल-बदल। 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद भी कई विधायक, सांसद और जिला स्तर के नेता पार्टी छोड़कर भाजपा, कांग्रेस और वाम दलों में चले गए। शुभेंदु अधिकारी, मुकुल रॉय, राजीव बनर्जी जैसे कद्दावर नेताओं का जाना संगठन में भरोसे की कमी को दर्शाता है। नीचे के स्तर पर भी ब्लॉक और पंचायत स्तर पर गुटबाजी खुलकर सामने आ रही है।</p>
<p><br />नियोग, कोयला, गोरू तस्करी और राशन घोटाले जैसे मामलों में पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं के नाम सामने आए। ED और CBI की कार्रवाई ने संगठन की साख को नुकसान पहुंचाया। आम लोगों में यह धारणा मजबूत हुई है कि सत्ता के साथ भ्रष्टाचार भी जड़ें जमा चुका है। इससे जमीनी कार्यकर्ता हतोत्साहित हैं और मतदाता का एक हिस्सा विकल्प तलाश रहा है।<br />                  टीएमसी आज भी पूरी तरह ममता बनर्जी के व्यक्तित्व पर टिकी है। पार्टी का ढांचा संस्थागत कम, परिवार और करीबी नेताओं के इर्द-गिर्द ज्यादा केंद्रित है। अभिषेक बनर्जी के बढ़ते कद ने भी पुराने नेताओं में असहजता पैदा की है। जब कोई संगठन एक व्यक्ति पर निर्भर हो जाता है, तो उस व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य और राजनीतिक रणनीति ही पार्टी का भविष्य तय करने लगती है। फिलहाल ताजा खबर यह है कि टीएमसी एक और बड़ी टूट की कगार पर खड़ी है और यह निश्चित हो गया है कि विधानसभा चुनाव में हार के बाद अब टीएमसी को उभरने का मौका शायद ही मिल सके। कल सोमवार को नई दिल्ली में इंडिया गठबंधन की बैठक में ममता बनर्जी उपस्थित नज़र आईं तो वहीं दावा है कि उनकी पार्टी के 20 सांसदो ने बगावत कर दी है। सूचना है कि पार्टी के कई सांसद भाजपा नेताओं से मिलकर बगावत की रणनीति बना रहे थे।</p>
<p>केन्द्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के घर पर सोमवार को ही टीएमसी के कई सांसदों ने मुलाकात के बाद अलग गुट बनाने का दावा किया है। पता चला है कि इस बैठक में टीएमसी के पांच सांसद मौजूद रहे। इनमें शर्मिला सरकार, प्रसून बनर्जी, जगदीश बसुनिया, कालिपद सोरेन व अनूप चक्रवर्ती शामिल हैं। टीएमसी के लोकसभा में 28 व राज्यसभा में 12 सांसद हैं। सूत्र बताते हैं कि बागी सांसदों ने रविवार को एक बैठक की थी, और उसी वक्त अलग गुट बनाने का ऐलान कर टीएमसी को झटका दिया जाने पर विचार हुआ है।</p>
<p>जब विधायक दल में टूट हुई थी तो सांसदों के बग़ावत की चर्चाओं ने तूल पकड़ लिया था। ऐसा बताया जा रहा है कि बाग़ी सांसद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के भी संपर्क में हैं और बहुत ही जल्द एक नये गुट का ऐलान हो सकता है। टीएमसी की सांसद काकोली घोष ने दावा किया है कि बागी सांसदों ने एनडीए का समर्थन करने का फैसला किया है और लोकसभा स्पीकर को अपने फैसले से अवगत करा दिया है। कोई भी पार्टी जब चुनाव हारती है तब उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती होती है</p>
<p>अपनी पार्टी को टूट से बचाने की क्यों कि हर कोई सत्ता के लड्डू खाना चाहता है, बेकार में विपक्ष में अब कोई बैठना नहीं चाहता है। इसके लिए केंद्र में कांग्रेस में टूट, दिल्ली में आप में टूट उत्तर प्रदेश में सपा में टूट और महाराष्ट्र का उदाहरण देखा जा सकता है। यही संकट अब इस समय टीएमसी के ऊपर मंडरा रहा है। अब देखना यह है कि ममता बनर्जी अपनी पार्टी को टूटने से कितना बचा पातीं हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 17:45:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>‘मैं इस्तीफा नहीं दूंगी’:क्या यह  ब्यान संवैधानिक है या लोकतांत्रिक मर्यादाओं का अतिक्रमण?”</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
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<div style="text-align:justify;"><strong>लेखक:प्रो.(डा.) मनमोहन प्रकाश </strong></div>
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<div style="text-align:justify;">भारतीय लोकतंत्र में राजनेताओं द्वारा दिये गये ब्यान केवल शब्द या अभिव्यक्ति नहीं होते, वे व्यवस्था की दिशा भी तय करते हैं और राजनेताओं का आचरण। जब माननीय मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जैसा वरिष्ठ नेतृत्व विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी और स्वयं के हार के बाद यह वक्तव्य देता है कि “मैं इस्तीफा नहीं दूंगी”, तो यह एक साधारण राजनीतिक वक्तव्य नहीं रह जाता, बल्कि संवैधानिकता, नैतिकता और लोकतांत्रिक परंपराओं पर गहन बहस का विषय बन जाता है।</div>
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<div style="text-align:justify;">भारत का शासन तंत्र संसदीय लोकतंत्र पर आधारित है और संविधान द्वारा संचालित। राज्य स्तर पर मुख्यमंत्री की वैधता विधानसभा</div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178321/%E2%80%98i-will-not-resign%E2%80%99is-this-statement-constitutional-or-a-violation"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/hq720.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div>
<div style="text-align:justify;"><strong>लेखक:प्रो.(डा.) मनमोहन प्रकाश </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारतीय लोकतंत्र में राजनेताओं द्वारा दिये गये ब्यान केवल शब्द या अभिव्यक्ति नहीं होते, वे व्यवस्था की दिशा भी तय करते हैं और राजनेताओं का आचरण। जब माननीय मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जैसा वरिष्ठ नेतृत्व विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी और स्वयं के हार के बाद यह वक्तव्य देता है कि “मैं इस्तीफा नहीं दूंगी”, तो यह एक साधारण राजनीतिक वक्तव्य नहीं रह जाता, बल्कि संवैधानिकता, नैतिकता और लोकतांत्रिक परंपराओं पर गहन बहस का विषय बन जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत का शासन तंत्र संसदीय लोकतंत्र पर आधारित है और संविधान द्वारा संचालित। राज्य स्तर पर मुख्यमंत्री की वैधता विधानसभा में बहुमत से निर्धारित होती है।यदि किसी दल या गठबंधन के पास बहुमत नहीं है, तो वह सरकार बनाने का नैतिक और संवैधानिक अधिकार खो देता है।ऐसी स्थिति में या तो वैकल्पिक बहुमत सिद्ध किया जाता है या पद छोड़ना पड़ता है।इस दृष्टि से “बहुमत के बिना इस्तीफा न देने” का कथन या यूं कहें बहुमत वाले दल के लिए सक्ता हस्तांतरण हेतु पद न  छोड़ने जैसे वक्तव्य संवैधानिक भावना के विपरीत प्रतीत होते हैं। भारत में इस तरह का ब्यान शायद अपने आप में पहला है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">संविधान केवल प्रावधानों का दस्तावेज नहीं, बल्कि संवैधानिक नैतिकता का भी आधार है।डॉ. भीमराव आंबेडकर ने स्पष्ट कहा था कि संविधान की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसे लागू करने वाले लोग कितनी ईमानदारी से उसका पालन करते हैं।ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है,क्या इस तरह के ब्यान देने  की प्रवृत्ति लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है?क्या यह जनादेश का अपमान नहीं है?</div>
<div style="text-align:justify;">ममता दीदी पर मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान महामहिम राष्ट्रपति के प्रदेश आगमन पर उन्हें प्रोटोकॉल के अनुरूप सम्मान न देना, केन्द्रीय जांच एजेंसियों को सहयोग न करना, जांच में व्यवधान उत्पन्न करना,सघन मतदाता जांच का विरोध करना, चुनाव आयोग के अधिकारियों के कार्यों में व्यवधान उत्पन्न करना, समुदाय विशेष को लाभ पहुंचाना जैसे बहुत सारे आरोप समय-समय पर लगते रहे हैं। इनमें कितने आरोप संवैधानिक रूप से सही है या नहीं यह न्यायलय का तय करना का विषय है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे प्रकरण का सबसे दिलचस्प और चिंताजनक पहलू विपक्षी दलों की ममता दीदी के इस्तीफा न देने वाले ब्यान पर प्रतिक्रिया न आना  है।जहाँ एक ओर समय-समय पर कई विपक्षी दल बार-बार यह आरोप लगाते रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी के शासन में “संविधान खतरे में है”, वहीं दूसरी ओर ममता दीदी के इस स्पष्ट बयान पर न तो विपक्षी दलों द्वारा अपेक्षित विरोध किया और न ही कोई  समझाइश दी गई अपितु 100 सीटों की चोरी के आरोप का समर्थन कर चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर प्रश्न खड़े कर दिए, जबकि चुनाव में धांधली हुई या नहीं इसको तय करने के लिए न्यायालय, और उसकी शरण में जाना चाहिए यदि किसी प्रकार की आशंका है। चुनाव आयोग की हिंसा रहित निष्पक्ष चुनाव कराने के श्रम पर पानी फेरने से बचना चाहिए।ऐसा मौन समर्थन क्या भारतीय संविधान को खतरे में नहीं डालता? वास्तव में यह विरोधाभास कई सवाल खड़े करता है:क्या संविधान की चिंता केवल राजनीतिक सुविधा का विषय है?क्या संवैधानिक मूल्यों की रक्षा का पैमाना दलगत आधार पर बदल जाता है?यदि एक ओर “संविधान खतरे में” का नरेटिव गढ़ा जाए और दूसरी ओर ऐसे बयानों पर चुप्पी साध ली जाए, तो क्या यह उस नरेटिव की विश्वसनीयता को कमजोर नहीं करता ?</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लोकतंत्र केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं, बल्कि सिद्धांतों की निरंतरता का नाम है।जब राजनीतिक दल अपने विरोधियों के लिए एक मानक और अपने सहयोगियों के लिए दूसरा मानक अपनाते हैं तो इससे लोकतांत्रिक विमर्श का स्तर गिरता है।इस संदर्भ में यह स्पष्ट होता है कि:संविधान की रक्षा का प्रश्न चयनात्मक नहीं हो सकता;लोकतांत्रिक मूल्यों की कसौटी सभी पर समान रूप से लागू होनी चाहिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मेरा ऐसा मानना है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति से उठा यह मुद्दा राष्ट्रीय बहस का विषय बन चुका है।“बहुमत हासिल न करने पर भी मैं इस्तीफा नहीं दूंगी” जैसा कथन-संवैधानिक रूप से संदिग्ध और लोकतांत्रिक दृष्टि से अनुपयुक्त प्रतीत होता है।</div>
<div style="text-align:justify;">इसके साथ ही विपक्ष की चुप्पी यह संकेत देती है कि भारतीय राजनीति में सिद्धांतों की बजाय सुविधा का प्रभाव बढ़ रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि-सत्ता या विपक्ष में कोई भी बैठे,सबके लिए संविधान सर्वोपरि रहे, और जनादेश का सम्मान अनिवार्य।</div>
</div>
<div class="yj6qo" style="text-align:justify;"> </div>
<div class="adL" style="text-align:justify;"> </div>
</div>
</div>
</div>
<div class="hq gt" style="text-align:justify;"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 06 May 2026 16:54:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>विकसित बिहार की सपना सरकार करने के लिए सद्भाव यात्रा पर निकले जदयू नेता इंo निशांत कुमार को यात्रा की सफलता के बधाई एवं शुभकामनाएं</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>  गोपालगंज,(बिहार )-</strong>विकसित बिहार के सपना साकार करने के लिए सद्भाव यात्रा पर निकले जदयू नेता ईo निशांत कुमार की यात्रा की सफलता के लिए जनता गोपालगंज जनता दल यूनाइटेड जिला अध्यक्ष प्रमोद कुमार पटेल ने उन्हें बधाई एवं शुभकामनाएं दिया है श्री पटेल ने कहा कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बिहार के शिल्पकार पूर्व मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार  ने बिहार को विकास के शिखर पर पहुंचा है उनके पुत्र निशांत कुमार उनके पद चिन्हों पर चलकर बिहार के चंपारण की पावन धरती से जो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी  की कर्मभूमि रही है निशांत कुमार संघर्ष, समर्पण, सेवा और सद्भाव  के</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178011/congratulations-and-best-wishes-for-the-success-of-the-journey"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/1000089855.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong> गोपालगंज,(बिहार )-</strong>विकसित बिहार के सपना साकार करने के लिए सद्भाव यात्रा पर निकले जदयू नेता ईo निशांत कुमार की यात्रा की सफलता के लिए जनता गोपालगंज जनता दल यूनाइटेड जिला अध्यक्ष प्रमोद कुमार पटेल ने उन्हें बधाई एवं शुभकामनाएं दिया है श्री पटेल ने कहा कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बिहार के शिल्पकार पूर्व मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार  ने बिहार को विकास के शिखर पर पहुंचा है उनके पुत्र निशांत कुमार उनके पद चिन्हों पर चलकर बिहार के चंपारण की पावन धरती से जो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी  की कर्मभूमि रही है निशांत कुमार संघर्ष, समर्पण, सेवा और सद्भाव  के संकल्प के साथ बिहार के विकास को आगे बढ़ाने के लिए सद्भाव यात्रा पर निकल रहे है उनके साथ बिहार प्रदेश जनता दल यूनाइटेड के सम्मानित प्रदेश अध्यक्ष सह विधायक उमेश सिंह कुशवाहा  बिहार विधानसभा में पार्टी विधायक दल के नेता पूर्व मंत्री श्री श्रवण कुमार   मुख्य रूप से है! श्री पटेल ने कहा कि निशांत कुमार  संगठन को सशक्त बनाने और पार्टी के एक एक </div>
