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                <title>   Hindi lekh - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>नीतीश कुमार होना आसान नहीं है</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><span lang="en-us" xml:lang="en-us">महेन्द्र तिवारी</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय राजनीति के फलक पर नीतीश कुमार एक ऐसी पहेली हैं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे सुलझाने का दावा हर कोई करता है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन पूरी तरह कोई समझ नहीं पाता। एक ऐसा नेता</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके पास लालू प्रसाद यादव जैसा नैसर्गिक करिश्मा नहीं है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">न ही उनके पास भाजपा जैसा विशाल सांगठनिक ढांचा है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">फिर भी वह साल-दर-साल बिहार की सत्ता की धुरी बने हुए हैं। यह राजनीतिक उत्तरजीविता का ऐसा उदाहरण है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जो राजनीति विज्ञान के छात्रों के लिए किसी शोध से कम नहीं। नीतीश कुमार के व्यक्तित्व को समझने के लिए हमें उस दौर में</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172868/it-is-not-easy-to-be-nitish-kumar"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/नीतीश-कुमार-होना-आसान-नहीं-है.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><span lang="en-us" xml:lang="en-us">महेन्द्र तिवारी</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय राजनीति के फलक पर नीतीश कुमार एक ऐसी पहेली हैं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे सुलझाने का दावा हर कोई करता है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन पूरी तरह कोई समझ नहीं पाता। एक ऐसा नेता</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके पास लालू प्रसाद यादव जैसा नैसर्गिक करिश्मा नहीं है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">न ही उनके पास भाजपा जैसा विशाल सांगठनिक ढांचा है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">फिर भी वह साल-दर-साल बिहार की सत्ता की धुरी बने हुए हैं। यह राजनीतिक उत्तरजीविता का ऐसा उदाहरण है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जो राजनीति विज्ञान के छात्रों के लिए किसी शोध से कम नहीं। नीतीश कुमार के व्यक्तित्व को समझने के लिए हमें उस दौर में पीछे जाना होगा</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जब बिहार </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">जंगलराज</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के तमगे से जूझ रहा था।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">2005</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> में जब उन्होंने सत्ता संभाली</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो उनके सामने एक ऐसा राज्य था जिसकी सड़कें गायब थीं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जहां शाम ढलते ही लोग घरों में दुबक जाते थे और जहां विकास की परिभाषा केवल सरकारी विज्ञापनों तक सीमित थी। उस समय नीतीश कुमार ने </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">सुशासन बाबू</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की जो छवि गढ़ी</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वह रातों-रात नहीं बनी थी। उसके पीछे दशकों का संघर्ष और समाजवाद की वह विचारधारा थी</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे उन्होंने राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण से सीखा था। नीतीश कुमार होना इसलिए कठिन है क्योंकि उन्हें हर कदम पर एक संतुलन साधना पड़ता है एक तरफ अपनी समाजवादी साख बचाए रखने की चुनौती और दूसरी तरफ सत्ता के समीकरणों को साधने की मजबूरी।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी राजनीति का सबसे दिलचस्प और विवादित पहलू उनका पाला बदलना रहा है। आलोचक उन्हें </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">पलटू राम</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">कहते हैं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन अगर इसे गहराई से देखें</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह एक ऐसे नेता की छटपटाहट भी हो सकती है जो अपने एजेंडे को लागू करने के लिए किसी भी हद तक समझौता करने को तैयार है। </span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">क्या यह सत्ता का लालच है या बिहार के विकास की मजबूरी</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">? </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इस पर बहस अंतहीन हो सकती है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन एक सच यह भी है कि नीतीश कुमार ने कभी भी अपनी व्यक्तिगत ईमानदारी और छवि पर दाग नहीं लगने दिया। भारतीय राजनीति में जहां भ्रष्टाचार एक सामान्य शिष्टाचार बन गया हो</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वहां एक मुख्यमंत्री का बेदाग बने रहना वाकई आसान नहीं है। उनकी ताकत उनके वोट बैंक में नहीं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उनकी कार्यशैली में रही है। उन्होंने बिहार में एक नया वर्ग तैयार किया </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">मौन मतदाता</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">। इसमें महिलाएं और अति पिछड़े वर्ग शामिल हैं।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> जब नीतीश ने लड़कियों को साइकिल दी</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो वह केवल एक वाहन नहीं था</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वह बिहार की आधी आबादी के लिए आजादी का परवाना था। सड़क पर साइकिल चलाती उन लड़कियों ने बिहार के सामाजिक ढांचे को बदल दिया। नीतीश कुमार को पता था कि अगर उन्हें बड़े जनाधार वाले नेताओं से लड़ना है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो उन्हें समाज के उन हिस्सों तक पहुंचना होगा जिन्हें अब तक राजनीति में केवल </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">नंबर</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">समझा जाता था।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नीतीश कुमार का शासन मॉडल अक्सर नौकरशाही पर बहुत अधिक निर्भर रहा है। उनके बारे में कहा जाता है कि वे राजनेताओं से ज्यादा अफसरों पर भरोसा करते हैं। यह उनकी ताकत भी रही और कमजोरी भी। ताकत इसलिए क्योंकि इसने योजनाओं को धरातल पर उतारने में मदद की</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और कमजोरी इसलिए क्योंकि इसने उन्हें अपनी ही पार्टी के नेताओं से दूर कर दिया। एक अकेला नेता जो अपनी शर्तों पर सरकार चलाना चाहता है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">उसके लिए गठबंधन की राजनीति किसी जलती हुई मोमबत्ती को दोनों सिरों से पकड़ने जैसा है। </span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कभी भाजपा का हिंदुत्व</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो कभी राजद का </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">माय</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">समीकरण इन दो पाटों के बीच अपनी </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">धर्मनिरपेक्ष</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">विकासवादी</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">छवि को बचाए रखना किसी बाजीगर का ही काम हो सकता है। नीतीश कुमार ने बिहार को बिजली दी</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सड़कें दीं और शराबबंदी जैसा साहसी (भले ही विवादास्पद) फैसला लिया। शराबबंदी के पीछे का तर्क विशुद्ध रूप से सामाजिक था</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जो उनके महिला वोट बैंक को मजबूती देता था। हालांकि</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके क्रियान्वयन में हुई विफलताओं ने उनकी प्रशासनिक साख पर सवाल भी उठाए</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन नीतीश अपनी जिद पर अड़े रहे। यह जिद ही उन्हें खास बनाती है और यही उनके लिए मुश्किलें भी खड़ी करती है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नीतीश कुमार के राजनीतिक सफर का एक और पहलू उनकी </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">तन्हाई</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">है। वे एक ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिनके पास अपनी पार्टी जेडीयू के भीतर भी कोई स्पष्ट उत्तराधिकारी नहीं है। वे एक ऐसे बरगद के पेड़ की तरह हैं जिसकी छाया तो बहुत है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उसके नीचे दूसरा कोई पौधा नहीं पनप पाया। यह स्थिति एक नेता के लिए असुरक्षा का कारण भी बन सकती है और उसकी अपरिहार्यता का प्रमाण भी। </span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज के दौर में जब राजनीति सोशल मीडिया के शोर और इवेंट मैनेजमेंट से चलती है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नीतीश कुमार अभी भी पुराने ढर्रे की उस गंभीर राजनीति में विश्वास रखते हैं जहां फाइलों का अध्ययन और आंकड़ों की बाजीगरी प्राथमिक होती है। वे एक </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">मैकेनिकल इंजीनियर</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हैं और उनकी राजनीति में भी वही इंजीनियरिंग साफ दिखती है। वे जानते हैं कि किस पुर्जे को कब और कहां फिट करना है ताकि सत्ता की मशीन चलती रहे। लेकिन इस मशीन को चलाने की कीमत उन्हें अपनी साख की अस्थिरता से चुकानी पड़ी है। जनता के बीच उनकी विश्वसनीयता का ग्राफ कभी ऊपर तो कभी नीचे जाता रहा है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">फिर भी वे प्रासंगिक बने रहे।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नीतीश कुमार होना इसलिए भी मुश्किल है क्योंकि उनके ऊपर हमेशा एक </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">बड़े भाई</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की छाया रही है। कभी वह छाया लालू प्रसाद यादव की थी</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो कभी भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की। इस छाया से बाहर निकलकर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखना और यह सुनिश्चित करना कि बिहार की बागडोर उन्हीं के हाथ में रहे</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एक निरंतर चलने वाला युद्ध है। उन्होंने बिहार को उस हीन भावना से बाहर निकाला जो </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">90</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> के दशक के अंत में घर कर गई थी। उन्होंने </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">बिहार गौरव</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की बात की</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रवासी बिहारियों को वापस आने का न्योता दिया और राज्य के बजट को कई गुना बढ़ाया।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> लेकिन इन सबके बावजूद</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पलायन और बेरोजगारी जैसे राक्षसों को वे पूरी तरह काबू नहीं कर पाए। यह उनकी राजनीति की एक दुखद विडंबना है कि जिस राज्य को उन्होंने विकास की पटरी पर दौड़ाने की कोशिश की</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वहां का युवा आज भी रोजगार के लिए दूसरे राज्यों की ओर देखने को मजबूर है। एक मुख्यमंत्री के रूप में इस विफलता का बोझ ढोना और फिर भी यह कहना कि "सब ठीक है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">," </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वाकई आसान नहीं है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अक्सर यह सवाल उठता है कि नीतीश कुमार का अंतिम लक्ष्य क्या है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">? </span><span lang="hi" xml:lang="hi">क्या वे प्रधानमंत्री बनना चाहते थे</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">? </span><span lang="hi" xml:lang="hi">या वे केवल बिहार के इतिहास में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज कराना चाहते हैं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">? </span><span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी महत्वाकांक्षाएं हमेशा उनके चेहरे की झुर्रियों और उनकी नपी-तुली बातों के पीछे छिपी रहती हैं। वे एक ऐसे खिलाड़ी हैं जो अपने पत्ते तभी खोलते हैं जब सामने वाला अपनी चाल चल चुका होता है। </span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी यह अनिश्चितता उनके सहयोगियों के लिए डरावनी और विरोधियों के लिए चुनौतीपूर्ण होती है। नीतीश कुमार ने बिहार की राजनीति को </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">जाति</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">से निकालकर </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">जमात</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">विकास</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की ओर ले जाने की कोशिश की</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन अंततः उन्हें भी जातिगत जनगणना जैसे हथियारों का सहारा लेना पड़ा। यह इस बात का प्रमाण है कि जमीन की हकीकतें कितनी भी आदर्शवादी राजनीति को घुटने टेकने पर मजबूर कर सकती हैं।</span> </p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नीतीश कुमार के व्यक्तित्व का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा उनका व्यक्तिगत संयम है। वे चकाचौंध से दूर रहते हैं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">उनका परिवार राजनीति से कोसों दूर है और वे अपनी निजी जिंदगी को बहुत गोपनीय रखते हैं। भारतीय राजनीति के इस दौर में</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जहां परिवारवाद एक बड़ी समस्या है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नीतीश कुमार का इस मामले में अडिग रहना उन्हें सम्मान दिलाता है। लेकिन यही संयम उन्हें कभी-कभी </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">अहंकारी</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">या </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">संपर्कविहीन</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नेता के रूप में भी चित्रित कर देता है। उनके बारे में प्रसिद्ध है कि वे एक बार जो तय कर लेते हैं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">फिर किसी की नहीं सुनते। यह दृढ़ता ही थी जिसने बिहार में कानून का राज स्थापित किया</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन यही जिद आज उनकी पार्टी के भीतर असंतोष का कारण भी बनती है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अंत में</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नीतीश कुमार होना एक निरंतर द्वंद्व में जीने जैसा है। यह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो आधुनिक बिहार का निर्माता कहलाना चाहता है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जिसे अपनी कुर्सी बचाने के लिए बार-बार उन सिद्धांतों से समझौता करना पड़ता है जिन्हें उसने कभी पवित्र माना था। वे एक ऐसे नायक हैं जिनके चरित्र में शेड्स ऑफ ग्रे अधिक हैं। न तो वे पूरी तरह </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">सफेद</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आदर्शवादी हैं और न ही पूरी तरह </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">काले</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अवसरवादी। वे समय की मांग के अनुसार रंग बदलने वाले एक कुशल राजनेता हैं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जो जानते हैं कि राजनीति संभावनाओं का खेल है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> बिहार के इतिहास में नीतीश कुमार का मूल्यांकन केवल उनके पाला बदलने के आधार पर नहीं होगा</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उस बदलाव के आधार पर होगा जो उन्होंने एक आम बिहारी के जीवन में लाने की कोशिश की। उनके विरोधी चाहे जो कहें</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि उन्होंने बिहार को एक </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">पहचान</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">दी है। एक ऐसी पहचान</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जो अराजकता से दूर और प्रगति की ओर अग्रसर है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">2026 </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के इस दौर में भी</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जब राजनीति पूरी तरह बदल चुकी है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नीतीश कुमार का प्रासंगिक बने रहना यह साबित करता है कि वे सिर्फ एक नेता नहीं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि बिहार की राजनीति का एक अनिवार्य अध्याय हैं। और सच यही है कि उस अध्याय को लिखना या उसे जी पाना</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वाकई हर किसी के बस की बात नहीं है। नीतीश कुमार होना</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">दरअसल</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी ही छाया से लड़ते हुए सत्ता के शिखर पर बने रहने की एक अंतहीन साधना है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 08 Mar 2026 18:19:49 +0530</pubDate>
