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                <title>बिहार विधान परिषद में हालिया हंगामे ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>सदन की मर्यादा पर सवाल लोकतंत्र का मंदिर या सियासत का अखाड़ा?</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">बिहार विधान परिषद में हालिया हंगामे ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हमारे जनप्रतिनिधि लोकतंत्र की गरिमा को समझ रहे हैं या नहीं। मंत्री अशोक चौधरी और राजद के सुनील कुमार सिंह के बीच जिस तरह की तीखी नोकझोंक हुई, वह केवल राजनीतिक मतभेद नहीं था, बल्कि भाषा और आचरण की सीमाओं का खुला उल्लंघन था। आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला इतना बढ़ गया कि बात हाथापाई तक पहुंच गई और मार्शलों को बीच-बचाव करना पड़ा। सदन की कार्यवाही बाधित हुई, सभापति को हस्तक्षेप करना पड़ा और विपक्षी सदस्यों को दिन भर के लिए बाहर</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/169194/question-on-the-dignity-of-the-house-temple-of-democracy"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/new-project-2026-02-06t132931.475.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">बिहार विधान परिषद में हालिया हंगामे ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हमारे जनप्रतिनिधि लोकतंत्र की गरिमा को समझ रहे हैं या नहीं। मंत्री अशोक चौधरी और राजद के सुनील कुमार सिंह के बीच जिस तरह की तीखी नोकझोंक हुई, वह केवल राजनीतिक मतभेद नहीं था, बल्कि भाषा और आचरण की सीमाओं का खुला उल्लंघन था। आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला इतना बढ़ गया कि बात हाथापाई तक पहुंच गई और मार्शलों को बीच-बचाव करना पड़ा। सदन की कार्यवाही बाधित हुई, सभापति को हस्तक्षेप करना पड़ा और विपक्षी सदस्यों को दिन भर के लिए बाहर करना पड़ा। यह दृश्य केवल एक दिन की अव्यवस्था नहीं था, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के स्तर में गिरावट का संकेत था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सदन को लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता है। यहां जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि बैठते हैं, जो राज्य की नीतियां तय करते हैं, कानून बनाते हैं और सरकार से जवाबदेही मांगते हैं। लेकिन जब इसी सदन में ‘चोट्टा’, ‘चोर’ और ‘घोटालेबाज’ जैसे शब्द गूंजते हैं, जब ‘औकात’ जैसी भाषा का इस्तेमाल होता है, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हम अपने लोकतंत्र को सही दिशा में ले जा रहे हैं। बहस और विरोध लोकतंत्र की आत्मा हैं, लेकिन गाली-गलौज और व्यक्तिगत हमले उसकी आत्मा को आहत करते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हंगामे की शुरुआत कार्यवाही में देरी को लेकर हुई। विपक्ष ने मुख्यमंत्री द्वारा कथित अभद्र टिप्पणी और राबड़ी देवी के अपमान का मुद्दा उठाया। सत्ता पक्ष ने इसे प्रक्रिया का मामला बताया। धीरे-धीरे वातावरण गरमाता गया और व्यक्तिगत आरोपों का दौर शुरू हो गया। मंत्री और विपक्षी सदस्य आमने-सामने आ गए। जिस तरह की भाषा का प्रयोग हुआ, वह लिखने योग्य भी नहीं है। सदन के भीतर की यह स्थिति आम नागरिकों के लिए निराशाजनक है, क्योंकि वे उम्मीद करते हैं कि उनके प्रतिनिधि संयम और शालीनता का उदाहरण पेश करेंगे।</div>
<div style="text-align:justify;">यह पहला अवसर नहीं है जब बिहार की राजनीति में सदन के भीतर शालीनता पर प्रश्नचिह्न लगा हो।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी और लालू प्रसाद यादव के कार्यकाल के दौरान भी कई बार सदन में तीखी बहसें और हंगामे हुए। 1990 के दशक में चारा घोटाले को लेकर विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच जबरदस्त टकराव देखने को मिला था। उस समय भी आरोप-प्रत्यारोप और राजनीतिक कटाक्षों ने सदन की कार्यवाही को कई बार बाधित किया। हालांकि उस दौर की राजनीति में भी कटुता थी, लेकिन यह अपेक्षा की जाती रही कि व्यक्तिगत मर्यादा की एक सीमा बनी रहे। लोकतांत्रिक विमर्श में असहमति स्वाभाविक है, परंतु असभ्यता स्वीकार्य नहीं हो सकती।