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                <title>भारतीय अर्थव्यवस्था - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>भारतीय अर्थव्यवस्था RSS Feed</description>
                
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                <title>स्वतन्त्रता का दिवस सुहाना, विकृतियों से मुक्त बने भारत</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">पन्द्रह अगस्त केवल ध्वजारोहण करने, राष्ट्रगान गाने और स्वतंत्रता सेनानियों को स्मरण करने का दिन नहीं है। यह आत्ममंथन का अवसर भी है कि जिस स्वतंत्रता के लिए असंख्य देशभक्तों ने अपना सर्वस्व न्यौछावर किया, उस स्वतंत्रता को हमने कितना सार्थक बनाया है और विकसित भारत के निर्माण के लिए हमें अभी कितना आगे जाना है। वर्ष 1947 में देश राजनीतिक पराधीनता से मुक्त हुआ था, लेकिन स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होगा, जब भारत सामाजिक विकृतियों, आर्थिक विषमता, अशिक्षा, भ्रष्टाचार, जातिवाद, संकीर्णता, बेरोजगारी, हिंसा और नैतिक पतन जैसी चुनौतियों से भी मुक्त हो।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">गुलामी की पीड़ा को वही</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/185285/happy-independence-day-india-should-be-free-from-distortions"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/10021511681.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">पन्द्रह अगस्त केवल ध्वजारोहण करने, राष्ट्रगान गाने और स्वतंत्रता सेनानियों को स्मरण करने का दिन नहीं है। यह आत्ममंथन का अवसर भी है कि जिस स्वतंत्रता के लिए असंख्य देशभक्तों ने अपना सर्वस्व न्यौछावर किया, उस स्वतंत्रता को हमने कितना सार्थक बनाया है और विकसित भारत के निर्माण के लिए हमें अभी कितना आगे जाना है। वर्ष 1947 में देश राजनीतिक पराधीनता से मुक्त हुआ था, लेकिन स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होगा, जब भारत सामाजिक विकृतियों, आर्थिक विषमता, अशिक्षा, भ्रष्टाचार, जातिवाद, संकीर्णता, बेरोजगारी, हिंसा और नैतिक पतन जैसी चुनौतियों से भी मुक्त हो।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">गुलामी की पीड़ा को वही समझ सकता है जिसने पराधीनता का जीवन देखा हो। हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने केवल सत्ता परिवर्तन के लिए संघर्ष नहीं किया था। उनके सामने एक ऐसे भारत का सपना था, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति सम्मान के साथ जीवन जी सके, न्याय सबको मिले, अवसर सबके लिए उपलब्ध हों और राष्ट्र अपनी पहचान तथा आत्मसम्मान के साथ विश्व में खड़ा हो। इसलिए स्वतंत्रता दिवस पर हमें केवल अतीत का गौरवगान नहीं करना चाहिए, बल्कि वर्तमान की उपलब्धियों और कमियों का निष्पक्ष मूल्यांकन भी करना चाहिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">स्वतंत्रता के बाद भारत ने अनेक क्षेत्रों में ऐसी उपलब्धियां हासिल की हैं, जिन पर प्रत्येक भारतीय को गर्व होना चाहिए। जिस देश को आजादी के समय गरीबी, अशिक्षा, खाद्यान्न संकट, कमजोर औद्योगिक आधार और सीमित संसाधनों जैसी अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा था, वही भारत आज विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। कृषि के क्षेत्र में हरित क्रांति ने देश को खाद्यान्न के लिए बाहरी निर्भरता से बाहर निकाला। सिंचाई, उर्वरक, कृषि अनुसंधान और आधुनिक तकनीक ने भारतीय कृषि को नई शक्ति दी। आज भारत कृषि उत्पादन के साथ-साथ डेयरी, मत्स्य और खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">औद्योगिक विकास ने भी स्वतंत्र भारत की तस्वीर बदली है। आज देश में इस्पात, ऑटोमोबाइल, दवा, इलेक्ट्रॉनिक्स, दूरसंचार, ऊर्जा, रक्षा उत्पादन और अनेक आधुनिक उद्योगों का व्यापक विस्तार हुआ है। बड़े-बड़े बांध, बिजली परियोजनाएं, राष्ट्रीय राजमार्ग, रेलवे नेटवर्क, बंदरगाह, हवाई अड्डे और महानगरों की आधुनिक परिवहन व्यवस्था देश की विकास यात्रा के प्रमाण हैं। कभी जिन वस्तुओं और तकनीकों के लिए भारत को दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ता था, उनमें से अनेक का निर्माण आज देश में हो रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत की अंतरिक्ष यात्रा तो स्वतंत्रता के बाद की सबसे प्रेरणादायक उपलब्धियों में से एक है। सीमित संसाधनों के साथ शुरू हुआ भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम आज उपग्रह प्रक्षेपण, दूरसंचार, मौसम पूर्वानुमान, आपदा प्रबंधन, कृषि निगरानी और वैज्ञानिक अनुसंधान से लेकर चंद्रमा तथा मंगल तक पहुंच चुका है। चंद्रयान अभियानों ने भारत की वैज्ञानिक क्षमता को विश्व के सामने स्थापित किया। चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र के निकट सफल सॉफ्ट लैंडिंग ने भारत की वैज्ञानिक प्रतिभा का नया परिचय दिया। आदित्य-एल1 जैसे मिशन भारत की बढ़ती अंतरिक्ष क्षमता का प्रमाण हैं। अब भारत केवल अंतरिक्ष में पहुंचने वाला देश नहीं है, बल्कि अंतरिक्ष विज्ञान में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाला राष्ट्र है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विज्ञान और तकनीक के साथ डिजिटल क्षेत्र में भी भारत ने असाधारण परिवर्तन देखा है। मोबाइल संचार, इंटरनेट, डिजिटल भुगतान और डिजिटल सार्वजनिक सेवाओं ने सामान्य नागरिक के जीवन को प्रभावित किया है। गांवों तक इंटरनेट और बैंकिंग सेवाओं की पहुंच बढ़ी है। डिजिटल भुगतान ने आर्थिक लेन-देन की संस्कृति बदल दी है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, रोबोटिक्स और आधुनिक विनिर्माण जैसे नए क्षेत्रों में भारत अपनी क्षमता बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यह परिवर्तन बताता है कि भारत केवल परंपरा का देश नहीं, बल्कि आधुनिक विज्ञान और तकनीक को अपनाने वाला राष्ट्र भी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">देश की सुरक्षा के क्षेत्र में भी स्वतंत्र भारत ने लंबी यात्रा तय की है। 1962, 1965 और 1971 के युद्धों से लेकर कारगिल तक भारतीय सेनाओं ने अदम्य साहस का परिचय दिया है। आज भारत की थल सेना, वायु सेना और नौसेना अत्याधुनिक तकनीक तथा स्वदेशी सैन्य उपकरणों से अपनी क्षमता बढ़ा रही हैं। स्वदेशी लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, मिसाइल प्रणालियां, युद्धपोत, पनडुब्बियां और विभिन्न रक्षा उपकरण भारत की आत्मनिर्भर रक्षा क्षमता को मजबूत कर रहे हैं। रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक उपलब्धि नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विश्व मंच पर भारत की बढ़ती साख भी स्वतंत्रता के बाद की उपलब्धियों का महत्वपूर्ण अध्याय है। भारत आज अनेक वैश्विक मंचों पर अपनी बात प्रभावशाली ढंग से रखता है। जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, वैश्विक स्वास्थ्य, ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और तकनीकी सहयोग जैसे विषयों पर भारत की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण हुई है। विश्व के अनेक देश भारत को एक बड़े बाजार के साथ-साथ जिम्मेदार और प्रभावशाली शक्ति के रूप में देखते हैं। भारतीय मूल के लोग भी दुनिया के विभिन्न देशों में अपनी प्रतिभा से भारत की प्रतिष्ठा बढ़ा रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लेकिन इन उपलब्धियों के बीच यह प्रश्न भी खड़ा होता है कि क्या विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक समान रूप से पहुंचा है? क्या हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल रही है? क्या प्रत्येक युवा को उसकी क्षमता के अनुरूप रोजगार और अवसर मिल रहे हैं? क्या गांव और शहर के बीच सुविधाओं का अंतर कम हुआ है? क्या महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित हुआ है? क्या भ्रष्टाचार, अपराध और सामाजिक भेदभाव से हम पूरी तरह मुक्त हो पाए हैं? इन प्रश्नों से आंखें मूंदना स्वतंत्रता दिवस की भावना के साथ न्याय नहीं होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विकसित राष्ट्र केवल ऊंची इमारतों, चौड़ी सड़कों और आधुनिक तकनीक से नहीं बनता। विकसित राष्ट्र की वास्तविक पहचान उसके नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता से होती है। शिक्षा उसकी पहली आधारशिला है। ऐसा शिक्षा तंत्र चाहिए जो केवल परीक्षा पास करने वाले विद्यार्थी न बनाए, बल्कि वैज्ञानिक सोच, चरित्र, संवेदनशीलता, अनुशासन और राष्ट्रबोध से संपन्न नागरिक तैयार करे। स्वास्थ्य व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें आर्थिक स्थिति किसी व्यक्ति के उपचार में बाधा न बने। गांवों में भी गुणवत्तापूर्ण अस्पताल, विद्यालय, इंटरनेट, परिवहन और रोजगार के अवसर उपलब्ध हों।