<div style="text-align:justify;">कार्यकर्ता से मिलेंगे बात करेगे और संगठन की समस्याओं को नजदीक से समझेगे!</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>बिहार/झारखंड</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 03 May 2026 18:57:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>एग्जिट पोल की सच्चाई — लोकतंत्र का आईना या मीडिया का मुखौटा?</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब आंकड़ों की चकाचौंध सच का मुखौटा पहनने लगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी सवाल उठाना जरूरी हो जाता है—</span>29 <span lang="hi" xml:lang="hi">अप्रैल </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">की वह शाम ठीक ऐसी ही थी। मतदान खत्म होते ही टीवी स्क्रीन पर एग्जिट पोल का सैलाब उमड़ पड़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानो जनादेश पहले ही लिख दिया गया हो। पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के दावे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असम में प्रचंड बहुमत की भविष्यवाणी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दक्षिण भारत में कड़े मुकाबले के संकेत—हर चैनल अपनी कहानी गढ़ रहा था। इन आंकड़ों की चमक ने माहौल को रोमांचक जरूर बनाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन भीतर ही भीतर एक संशय भी जन्म लेने लगा। क्या ये</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177774/the-truth-of-exit-polls-%E2%80%93-mirror-of-democracy-or"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/exit-poll.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब आंकड़ों की चकाचौंध सच का मुखौटा पहनने लगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी सवाल उठाना जरूरी हो जाता है—</span>29 <span lang="hi" xml:lang="hi">अप्रैल </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">की वह शाम ठीक ऐसी ही थी। मतदान खत्म होते ही टीवी स्क्रीन पर एग्जिट पोल का सैलाब उमड़ पड़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानो जनादेश पहले ही लिख दिया गया हो। पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के दावे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असम में प्रचंड बहुमत की भविष्यवाणी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दक्षिण भारत में कड़े मुकाबले के संकेत—हर चैनल अपनी कहानी गढ़ रहा था। इन आंकड़ों की चमक ने माहौल को रोमांचक जरूर बनाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन भीतर ही भीतर एक संशय भी जन्म लेने लगा। क्या ये अनुमान सचमुच जनता के मन की गहराइयों को छू रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या फिर यह केवल एक ऐसा परदा है जो सच्चाई को ढककर भ्रम का नया संसार रच रहा है</span>?</p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब पूर्वानुमान ही परिणाम बनने लगें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब लोकतंत्र की दिशा पर सवाल उठना स्वाभाविक है—एग्जिट पोल अब केवल प्रक्रिया नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि प्रभावशाली शक्ति हैं। ये आंकड़े दलों के आत्मविश्वास को बढ़ा-घटा सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाजार की दिशा तय कर सकते हैं और मतदाता की सोच प्रभावित कर सकते हैं। </span>2024 <span lang="hi" xml:lang="hi">के लोकसभा चुनाव में बड़े अनुमान वास्तविक नतीजों से अलग रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे केवल समीकरण ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जनता का भरोसा भी डगमगाया। </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">में भी वही तस्वीर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां हर चैनल अपनी गणना से विजेता तय कर रहा है। ऐसे में चिंता बढ़ती है कि क्या हम इन अनुमानों से लोकतंत्र की सच्चाई समझ रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या अनजाने में उसके मूल स्वरूप को कमजोर कर रहे हैं।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब मतदाता का मन ही रहस्य बन जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब उसे आंकड़ों में बांधना कठिन हो जाता है—भारत जैसे विविध देश में यह पहेली और गहरी है। यहां निर्णय केवल विचारधारा पर नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि जाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षेत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थानीय मुद्दों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्तिगत अनुभवों और भावनात्मक प्रतिक्रियाओं के मिश्रण पर आधारित होता है। कई बार मतदाता अपनी वास्तविक राय छिपा लेते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे एग्जिट पोल की सटीकता पर सवाल उठते हैं। </span>2021 <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>2024 <span lang="hi" xml:lang="hi">के चुनावों में ‘साइलेंट वोटर’ ने सभी अनुमानों को ध्वस्त कर दिया। </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">में भी यह अनदेखी ताकत सक्रिय हो सकती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो किसी भी सर्वेक्षण को चुनौती दे सकती है। यही वह बिंदु है जहां एग्जिट पोल की सीमाएं स्पष्ट होती हैं—वे आंकड़े दिखाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन की गहराइयों को नहीं पढ़ पाते।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हर शोर में भ्रम नहीं होता—कुछ आवाजें सच भी कहती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और एग्जिट पोल उसी सच की झलक बन सकते हैं। फिर भी यह कहना गलत होगा कि इनका कोई महत्व नहीं है। जब ये ईमानदारी और वैज्ञानिक पद्धति से किए जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो ये समाज के उन वर्गों की आवाज बनते हैं जो अक्सर मुख्यधारा से दूर रहते हैं। गांवों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कस्बों और हाशिए के समुदायों की राय सामने लाते हैं। यह लोकतंत्र की सकारात्मक झलक भी देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां हर आवाज मायने रखती है। चुनाव आयोग के नियम (सेक्शन </span>126A) <span lang="hi" xml:lang="hi">इनके दुरुपयोग को रोकने का प्रयास करते हैं। लेकिन टीआरपी की दौड़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजनीतिक दबाव और व्यावसायिक हित अक्सर इन आदर्शों को कमजोर कर देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे निष्पक्षता पर सवाल उठने लगते हैं।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब सच का आईना टेढ़ा दिखने लगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब खतरा गहराना तय है—एग्जिट पोल यदि वास्तविकता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका विकृत प्रतिबिंब बन जाएं तो असर दूर तक जाता है। जब ये अनुमान गलत साबित होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो प्रभाव केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रहता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि जनता के विश्वास पर भी पड़ता है। </span>2024 <span lang="hi" xml:lang="hi">में दिखी आर्थिक और मानसिक अस्थिरता इस बात का प्रमाण है कि गलत अनुमान बड़ी कीमत वसूलते हैं। यदि </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">के परिणाम भी इन पूर्वानुमानों से अलग निकलते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह केवल तकनीकी त्रुटि नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर सवाल होगा। तब यह पूछना लाजमी होगा कि क्या हम डेटा के नाम पर भ्रम को बढ़ावा दे रहे हैं</span>?</p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब अनुमान की सीमाएं खुद स्वीकार हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब सटीकता पर सवाल स्वाभाविक है—भारत जैसे विशाल देश में भविष्यवाणी करना बेहद कठिन है। सैंपलिंग की सीमाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जमीनी डेटा जुटाने की चुनौतियां और अंतिम क्षणों में मतदाता के मन में बदलाव—ये सभी एग्जिट पोल की विश्वसनीयता को प्रभावित करते हैं। फिर भी ये पूरी तरह निरर्थक नहीं हैं। ये रुझान समझने का माध्यम देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दलों को रणनीति पर पुनर्विचार के लिए प्रेरित करते हैं और जनता को चर्चा का आधार देते हैं। लेकिन समस्या तब होती है जब इन्हें अंतिम सत्य मान लिया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे भ्रम और अपेक्षाओं का टकराव पैदा होता है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब मतदाता का फैसला हर बार अनुमान को चौंका दे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब उसकी अप्रत्याशितता ही उसकी असली पहचान बन जाती है—भारतीय मतदाता यही साबित करता आया है। इतिहास गवाह है कि यहां अंतिम क्षण का निर्णय कई बार सभी अनुमानों को धता बता देता है। </span>2004 <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>2024 <span lang="hi" xml:lang="hi">के चुनाव इसके स्पष्ट उदाहरण हैं। यह दिखाता है कि लोकतंत्र की असली ताकत किसी सर्वेक्षण में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि जनता की स्वतंत्र सोच और निर्णय क्षमता में है। एग्जिट पोल इस जटिलता को पूरी तरह नहीं समझ पाते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि वे केवल सतह को छूते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गहराई को नहीं।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब नजर संतुलित हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी सच साफ दिखता है—एग्जिट पोल को लेकर यही सबसे बड़ा समाधान है। ये न पूरी तरह गलत हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न पूरी तरह सही—इनका मूल्य इस बात पर निर्भर करता है कि हम इन्हें कैसे देखते हैं। यदि इन्हें संकेतक माना जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो ये उपयोगी हैं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन यदि अंतिम निर्णय मान लिया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो भ्रम पैदा करते हैं। </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">के इन महत्वपूर्ण चुनावों में जरूरी है कि हम आंकड़ों की चमक से प्रभावित होने के बजाय वास्तविकता की प्रतीक्षा करें। क्योंकि लोकतंत्र की सच्ची तस्वीर वही होती है जो मतपेटियों से निकलती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि वह जो स्क्रीन पर दिखाई जाती है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 01 May 2026 16:44:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पांच राज्यों के चुनाव परिणाम को लेकर देशभर में बढ़ती उत्सुकता और राजनीतिक भविष्य की दिशा</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">देश के पांच महत्वपूर्ण राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के बाद अब पूरे देश की नजर आने वाले परिणामों पर टिकी हुई है। मतदान समाप्त होने के साथ ही विभिन्न एजेंसियों द्वारा जारी किए गए एग्जिट पोल ने राजनीतिक माहौल को और अधिक गर्म कर दिया है ।हर गली हर शहर और हर राजनीतिक मंच पर यही चर्चा है कि आखिर किसकी सरकार बनेगी और कौन मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठेगा ।हालांकि यह भी सच है कि एग्जिट पोल केवल अनुमान होते हैं और कई बार ये वास्तविक परिणामों से काफी अलग साबित हुए हैं। इसलिए अंतिम फैसला तो मतगणना</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177667/there-is-increasing-curiosity-across-the-country-regarding-the-election"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/img-20250331-wa0163.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">देश के पांच महत्वपूर्ण राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के बाद अब पूरे देश की नजर आने वाले परिणामों पर टिकी हुई है। मतदान समाप्त होने के साथ ही विभिन्न एजेंसियों द्वारा जारी किए गए एग्जिट पोल ने राजनीतिक माहौल को और अधिक गर्म कर दिया है ।