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                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-03/%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%B6-%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%86%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%A8%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%82-%E0%A4%B9%E0%A5%88.jpg"                         length="8993"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पकिस्तान में सेना पर अंकुश लगाने की कोशिश</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="margin-bottom:0.0001pt;line-height:normal;background:rgb(246,246,246);text-align:justify;" align="right"><strong><span style="font-size:12pt;font-family:Mangal, serif;color:#2d2d2d;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></span></strong></p>
<p style="text-align:justify;">  </p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">पाकिस्तान की सियासत के सात दशकों का इतिहास यदि एक वाक्य में पिरोना हो</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तो वह </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">लोकतंत्र और वर्दी के बीच का कभी न खत्म होने वाला द्वंद्व</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">है। </span>14 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">अगस्त </span>1947 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">को वजूद में आने के बाद से ही इस मुल्क ने एक ऐसी विडंबना को जिया है जहाँ संविधान की किताब तो नागरिक शासन की बात करती है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">लेकिन सत्ता की असली चाबी रावलपिंडी के जनरल हेडक्वार्टर्स में महफूज रहती है। पाकिस्तान में सेना पर अंकुश लगाने की कोशिशें केवल राजनीतिक सुधारों का हिस्सा नहीं रही हैं</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि ये अस्तित्व की</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/171684/efforts-to-curb-the-army-in-pakistan"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/hindi-divas47.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="margin-bottom:0.0001pt;line-height:normal;background:rgb(246,246,246);text-align:justify;" align="right"><strong><span style="font-size:12pt;font-family:Mangal, serif;color:#2d2d2d;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></span></strong></p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">पाकिस्तान की सियासत के सात दशकों का इतिहास यदि एक वाक्य में पिरोना हो</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तो वह </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">लोकतंत्र और वर्दी के बीच का कभी न खत्म होने वाला द्वंद्व</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">है। </span>14 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">अगस्त </span>1947 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">को वजूद में आने के बाद से ही इस मुल्क ने एक ऐसी विडंबना को जिया है जहाँ संविधान की किताब तो नागरिक शासन की बात करती है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">लेकिन सत्ता की असली चाबी रावलपिंडी के जनरल हेडक्वार्टर्स में महफूज रहती है। पाकिस्तान में सेना पर अंकुश लगाने की कोशिशें केवल राजनीतिक सुधारों का हिस्सा नहीं रही हैं</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि ये अस्तित्व की वो लड़ाइयां रही हैं जिनमें कई प्रधानमंत्रियों ने अपनी कुर्सी गवाई</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जेल की सजा काटी और कुछ ने तो अपनी जान से भी हाथ धोया। इस संघर्ष की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी साल </span>2006 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">का </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">लोकतंत्र का चार्टर</span>'<span>  </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जिसे नवाज शरीफ और बेनजीर भुट्टो ने लंदन की निर्वासित गलियों में तैयार किया था। यह दस्तावेज केवल एक समझौता नहीं था</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि पाकिस्तानी सेना के उस </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">हाइब्रिड मॉडल</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">के खिलाफ एक सीधा युद्धघोष था</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जिसने देश को विकास के बजाय बारूद और कर्ज के ढेर पर ला खड़ा किया।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">पाकिस्तान में सेना का वर्चस्व अचानक पैदा नहीं हुआ। </span>1958 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">में अयूब खान</span>, 1977 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">में जिया-उल-हक और </span>1999 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">में परवेज मुशर्रफ द्वारा किए गए सैन्य तख्तापलट ने मुल्क की राजनीतिक जड़ों को इतना खोखला कर दिया कि वहां की अवाम और सियासतदानों के मन में यह बात बैठ गई कि </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तख्त</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">का रास्ता सेना की मंजूरी से होकर ही गुजरता है। सेना ने खुद को न केवल सरहदों का रखवाला</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">वैचारिक सीमाओं</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">का रक्षक और राष्ट्रीय सुरक्षा का एकमात्र ठेकेदार घोषित कर दिया। इसी पृष्ठभूमि में जब </span>2006 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">में चार्टर ऑफ डेमोक्रेसी पर हस्ताक्षर हुए</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तो उम्मीद की एक किरण जगी थी। इस चार्टर में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि सेना को राजनीति से पूरी तरह बेदखल किया जाएगा</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">खुफिया एजेंसियां (</span>ISI <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">और </span>MI) <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">केवल प्रधानमंत्री के प्रति जवाबदेह होंगी</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">और किसी भी सैन्य अधिकारी को संवैधानिक पद पर बैठने की अनुमति नहीं दी जाएगी। यह पाकिस्तान के इतिहास में पहली बार था जब दो कट्टर प्रतिद्वंद्वी दल</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">पीपीपी और पीएमएल-एन</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">अपनी आपसी रंजिश भुलाकर एक साझा दुश्मन यानी </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">सैन्य प्रतिष्ठान</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">के खिलाफ एकजुट हुए थे।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">हालांकि</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">इतिहास गवाह है कि पाकिस्तान में सेना पर लगाम कसने की हर कोशिश को खुद सेना ने बहुत ही शातिर तरीके से नाकाम किया। </span>2007 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">में बेनजीर भुट्टो की शहादत और उसके बाद </span>2008 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">के चुनावों के बाद बनी लोकतांत्रिक सरकार ने जब भी सेना के अधिकारों को चुनौती देने की कोशिश की</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">उसे </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">मेमोगेट स्कैंडल</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">या </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">डॉन लीक्स</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जैसे विवादों में उलझा दिया गया। सेना ने अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए एक नया तरीका ईजाद किया जिसे </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">हाइब्रिड शासन</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">कहा जाता है। इसमें सीधे तौर पर मार्शल लॉ नहीं लगाया जाता</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि एक ऐसी राजनीतिक कठपुतली को सत्ता में बिठाया जाता है जो सेना के हितों की रक्षा कर सके। इमरान खान का </span>2018 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">में सत्ता में आना इसी प्रयोग का हिस्सा माना गया था</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">लेकिन विडंबना देखिए कि जिस इमरान खान को सेना ने </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">प्रोजेक्ट</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">के तौर पर लॉन्च किया था</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">वही </span>2022 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">में सत्ता से बेदखल होने के बाद सेना के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गए। आज </span>2026 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">के दौर में भी पाकिस्तान उसी दोराहे पर खड़ा है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">सेना पर अंकुश लगाने की राह में सबसे बड़ी बाधा पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर सेना का कब्जा है। </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">मिलिट्री इंक</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">के नाम से मशहूर यह व्यवस्था बैंकिंग</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">खाद</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">सीमेंट</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">अनाज और रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों में सेना का एकाधिकार सुनिश्चित करती है। जब किसी संस्था के पास देश की अर्थव्यवस्था का इतना बड़ा हिस्सा और अत्याधुनिक हथियार दोनों हों</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तो निहत्थे राजनेता उसके सामने बौने नजर आते हैं। इसके अलावा</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">पाकिस्तान की न्यायपालिका ने भी अक्सर सेना के कदमों को </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जरूरत का सिद्धांत</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बताकर जायज ठहराया है। जब तक जजों की नियुक्तियों और उनके फैसलों पर सेना का परोक्ष दबाव रहेगा</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तब तक लोकतांत्रिक अंकुश की बात केवल एक किताबी कल्पना बनी रहेगी। वर्तमान में आसिम मुनीर के कार्यकाल में सेना की शक्ति और भी केंद्रित हो गई है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जहाँ विशेष सैन्य अदालतों के माध्यम से नागरिकों और राजनेताओं को नियंत्रित किया जा रहा है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">फरवरी </span>2026 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">की हालिया राजनीतिक हलचल</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जिसमें शहबाज शरीफ सरकार ने इमरान खान की पार्टी (</span>PTI) <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">को फिर से </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">लोकतंत्र के चार्टर</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">पर साइन करने का न्यौता दिया है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">इस दिशा में एक हताश लेकिन महत्वपूर्ण प्रयास दिखती है। यह प्रस्ताव इस अहसास से उपजा है कि जब तक राजनीतिक दल आपस में लड़ते रहेंगे</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">सेना </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">फूट डालो और राज करो</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">की नीति से अपना उल्लू सीधा करती रहेगी। यदि इमरान खान और वर्तमान सत्ताधारी गठबंधन सेना के खिलाफ एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर सहमत हो जाते हैं</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तो यह पाकिस्तान की सेना के लिए दशकों बाद सबसे बड़ी चुनौती होगी। लेकिन यहाँ भी संदेह के बादल गहरे हैं</span>; <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">क्या इमरान खान वास्तव में लोकतंत्र को मजबूत करना चाहते हैं या वे केवल सेना के साथ अपनी व्यक्तिगत </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">डील</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">की तलाश में हैं</span>? <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">पाकिस्तान की राजनीति में </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">डील</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">और </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">ढीली</span>' (<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">रियायत) दो ऐसे शब्द हैं जिन्होंने वहां के लोकतंत्र को कभी परिपक्व नहीं होने दिया।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">भारत और शेष विश्व के लिए पाकिस्तान में सेना पर अंकुश लगाने की कोशिशें बेहद संवेदनशील मामला हैं। एक ऐसी सेना जिसके हाथ में परमाणु हथियारों का बटन हो और जिसका राजनीतिक अस्तित्व भारत-विरोध पर टिका हो</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">वह कभी भी शांति की समर्थक नहीं हो सकती। यदि वहां की नागरिक सरकारें वास्तव में सेना को बैरकों तक सीमित करने में सफल होती हैं</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तो इससे न केवल कश्मीर मुद्दे पर बातचीत का एक ठोस धरातल तैयार होगा</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में स्थिरता आएगी। लेकिन यह रास्ता कांटों भरा है। सेना ने दशकों से यह नैरेटिव गढ़ा है कि बिना उनके पाकिस्तान का वजूद खत्म हो जाएगा। इस नैरेटिव को तोड़ने के लिए पाकिस्तान के राजनेताओं को न केवल एकजुट होना होगा</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि उन्हें सुशासन के माध्यम से जनता का विश्वास भी जीतना होगा।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">अंततः</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">पाकिस्तान में सेना पर अंकुश लगाने की कोशिशें तब तक सफल नहीं हो सकतीं जब तक कि वहां का मध्यम वर्ग और युवा पीढ़ी इस बदलाव के लिए सड़कों पर खड़ी न हो। </span>9 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">मई </span>2023 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">की घटनाओं ने दिखाया था कि जनता के एक हिस्से में सेना के खिलाफ गुस्सा तो है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">लेकिन बिना संगठित नेतृत्व और संस्थागत सुधारों के</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">यह गुस्सा केवल अराजकता पैदा करता है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बदलाव नहीं। </span>2006 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">का चार्टर आज भी एक मार्गदर्शक दस्तावेज की तरह मौजूद है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">लेकिन इसकी सार्थकता तभी है जब इसे सत्ता हथियाने का हथियार बनाने के बजाय देश के भविष्य को सुरक्षित करने का संकल्प बनाया जाए। पाकिस्तान को आज एक ऐसे </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">सत्य और सुलह आयोग</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">की जरूरत है जो सेना के राजनीतिक दखल के घावों को भरे और एक ऐसा नया सामाजिक अनुबंध</span> <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तैयार करे जहाँ बंदूक की ताकत वोट की ताकत के सामने नतमस्तक हो।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/171684/efforts-to-curb-the-army-in-pakistan</link>