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आर्थिक विकास के साथ रोजगार सृजन पर विशेष ध्यान देना होगा। भारत की युवा आबादी हमारी सबसे बड़ी शक्ति है, लेकिन यही शक्ति तभी राष्ट्रनिर्माण में बदल सकती है जब युवाओं को कौशल, शिक्षा और रोजगार के पर्याप्त अवसर मिलें। केवल सरकारी नौकरियों पर निर्भर रहने के बजाय उद्यमिता, स्टार्टअप, विनिर्माण, कृषि आधारित उद्योग, पर्यटन, सेवा क्षेत्र और नई तकनीकों में व्यापक अवसर पैदा करने होंगे। युवाओं को नौकरी खोजने वाला ही नहीं, रोजगार देने वाला बनने की दिशा में भी प्रेरित करना होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विकसित भारत का एक महत्वपूर्ण आधार सामाजिक समरसता है। जाति, भाषा, क्षेत्र और संप्रदाय के नाम पर समाज को बांटने की राजनीति देश की शक्ति को कमजोर करती है। विविधता भारत की पहचान है, लेकिन विविधता का अर्थ विभाजन नहीं होना चाहिए। हमें ऐसी राष्ट्रीय चेतना विकसित करनी होगी जिसमें व्यक्ति अपनी भाषा, परंपरा और क्षेत्रीय पहचान पर गर्व करे, लेकिन सबसे पहले स्वयं को भारतीय माने। सामाजिक न्याय का उद्देश्य समाज को स्थायी खांचों में बांटना नहीं, बल्कि वंचित व्यक्ति को आगे बढ़ने का अवसर देना होना चाहिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">साम्प्रदायिक सद्भाव भी राष्ट्र की प्रगति की अनिवार्य शर्त है। धर्म व्यक्ति की आस्था का विषय है, उसे राजनीतिक संघर्ष और सामाजिक वैमनस्य का हथियार नहीं बनने देना चाहिए। भारत की शक्ति उसकी बहुलता में है। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च और अन्य आस्था-स्थल तभी सुरक्षित रहेंगे, जब समाज में परस्पर सम्मान और विश्वास कायम रहेगा। किसी भी प्रकार की हिंसा, घृणा और अफवाह विकास की राह को रोकती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भ्रष्टाचार और राजनीतिक स्वार्थ से मुक्ति भी विकसित भारत के लिए आवश्यक है। सत्ता चाहे किसी भी दल की हो, उसका मूल उद्देश्य जनसेवा होना चाहिए। लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का माध्यम नहीं, बल्कि जनता के प्रति जवाबदेही की व्यवस्था है। राजनीतिक दलों और नेताओं को अपने आचरण से ऐसी मिसाल प्रस्तुत करनी होगी, जिससे आने वाली पीढ़ियां सार्वजनिक जीवन को सम्मान और सेवा का क्षेत्र समझें। राजनीति में विचार, सिद्धांत, त्याग और राष्ट्रहित की पुनर्स्थापना आवश्यक है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">युवाओं की भूमिका इस परिवर्तन में सबसे महत्वपूर्ण है। युवा केवल विरोध, आंदोलन या सोशल मीडिया की बहस तक सीमित न रहें। वे विज्ञान, शिक्षा, खेल, कृषि, उद्यमिता, प्रशासन, सेना, तकनीक और सामाजिक सेवा हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का उपयोग करें। नशे, हिंसा, अंधानुकरण और डिजिटल माध्यमों के दुरुपयोग से स्वयं को बचाते हुए वे राष्ट्र के निर्माण में रचनात्मक भूमिका निभा सकते हैं। जिस देश के युवाओं में अनुशासन, परिश्रम, ईमानदारी और नवाचार की भावना जाग जाती है, उस देश को आगे बढ़ने से कोई शक्ति नहीं रोक सकती।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज आवश्यकता केवल विकसित भारत का सपना देखने की नहीं, बल्कि उसके लिए राष्ट्रीय संकल्प लेने की है। हमें ऐसा भारत बनाना है जिसमें किसान समृद्ध हो, श्रमिक सम्मानित हो, युवा सक्षम हो, महिला सुरक्षित और आत्मनिर्भर हो, बच्चे शिक्षित हों, बुजुर्ग सम्मान के साथ जीवन जीएं और गरीब व्यक्ति विकास की मुख्यधारा से बाहर न रहे। हमें ऐसा भारत बनाना है जो आर्थिक रूप से शक्तिशाली होने के साथ नैतिक रूप से भी मजबूत हो।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">स्वतंत्रता का अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं है। जब तक व्यक्ति अज्ञान, भय, नशे, गरीबी, भेदभाव और अन्याय से मुक्त नहीं होता, तब तक स्वतंत्रता की यात्रा अधूरी है। इसलिए इस पन्द्रह अगस्त को तिरंगे के सामने हमें केवल देशभक्ति के नारे नहीं लगाने हैं, बल्कि अपने भीतर कर्तव्यबोध जगाना है। हमें यह संकल्प लेना है कि हम अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी समझेंगे, कानून का सम्मान करेंगे, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करेंगे, प्रकृति को बचाएंगे, सामाजिक सद्भाव बनाए रखेंगे और अपने कार्यक्षेत्र में ईमानदारी से योगदान देंगे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">स्वतंत्रता सेनानियों ने हमें आजाद भारत सौंपा था। अब विकसित, समृद्ध, सुरक्षित, शिक्षित, स्वस्थ, आत्मनिर्भर और संस्कारवान भारत अगली पीढ़ी को सौंपना हमारी जिम्मेदारी है। पन्द्रह अगस्त तभी वास्तव में सुहाना बनेगा, जब तिरंगे की ऊंचाई के साथ हमारे चरित्र की ऊंचाई भी बढ़ेगी। राष्ट्र केवल सरकारों से नहीं बनता, राष्ट्र नागरिकों के चरित्र, श्रम और संकल्प से बनता है। इसलिए इस स्वतंत्रता दिवस पर हमारा संकल्प स्पष्ट होना चाहिए कि हम भारत को केवल विकसित अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि विकसित चेतना वाला राष्ट्र बनाएंगे। यही स्वतंत्रता के अमृत पर्व की सच्ची सार्थकता होगी और यही उन अनगिनत बलिदानियों के प्रति हमारी वास्तविक श्रद्धांजलि भी होगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 19:19:20 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मोदी की 12 वर्षों की सत्ता और आम आदमी: वादे, बदलाव और ज़मीनी हकीकत</title>
                                    <description><![CDATA[<blockquote class="format1">राजीव शुक्ल-संपादक </blockquote>
<p>2014 में “अच्छे दिन आएंगे” के नारे के साथ केंद्र की सत्ता संभालने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मई 2026 तक लगातार 12 साल प्रधानमंत्री रह चुके हैं। यह भारत के स्वतंत्र इतिहास में सबसे लंबी अखंड सत्ता वाले प्रधानमंत्रियों में से एक कार्यकाल है। इस दौरान सरकार की नीतियों, योजनाओं और राजनीतिक शैली का सीधा असर आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर पड़ा है। अलग हम कल्याणकारी योजनाओं और उनके विस्तार के विषय में बात करें तो उनकी फेरहिस्त काफी लंबी है।</p>
<p><br />पिछले 12 साल में सरकार ने प्रत्यक्ष लाभ अंतरण को आधार बनाकर योजनाओं का दायरा</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181933/modis-12-years-in-power-and-common-mans-promises-change"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/images-(3).jpeg" alt=""></a><br /><blockquote class="format1">राजीव शुक्ल-संपादक </blockquote>