हर गली हर शहर और हर राजनीतिक मंच पर यही चर्चा है कि आखिर किसकी सरकार बनेगी और कौन मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठेगा ।हालांकि यह भी सच है कि एग्जिट पोल केवल अनुमान होते हैं और कई बार ये वास्तविक परिणामों से काफी अलग साबित हुए हैं। इसलिए अंतिम फैसला तो मतगणना के दिन ही होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन चुनावों में असम केरल पश्चिम बंगाल तमिलनाडु और पुदुचेरी जैसे राज्यों की राजनीति दांव पर लगी हुई है ।हर राज्य का राजनीतिक परिदृश्य अलग है और वहां की जनता के मुद्दे भी भिन्न हैं। ऐसे में इन चुनावों के परिणाम केवल सरकारों का गठन ही तय नहीं करेंगे बल्कि यह देश की व्यापक राजनीतिक दिशा को भी प्रभावित करेंगे। असम में एग्जिट पोल के अनुसार सत्तारूढ़ दल को बढ़त मिलती दिख रही है और लगातार तीसरी बार सरकार बनने की संभावना जताई जा रही है यदि ऐसा होता है तो यह राज्य की राजनीति में स्थिरता का संकेत होगा वहीं विपक्ष के लिए यह एक बड़ी चुनौती होगी कि वह अपनी रणनीति को पुनः परिभाषित करे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">केरल में स्थिति कुछ अलग नजर आती है यहां एग्जिट पोल में सत्ता परिवर्तन की संभावना जताई जा रही है यदि यह अनुमान सही साबित होता है तो यह राज्य की पारंपरिक राजनीतिक प्रवृत्ति के अनुरूप होगा जहां जनता समय समय पर सरकार बदलती रही है। इससे यह संकेत मिलता है कि मतदाता अपने अधिकारों के प्रति सजग हैं और वे प्रदर्शन के आधार पर निर्णय लेते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल का चुनाव इस बार सबसे अधिक चर्चा में रहा है। यहां मुकाबला बेहद कड़ा बताया जा रहा है ।एग्जिट पोल के अनुसार दोनों प्रमुख दलों के बीच कांटे की टक्कर है कुछ अनुमानों में एक पक्ष को बढ़त दिखाई गई है तो कुछ में दूसरे को यह स्थिति इस बात का संकेत देती है कि राज्य में राजनीतिक ध्रुवीकरण काफी गहरा है और मतदाताओं ने सोच समझकर मतदान किया है। तमिलनाडु में एग्जिट पोल के अनुसार वर्तमान सरकार की वापसी की संभावना जताई गई है यदि ऐसा होता है तो यह वहां की जनता द्वारा स्थिरता और निरंतरता को प्राथमिकता देने का संकेत होगा। साथ ही यह भी दर्शाता है कि राज्य में क्षेत्रीय दलों की पकड़ अभी भी मजबूत है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पुदुचेरी में भी राजनीतिक समीकरण दिलचस्प बने हुए हैं। यहां एग्जिट पोल में मौजूदा गठबंधन को बढ़त मिलती दिख रही है हालांकि छोटे राज्यों में अक्सर परिणाम अप्रत्याशित भी हो सकते हैं इसलिए यहां भी अंतिम नतीजों का इंतजार करना जरूरी है। एग्जिट पोल को लेकर एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इनका इतिहास पूरी तरह विश्वसनीय नहीं रहा है कई बार ये वास्तविक परिणामों के काफी करीब रहे हैं लेकिन कई बार पूरी तरह गलत भी साबित हुए हैं। उदाहरण के तौर पर पहले भी कई चुनावों में एग्जिट पोल ने एक पक्ष की जीत का दावा किया लेकिन परिणाम ठीक इसके उलट आए ,इससे यह स्पष्ट होता है कि मतदाताओं का अंतिम निर्णय अक्सर अनुमान से परे होता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">देशभर में इन चुनावों को लेकर उत्साह का माहौल है ।चाय की दुकानों से लेकर सोशल मीडिया तक हर जगह लोग अपने अपने अनुमान लगा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक विभिन्न आंकड़ों और रुझानों के आधार पर भविष्यवाणी कर रहे हैं। वहीं आम जनता भी इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया में गहरी रुचि दिखा रही है। इन चुनावों का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि इसमें महिलाओं और युवाओं की भागीदारी काफी अधिक रही है। कई स्थानों पर महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों से अधिक दर्ज की गई है यह लोकतंत्र के लिए एक सकारात्मक संकेत है क्योंकि इससे यह स्पष्ट होता है कि समाज के सभी वर्ग अपनी भूमिका निभा रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके अलावा इन चुनावों में स्थानीय मुद्दों के साथ साथ राष्ट्रीय मुद्दों का भी प्रभाव देखा गया है ।विकास ,रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून व्यवस्था जैसे विषय मतदाताओं के निर्णय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते नजर आए हैं। राजनीतिक दलों ने भी अपने अपने घोषणापत्र में इन मुद्दों को प्रमुखता दी है। चुनाव परिणाम केवल सरकार गठन तक सीमित नहीं होते बल्कि यह आने वाले समय की नीतियों और योजनाओं को भी प्रभावित करते हैं ,इसलिए इन परिणामों का महत्व और भी बढ़ जाता है ।यह तय करेंगे कि किस दिशा में विकास की नीतियां आगे बढ़ेंगी और जनता की अपेक्षाओं को किस प्रकार पूरा किया जाएगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हालांकि यह भी जरूरी है कि हम एग्जिट पोल को अंतिम सत्य न मानें यह केवल एक संकेत हैं न कि निष्कर्ष वास्तविक परिणाम ही यह तय करेंगे कि जनता ने किसे अपना समर्थन दिया है ।इसलिए धैर्य बनाए रखना और आधिकारिक नतीजों का इंतजार करना ही उचित होगा।</div>
<div style="text-align:justify;">अंत में यह कहा जा सकता है कि पांच राज्यों के ये चुनाव देश के लोकतांत्रिक ढांचे की मजबूती को दर्शाते हैं। मतदाताओं की सक्रिय भागीदारी और चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र केवल एक व्यवस्था नहीं बल्कि एक जीवंत परंपरा है।</div>
<div style="text-align:justify;">अब सभी की नजरें मतगणना के दिन पर टिकी हुई हैं जब यह स्पष्ट हो जाएगा कि किसकी सरकार बनेगी और कौन मुख्यमंत्री बनेगा तब तक अटकलों और चर्चाओं का दौर जारी रहेगा लेकिन अंतिम निर्णय जनता के मतों के आधार पर ही होगा और यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है।</div>
<div style="text-align:justify;">          *कान्तिलाल मांडोत*</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 17:12:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कांग्रेस नेता पवन खेड़ा पहुंचे सुप्रीम कोर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने गौहाटी उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। बता दें कि, गौहाटी उच्च न्यायालय ने मानहानि और जालसाजी के एक मामले में उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी।  यह मामला असम पुलिस ने उनके खिलाफ दर्ज किया है। पवन खेड़ा ने अपनी अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने के बाद शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के मुताबिक, खेड़ा ने रविवार को एक स्पेशल लीव पिटीशन (एसएलपी) दायर की है, और इस मामले को डायरी नंबर 25523/2026 के तौर</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177433/congress-leader-pawan-kheda-reached-supreme-court-and-challenged-assam"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/8figkh4o_pawan-khera-pti_625x300_27_april_23.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने गौहाटी उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। बता दें कि, गौहाटी उच्च न्यायालय ने मानहानि और जालसाजी के एक मामले में उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी।  यह मामला असम पुलिस ने उनके खिलाफ दर्ज किया है। पवन खेड़ा ने अपनी अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने के बाद शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के मुताबिक, खेड़ा ने रविवार को एक स्पेशल लीव पिटीशन (एसएलपी) दायर की है, और इस मामले को डायरी नंबर 25523/2026 के तौर पर रजिस्टर किया गया है। शाम करीब 6.26 बजे दायर की गई यह याचिका फिलहाल 'पेंडिंग' के तौर पर लिस्टेड है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह याचिका गौहाटी हाईकोर्ट की ओर से खेड़ा को गिरफ्तारी से पहले जमानत देने से इनकार करने के दो दिन बाद आई है। जस्टिस पार्थिवज्योति सैकिया की सिंगल-जज बेंच ने फैसला सुनाया था कि कांग्रेस नेता 'गिरफ्तारी से पहले जमानत का विशेषाधिकार पाने के हकदार नहीं हैं।'</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">गौहाटी हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज करते हुए कहा था कि इस मामले को सिर्फ मानहानि का मामला नहीं कहा जा सकता। भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 की धारा 339 के तहत पहली नजर में मामला बनने के सबूत मौजूद हैं।असम पुलिस ने उनके खिलाफ मानहानि और जालसाजी का मामला दर्ज किया था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह मामला असम के मुख्यमंत्री हिमंत कुमार सरमा की पत्नी रिनिकी भुइयां सरमा ने दर्ज कराया है। उन्होंने खेड़ा के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई थी। खेड़ा ने हाल ही में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया था कि रिनिकी भुइयां सरमा के पास कई विदेशी पासपोर्ट और विदेशों में अघोषित संपत्तियां हैं।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 18:35:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>आप में सियासी भूचाल दलबदल कानून के घेरे में 7 राज्यसभा सांसदों का भविष्य</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">देश की राजनीति में एक बार फिर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है जिसने संसद से लेकर राजनीतिक गलियारों तक हलचल मचा दी है। आम आदमी पार्टी में आई इस बड़ी टूट ने न केवल पार्टी के आंतरिक हालात को उजागर किया है बल्कि दलबदल विरोधी कानून की प्रासंगिकता और उसकी सीमाओं पर भी नई बहस छेड़ दी है। राज्यसभा के कई सांसदों द्वारा पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने की घोषणा के बाद अब यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या ये सांसद अपनी सदस्यता बनाए रख पाएंगे या उन्हें अयोग्य घोषित किया जाएगा।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177385/political-turmoil-in-aap-future-of-7-rajya-sabha-mps"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/indian-politics-defection-crisis-jaychand-mirjafar-analysis.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">देश की राजनीति में एक बार फिर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है जिसने संसद से लेकर राजनीतिक गलियारों तक हलचल मचा दी है। आम आदमी पार्टी में आई इस बड़ी टूट ने न केवल पार्टी के आंतरिक हालात को उजागर किया है बल्कि दलबदल विरोधी कानून की प्रासंगिकता और उसकी सीमाओं पर भी नई बहस छेड़ दी है। राज्यसभा के कई सांसदों द्वारा पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने की घोषणा के बाद अब यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या ये सांसद अपनी सदस्यता बनाए रख पाएंगे या उन्हें अयोग्य घोषित किया जाएगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे मामले के केंद्र में हैं राघव चड्ढा जिनके साथ कई अन्य सांसदों ने भी पार्टी छोड़ने का दावा किया है। इनके साथ संदीप पाठक अशोक मित्तल विक्रम साहनी हरभजन सिंह स्वाति मालीवाल और नरेंद्र गुप्ता जैसे नामों का भी उल्लेख किया जा रहा है। इन सभी के बारे में कहा जा रहा है कि उन्होंने आम आदमी पार्टी से अलग होकर भाजपा का रुख किया है। इस दावे ने राजनीतिक माहौल को और अधिक गरमा दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दूसरी ओर संजय सिंह ने इस पूरे घटनाक्रम को लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ बताते हुए कड़ा विरोध जताया है। उन्होंने राज्यसभा के सभापति और देश के उपराष्ट्रपति सी पी राधाकृष्णन को याचिका सौंपकर इन सात सांसदों को अयोग्य घोषित करने की मांग की है। उनका कहना है कि इन सांसदों ने संविधान की दसवीं अनुसूची का स्पष्ट उल्लंघन किया है जो दलबदल को रोकने के लिए बनाई गई थी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत में दलबदल विरोधी कानून जिसे दसवीं अनुसूची के नाम से जाना जाता है वर्ष 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए लागू किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य राजनीतिक दलों में स्थिरता बनाए रखना और निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए पार्टी बदलने की प्रवृत्ति को रोकना था। इस कानून के तहत यदि कोई सांसद या विधायक स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है तो उसे अयोग्य घोषित किया जा सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस कानून में एक और महत्वपूर्ण प्रावधान है जो पार्टी व्हिप से जुड़ा हुआ है। यदि कोई सांसद सदन में अपनी पार्टी के निर्देशों के खिलाफ वोट करता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है तो भी उसे अयोग्यता का सामना करना पड़ सकता है। इस नियम का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पार्टी अनुशासन बना रहे और सरकार या विपक्ष की रणनीति प्रभावित न हो।</div>
