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                <title>भारतीय राजनीति - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>भारतीय राजनीति RSS Feed</description>
                
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                <title>नारी बन्दन बिल के सहारे  बीजेपी बंगाल जीतना चाहती थी या चीन मॉडल लागू करना चाहती थी </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>प्रोफेसर अशोक कुमार </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> देश में एक तरफचुनाव का वातावरण बना था पांच राज्यों में चुनाव हो रहा था ।तीन राज्यों का चुनाव भी एक चरण में पूरा होगया है ।दो मजबूत राज्यों बंगाल और तामिलनाडु में तीन चरणों में चुनाव होने वाला है।बंगाल के चुनाव में नब्बे लाख वैध मतदान का नाम चुनाव आयोग हटा दिया है । चुनाव आयोग के इस कृत्य को देश की जनता सब देख रही है। सुन रही जान रही पर मौन है।मौन जब तुटता है तो तूफ़ान  आ जाता है । भारत की जनता  कब अपना मौन तोड़ेगी यह समय बतायेगा।पर बंगाल</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176611/bjp-wanted-to-win-bengal-with-the-help-of-nari"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/img_20260417_2100471.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>प्रोफेसर अशोक कुमार </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> देश में एक तरफचुनाव का वातावरण बना था पांच राज्यों में चुनाव हो रहा था ।तीन राज्यों का चुनाव भी एक चरण में पूरा होगया है ।दो मजबूत राज्यों बंगाल और तामिलनाडु में तीन चरणों में चुनाव होने वाला है।बंगाल के चुनाव में नब्बे लाख वैध मतदान का नाम चुनाव आयोग हटा दिया है । चुनाव आयोग के इस कृत्य को देश की जनता सब देख रही है। सुन रही जान रही पर मौन है।मौन जब तुटता है तो तूफ़ान  आ जाता है । भारत की जनता  कब अपना मौन तोड़ेगी यह समय बतायेगा।पर बंगाल के चुनाव में जो भी वोटर लिस्ट में धांधली हो रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">  यह एक लोकतांत्रिक देश के लिए शुभ संकेत नहीं है।  अपने ही नागरिकों का वोट का अधिकार छीन कर उनको विदेशी नागरिक कहना उचित नहीं है पर 2014से एक धर्म विशेष के लोगों को हर राज्य में नया नामकरण दिया गया घूसपैठिये और आज तक यानि 2014से अब तक कितने घुसपैठिए हर राज्य में मिले भारत सरकार जनता को चुनाव में नहीं बता पा रही है।  बस एक नरेटिव कि बंगाल में ममता चुनाव घुसपैठियों के वोट से जीत रही है एक धर्म के वोट से जीत रही  है उनको वोट के अधिकार से वंचित करना है । जो चुनाव आयोग सरकार का कठपुतली बन कर कर दिया। नब्बे लाख का नाम काट दिया।  अब चुनाव में वोट नहींदेगे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विपक्ष का आरोप सही कि देश की सभी सम्वैधानिक संस्थानों पर व  न्यायालय हो चुनाव आयोग हो ई डी सी बी आई हर पर एक पार्टी एक विचार धारा का कब्जा हो गया है।यह बात भारत के जनमानस के  साथ  विश्व के जनमानस में भी यही गुज रहा है कि 2014के बाद भारत में लोकतंत्र कमजोर होगया।  बस एक नेता एक पार्टी कीबात होनेलगी है विपक्ष कहीं जिन्दा नहीं  रहे।उसको संसद से सड़क तक लड़ने का अधिकार नहीं जब जब संसद से सड़क पर आया लड़ने उसको देशद्रोही पाक परस्त छदम सेकुलर अवसर वादी न जाने किन किन अलंकरणों से भारतीय मिडिया भाजपा का आईटी सेल सोशल मिडिया अलंकृत करता रहता है ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बंगाल के चुनाव में एक और बात बहुत दिलचप्स  हो रही की कभी ममता के विधायक रहे हुमाऊ कबीर ममता को छोड़ कर भाजपा में गये फिर वहां से सौदे बाजी करके अलग पार्टी बनाया। भाजपा ने ममता को हराने के लिए एक हजार करोड़ और उपमुख्यमंत्री के पद पर समझौता किया यह बात एक स्टिंग ऑपरेशन करके किसी ने खुलासाकर दिया  विडियो बनाकर  सोशल मिडिया में चला रहा है। मैं यह नहीं कह सकता हूं दावे के साथ की यह विडियो सही या ग़लत  है।जो सोशल मिडिया पर चल रहा उसी की बात कर रहा हूं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सच क्या है जांच हो तो सब जनता जाने ।इसी विडियो से  परेशान होकर देश की सरकार  जो हर समय बस  चुनाव में रहती हैं परेशान हो ग ई जीत का सपना जो बंगाल में  देख रही थी  काबफूर होने लगा। तब वह  एक नया गेम प्लान लेकर आई कि बीच चुनाव में ही संसद का विशेष सत्र तीन दिन का बुला लिया कि अब देश की नारी आधी आबादी शायद बंगाल जीतादे।  जो  नारी शक्ति वन्दन बिल यानि महिला आरक्षण 2023मे पास हो चुका है और 2029के चुनाव में लागू होगा  जिसमें जनगणना और परिसीमन की बात थी ।उसको बदलने के लिए ही विशेष सत्र को बुलाया जो गलत है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लोकतंत्र में संख्या बल का खेल है। तो सरकार सत्ता में संसद का विशेष सत्र बुला लिया।और तीन अलग अलग बिल पेश कर दिया। 16अप्रैल से बहस चल रही है 17शाम चार बजे के बाद वोटिंग होगी  इस में भी सरकारकिस नियम से वोटिंग करायेगी।इस महिला बिल का विपक्ष समर्थन कर रहा उनका कहना है महिलाओं को आरक्षण 545सासद के वर्तमान नम्बर में से कर दिया जाये।  लेकिन भाजपा कह रही हम देश में नये राजाओं की संख्या बढायेंगे वह 850करके उस संख्या में से महिलाओं को तैंतीस प्रतिशत आरक्षण देने की बात कर रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लेकिन इस आरक्षण में भी एक खेल होगया अनुसुचित जाति और अनुसूचितजन जाति को तो लिया है परन्तु पिछड़ी जाति को आरक्षण में नहीं लिया है।विपक्ष का कहना है फिर परिसीमन  नहीं हो गा तबतक जब तक  जनगणना नही हो जायेगी जनगणना जातिय आधार पर होगी उसके बाद ही महिलाओं को आरक्षण और संसदों तथा प्रदेश में विधानसभा में विधायकों की संख्या बढ़ेगी। भाजपा परिसीमन को जनगणना से नहीं जोड़ना चाहती है भाजपा कि एक मंशा यह भी होगी कि परिसीमन बिल पास कराले। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">न ई जनगणना में जातियों की गणना नहीं करायेगे यह आशंका है कि जातिय जनगणाना भाजपा नहीं करना चाहती है।