<p>2014 में “अच्छे दिन आएंगे” के नारे के साथ केंद्र की सत्ता संभालने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मई 2026 तक लगातार 12 साल प्रधानमंत्री रह चुके हैं। यह भारत के स्वतंत्र इतिहास में सबसे लंबी अखंड सत्ता वाले प्रधानमंत्रियों में से एक कार्यकाल है। इस दौरान सरकार की नीतियों, योजनाओं और राजनीतिक शैली का सीधा असर आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर पड़ा है। अलग हम कल्याणकारी योजनाओं और उनके विस्तार के विषय में बात करें तो उनकी फेरहिस्त काफी लंबी है।</p>
<p><br />पिछले 12 साल में सरकार ने प्रत्यक्ष लाभ अंतरण को आधार बनाकर योजनाओं का दायरा बढ़ाया। उज्ज्वला योजना के तहत करोड़ों महिलाओं को मुफ्त गैस कनेक्शन मिला। स्वच्छ भारत मिशन ने ग्रामीण शौचालय कवरेज को तेज़ी से बढ़ाया। आयुष्मान भारत योजना ने 5 लाख तक का स्वास्थ्य बीमा गरीब परिवारों तक पहुंचाया। जनधन खातों ने वित्तीय समावेशन को बढ़ाया और कोविड काल में डीबीटी से करोड़ों लोगों को सीधी मदद मिली। </p>
<p><br />आम आदमी के लिए इसका मतलब यह हुआ कि सरकारी लाभ के लिए बिचौलियों पर निर्भरता घटी। बैंकिंग और डिजिटल पेमेंट का दायरा बढ़ा, जिससे UPI आज छोटे दुकानदार से लेकर ठेले वाले तक इस्तेमाल कर रहे हैं।</p>
<p><br />                हम बात करें इंफ्रास्ट्रक्चर और डिजिटल भारत की तो इसमें भी प्रगति हुई है और कई सुधार अभी भी बाकी हैं। सड़क, रेल, हवाई अड्डे और एक्सप्रेसवे के निर्माण में तेज़ी आई। दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे, अटल टनल, और नए वंदे भारत ट्रेनें आम यात्रियों के सफर को तेज़ और सुरक्षित बनाने की कोशिश हैं। डिजिटल इंडिया के तहत इंटरनेट और स्मार्टफोन की पहुंच गांवों तक बढ़ी। इससे शिक्षा, बैंकिंग और सरकारी सेवाएं मोबाइल पर आ गईं।</p>
<p><br />आम आदमी के लिए इसका फायदा समय की बचत और लागत में कमी के रूप में दिखा। लेकिन ग्रामीण इलाकों में अभी भी इंटरनेट की गुणवत्ता और बिजली की आपूर्ति असमान बनी हुई है। हालांकि कर और अर्थव्यवस्था में बदलाव तो हुआ है लेकिन महंगाई के कारण अभी उतनी राहत महसूस नहीं हुई है । GST लागू होने से अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था एकजुट हुई। छोटे व्यापारियों के लिए शुरू में जटिलता बढ़ी, लेकिन धीरे-धीरे फाइलिंग आसान हुई। नोटबंदी 2016 का मकसद काला धन और नकली नोट पर चोट था, लेकिन इसका तत्काल असर छोटे कारोबार और दिहाड़ी मजदूरों पर पड़ा। महंगाई, बेरोजगारी और निजी निवेश की रफ्तार आम आदमी की सबसे बड़ी चिंता बनी रही। कोरोना के बाद रिकवरी तेज़ रही, लेकिन असंगठित क्षेत्र में रोज़गार और आय अभी भी पूरी तरह पटरी पर नहीं आई है।</p>
<p><br /> राजनीतिक संवाद और छवि की बात की जाये तो इसमें मोदी सरकार का कोई जोड़ नहीं है। मोदी की सरकार ने सीधे संवाद पर ज़ोर दिया। मन की बात, सोशल मीडिया और रैलियों के ज़रिए प्रधानमंत्री खुद जनता से जुड़े रहे। “सबका साथ, सबका विकास” का नारा केंद्र में रहा। विरोधियों का आरोप रहा कि आलोचना को जगह कम मिली और मीडिया पर नियंत्रण बढ़ा। आम आदमी के लिए इसका असर यह हुआ कि सरकार की योजनाओं की जानकारी तेज़ी से पहुंची, लेकिन विपरीत राय और स्थानीय समस्याएं कई बार राष्ट्रीय बहस में जगह नहीं बना पाईं।</p>
<p><br /> अलग हम इसकी ज़मीनी हकीकत जानें और यह पता करें कि क्या बदला? तो 12 साल में सबसे बड़ा बदलाव यह है कि सरकार सीधे नागरिक तक पहुंचने की कोशिश कर रही है। पहले जहां फाइलों और दफ्तरों में काम अटकता था, अब ऑनलाइन पोर्टल और ऐप्स से काम होता है। गरीबों के लिए रसोई गैस, शौचालय, बिजली और बैंक खाता पहले से ज्यादा सुलभ हुए हैं। दूसरी तरफ, महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की आय और शिक्षा-स्वास्थ्य की गुणवत्ता जैसे मुद्दे अभी भी चुनौती हैं। मध्यम वर्ग टैक्स और जीवनयापन की लागत को लेकर दबाव महसूस करता है। ग्रामीण भारत में कृषि पर निर्भरता और मौसम की मार अब भी जीवन को अनिश्चित रखती है।</p>
<p>मोदी की 12 साल की सत्ता ने आम आदमी की ज़िंदगी में बुनियादी सुविधाओं और डिजिटल पहुंच के मामले में ठोस बदलाव लाए हैं। योजनाओं का लाभ पहले से ज्यादा पारदर्शी हुआ है। लेकिन रोज़गार, महंगाई और असमानता जैसे संरचनात्मक मुद्दे बने हुए हैं। आम आदमी के लिए यह कार्यकाल सुविधाओं में बढ़ोतरी और आर्थिक दबाव दोनों का मिश्रण रहा है। 2026 की सियासत इस बात पर टिकी होगी कि क्या सरकार इन बदलावों को स्थायी रोज़गार और आय में बदल पाती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 17:41:57 +0530</pubDate>
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                <title>पश्चिम एशिया में युद्ध के प्रभाव से निबटना भारतीयों की चुनौती </title>
                                    <description><![CDATA[<blockquote class="format1">राजीव शुक्ल-संपादक </blockquote>
<p style="text-align:justify;">युद्ध कोई भी हो उसका नुकसान तो सभी को उठाना पड़ता है। पिछले कुछ महीनों से पश्चिम एशिया में फैली अंशाति का खामियाजा पूरे विश्व को उठाना पड़ रहा है। हम बात कर रहे हैं इजराइल और हमास के मध्य चल रहे युद्ध की जिसमें दुनियां के साथ साथ भारत की भी चिंता बढ़ती जा रही है। व्यापार टूट रहा है महंगाई बढ़ती जा रही है, इस पर कोई देश कंट्रोल नहीं कर पा रहा है। पश्चिम एशिया दशकों से अस्थिरता का केंद्र रहा है, लेकिन 2023 के बाद से इज़राइल-हमास, इज़राइल-हिज़बुल्लाह और इज़राइल-ईरान के बीच बढ़ा टकराव</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181931/challenge-of-indians-to-deal-with-the-impact-of-war"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hq720-(1).jpg" alt=""></a><br /><blockquote class="format1">राजीव शुक्ल-संपादक </blockquote>
<p style="text-align:justify;">युद्ध कोई भी हो उसका नुकसान तो सभी को उठाना पड़ता है। पिछले कुछ महीनों से पश्चिम एशिया में फैली अंशाति का खामियाजा पूरे विश्व को उठाना पड़ रहा है। हम बात कर रहे हैं इजराइल और हमास के मध्य चल रहे युद्ध की जिसमें दुनियां के साथ साथ भारत की भी चिंता बढ़ती जा रही है। व्यापार टूट रहा है महंगाई बढ़ती जा रही है, इस पर कोई देश कंट्रोल नहीं कर पा रहा है। पश्चिम एशिया दशकों से अस्थिरता का केंद्र रहा है, लेकिन 2023 के बाद से इज़राइल-हमास, इज़राइल-हिज़बुल्लाह और इज़राइल-ईरान के बीच बढ़ा टकराव इस क्षेत्र को एक बड़े युद्ध की कगार पर ले आया है। भारत के लिए यह सिर्फ एक भौगोलिक दूरी की खबर नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">पश्चिम एशिया भारत की ऊर्जा सुरक्षा, 90 लाख से ज्यादा प्रवासी भारतीयों की रोज़ी-रोटी और खाड़ी देशों से व्यापार का सीधा जुड़ाव रखता है। ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा असर पड़ रहा है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 85% आयात करता है। इसमें से 50% से ज्यादा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है - सऊदी अरब, UAE, इराक, ईरान और कुवैत मुख्य आपूर्तिकर्ता हैं। जब भी होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ता है, तेल की कीमतें उछलती हैं। 2024-2025 में इज़राइल-ईरान मिसाइल हमलों के दौरान ब्रेंट क्रूड $90 पार कर गया था। भारत के लिए इसका मतलब है महंगा पेट्रोल-डीजल, बढ़ती महंगाई और चालू खाते के घाटे पर दबाव। एयर इंडिया, इंडिगो जैसी एयरलाइनों का खर्च बढ़ता है, जिसका असर हवाई किराए पर पड़ता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />             इस अशांति से 90 लाख भारतीयों का भविष्य दांव पर लग गया है। सरकार बहुत कुछ सोच रही है लेकिन स्थिति उसके नियंत्रण से बाहर है।यूएई, सऊदी अरब, कतर, कुवैत और ओमान में 90 लाख से ज्यादा भारतीय काम करते हैं। ये हर साल 35-40 बिलियन डॉलर की रेमिटेंस भारत भेजते हैं। युद्ध बढ़ने पर दो तरह का खतरा है। पहला, अगर खाड़ी देश युद्ध में खिंचे तो वहां नौकरियां घटेंगी और भारतीयों की वापसी शुरू होगी। 