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                <pubDate>Fri, 27 Feb 2026 18:07:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>प्रगतिशील ज्ञान और शिक्षा राष्ट्र के उत्थान की बुनियाद</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">यह सर्वविदित है कि इतिहास का पन्ना पलटें तो हर सभ्यता ने अपने कई कई रूप बदले हैंl संस्कृति ने नए नए नए आयाम का सृजन किया हैl वैसे भी जीवन परिवर्तन का पर्याय है एवं विकास का स्वरूप हैl यह सर्वकालीन सत्य है कि शिक्षा एवं ज्ञान का महत्व हर संस्कृति, सभ्यता और मानवीय समुदाय के जीवन में एक प्रकाश पुंज की तरह उन्हें विकास की दिशा दिखाते हुए आया हैl जिस देश की भाषा जितनी समृद्ध होगी उस देश की सभ्यता संस्कृति और ज्ञान उत्तम शिखर पर होगा और विकास की नई नई धाराएं बहेगीl</p>
<p style="text-align:justify;">मानवीय विकास के</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/170629/progressive-knowledge-and-education-are-the-foundation-for-the-development"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/hindi-divas37.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">यह सर्वविदित है कि इतिहास का पन्ना पलटें तो हर सभ्यता ने अपने कई कई रूप बदले हैंl संस्कृति ने नए नए नए आयाम का सृजन किया हैl वैसे भी जीवन परिवर्तन का पर्याय है एवं विकास का स्वरूप हैl यह सर्वकालीन सत्य है कि शिक्षा एवं ज्ञान का महत्व हर संस्कृति, सभ्यता और मानवीय समुदाय के जीवन में एक प्रकाश पुंज की तरह उन्हें विकास की दिशा दिखाते हुए आया हैl जिस देश की भाषा जितनी समृद्ध होगी उस देश की सभ्यता संस्कृति और ज्ञान उत्तम शिखर पर होगा और विकास की नई नई धाराएं बहेगीl</p>
<p style="text-align:justify;">मानवीय विकास के साथ मनुष्य को अधिक परिपक्व को समझदार तथा समृद्ध बनाने में शिक्षा,भाषा, ज्ञान और साहित्य का सर्वाधिक महत्व रहा हैl शिक्षा चाहे आपके परिवार से प्राप्त हुई हो, स्कूल कॉलेज अथवा किसी शिक्षण संस्थान से प्राप्त हुई हो या भारतीय संस्कृति के वैदिक शास्त्रों से प्राप्त हुई हो, शिक्षा का मनुष्य के व्यक्तित्व के निर्माण में बड़ी अहम भूमिका होती हैl शिक्षा भी समाज संस्कृति एवं सभ्यताओं के साथ परिवर्तनशील तथा प्रगतिशील हैl</p>
<p style="text-align:justify;">शिक्षा, ज्ञान तथा संस्कृति और कला साहित्य को देश और विदेश की सीमाओं में बांधा नहीं जा सकता है। यह असीमित भंडार है एवं इसमें आकाशीय ऊंचाइयां भी शामिल रहती हैंl शिक्षा और ज्ञान न तो गहराइयां न ही नापी नजा सकती है, और ना ही इसकी ऊंचाई को देखा जा सकता है। पूर्वी सभ्यता जहां अध्यात्म, वेद ,पुराणों पर अवलंबित है, वहीं पश्चिमी सभ्यता ज्ञान विज्ञान नए नए अविष्कार और आकाश की अनछुई कई बातों को उजागर करने वाली है। ऐसी शिक्षा तथा ज्ञान के कारण मानव चंद्रमा पर पहुंच कर एक नई गाथा लिख पाया हैl वस्तुतः पूर्व तथा पश्चिम ज्ञान विज्ञान तथा शिक्षा के मामले में एकाकार हो चुका है कोई भी भेदभाव या विभाजन रेखा नहीं खींची जा सकती हैl</p>
<p style="text-align:justify;">पूरी सभ्यता ने जहां पाश्चात्य दर्शन से नए नए अविष्कारों हवाई जहाज, इंजन, ग्रामोफोन, रेडियो एवं नई नई टेक्नोलॉजी को अपनाया है वहीं पश्चिमी दर्शन ने भारती ज्ञान विज्ञान संस्कार आयुर्वेद योग धर्म दर्शन को अपना कर अपनी जीवनशैली में शांति तथा सौभाग्य स्थापित किया हैl यह सब शिक्षा भाषा एवं ज्ञान के बदौलत पूर्व और पश्चिम का मेल संभव हो पाया हैl</p>
<p style="text-align:justify;">शिक्षा और भाषा सदैव ही अज्ञानता के तमस में एक प्रकाश पुंज की तरह देदीप्यमान होता रहा है, नवजीवन की विकास धारा में सदैव महत्वपूर्ण भूमिका निभाता आया हैl हमारे कई धर्मों में जिनमें जैन ,बौद्ध दर्शन, नव्य वेदांत तथा भारतीय संस्कृति के नवीन चिंतन के सामने आने से नवयुग की कल्पना को साकार किया है। पश्चिम के कई विद्वान और चिंतक जिनमें प्लूटो, अरस्तु, सुकरात, कार्ल मार्क्स, लेनिन ने अनेक विकास के सिद्धांतों को प्रतिपादित किया है। जिसका पूरे विश्व ने खुले दिल से स्वागत किया एवं विकास की नई नई की इबारत लिखी हैl<br />दूसरी ओर भारत की संस्कृति, सभ्यता और समाज में सदैव आवश्यक सुधार तथा नई नई बुद्धिमता पूर्ण युक्तियों को अपने में आत्मसात करने की एक अलग क्षमता रही है, और विकास का मूल मंत्र भी परिवर्तनशील जीवनशैली ही हैl</p>
<p style="text-align:justify;">राजनीति तो सदैव परिवर्तन पर अवलंबित रहती है। स्वतंत्रता के पहले तथा बाद में राजनीतिक घटनाक्रम जिस नव परिवर्तन युग की तरफ अग्रसर हुए हैं वह अत्यंत उल्लेखनीय हैl भारतीय सभ्यता समाज और संस्कृति जितनी जटिल तथा गूढ है उसको जितना समझा जाए, उसका जितना अध्ययन किया जाए तो उससे नवीन बातें समझ में आती है, और उसके नए नए अर्थ हमारे सामने आते हैं, जिसका बहु आयामी उपयोग हम अपनी जीवनशैली में परिवर्तन करने के लिए सदैव कर सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">स्वतंत्रता के बाद तो भारत देश ने ज्ञान भाषा तथा संस्कृति में अनेक परिवर्तन किए गांधीजी, जवाहरलाल नेहरू, बाल गंगाधर तिलक, सुभाष चंद्र बोस आदि ने अपनी किताबों में नव परिवर्तन के नए-नए आयामों तथा जीवन शैली के सत्य के साथ प्रयोग को एक नया आयाम दिया है और भारत देश को नए स्वरूप में विश्व में पहचान दिलाई है। पाश्चात्य ज्ञान से हमें अपने आडंबर एवं अंधविश्वास तथा शिक्षा पर विजय प्राप्त करने में काफी मदद प्राप्त हुई है। भारतीय संस्कृति की कई भ्रांतियों को भी हमने ज्ञान तथा भाषा के नवीन प्रयोगो से समाज से दूर किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">दिन प्रतिदिन जीवन की कार्यशैली में हम यह महसूस करते हैं कि शिक्षा भाषा तथा ज्ञान हमें यह महसूस कर आते हैं कि हम अभी तक कितने पीछे हैं एवं हमें कितने ज्ञान की और आवश्यकता है। हालांकि ज्ञान का कोई और झोर नहीं होता, ज्ञान तथा भाषा एक समृद्ध भंडार है, उसमें आप जितना सीख सकते हैं ज्ञान ले सकते हैं वह अत्यंत लघु होता है। तो हमेशा हमें यह प्रयास करना चाहिए कि हम पल प्रतिपल कुछ ना कुछ हर व्यक्ति, हर समाज, हर सभ्यता से सीखने का प्रयास करें ,क्योंकि ज्ञान भाषा एवं संस्कृति हमें सदैव समृद्ध विकासशील एवं परिवर्तनशील बनाती है और परिवर्तनशील जीवन ही एक नई ऊर्जा, आशा और विकास को जन्म देती है।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 21 Feb 2026 18:03:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मैक्रों की पुकार, मोदी का संकेत: क्या बदलेगा डिजिटल भविष्य?</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दिल्ली के</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत मंडपम</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">में एआई इंपैक्ट समिट का वह क्षण ऐतिहासिक बन गया।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इमैनुएल मैक्रों</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मंच पर खड़े थे</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">आँखों में गहरी चिंता और स्वर में पिता-सी व्याकुलता। उन्होंने प्रधानमंत्री की ओर देख कहा— “मिस्टर प्राइम मिनिस्टर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्या आप इस क्लब में शामिल होंगे</span>?” <span lang="hi" xml:lang="hi">यह केवल कूटनीतिक प्रश्न नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक पिता की पुकार और सभ्यता की चेतावनी थी।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने पूछा</span>, “<span lang="hi" xml:lang="hi">जो चीजें वास्तविक जीवन में अपराध हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे हमारे बच्चों के सामने क्यों परोसी जा रही हैं</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">फ्रांस पंद्रह वर्ष से कम आयु के लिए सोशल मीडिया</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/170493/macrons-call-modis-indication-what-will-change-the-digital-future"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/4141.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दिल्ली के</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत मंडपम</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">में एआई इंपैक्ट समिट का वह क्षण ऐतिहासिक बन गया।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इमैनुएल मैक्रों</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मंच पर खड़े थे</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">आँखों में गहरी चिंता और स्वर में पिता-सी व्याकुलता। उन्होंने प्रधानमंत्री की ओर देख कहा— “मिस्टर प्राइम मिनिस्टर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्या आप इस क्लब में शामिल होंगे</span>?” <span lang="hi" xml:lang="hi">यह केवल कूटनीतिक प्रश्न नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक पिता की पुकार और सभ्यता की चेतावनी थी।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने पूछा</span>, “<span lang="hi" xml:lang="hi">जो चीजें वास्तविक जीवन में अपराध हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे हमारे बच्चों के सामने क्यों परोसी जा रही हैं</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">फ्रांस पंद्रह वर्ष से कम आयु के लिए सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध की दिशा में बढ़ रहा है। स्पेन और ग्रीस भी आगे हैं। अब भारत को ‘कोलिशन ऑफ विलिंग’ में शामिल होने का आमंत्रण है— क्योंकि यह नियमों से बढ़कर हमारी सभ्यता का प्रश्न है।” उनके शब्द सभागार में गूँजे और असंख्य माता-पिताओं के हृदय तक पहुँचे। क्या हम अब भी मौन रहेंगे</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह विमर्श अब केवल तकनीक की प्रगति का नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे बच्चों के मन और मर्म की सुरक्षा का प्रश्न बन चुका है। वैज्ञानिक शोध निरंतर चेतावनी दे रहे हैं कि सामाजिक माध्यम किशोरों में अवसाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिंता और आत्महत्या जैसे विचारों की प्रवृत्ति को बढ़ा रहे हैं। अनवरत स्क्रीन पर अंगुली चलाने की आदत ऐसी जकड़ बन चुकी है कि बच्चे नींद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्ययन और वास्तविक संबंधों से दूर होते जा रहे हैं। भारत में पचास करोड़ से अधिक युवा इंटरनेट से जुड़े हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें दस से चौदह वर्ष आयु के लाखों बच्चे इंस्टाग्राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यूट्यूब और टिकटॉक जैसे मंचों पर घंटों डूबे रहते हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इमैनुएल मैक्रों</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इसे स्पष्ट शब्दों में “डिजिटल अब्यूज” कहते हैं। प्रश्न यह है— क्या हम इसे अब भी मात्र “एक्सपोजर” का नाम देकर टालते रहेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या फिर समय की पुकार सुनकर अपने बच्चों को इस विषैली स्क्रीन-जगत से बचाने का साहस करेंगे</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत में यह बहस पुरानी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर अब निर्णायक हो चली है। आर्थिक सर्वेक्षण ने सोशल मीडिया पर आयु-आधारित सीमा की अनुशंसा की है। एआई</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इंपैक्ट समिट में सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अश्विनी वैष्णव</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ने कहा कि सरकार मंचों से डीपफेक और आयु-नियंत्रण पर चर्चा कर रही है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आंध्र प्रदेश</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सोलह वर्ष से कम आयु के लिए प्रतिबंध का प्रस्ताव रख चुका है। पर प्रश्न है— क्या केवल कानून पर्याप्त होगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">फेक आईडी और वीपीएन को कैसे रोका जाएगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">ऑस्ट्रेलिया</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ने सोलह वर्ष से कम आयु पर प्रतिबंध लगाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर भी चुनौतियाँ बनी रहीं। भारत जैसे विशाल देश में यह और कठिन होगा। फिर भी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इमैनुएल मैक्रों</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">का प्रश्न स्पष्ट है— क्या बच्चों की सुरक्षा सर्वोपरि होगी</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विरोधी पक्ष का कहना है कि पूर्ण प्रतिबंध व्यावहारिक समाधान नहीं है। बच्चे शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवाद और सृजन के लिए इन मंचों का उपयोग करते हैं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">कठोर</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिबंध उन्हें छिपे और अनियंत्रित उपयोग की ओर धकेल सकता है। इसलिए सख्त अभिभावकीय निगरानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभावी आयु-सत्यापन और सुदृढ़ सामग्री छनन को अधिक संतुलित विकल्प माना जा रहा है। डिजिटल व्यक्तिगत आँकड़ा संरक्षण अधिनियम अठारह वर्ष से कम आयु के लिए अभिभावकीय सहमति अनिवार्य करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किंतु प्रश्न शेष है— क्या यह पर्याप्त है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">इमैनुएल मैक्रों</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">का स्पष्ट मत है— जब तक मंच स्वयं जवाबदेही नहीं स्वीकारेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तक बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होगी। फ्रांस में विधेयक आगे बढ़ चुका है। अब प्रश्न भारत के सामने है— क्या वह प्रतीक्षा करेगा</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह प्रश्न केवल बच्चों तक सीमित नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूरे समाज का है। सोशल मीडिया ने सूचना को जनसुलभ बनाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर साथ ही घृणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्पीड़न और मिथ्या समाचार का खुला बाजार भी खड़ा कर दिया। सबसे आसान लक्ष्य हमारे बच्चे बनते हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एआई</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के दौर में डीपफेक और एआई</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जेनरेटेड कंटेंट ने खतरा दोगुना कर दिया है। ग्रोक चैटबॉट से हजारों बच्चों की सेक्शुअलाइज्ड इमेज बनने की घटना ने दुनिया को झकझोर दिया। इमैनुएल मैक्रों</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ने स्पष्ट कहा</span>, “<span lang="hi" xml:lang="hi">एआई सबके लिए होनी चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर बच्चों की सुरक्षा सर्वोपरि है।”