<div style="text-align:justify;">निर्दलीय सदस्यों के लिए भी इस कानून में स्पष्ट नियम हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यदि कोई निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव जीतने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है तो उसे तुरंत अयोग्य घोषित किया जा सकता है। इससे यह सुनिश्चित किया जाता है कि मतदाता जिस स्वतंत्र उम्मीदवार को चुनते हैं वह बाद में किसी दल का हिस्सा बनकर उनकी अपेक्षाओं के साथ समझौता न करे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हालांकि इस कानून में एक महत्वपूर्ण अपवाद भी है जिसे विलय का प्रावधान कहा जाता है। इसके अनुसार यदि किसी दल के दो तिहाई या उससे अधिक सदस्य एक साथ किसी अन्य दल में शामिल हो जाते हैं तो इसे दलबदल नहीं बल्कि वैध विलय माना जाता है और ऐसे सदस्यों को अयोग्यता से छूट मिल जाती है। यही वह बिंदु है जिस पर इस पूरे मामले का भविष्य काफी हद तक निर्भर करेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अब सवाल यह है कि क्या आम आदमी पार्टी के इन सांसदों की संख्या दो तिहाई के आंकड़े तक पहुंचती है या नहीं। यदि यह संख्या पूरी होती है तो ये सांसद अपनी सदस्यता बचा सकते हैं अन्यथा इन्हें अयोग्यता का सामना करना पड़ सकता है। यही कारण है कि दोनों पक्ष अपने अपने दावे कर रहे हैं और राजनीतिक गणित तेजी से बदल रहा है।इस पूरे मामले में अंतिम निर्णय लेने का अधिकार राज्यसभा के सभापति के पास होता है। वर्तमान में यह जिम्मेदारी उपराष्ट्रपति के पास है जो इस मामले की सुनवाई करेंगे और तथ्यों के आधार पर फैसला देंगे। उनका निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण होगा क्योंकि वही तय करेगा कि संबंधित सांसद संसद में बने रहेंगे या नहीं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हालांकि यह भी ध्यान देने वाली बात है कि सभापति का निर्णय अंतिम होने के बावजूद न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि दलबदल से जुड़े मामलों में सभापति के फैसले को अदालत में चुनौती दी जा सकती है। इसका मतलब है कि यदि किसी पक्ष को निर्णय से असंतोष होता है तो वह न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला केवल एक पार्टी तक सीमित नहीं है बल्कि इसका प्रभाव पूरे देश की राजनीति पर पड़ेगा। यदि बड़ी संख्या में सांसद दलबदल कर बिना अयोग्यता के बच जाते हैं तो यह अन्य दलों के लिए भी एक उदाहरण बन सकता है। वहीं यदि कड़ी कार्रवाई होती है तो यह संदेश जाएगा कि दलबदल कानून अभी भी प्रभावी है और उसका उल्लंघन करने पर सख्त परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या दलबदल विरोधी कानून अपने उद्देश्य को पूरी तरह से पूरा कर पा रहा है या इसमें सुधार की आवश्यकता है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इस कानून का उपयोग कई बार राजनीतिक हथियार के रूप में भी किया जाता है जिससे विधायकों और सांसदों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति प्रभावित होती है। वहीं दूसरी ओर यह भी तर्क दिया जाता है कि यदि यह कानून न हो तो राजनीतिक अस्थिरता बढ़ सकती है और सरकारें गिरने का खतरा बना रह सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के बीच यह टकराव आने वाले दिनों में और तेज हो सकता है। दोनों पक्ष अपने अपने तर्कों के साथ जनता और संवैधानिक संस्थाओं के सामने अपनी बात रखेंगे। इस पूरे मामले पर देश की नजर बनी हुई है क्योंकि यह केवल सात सांसदों का मुद्दा नहीं है बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती से जुड़ा हुआ प्रश्न है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः यह कहा जा सकता है कि दलबदल कानून भारतीय लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जो राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है। लेकिन इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि इसका उपयोग निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से हो ताकि लोकतंत्र की मूल भावना बनी रहे। आने वाले समय में सभापति का निर्णय इस दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत देगा और यह तय करेगा कि राजनीति में दल बदल की प्रवृत्ति पर कितना नियंत्रण संभव है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 17:18:42 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>दल बदल की राजनीति और जनविश्वास का प्रश्न ईमानदारी से चलने वाले दल की निरंतर उन्नति और भ्रष्टाचार में डूबे दल की अनिवार्य गिरावट</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">भारतीय लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उसकी बहुदलीय व्यवस्था है जहां अनेक विचारधाराएं अनेक नेतृत्व और अनेक सामाजिक आकांक्षाएं एक साथ विकसित होती हैं, परंतु पिछले कुछ वर्षों में एक अलग ही प्रवृत्ति तेजी से उभरती दिखाई दी है जिसे आम भाषा में दल बदल या राजनीतिक टूटफूट कहा जाता है ।यह केवल व्यक्तियों का एक दल से दूसरे दल में जाना भर नहीं है ,बल्कि यह उस गहरे राजनीतिक और नैतिक संकट का संकेत भी है जो कई दलों के भीतर पनप रहा है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">जब हम देश के विभिन्न राज्यों और राष्ट्रीय स्तर पर हुए घटनाक्रमों को देखते हैं</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177280/politics-of-defection-and-the-question-of-public-trust-continuous"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/thumb_9083_1024_768_0_0_crop.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">भारतीय लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उसकी बहुदलीय व्यवस्था है जहां अनेक विचारधाराएं अनेक नेतृत्व और अनेक सामाजिक आकांक्षाएं एक साथ विकसित होती हैं, परंतु पिछले कुछ वर्षों में एक अलग ही प्रवृत्ति तेजी से उभरती दिखाई दी है जिसे आम भाषा में दल बदल या राजनीतिक टूटफूट कहा जाता है ।यह केवल व्यक्तियों का एक दल से दूसरे दल में जाना भर नहीं है ,बल्कि यह उस गहरे राजनीतिक और नैतिक संकट का संकेत भी है जो कई दलों के भीतर पनप रहा है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">जब हम देश के विभिन्न राज्यों और राष्ट्रीय स्तर पर हुए घटनाक्रमों को देखते हैं तो एक पैटर्न स्पष्ट दिखाई देता है ।कई क्षेत्रीय दल और राष्ट्रीय दल अपने ही नेताओं और विधायकों को संभालने में असफल रहे हैं। जिसके परिणामस्वरूप उनके भीतर असंतोष बढ़ा और वह असंतोष अंततः टूट के रूप में सामने आया ।इस प्रक्रिया में एक दल मजबूत होता गया और अन्य दल कमजोर होते गए यह केवल संख्या का खेल नहीं है, बल्कि यह भरोसे और विश्वसनीयता का प्रश्न भी है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">लोकतंत्र में जनता केवल नारों या वादों पर भरोसा नहीं करती बल्कि वह यह भी देखती है कि कोई दल अपने सिद्धांतों पर कितना टिकता है और अपने नेताओं को कितनी ईमानदारी से आगे बढ़ाता है जब किसी दल के भीतर पारदर्शिता की कमी होती है या नेतृत्व अपने स्वार्थ में उलझ जाता है तो वहां असंतोष जन्म लेता है। यही असंतोष धीरे धीरे विद्रोह में बदलता है और अंततः दल टूट जाता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">पिछले वर्षों में कई राज्यों में हुए राजनीतिक घटनाक्रम इस बात के उदाहरण हैं जहां विधायकों और सांसदों ने अपने ही दल को छोड़कर दूसरे दल का दामन थाम लिया। इन घटनाओं के पीछे केवल सत्ता का आकर्षण नहीं था बल्कि कई बार यह आरोप भी लगे कि मूल विचारधारा से भटकाव हुआ है और नेतृत्व ने कार्यकर्ताओं और जनता के विश्वास को तोड़ा है। जब ऐसी स्थिति बनती है तो दल के भीतर का ढांचा कमजोर पड़ जाता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यह भी सत्य है कि जिस दल ने अपने संगठन को मजबूत रखा अनुशासन बनाए रखा और कार्यकर्ताओं के बीच विश्वास कायम किया वह लगातार आगे बढ़ता गया संगठन की मजबूती किसी भी राजनीतिक दल की रीढ़ होती है। जब यह रीढ़ मजबूत होती है तो बाहरी आघात भी उसे ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचा पाते इसके विपरीत जब संगठन भीतर से ही खोखला हो जाता है तो छोटी सी चुनौती भी उसे हिला देती है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">राजनीतिक दलों की सफलता केवल चुनाव जीतने में नहीं होती बल्कि यह इस बात पर निर्भर करती है कि वे जनता के बीच कितनी विश्वसनीयता बनाए रखते हैं ।यदि कोई दल ईमानदारी से काम करता है पारदर्शिता रखता है और अपने वादों को निभाने का प्रयास करता है तो जनता उसे बार बार अवसर देती है यह प्रक्रिया धीरे धीरे उस दल को और मजबूत बनाती है और उसकी उन्नति निरंतर होती रहती है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इसके विपरीत यदि कोई दल भ्रष्टाचार में डूब जाता है नेताओं पर आरोप लगते हैं और जनता के मुद्दों से दूरी बढ़ती जाती है तो उसकी गिरावट निश्चित हो जाती है ।इतिहास इस बात का गवाह है कि ऐसे दल चाहे कुछ समय के लिए सत्ता में रहे हों लेकिन अंततः उन्हें जनता ने नकार दिया जनता की नजर में विश्वास सबसे बड़ी पूंजी होती है और जब यह पूंजी खत्म हो जाती है तो कोई भी रणनीति उस दल को बचा नहीं सकती।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों में यह भी देखने को मिला है कि जब किसी दल के कई नेता एक साथ इस्तीफा देते हैं या दूसरे दल में शामिल होते हैं तो वह केवल संख्या का नुकसान नहीं होता बल्कि वह उस दल की साख पर भी चोट होती है ।जनता के मन में यह प्रश्न उठता है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि इतने बड़े स्तर पर असंतोष पैदा हो जाता है।उस दल के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">राजनीति में विचारधारा का महत्व अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। जब कोई दल अपनी मूल विचारधारा से भटकता है और केवल सत्ता प्राप्ति को लक्ष्य बना लेता है तो उसके भीतर की एकता कमजोर पड़ने लगती है कार्यकर्ता स्वयं को असहज महसूस करते हैं और धीरे धीरे दूरी बनाने लगते हैं यही दूरी आगे चलकर टूट का कारण बनती है। इसलिए यह आवश्यक है कि हर दल अपने मूल सिद्धांतों पर कायम रहे और समय समय पर आत्ममंथन करता रहे।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">संगठन में लोकतंत्र भी उतना ही जरूरी है यदि निर्णय लेने की प्रक्रिया में केवल कुछ लोगों का वर्चस्व हो और अन्य नेताओं को नजरअंदाज किया जाए तो असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है। एक स्वस्थ दल वही होता है जहां संवाद होता है जहां असहमति को भी स्थान मिलता है और जहां सभी को अपनी बात रखने का अवसर मिलता है ऐसे दल लंबे समय तक टिके रहते हैं और निरंतर प्रगति करते हैं</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">वर्तमान समय में जनता भी पहले से अधिक जागरूक हो चुकी है वह केवल चुनावी वादों से प्रभावित नहीं होती बल्कि वह यह भी देखती है कि कौन सा दल वास्तव में उसके हित में काम कर रहा है कौन सा दल केवल दिखावे की राजनीति कर रहा है और कौन सा दल ईमानदारी से शासन चला रहा है। यह जागरूकता लोकतंत्र के लिए सकारात्मक संकेत है, क्योंकि इससे राजनीतिक दलों पर भी दबाव बनता है कि वे बेहतर काम करें।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">दल बदल की राजनीति को केवल नकारात्मक दृष्टि से देखना भी पूरी तरह उचित नहीं है कई बार यह बदलाव उन नेताओं के लिए एक अवसर भी होता है जो अपने पुराने दल में उपेक्षित महसूस कर रहे थे या जिनकी विचारधारा को वहां स्थान नहीं मिल रहा था लेकिन जब यह प्रक्रिया बहुत अधिक होने लगे और बार बार होने लगे तो यह लोकतंत्र की स्थिरता के लिए चुनौती बन जाती है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यह भी जरूरी है कि राजनीतिक दल अपने भीतर नैतिक मूल्यों को मजबूत करें भ्रष्टाचार के आरोप किसी भी दल के लिए सबसे बड़ा खतरा होते हैं क्योंकि ये आरोप सीधे जनता के विश्वास को प्रभावित करते हैं यदि कोई दल पारदर्शिता बनाए रखता है और गलत कार्यों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करता है तो वह अपने विश्वास को बनाए रख सकता है इसके विपरीत यदि आरोपों को नजरअंदाज किया जाए या उन्हें दबाने का प्रयास किया जाए तो स्थिति और खराब हो जाती है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">अंत में यह कहा जा सकता है कि राजनीति में स्थायी सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं है यह एक लंबी प्रक्रिया है जिसमें ईमानदारी अनुशासन पारदर्शिता और जनता के प्रति समर्पण की आवश्यकता होती है, जो दल इन मूल्यों को अपनाते हैं वे धीरे धीरे मजबूत होते जाते हैं और उनकी उन्नति निरंतर होती रहती है वहीं जो दल इन मूल्यों से दूर हो जाते हैं और भ्रष्टाचार में डूब जाते हैं उनकी गिरावट तय होती है</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इसलिए आज के समय में हर राजनीतिक दल के लिए यह आवश्यक है कि वह आत्ममंथन करे अपने संगठन को मजबूत बनाए और जनता के विश्वास को सर्वोच्च प्राथमिकता दे क्योंकि अंततः लोकतंत्र में वही दल सफल होता है जो जनता के दिल में जगह बनाता है और यह स्थान केवल ईमानदारी और सेवा भाव से ही प्राप्त किया जा सकता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 26 Apr 2026 17:39:01 +0530</pubDate>