1990 में खाड़ी युद्ध के समय 1.5 लाख भारतीयों को एयरलिफ्ट करना पड़ा था।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरा, अगर ईरान-इज़राइल संघर्ष बढ़ा तो ईरान में 4000 और इज़राइल में 18,000 भारतीयों की सुरक्षा बड़ी चुनौती बनेगी। भारत ने ऑपरेशन अजय और ऑपरेशन अजेय के जरिए पहले भी नागरिकों को निकाला है, लेकिन बड़े पैमाने पर निकासी लॉजिस्टिक रूप से जटिल है। युद्ध के कारण व्यापार और निवेश की रफ्तार धीमी पड़ रही है। यूएई और सऊदी अरब भारत के टॉप 5 व्यापारिक साझेदार हैं। I2U2 और IMEC कॉरिडोर जैसी परियोजनाएं पश्चिम एशिया को भारत से जोड़ने के लिए बनी थीं। लेकिन युद्ध के माहौल में निवेश रुक जाता है। लाल सागर में हूती हमलों के बाद शिपिंग बीमा महंगा हुआ और भारत-यूरोप व्यापार पर असर पड़ा। अगर सूएज नहर या होर्मुज बंद हुआ तो भारत का 80% विदेशी व्यापार प्रभावित होगा।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />भारत की पश्चिम एशिया नीति हमेशा "संतुलन" पर टिकी रही है। भारत इज़राइल से रक्षा और तकनीक लेता है, अरब देशों से तेल और निवेश, और ईरान से चाबहार पोर्ट के जरिए मध्य एशिया तक पहुंच चाहता है। वर्तमान युद्ध ने इस संतुलन को कठिन बना दिया है। एक तरफ चुनना पड़ा तो भारत के आर्थिक हित प्रभावित होंगे। इसलिए भारत ने यूएन में शांति की अपील की है, लेकिन सीधे किसी पक्ष का खुलकर समर्थन नहीं किया। ये तटस्थता कूटनीतिक तौर पर जरूरी है, लेकिन घरेलू राजनीति में इसकी आलोचना भी होती है। इस युद्ध का असर घरेलू राजनीति और सामाजिक स्तर पर भी पड़ रहा है। पश्चिम एशिया का युद्ध भारत में धार्मिक और राजनीतिक बहस को भी प्रभावित करता है। फिलिस्तीन और इज़राइल पर भारत के रुख को लेकर सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक ध्रुवीकरण दिखता है। इसके अलावा, अगर तेल 120 डॉलर पार गया तो भारत सरकार को सब्सिडी बढ़ानी पड़ेगी या महंगाई झेलनी पड़ेगी। दोनों ही स्थिति में आम आदमी की जेब पर असर पड़ता है। भारत सरकार इस मुद्दे पर चर्चा कर रही है कि भारत के पास क्या विकल्प हैं? रणनीतिक तेल भंडार : भारत ने पहले ही 5.33 मिलियन टन का भंडार बना रखा है, जो 9-10 दिन चल सकता है। इसे बढ़ाने की जरूरत है। वैकल्पिक स्रोत : रूस, अमेरिका और अफ्रीका से तेल आयात बढ़ाकर पश्चिम एशिया पर निर्भरता कम करना। निकासी योजना: खाड़ी देशों में भारतीय दूतावासों को हाई अलर्ट पर रखना और नौसेना की तत्परता बढ़ाना।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />कूटनीतिक सक्रियता: भारत G20 और BRICS के मंच पर युद्ध रोकने के लिए आवाज उठा सकता है। पश्चिम एशिया में युद्ध भारत के लिए दूर का युद्ध नहीं है। ये हमारे रसोई गैस के दाम, खाड़ी में काम करने वाले भाई-बहन की नौकरी और रुपये की कीमत से जुड़ा है। भारत की ताकत ये है कि वो अब भी अरब देशों, इज़राइल और ईरान तीनों से बात कर सकता है। लेकिन अगर युद्ध लंबा खिंचा तो इस संतुलन को बचाना सबसे बड़ी चुनौती होगी। आम भारतीय के लिए इसका मतलब है अगले 6-12 महीने महंगाई और अनिश्चितता के साथ जीना।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 17:36:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मोदी सरकार में वो समस्याएं जो अभी तक नहीं सुधरीं</title>
                                    <description><![CDATA[<blockquote class="format1"><strong>राजीव शुक्ल-संपादक </strong></blockquote>
<p style="text-align:justify;">इस बात में कोई दो राय नहीं है कि 2014 के बाद से अब तक भारत ने काफी तरक्की की है लेकिन इसमें यह भी है कि अभी तक बहुत सी ऐसी समस्याएं हैं जिनमें सुधार होना बाकी है। 2014 से 2026 तक 12 साल की सत्ता में मोदी सरकार ने योजनाओं, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक छवि पर काम किया। लेकिन कुछ संरचनात्मक समस्याएं ऐसी हैं जो चुनावी नारों और सरकारी रिपोर्टों के बावजूद ज़मीन पर बनी हुई हैं। ये समस्याएं आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से सीधे जुड़ती हैं। इसमें सबसे पहले आती है बेरोज़गारी और</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181929/those-problems-which-have-not-been-improved-yet-in-modi"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/images-(2).jpeg" alt=""></a><br /><blockquote class="format1"><strong>राजीव शुक्ल-संपादक </strong></blockquote>
<p style="text-align:justify;">इस बात में कोई दो राय नहीं है कि 2014 के बाद से अब तक भारत ने काफी तरक्की की है लेकिन इसमें यह भी है कि अभी तक बहुत सी ऐसी समस्याएं हैं जिनमें सुधार होना बाकी है। 2014 से 2026 तक 12 साल की सत्ता में मोदी सरकार ने योजनाओं, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक छवि पर काम किया। लेकिन कुछ संरचनात्मक समस्याएं ऐसी हैं जो चुनावी नारों और सरकारी रिपोर्टों के बावजूद ज़मीन पर बनी हुई हैं। ये समस्याएं आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से सीधे जुड़ती हैं। इसमें सबसे पहले आती है बेरोज़गारी और अनौपचारिक क्षेत्र की अस्थिरता।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि बेरोजगारी को कम करने के लिए सरकार ने बहुत प्रयास किए हैं लेकिन अभी कई प्रयास करने वाकी हैं। सरकारी आंकड़े कहते हैं कि बेरोज़गारी दर 2017 के मुकाबले घटी है। लेकिन हकीकत में समस्या की प्रकृति बदली है। गुणवत्तापूर्ण रोज़गार की कमी भारतीयों को खल रही है। हर साल 1.2 करोड़ युवा श्रम बाजार में आते हैं, लेकिन प्राइवेट सेक्टर में वेतन बढ़ोतरी धीमी है। आईटी और स्टार्टअप में छंटनी ने मिडिल क्लास की चिंता बढ़ाई है। अनौपचारिक क्षेत्र पर असर: नोटबंदी, GST और कोविड के बाद छोटे दुकानदार, ठेले वाले और दिहाड़ी मजदूर पूरी तरह उभर नहीं पाए। CMIE और NSSO के सर्वे बताते हैं कि स्वरोज़गार बढ़ा है, लेकिन ये ज़्यादातर मजबूरी का स्वरोज़गार है। कृषि संकट और किसान की आय के लिए बहुत समय से बात चल रही है लेकिन अभी तक इस पर कोई ठोस नीति नहीं बन सकी है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />2016 में सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य रखा था। 2026 तक वो लक्ष्य पूरा नहीं हुआ। MSP की सीमित पहुंच : सिर्फ गेहूं-धान के किसान ही MSP का फायदा ले पाते हैं। दाल, तिलहन, फल-सब्जी वाले किसान मंडी के भाव पर निर्भर हैं। कर्ज और जलवायु जोखिम: को लेकर किसान हमेशा से परेशान रहा है। फसल बीमा योजना ने कुछ राहत दी, लेकिन अतिवृष्टि, सूखा और आवारा पशु की समस्या बनी हुई है। तीन कृषि कानूनों के विरोध के बाद सरकार बैकफुट पर आ गई और बड़े कृषि सुधार रुके हुए हैं।<br />              शिक्षा और स्वास्थ्य में गुणवत्ता का अंतर</p>
