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                <title>क्या विद्यालयों को बंद करने से भारत बनेगा विश्व गुरु ? - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>क्या विद्यालयों को बंद करने से भारत बनेगा विश्व गुरु ? </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><span style="font-size:large;"><strong>निर्मल रानी</strong></span></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>पिछले दिनों एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी शासित राज्य मध्य प्रदेश से एक निर्माणाधीन निजी स्कूल की इमारत को बुल्डोज़र से ढहा दिये जाने का अत्यंत दुखद समाचार प्राप्त हुआ। प्राप्त ख़बरों के अनुसार मध्य प्रदेश के बैतूल ज़िले के धाबा गांव के रहने वाले अब्दुल नईम इसी गांव में अपनी निजी ज़मीन पर एक निजी स्कूल बनवा रहे थे। परन्तु चूँकि निर्माणाधीन स्कूल संचालक का नाम 'अब्दुल नईम' था इसलिये प्रशासन ने उस भवन को स्कूल के बजाये मदरसा बताकर ढहा दिया। बताया जा रहा है कि जिस समय बुलडोज़र उस </strong><strong>निर्माणाधीन </strong><strong>स्कूल भवन को ध्वस्त</strong></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/168230/will-india-become-a-world-leader-by-closing-schools"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/hindi-divas8.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><span style="font-size:large;"><strong>निर्मल रानी</strong></span></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>पिछले दिनों एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी शासित राज्य मध्य प्रदेश से एक निर्माणाधीन निजी स्कूल की इमारत को बुल्डोज़र से ढहा दिये जाने का अत्यंत दुखद समाचार प्राप्त हुआ। प्राप्त ख़बरों के अनुसार मध्य प्रदेश के बैतूल ज़िले के धाबा गांव के रहने वाले अब्दुल नईम इसी गांव में अपनी निजी ज़मीन पर एक निजी स्कूल बनवा रहे थे। परन्तु चूँकि निर्माणाधीन स्कूल संचालक का नाम 'अब्दुल नईम' था इसलिये प्रशासन ने उस भवन को स्कूल के बजाये मदरसा बताकर ढहा दिया। बताया जा रहा है कि जिस समय बुलडोज़र उस </strong><strong>निर्माणाधीन </strong><strong>स्कूल भवन को ध्वस्त कर रहा था उस समय ग्रामीण, प्रशासन से उसे न तोड़े जाने की गुहार लगा रहे थे। ख़ुद स्थानीय सरपंच हाथ जोड़कर </strong><strong>प्रशासन से </strong><strong>बुलडोज़र चलाने से मना करती रहीं परन्तु एसडीएम के आदेश पर बुलडोज़र चला दिया गया। </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>ग्रामीणों में पहली बार यह आस बंधी थी कि यह स्कूल खुलने के बाद उनके बच्चे अब गांव में ही पढ़ पाएंगे परन्तु वे लोग मलबे के सामने खड़े होकर सवाल पूछते नज़र आये । उस पर ढिटाई यह कि ज़िला प्रशासन ने यह आरोप मढ़ दिया कि पंचायत ने ही स्कूल की निर्माणाधीन इमारत पर बुल्डोज़र चलवाया है जबकि सरपंच और उप सरपंच इस से साफ़ इनकार कर रहे हैं। ग़ौरतलब है कि लगभग दो हज़ार की आबादी वाला धाबा गांव आदिवासी बाहुल्य गांव है और इस गांव में केवल तीन ही मुस्लिम परिवार रहते हैं। अच्छे स्कूल के अभाव में ही इस गांव के कई परिवार बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए गांव से 10-15 किलोमीटर दूर तक प्राइवेट स्कूल में पढ़ने के लिए भेजते हैं। इसी उद्देश्य से अब्दुल नईम ने स्कूल बनाने के लिए न केवल अपनी पूरी जमा-पूंजी लगा दी बल्कि लाखों रूपये लोगों से उधार भी लेकर अपने सपनों के इस स्कूल में लगा दिये थे। </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>बड़ी अजीब बात है कि वर्तमान सरकार से ही जुड़े नेता मंत्री व समर्थक भारत को 'विश्व गुरु' बनाने का ढिंढोरा पीटते रहते हैं। तो क्या  विश्व गुरु भारत  का अर्थ शिक्षित भारत नहीं ? और यदि शिक्षित भारत का सपना साकार करना है तो शिक्षण संस्थाओं से दुश्मनी कैसी ? परन्तु दुर्भाग्य तो यही है कि विश्व गुरु बनने का जितनी ज़ोर ज़ोर ढिंढोरा पीटा जा रहा है उतनी ही तेज़ी से इसी सरकार के दौर में स्कूल भी बंद किये जा रहे हैं। केवल  2019 से 2024 तक  अनुमानतः लगभग 14,910 सरकारी स्कूल या तो बंद कर दिये गये या दूसरे स्कूल्स में समाहित कर दिये गये। कुल मिलाकर अब तक 89,441 सरकारी स्कूल बंद होने का उल्लेख है। इस दौरान निजी स्कूलों में वृद्धि हुई है जबकि सरकारी स्कूलों में कमी आई है। सबसे