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                <title>लोकप्रियता से विवाद तक का सफर</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>महेन्द्र तिवारी </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">राघव चड्ढा का हालिया राजनीतिक निर्णय केवल संसदीय गलियारों या राजनीतिक दलों के बीच की एक साधारण घटना नहीं है बल्कि इसने अंतर्जाल की आभासी दुनिया में भी अत्यंत गहरा और अभूतपूर्व प्रभाव छोड़ा है। आम आदमी पार्टी से भारतीय जनता पार्टी में उनका सम्मिलित होना एक सामान्य राजनीतिक घटनाक्रम की तरह प्रतीत हो सकता था परंतु कुछ ही घंटों के भीतर इसने सामाजिक संवाद के माध्यमों पर एक बड़े वैचारिक और संख्यात्मक बदलाव को जन्म दे दिया। विशेष रूप से छायाचित्र साझा करने वाले प्रमुख वैश्विक मंच पर उनके अनुगामियों की संख्या में आई आकस्मिक गिरावट ने</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177274/journey-from-popularity-to-controversy"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/raghav-chadha-1696929862.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>महेन्द्र तिवारी </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राघव चड्ढा का हालिया राजनीतिक निर्णय केवल संसदीय गलियारों या राजनीतिक दलों के बीच की एक साधारण घटना नहीं है बल्कि इसने अंतर्जाल की आभासी दुनिया में भी अत्यंत गहरा और अभूतपूर्व प्रभाव छोड़ा है। आम आदमी पार्टी से भारतीय जनता पार्टी में उनका सम्मिलित होना एक सामान्य राजनीतिक घटनाक्रम की तरह प्रतीत हो सकता था परंतु कुछ ही घंटों के भीतर इसने सामाजिक संवाद के माध्यमों पर एक बड़े वैचारिक और संख्यात्मक बदलाव को जन्म दे दिया। विशेष रूप से छायाचित्र साझा करने वाले प्रमुख वैश्विक मंच पर उनके अनुगामियों की संख्या में आई आकस्मिक गिरावट ने इस तथ्य को पूरी तरह स्पष्ट कर दिया कि वर्तमान समय में राजनीति केवल विचारधारा या चुनावी कूटनीति तक सीमित नहीं रह गई है बल्कि यह सीधे तौर पर जनता की संवेदनाओं और उनकी तत्काल आभासी प्रतिक्रियाओं से जुड़ गई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उपलब्ध आंकड़ों के विश्लेषण से यह ज्ञात होता है कि जिस दिन उन्होंने अपने राजनीतिक दल के परिवर्तन की सार्वजनिक घोषणा की थी उस समय उनके व्यक्तिगत खाते पर लगभग 14.6 मिलियन अनुगामी उपस्थित थे। इस घोषणा के मात्र 24 घंटे के भीतर यह संख्या तीव्रता से घटकर लगभग 13.3 मिलियन से 13.5 मिलियन के मध्य पहुँच गई। इसका प्रत्यक्ष अर्थ यह है कि लगभग 10 लाख से 11 लाख लोगों ने अत्यंत अल्प समय में उन्हें अननुगामित कर दिया। आंकड़ों में आई यह भारी गिरावट केवल गणितीय अंकों का खेल नहीं है बल्कि यह उस तीव्र भावनात्मक प्रतिक्रिया और रोष को दर्शाती है जो उनके समर्थकों के मध्य उत्पन्न हुई।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह घटना इसलिए भी विशेष महत्व रखती है क्योंकि राघव चड्ढा की छवि लंबे समय से एक ऐसे युवा राजनेता की रही है जो पारंपरिक और रूढ़िवादी राजनीति की परिधि से बाहर दिखाई देते थे। उनकी पहचान केवल एक सांसद के रूप में स्थापित नहीं थी बल्कि वे एक ऐसे सार्वजनिक चेहरे के रूप में उभरे थे जिसने निरंतर युवाओं के ज्वलंत मुद्दों को स्वर दिया। उन्होंने अस्थायी सेवा कर्मियों, वितरण कर्मचारियों, पितृत्व अवकाश और तीव्र वितरण सेवाओं जैसे समकालीन विषयों को सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनाने का सफल प्रयास किया था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यही प्रमुख कारण था कि उनके अनुगामियों में बहुत बड़ी संख्या उस युवा वर्ग की थी जिसे प्रायः नई पीढ़ी या आधुनिक युग की संतति कहा जाता है। परंतु जैसे ही उन्होंने अपनी राजनीतिक दिशा और निष्ठा को बदलने का निर्णय लिया उसी वर्ग की प्रतिक्रिया सबसे अधिक प्रखर और तीखी दिखाई दी। सामाजिक संवाद के मंचों पर अचानक एक संगठित अननुगामी अभियान प्रारंभ हो गया जिसमें सहस्रों नहीं अपितु लाखों लोगों ने सक्रिय रूप से अपनी भागीदारी दर्ज की।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस अभियान ने वैश्विक स्तर पर यह सिद्ध कर दिया कि आभासी मंचों पर मिलने वाला जनसमर्थन अत्यंत अस्थिर हो सकता है और वह क्षण भर में विपरीत दिशा में मुड़ सकता है। जो लोग पूर्व में उनके समर्थन में सक्रिय थे वही लोग कुछ ही घंटों के भीतर उनके विरोध में खड़े दिखाई देने लगे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस संपूर्ण घटनाक्रम को गहराई से समझने हेतु यह देखना अनिवार्य है कि सामाजिक संवाद के ये आधुनिक माध्यम आज केवल मनोरंजन या सूचना के स्रोत नहीं रह गए हैं। ये अब एक प्रकार के तत्काल जनमत संग्रह के केंद्र बन चुके हैं जहाँ साधारण जन अपनी राय को तुरंत और प्रभावी ढंग से व्यक्त करते हैं। पूर्व के समय में जहाँ किसी राजनेता की लोकप्रियता का आकलन केवल चुनाव परिणामों, जनसभाओं की भीड़ या मतपेटियों से किया जाता था वहीं अब अनुगामियों की संख्या और उन पर प्राप्त होने वाली प्रतिक्रियाएं भी लोकप्रियता का एक अपरिहार्य मापदंड बन गई हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राघव चड्ढा के प्रकरण में यह विषय भी चर्चा का केंद्र बना कि उनके पुराने आभासी संदेशों और लेखों में कुछ संपादन या परिवर्तन किए गए। कुछ समाचार रिपोर्टों में यह तथ्य उभरकर सामने आया कि उन्होंने अपने आधिकारिक खातों से पूर्व में किए गए आलोचनात्मक लेखों को या तो पूरी तरह हटा दिया या उनकी संख्या कम कर दी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस गतिविधि से जनमानस में यह धारणा सुदृढ़ हुई कि उनकी आभासी छवि को नए राजनीतिक वातावरण और नई पार्टी की नीतियों के अनुरूप ढाला जा रहा है। इस प्रकार की गतिविधियों ने आलोचना की अग्नि में घी डालने का कार्य किया क्योंकि उनके राजनीतिक विरोधियों और आलोचकों ने इसे एक शुद्ध अवसरवादी कदम के रूप में प्रस्तुत किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे घटनाक्रम का एक और उल्लेखनीय पक्ष यह है कि यह प्रतिक्रिया केवल सामान्य उपयोगकर्ताओं तक ही सीमित नहीं रही बल्कि कई प्रतिष्ठित व्यक्तियों और सार्वजनिक जीवन के प्रभावशाली लोगों ने भी उन्हें अननुगामित करने का निर्णय लिया। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह आक्रोश केवल व्यक्तिगत या भावनात्मक स्तर पर नहीं था बल्कि यह एक व्यापक सामाजिक और बौद्धिक प्रतिक्रिया थी जिसमें समाज के विभिन्न वर्गों के लोग सम्मिलित थे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राजनीति के विशेषज्ञों का यह तर्क है कि इस घटना के पीछे केवल एक दल बदलने का निर्णय नहीं है बल्कि उस निर्णय से जुड़ी जन-अपेक्षाएं और विश्वास का भंग होना सम्मिलित है। जब कोई राजनेता अपनी विशिष्ट पहचान एक विशेष विचारधारा या नैतिकता के आधार पर निर्मित करता है तो उसके समर्थक उसी वैचारिक धरातल पर उससे जुड़ते हैं। यदि वह राजनेता अचानक उस दिशा से पूर्णतः विपरीत कोई कदम उठाता है तो उन समर्थकों के लिए इस आकस्मिक बदलाव को स्वीकार करना और उसके साथ समन्वय बिठाना अत्यंत कठिन हो जाता है। यह स्थिति विश्वास के संकट को जन्म देती है जिसका परिणाम हम आंकड़ों की गिरावट के रूप में देखते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस घटना ने यह भी प्रमाणित कर दिया है कि आभासी समर्थन कभी भी स्थायी संपत्ति नहीं होता। यह निरंतर बदलती परिस्थितियों और राजनेता के व्यवहार के अनुसार परिवर्तित होता रहता है। किसी नेता के पास लाखों की संख्या में अनुगामी होना उसकी चिरस्थायी लोकप्रियता का प्रमाणपत्र नहीं है। यह केवल उस विशिष्ट समय की मनोदशा को प्रतिबिंबित करता है। जैसे ही परिस्थितियां बदलती हैं या नेता के आचरण में विरोधाभास दिखाई देता है वैसे ही यह समर्थन रेत के महल की भांति ढह सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके साथ ही यह गंभीर प्रश्न भी उपस्थित होता है कि क्या आभासी दुनिया में आई इस गिरावट का वास्तविक धरातल की राजनीति पर कोई निर्णायक प्रभाव पड़ेगा। राजनीतिक इतिहास के पन्ने यह बताते हैं कि सामाजिक मंचों की प्रतिक्रिया और वास्तविक चुनावी परिणाम सदैव एक समान नहीं होते। कई बार आभासी मंचों पर प्रचंड विरोध दिखाई देता है परंतु जमीनी स्तर पर उसका प्रभाव बहुत सीमित रहता है। इसलिए वर्तमान में यह कहना समय पूर्व होगा कि इस घटना से उनके दीर्घकालिक राजनीतिक भविष्य पर क्या और कितना प्रभाव पड़ेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तथापि यह स्वीकार करना भी अनिवार्य है कि इस संपूर्ण प्रकरण ने उनकी सार्वजनिक छवि को निश्चित रूप से प्रभावित किया है। किसी भी सार्वजनिक जीवन जीने वाले व्यक्ति विशेषकर एक राजनेता के लिए जनता का विश्वास ही उसकी सबसे बड़ी और वास्तविक पूंजी होती है। जब उस विश्वास की नींव पर ही प्रश्नचिह्न अंकित होने लगें तो उसे पुनः स्थापित करना कोई सरल कार्य नहीं होता। इसके लिए केवल सुंदर वक्तव्य या विज्ञापन के माध्यम से किया गया प्रचार पर्याप्त नहीं होता बल्कि इसके लिए निरंतर कार्य, नैतिक स्पष्टता और एक पारदर्शी दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे मामले में एक और रोचक पक्ष यह है कि अंतर्जाल की गति और उसके व्यापक प्रभाव ने राजनीति के व्याकरण को पूरी तरह परिवर्तित कर दिया है। पहले के युग में जहाँ किसी भी राजनीतिक निर्णय के प्रभाव को समझने और मापने में महीनों या वर्षों का समय लग जाता था वहीं अब मात्र कुछ ही घंटों में उस निर्णय की व्यापक प्रतिक्रिया जनता के सामने आ जाती है। यह परिवर्तन आधुनिक नेताओं के लिए एक बड़ी चुनौती भी है और एक अवसर भी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यदि वे सही और ईमानदार तरीके से इन माध्यमों का उपयोग करें तो वे सीधे जनता से संवाद स्थापित कर सकते हैं और अपनी नीतियों को स्पष्ट कर सकते हैं। परंतु यदि वे ऐसा करने में विफल रहते हैं या उनके कार्यों में कथनी और करनी का अंतर दिखता है तो यही माध्यम उनके विरुद्ध एक शक्तिशाली शस्त्र के रूप में भी कार्य कर सकता है। राघव चड्ढा के मामले में यह दूसरी स्थिति अधिक प्रबलता से दिखाई देती है जहाँ उनकी वर्षों में निर्मित आभासी छवि अचानक एक बड़ी चुनौती के घेरे में आ गई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह संपूर्ण घटना केवल एक व्यक्ति विशेष की कथा नहीं है बल्कि यह आधुनिक राजनीति के परिवर्तित होते हुए व्याकरण का एक सटीक उदाहरण है। यह इस तथ्य को रेखांकित करती है कि आज का मतदाता और नागरिक केवल मतदान दिवस पर ही सक्रिय नहीं होता बल्कि वह राजनेता के प्रत्येक निर्णय और गतिविधि पर सूक्ष्म दृष्टि रखता है और उस पर त्वरित प्रतिक्रिया देता है। अंततः यह कहा जा सकता है कि राघव चड्ढा के अनुगामियों में आई यह भारी कमी एक प्रतीक के रूप में कार्य करती है जो हमें यह चेतावनी देती है कि इस तीव्र गति वाले युग में राजनीति कितनी चंचल और अनिश्चित हो गई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह घटना राजनेताओं के लिए एक सबक भी है कि लोकप्रियता प्राप्त करना जितना कठिन है उससे कहीं अधिक कठिन उसे नैतिकता और निरंतरता के साथ बनाए रखना है। आने वाले समय में यह देखना अत्यंत रोचक होगा कि क्या वे इस भीषण चुनौती को पुनः एक अवसर में परिवर्तित कर पाने में सफल होते हैं या यह घटना उनकी राजनीतिक छवि पर एक स्थायी और अमिट प्रभाव छोड़ जाती है। राजनीति और अंतर्जाल का यह संगम आने वाले वर्षों में जनमत के निर्माण की प्रक्रिया को और भी अधिक जटिल और दिलचस्प बनाने वाला है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 26 Apr 2026 17:26:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>परिसीमन बिल गिरने से  देश को तो  लाभ हुआ</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक मधुप</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश की आधी आबादी यानी महिलाओं को </span>33 <span lang="hi" xml:lang="hi">फीसदी राजनीतिक आरक्षण देने वाला ऐतिहासिक बिल लोकसभा में भले ही गिर गया हो किंतु भाजपा को जो लाभ मिलना था,  वह मिल या।  