<p style="text-align:justify;"><br />शिक्षा: NEP 2020 ने ढांचा बदला, लेकिन सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी, ड्रॉपआउट रेट और लर्निंग आउटकम अब भी कमजोर हैं। ASER रिपोर्ट लगातार बताती है कि कक्षा 5 का बच्चा कक्षा 2 का पाठ नहीं पढ़ पाता। इसी तरह स्वास्थ्य: आयुष्मान भारत ने कवरेज बढ़ाया, लेकिन ग्रामीण इलाकों में डॉक्टर, नर्स और दवाओं की कमी है। निजी अस्पताल महंगे हैं, और आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च भारत में अब भी GDP का 50% से ज्यादा है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />महंगाई का मध्यम वर्ग पर दबाव बहुत बढ़ता जा रहा है। तेल, सब्जी, दाल और किराये की कीमतों में उछाल ने मध्यम वर्ग को सबसे ज्यादा प्रभावित किया। सरकार ने टैक्स स्लैब बदले, लेकिन प्रत्यक्ष कर का बोझ अब भी वेतनभोगी वर्ग पर ज्यादा है।  <br />कोर महंगाई भले नियंत्रण में रही हो, लेकिन खाद्य महंगाई 2022-2024 में दो बार 10% पार कर गई। RBI के बार-बार रेपो रेट बढ़ाने से EMI बढ़ी और घर खरीदना मुश्किल हुआ। नौकरशाही और भ्रष्टाचार की जड़ें मजबूत हो रहीं हैं। DBT और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने बिचौलियों को कम किया, लेकिन ज़मीन-रजिस्ट्री, पुलिस, म्यूनिसिपल सर्विस में भ्रष्टाचार खत्म नहीं हुआ। विपक्ष का आरोप है कि ED, CBI जैसी एजेंसियों का राजनीतिक इस्तेमाल बढ़ा है। वहीं सरकार कहती है कि भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई हो रही है। नतीजा ये है कि आम आदमी का भरोसा सिस्टम पर आंशिक ही बहाल हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />सामाजिक ध्रुवीकरण और संवाद की कमी पिछले 12 साल में धार्मिक और क्षेत्रीय मुद्दे राष्ट्रीय बहस में हावी रहे। इससे विकास और रोज़गार जैसे मुद्दे कई बार बैकसीट पर चले गए। मीडिया और सिविल सोसाइटी का स्पेस सिकुड़ने की शिकायत विपक्ष और पत्रकार संगठनों से आती रही है। सरकार का पक्ष है कि फेक न्यूज़ और अस्थिरता रोकने के लिए नियम जरूरी हैं। राज्य-केंद्र संबंध और संघीय ढांचा<br />GST लागू होने के बाद राज्यों को मुआवज़ा देने का वादा 2022 में खत्म हो गया। अब कई राज्य कहते हैं कि उनका फिस्कल स्पेस सिकुड़ गया है।  केंद्रीय योजनाओं के नाम पर राज्यों की भूमिका सीमित हो गई है, जिससे संघीय संतुलन पर सवाल उठते हैं।  सुधार हुआ, पर असमान गति से मोदी सरकार ने बुनियादी सुविधाओं, डिजिटल ट्रांजैक्शन और इंफ्रास्ट्रक्चर में ठोस काम किया है। उज्ज्वला, जनधन, सड़क, रेल और UPI इसका उदाहरण हैं। लेकिन रोज़गार की गुणवत्ता, कृषि आय, शिक्षा-स्वास्थ्य की ग्राउंड लेवल क्वालिटी, और महंगाई जैसी समस्याएं अभी भी सिस्टम की कमज़ोरी दिखाती हैं। 2026 तक सरकार की सबसे बड़ी चुनौती ये है कि वो कल्याणकारी योजनाओं के साथ-साथ प्रोडक्टिविटी और प्राइवेट इन्वेस्टमेंट को भी तेज़ करे, ताकि ये समस्याएं चुनावी मुद्दे बनकर न रह जाएं बल्कि हल हों।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 17:33:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व के 12 वर्ष पूर्ण होने पर अभिनंदन समारोह आयोजि</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
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<div style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली। </strong>इंद्रप्रस्थ पुनर्जागरण ट्रस्ट द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के 12 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर नई दिल्ली स्थित संविधान क्लब के उपाध्यक्ष सभागार एनेक्सी में अभिनंदन एवं शुभकामना समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में सामाजिक, धार्मिक और सार्वजनिक जीवन से जुड़े अनेक गणमान्य नागरिकों ने भाग लिया।</div>
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<div style="text-align:justify;">समारोह में चांदनी चौक के सांसद प्रवीण खंडेलवाल मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। वहीं नई दिल्ली नगर परिषद एनडीएमसी के सदस्य दिनेश प्रताप सिंह विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए। कार्यक्रम में नवश्री धार्मिक लीला समिति, लालकिला के महामंत्री प्रकाश बैराठी तथा विश्व हिंदू परिषद,</div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181423/congratulatory-ceremony-organized-on-completion-of-12-years-of-prime"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/img-20260617-wa0003.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
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<div style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली। </strong>इंद्रप्रस्थ पुनर्जागरण ट्रस्ट द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के 12 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर नई दिल्ली स्थित संविधान क्लब के उपाध्यक्ष सभागार एनेक्सी में अभिनंदन एवं शुभकामना समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में सामाजिक, धार्मिक और सार्वजनिक जीवन से जुड़े अनेक गणमान्य नागरिकों ने भाग लिया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">समारोह में चांदनी चौक के सांसद प्रवीण खंडेलवाल मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। वहीं नई दिल्ली नगर परिषद एनडीएमसी के सदस्य दिनेश प्रताप सिंह विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए। कार्यक्रम में नवश्री धार्मिक लीला समिति, लालकिला के महामंत्री प्रकाश बैराठी तथा विश्व हिंदू परिषद, इंद्रप्रस्थ प्रांत के प्रांत मंत्री सुरेंद्र गुप्ता भी मौजूद रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता सुरेंद्र गुप्ता ने की।अपने संबोधन में प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले 12 वर्षों के दौरान देश में आधारभूत संरचना, अर्थव्यवस्था और विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय विकास हुआ है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई है।अध्यक्षीय संबोधन में सुरेंद्र गुप्ता ने सामाजिक जागरूकता, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्र निर्माण जैसे विषयों पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने समाज की सुरक्षा और सहायता के लिए संचालित हिंदू हेल्पलाइन की जानकारी दी। साथ ही दिल्ली के ऐतिहासिक महत्व और इंद्रप्रस्थ की अवधारणा पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि देश विकास के साथ-साथ सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;">कार्यक्रम में बड़ी संख्या में प्रबुद्ध नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। वक्ताओं ने राष्ट्र निर्माण में जनभागीदारी और सामाजिक दायित्वों के निर्वहन की आवश्यकता पर बल दिया।समारोह के अंत में इंद्रप्रस्थ पुनर्जागरण ट्रस्ट की ओर से सभी अतिथियों और उपस्थित लोगों का आभार व्यक्त किया गया। कार्यक्रम के आयोजन में ट्रस्ट के संयोजक सुशांत अग्रवाल,सह-संयोजक हर्ष कप्तान तथा सह-संयोजक गरिमा बंसल की महत्वपूर्ण भूमिका रही।</div>
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<div class="eqJbab cZD3Qb"></div>
</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 17 Jun 2026 20:08:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बढ़ती कीमतों से बिगड़ी मध्यवर्गीय सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">मानवी अहंकार के परिणाम स्वरूप अमेरिका ईरान इजरायल और यूक्रेन रूस युद्ध के चलते पेट्रोलियम पदार्थों के दाम लगभग विश्व के हर देश में बढ़ गए हैं। इसी परिपेक्ष में भारत में भी बढ़ते पेट्रोल डीजल के दामों के करण भारतीय मध्यम वर्गीय अर्थव्यवस्था तथा सामाजिक संरचना बृहद रूप में प्रभावित हुई है । विश्व स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, युद्धों और शक्ति-संघर्षों का सबसे अधिक प्रभाव आम नागरिकों पर पड़ता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका-ईरान तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध तथा मध्य-पूर्व में इजरायल से जुड़े संघर्षों ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को अस्थिर कर दिया है। पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में हुई वृद्धि ने</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180351/middle-class-socio-economic-system-deteriorated-due-to-rising-prices"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/images-(1)2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मानवी अहंकार के परिणाम स्वरूप अमेरिका ईरान इजरायल और यूक्रेन रूस युद्ध के चलते पेट्रोलियम पदार्थों के दाम लगभग विश्व के