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज की घटना में जो बात अधिक चिंताजनक है, वह यह है कि राजनीतिक दल एक-दूसरे को सुनने की बजाय केवल आरोप लगाने में लगे दिखाई देते हैं। विपक्ष को अपनी बात रखने और सरकार से सवाल पूछने का पूरा अधिकार है। वहीं सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी है कि वह धैर्यपूर्वक जवाब दे और आलोचना को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा माने। लेकिन जब संवाद की जगह टकराव ले लेता है, तो लोकतंत्र कमजोर होता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बिहार विधानसभा में भी इसी दिन बच्चियों के खिलाफ बढ़ते अपराध, नीट छात्र की मौत और राबड़ी देवी के अपमान को लेकर जोरदार नारेबाजी हुई। कांग्रेस विधायकों द्वारा सरकार का पुतला सदन में लाना और उसे चूड़ियां पहनाना प्रतीकात्मक विरोध था, परंतु इससे भी सदन की कार्यवाही प्रभावित हुई। विरोध दर्ज कराने के लोकतांत्रिक तरीके होते हैं, लेकिन सदन की गरिमा बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर राबड़ी देवी की टिप्पणी कि वे अपने पद की गरिमा भूल गए हैं, राजनीति में बढ़ती कटुता को दर्शाती है। राजनीतिक मतभेदों के बावजूद भाषा की मर्यादा बनाए रखना प्रत्येक नेता की जिम्मेदारी है। जब वरिष्ठ नेता ही संयम खो बैठते हैं, तो युवा नेताओं और कार्यकर्ताओं को गलत संदेश जाता है। लोकतंत्र केवल संख्या का खेल नहीं है, बल्कि आचरण और संवाद की संस्कृति भी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह भी सच है कि चुनावी हार-जीत का असर सदन के व्यवहार पर पड़ता है। हार का गम और सत्ता का आत्मविश्वास, दोनों ही कभी-कभी संतुलन बिगाड़ देते हैं। लेकिन जनप्रतिनिधियों को यह नहीं भूलना चाहिए कि वे व्यक्तिगत लड़ाई नहीं लड़ रहे, बल्कि जनता की उम्मीदों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। जिन लोगों ने उन्हें वोट देकर सदन तक पहुंचाया, वे उम्मीद करते हैं कि उनके मुद्दों पर गंभीर चर्चा होगी, न कि सड़कछाप भाषा का प्रदर्शन।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सदन में हुई घटना ने देशवासियों को यह सोचने पर मजबूर किया है कि क्या हमारे लोकतांत्रिक संस्थान अपनी गरिमा बचा पा रहे हैं। संसद और विधानसभाएं केवल राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन के मंच नहीं हैं। वे नीति निर्माण और सामाजिक संवाद के केंद्र हैं। यदि यहां भी शोर, आरोप और अपमान ही सुनाई देंगे, तो जनता का विश्वास कमजोर होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">समय आ गया है कि सभी दल आत्ममंथन करें। सत्ता पक्ष को चाहिए कि वह विपक्ष की आलोचना को सहनशीलता से ले और पारदर्शिता के साथ जवाब दे। विपक्ष को चाहिए कि वह विरोध दर्ज कराते समय भाषा और व्यवहार की मर्यादा का पालन करे। सभापति और स्पीकर की भूमिका भी महत्वपूर्ण है, जो निष्पक्षता से सदन को संचालित करें और अनुशासन सुनिश्चित करें।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लोकतंत्र की खूबसूरती इसी में है कि यहां विचारों की लड़ाई होती है, व्यक्तियों की नहीं। असहमति लोकतंत्र को मजबूत करती है, लेकिन असभ्यता उसे कमजोर करती है। यदि हमारे जनप्रतिनिधि सदन में संयम और शालीनता का उदाहरण पेश करेंगे, तो लोकतंत्र की जड़ें और मजबूत होंगी। अन्यथा, लोकतंत्र का मंदिर धीरे-धीरे सियासत का अखाड़ा बनता चला जाएगा। जनता ने जिन्हें सम्मान देकर सदन तक भेजा है, उनसे यही अपेक्षा है कि वे अपनी भाषा और व्यवहार से उस सम्मान को बनाए रखें और लोकतंत्र की मर्यादा को सर्वोपरि मानें।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
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                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 11 Feb 2026 18:01:56 +0530</pubDate>
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