अगर जातिय जन गणना देश की होगी तो बहुत कुछ देश में बदल जायेगा राजनिति का सन्तुलन भी गड़बड़ होगा फिर नारा वहीं चलेगा जिसकी जितनी सख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी ।इसी कारण से यह तीन दिन का विशेष सत्र बुलाया गया।है या इस सत्र के परिणाम को जनता में ले जाकर सहानभूति लेने का राजनिति चाल  था।  बंगाल के चुनाव प्रचार में पता चलेगा बिल के पीछे का असली मकसद  क्या था या नकली चेहरा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसी कारण भाजपा 2011या किसी भी जनगणना से किसी भी राज्य की संसदों की सख्या निर्धारित करने का एकाधिकार चाहती है। जो बहुत ग़लत है विपक्ष विरोध कर रहा यह तो निश्चित है जिस राज्य में जन संख्या कम होगी वहां सांसद कम होंगे इस बिल से उत्तर भारत में यूं पी बिहार राजस्थान  एम पी में सांसदों की संख्या बढ़ेगी और इन राज्यो  की तुलना में दक्षिण राज्यों में कम संख्या सांसदों की होगी पूर्वोत्तर राज्यों में भी कामोवेश यही होगा ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अब एक न ई लड़ाई इस बिल से उत्तर भारत और दक्षिण भारत में शुरू होगया है यह सब एक सुनियोजित चाल से भारत में लोकतंत्र को चीनी लोकतंत्र में बदलने का कुचक्र  तो नहीं चल रहा है कि चुनाव में दो तिहाई बहुमत मिले सम्विधान बदले और चीनी राष्ट्रपति की प्रणाली बना कर  भाजपा सत्ता में सदा के लिए बनी रहे  अगर मंशा साफ होता तो  महिलाओं को आरक्षण  तो2024मे दे दिया होता। पर नारी के पीछे छिपकर देश में नया लोकतंत्र स्थापित करने की एक मंशा है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">परन्तु इस बिल में एक बात और है कि राज्य सभा कि सीट नहीं बढ़ाया जा रहा अनुपातिक तौर पर राज्य सभा में भी सीट बढ़े।  कारण अगर विधानसभा में हर राज्य में पचास प्रतिशत सीट बढ़ रही है तो राज्य सभा का क्योंनही बढ़ेगी। यह और तरह का खेल है कि अगर राज्य सभा में बहुमत नहीं होगा तो दोनों सदनों को मिलाकर कोई बिल‌विधेयक पास हो जायेगा विपक्ष यहां क्यौ मौन है राज्य  सभा में बढ़े पचास प्रतिशत।विपक्ष यह चाल भाजपा का समझ गया और या जाल मेंनही फंसा उस कबुतर की तरह । इस बिल से आभास हो रहा है नाम नारी शक्ति वन्दन पर खेल कुछ और है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अब बंगाल का चुनाव बिल पास होगा तब भी नहीं पास होगा तब भी नारीशक्ति वन्दन के सहारे चलेगा सारा फोकस भाजपा का यही होगा  कि हम नारी सम्मान करतेहै  बिल आपके लिए शक्ति देगा नहीं पास हुआ तो  विपक्ष नारी विरोधी है यही गुंजेगा।परन्तु एक बात जो जनता को पूछना होगा अपने नेताओं से कि हम भारत के नागरिक इतने अमीर हो गये है कि 545राजा ससद के चार हजार विधानसभा के राजाओं  के ऐशो आराम के लिए जो अभी टैक्स दे रहे हैं। फिर 307सासदो और 2100 विधायको को जो बिल पास होने के बाद आयेंगे इनको पालने के लिए कितना और टैक्स देंगे लगभग हर वर्ष सभी राजाओं को पालने ऐशो आराम के लिए पन्द्रह हजार करोड़ लगेगा कहा से आयेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कैसे आयेगा क्या और टैक्स लगेगा कोई राजनेता संसद में यह बात नहीं कर रहा नहीं सत्ता पक्ष यह जनता को बता रहा हैं कि इन सभी राजाओं को पालने का खर्च किस मद से होगा बस नारी शक्ति वन्दन हो रहा है। इन राजाओं के साथ साथ देश की जनता पूर्व सांसदों विधायकों को भी पाल रही है।इनके लालनपालन पर हर वर्ष ग्यारह हजार करोड़ खर्च होता पेंशन और मुफ्त यात्रा में यह सब गरीब भारत की जनता है पांच किलो मुफ्त राशन वाले असृसी करोड़ भी इनके लालपाल में अपना योगदान दे रहे हैं।अब भारत इतना अमीर तो नहीं है कि हजारों राजाओं को अपने। जनता के टैक्स पर पाले जा रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">देश के उस समय अटल की सरकार ने 2003मे सरकारी कर्मचारियों का पेंशन यह कह कर बन्द कर दिया कि देश की जीडीपी पेंशन के भार को नहीं उठा पायेगी परन्तु इन राजाओं का  पेंशन वेतन मुफ्त आवास चिकित्सा यात्रा भत्ता देश  उठा रहा है।पर हम जनता मौन है। अपने लड़कों के हक में नहीं बोल रहे हैं।यह बिल जो लाया गया है देश हित में नहीं है जितनी पहले सांसदों की सख्या है उसी में से महिलाओं को आरक्षण दिया जाये सांसदों और विधायकों की सख्या न बढ़ाई जाये नहीं तो जनता कभी भी सड़क पर आयेगी तो क्या दृश्य होगा इसकी कल्पना कोई राजनेता या ज्योतिषी नहीं कर सकता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यदि नये राजाओं की संख्या देश में बढ़ी तो शायद फिर देश में कोई नया गांधी सुभाष आजाद भगत बनकर जरूर आयेगा इन राज्यों से मुक्ति जनता को मिलेगी जैसे मुगलों से अग्रेजो से देशी राजाओं से मिला था उसी तरह फिर लड़ना होगा नये राजाओ को हटाने के लिए ।भाजपा का मकसद नारी के नाम को चुनाव में लेकर सत्ता तक पहुचना है। वह नारी सम्मान कितना किये है और करेंगे संसद में  दिये गये भाषण को जनता याद कर रही कि आज वही व्यक्ति नारी वन्दन कर रहा जो कभी किसी नारी को विधवा न जाने कैसे कैसे अलंकरणों से सुशोभित किया था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भाजपा के ऊपर जो तमाम आरोप लग रहे हैं उसी से जनता और महिलाओं के ध्यान को हटाने के लिए बंगाल तमिलनाडु में सरकार बनाने के लिए यह बिल लाया गया भाजपा को पता है बिल पास नहीं होगा फिर भी यह खेल किया कि चुनाव में विपक्ष को महिलाओं के विरोधी के रुप में स्थापित करके अपनी छबि को बचाने का नया कुचक्र  है।विपक्ष जब मांग कर रहा था कि ईरान अमेरिका इजरायल युद्ध और देश की ऊर्जा सुरक्षा पर बहस के लिए विशेष संसद का सत्र बुलाने की मांग नहीं माना और चर्चा नहीं हुआ वह ईरान पर मौन बस इजरायल अमेरिका के साथ खड़े हैं अब क्यों अमेरिका इजरायल के साथ है यह कूटनिती की कोई भाषा होगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कल संसद में मोदी गारंटी दे रहे थे बिल की पर शायद वह हर चुनाव में गारंटी देते आरहे है क्यो पूरा नहीं हुआ दोकरोड रोजगार बिहार में उघोग सौ स्मार्ट सीटी सब कहां  है।अब तो बिल पास नहीं हुआ। यह जो बिल गिरा भारत बच गया अगर बिल पास होगया होता तो 2029मेका आखिरी चुनाव होता या 2027मे मध्यावधि चुनाव कराकर सम्विधान बदले देते की भारत में एक दलित प्रणाली ही होगी।