हर देश में बढ़ गए हैं। इसी परिपेक्ष में भारत में भी बढ़ते पेट्रोल डीजल के दामों के करण भारतीय मध्यम वर्गीय अर्थव्यवस्था तथा सामाजिक संरचना बृहद रूप में प्रभावित हुई है । विश्व स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, युद्धों और शक्ति-संघर्षों का सबसे अधिक प्रभाव आम नागरिकों पर पड़ता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका-ईरान तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध तथा मध्य-पूर्व में इजरायल से जुड़े संघर्षों ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को अस्थिर कर दिया है। पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में हुई वृद्धि ने लगभग प्रत्येक देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा। पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की बढ़ती कीमतों ने विशेष रूप से भारतीय मध्यम वर्ग की आर्थिक और सामाजिक संरचना को गहरे स्तर पर प्रभावित किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में वृद्धि का सीधा प्रभाव घरेलू बाजार पर पड़ता है। पेट्रोल और डीजल केवल वाहन चलाने के साधन नहीं हैं, बल्कि वे संपूर्ण आर्थिक गतिविधियों की रीढ़ हैं। परिवहन, कृषि, उद्योग, व्यापार और सेवा क्षेत्र लगभग सभी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इन पर निर्भर हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">डीजल की कीमतों में वृद्धि का सबसे अधिक प्रभाव परिवहन क्षेत्र पर पड़ता है। देश में अधिकांश माल ढुलाई ट्रकों के माध्यम से होती है। जब डीजल महंगा होता है, तो परिवहन लागत बढ़ जाती है। इसका परिणाम यह होता है कि खाद्यान्न, फल-सब्जियां, दूध, दालें, निर्माण सामग्री और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की कीमतें स्वतः बढ़ने लगती हैं। व्यापारी अतिरिक्त लागत का भार अंततः उपभोक्ताओं पर डाल देते हैं। इस प्रकार महंगाई का एक ऐसा चक्र प्रारंभ हो जाता है, जिससे सामान्य नागरिक बच नहीं पाता।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय मध्यम वर्ग पहले से ही शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और रोजगार संबंधी चुनौतियों से जूझ रहा है। पेट्रोलियम उत्पादों की बढ़ती कीमतों ने उसकी मासिक आय और व्यय के संतुलन को और बिगाड़ दिया है। जिन परिवारों के पास निजी वाहन हैं, उनके लिए कार्यालय, विद्यालय और अन्य आवश्यक यात्राओं का खर्च बढ़ गया है। वहीं रसोई गैस की कीमतों में वृद्धि ने घरेलू बजट को प्रभावित किया है। परिणामस्वरूप परिवारों को अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओं के बीच समझौता करना पड़ रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">महंगाई का सामाजिक प्रभाव भी कम गंभीर नहीं है। जब आय स्थिर हो और खर्च लगातार बढ़ता जाए, तो परिवारों में तनाव बढ़ने लगता है। आर्थिक दबाव पारिवारिक संबंधों, सामाजिक सहभागिता और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। मध्यम वर्ग, जो समाज की स्थिरता और विकास का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है, स्वयं असुरक्षा और भविष्य की चिंताओं से घिर जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">कृषि क्षेत्र भी इससे प्रभावित हुआ है। डीजल से चलने वाले पंप, ट्रैक्टर और कृषि यंत्रों की लागत बढ़ने से खेती महंगी हो गई है। उत्पादन लागत बढ़ने पर किसान अपनी उपज का उचित मूल्य चाहते हैं, जिससे बाजार में खाद्य पदार्थों की कीमतों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इस प्रकार महंगाई का प्रभाव खेत से लेकर थाली तक दिखाई देता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अर्थशास्त्री लंबे समय से कहते रहे हैं कि ऊर्जा की कीमतें किसी भी अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण संकेतक होती हैं। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री और प्रसिद्ध अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह ने अनेक अवसरों पर ऊर्जा सुरक्षा को आर्थिक स्थिरता के लिए आवश्यक बताया था। वहीं अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने भी विकास को केवल आय वृद्धि नहीं बल्कि जीवन-स्तर की गुणवत्ता से जोड़कर देखा है। यदि बढ़ती महंगाई लोगों की बुनियादी आवश्यकताओं को प्रभावित करती है, तो विकास का वास्तविक लाभ समाज तक नहीं पहुंच पाता।</p>
<p style="text-align:justify;">आज आवश्यकता इस बात की है कि वैश्विक स्तर पर युद्ध और संघर्ष की राजनीति के स्थान पर संवाद और सहयोग को बढ़ावा दिया जाए। साथ ही भारत को वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों, सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था और ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में और अधिक प्रयास करने होंगे। सौर ऊर्जा, जैव ईंधन और विद्युत वाहनों को बढ़ावा देकर पेट्रोलियम पर निर्भरता कम की जा सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">बढ़ती पेट्रोलियम कीमतें केवल आर्थिक समस्या नहीं हैं, बल्कि वे सामाजिक स्थिरता और जीवन की गुणवत्ता से भी जुड़ी हुई हैं। युद्धों और वैश्विक तनावों की कीमत अंततः आम नागरिक चुकाता है। इसलिए विश्व शांति, ऊर्जा सुरक्षा और संतुलित आर्थिक नीतियां ही मध्यम वर्ग को राहत प्रदान कर सकती हैं। जब तक पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों पर नियंत्रण नहीं होगा, तब तक महंगाई का दबाव भारतीय मध्यम वर्ग की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था को प्रभावित करता रहेगा।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 30 May 2026 22:43:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वैश्विक आर्थिक अस्थिरता के दौर में, भारत क्यों बना हुआ है मजबूत?</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दुनिया इस समय आर्थिक अनिश्चितता के ऐसे दौर से गुजर रही है जिसमें युद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्जा संकट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महंगाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यापारिक अस्थिरता और राजनीतिक तनाव एक साथ वैश्विक व्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं। पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को चिंता में डाल दिया है। तेल और गैस की कीमतों में लगातार वृद्धि हो रही है। समुद्री व्यापार मार्गों पर संकट गहराता जा रहा है। उत्पादन लागत बढ़ रही है और इसका प्रभाव गरीब तथा विकासशील देशों पर सबसे अधिक दिखाई दे रहा है। ऐसे समय में विश्व बैंक ने चेतावनी दी है</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180129/why-india-remains-strong-in-times-of-global-economic-instability"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/economy.