</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नरेंद्र मोदी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ने भी उत्तर दिया कि एआई को ‘फैमिली-गाइडेड’ और ‘चाइल्ड-सेफ’ बनाना अनिवार्य है। जब दोनों नेता एक स्वर में चेतावनी दे रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो प्रश्न यही है— क्या यह संकल्प केवल मंचीय शब्द बनकर रह जाएगा</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब निर्णय की घड़ी आ पहुँची है। भारत विश्व का सबसे युवा राष्ट्र है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारी डेमोग्राफी हमारी ताकत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन अगर हम बच्चों को डिजिटल जहर से नहीं बचाएंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह ताकत कमजोर पड़ सकती है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मैक्रों</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">का प्रस्ताव एक सीधी चुनौती है— क्या हम यूरोप के साथ संतुलित और नियंत्रित मार्ग चुनेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या अमेरिकी मॉडल (फ्रीडम फर्स्ट) को अपनाएंगे</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">जी-</span>7 <span lang="hi" xml:lang="hi">की अध्यक्षता इस समय फ्रांस के पास है और यह विषय उनकी प्राथमिकताओं में अग्रणी है। यदि भारत इस पहल से जुड़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वैश्विक मानक तय हो सकते हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">निस्संदेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रियान्वयन सरल नहीं होगा। प्लेटफॉर्म्स प्रतिरोध करेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपयोगकर्ता असंतोष प्रकट करेंगे। पर प्रश्न सीधा है— जब बच्चों का भविष्य दाँव पर हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब क्या कठिनाई निर्णय को टालने का कारण बन सकती है</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अंततः प्रश्न हम सबके लिए है— क्या हम सोशल मीडिया को अपने बच्चों का मित्र मानते हैं या अनजाने में उन्हें उनके भविष्य का शत्रु बना रहे हैं</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">इमैनुएल मैक्रों</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ने दिल्ली की धरती पर जो कहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह केवल फ्रांस की नीति की घोषणा नहीं थी</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वह समूची मानवता के अंत:करण से उठी चेतावनी थी। अगर हम अब नहीं जागे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">समय आ गया है कि भारत दृढ़ और साहसी निर्णय ले। बच्चों की हँसी आभासी परदे की चमक में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वास्तविक जीवन की खुली धूप में खिलनी चाहिए। प्रश्न यही है— क्या हम इस परिवर्तन के लिए तैयार हैं</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तर किसी और के पास नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे सामूहिक संकल्प में छिपा है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/170493/macrons-call-modis-indication-what-will-change-the-digital-future</link>
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                <pubDate>Fri, 20 Feb 2026 17:51:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>संवेदनशील प्रशासन और संयमित छात्र: संतुलन ही समाधान</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कभी-कभी बस एक छोटा-सा क्षण पूरी व्यवस्था की आत्मा को बेनकाब कर देता है। घड़ी ने दस मिनट का फासला तय किया—और एक बच्ची परीक्षा कक्ष के बाहर रह गई। वही दस मिनट उसके जीवन और मृत्यु के बीच की दूरी बन गए। नियम अपनी जगह अडिग खड़े रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर जीवन चुपचाप फिसल गया।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरी ओर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक परीक्षा केंद्र पर प्रश्नपत्र कम पड़े तो उसी तंत्र ने नियमों को मोड़कर दो पालियों में परीक्षा करा दी। यही विरोधाभास</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे समय की नंगी सच्चाई है—जहाँ सुविधा हो वहाँ नियम लचीले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और जहाँ करुणा चाहिए</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/170333/sensitive-administration-and-balanced-student-balance-is-the-only-solution"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/images-(1)30.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कभी-कभी बस एक छोटा-सा क्षण पूरी व्यवस्था की आत्मा को बेनकाब कर देता है। घड़ी ने दस मिनट का फासला तय किया—और एक बच्ची परीक्षा कक्ष के बाहर रह गई। वही दस मिनट उसके जीवन और मृत्यु के बीच की दूरी बन गए। नियम अपनी जगह अडिग खड़े रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर जीवन चुपचाप फिसल गया।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरी ओर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक परीक्षा केंद्र पर प्रश्नपत्र कम पड़े तो उसी तंत्र ने नियमों को मोड़कर दो पालियों में परीक्षा करा दी। यही विरोधाभास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे समय की नंगी सच्चाई है—जहाँ सुविधा हो वहाँ नियम लचीले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और जहाँ करुणा चाहिए वहाँ वे पत्थर बनकर गिरते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दस मिनट की देरी पर दरवाज़ा बंद कर देना नियम की कठोरता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवेदना की विफलता है। परीक्षा का उद्देश्य प्रतिभा की जाँच है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि घड़ी की सुइयों की पूजा। यदि चाहा जाता तो कोई व्यावहारिक रास्ता निकाला जा सकता था—जैसा अन्य परिस्थितियों में निकाला भी गया। पर यहाँ नियमों की दीवार ऊँची कर दी गई और मानवीय विवेक को बाहर छोड़ दिया गया। परिणाम केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं रहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह एक असहनीय त्रासदी में बदल गया। प्रश्न नियमों के अस्तित्व का नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनमें जीवित मनुष्यता की उपस्थिति का है। क्या व्यवस्था इतनी यांत्रिक हो चुकी है कि उसे परिस्थितियों की धड़कन सुनाई ही नहीं देती</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी क्रम में दूसरी घटना ने तंत्र का दूसरा चेहरा भी दिखाया। जब प्रश्नपत्र कम पड़ गए और व्यवस्था की अपनी भूल उजागर हुई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो तुरंत समाधान तलाश लिया गया। दो पालियाँ बनीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतियाँ तैयार हुईं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समय-सारिणी बदली—और परीक्षा पूरी करा दी गई। यहाँ नियमों को मोड़ना संभव था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि आवश्यकता थी। यही विरोधाभास सबसे चुभता है—जहाँ सिस्टम की असुविधा हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ लचीलापन</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ छात्र की मजबूरी हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ कठोरता क्यों</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्या नियम केवल नीचे की ओर सख्त और ऊपर की ओर नरम होते हैं</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्या करुणा का पैमाना भी पद और अधिकार देखकर बदल जाता है</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पर इस पूरी पीड़ा का एक और पक्ष भी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। कोई भी परीक्षा जीवन से बड़ी नहीं होती। अंक केवल भविष्य की दिशा तय करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्तित्व की कीमत नहीं। देर हो जाए तो अगला अवसर मिलता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अगला प्रयास संभव है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अगला वर्ष भी आता है। पर यदि जीवन का पन्ना ही फाड़ दिया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसे कोई परिणाम फिर नहीं जोड़ सकता। क्षणिक आवेग में उठाया गया चरम कदम समस्या का समाधान नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवार के लिए आजीवन घाव बन जाता है। हमें यह समझना और समझाना होगा कि असफलता अंत नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुभव है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">ठोकर हार नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आगे बढ़ने की तैयारी है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे समाज ने परीक्षा को उपलब्धि से आगे बढ़ाकर प्रतिष्ठा और पहचान का पैमाना बना दिया है। अंक अब केवल परिणाम नहीं रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे मानो सम्मान का प्रमाणपत्र बन गए हैं। माता-पिता की आकांक्षाएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रिश्तेदारों की तुलना और सोशल मीडिया की चकाचौंध—ये सब मिलकर एक कोमल मन पर ऐसा दबाव रचते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो दिखाई नहीं देता पर भीतर गहराई तक चुभता है। ऐसे माहौल में दस मिनट की देरी महज़ समय का अंतर नहीं रह जाती</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वह मानो सपनों के ढह जाने का प्रतीक बन जाती है। यहीं परिवार और विद्यालय की असली भूमिका शुरू होती है। बच्चों को सिखाना होगा कि जीवन की कीमत किसी परिणाम से कहीं अधिक है। परीक्षा एक अवसर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्तित्व का अंतिम सत्य नहीं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशासन की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। नियम अनुशासन बनाए रखने के लिए होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर उनका उद्देश्य मनुष्यों की रक्षा करना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें तोड़ना नहीं। यदि कोई नियम ऐसी स्थिति पैदा करे जहाँ जीवन ही संकट में पड़ जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसके स्वरूप पर पुनर्विचार अनिवार्य हो जाता है। हर परीक्षा केंद्र पर मानवीय विवेक की एक खिड़की खुली रहनी चाहिए—ऐसी व्यवस्था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ आपात स्थिति में समाधान खोजा जा सके। जब तकनीकी त्रुटियों पर तत्काल विकल्प संभव हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कुछ मिनट की देरी पर संवेदना असंभव क्यों प्रतीत होती है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशासनिक दक्षता के साथ संवेदनशीलता भी अनिवार्य प्रशिक्षण का हिस्सा बननी चाहिए।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">छात्रों के लिए यह घटना एक चेतावनी भी है और एक सीख भी। समयपालन कोई औपचारिक नियम नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि व्यक्तित्व की रीढ़ है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुशासन ही वह आधार है जिस पर सफलता की इमारत खड़ी होती है। परीक्षा के दिन तैयारी केवल पाठ्यक्रम की नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिस्थिति की भी होनी चाहिए—समय से पहुँचना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विकल्प सोचकर चलना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जोखिम से बचना। किंतु यदि कभी चूक हो जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसे जीवन की हार का नाम न दें। सच्चा साहस गिरकर फिर खड़े होने में है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि एक ठोकर को अंतिम सत्य मान लेने में। असफलता से जूझना परिपक्वता है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षणिक आवेग में स्वयं को ही दंडित कर देना नहीं। जीवन एक लंबी दौड़ है—एक मोड़ फिसलन भरा हो सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर वह पूरी मंज़िल को निगल नहीं सकता।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह घटना हमें एक कठोर सत्य से रूबरू कराती है—संतुलन ही व्यवस्था और जीवन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों की सबसे बड़ी आवश्यकता है। नियम हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर उनमें मानवता की धड़कन भी हो</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुशासन हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर उसके साथ समझ और संवेदना भी। उतना ही जरूरी है कि विद्यार्थी भी क्षणिक आघात को अंतिम फैसला न बनने दें। समाधान किसी एक पक्ष की कठोरता में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों के सामंजस्य में छिपा है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जब प्रशासन विवेकशील हो और युवा संयमित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी त्रासदियों के रास्ते बंद होते हैं। यदि व्यवस्था पत्थर न बने और छात्र आवेग के बजाय साहस चुनें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो अनेक घरों की रोशनी बच सकती है। परीक्षा कक्ष का दरवाज़ा समय पर बंद हो सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर जीवन का द्वार कभी बंद नहीं होना चाहिए—और उसे खुला रखना ही समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिस्टम और छात्र</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi"> हम सबकी साझा जिम्मेदारी है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 19 Feb 2026 17:27:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>राष्ट्र का सुनहरा भविष्य  युवाशक्ति ,नवयुवकों का जागरण और कर्तव्यबोध</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">भारत सदियों से संयम, त्याग और आध्यात्मिक चेतना की भूमि रहा है। यहाँ आत्मसंयम को ही वास्तविक शक्ति माना गया है और चरित्र को ही मनुष्य की सबसे बड़ी संपत्ति समझा गया है। यही कारण है कि इस देश ने समय-समय पर ऐसे महान आदर्श प्रस्तुत किए, जिन्होंने न केवल भारत बल्कि सम्पूर्ण विश्व को दिशा दी। भीष्म पितामह की आजीवन ब्रह्मचर्य प्रतिज्ञा हो, भगवान महावीर का संयम और तप का संदेश हो या स्वामी विवेकानन्द का तेजस्वी व्यक्तित्व इन सबने सिद्ध किया कि सच्ची शक्ति बाहरी आडंबर में नहीं, बल्कि भीतर के आत्मबल में निहित होती है। आज आवश्यकता</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/169683/golden-future-of-the-nation-youth-power-awakening-and-sense"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/hindi-divas33.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">भारत सदियों से संयम, त्याग और आध्यात्मिक चेतना की भूमि रहा है। यहाँ आत्मसंयम को ही वास्तविक शक्ति माना गया है और चरित्र को ही मनुष्य की सबसे बड़ी संपत्ति समझा गया है। यही कारण है कि इस देश ने समय-समय पर ऐसे महान आदर्श प्रस्तुत किए, जिन्होंने न केवल भारत बल्कि सम्पूर्ण विश्व को दिशा दी। भीष्म पितामह की आजीवन ब्रह्मचर्य प्रतिज्ञा हो, भगवान महावीर का संयम और तप का संदेश हो या स्वामी विवेकानन्द का तेजस्वी व्यक्तित्व इन सबने सिद्ध किया कि सच्ची शक्ति बाहरी आडंबर में नहीं, बल्कि भीतर के आत्मबल में निहित होती है। आज आवश्यकता है कि युवा पीढ़ी इन आदर्शों को आत्मसात कर राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका को समझे, क्योंकि देश की बागडोर अब युवाओं के हाथ में है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वर्तमान समय में युवाशक्ति अनेक चुनौतियों से घिरी हुई दिखाई देती है। भोगवादी प्रवृत्तियाँ, दिखावा, कृत्रिम जीवनशैली और व्यसनों की प्रवृत्ति ने युवाओं के नैसर्गिक तेज को धूमिल कर दिया है। देर रात तक अनावश्यक मनोरंजन में डूबे रहना, असंतुलित दिनचर्या, अस्वस्थ खान-पान और फैशन की अंधी दौड़ ने उनके शरीर और मन दोनों को कमजोर किया है। जबकि एक युवा के व्यक्तित्व में ऊर्जा, उत्साह, दृढ़ निश्चय और कर्मठता का संचार होना चाहिए। राष्ट्र का भविष्य उन्हीं कंधों पर टिका होता है जिनमें सामर्थ्य, चरित्र और कर्तव्यनिष्ठा का बल हो। यदि युवा स्वयं ही शारीरिक, मानसिक और नैतिक रूप से दुर्बल हो जाएँ, तो राष्ट्र की प्रगति कैसे संभव होगी?