पर विपक्ष की गजब की एक जुटता कल देखने को मिला बिल गिर गया देश बच गया।अब  पांच राज्योचुनाव परिणाम का इन्तजार करे वैसे महंगाई के लिए भी जनता कमर कस ले।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">29अप्रैल शाम पांच बजे देश का मौसम गुलाबी होगा जब तेल के दाम बढ़ेंगे यानही बढ़ेंगे  तब भी  भी मौसम गुलाबी रहेगा कारण पांच राज्यों का एक्जिट पोल पर बहस होगी कौन मुख्य मंत्री बनेगा तमाम बातें होंगी फिर लोग नारी शक्ति वन्दन भूल जायेंगे। इस माडल को हराने में दक्षिण के राज्य तृणमूल कांग्रेस के सहयोग की सराहना होनी चाहिए भाजपा समर्थक ससद दक्षिण के जो थे जनता उनसे हिसाब ले क्यों दक्षिण से धोखा किया।।अभी इसे जीत न माने न खुशी माने यह तो बस आरम्भ है।अभी सत्ता से विपक्ष को और लड़ना होगा जनता को भी  लड़ना होगा।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 19 Apr 2026 19:55:11 +0530</pubDate>
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                <title>परिसीमन की सियासत, अस्मिता का उभार और चुनावी हवा का बदलता रुख</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">भारतीय राजनीति में चुनाव केवल मतों का गणित नहीं होता, बल्कि यह भावनाओं, पहचान, रणनीतियों और समय-समय पर बदलते नैरेटिव का एक जटिल मिश्रण होता है। हाल के घटनाक्रमों में महिला आरक्षण से जुड़ा संविधान संशोधन बिल का संसद में गिरना और परिसीमन बिल का पेश न होना, दो ऐसे मोड़ साबित हुए हैं जिन्होंने चुनावी राजनीति की दिशा और भाषा दोनों को बदल दिया है। विशेषकर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में यह बदलाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है, जहां सत्तारूढ़ और विपक्षी दल अपने-अपने हिसाब से नए मुद्दे गढ़ रहे हैं और पुराने विमर्शों को</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176589/politics-of-delimitation-rise-of-identity-and-changing-direction-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/img_20260417_2100471.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">भारतीय राजनीति में चुनाव केवल मतों का गणित नहीं होता, बल्कि यह भावनाओं, पहचान, रणनीतियों और समय-समय पर बदलते नैरेटिव का एक जटिल मिश्रण होता है। हाल के घटनाक्रमों में महिला आरक्षण से जुड़ा संविधान संशोधन बिल का संसद में गिरना और परिसीमन बिल का पेश न होना, दो ऐसे मोड़ साबित हुए हैं जिन्होंने चुनावी राजनीति की दिशा और भाषा दोनों को बदल दिया है। विशेषकर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में यह बदलाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है, जहां सत्तारूढ़ और विपक्षी दल अपने-अपने हिसाब से नए मुद्दे गढ़ रहे हैं और पुराने विमर्शों को पीछे छोड़ रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने जिस तेजी से अपनी चुनावी रणनीति को बदला है, वह उनकी राजनीतिक समझ और समय की नब्ज पकड़ने की क्षमता को दर्शाता है। महिला आरक्षण बिल के गिरने के बाद उन्होंने परिसीमन को केंद्र में रखकर एक नया आक्रामक अभियान शुरू किया है। पहले जहां एसआईआर जैसे मुद्दे को बंगाल की अस्मिता से जोड़ा जा रहा था, वहीं अब परिसीमन को “देश को तोड़ने की साजिश” के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। यह बदलाव केवल भाषाई नहीं बल्कि पूरी राजनीतिक दिशा को बदलने वाला है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उत्तर बंगाल, जहां भाजपा ने पिछली बार मजबूत प्रदर्शन किया था, अब इस नए नैरेटिव का केंद्र बन गया है। चाय बागानों में काम करने वाले लाखों मजदूरों तक पहुंचने के लिए तृणमूल कांग्रेस ने घर-घर अभियान शुरू किया है। यहां अब रोजगार, मजदूरी और जमीन के अधिकार जैसे मुद्दों की जगह परिसीमन को लेकर भय और असुरक्षा का माहौल बनाया जा रहा है। ममता बनर्जी यह संदेश देने की कोशिश कर रही हैं कि यदि परिसीमन लागू होता, तो कई जिलों की पहचान ही खत्म हो जाती। यह एक ऐसा भावनात्मक तर्क है जो सीधे जनता के मन में अस्मिता के सवाल को जगाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दूसरी ओर अभिषेक बनर्जी जैसे नेता इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा की कमजोरी के रूप में पेश कर रहे हैं। उनका कहना है कि संसद में जो हुआ, वह केवल शुरुआत है और इसका असर राज्यों में भी दिखेगा। यह बयान न केवल आत्मविश्वास दर्शाता है बल्कि कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भरने का प्रयास भी है।तमिलनाडु में स्थिति और भी रोचक है। यहां द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने बेहद तेजी से चुनावी हवा को अपने पक्ष में मोड़ने का काम किया है। तीन दिन पहले तक परिसीमन बिल सबसे बड़ा मुद्दा था, लेकिन अब “तमिल अस्मिता” चुनाव का केंद्रीय विषय बन चुकी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एम. के. स्टालिन को इस पूरे घटनाक्रम में एक विजेता के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, मानो उन्होंने केंद्र के खिलाफ एक बड़ी लड़ाई जीत ली हो। डीएमके के कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर “द्रविड़ गौरव” के पर्चे बांट रहे हैं और यह संदेश दे रहे हैं कि यह केवल राजनीतिक लड़ाई नहीं बल्कि तमिल पहचान की रक्षा का प्रश्न है। इस रणनीति का असर यह हुआ है कि चुनावी विमर्श पूरी तरह बदल गया है। अब यह केवल सीटों के बंटवारे का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह सांस्कृतिक और क्षेत्रीय अस्मिता का प्रश्न बन गया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भाजपा के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण बन गई है। के. अन्नामलाई लगातार यह कह रहे हैं कि परिसीमन से तमिलनाडु को कोई नुकसान नहीं होता, लेकिन उनकी बात उतनी प्रभावी तरीके से जनता तक नहीं पहुंच पा रही है। इसके विपरीत डीएमके का संदेश ज्यादा संगठित और भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है, जिससे वह ज्यादा असरदार साबित हो रहा है।