इस बिल के माध्यम से वह यह संदेश देने में कामयाब रही कि हम तो महिलाओं को संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण देना  चाहते  है, कितु विपक्ष  नही चाहता।  विपक्ष  भी  इस बिल के गिरने को  अपनी विजय मानता है।  इस बिल के गिरने से भाजपा को लाभ मिले या विपक्ष को किंतु सबसे बड़ा  लाभ देश को हुआ है। इस बिल के पास होने से</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176917/the-country-benefited-from-the-falling-of-the-delimitation-bill"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/1399507-womens-reservation-delimitation-opposition.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक मधुप</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश की आधी आबादी यानी महिलाओं को </span>33 <span lang="hi" xml:lang="hi">फीसदी राजनीतिक आरक्षण देने वाला ऐतिहासिक बिल लोकसभा में भले ही गिर गया हो किंतु भाजपा को जो लाभ मिलना था,  वह मिल या।  इस बिल के माध्यम से वह यह संदेश देने में कामयाब रही कि हम तो महिलाओं को संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण देना  चाहते  है, कितु विपक्ष  नही चाहता।  विपक्ष  भी  इस बिल के गिरने को  अपनी विजय मानता है।  इस बिल के गिरने से भाजपा को लाभ मिले या विपक्ष को किंतु सबसे बड़ा  लाभ देश को हुआ है। इस बिल के पास होने से बढ़ने वाली लोकसभा और विधान सभा  सीट के    सांसदों के वेतन और भत्तों का  खर्च बच गया। नए सांसदों और विधायकों  की पेंशन की राशि का बोझ अब देश को नही उठाना पड़ेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मोदी सरकार ने लोकसभा और विधानसभाओं में वर्तमान सीटों की संख्या एकमुश्त बढ़ाकर  डेढ़ गुना करने का जो प्रस्ताव इस बिल में किया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका लाभ कुल मिलाकर </span>2250 <span lang="hi" xml:lang="hi">सीटों का होता।  लोकसभा में वर्तमान </span>545 <span lang="hi" xml:lang="hi">सीटों के हिसाब से की महिलाओं के </span>33<span lang="hi" xml:lang="hi">  प्रतिशत</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आरक्षण के हिसाब से </span>205 <span lang="hi" xml:lang="hi">सीटें बढ़तीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि सभी </span>28 <span lang="hi" xml:lang="hi">राज्यों और दो केन्द्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं में </span>2045 <span lang="hi" xml:lang="hi">सीटों का इजाफा होता। यानी </span>70 <span lang="hi" xml:lang="hi">करोड़ महिलाओं में से मात्र </span>2250 <span lang="hi" xml:lang="hi">महिलाएं चुनकर विधानमंडलों में पहुंचतीं।</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें राज्यसभा और विधानपरिषदों की सीटें शामिल नहीं हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि उनकी संख्या बाद में तय होगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> तर्क दिया जा सकता है कि इस आरक्षण को महिलाओं की संख्या की बजाए उनके राजनीतिक-सामाजिक सशक्तिकरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लैंगिक समता और राजनीतिक नैतिकता की पवित्र मंशा के आईने में देखा जाना चाहिए। सही है। लेकिन अगर बिल पास हो जाता। सासंदों और  विधायकों के क्षेत्र और सीट बढ़  जाती तो वढ़े सासदों , विधायकों के वेतन, भत्ते, सुविधाओं और पेंशन का बोझ तो देश पर ही पड़ता।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">12 <span lang="hi" xml:lang="hi">साल के कार्यकाल में यह पहला अवसर था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब मोदी सरकार  की संसद में विधायी हार हुई। संसदीय इतिहास में </span>1990 <span lang="hi" xml:lang="hi">में पंचायत सशक्तिकरण संशोधन बिल के राज्यसभा में गिरने के बाद यह पहला बिल है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो लोकसभा में ही ढ़ह  गया। वैसे मोदी सरकार चाहती तो यह अत्यंत महत्वपूर्ण बिल अपने दूसरे कार्यकाल में ला सकती थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब एनडीए के अपने </span>353 <span lang="hi" xml:lang="hi">सांसद थे और कोई भी संशाधन बिल आसानी से पारित हो सकता था। लेकिन उसने तब ऐसा नहीं किया।</span> </p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय राजव्यवस्था में पिछले कुछ वर्षों से वित्तीय प्रबंधन और संसाधनों के आवंटन को लेकर एक व्यापक बहस छिड़ी हुई है। एक तरफ सरकार राजकोषीय घाटे को कम करने और अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के नाम पर पुरानी पेंशन योजनाओं और सैन्य भर्ती की पारंपरिक प्रक्रियाओं में आमूलचूल परिवर्तन कर रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं दूसरी ओर लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के विस्तार के नाम पर विधायी निकायों के आकार को बढ़ाने की योजनाएं भी चर्चा के केंद्र में हैं। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन निर्णयों का भारतीय अर्थव्यवस्था और आम नागरिक के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। सरकार के इन कदमों के पीछे तर्क दिया जाता है कि आधुनिक समय की चुनौतियों से निपटने के लिए संसाधनों का कुशल उपयोग अनिवार्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जब बात सांसदों और जनप्रतिनिधियों की सुविधाओं की आती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो जनता के बीच विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पेंशन के मुद्दे पर सरकारी कर्मचारियों में व्यापक असंतोष देखा जा रहा है। केंद्र सरकार ने वित्तीय बोझ को कम करने के लिए लंबे समय से पुरानी पेंशन योजना (</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ओपीएस</span>) <span lang="hi" xml:lang="hi">के स्थान पर नई पेंशन योजना (</span><span lang="hi" xml:lang="hi">एनपीएस</span>) <span lang="hi" xml:lang="hi">को प्राथमिकता दी है। हालिया वर्षों में महंगाई भत्ते (</span><span lang="hi" xml:lang="hi">डीए</span>) <span lang="hi" xml:lang="hi">और महंगाई राहत (</span><span lang="hi" xml:lang="hi">डीआर</span>) <span lang="hi" xml:lang="hi">में वृद्धि तो की गई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे कि 2026 के शुरुआती आंकड़ों के अनुसार इसे 60 प्रतिशत तक पहुँचाया गया</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> फिर भी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> यह वृद्धि कर्मचारियों की उन मांगों को शांत करने में विफल रही है। वे तो  सेवानिवृत्ति के बाद एक सुनिश्चित आय की गारंटी चाहते हैं। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सरकार का तर्क है कि पेंशन पर होने वाला खर्च भविष्य में विकास कार्यों के लिए उपलब्ध बजट को कम कर सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए निवेश-आधारित पेंशन प्रणाली अधिक व्यावहारिक है। हालांकि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरकारी कर्मचारी इसे अपनी सामाजिक सुरक्षा में कटौती के रूप में देखते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे उनके भविष्य की स्थिरता पर सवालिया निशान लग जाते हैं। अर्थशास्त्री दावा करते हैं कि यदि पुरानी पेंशन दी गई तो कुछ राज्य आर्थिक रूप से दिवालिया  हो जाएगें,किंतु सासदों और विधायकों की संख्या  उनके  वेतन भत्तों और पेंशन से देश के सामने आने  वाली आर्थिक चुनौतियों की और ध्यान नही दिया जाता। यह कहीं गणना  नही होती कि इससे देश पर कितना बोझ  पड़ेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सैनिकों की भर्ती के लिए लाई गई अग्निपथ योजना इसी वित्तीय पुनर्गठन की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जाती है। अग्निवीर योजना के तहत युवाओं को चार साल के लिए सेना में भर्ती किया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके बाद केवल 25 प्रतिशत को ही स्थायी सेवा में रखा जाता है। शेष 75 प्रतिशत युवाओं को एकमुश्त सेवा निधि पैकेज देकर सेवामुक्त कर दिया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और उन्हें आजीवन पेंशन या अन्य चिकित्सा सुविधाएं नहीं दी जातीं। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सरकार का उद्देश्य रक्षा बजट के एक बड़े हिस्से को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो वर्तमान में वेतन और पेंशन में चला जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आधुनिक हथियारों और तकनीक की खरीद में लगाना है। लेकिन इस योजना ने सुरक्षा विशेषज्ञों और युवाओं के बीच चिंता पैदा कर दी है। आलोचकों का कहना है कि पेंशन के अभाव में सैनिकों का मनोबल प्रभावित हो सकता है और चार साल बाद बेरोजगार होने का डर युवाओं को इस गौरवशाली पेशे से दूर कर सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक तरफ जहां देश की सुरक्षा और प्रशासनिक सेवा में लगे लोगों के लाभों को सीमित किया जा रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं दूसरी ओर 131वें संविधान संशोधन विधेयक के माध्यम से लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाने का मार्ग प्रशस्त किया गया है। वर्तमान में लोकसभा की 543 सीटों को बढ़ाकर लगभग 815 से 850 तक करने का प्रस्ताव है।इसी के साथ नए परीसीमन से विधायकों की भी 2045 सीट बढ़ने की व्यवस्था है। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह वृद्धि परिसीमन की प्रक्रिया के तहत की जा रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका उद्देश्य बढ़ती जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व को संतुलित करना है। हालांकि यह कदम लोकतांत्रिक दृष्टिकोण से तर्कसंगत लग सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर  इसके आर्थिक निहितार्थ अत्यधिक गंभीर हैं। सांसदों की संख्या में लगभग 50 प्रतिशत की वृद्धि का अर्थ है उनके वेतन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भत्तों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आवास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुरक्षा और कार्यालय खर्चों में भी उसी अनुपात में बढ़ोतरी होना।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि हम वर्तमान वित्तीय आंकड़ों का विश्लेषण करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो एक सांसद का वेतन और विभिन्न भत्ते मिलाकर प्रतिमाह एक बड़ी राशि बनती है। वर्ष 2025-26 के संशोधित आंकड़ों के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक सांसद का मूल वेतन लगभग 1.24 लाख रुपये है। इसके अतिरिक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें निर्वाचन क्षेत्र भत्ता (लगभग 70,000 रुपये)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्यालय भत्ता (लगभग 60,000 रुपये) और संसद सत्र के दौरान प्रतिदिन का दैनिक भत्ता (2,500 रुपये) मिलता है। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि इन सबको जोड़ दिया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो एक सांसद पर सीधे तौर पर प्रतिमाह लगभग 2.7 लाख से 3 लाख रुपये का खर्च आता है। इसमें उनके लिए उपलब्ध मुफ्त बिजली (50,000 यूनिट)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पानी (4,000 किलोलीटर)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">34 मुफ्त हवाई यात्राएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रेल यात्राएं और दिल्ली में मिलने वाले महंगे बंगलों का रखरखाव शामिल नहीं है। यदि लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़कर 816 हो जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो केवल इन सीधे खर्चों के कारण देश पर प्रतिमाह करोड़ों रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।