</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कृत्रिमता के इस युग में मनुष्य बाहरी सजावट से अपनी वास्तविकता को ढकने का प्रयास करता है, परन्तु सच्चाई यह है कि कृत्रिम सौंदर्य कभी भी नैसर्गिक शक्ति और आत्मविश्वास का स्थान नहीं ले सकता। जिस प्रकार सूखी जड़ वाला वृक्ष ऊपर से हरा दिखाया जाए तो भी वह अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकता, उसी प्रकार यदि युवा केवल बाहरी आडंबर में उलझे रहेंगे और आत्मिक विकास की ओर ध्यान नहीं देंगे, तो उनका व्यक्तित्व खोखला रह जाएगा। राष्ट्र निर्माण के लिए ऐसे युवाओं की आवश्यकता है जिनकी जड़ें मजबूत हों, जिनके भीतर आत्मसंयम और आत्मविश्वास की गहरी नींव हो।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत की सांस्कृतिक परंपरा ने सदैव संयम, तप और साधना को महत्व दिया है। यहाँ जीवन को केवल भोग का साधन नहीं, बल्कि साधना का अवसर माना गया है। स्वामी विवेकानन्द जब विश्व धर्म सम्मेलन में भाग लेने के लिए शिकागो गए, तब भी उन्होंने अपने संस्कारों और संयम को नहीं छोड़ा। उनके तेजस्वी व्यक्तित्व का रहस्य बाहरी आकर्षण नहीं, बल्कि भीतर की पवित्रता और आत्मबल था। यही आत्मबल युवाओं को अपनाना होगा। जब युवा अपने चरित्र को दृढ़ बनाते हैं, तब वे समाज में विश्वास और प्रेरणा के स्तंभ बनते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज देश अनेक क्षेत्रों में परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। विज्ञान, तकनीक, शिक्षा, उद्योग, राजनीति और सामाजिक जीवन में नई संभावनाएँ उभर रही हैं। इन संभावनाओं को साकार करने की जिम्मेदारी युवाओं पर ही है। देश की बागडोर उनके हाथ में है, इसलिए उन्हें केवल अपने व्यक्तिगत सुख-सुविधा तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानना चाहिए। देश के प्रति समर्पण केवल नारों से सिद्ध नहीं होता, बल्कि अनुशासन, ईमानदारी और परिश्रम से प्रकट होता है। जब युवा अपने कर्तव्यों का पालन निष्ठा से करते हैं, तभी राष्ट्र सशक्त बनता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">युवाओं का प्रथम कर्तव्य है कि वे स्वयं को शारीरिक और मानसिक रूप से सुदृढ़ बनाएं। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है। नियमित दिनचर्या, संतुलित आहार, व्यायाम और योग से शरीर में ऊर्जा का संचार होता है। साथ ही अध्ययन, चिंतन और सत्साहित्य के माध्यम से बुद्धि का विकास होता है। ज्ञान से ही विवेक उत्पन्न होता है और विवेक से ही सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित होती है। जब युवा विवेकशील बनेंगे, तब वे समाज को सही दिशा दे सकेंगे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दूसरा महत्वपूर्ण कर्तव्य है नैतिक मूल्यों का पालन। ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, करुणा और सहयोग की भावना ही समाज को जोड़ती है। यदि युवा भ्रष्टाचार, छल और स्वार्थ से दूर रहकर आदर्श जीवन जिएँगे, तो समाज में विश्वास की नींव मजबूत होगी। राष्ट्र का निर्माण केवल सड़कों और भवनों से नहीं, बल्कि सुदृढ़ चरित्र वाले नागरिकों से होता है। युवाओं को यह समझना होगा कि उनका प्रत्येक कार्य देश के भविष्य को प्रभावित करता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तीसरा कर्तव्य है सामाजिक जागरूकता और सक्रिय भागीदारी। युवाओं को पर्यावरण संरक्षण, शिक्षा प्रसार, स्वच्छता अभियान, डिजिटल साक्षरता और सामाजिक समरसता जैसे कार्यों में आगे आना चाहिए। वे नई सोच और नवाचार के माध्यम से देश को आत्मनिर्भर बना सकते हैं। तकनीकी दक्षता और रचनात्मकता के बल पर वे विश्व पटल पर भारत की प्रतिष्ठा को ऊँचा उठा सकते हैं। जब युवा अपने कौशल और प्रतिभा को राष्ट्रहित में समर्पित करते हैं, तब देश प्रगति की नई ऊँचाइयों को छूता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज आवश्यकता है कि युवा कृत्रिम आकर्षणों से ऊपर उठकर वास्तविक जीवन मूल्यों को अपनाएँ। संयम का अर्थ केवल त्याग नहीं, बल्कि अपनी ऊर्जा का सही दिशा में उपयोग करना है। जब इन्द्रियाँ भोग से हटकर योग की ओर उन्मुख होती हैं, तब व्यक्ति में अद्भुत शक्ति का संचार होता है। यही शक्ति राष्ट्र निर्माण का आधार बनती है। युवाओं को चाहिए कि वे अपने भीतर आत्मगौरव और राष्ट्रगौरव की भावना को जागृत करें।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत का भविष्य उज्ज्वल तभी होगा जब उसकी युवा पीढ़ी जागरूक, अनुशासित और समर्पित होगी। आज का युवा यदि अपने वर्तमान को संवार ले, तो उसका कल स्वयं ही स्वर्णिम हो जाएगा। देश की प्रगति किसी एक नेता या संस्था पर निर्भर नहीं, बल्कि करोड़ों युवाओं के सामूहिक प्रयास पर आधारित है। जब प्रत्येक युवा यह संकल्प लेगा कि वह अपने जीवन को राष्ट्र के हित में उपयोग करेगा, तब भारत पुनः विश्वगुरु बनने की दिशा में अग्रसर होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः यही कहा जा सकता है कि राष्ट्र का सुनहरा भविष्य युवाशक्ति के जागरण में निहित है। युवाओं को अपने कर्तव्यों का बोध होना चाहिए और उन्हें पूरे समर्पण के साथ निभाना चाहिए। संयम, परिश्रम, नैतिकता और देशभक्ति के आधार पर ही एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण संभव है। आज समय की पुकार है कि युवा स्वयं को बदलें, समाज को बदलें और राष्ट्र को नई ऊँचाइयों तक ले जाएँ। जब युवाशक्ति जागृत होगी, तब भारत का भविष्य सचमुच स्वर्णिम बनेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 14 Feb 2026 18:36:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पाखंड की ओट में छुपा दान: क्या यह सच में पुण्य है?</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong>  </strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य की आत्मा जब अपने कर्मों का निष्पक्ष लेखा-जोखा करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब सबसे पहले यह प्रश्न उसके अंतर्मन में गूँजता है—क्या धन की पवित्रता से बड़ा कोई नैतिक मूल्य हो सकता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">आज के युग में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब अनेक लोग छल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कपट और अनैतिक तरीकों से अर्जित धन को धार्मिक कार्यों में लगाकर स्वयं को धर्मात्मा सिद्ध करने का प्रयास करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब इस प्रवृत्ति की गंभीर समीक्षा अनिवार्य हो जाती है। यह विषय केवल दान तक सीमित नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह चरित्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विवेक और सामाजिक उत्तरदायित्व की कसौटी है।</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/169318/is-charity-hidden-behind-hypocrisy-really-a-virtue"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/hindi-divas28.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong> </strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य की आत्मा जब अपने कर्मों का निष्पक्ष लेखा-जोखा करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब सबसे पहले यह प्रश्न उसके अंतर्मन में गूँजता है—क्या धन की पवित्रता से बड़ा कोई नैतिक मूल्य हो सकता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">आज के युग में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब अनेक लोग छल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कपट और अनैतिक तरीकों से अर्जित धन को धार्मिक कार्यों में लगाकर स्वयं को धर्मात्मा सिद्ध करने का प्रयास करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब इस प्रवृत्ति की गंभीर समीक्षा अनिवार्य हो जाती है। यह विषय केवल दान तक सीमित नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह चरित्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विवेक और सामाजिक उत्तरदायित्व की कसौटी है। भव्य मंदिर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशाल दानशालाएँ और चमकदार आयोजन हमारी आँखों को चकाचौंध कर सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किंतु उनके पीछे छिपा अन्याय प्रायः दृष्टि से ओझल रह जाता है। यही भ्रम धीरे-धीरे हमारी चेतना को शिथिल करता है और हमें नैतिक पतन की खाई की ओर धकेल देता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी गलत कमाई को अच्छे कार्यों में लगा रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कम से कम वह समाज का हित तो कर ही रहा है। परंतु यह सोच न केवल सतही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि अत्यंत भ्रामक भी है। जिस धन की नींव शोषण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धोखा और भ्रष्टाचार पर रखी गई हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह कभी भी सच्चे कल्याण का माध्यम नहीं बन सकता। ऐसा धन पीड़ितों की आहों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आँसुओं और असहनीय पीड़ा से जुड़ा होता है। जब उसी धन से दान किया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब वह सहायता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि अन्याय का एक नया रूप बन जाता है—अन्याय का पुनर्वितरण। समाज को यह स्पष्ट रूप से समझना होगा कि सच्ची भलाई का मार्ग केवल शुद्ध और न्यायपूर्ण साधनों से होकर ही गुजरता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय दर्शन सदैव साधन और साध्य—दोनों की शुद्धता पर बल देता आया है। उपनिषद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गीता और स्मृतियाँ एक स्वर में यह उद्घोष करती हैं कि अधर्म से अर्जित धन कभी भी पुण्य का स्रोत नहीं बन सकता। श्रीमद्भगवद्गीता में सात्त्विक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजस और तामस दान का विवेचन करते हुए शुद्ध भावना और ईमानदार कमाई को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। मनुस्मृति भी यही प्रतिपादित करती है कि अन्यायपूर्ण साधनों से प्राप्त संपत्ति आत्मिक उन्नति में बाधक बनती है। वास्तव में धर्म का उद्देश्य मनुष्य को नैतिक ऊँचाइयों तक पहुँचाना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि उसे अपने पापों पर आडंबर का आवरण चढ़ाने की अनुमति देना।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इतिहास स्वयं इस निर्विवाद सत्य का साक्षी है कि अपराध और दान का संगम कभी भी महानता की रचना नहीं कर सका। अनेक शासकों और धनाढ्य व्यक्तियों ने अस्पताल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्यालय और धार्मिक स्थलों का निर्माण करवाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परंतु उनके अत्याचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्याय और निर्दयता उन्हें कभी महान नहीं बना सके। जनता के खून-पसीने और पीड़ा से अर्जित धन से खड़े किए गए भवन केवल निर्जीव पत्थर के ढाँचे होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें नैतिकता और संवेदनशीलता की आत्मा का सर्वथा अभाव होता है। समय ने बार-बार यह सिद्ध किया है कि व्यक्ति का वास्तविक मूल्य उसके आचरण और कर्मों से आँका जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि उसके दान की भव्यता और राशि से।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी गलत कमाई से किया गया दान आत्म-शुद्धि का एक झूठा भ्रम उत्पन्न करता है। अनेक लोग इसे अपने अपराध-बोध से मुक्ति पाने का सरल उपाय मान लेते हैं। वे यह मान बैठते हैं कि कुछ धन दान कर देने मात्र से उनके पाप धुल जाएँगे और उनका अंतर्मन निर्मल हो जाएगा। किंतु यह मानसिकता आत्म-सुधार नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि आत्म-छल और आत्म-प्रवंचना का रूप है। सच्चा प्रायश्चित तभी संभव होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब मनुष्य अपने गलत मार्ग को त्यागकर सत्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईमानदारी और नैतिकता के पथ पर दृढ़ता से अग्रसर हो। बिना आचरण बदले किया गया दान आत्मा को अस्थायी संतोष देने वाला एक छलावा मात्र बनकर रह जाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">समाज पर इस प्रवृत्ति का प्रभाव अत्यंत गहरा और चिंताजनक होता है। जब बेईमान लोग बड़े-बड़े दानों के माध्यम से सम्मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिष्ठा और सामाजिक स्वीकार्यता प्राप्त कर लेते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब ईमानदार और परिश्रमी व्यक्ति स्वयं को उपेक्षित और हताश अनुभव करता है। इससे समाज का नैतिक संतुलन डगमगाने लगता है और युवाओं को यह गलत संदेश मिलने लगता है कि सफलता का मार्ग सत्य और परिश्रम से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि चतुराई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छल और अनैतिकता से होकर जाता है। धीरे-धीरे यही सोच पूरे सामाजिक ताने-बाने को खोखला कर देती है और परस्पर विश्वास की नींव को गहराई से हिला देती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वास्तव में सच्चा दान वही होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो त्याग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करुणा और पवित्र परिश्रम की भूमि पर अंकुरित होता है। जब कोई व्यक्ति अपनी सीमित आय और साधनों के बावजूद दूसरों की पीड़ा को समझकर सहायता के लिए हाथ बढ़ाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब उसका योगदान आकार में छोटा होकर भी मूल्य में महान बन जाता है। उसमें अहंकार का प्रदर्शन नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि निःस्वार्थ सेवा की भावना होती है। ऐसा दान समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत बनता है और नैतिक मूल्यों की जड़ों को और अधिक सुदृढ़ करता है। इसके विपरीत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गलत कमाई से किया गया दान प्रायः दिखावे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिष्ठा और प्रसिद्धि की अतृप्त लालसा से प्रेरित होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें संवेदना से अधिक स्वार्थ छिपा होता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">समाधान का मार्ग पूर्णतः स्पष्ट और निर्विवाद है। हमें दान की मात्रा और भव्यता से अधिक उसके स्रोत और भावना की शुद्धता पर ध्यान केंद्रित करना होगा। समाज का दायित्व है कि वह भ्रष्टाचार और अनैतिकता से अर्जित धन को सम्मान देने के बजाय ईमानदार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिश्रमी और सत्यनिष्ठ जीवन को सर्वोच्च आदर्श के रूप में स्थापित करे। शिक्षण संस्थानों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धार्मिक संगठनों और मीडिया को भी इस विषय पर निरंतर जागरूकता फैलाकर लोगों की सोच को सही दिशा देनी चाहिए। जब हम संपत्ति से ऊपर चरित्र को स्थान देंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी सच्चे अर्थों में एक न्यायपूर्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवेदनशील और नैतिक समाज का निर्माण संभव हो सकेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि गलत तरीकों से कमाए गए धन से किया गया दान पुण्य नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि अन्याय और पाप पर चढ़ाया गया एक चमकदार आवरण मात्र है। यह समाज को भ्रमित करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य को ढक देता है और नैतिक मूल्यों को धीरे-धीरे क्षीण कर देता है। सच्ची धार्मिकता मंदिरों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मस्जिदों या दानपेटियों की सीमाओं में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि ईमानदार जीवन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अडिग सत्यनिष्ठा और करुणामय आचरण में निवास करती है। हमें इतना साहस अवश्य दिखाना होगा कि हम ऐसे दिखावटी दान की प्रशंसा करने से इंकार करें और स्पष्ट शब्दों में यह घोषित करें—पुण्य का मार्ग केवल शुद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यायपूर्ण और नैतिक साधनों से होकर ही जाता है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 12 Feb 2026 17:32:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सदन की मर्यादा पर सवाल लोकतंत्र का मंदिर या सियासत का अखाड़ा?</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">बिहार विधान परिषद में हालिया हंगामे ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हमारे जनप्रतिनिधि लोकतंत्र की गरिमा को समझ रहे हैं या नहीं। मंत्री अशोक चौधरी और राजद के सुनील कुमार सिंह के बीच जिस तरह की तीखी नोकझोंक हुई, वह केवल राजनीतिक मतभेद नहीं था, बल्कि भाषा और आचरण की सीमाओं का खुला उल्लंघन था। आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला इतना बढ़ गया कि बात हाथापाई तक पहुंच गई और मार्शलों को बीच-बचाव करना पड़ा। सदन की कार्यवाही बाधित हुई, सभापति को हस्तक्षेप करना पड़ा और विपक्षी सदस्यों को दिन भर के लिए बाहर</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/169194/question-on-the-dignity-of-the-house-temple-of-democracy"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/new-project-2026-02-06t132931.475.