एनडीए की सहयोगी एआईएडीएमके एक असमंजस की स्थिति में है। वह न तो खुलकर परिसीमन बिल के खिलाफ बोल पा रही है और न ही तमिल अस्मिता के मुद्दे पर पूरी तरह डीएमके का विरोध कर पा रही है। यह स्थिति उसे चुनावी मैदान में कमजोर बनाती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे घटनाक्रम में एक और दिलचस्प पहलू उभरकर सामने आया है, वह है नए चेहरों का उदय। अभिनेता विजय ने इस मुद्दे को एक अवसर के रूप में लिया है और अपनी पार्टी के जरिए “तमिलनाडु का हक” जैसे संदेशों को डिजिटल माध्यम से फैलाया है। यह दिखाता है कि कैसे बदलते राजनीतिक माहौल में नए खिलाड़ी भी अपनी जगह बना सकते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यदि व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाए, तो यह पहली बार नहीं है जब चुनाव से ठीक पहले मुद्दों में इतना बड़ा बदलाव आया हो। पश्चिम बंगाल में 2011 में “परिवर्तन” का नारा और 2021 में “खेला होबे” जैसे अभियान यह साबित करते हैं कि सही समय पर सही नैरेटिव चुनाव की दिशा बदल सकता है। इसी तरह तमिलनाडु में 1967 और 2016 के चुनावों में भी आखिरी समय में मुद्दों के बदलने से परिणाम प्रभावित हुए थे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस बार भी वही पैटर्न दोहराया जा रहा है, लेकिन एक अंतर के साथ। इस बार मुद्दे केवल स्थानीय नहीं हैं, बल्कि राष्ट्रीय नीतियों से जुड़े हुए हैं। परिसीमन जैसे विषय को लेकर क्षेत्रीय अस्मिता का उभार यह दिखाता है कि भारत की संघीय राजनीति में राज्य और केंद्र के बीच संतुलन का सवाल कितना संवेदनशील है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भाजपा की स्थिति भी दिलचस्प है। एक तरफ वह संसद में बिल गिरने के बावजूद इसे अपनी रणनीतिक जीत के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी तरफ राज्यों में उसे नए नैरेटिव का सामना करना पड़ रहा है। यह विरोधाभास उसके लिए चुनौती बन सकता है। दूसरी ओर विपक्ष, जो इस घटनाक्रम से उत्साहित है, कहीं न कहीं आंतरिक असंतोष और भ्रम का भी शिकार दिखाई देता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः यह स्पष्ट है कि आने वाले चुनाव केवल नीतियों या वादों पर नहीं बल्कि भावनाओं, पहचान और धारणा की लड़ाई पर आधारित होंगे। परिसीमन का मुद्दा केवल एक विधायी प्रक्रिया नहीं रह गया है, बल्कि यह राजनीतिक हथियार बन चुका है। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में जिस तरह से इसे अलग-अलग रूपों में प्रस्तुत किया जा रहा है, वह भारतीय राजनीति की विविधता और जटिलता दोनों को दर्शाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अब सबकी नजर चुनावी परिणामों पर है। क्या भाजपा इस बदलती हवा के बावजूद अपनी पकड़ बनाए रख पाएगी, या विपक्ष की नई रणनीतियां उसे पीछे छोड़ देंगी—यह सवाल अभी खुला है। लेकिन इतना तय है कि यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि राजनीतिक विमर्श के नए स्वरूप का भी संकेत देगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 19 Apr 2026 19:11:20 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>अनुपम अद्वितीय विलक्षण नेतृत्व क्षमता के धनी हैं नरेंद्र मोदी </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तपस्थली से तप कर निकले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारत की राजनीति में सबसे कुशल अपराजेय नेतृत्वकर्ता हैं वह अपने विरोधियों यहां तक की अपनी पार्टी और सहयोगी दलों के प्रतिस्पर्धियों की तमाम चालों की काट कर अपनी नेतृत्व क्षमता के बूते पर अपरिमित दक्षता भी रखते हैं इस मामले में उनका कोई सानी नहीं है यह हम नही रिकार्ड बयान कर रहे हैं। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">तमाम आलोचनाओं और विरोधियों के जबरदस्त साजिशी प्रहार के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक ऐसी शख्सियत बन कर उभरे है जो धरातल पर अपनी अद्वितीय नेतृत्व क्षमता के बूते पर</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173939/narendra-modi-is-blessed-with-unique-leadership-abilities"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/pm-narendra-modi-2.jpeg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तपस्थली से तप कर निकले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारत की राजनीति में सबसे कुशल अपराजेय नेतृत्वकर्ता हैं वह अपने विरोधियों यहां तक की अपनी पार्टी और सहयोगी दलों के प्रतिस्पर्धियों की तमाम चालों की काट कर अपनी नेतृत्व क्षमता के बूते पर अपरिमित दक्षता भी रखते हैं इस मामले में उनका कोई सानी नहीं है यह हम नही रिकार्ड बयान कर रहे हैं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तमाम आलोचनाओं और विरोधियों के जबरदस्त साजिशी प्रहार के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक ऐसी शख्सियत बन कर उभरे है जो धरातल पर अपनी अद्वितीय नेतृत्व क्षमता के बूते पर अपना अलग अनूठा व्यक्तित्व रखते हैं उन्होंने किसी भी राजनीतिक नेता के सरकार के लम्बे समय तक नेतृत्व करने के रिकार्ड को तोड़ दिया है। भारत की राजनीति में एक नया इतिहास रचते हुए पीएम नरेंद्र मोदी अब देश के सबसे लंबे समय तक सरकार चलाने वाले नेता बन गए हैं। उन्होंने सिक्किम के पूर्व मुख्यमंत्री पवन चामलिंग को पीछे छोड़ दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">गुजरात के मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री तक उनका सफर लगातार जीत, मजबूत नेतृत्व और राजनीतिक स्थिरता की मिसाल बनकर उभरा है। भारतीय राजनीति में बीता रविवार 22 मार्च विशेष दिन बन गया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने  एक ऐसा रिकॉर्ड तोड़ा जो दशकों से किसी और के नाम था. सिक्किम के पूर्व मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग ने लगातार 8,930 दिनों तक किसी सरकार का नेतृत्व किया था. यह भारत में किसी भी सरकार के मुखिया का अब तक का सबसे लंबा कार्यकाल था. </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बता दें कि पीएम नरेंद्र मोदी ने 7 अक्तूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। वह लंबे समय तक इस पद पर बने रहे और अपने कार्यकाल में कभी चुनाव नहीं हारे। साल 2014 में प्रधानमंत्री पद के लिए नाम सामने आने के बाद उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। गुजरात के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद पीएम नरेंद्र मोदी ने 2014 में लोकसभा चुनाव में बड़ी जीत हासिल कर प्रधानमंत्री पद संभाला। इसके बाद 2019 और 2024 में भी उन्होंने लगातार जीत दर्ज की। खास बात यह है कि अपने पूरे राजनीतिक करियर में उन्होंने अब तक कोई बड़ा चुनाव नहीं हारा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर. 2001 से 2014 तक करीब 13 साल तक वो गुजरात की सत्ता संभालते रहे. इस दौरान गुजरात के विकास मॉडल की चर्चा पूरे देश में होती थी। 