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दुनिया इस समय आर्थिक अनिश्चितता के ऐसे दौर से गुजर रही है जिसमें युद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्जा संकट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महंगाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यापारिक अस्थिरता और राजनीतिक तनाव एक साथ वैश्विक व्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं। पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को चिंता में डाल दिया है। तेल और गैस की कीमतों में लगातार वृद्धि हो रही है। समुद्री व्यापार मार्गों पर संकट गहराता जा रहा है। उत्पादन लागत बढ़ रही है और इसका प्रभाव गरीब तथा विकासशील देशों पर सबसे अधिक दिखाई दे रहा है। ऐसे समय में विश्व बैंक ने चेतावनी दी है कि यदि यह संकट लंबा चला तो वैश्विक विकास दर में भारी गिरावट आ सकती है। इसके बावजूद भारत को दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल माना जा रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व बैंक की हालिया रिपोर्ट के अनुसार 2026 में ऊर्जा कीमतों में लगभग 24 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान लगाया गया है। यह वृद्धि केवल सामान्य बाजार कारणों से नहीं बल्कि युद्ध और आपूर्ति संकट से जुड़ी हुई है। होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया के समुद्री कच्चे तेल व्यापार का लगभग 35 प्रतिशत गुजरता है। इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने से तेल आपूर्ति प्रभावित हुई है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से ऊपर गई हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि संघर्ष और लंबा खिंचता है तो ब्रेंट तेल की औसत कीमत 115 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्जा संकट का असर केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता। इससे परिवहन महंगा होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्योगों की लागत बढ़ती है और खाद्य पदार्थों की कीमतें भी ऊपर चली जाती हैं। विश्व बैंक के अनुसार उर्वरकों की कीमतों में 31 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है। यूरिया की कीमतों में लगभग 60 प्रतिशत उछाल का अनुमान व्यक्त किया गया है। इससे कृषि उत्पादन प्रभावित होगा और दुनिया में खाद्य संकट गहरा सकता है। विश्व खाद्य कार्यक्रम ने चेतावनी दी है कि यदि हालात नहीं सुधरे तो लगभग 45 मिलियन अतिरिक्त लोग खाद्य असुरक्षा की स्थिति में पहुंच सकते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यूरोप की स्थिति भी चिंता पैदा कर रही है। यूरोपीय आयोग ने अनुमान लगाया है कि 2026 में यूरो क्षेत्र की विकास दर घटकर लगभग 0.9 प्रतिशत रह सकती है। बढ़ती महंगाई के कारण ब्याज दरों में वृद्धि की संभावना है। इससे उद्योगों में निवेश कम होगा और उपभोक्ता खर्च भी प्रभावित होगा। यूरोप पहले ही ऊर्जा आयात पर काफी निर्भर रहा है और पश्चिम एशिया संकट ने उसकी कठिनाइयों को और बढ़ा दिया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अफ्रीका के कई देशों में भी हालात चुनौतीपूर्ण होते जा रहे हैं। अफ्रीकी विकास बैंक ने कहा है कि ईंधन और खाद्य कीमतों में वृद्धि के कारण 2026 में अफ्रीका की आर्थिक वृद्धि धीमी पड़ सकती है। कई गरीब देशों पर पहले से भारी कर्ज है और अब बढ़ती महंगाई ने उनकी वित्तीय स्थिति को और कमजोर कर दिया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन वैश्विक चुनौतियों के बीच भारत की स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत मानी जा रही है। विश्व बैंक ने भारत की विकास दर 6.6 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है। यह दर दुनिया की अधिकांश बड़ी अर्थव्यवस्थाओं से कहीं अधिक है। भारत की मजबूती का सबसे बड़ा कारण उसकी घरेलू मांग है। देश की बड़ी आबादी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बढ़ता मध्यम वर्ग और सेवा क्षेत्र की तेजी भारतीय अर्थव्यवस्था को सहारा दे रहे हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत में पिछले कुछ वर्षों में डिजिटल भुगतान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आधारभूत संरचना और विनिर्माण क्षेत्र में तेज निवेश हुआ है। सरकार ने सड़क</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बंदरगाह और हवाई अड्डों के विकास पर बड़े स्तर पर खर्च किया है। इससे रोजगार के अवसर बढ़े हैं और आर्थिक गतिविधियों को गति मिली है। दूसरी ओर सेवा क्षेत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशेषकर सूचना प्रौद्योगिकी और वित्तीय सेवाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विदेशी मुद्रा कमाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हालांकि भारत पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। यदि तेल की कीमतें लगातार ऊंची बनी रहती हैं तो इसका सीधा असर भारत के आयात बिल पर पड़ेगा। इससे व्यापार घाटा बढ़ सकता है और रुपये पर दबाव आ सकता है। महंगाई बढ़ने पर आम जनता की क्रय शक्ति प्रभावित होगी। परिवहन महंगा होने से खाद्य पदार्थों और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ेंगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय रिजर्व बैंक के सामने भी कठिन चुनौती होगी। यदि महंगाई बढ़ती है तो ब्याज दरें ऊंची रखनी पड़ सकती हैं। इससे उद्योगों को महंगा कर्ज मिलेगा और निवेश की गति धीमी हो सकती है। दूसरी ओर यदि ब्याज दरें कम रखी जाती हैं तो महंगाई नियंत्रण से बाहर जा सकती है। इसलिए संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व बैंक ने यह भी कहा है कि दक्षिण एशिया की विकास दर 2026 में घटकर लगभग 6.3 प्रतिशत रह सकती है। इसका कारण यह है कि दक्षिण एशियाई देश ऊर्जा आयात पर बहुत अधिक निर्भर हैं। तेल की कीमतें बढ़ने से इन देशों की आर्थिक स्थिति प्रभावित होगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत ने इस चुनौती से निपटने के लिए ऊर्जा स्रोतों में विविधता बढ़ाने की दिशा में काम तेज किया है। सौर ऊर्जा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पवन ऊर्जा और हरित हाइड्रोजन परियोजनाओं पर तेजी से निवेश हो रहा है। सरकार का लक्ष्य है कि आने वाले वर्षों में आयातित तेल पर निर्भरता कम की जाए। इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने की नीति भी इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैश्विक व्यापार पर भी इस संकट का प्रभाव स्पष्ट दिखाई दे रहा है। समुद्री मार्गों में व्यवधान के कारण माल ढुलाई महंगी हो गई है। बीमा लागत बढ़ गई है। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार की रफ्तार धीमी पड़ रही है। कई कंपनियां अब अपने उत्पादन केंद्रों को एक ही क्षेत्र में रखने के बजाय अलग अलग देशों में बांटने की रणनीति अपना रही हैं। भारत इस स्थिति का लाभ उठा सकता है क्योंकि अनेक विदेशी कंपनियां चीन के विकल्प के रूप में भारत की ओर देख रही हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दुनिया के कई देशों में शेयर बाजारों में अस्थिरता बढ़ गई है। निवेशक सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर बढ़ रहे हैं। सोने की कीमतों में वृद्धि इसका संकेत है। अनिश्चितता के दौर में पूंजी बाजारों में उतार चढ़ाव बढ़ना सामान्य माना जाता है। लेकिन लगातार अस्थिरता निवेश और रोजगार दोनों को प्रभावित करती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष दोनों ने चेतावनी दी है कि यदि पश्चिम एशिया संकट लंबा चला तो वैश्विक विकास दर में भारी गिरावट आ सकती है। इसका असर केवल तेल आयातक देशों पर ही नहीं बल्कि निर्यातक देशों पर भी पड़ेगा। उत्पादन कम होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपभोग घटेगा और वैश्विक मांग कमजोर पड़ जाएगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन परिस्थितियों में भारत के सामने अवसर और चुनौती दोनों मौजूद हैं। एक ओर दुनिया भारत को स्थिर और भरोसेमंद अर्थव्यवस्था के रूप में देख रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरी ओर ऊर्जा आयात पर निर्भरता और महंगाई का दबाव चिंता का विषय है। यदि भारत घरेलू उत्पादन बढ़ाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्जा आत्मनिर्भरता मजबूत करने और निर्यात क्षमता सुधारने में सफल होता है तो वह इस संकट के बीच भी मजबूत स्थिति बनाए रख सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह समय केवल आर्थिक आंकड़ों का नहीं बल्कि नीतिगत दूरदर्शिता का भी है। दुनिया जिस अस्थिरता से गुजर रही है उसमें वे देश आगे निकलेंगे जो ऊर्जा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तकनीक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्पादन और मानव संसाधन के क्षेत्र में दीर्घकालिक रणनीति अपनाएंगे। भारत के पास जनसंख्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाजार और तकनीकी क्षमता जैसी बड़ी ताकतें हैं। यदि इनका सही उपयोग किया गया तो वैश्विक संकट के बीच भी भारत आर्थिक स्थिरता और विकास का नया उदाहरण बन सकता है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/180129/why-india-remains-strong-in-times-of-global-economic-instability</link>