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">बिहार विधान परिषद में हालिया हंगामे ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हमारे जनप्रतिनिधि लोकतंत्र की गरिमा को समझ रहे हैं या नहीं। मंत्री अशोक चौधरी और राजद के सुनील कुमार सिंह के बीच जिस तरह की तीखी नोकझोंक हुई, वह केवल राजनीतिक मतभेद नहीं था, बल्कि भाषा और आचरण की सीमाओं का खुला उल्लंघन था। आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला इतना बढ़ गया कि बात हाथापाई तक पहुंच गई और मार्शलों को बीच-बचाव करना पड़ा। सदन की कार्यवाही बाधित हुई, सभापति को हस्तक्षेप करना पड़ा और विपक्षी सदस्यों को दिन भर के लिए बाहर करना पड़ा। यह दृश्य केवल एक दिन की अव्यवस्था नहीं था, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के स्तर में गिरावट का संकेत था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सदन को लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता है। यहां जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि बैठते हैं, जो राज्य की नीतियां तय करते हैं, कानून बनाते हैं और सरकार से जवाबदेही मांगते हैं। लेकिन जब इसी सदन में ‘चोट्टा’, ‘चोर’ और ‘घोटालेबाज’ जैसे शब्द गूंजते हैं, जब ‘औकात’ जैसी भाषा का इस्तेमाल होता है, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हम अपने लोकतंत्र को सही दिशा में ले जा रहे हैं। बहस और विरोध लोकतंत्र की आत्मा हैं, लेकिन गाली-गलौज और व्यक्तिगत हमले उसकी आत्मा को आहत करते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हंगामे की शुरुआत कार्यवाही में देरी को लेकर हुई। विपक्ष ने मुख्यमंत्री द्वारा कथित अभद्र टिप्पणी और राबड़ी देवी के अपमान का मुद्दा उठाया। सत्ता पक्ष ने इसे प्रक्रिया का मामला बताया। धीरे-धीरे वातावरण गरमाता गया और व्यक्तिगत आरोपों का दौर शुरू हो गया। मंत्री और विपक्षी सदस्य आमने-सामने आ गए। जिस तरह की भाषा का प्रयोग हुआ, वह लिखने योग्य भी नहीं है। सदन के भीतर की यह स्थिति आम नागरिकों के लिए निराशाजनक है, क्योंकि वे उम्मीद करते हैं कि उनके प्रतिनिधि संयम और शालीनता का उदाहरण पेश करेंगे।</div>
<div style="text-align:justify;">यह पहला अवसर नहीं है जब बिहार की राजनीति में सदन के भीतर शालीनता पर प्रश्नचिह्न लगा हो।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी और लालू प्रसाद यादव के कार्यकाल के दौरान भी कई बार सदन में तीखी बहसें और हंगामे हुए। 1990 के दशक में चारा घोटाले को लेकर विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच जबरदस्त टकराव देखने को मिला था। उस समय भी आरोप-प्रत्यारोप और राजनीतिक कटाक्षों ने सदन की कार्यवाही को कई बार बाधित किया। हालांकि उस दौर की राजनीति में भी कटुता थी, लेकिन यह अपेक्षा की जाती रही कि व्यक्तिगत मर्यादा की एक सीमा बनी रहे। लोकतांत्रिक विमर्श में असहमति स्वाभाविक है, परंतु असभ्यता स्वीकार्य नहीं हो सकती।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज की घटना में जो बात अधिक चिंताजनक है, वह यह है कि राजनीतिक दल एक-दूसरे को सुनने की बजाय केवल आरोप लगाने में लगे दिखाई देते हैं। विपक्ष को अपनी बात रखने और सरकार से सवाल पूछने का पूरा अधिकार है। वहीं सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी है कि वह धैर्यपूर्वक जवाब दे और आलोचना को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा माने। लेकिन जब संवाद की जगह टकराव ले लेता है, तो लोकतंत्र कमजोर होता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बिहार विधानसभा में भी इसी दिन बच्चियों के खिलाफ बढ़ते अपराध, नीट छात्र की मौत और राबड़ी देवी के अपमान को लेकर जोरदार नारेबाजी हुई। कांग्रेस विधायकों द्वारा सरकार का पुतला सदन में लाना और उसे चूड़ियां पहनाना प्रतीकात्मक विरोध था, परंतु इससे भी सदन की कार्यवाही प्रभावित हुई। विरोध दर्ज कराने के लोकतांत्रिक तरीके होते हैं, लेकिन सदन की गरिमा बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर राबड़ी देवी की टिप्पणी कि वे अपने पद की गरिमा भूल गए हैं, राजनीति में बढ़ती कटुता को दर्शाती है। राजनीतिक मतभेदों के बावजूद भाषा की मर्यादा बनाए रखना प्रत्येक नेता की जिम्मेदारी है। जब वरिष्ठ नेता ही संयम खो बैठते हैं, तो युवा नेताओं और कार्यकर्ताओं को गलत संदेश जाता है। लोकतंत्र केवल संख्या का खेल नहीं है, बल्कि आचरण और संवाद की संस्कृति भी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह भी सच है कि चुनावी हार-जीत का असर सदन के व्यवहार पर पड़ता है। हार का गम और सत्ता का आत्मविश्वास, दोनों ही कभी-कभी संतुलन बिगाड़ देते हैं। लेकिन जनप्रतिनिधियों को यह नहीं भूलना चाहिए कि वे व्यक्तिगत लड़ाई नहीं लड़ रहे, बल्कि जनता की उम्मीदों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। जिन लोगों ने उन्हें वोट देकर सदन तक पहुंचाया, वे उम्मीद करते हैं कि उनके मुद्दों पर गंभीर चर्चा होगी, न कि सड़कछाप भाषा का प्रदर्शन।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सदन में हुई घटना ने देशवासियों को यह सोचने पर मजबूर किया है कि क्या हमारे लोकतांत्रिक संस्थान अपनी गरिमा बचा पा रहे हैं। संसद और विधानसभाएं केवल राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन के मंच नहीं हैं। वे नीति निर्माण और सामाजिक संवाद के केंद्र हैं। यदि यहां भी शोर, आरोप और अपमान ही सुनाई देंगे, तो जनता का विश्वास कमजोर होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">समय आ गया है कि सभी दल आत्ममंथन करें। सत्ता पक्ष को चाहिए कि वह विपक्ष की आलोचना को सहनशीलता से ले और पारदर्शिता के साथ जवाब दे। विपक्ष को चाहिए कि वह विरोध दर्ज कराते समय भाषा और व्यवहार की मर्यादा का पालन करे। सभापति और स्पीकर की भूमिका भी महत्वपूर्ण है, जो निष्पक्षता से सदन को संचालित करें और अनुशासन सुनिश्चित करें।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लोकतंत्र की खूबसूरती इसी में है कि यहां विचारों की लड़ाई होती है, व्यक्तियों की नहीं। असहमति लोकतंत्र को मजबूत करती है, लेकिन असभ्यता उसे कमजोर करती है। यदि हमारे जनप्रतिनिधि सदन में संयम और शालीनता का उदाहरण पेश करेंगे, तो लोकतंत्र की जड़ें और मजबूत होंगी। अन्यथा, लोकतंत्र का मंदिर धीरे-धीरे सियासत का अखाड़ा बनता चला जाएगा। जनता ने जिन्हें सम्मान देकर सदन तक भेजा है, उनसे यही अपेक्षा है कि वे अपनी भाषा और व्यवहार से उस सम्मान को बनाए रखें और लोकतंत्र की मर्यादा को सर्वोपरि मानें।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 11 Feb 2026 18:01:56 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>जनरल नरवणे की अप्रकाशित आत्मकथा और दिल्ली पुलिस की जांच</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="margin-bottom:0.0001pt;line-height:normal;background:rgb(246,246,246);text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" style="font-size:12pt;font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';color:#2d2d2d;" xml:lang="hi">महेन्द्र</span><span lang="hi" style="font-size:12pt;color:#2d2d2d;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';color:#2d2d2d;" xml:lang="hi">तिवारी</span></strong></p>
<p style="text-align:justify;">  </p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';" xml:lang="hi">दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की अप्रकाशित आत्मकथा फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी की पीडीएफ कॉपी के सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स पर प्रसार को लेकर औपचारिक जांच शुरू कर दी है। यह मामला किसी अपराध या घोटाले से जुड़ा नहीं</span><span style="font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';">, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि एक ऐसी आत्मकथा से संबंधित है जो अभी औपचारिक रूप से प्रकाशित भी नहीं हुई और फिर भी व्यापक रूप से पढ़ी जा रही है। पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल नरवणे द्वारा लिखी गई इस पुस्तक की डिजिटल प्रति अचानक विभिन्न संदेश माध्यमों और सामाजिक मंचों पर फैल गई।</span></span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/169190/general-naravanes-unpublished-autobiography-and-delhi-polices-investigation"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/जनरल-नरवणे-की-अप्रकाशित-आत्मकथा-और-दिल्ली-पुलिस-की-जांच.webp" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="margin-bottom:0.0001pt;line-height:normal;background:rgb(246,246,246);text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" style="font-size:12pt;font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';color:#2d2d2d;" xml:lang="hi">महेन्द्र</span><span lang="hi" style="font-size:12pt;color:#2d2d2d;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';color:#2d2d2d;" xml:lang="hi">तिवारी</span></strong></p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';" xml:lang="hi">दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की अप्रकाशित आत्मकथा फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी की पीडीएफ कॉपी के सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स पर प्रसार को लेकर औपचारिक जांच शुरू कर दी है। यह मामला किसी अपराध या घोटाले से जुड़ा नहीं</span><span style="font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';">, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि एक ऐसी आत्मकथा से संबंधित है जो अभी औपचारिक रूप से प्रकाशित भी नहीं हुई और फिर भी व्यापक रूप से पढ़ी जा रही है। पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल नरवणे द्वारा लिखी गई इस पुस्तक की डिजिटल प्रति अचानक विभिन्न संदेश माध्यमों और सामाजिक मंचों पर फैल गई। देखते ही देखते यह रचना केवल सैन्य इतिहास की किताब न रहकर राष्ट्रीय बहस का विषय बन गई। प्रश्न यह नहीं रह गया कि पुस्तक लीक कैसे हुई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह बन गया कि वह अब तक प्रकाशित क्यों नहीं हो सकी।</span></span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';" xml:lang="hi">यह आत्मकथा चार दशकों से अधिक लंबे सैन्य जीवन का विवरण देती है। एक युवा अधिकारी के रूप में सीमावर्ती क्षेत्रों में तैनाती से लेकर देश की थलसेना के सर्वोच्च पद तक की यात्रा इसमें दर्ज है। इसमें पूर्वी सीमा पर हुए टकराव</span><span style="font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';">, <span lang="hi" xml:lang="hi">पश्चिमी मोर्चे पर तनाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पड़ोसी देशों के साथ संघर्षविराम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और एक भीषण वैश्विक महामारी के दौरान सेना की भूमिका जैसे प्रसंग शामिल हैं। ऐसे समय में जब देश का सैन्य इतिहास अक्सर आधिकारिक वक्तव्यों और संक्षिप्त प्रेस विज्ञप्तियों तक सीमित रह जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह पुस्तक घटनाओं के भीतर झांकने का अवसर देती है। शायद यही कारण है कि इसकी प्रतीक्षा लंबे समय से की जा रही थी।</span></span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';" xml:lang="hi">प्रकाशन की प्रक्रिया सामान्य नहीं रही। पुस्तक के प्रकाशन की घोषणा पहले ही हो चुकी थी</span><span style="font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';">, <span lang="hi" xml:lang="hi">अग्रिम आदेश भी लिए गए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परंतु अचानक सब कुछ रोक दिया गया। पाठकों को धन वापस कर दिया गया और कहा गया कि आवश्यक स्वीकृतियां लंबित हैं। पूर्व सैन्य अधिकारियों द्वारा लिखी जाने वाली स्मृतियों के लिए रक्षा मंत्रालय की पूर्व अनुमति आवश्यक होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह कोई नई बात नहीं है। परंतु जब सूचना के अधिकार के अंतर्गत प्राप्त आंकड़ों से यह सामने आया कि उसी अवधि में दर्जनों अन्य पुस्तकों को अनुमति मिल चुकी है और केवल यही एक रचना अटकी हुई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो संदेह स्वाभाविक हो जाता है।</span></span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';" xml:lang="hi">लेखक स्वयं कई अवसरों पर स्पष्ट कर चुके हैं कि उन्होंने अपना कार्य पूरा कर दिया था और उसे प्रकाशक को सौंप दिया था। अनुमति प्राप्त करना उनका दायित्व नहीं था। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि पुस्तक की सामग्री उनकी अपनी लिखी हुई है और उसमें किसी प्रकार की असत्य जानकारी नहीं है। यही नहीं</span><span style="font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';">, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुस्तक के मसौदे को पहले ही कई वरिष्ठ रक्षा विशेषज्ञों और पूर्व अधिकारियों ने पढ़ा था और उसकी सराहना भी की थी। इन प्रतिक्रियाओं से यह संकेत मिलता है कि सामग्री न तो मनगढ़ंत है और न ही हल्की।</span></span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';" xml:lang="hi">इसके बावजूद पुस्तक पर चुप्पी बनी रही। इस बीच कुछ समाचार माध्यमों ने इसके अंशों के आधार पर लेख प्रकाशित किए। उन लेखों में सीमा पर हुए संकटों के दौरान लिए गए राजनीतिक और सैन्य निर्णयों का उल्लेख था। संसद में जब इन संदर्भों का उपयोग करने की कोशिश की गई तो भारी हंगामा हुआ और चर्चा रोक दी गई। इसके तुरंत बाद वही डिजिटल प्रति</span><span style="font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';">, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे अब तक केवल सीमित लोगों ने देखा था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यापक रूप से फैलने लगी। यह एक अजीब स्थिति थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें एक पुस्तक आधिकारिक रूप से अस्तित्वहीन मानी जा रही थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परंतु वास्तविकता में हजारों पाठकों तक पहुंच चुकी थी।</span></span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';" xml:lang="hi">अब जांच का केंद्र यह है कि इस अनधिकृत प्रसार के लिए कौन जिम्मेदार है। कानून की दृष्टि से यह कॉपीराइट का उल्लंघन हो सकता है</span><span style="font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';">, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि अप्रकाशित सामग्री को बिना अनुमति साझा किया गया। यदि यह माना जाए कि पुस्तक में संवेदनशील सैन्य जानकारियां हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उस पर गोपनीयता से जुड़े कानून भी लागू हो सकते हैं। परंतु यहां एक गहरा प्रश्न छिपा है। क्या जांच का उद्देश्य वास्तव में कानून का पालन कराना है या फिर उन तथ्यों को नियंत्रित करना है जो असुविधाजनक साबित हो सकते हैं।</span></span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';" xml:lang="hi">इस आत्मकथा में जिन घटनाओं का उल्लेख है</span><span style="font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';">, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे हाल के वर्षों की सबसे संवेदनशील राष्ट्रीय घटनाओं में से हैं। सीमावर्ती क्षेत्र में हुई झड़पों में देश ने अपने जवान खोए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परंतु उन घटनाओं के बारे में आधिकारिक विवरण सीमित रहा। सरकार की ओर से एक विशेष प्रकार का आख्यान प्रस्तुत किया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें दृढ़ता और सफलता पर जोर था। यदि किसी पूर्व थलसेना प्रमुख की पुस्तक उस आख्यान से अलग तस्वीर पेश करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो स्वाभाविक है कि वह राजनीतिक रूप से असहज कर सकती है। परंतु क्या असहजता ही किसी रचना को रोकने का पर्याप्त कारण हो सकती है।