ज़्यादा स्कूल मध्य प्रदेश, ओडिशा, व जम्मू-कश्मीर राज्यों में बंद किये जाने की ख़बर है। जबकि गुजरात, पश्चिम बंगाल,महाराष्ट्र,पंजाब, राजस्थान के अलावा सीमावर्ती क्षेत्रों सांबा, कठुआ, राजौरी, पूंछ, बाड़मेर, बीकानेर, जैसलमेर में भी काफ़ी संख्या में स्कूल बंद किये गये। </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>स्कूल बंद करने के जो कारण बताये गये उनमें कहीं आधारभूत संरचना की कमी बताई गयी तो कहीं शिक्षकों की भारी कमी बताकर स्कूल बंद किये गए। कहीं कम छात्र संख्या वाले स्कूलों को बड़े स्कूलों में समाहित कर दिया गया। इसी तरह कुछ राज्यों में नये निजी स्कूलों की वृद्धि के चलते सरकारी स्कूलों पर दबाव बढ़ा और उन्हें बंद करना पड़ा। ज़ाहिर है इससे ग़रीब व निम्न वर्ग के बच्चों की शिक्षा में बाधा पड़ना स्वभाविक है। इसी तरह सरकार की सबसे ज़्यादा गाज मदरसों पर गिरी। देश के सैकड़ों मदरसों को या तो अवैध बताकर ढहा दिया गया या उन्हें बंद करवा दिया गया। भाजपा शासित असम,उत्तर प्रदेश,उत्तराखंड बिहार,मध्य प्रदेश,व छत्तीसगढ़ राज्यों में अनेक मदरसे बंद किये गये। निःसंदेह यह क़दम ख़ासकर ग़रीब मुस्लिम अल्पसंख्यकों की शिक्षा के साथ भेदभाव के सिवा और कुछ नहीं क्योंकि 90% से ज़्यादा मदरसा छात्र ग़रीब पृष्ठभूमि से आते हैं। </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>जहाँ तक मदरसे में मिलने वाली शिक्षा का सवाल है तो इस्लाम धर्म व मुस्लिम समाज से नफ़रत करने वालों ने भारतीय मदरसों को साम्प्रदायिक शिक्षा के केंद्र के रूप में क्यों न दुष्प्रचारित किया हो परन्तु यदि आप मदरसों से शिक्षा प्राप्त महापुरुषों व विशिष्ट जनों पर नज़र डालें तो मदरसों के साम्प्रदायिक होने की गढ़ित धारणा स्वयं ही समाप्त हो जायेगी और यह महज़ एक प्रोपेगंडा प्रतीत होगा। मिसाल के तौर पर सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी ने मदरसा में ही शिक्षा हासिल कर फ़ारसी भाषा सीखी। इसी तरह सिखों के दसवें गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी ने भी मदरसे से ही शिक्षा हासिल कर फ़ारसी का ज्ञान प्राप्त किया। तभी वे फ़ारसी में इतना निपुण थे कि उन्होंने अपनी मशहूर रचना 'ज़फ़र नामा' फ़ारसी में लिखी। सिख साम्राज्य के संस्थापक महाराजा रणजीत सिंह की तो दरबारी भाषा ही फ़ारसी थी जो कि मदरसा शिक्षा से जुड़ी थी।</strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong> मराठा साम्राज्य के संस्थापक शिवाजी महाराज भी फ़ारसी भाषा में निपुण थे। उन्होंने फ़ारसी-संस्कृत शब्दकोश का संकलन करवाया।  शिवाजी महाराज  के दौर में फ़ारसी शिक्षा मदरसे से ही जुड़ी होती थी। इसी तरह हिन्दू सुधारक और ब्रह्म समाज के संस्थापक राजा राम मोहन राय ने भी बंगाल के मदरसा आलिया और पटना के मदरसा मुजीबिया में पढ़ाई की। उन्होंने फ़ारसी और अरबी सीखी और एक फ़ारसी अख़बार का संपादन भी किया। भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने भी ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक शिक्षा की कमी के कारण मदरसा में पढ़ाई की। भारतीय साहित्य की प्रमुख हस्ती प्रसिद्ध  लेखक व कहानीकार मुंशी प्रेमचंद ने वाराणसी के एक ऐसे मदरसे में पढ़ाई की, जहां ग़ैर-मुस्लिम छात्र भी बड़ी संख्या में पढ़ते थे।</strong></div>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"><strong>और मुस्लिम समाज की जो विशिष्ट हस्तियां मदरसा से शिक्षा प्राप्त हैं उनमें  भारत के पहले शिक्षा मंत्री और स्वतंत्रता सेनानी मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के संस्थापक सर सैयद अहमद ख़ान, 'इंक़लाब ज़िंदाबाद' का नारा देने वाले  प्रसिद्ध उर्दू कवि और स्वतंत्रता सेनानी हसरत मोहानी, स्वतंत्रता सेनानी व 'सिल्क लेटर मूवमेंट' के नेता मौलाना महमूद हसन देवबंदी जैसे अनेक लोगों के नाम शामिल हैं। आज भी बंगाल,झारखण्ड व बिहार जैसे कई राज्यों में केवल मुस्लिम नहीं बल्कि बड़ी संख्या में ग़ैर मुस्लिम ग़रीब बच्चे मदरसों में शिक्षा हासिल करते हैं। परन्तु सरकार क्या मदरसा तो क्या अन्य सरकारी स्कूल सभी को किसी न किसी बहाने बंद करने पर तुली है। सवाल यह है कि क्या मदरसे या विद्यालयों को बंद करने से भारत विश्व गुरु बन सकेगा ?</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 04 Feb 2026 18:04:47 +0530</pubDate>
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