विधायकों की सीट बढ़ने से होने वाला  आर्थिक बोझ इसमें शामिल नही किया गया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अतिरिक्त वित्तीय बोझ का अनुमान लगाने के लिए यदि हम 273 नए सांसदों (816 - 543) को आधार मानें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो केवल उनके वेतन और नियमित भत्तों पर ही प्रतिमाह लगभग 7.5 करोड़ से 8 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च होगा। वार्षिक आधार पर यह आंकड़ा 90 करोड़ से 100 करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है। लेकिन यह तो केवल हिमशैल का सिरा है। प्रत्येक नए सांसद के लिए लुटियंस दिल्ली जैसे महंगे इलाकों में आवास की व्यवस्था करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके कार्यालयों का निर्माण और उनके साथ तैनात होने वाले सुरक्षा कर्मियों व सहायक कर्मचारियों का वेतन इस खर्च को कई गुना बढ़ा देगा। इसके अलावा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सांसदों को मिलने वाली आजीवन पेंशन का खर्च भी भविष्य के बजटों पर एक स्थायी बोझ बन जाएगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विवाद का मुख्य बिंदु यही है कि जब देश के सैनिकों और आम कर्मचारियों के लिए </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">राजकोषीय अनुशासन</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पेंशन सुधार</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">की बात की जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वही मापदंड जनप्रतिनिधियों पर लागू क्यों नहीं होते</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">अग्निवीर योजना के माध्यम से करोड़ों रुपये बचाने की कोशिश करने वाली सरकार जब सांसदों की फौज बढ़ाने की तैयारी करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो आम नागरिक के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या देश की प्राथमिकताएं सही दिशा में हैं। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक तरफ एक जवान है जो अपनी जवानी के चार साल देश को देता है और बिना पेंशन के घर लौट आता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और दूसरी तरफ एक सांसद है जो केवल पांच साल के कार्यकाल के बाद आजीवन पेंशन और सुविधाओं का हकदार बन जाता है। एक बात और जहां कर्मचारी को पेंशन का हकदार बनने के लिए 20 से 25 साल की सेवा अनिवार्य  है,  वहां सांसद या विधायक के लिए ऐसा नही है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> एक दिन के लिए सांसद या विधायक  बनने  पर उन्हें पूरी पेंशन मिलती है। सांसद या विधायक जितनी बार चुना जाता है,  उसकी   उ पेंशन में बढ़े कार्यकाल के हिसाब से वृद्धि मिलती है।कोई व्यक्ति  यदि चार बार सांसद  और तीन बार विधायक  बने तो उसे सांसद काल की चार और विधायक काल की तीन वृद्धि पेंशन में जुड़कर  मिलती है। वर्तमान   पंजाब सरकार ने  एक आदेश करने विधायक के लिए सिर्फ  एक पेंशन की व्यवस्था रखी है। ऐसा पूरे देश में क्यों नही हो सकता। सांसद और विधायकों के साथ भी ऐसा ही किया जाना चाहिए।    </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत जैसे विकासशील देश में जहां शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे के लिए संसाधनों की भारी कमी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहां विधायी विस्तार के खर्चों को बहुत सावधानी से तौलने की आवश्यकता है। लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व महत्वपूर्ण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इसे इस तरह से लागू किया जाना चाहिए कि यह आम जनता के त्याग और सैनिकों के समर्पण के साथ न्याय करे। यदि सरकार को वास्तव में राजकोषीय घाटे की चिंता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसे सांसदों के वेतन-भत्तों में भी कटौती करने और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">एक राष्ट्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक पेंशन</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसी व्यवस्था पर विचार करना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि देश का पैसा सांसदों की सुख-सुविधाओं के बजाय उन लोगों पर खर्च हो जो वास्तव में देश की नींव को मजबूत करते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक मधुप</span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 18:37:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>नारी बन्दन बिल के सहारे  बीजेपी बंगाल जीतना चाहती थी या चीन मॉडल लागू करना चाहती थी </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>प्रोफेसर अशोक कुमार </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> देश में एक तरफचुनाव का वातावरण बना था पांच राज्यों में चुनाव हो रहा था ।तीन राज्यों का चुनाव भी एक चरण में पूरा होगया है ।दो मजबूत राज्यों बंगाल और तामिलनाडु में तीन चरणों में चुनाव होने वाला है।बंगाल के चुनाव में नब्बे लाख वैध मतदान का नाम चुनाव आयोग हटा दिया है । चुनाव आयोग के इस कृत्य को देश की जनता सब देख रही है। सुन रही जान रही पर मौन है।मौन जब तुटता है तो तूफ़ान  आ जाता है । भारत की जनता  कब अपना मौन तोड़ेगी यह समय बतायेगा।पर बंगाल</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176611/bjp-wanted-to-win-bengal-with-the-help-of-nari"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/img_20260417_2100471.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>प्रोफेसर अशोक कुमार </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> देश में एक तरफचुनाव का वातावरण बना था पांच राज्यों में चुनाव हो रहा था ।तीन राज्यों का चुनाव भी एक चरण में पूरा होगया है ।दो मजबूत राज्यों बंगाल और तामिलनाडु में तीन चरणों में चुनाव होने वाला है।बंगाल के चुनाव में नब्बे लाख वैध मतदान का नाम चुनाव आयोग हटा दिया है । चुनाव आयोग के इस कृत्य को देश की जनता सब देख रही है। सुन रही जान रही पर मौन है।मौन जब तुटता है तो तूफ़ान  आ जाता है । भारत की जनता  कब अपना मौन तोड़ेगी यह समय बतायेगा।पर बंगाल के चुनाव में जो भी वोटर लिस्ट में धांधली हो रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">  यह एक लोकतांत्रिक देश के लिए शुभ संकेत नहीं है।  अपने ही नागरिकों का वोट का अधिकार छीन कर उनको विदेशी नागरिक कहना उचित नहीं है पर 2014से एक धर्म विशेष के लोगों को हर राज्य में नया नामकरण दिया गया घूसपैठिये और आज तक यानि 2014से अब तक कितने घुसपैठिए हर राज्य में मिले भारत सरकार जनता को चुनाव में नहीं बता पा रही है।  बस एक नरेटिव कि बंगाल में ममता चुनाव घुसपैठियों के वोट से जीत रही है एक धर्म के वोट से जीत रही  है उनको वोट के अधिकार से वंचित करना है । जो चुनाव आयोग सरकार का कठपुतली बन कर कर दिया। नब्बे लाख का नाम काट दिया।  अब चुनाव में वोट नहींदेगे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विपक्ष का आरोप सही कि देश की सभी सम्वैधानिक संस्थानों पर व  न्यायालय हो चुनाव आयोग हो ई डी सी बी आई हर पर एक पार्टी एक विचार धारा का कब्जा हो गया है।यह बात भारत के जनमानस के  साथ  विश्व के जनमानस में भी यही गुज रहा है कि 2014के बाद भारत में लोकतंत्र कमजोर होगया।  बस एक नेता एक पार्टी कीबात होनेलगी है विपक्ष कहीं जिन्दा नहीं  रहे।उसको संसद से सड़क तक लड़ने का अधिकार नहीं जब जब संसद से सड़क पर आया लड़ने उसको देशद्रोही पाक परस्त छदम सेकुलर अवसर वादी न जाने किन किन अलंकरणों से भारतीय मिडिया भाजपा का आईटी सेल सोशल मिडिया अलंकृत करता रहता है ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बंगाल के चुनाव में एक और बात बहुत दिलचप्स  हो रही की कभी ममता के विधायक रहे हुमाऊ कबीर ममता को छोड़ कर भाजपा में गये फिर वहां से सौदे बाजी करके अलग पार्टी बनाया। भाजपा ने ममता को हराने के लिए एक हजार करोड़ और उपमुख्यमंत्री के पद पर समझौता किया यह बात एक स्टिंग ऑपरेशन करके किसी ने खुलासाकर दिया  विडियो बनाकर  सोशल मिडिया में चला रहा है। मैं यह नहीं कह सकता हूं दावे के साथ की यह विडियो सही या ग़लत  है।जो सोशल मिडिया पर चल रहा उसी की बात कर रहा हूं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सच क्या है जांच हो तो सब जनता जाने ।इसी विडियो से  परेशान होकर देश की सरकार  जो हर समय बस  चुनाव में रहती हैं परेशान हो ग ई जीत का सपना जो बंगाल में  देख रही थी  काबफूर होने लगा। तब वह  एक नया गेम प्लान लेकर आई कि बीच चुनाव में ही संसद का विशेष सत्र तीन दिन का बुला लिया कि अब देश की नारी आधी आबादी शायद बंगाल जीतादे।  जो  नारी शक्ति वन्दन बिल यानि महिला आरक्षण 2023मे पास हो चुका है और 2029के चुनाव में लागू होगा  जिसमें जनगणना और परिसीमन की बात थी ।उसको बदलने के लिए ही विशेष सत्र को बुलाया जो गलत है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लोकतंत्र में संख्या बल का खेल है। तो सरकार सत्ता में संसद का विशेष सत्र बुला लिया।और तीन अलग अलग बिल पेश कर दिया। 16अप्रैल से बहस चल रही है 17शाम चार बजे के बाद वोटिंग होगी  इस में भी सरकारकिस नियम से वोटिंग करायेगी।इस महिला बिल का विपक्ष समर्थन कर रहा उनका कहना है महिलाओं को आरक्षण 545सासद के वर्तमान नम्बर में से कर दिया जाये।  लेकिन भाजपा कह रही हम देश में नये राजाओं की संख्या बढायेंगे वह 850करके उस संख्या में से महिलाओं को तैंतीस प्रतिशत आरक्षण देने की बात कर रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लेकिन इस आरक्षण में भी एक खेल होगया अनुसुचित जाति और अनुसूचितजन जाति को तो लिया है परन्तु पिछड़ी जाति को आरक्षण में नहीं लिया है।विपक्ष का कहना है फिर परिसीमन  नहीं हो गा तबतक जब तक  जनगणना नही हो जायेगी जनगणना जातिय आधार पर होगी उसके बाद ही महिलाओं को आरक्षण और संसदों तथा प्रदेश में विधानसभा में विधायकों की संख्या बढ़ेगी। भाजपा परिसीमन को जनगणना से नहीं जोड़ना चाहती है भाजपा कि एक मंशा यह भी होगी कि परिसीमन बिल पास कराले। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">न ई जनगणना में जातियों की गणना नहीं करायेगे यह आशंका है कि जातिय जनगणाना भाजपा नहीं करना चाहती है।अगर जातिय जन गणना देश की होगी तो बहुत कुछ देश में बदल जायेगा राजनिति का सन्तुलन भी गड़बड़ होगा फिर नारा वहीं चलेगा जिसकी जितनी सख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी ।इसी कारण से यह तीन दिन का विशेष सत्र बुलाया गया।है या इस सत्र के परिणाम को जनता में ले जाकर सहानभूति लेने का राजनिति चाल  था।  बंगाल के चुनाव प्रचार में पता चलेगा बिल के पीछे का असली मकसद  क्या था या नकली चेहरा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसी कारण भाजपा 2011या किसी भी जनगणना से किसी भी राज्य की संसदों की सख्या निर्धारित करने का एकाधिकार चाहती है। जो बहुत ग़लत है विपक्ष विरोध कर रहा यह तो निश्चित है जिस राज्य में जन संख्या कम होगी वहां सांसद कम होंगे इस बिल से उत्तर भारत में यूं पी बिहार राजस्थान  एम पी में सांसदों की संख्या बढ़ेगी और इन राज्यो  की तुलना में दक्षिण राज्यों में कम संख्या सांसदों की होगी पूर्वोत्तर राज्यों में भी कामोवेश यही होगा ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अब एक न ई लड़ाई इस बिल से उत्तर भारत और दक्षिण भारत में शुरू होगया है यह सब एक सुनियोजित चाल से भारत में लोकतंत्र को चीनी लोकतंत्र में बदलने का कुचक्र  तो नहीं चल रहा है कि चुनाव में दो तिहाई बहुमत मिले सम्विधान बदले और चीनी राष्ट्रपति की प्रणाली बना कर  भाजपा सत्ता में सदा के लिए बनी रहे  अगर मंशा साफ होता तो  महिलाओं को आरक्षण  तो2024मे दे दिया होता। पर नारी के पीछे छिपकर देश में नया लोकतंत्र स्थापित करने की एक मंशा है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">परन्तु इस बिल में एक बात और है कि राज्य सभा कि सीट नहीं बढ़ाया जा रहा अनुपातिक तौर पर राज्य सभा में भी सीट बढ़े।  कारण अगर विधानसभा में हर राज्य में पचास प्रतिशत सीट बढ़ रही है तो राज्य सभा का क्योंनही बढ़ेगी। यह और तरह का खेल है कि अगर राज्य सभा में बहुमत नहीं होगा तो दोनों सदनों को मिलाकर कोई बिल‌विधेयक पास हो जायेगा विपक्ष यहां क्यौ मौन है राज्य  सभा में बढ़े पचास प्रतिशत।विपक्ष यह चाल भाजपा का समझ गया और या जाल मेंनही फंसा उस कबुतर की तरह । इस बिल से आभास हो रहा है नाम नारी शक्ति वन्दन पर खेल कुछ और है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अब बंगाल का चुनाव बिल पास होगा तब भी नहीं पास होगा तब भी नारीशक्ति वन्दन के सहारे चलेगा सारा फोकस भाजपा का यही होगा  कि हम नारी सम्मान करतेहै  बिल आपके लिए शक्ति देगा नहीं पास हुआ तो  विपक्ष नारी विरोधी है यही गुंजेगा।