</span></span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';" xml:lang="hi">लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ केवल सामान्य नागरिकों तक सीमित नहीं है। जिन लोगों ने राज्य की सर्वोच्च जिम्मेदारियां निभाई हैं</span><span style="font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';">, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनका अनुभव और दृष्टिकोण भी सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा होना चाहिए। निश्चित रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा एक गंभीर विषय है और किसी भी प्रकार की जानकारी का प्रकाशन सावधानी से होना चाहिए। परंतु सुरक्षा और सेंसरशिप के बीच की रेखा बहुत महीन होती है। जब सुरक्षा के नाम पर हर असुविधाजनक प्रश्न को दबाया जाने लगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब वह लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरा बन जाती है।</span></span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';" xml:lang="hi">यह भी ध्यान देने योग्य है कि इस मामले में न तो लेखक ने अपनी बात से पीछे हटने का प्रयास किया और न ही प्रकाशक ने यह कहा कि सामग्री गलत है। प्रकाशक ने केवल इतना कहा कि पुस्तक अभी सार्वजनिक नहीं है। इसका अर्थ यह हुआ कि समस्या सामग्री में नहीं</span><span style="font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';">, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उसके सार्वजनिक होने में है। यही विरोधाभास इस पूरे विवाद को और गहरा बनाता है।</span></span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';" xml:lang="hi">डिजिटल युग में किसी रचना को पूरी तरह रोक पाना लगभग असंभव है। एक बार यदि वह किसी रूप में बाहर आ गई</span><span style="font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';">, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसे नियंत्रित करना कठिन हो जाता है। इस घटना ने यह भी दिखा दिया कि प्रतिबंध और देरी कभी-कभी विपरीत प्रभाव डालते हैं। जिस पुस्तक को कुछ कार्यालयी फाइलों में दबाकर रखा गया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह अब कहीं अधिक लोगों तक पहुंच चुकी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह भी बिना किसी आधिकारिक संदर्भ और विमर्श के। इससे गलत व्याख्याओं और अफवाहों की संभावना भी बढ़ जाती है।</span></span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';" xml:lang="hi">अंततः यह प्रश्न बना रहता है कि समाधान क्या है। क्या बेहतर यह नहीं होता कि पुस्तक को आवश्यक संपादन और स्पष्ट चेतावनियों के साथ प्रकाशित होने दिया जाता</span><span style="font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';">, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि पाठक उसे पूरे संदर्भ में समझ सकें। जांच और प्रतिबंध के रास्ते ने न केवल लेखक और प्रकाशक को असमंजस में डाला है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पाठकों को भी अधूरी और असंतुलित जानकारी के भरोसे छोड़ दिया है।</span></span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';" xml:lang="hi">यह प्रकरण केवल एक आत्मकथा का नहीं है। यह उस बड़े संघर्ष का प्रतीक है</span><span style="font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';">, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें राज्य की शक्ति और नागरिक समाज की जिज्ञासा आमने-सामने खड़ी होती हैं। इतिहास बताता है कि सत्य को लंबे समय तक दबाया नहीं जा सकता। वह कभी दस्तावेज के रूप में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी स्मृति के रूप में और कभी डिजिटल प्रति के रूप में सामने आ ही जाता है। प्रश्न केवल यह है कि क्या हम उसे खुली बहस और परिपक्व संवाद के साथ स्वीकार करेंगे या डर और नियंत्रण के माध्यम से उसे और रहस्यमय बना देंगे। जनरल नरवणे की आत्मकथा आज भले ही औपचारिक रूप से प्रकाशित न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परंतु उसने यह स्पष्ट कर दिया है कि कहानियां केवल अनुमति से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आवश्यकता से जीवित रहती हैं।</span></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 11 Feb 2026 17:52:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>मोबाइल, नेटवर्क और सपने: लेकिन महिलाएं अब भी बाहर क्यों?</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कृति आरके जैन</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हर सुबह घर में रोशनी से पहले जिम्मेदारियां जाग जाती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और उसी के साथ एक महिला भी। मोबाइल की चमक दीवारों तक पहुंचती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उसकी हथेली तक नहीं। वह चूल्हे की आग में अपनी थकान घोलती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बच्चों के सपनों को आकार देती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पानी की कतार में खड़ी होकर दिन की नींव रखती है। उसी घर में रखा फोन किसी और की उंगलियों में पूरी दुनिया समेटे रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि वह अपने ही घर में डिजिटल अंधेरे में जीती रहती है। चमकते नारों और विज्ञापनों के पीछे एक दबा</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/168854/mobile-networks-and-dreams-but-why-women-still-left-out"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/hindi-divas22.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कृति आरके जैन</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हर सुबह घर में रोशनी से पहले जिम्मेदारियां जाग जाती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और उसी के साथ एक महिला भी। मोबाइल की चमक दीवारों तक पहुंचती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उसकी हथेली तक नहीं। वह चूल्हे की आग में अपनी थकान घोलती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बच्चों के सपनों को आकार देती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पानी की कतार में खड़ी होकर दिन की नींव रखती है। उसी घर में रखा फोन किसी और की उंगलियों में पूरी दुनिया समेटे रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि वह अपने ही घर में डिजिटल अंधेरे में जीती रहती है। चमकते नारों और विज्ञापनों के पीछे एक दबा हुआ दर्द छिपा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां करोड़ों महिलाएं तकनीक के दरवाजे पर खड़ी होकर भी भीतर नहीं जा पातीं। उनके पास घर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रिश्ते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिम्मेदारियां हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन अपने भविष्य को गढ़ने का डिजिटल अधिकार नहीं है। यह कहानी सुविधा की नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छीनी गई पहचान की पीड़ा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत गर्व के साथ खुद को तकनीकी शक्ति कहता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऑनलाइन बैंकिंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल भुगतान और वर्चुअल शिक्षा आधुनिकता के प्रतीक बन चुके हैं। शहरों की ऊंची इमारतों से लेकर गांव की कच्ची गलियों तक इंटरनेट की लहर दौड़ रही है। लेकिन इस विकास के रंगमंच पर महिलाओं की भूमिका अक्सर दर्शक की बनी रहती है। ग्रामीण और मध्यमवर्गीय घरों में स्मार्टफोन आज भी पुरुषों की निजी जागीर समझा जाता है। महिलाएं अनुमति की दहलीज लांघकर ही उसे छू पाती हैं। सरकारी योजनाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नौकरी के पोर्टलों और बैंकिंग ऐप्स तक उनकी पहुंच अधूरी रहती है। यह अधूरापन उन्हें हर दिन प्रगति की दौड़ में और पीछे धकेल देता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस डिजिटल दूरी की जड़ें नेटवर्क की कमजोरी में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सदियों पुरानी मानसिकता में गहराई तक धंसी हुई हैं। आज भी कई घरों में फोन महिलाओं की स्वतंत्रता पर पहरा माना जाता है। उनकी आज़ादी को संदेह और नियंत्रण की जंजीरों में जकड़ दिया जाता है। डिजिटल शिक्षा के अभाव में वे खुद को असुरक्षित महसूस करती हैं। उन्हें हर क्लिक से डर लगता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर लिंक में खतरा नजर आता है। साइबर अपराध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डीपफेक और ऑनलाइन अपमान का भय उनके मन में स्थायी साया बनकर बैठ जाता है। यह डर धीरे धीरे उनकी जिज्ञासा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मसम्मान और आगे बढ़ने की इच्छा को खामोशी से निगल जाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">घर की चारदीवारी के भीतर महिलाओं पर टिका अदृश्य बोझ इस असमानता को और मजबूत करता है। बिना किसी वेतन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्मान या अवकाश के वे दिनभर चूल्हे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बच्चों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुजुर्गों और जरूरतों के बीच खुद को खपा देती हैं। उनका हर दिन दूसरों के लिए शुरू होता है और दूसरों पर ही खत्म हो जाता है। सीखने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समझने और आगे बढ़ने के लिए उनके पास न समय बचता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न ऊर्जा। गांवों में पानी और ईंधन की तलाश लड़कियों की पढ़ाई और डिजिटल दुनिया दोनों छीन लेती है। तकनीक उनके लिए एक दूर चमकता सपना बन जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे वे सिर्फ दूसरों की उंगलियों में साकार होते देखती हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस डिजिटल खाई का सबसे गहरा घाव महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता पर पड़ता है। आज रोज़गार और कमाई के नए रास्ते इंटरनेट की गलियों से होकर गुजरते हैं। ऑनलाइन व्यापार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फ्रीलांसिंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल सेवाएं और गिग वर्क उन्हें आत्मनिर्भर बना सकते थे। लेकिन साधनों की कमी उनके सपनों पर ताला लगा देती है। किसान महिलाएं आधुनिक तकनीक से वंचित रहकर कम उपज और कम आय तक सीमित रह जाती हैं। मध्यमवर्गीय महिलाएं घर बैठे काम करने के अवसर खो देती हैं। उनकी मेहनत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिभा और हुनर बाजार की रोशनी तक पहुंच ही नहीं पाते।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जमीनी सच्चाइयों की कहानियां इस पीड़ा को और तीखा बना देती हैं। कोई महिला महीनों की मेहनत से बनाई गई हस्तकला को ऑनलाइन मंच नहीं दे पाती। कोई छात्रा कमजोर नेटवर्क के कारण अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़ देती है। कोई बीमार महिला डॉक्टर से संपर्क न कर पाने के कारण चुपचाप दर्द सहती रहती है। कई महिलाएं सोशल मीडिया पर अपमान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धमकी और ट्रोलिंग के डर से अपनी आवाज दबा लेती हैं। वे धीरे धीरे पीछे हट जाती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे खामोशी ही उनकी नियति बन गई हो।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सरकार और संस्थाओं ने बदलाव की कोशिशें जरूर की हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन वे अब भी अधूरी और कमजोर हैं। प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर महिलाओं तक सही ढंग से नहीं पहुंच पाते। नेटवर्क गांवों की सीमाओं पर आकर दम तोड़ देता है। डेटा गरीब महिलाओं के लिए आज भी भारी बोझ बना हुआ है। साइबर सुरक्षा कानून और सहायता तंत्र कमजोर हैं। नीतियां कागजों पर आकर्षक दिखती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जमीन पर उनका असर फीका पड़ जाता है। जब तक योजनाएं महिलाओं की वास्तविक जिंदगी और जरूरतों से नहीं जुड़ेंगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तक डिजिटल बराबरी का सपना अधूरा ही रहेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह डिजिटल असमानता केवल वर्तमान की समस्या नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि आने वाली पीढ़ियों की किस्मत भी तय कर रही है। जब एक मां तकनीक की दुनिया से बाहर रह जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसकी बेटी भी आत्मविश्वास और अवसरों से वंचित हो जाती है। शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य और रोजगार के क्षेत्र में यह दूरी पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ती चली जाती है। समाज में जब आत्मनिर्भर और सशक्त महिलाओं की संख्या घटती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो विकास की रफ्तार खुद ही थमने लगती है। तकनीकी क्षेत्रों में महिलाओं की कमजोर मौजूदगी देश की रचनात्मकता और नवाचार शक्ति को खोखला कर देती है। यह पराजय सिर्फ महिलाओं की नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पूरे राष्ट्र की सामूहिक हार बन जाती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब आधे-अधूरे प्रयासों का समय बीत चुका है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह निर्णायक बदलाव का क्षण है। महिलाओं के लिए हर गांव और हर मोहल्ले में डिजिटल प्रशिक्षण केंद्र बनने चाहिए। हर लड़की और हर महिला को सस्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुरक्षित और निजी स्मार्टफोन मिलना चाहिए। परिवारों में यह चेतना जागृत करनी होगी कि मोबाइल आज विलासिता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोजगार और सम्मान का साधन है। साइबर सुरक्षा और डिजिटल अधिकारों की शिक्षा अनिवार्य बनानी होगी। गांवों में मजबूत नेटवर्क</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामुदायिक इंटरनेट केंद्र और तकनीकी सहायता केंद्र स्थापित करने होंगे। साथ ही महिलाओं को डिजिटल उद्यमिता के लिए वित्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मार्गदर्शन और बाजार से जोड़ना होगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कल्पना नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब एक नए भारत की जरूरत है — ऐसा भारत जहां किसी महिला की सुबह चूल्हे की आग से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उसके अपने मोबाइल की रोशनी से शुरू हो। जहां वह डर और अनुमति के बिना बैंकिंग करे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पढ़ाई करे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कारोबार बढ़ाए और दुनिया से बराबरी के साथ संवाद करे। जहां तकनीक उसकी सीमाएं तय न करे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उसके सपनों को दिशा और गति दे। जहां डिजिटल समानता सिर्फ सरकारी दस्तावेजों की भाषा न होकर हर घर की सच्चाई बने। यह सवाल सुविधा का नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सम्मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधिकार और आत्मसम्मान का है। जिस दिन हर महिला डिजिटल रूप से सशक्त होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी दिन भारत सच मायनों में विकसित कहलाएगा। अब वक्त आ गया है कि फोन केवल घर में मौजूद न रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि हर महिला के हाथ में उसकी ताकत बनकर पहुंचे।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 09 Feb 2026 17:58:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>क्या था एपस्टीन का बेबी रैंच प्लान?