2014 में जब वो पहली बार देश के प्रधानमंत्री बने. तब से इस रिपोर्ट को लिखने तक लगातार. इन दोनों कार्यकालों को जोड़ने पर यह आंकड़ा 8,931 दिन बनता है.सिक्किम के पूर्व मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग अब पद पर 8930 दिनों के साथ दूसरे स्थान पर है. चामलिंग ने सिक्किम की लगातार 24 साल और 165 दिनों तक सेवा की. इससे वे ना सिर्फ भारत में बल्कि विश्व स्तर पर सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले मुख्यमंत्रियों में से एक बन गए. </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसी कड़ी में तीसरा स्थान ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के पास है. उन्होंने 2000 से 2024 तक राज्य पर शासन किया. उन्होंने लगभग 24 साल और 99 दिनों का कार्यकाल पूरा किया. पटनायक के लंबे शासन की पहचान राजनीतिक स्थिरता और लगातार चुनावी जीत रही है. इसने उन्हें भारत के सबसे लंबे समय तक टिके रहने वाले नेताओं में से एक बनाए रखा.आपको बता दें इस रैंकिंग को जो बात खास रूप से दिलचस्प बनाती है वह यह है कि इसमें मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री दोनों के रूप में बिताए गए समय को जोड़ा गया है. जिन नेताओं ने सिर्फ प्रधानमंत्री के रूप में सेवा दीं जैसे कि जवाहरलाल नेहरू, वे इस खास गणना के तहत शीर्ष तीन में शामिल नहीं हैं. भले ही उनका कार्यकाल लंबा रहा हो.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह भी बता दें कि वरिष्ठ नेता ज्योति बसु ने 23 सालों से ज्यादा समय तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री के रूप में काम किया है. वे इस लिस्ट से बाहर हैं. लेकिन उनका कार्यकाल भारतीय इतिहास में किसी एक पद पर सबसे लंबे समय तक नेतृत्व करने वाले कार्यकालों में से एक हैप्रधानमंत्री मोदी का यह रिकॉर्ड अकेला नहीं है. प्रधानमंत्री मोदी के नाम और भी कई उपलब्धियां हैं. गुजरात के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री किसी और मुख्यमंत्री ने गुजरात में इतना लंबा कार्यकाल नहीं किया.</div>
<div style="text-align:justify;">आपको पता है कि किसी भी प्रधानमंत्री की तुलना में मोदी सबसे ज्यादा अनुभव लेकर दिल्ली पहुंचे थे. </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आजादी के बाद पैदा हुए पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्म 1950 में हुआ. वो पहले प्रधानमंत्री हैं जो आजाद भारत में पैदा हुए. तीन बार लगातार जीत - 2014, 2019 और 2024 तीनों लोकसभा चुनावों में जनता ने उन्हें चुना.2019 में भाजपा ने 303 सीटें जीतकर अपनी स्थिति और मजबूत की। 2024 में 240 सीटों के साथ एनडीए गठबंधन ने सत्ता बरकरार रखी। जवाहरलाल नेहरू के बाद प्रधानमंत्री मोदी लगातार तीन कार्यकाल के लिए नियुक्त होने वाले एकमात्र प्रधानमंत्री हैं। लगातार भारत का प्रधानमंत्री पद पर बने रहने का दिवंगत इंदिरा गांधी का रिकॉर्ड मोदी ने तोड़ उन्होंने पिछले साल इंदिरा गांधी (4,077 दिन) को लगातार प्रधानमंत्री रहने के मामले में पीछे छोड़ दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सितंबर 2025 में अपने तीसरे कार्यालय के दौरान वे लगातार सबसे लंबे समय तक पीएम रहने वाले भारत के दूसरे प्रधानमंत्री बन गए। साथ ही वे पहले गैर-कांग्रेसी नेता हैं जिन्होंने लगातार दो पूर्ण कार्यकाल पूरे किए हैं।इसी सिलसिले में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने इस उपलब्धि के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बधाई दी है. उन्होंने लिखा, "नरेंद्र मोदी का पूरा जीवन देश और देशवासियों की सेवा को समर्पित रहा है. गुजरात के मुख्यमंत्री से लेकर देश के प्रधानमंत्री तक यह यात्रा सेवा, ईमानदारी और देश को सबसे पहले रखने की यात्रा है.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एक रिपोर्ट के के मुताबिक पीएम मोदी ने अपने सफर को याद करते हुए बताया कि जब उन्होंने 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में काम शुरू किया, तब राज्य कई बड़ी मुश्किलों से गुजर रहा था। गुजरात भूकंप, चक्रवात, सूखा और राजनीतिक अस्थिरता जैसी समस्याओं से जूझ रहा था। उन्होंने कहा कि इन चुनौतियों ने उन्हें और मजबूत बनाया और उन्होंने राज्य को आगे बढ़ाने के लिए पूरी ताकत लगा दी। उन्होंने अपनी मां की एक सीख का भी जिक्र किया, गरीबों के लिए काम करना और कभी रिश्वत न लेना, जैसी सीख को उन्होंने अपने जीवन का मार्गदर्शन बताया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पीएम मोदी के अनुसार, उनके कार्यकाल में गुजरात ने कृषि, उद्योग और इंफ्रास्ट्रक्चर में काफी तरक्की की और एक मजबूत राज्य के रूप में उभरा। उन्होंने यह भी कहा कि 2014 में जब उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया गया, तब देश में भरोसे का संकट था, लेकिन जनता ने उन्हें मजबूत समर्थन दिया।पीएम मोदी ने दावा किया कि पिछले 11 वर्षों में 25 करोड़ से ज्यादा लोग गरीबी से बाहर आए हैं और भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में एक मजबूत देश बनकर उभरा है। पीएम मोदी ने महिलाओं (नारी शक्ति), युवाओं और किसानों के सशक्तिकरण पर जोर देते हुए कहा कि देश की सेवा करना उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान है। उन्होंने विकसित भारत के लक्ष्य को पूरा करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और लंबे सार्वजनिक जीवन की जमकर सराहना की है। अमित शाह ने कहा कि पीएम मोदी की दशकों की सेवा ने भारत में एक नया दौर शुरू किया है। उन्होंने गरीबों को अधिकार दिलाने, विकास को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने और दुनिया में भारत की छवि मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई है।