परन्तु एक बात जो जनता को पूछना होगा अपने नेताओं से कि हम भारत के नागरिक इतने अमीर हो गये है कि 545राजा ससद के चार हजार विधानसभा के राजाओं  के ऐशो आराम के लिए जो अभी टैक्स दे रहे हैं। फिर 307सासदो और 2100 विधायको को जो बिल पास होने के बाद आयेंगे इनको पालने के लिए कितना और टैक्स देंगे लगभग हर वर्ष सभी राजाओं को पालने ऐशो आराम के लिए पन्द्रह हजार करोड़ लगेगा कहा से आयेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कैसे आयेगा क्या और टैक्स लगेगा कोई राजनेता संसद में यह बात नहीं कर रहा नहीं सत्ता पक्ष यह जनता को बता रहा हैं कि इन सभी राजाओं को पालने का खर्च किस मद से होगा बस नारी शक्ति वन्दन हो रहा है। इन राजाओं के साथ साथ देश की जनता पूर्व सांसदों विधायकों को भी पाल रही है।इनके लालनपालन पर हर वर्ष ग्यारह हजार करोड़ खर्च होता पेंशन और मुफ्त यात्रा में यह सब गरीब भारत की जनता है पांच किलो मुफ्त राशन वाले असृसी करोड़ भी इनके लालपाल में अपना योगदान दे रहे हैं।अब भारत इतना अमीर तो नहीं है कि हजारों राजाओं को अपने। जनता के टैक्स पर पाले जा रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">देश के उस समय अटल की सरकार ने 2003मे सरकारी कर्मचारियों का पेंशन यह कह कर बन्द कर दिया कि देश की जीडीपी पेंशन के भार को नहीं उठा पायेगी परन्तु इन राजाओं का  पेंशन वेतन मुफ्त आवास चिकित्सा यात्रा भत्ता देश  उठा रहा है।पर हम जनता मौन है। अपने लड़कों के हक में नहीं बोल रहे हैं।यह बिल जो लाया गया है देश हित में नहीं है जितनी पहले सांसदों की सख्या है उसी में से महिलाओं को आरक्षण दिया जाये सांसदों और विधायकों की सख्या न बढ़ाई जाये नहीं तो जनता कभी भी सड़क पर आयेगी तो क्या दृश्य होगा इसकी कल्पना कोई राजनेता या ज्योतिषी नहीं कर सकता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यदि नये राजाओं की संख्या देश में बढ़ी तो शायद फिर देश में कोई नया गांधी सुभाष आजाद भगत बनकर जरूर आयेगा इन राज्यों से मुक्ति जनता को मिलेगी जैसे मुगलों से अग्रेजो से देशी राजाओं से मिला था उसी तरह फिर लड़ना होगा नये राजाओ को हटाने के लिए ।भाजपा का मकसद नारी के नाम को चुनाव में लेकर सत्ता तक पहुचना है। वह नारी सम्मान कितना किये है और करेंगे संसद में  दिये गये भाषण को जनता याद कर रही कि आज वही व्यक्ति नारी वन्दन कर रहा जो कभी किसी नारी को विधवा न जाने कैसे कैसे अलंकरणों से सुशोभित किया था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भाजपा के ऊपर जो तमाम आरोप लग रहे हैं उसी से जनता और महिलाओं के ध्यान को हटाने के लिए बंगाल तमिलनाडु में सरकार बनाने के लिए यह बिल लाया गया भाजपा को पता है बिल पास नहीं होगा फिर भी यह खेल किया कि चुनाव में विपक्ष को महिलाओं के विरोधी के रुप में स्थापित करके अपनी छबि को बचाने का नया कुचक्र  है।विपक्ष जब मांग कर रहा था कि ईरान अमेरिका इजरायल युद्ध और देश की ऊर्जा सुरक्षा पर बहस के लिए विशेष संसद का सत्र बुलाने की मांग नहीं माना और चर्चा नहीं हुआ वह ईरान पर मौन बस इजरायल अमेरिका के साथ खड़े हैं अब क्यों अमेरिका इजरायल के साथ है यह कूटनिती की कोई भाषा होगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कल संसद में मोदी गारंटी दे रहे थे बिल की पर शायद वह हर चुनाव में गारंटी देते आरहे है क्यो पूरा नहीं हुआ दोकरोड रोजगार बिहार में उघोग सौ स्मार्ट सीटी सब कहां  है।अब तो बिल पास नहीं हुआ। यह जो बिल गिरा भारत बच गया अगर बिल पास होगया होता तो 2029मेका आखिरी चुनाव होता या 2027मे मध्यावधि चुनाव कराकर सम्विधान बदले देते की भारत में एक दलित प्रणाली ही होगी।पर विपक्ष की गजब की एक जुटता कल देखने को मिला बिल गिर गया देश बच गया।अब  पांच राज्योचुनाव परिणाम का इन्तजार करे वैसे महंगाई के लिए भी जनता कमर कस ले।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">29अप्रैल शाम पांच बजे देश का मौसम गुलाबी होगा जब तेल के दाम बढ़ेंगे यानही बढ़ेंगे  तब भी  भी मौसम गुलाबी रहेगा कारण पांच राज्यों का एक्जिट पोल पर बहस होगी कौन मुख्य मंत्री बनेगा तमाम बातें होंगी फिर लोग नारी शक्ति वन्दन भूल जायेंगे। इस माडल को हराने में दक्षिण के राज्य तृणमूल कांग्रेस के सहयोग की सराहना होनी चाहिए भाजपा समर्थक ससद दक्षिण के जो थे जनता उनसे हिसाब ले क्यों दक्षिण से धोखा किया।।अभी इसे जीत न माने न खुशी माने यह तो बस आरम्भ है।अभी सत्ता से विपक्ष को और लड़ना होगा जनता को भी  लड़ना होगा।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Sun, 19 Apr 2026 19:55:11 +0530</pubDate>
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                <title>परिसीमन की सियासत, अस्मिता का उभार और चुनावी हवा का बदलता रुख</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">भारतीय राजनीति में चुनाव केवल मतों का गणित नहीं होता, बल्कि यह भावनाओं, पहचान, रणनीतियों और समय-समय पर बदलते नैरेटिव का एक जटिल मिश्रण होता है। हाल के घटनाक्रमों में महिला आरक्षण से जुड़ा संविधान संशोधन बिल का संसद में गिरना और परिसीमन बिल का पेश न होना, दो ऐसे मोड़ साबित हुए हैं जिन्होंने चुनावी राजनीति की दिशा और भाषा दोनों को बदल दिया है। विशेषकर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में यह बदलाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है, जहां सत्तारूढ़ और विपक्षी दल अपने-अपने हिसाब से नए मुद्दे गढ़ रहे हैं और पुराने विमर्शों को</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176589/politics-of-delimitation-rise-of-identity-and-changing-direction-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/img_20260417_2100471.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">भारतीय राजनीति में चुनाव केवल मतों का गणित नहीं होता, बल्कि यह भावनाओं, पहचान, रणनीतियों और समय-समय पर बदलते नैरेटिव का एक जटिल मिश्रण होता है। हाल के घटनाक्रमों में महिला आरक्षण से जुड़ा संविधान संशोधन बिल का संसद में गिरना और परिसीमन बिल का पेश न होना, दो ऐसे मोड़ साबित हुए हैं जिन्होंने चुनावी राजनीति की दिशा और भाषा दोनों को बदल दिया है। विशेषकर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में यह बदलाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है, जहां सत्तारूढ़ और विपक्षी दल अपने-अपने हिसाब से नए मुद्दे गढ़ रहे हैं और पुराने विमर्शों को पीछे छोड़ रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने जिस तेजी से अपनी चुनावी रणनीति को बदला है, वह उनकी राजनीतिक समझ और समय की नब्ज पकड़ने की क्षमता को दर्शाता है। महिला आरक्षण बिल के गिरने के बाद उन्होंने परिसीमन को केंद्र में रखकर एक नया आक्रामक अभियान शुरू किया है। पहले जहां एसआईआर जैसे मुद्दे को बंगाल की अस्मिता से जोड़ा जा रहा था, वहीं अब परिसीमन को “देश को तोड़ने की साजिश” के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। यह बदलाव केवल भाषाई नहीं बल्कि पूरी राजनीतिक दिशा को बदलने वाला है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उत्तर बंगाल, जहां भाजपा ने पिछली बार मजबूत प्रदर्शन किया था, अब इस नए नैरेटिव का केंद्र बन गया है। चाय बागानों में काम करने वाले लाखों मजदूरों तक पहुंचने के लिए तृणमूल कांग्रेस ने घर-घर अभियान शुरू किया है। यहां अब रोजगार, मजदूरी और जमीन के अधिकार जैसे मुद्दों की जगह परिसीमन को लेकर भय और असुरक्षा का माहौल बनाया जा रहा है। ममता बनर्जी यह संदेश देने की कोशिश कर रही हैं कि यदि परिसीमन लागू होता, तो कई जिलों की पहचान ही खत्म हो जाती। यह एक ऐसा भावनात्मक तर्क है जो सीधे जनता के मन में अस्मिता के सवाल को जगाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दूसरी ओर अभिषेक बनर्जी जैसे नेता इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा की कमजोरी के रूप में पेश कर रहे हैं। उनका कहना है कि संसद में जो हुआ, वह केवल शुरुआत है और इसका असर राज्यों में भी दिखेगा। यह बयान न केवल आत्मविश्वास दर्शाता है बल्कि कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भरने का प्रयास भी है।तमिलनाडु में स्थिति और भी रोचक है। यहां द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने बेहद तेजी से चुनावी हवा को अपने पक्ष में मोड़ने का काम किया है। तीन दिन पहले तक परिसीमन बिल सबसे बड़ा मुद्दा था, लेकिन अब “तमिल अस्मिता” चुनाव का केंद्रीय विषय बन चुकी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एम. के. स्टालिन को इस पूरे घटनाक्रम में एक विजेता के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, मानो उन्होंने केंद्र के खिलाफ एक बड़ी लड़ाई जीत ली हो। डीएमके के कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर “द्रविड़ गौरव” के पर्चे बांट रहे हैं और यह संदेश दे रहे हैं कि यह केवल राजनीतिक लड़ाई नहीं बल्कि तमिल पहचान की रक्षा का प्रश्न है। इस रणनीति का असर यह हुआ है कि चुनावी विमर्श पूरी तरह बदल गया है। अब यह केवल सीटों के बंटवारे का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह सांस्कृतिक और क्षेत्रीय अस्मिता का प्रश्न बन गया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भाजपा के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण बन गई है। के. अन्नामलाई लगातार यह कह रहे हैं कि परिसीमन से तमिलनाडु को कोई नुकसान नहीं होता, लेकिन उनकी बात उतनी प्रभावी तरीके से जनता तक नहीं पहुंच पा रही है। इसके विपरीत डीएमके का संदेश ज्यादा संगठित और भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है, जिससे वह ज्यादा असरदार साबित हो रहा है।एनडीए की सहयोगी एआईएडीएमके एक असमंजस की स्थिति में है। वह न तो खुलकर परिसीमन बिल के खिलाफ बोल पा रही है और न ही तमिल अस्मिता के मुद्दे पर पूरी तरह डीएमके का विरोध कर पा रही है। यह स्थिति उसे चुनावी मैदान में कमजोर बनाती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे घटनाक्रम में एक और दिलचस्प पहलू उभरकर सामने आया है, वह है नए चेहरों का उदय। अभिनेता विजय ने इस मुद्दे को एक अवसर के रूप में लिया है और अपनी पार्टी के जरिए “तमिलनाडु का हक” जैसे संदेशों को डिजिटल माध्यम से फैलाया है। यह दिखाता है कि कैसे बदलते राजनीतिक माहौल में नए खिलाड़ी भी अपनी जगह बना सकते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यदि व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाए, तो यह पहली बार नहीं है जब चुनाव से ठीक पहले मुद्दों में इतना बड़ा बदलाव आया हो। पश्चिम बंगाल में 2011 में “परिवर्तन” का नारा और 2021 में “खेला होबे” जैसे अभियान यह साबित करते हैं कि सही समय पर सही नैरेटिव चुनाव की दिशा बदल सकता है। इसी तरह तमिलनाडु में 1967 और 2016 के चुनावों में भी आखिरी समय में मुद्दों के बदलने से परिणाम प्रभावित हुए थे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस बार भी वही पैटर्न दोहराया जा रहा है, लेकिन एक अंतर के साथ। इस बार मुद्दे केवल स्थानीय नहीं हैं, बल्कि राष्ट्रीय नीतियों से जुड़े हुए हैं। परिसीमन जैसे विषय को लेकर क्षेत्रीय अस्मिता का उभार यह दिखाता है कि भारत की संघीय राजनीति में राज्य और केंद्र के बीच संतुलन का सवाल कितना संवेदनशील है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भाजपा की स्थिति भी दिलचस्प है। एक तरफ वह संसद में बिल गिरने के बावजूद इसे अपनी रणनीतिक जीत के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी तरफ राज्यों में उसे नए नैरेटिव का सामना करना पड़ रहा है। यह विरोधाभास उसके लिए चुनौती बन सकता है। दूसरी ओर विपक्ष, जो इस घटनाक्रम से उत्साहित है, कहीं न कहीं आंतरिक असंतोष और भ्रम का भी शिकार दिखाई देता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः यह स्पष्ट है कि आने वाले चुनाव केवल नीतियों या वादों पर नहीं बल्कि भावनाओं, पहचान और धारणा की लड़ाई पर आधारित होंगे। परिसीमन का मुद्दा केवल एक विधायी प्रक्रिया नहीं रह गया है, बल्कि यह राजनीतिक हथियार बन चुका है। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में जिस तरह से इसे अलग-अलग रूपों में प्रस्तुत किया जा रहा है, वह भारतीय राजनीति की विविधता और जटिलता दोनों को दर्शाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अब सबकी नजर चुनावी परिणामों पर है। क्या भाजपा इस बदलती हवा के बावजूद अपनी पकड़ बनाए रख पाएगी, या विपक्ष की नई रणनीतियां उसे पीछे छोड़ देंगी—यह सवाल अभी खुला है। लेकिन इतना तय है कि यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि राजनीतिक विमर्श के नए स्वरूप का भी संकेत देगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
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                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 19 Apr 2026 19:11:20 +0530</pubDate>
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