</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="margin-bottom:11.25pt;line-height:normal;background:rgb(246,246,246);text-align:justify;" align="right"><span style="font-size:12pt;color:#2d2d2d;">- </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';color:#2d2d2d;" xml:lang="hi">महेन्द्र</span><span lang="hi" style="font-size:12pt;color:#2d2d2d;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';color:#2d2d2d;" xml:lang="hi">तिवारी</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जेफ्री एपस्टीन का तथाकथित बेबी रैंच विचार आधुनिक समय के सबसे डरावने और विचलित करने वाले प्रसंगों में से एक माना जाता है। यह कोई औपचारिक योजना या लिखित परियोजना नहीं थी</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि उसकी निजी बातचीतों</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">दंभ भरी चर्चाओं और शक्ति प्रदर्शन से उपजा हुआ एक ऐसा विचार था</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जिसने उसके चरित्र</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">मानसिकता और नैतिक दिवालियेपन को उजागर कर दिया। यह विचार केवल व्यक्तिगत सनक नहीं था</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि उस सोच का विस्तार था जिसमें धन</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">प्रभाव और सत्ता के बल पर इंसानी जीवन को प्रयोग की वस्तु समझा जाता है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">एपस्टीन</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/168850/what-was-epsteins-baby-ranch-plan"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/jeffrey-epstein-baby-ranch-plan.jpeg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="margin-bottom:11.25pt;line-height:normal;background:rgb(246,246,246);text-align:justify;" align="right"><span style="font-size:12pt;color:#2d2d2d;">- </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';color:#2d2d2d;" xml:lang="hi">महेन्द्र</span><span lang="hi" style="font-size:12pt;color:#2d2d2d;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';color:#2d2d2d;" xml:lang="hi">तिवारी</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जेफ्री एपस्टीन का तथाकथित बेबी रैंच विचार आधुनिक समय के सबसे डरावने और विचलित करने वाले प्रसंगों में से एक माना जाता है। यह कोई औपचारिक योजना या लिखित परियोजना नहीं थी</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि उसकी निजी बातचीतों</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">दंभ भरी चर्चाओं और शक्ति प्रदर्शन से उपजा हुआ एक ऐसा विचार था</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जिसने उसके चरित्र</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">मानसिकता और नैतिक दिवालियेपन को उजागर कर दिया। यह विचार केवल व्यक्तिगत सनक नहीं था</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि उस सोच का विस्तार था जिसमें धन</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">प्रभाव और सत्ता के बल पर इंसानी जीवन को प्रयोग की वस्तु समझा जाता है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">एपस्टीन स्वयं को असाधारण बुद्धिमान मानता था। उसे यह भ्रम था कि उसके भीतर कुछ ऐसा विशेष है जो सामान्य मनुष्यों से उसे श्रेष्ठ बनाता है। इसी आत्ममुग्धता से यह विचार जन्मा कि यदि उसके जैविक गुणों से अनेक संतानें पैदा की जाएँ</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तो एक प्रकार की श्रेष्ठ मानव पीढ़ी अस्तित्व में आ सकती है। उसने न्यू मैक्सिको क्षेत्र में स्थित अपने विशाल और एकांत रैंच को इस कल्पना का केंद्र माना। उसके अनुसार यह स्थान इतना दूरदराज़ और सुरक्षित था कि वहाँ बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के उसकी मर्जी के प्रयोग किए जा सकते थे।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">उसकी कल्पना में यह रैंच केवल निवास स्थान नहीं था</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि एक प्रजनन केंद्र जैसा था</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जहाँ अनेक युवतियों को लाकर उनसे गर्भधारण कराया जाता और इस प्रक्रिया से उत्पन्न बच्चों को भविष्य के असाधारण मनुष्य के रूप में देखा जाता। वह बार बार यह कहता था कि इतिहास में कुछ लोगों ने महान बुद्धिजीवियों के जैविक तत्वों को संचित करने की कोशिश की थी और वही परंपरा वह और आगे ले जाना चाहता है। फर्क केवल इतना था कि वह स्वयं को उसी महानता का प्रतीक मान बैठा था।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">इस विचार की भयावहता केवल इसकी अव्यवहारिकता में नहीं थी</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि उस दृष्टि में थी जिसमें स्त्रियों को स्वतंत्र मनुष्य नहीं</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि साधन के रूप में देखा गया। उसके लिए मातृत्व कोई भावनात्मक या सामाजिक अनुभव नहीं था</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि एक यांत्रिक प्रक्रिया थी। स्त्री का शरीर उसके लिए प्रयोगशाला बन गया था और गर्भ एक परियोजना। यही कारण है कि जिन लोगों ने उससे यह बातें सुनीं</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">उन्होंने इसे अस्वस्थ</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">खतरनाक और परेशान करने वाला बताया।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">महत्वपूर्ण बात यह है कि इस कथित योजना के वास्तविक क्रियान्वयन का कोई ठोस प्रमाण कभी सामने नहीं आया। न तो ऐसे किसी संगठित प्रजनन केंद्र के प्रमाण मिले और न ही ऐसे बच्चों के</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जिन्हें निश्चयपूर्वक उससे जोड़ा जा सके। कुछ महिलाओं द्वारा यह दावा अवश्य किया गया कि वे उससे गर्भवती हुई थीं</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">परंतु ये दावे न तो न्यायिक जांच में सिद्ध हो सके और न ही किसी वैज्ञानिक पुष्टि तक पहुँचे। इस प्रकार यह योजना विचारों और दावों के स्तर पर ही सिमटी रही।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">फिर भी</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">केवल इस आधार पर इसे महत्वहीन नहीं माना जा सकता। क्योंकि यह विचार उसी मानसिक संरचना से निकला था</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जिसने उसे व्यापक यौन अपराधों की ओर प्रवृत्त किया। उसकी दुनिया में संबंधों का कोई नैतिक अर्थ नहीं था। वहाँ केवल नियंत्रण था</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">प्रभुत्व था और दूसरों की देह पर अधिकार जमाने की लालसा थी। उसका धन और सामाजिक पहुँच उसे यह भ्रम देती थी कि वह नियमों से ऊपर है और उसकी इच्छाएँ ही उसका विधान हैं।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">इस पूरे प्रसंग में एक गहरी ऐतिहासिक छाया भी दिखाई देती है। मानव इतिहास में कई बार ऐसी विचारधाराएँ उभरी हैं जिनमें कुछ लोगों ने स्वयं को श्रेष्ठ मानकर दूसरों की तुलना में अधिक मूल्यवान समझा। ऐसी सोच ने नस्लीय भेदभाव</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">अमानवीय प्रयोगों और व्यापक हिंसा को जन्म दिया है। एपस्टीन का विचार उसी खतरनाक परंपरा का आधुनिक और निजी रूप था</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जिसमें विज्ञान का मुखौटा पहनाकर अनैतिक इच्छाओं को</span><span style="font-family:'MS Gothic';">正</span><span> </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">ठहराने की कोशिश की जाती है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">यह भी उल्लेखनीय है कि एपस्टीन यह सब बातें अकेले में नहीं करता था। वह प्रभावशाली लोगों</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">शिक्षाविदों और वैज्ञानिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों के बीच इन विचारों को साझा करता था। यह तथ्य अपने आप में चिंताजनक है</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">क्योंकि इससे यह संकेत मिलता है कि उसकी बातों को सुनने और सहने वाले लोग भी समाज के उच्च स्तरों में मौजूद थे। यद्यपि उनमें से कई ने बाद में दूरी बना ली</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">परंतु प्रारंभिक चुप्पी भी अपने आप में एक प्रश्न खड़ा करती है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बाद में जब उसके अपराध सार्वजनिक हुए और उससे जुड़े दस्तावेज़ सामने आए</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तब इस कथित बेबी रैंच विचार को उसके समग्र व्यक्तित्व के संदर्भ में देखा जाने लगा। यह स्पष्ट हुआ कि यह कोई अलग या विचित्र कल्पना नहीं थी</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि उसी मानसिकता का तार्किक विस्तार था जिसमें शक्ति का दुरुपयोग और इंसानी गरिमा की अवहेलना शामिल थी। उसके लिए लोग व्यक्ति नहीं थे</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि संसाधन थे।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">इस पूरे मामले ने समाज को यह सोचने पर मजबूर किया कि जब अत्यधिक धन और प्रभाव किसी व्यक्ति के हाथ में बिना जवाबदेही के चला जाता है</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तो वह किस हद तक जा सकता है। यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि उस व्यवस्था पर भी प्रश्न है जो लंबे समय तक ऐसे लोगों को संरक्षण देती रहती है। एपस्टीन का पतन अचानक नहीं हुआ</span><span>; </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">वह वर्षों तक एक ऐसी दुनिया में सक्रिय रहा जहाँ उसकी हरकतों को या तो अनदेखा किया गया या दबा दिया गया।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">अंततः बेबी रैंच का विचार चाहे वास्तविकता में न बदला हो</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">परंतु उसका प्रतीकात्मक महत्व बहुत गहरा है। यह हमें यह याद दिलाता है कि विज्ञान</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बुद्धि और प्रगति के नाम पर यदि नैतिकता को किनारे रख दिया जाए</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तो परिणाम भयावह हो सकते हैं। मानव जीवन कोई प्रयोगशाला की वस्तु नहीं है और न ही किसी एक व्यक्ति की महत्वाकांक्षा का साधन।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">यह प्रसंग हमें सतर्क करता है कि किसी भी व्यक्ति को केवल उसकी संपत्ति</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">संपर्क या कथित प्रतिभा के आधार पर महान नहीं मान लेना चाहिए। असली मूल्य उस सोच में होता है जो मनुष्य को मनुष्य की तरह देखे। जेफ्री एपस्टीन का बेबी रैंच विचार इसी कसौटी पर पूरी तरह असफल सिद्ध होता है और इतिहास में एक चेतावनी की तरह दर्ज हो जाता है कि जब अहंकार</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">सत्ता और अनैतिक इच्छाएँ एक साथ मिलती हैं</span><span>, </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तो कल्पनाएँ भी अपराध का रूप ले सकती हैं।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 09 Feb 2026 17:46:37 +0530</pubDate>
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                <title>ए आई के दुरुपयोग का शिकार होते दुनियाभर के मासूम बच्चे</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मानव जीवन को सरल और सुविधाजनक बनाने के लिए विकसित की गई वैज्ञानिक तकनीक जहाँ एक ओर वरदान सिद्ध हुई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं इसके दुरुपयोग ने अनेक नई चुनौतियां भी पैदा कर दी हैं। संचार क्षेत्र में आई मोबाइल क्रांति इसका ताजा उदाहरण है। स्मार्टफोन ने दुनिया की दूरियाँ समाप्त कर लोगों को एक-दूसरे से जोड़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन यही तकनीक अब पारिवारिक और सामाजिक दूरियाँ बढ़ाने के साथ-साथ नई पीढ़ी के लिए गंभीर खतरे भी पैदा कर रही है । इसी खतरे का एक नया रूप आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) तकनीक का दुरुपयोग है। यूनिसेफ और इंटरपोल द्वारा तैयार एक हालिया</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/168680/innocent-children-around-the-world-becoming-victims-of-misuse-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/images-(2).jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मानव जीवन को सरल और सुविधाजनक बनाने के लिए विकसित की गई वैज्ञानिक तकनीक जहाँ एक ओर वरदान सिद्ध हुई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं इसके दुरुपयोग ने अनेक नई चुनौतियां भी पैदा कर दी हैं। संचार क्षेत्र में आई मोबाइल क्रांति इसका ताजा उदाहरण है। स्मार्टफोन ने दुनिया की दूरियाँ समाप्त कर लोगों को एक-दूसरे से जोड़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन यही तकनीक अब पारिवारिक और सामाजिक दूरियाँ बढ़ाने के साथ-साथ नई पीढ़ी के लिए गंभीर खतरे भी पैदा कर रही है । इसी खतरे का एक नया रूप आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) तकनीक का दुरुपयोग है। यूनिसेफ और इंटरपोल द्वारा तैयार एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल एक वर्ष में दुनियाभर के</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बारह लाख से अधिक बच्चे डीपफेक तकनीक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के शिकार हुए हैं। एशिया और अफ्रीका के ग्यारह देशों पर किए गए अध्ययन में सामने आया कि ए आई के गलत इस्तेमाल से विशेष रूप से लड़कियों की तस्वीरों को अश्लील रूप में परिवर्तित किया जा रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एआई की</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">फेस स्वैपिंग तकनीक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के माध्यम से किसी भी व्यक्ति के चेहरे को दूसरे फोटो या वीडियो पर आसानी से लगाया जा सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">न्यूडिफिकेशन तकनीक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तस्वीरों को अश्लील रूप देने में इस्तेमाल हो रही है। इसके अतिरिक्त</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वॉयस क्लोनिंग तकनीक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">किसी भी व्यक्ति की आवाज की हूबहू नकल कर नकली ऑडियो संदेश तैयार करने में सक्षम है। इन तकनीकों का उपयोग कर बनाए गए नकली ऑडियो-वीडियो और तस्वीरों को </span>“<span lang="hi" xml:lang="hi">डीपफेक</span>” <span lang="hi" xml:lang="hi">कहा जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनकी पहचान करना जांच एजेंसियों के लिए भी अत्यंत कठिन होता जा रहा है । रिपोर्ट के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डीपफेक के मामलों में</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span>65 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत से अधिक पीड़ित लड़कियां</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हैं। चिंता की बात यह भी है कि दुनिया के अधिकांश देशों में ए आई के दुरुपयोग को रोकने के लिए सख्त कानून अभी तक नहीं बने हैं। बहुत कम देशों जैसे भारत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिका और ब्रिटेन में बाल शोषण से संबंधित सामग्री को देखना या रखना अपराध की श्रेणी में स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है। कानूनों की कमी के कारण इंटरनेट पर बड़ी मात्रा में डीपफेक आधारित अश्लील सामग्री तेजी से फैल रही है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एआई तकनीक निस्संदेह कंप्यूटर विज्ञान की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो मशीनों को सीखने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्णय लेने और जटिल समस्याओं को हल करने की क्षमता प्रदान करती है तथा शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य और शोध के क्षेत्र में अनेक सकारात्मक संभावनाएँ खोलती है। किंतु इसका अनियंत्रित और अनैतिक उपयोग दुनिया के मासूम बच्चों के भविष्य के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है । अतः संयुक्त राष्ट्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैश्विक संगठनों तथा सभी देशों की सरकारों को मिलकर</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ए आई के दुरुपयोग को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कठोर कानून</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बनाने और उनके प्रभावी क्रियान्वयन की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। अन्यथा विज्ञान की यही तकनीक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो मानवता के लिए वरदान बन सकती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मासूम बच्चों की खुशियों और सुरक्षित भविष्य को निगलने वाली अभिशाप सिद्ध हो सकती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अरविंद रावल</span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 08 Feb 2026 18:51:16 +0530</pubDate>
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