उन्होंने यह भी कहा कि नए भारत के निर्माण के लिए पीएम मोदी ने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया है और पिछले 24 साल से अधिक समय से बिना छुट्टी लिए देश की सेवा कर रहे हैं। अमित शाह ने बताया कि पीएम मोदी को जनता का अपार प्यार और समर्थन मिला है। वास्तव में नरेन्द्र मोदी एक बिरले व्यक्तित्व है यह बात उनके विरोधी भी दबी जुबान से स्वीकार करते हैं।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 23 Mar 2026 17:13:27 +0530</pubDate>
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                <title>पांच राज्यों के चुनाव में बदलते समीकरण</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">भारत की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है, जहां असम, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी जैसे राज्यों के चुनाव केवल क्षेत्रीय सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह राष्ट्रीय राजनीति की दिशा और भविष्य की रणनीति तय करने वाले साबित हो सकते हैं। इन चुनावों में सबसे अधिक चर्चा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की रणनीति को लेकर है, क्योंकि पार्टी अब केवल हिंदी पट्टी तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि दक्षिण और पूर्वी भारत में भी अपने प्रभाव को निर्णायक रूप से स्थापित करने के प्रयास में है। इन चुनावों में भाजपा का फोकस विकास,</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173809/changing-equations-in-elections-of-five-states"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/hindi-divas13.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">भारत की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है, जहां असम, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी जैसे राज्यों के चुनाव केवल क्षेत्रीय सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह राष्ट्रीय राजनीति की दिशा और भविष्य की रणनीति तय करने वाले साबित हो सकते हैं। इन चुनावों में सबसे अधिक चर्चा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की रणनीति को लेकर है, क्योंकि पार्टी अब केवल हिंदी पट्टी तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि दक्षिण और पूर्वी भारत में भी अपने प्रभाव को निर्णायक रूप से स्थापित करने के प्रयास में है। इन चुनावों में भाजपा का फोकस विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा, सांस्कृतिक पहचान और कल्याणकारी योजनाओं के संतुलन पर है, जबकि विपक्षी दल क्षेत्रीय पहचान, सामाजिक न्याय और लोकल मुद्दों के सहारे मुकाबला कर रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">असम में जहां हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में भाजपा सरकार अपने विकास मॉडल, बुनियादी ढांचे के विस्तार और ‘असमिया अस्मिता’ की रक्षा को मुख्य मुद्दा बना रही है, वहीं पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में भाजपा की रणनीति पूरी तरह अलग और अधिक जटिल दिखाई देती है। असम में भाजपा अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में है और यहां उसका फोकस सत्ता बनाए रखने पर है, जबकि बंगाल और दक्षिण भारत में वह विस्तारवादी रणनीति के तहत नई सामाजिक और राजनीतिक जमीन तैयार कर रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल में मुकाबला मुख्यतः भाजपा और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बीच केंद्रित है, जहां ममता बनर्जी के नेतृत्व में टीएमसी ने इस बार 103 नए चेहरों को मैदान में उतारकर एक बड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है। फिल्मी सितारों की संख्या घटाकर आम और जमीनी स्तर से जुड़े उम्मीदवारों को प्राथमिकता देना यह दर्शाता है कि टीएमसी एंटी-इन्कम्बेंसी को कम करने और नए वोटरों को आकर्षित करने की रणनीति अपना रही है। इसके जवाब में भाजपा का फोकस ‘परिवर्तन’ के नारे, भ्रष्टाचार के आरोप, केंद्रीय योजनाओं के लाभ और ‘डबल इंजन सरकार’ के वादे पर है। भाजपा बंगाल में कानून-व्यवस्था, राजनीतिक हिंसा और घोटालों जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठा रही है, जिससे वह शहरी और मध्यम वर्ग के साथ-साथ युवा मतदाताओं को अपने पक्ष में कर सके।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बंगाल में भाजपा की एक और महत्वपूर्ण रणनीति हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को स्थानीय पहचान के साथ जोड़ने की है, जिसमें धार्मिक स्थलों, परंपराओं और त्योहारों को राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाया जा रहा है। हालांकि यह रणनीति पूरी तरह सफल होगी या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि भाजपा स्थानीय बंगाली अस्मिता के साथ कितनी सहजता से खुद को जोड़ पाती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">केरल में भाजपा की स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर है, लेकिन यहां पार्टी लगातार अपनी उपस्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रही है। केरल की राजनीति परंपरागत रूप से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ और वाम लोकतांत्रिक मोर्चा के बीच घूमती रही है, लेकिन भाजपा अब इस द्विध्रुवीय राजनीति को तोड़ने की कोशिश में है। भाजपा का फोकस यहां सबरीमाला मंदिर मुद्दा, हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण, और केंद्र सरकार की योजनाओं के लाभार्थियों को जोड़ने पर है। साथ ही पार्टी ईसाई समुदाय के साथ भी संवाद बढ़ाकर सामाजिक समीकरण बदलने की कोशिश कर रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तमिलनाडु में भाजपा की चुनौती और भी बड़ी है, क्योंकि यहां द्रविड़ राजनीति का गहरा प्रभाव है। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम और अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के बीच पारंपरिक मुकाबले में भाजपा खुद को तीसरे विकल्प के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रही है। यहां भाजपा का चुनावी विजन ‘संस्कृति बनाम द्रविड़ विचारधारा’ के साथ-साथ विकास और निवेश को बढ़ावा देने पर केंद्रित है। प्रधानमंत्री की लोकप्रियता, केंद्र की योजनाएं और राष्ट्रीय मुद्दों को स्थानीय संदर्भ में प्रस्तुत करना भाजपा की रणनीति का अहम हिस्सा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन सभी राज्यों में भाजपा जिन प्रमुख मुद्दों पर जनता को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है, उनमें सबसे पहले विकास और बुनियादी ढांचे का विस्तार है। सड़क, रेलवे, डिजिटल कनेक्टिविटी और रोजगार के अवसरों को पार्टी अपने सबसे बड़े उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है। दूसरा बड़ा मुद्दा ‘डबल इंजन सरकार’ का है, जिसमें यह दावा किया जाता है कि केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार होने से विकास तेजी से होता है। तीसरा महत्वपूर्ण मुद्दा कल्याणकारी योजनाएं हैं, जैसे मुफ्त राशन, उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत और पीएम आवास योजना, जिनके लाभार्थियों को भाजपा अपने स्थायी वोट बैंक में बदलने की कोशिश कर रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके अलावा राष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद के खिलाफ सख्ती और भारत की वैश्विक छवि को मजबूत करने जैसे मुद्दे भी भाजपा के चुनावी अभियान का हिस्सा हैं। वहीं सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और हिंदुत्व भी कई राज्यों में पार्टी के लिए प्रभावी हथियार बने हुए हैं, हालांकि दक्षिण भारत में इसे अधिक सावधानी से इस्तेमाल किया जा रहा है।इस बार के चुनावों में यह भी देखने को मिल रहा है कि भाजपा स्थानीय नेतृत्व को आगे बढ़ाने की रणनीति अपना रही है, ताकि यह धारणा खत्म की जा सके कि पार्टी केवल केंद्रीय नेतृत्व पर निर्भर है। साथ ही सोशल मीडिया, डिजिटल कैंपेन और डेटा आधारित चुनावी रणनीति का भी व्यापक उपयोग किया जा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विपक्षी दल भी अपनी-अपनी रणनीति के साथ मैदान में हैं। बंगाल में टीएमसी जहां ‘दीदी के 10 संकल्प’ और लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाओं के जरिए महिलाओं और गरीब वर्ग को साधने की कोशिश कर रही है, वहीं केरल में राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस बदलाव का नारा दे रही है। इन सबके बीच चुनावी मुकाबला केवल नीतियों का नहीं, बल्कि नैरेटिव और धारणा का भी बन गया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः यह कहा जा सकता है कि पांच राज्यों के ये चुनाव केवल क्षेत्रीय सत्ता का संघर्ष नहीं हैं, बल्कि यह भाजपा के राष्ट्रीय विस्तार, विपक्ष की एकजुटता और भारतीय राजनीति के भविष्य की दिशा तय करने वाले हैं। भाजपा जहां विकास, राष्ट्रवाद और कल्याणकारी योजनाओं के सहारे अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है, वहीं विपक्ष स्थानीय मुद्दों, सामाजिक समीकरणों और क्षेत्रीय पहचान के आधार पर उसे चुनौती दे रहा है। आने वाले परिणाम यह तय करेंगे कि क्या भाजपा अपनी रणनीति में सफल होती है या फिर क्षेत्रीय दल अपनी पकड़ बनाए रखते है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 22 Mar 2026 17:18:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>कांग्रेस में अनुशासन संकट और नेतृत्व पर उठते सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">भारतीय राजनीति में दलों के भीतर मतभेद कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब ये मतभेद सार्वजनिक मंचों से तीखे व्यक्तिगत हमलों में बदल जाएं, तो उनका असर केवल पार्टी की छवि तक सीमित नहीं रहता बल्कि व्यापक राजनीतिक परिदृश्य को भी प्रभावित करता है। हाल के दिनों में मणिशंकर अय्यर, पवन खेड़ा और जयराम रमेश के बीच चला बयानबाजी का दौर इसी प्रवृत्ति का उदाहरण है। इस विवाद ने कांग्रेस के भीतर अनुशासन, नेतृत्व और वैचारिक स्पष्टता पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।</div>
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<div style="text-align:justify;">विवाद की पृष्ठभूमि केरल की राजनीति से जुड़ी है, जहां वाम लोकतांत्रिक मोर्चा के नेतृत्व</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/170061/discipline-crisis-in-congress-and-questions-raised-on-leadership"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/images-(1)28.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">भारतीय राजनीति में दलों के भीतर मतभेद कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब ये मतभेद सार्वजनिक मंचों से तीखे व्यक्तिगत हमलों में बदल जाएं, तो उनका असर केवल पार्टी की छवि तक सीमित नहीं रहता बल्कि व्यापक राजनीतिक परिदृश्य को भी प्रभावित करता है। हाल के दिनों में मणिशंकर अय्यर, पवन खेड़ा और जयराम रमेश के बीच चला बयानबाजी का दौर इसी प्रवृत्ति का उदाहरण है। इस विवाद ने कांग्रेस के भीतर अनुशासन, नेतृत्व और वैचारिक स्पष्टता पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।</div>
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<div style="text-align:justify;">विवाद की पृष्ठभूमि केरल की राजनीति से जुड़ी है, जहां वाम लोकतांत्रिक मोर्चा के नेतृत्व में मुख्यमंत्री पिनराई विजयन की संभावित वापसी को लेकर बयान सामने आया। कांग्रेस लंबे समय से केरल में संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा के माध्यम से सत्ता में वापसी का प्रयास करती रही है। ऐसे में पार्टी के वरिष्ठ नेता द्वारा सार्वजनिक रूप से प्रतिद्वंद्वी मोर्चे के नेता की प्रशंसा और उनके दोबारा मुख्यमंत्री बनने की भविष्यवाणी करना स्वाभाविक रूप से विवाद का कारण बना। पार्टी प्रवक्ता की ओर से यह कहा जाना कि संबंधित नेता व्यक्तिगत क्षमता में बोल रहे हैं और उनका पार्टी से औपचारिक संबंध सक्रिय नहीं है, आग में घी डालने जैसा साबित हुआ।</div>
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<div style="text-align:justify;">इसके बाद जिस तरह से तीखी प्रतिक्रिया सामने आई, उसने राजनीतिक असहमति को व्यक्तिगत कटाक्षों में बदल दिया। किसी को कठपुतली या तोता कहना, पार्टी सहयोगियों को राउडी बताना या सार्वजनिक रूप से यह कहना कि यदि निकाला गया तो प्रतिशोध लेंगे, यह सब उस राजनीतिक संस्कृति को दर्शाता है जिसमें संयम और संवाद की जगह उत्तेजना और आक्रोश ले लेते हैं। लोकतांत्रिक दलों में असहमति स्वाभाविक है, परंतु असहमति की अभिव्यक्ति का भी एक मर्यादित तरीका होता है। जब वरिष्ठ नेता ही मर्यादा की सीमाएं लांघते दिखें, तो कार्यकर्ताओं और समर्थकों को क्या संदेश जाता है, यह विचारणीय है।</div>
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<div style="text-align:justify;">कांग्रेस एक ऐतिहासिक दल है जिसने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आधुनिक भारत के निर्माण तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे नेताओं की विरासत का दावा करने वाला दल यदि अपने ही नेताओं के बीच सार्वजनिक कटुता से जूझता दिखे, तो मतदाताओं में भ्रम और निराशा स्वाभाविक है। आज जब भारतीय राजनीति अत्यंत प्रतिस्पर्धी और ध्रुवीकृत हो चुकी है, तब किसी भी दल के लिए आंतरिक एकजुटता उसकी सबसे बड़ी ताकत होती है।</div>
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<div style="text-align:justify;">नेतृत्व का प्रश्न भी इस पूरे विवाद के केंद्र में है। पार्टी के भीतर यह धारणा बनना कि कौन गांधीवादी है, कौन नेहरूवादी है और कौन किस नेतृत्व के प्रति प्रतिबद्ध है, यह वैचारिक बहस का विषय हो सकता है। लेकिन जब यह बहस सार्वजनिक मंच से चुनौती और कटाक्ष के रूप में सामने आए, तो वह संगठनात्मक अनुशासन को कमजोर करती है। किसी भी राजनीतिक दल में नेतृत्व के प्रति असहमति दर्ज कराने के औपचारिक मंच होते हैं—कार्यसमिति, समन्वय बैठकें, आंतरिक संवाद। यदि इन मंचों की बजाय मीडिया और सार्वजनिक सभाओं को माध्यम बनाया जाए, तो संदेश यही जाता है कि पार्टी के भीतर संवाद की प्रक्रिया कमजोर है।</div>
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<div style="text-align:justify;">इस प्रकरण का एक व्यापक राजनीतिक आयाम भी है। विपक्षी दल ऐसे बयानों को तुरंत लपकते हैं और यह संदेश देने का प्रयास करते हैं कि पार्टी के भीतर नेतृत्व पर भरोसा नहीं है। इससे न केवल पार्टी की साख पर असर पड़ता है, बल्कि गठबंधन राजनीति में भी उसकी स्थिति कमजोर होती है। केरल जैसे राज्यों में जहां बहुकोणीय मुकाबला है, वहां विपक्षी एकता और स्पष्ट रणनीति की आवश्यकता और भी अधिक होती है। यदि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ही अलग-अलग सुर में बोलते दिखें, तो कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरना स्वाभाविक है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कांग्रेस के सामने चुनौती केवल चुनाव जीतने की नहीं है, बल्कि संगठन को पुनर्गठित करने और कार्यकर्ताओं में विश्वास जगाने की भी है। पिछले वर्षों में कई वरिष्ठ नेताओं का पार्टी छोड़ना या निष्क्रिय हो जाना यह संकेत देता है कि भीतर कहीं संवाद और संतुलन की कमी रही है। अनुशासन केवल दंडात्मक कार्रवाई से स्थापित नहीं होता, बल्कि पारदर्शी संवाद, स्पष्ट जिम्मेदारी और सामूहिक निर्णय प्रक्रिया से बनता है। यदि कोई नेता पार्टी लाइन से अलग बयान देता है, तो पहले आंतरिक स्तर पर बात होनी चाहिए। सार्वजनिक फटकार या सार्वजनिक अपमान स्थिति को और बिगाड़ता है।</div>
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<div style="text-align:justify;">राजनीति में शब्दों का महत्व बहुत बड़ा होता है। एक कठोर टिप्पणी क्षणिक संतोष दे सकती है, लेकिन दीर्घकाल में वह संगठन की छवि को नुकसान पहुंचाती है। मतदाता केवल नीतियों और घोषणाओं को नहीं देखते, बल्कि नेताओं के व्यवहार और भाषा को भी परखते हैं। जब मंच से अभद्रता या व्यक्तिगत हमले दिखाई देते हैं, तो आम नागरिक यह सोचने पर मजबूर होता है कि क्या यही राजनीतिक संस्कृति देश को दिशा देगी।</div>
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<div style="text-align:justify;">कांग्रेस के लिए यह समय आत्ममंथन का है। उसे यह तय करना होगा कि क्या वह व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और सार्वजनिक बयानबाजी के आधार पर आगे बढ़ेगी या सामूहिक नेतृत्व और अनुशासन के आधार पर। संगठन के भीतर मतभेदों को स्वीकार करते हुए भी एक साझा सार्वजनिक रुख अपनाना आवश्यक है। पार्टी को अपने प्रवक्ताओं और वरिष्ठ नेताओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना होगा, ताकि संदेश स्पष्ट और एकसमान रहे।</div>
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<div style="text-align:justify;">अंततः किसी भी राजनीतिक दल की मजबूती उसके विचार, संगठन और अनुशासन से तय होती है। यदि कांग्रेस को अपने गिरते जनाधार को पुनर्जीवित करना है, तो उसे शांत चित्त से सोचकर संगठनात्मक सुधार, नेतृत्व की स्पष्टता और संवाद की संस्कृति को मजबूत करना होगा। सार्वजनिक मंचों से कटाक्ष और आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति अल्पकालिक सुर्खियां तो दिला सकती है, परंतु दीर्घकाल में वही दल सफल होता है जो संयम, एकजुटता और स्पष्ट दिशा के साथ आगे बढ़ता है। कांग्रेस के सामने आज यही सबसे बड़ी परीक्षा है।</div>
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<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>
<div class="yj6qo" style="text-align:justify;"> </div>
<div class="adL" style="text-align:justify;"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 17 Feb 2026 18:13:47 +0530</pubDate>
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