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                <pubDate>Wed, 27 May 2026 18:09:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>राहुल गांधी ने मोदी सरकार को घेरा, चुनाव के बाद पेट्रोल-डीजल और LPG की कीमतें बढ़ेंगी, एमएसएमई पर चोट पहुंचेगी</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>पश्चिमी एशिया में चल रही जंग और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का असर भारतीय करेंसी पर पड़ रहा है। डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार कमजोर हो रहा है। इसे लेकर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने केंद्र सरकार का घेराव किया।</p>
<p style="text-align:justify;">राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर पोस्ट कर कहा, "रुपये का डॉलर के मुकाबले कमजोर होकर 100 की तरफ बढ़ना और इंडस्ट्रियल फ्यूल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी- ये सिर्फ आंकड़े नहीं, आने वाली महंगाई के साफ संकेत हैं।"</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि सरकार चाहे इसे 'नॉर्मल' बताए, लेकिन हकीकत ये</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173868/rahul-gandhi-attacks-modi-government-prices-of-petrol-diesel-and"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/rahul-gandhi-modi-government-congress.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>पश्चिमी एशिया में चल रही जंग और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का असर भारतीय करेंसी पर पड़ रहा है। डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार कमजोर हो रहा है। इसे लेकर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने केंद्र सरकार का घेराव किया।</p>
<p style="text-align:justify;">राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर पोस्ट कर कहा, "रुपये का डॉलर के मुकाबले कमजोर होकर 100 की तरफ बढ़ना और इंडस्ट्रियल फ्यूल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी- ये सिर्फ आंकड़े नहीं, आने वाली महंगाई के साफ संकेत हैं।"</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि सरकार चाहे इसे 'नॉर्मल' बताए, लेकिन हकीकत ये है कि उत्पादन और ट्रांसपोर्ट महंगे होंगे। एमएसएमई को सबसे ज्यादा चोट लगेगी। रोजमर्रा की चीजों के दाम बढ़ेंगे। एफआईआई का पैसा और तेजी से बाहर जाएगा, जिससे शेयर बाजार पर दबाव बढ़ेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">राहुल गांधी ने आगे कहा कि यानी हर परिवार की जेब पर इसका सीधा और गहरा असर पड़ना तय है। और यह सिर्फ वक्त की बात है, चुनाव के बाद पेट्रोल, डीजल, और एलपीजी की कीमतें भी बढ़ा दी जाएंगी। मोदी सरकार के पास न दिशा है, न रणनीति, सिर्फ बयानबाजी है। सवाल यह नहीं कि सरकार क्या कह रही है, सवाल यह है कि आपकी थाली में क्या बचा है।</p>
<p style="text-align:justify;">पिछले दिनों राहुल गांधी ने कहा था कि दुनिया तेजी से बदल रही है। संकट हमारे दरवाजे पर है। अगर सरकार ने तुरंत कदम नहीं उठाए तो एलपीजी, पेट्रोल और डीजल करोड़ों भारतीय परिवारों के लिए बड़ी समस्या बन जाएंगे। सच्चाई साफ है, केंद्र सरकार ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा से समझौता कर दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने यह भी कहा था कि कमजोर और दिशाहीन विदेश नीति ने देश को इस खतरनाक स्थिति में ला खड़ा किया है। अब समय है सच बताने का और देश को तैयार करने का। वरना इसकी कीमत भारत के आम लोग चुकाएंगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 22 Mar 2026 19:29:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>अमेरिकी दबाव के बीच भारतीय बजट की बड़ी परीक्षा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय इतिहास के एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां वैश्विक राजनीति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यापारिक नीतियां और राष्ट्रीय हित आपस में गहराई से उलझ गए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए आक्रामक टैरिफ़ ने विश्व व्यापार व्यवस्था की स्थिरता को चुनौती दी है। अगस्त </span>2025 <span lang="hi" xml:lang="hi">में भारत पर लगाए गए </span>50 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत टैरिफ़ केवल शुल्क वृद्धि नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि एक स्पष्ट राजनीतिक और आर्थिक संदेश हैं। इस पृष्ठभूमि में बजट </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">साधारण वार्षिक प्रक्रिया न रहकर भारत की आर्थिक दिशा तय करने वाला ऐतिहासिक दस्तावेज बनने की ओर</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/167256/big-test-for-indian-budget-amid-american-pressure"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-01/hindi-divas37.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय इतिहास के एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां वैश्विक राजनीति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यापारिक नीतियां और राष्ट्रीय हित आपस में गहराई से उलझ गए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए आक्रामक टैरिफ़ ने विश्व व्यापार व्यवस्था की स्थिरता को चुनौती दी है। अगस्त </span>2025 <span lang="hi" xml:lang="hi">में भारत पर लगाए गए </span>50 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत टैरिफ़ केवल शुल्क वृद्धि नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि एक स्पष्ट राजनीतिक और आर्थिक संदेश हैं। इस पृष्ठभूमि में बजट </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">साधारण वार्षिक प्रक्रिया न रहकर भारत की आर्थिक दिशा तय करने वाला ऐतिहासिक दस्तावेज बनने की ओर बढ़ रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ट्रंप टैरिफ़ का प्रभाव भारतीय निर्यात के लिए गहरी चिंता का विषय बन चुका है। उपभोक्ता वस्तुएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वस्त्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रसायन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऑटो कलपुर्जे और खुदरा उत्पाद जैसे क्षेत्र सीधे तौर पर इन शुल्कों की मार झेल रहे हैं। बढ़ी हुई लागत के कारण भारतीय उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजारों में प्रतिस्पर्धा खो सकते हैं। यह स्थिति केवल व्यापार घाटे तक सीमित नहीं रहती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उत्पादन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोजगार और निवेश पर भी नकारात्मक असर डालने की क्षमता रखती है। ऐसे में बजट </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">से अपेक्षा है कि वह इस दबाव को अवसर में बदलने की स्पष्ट रणनीति प्रस्तुत करे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैश्विक स्तर पर ट्रंप टैरिफ़ संरक्षणवाद की उस नई लहर का प्रतीक हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें मुक्त व्यापार की अवधारणा धीरे-धीरे पीछे हटती दिख रही है। अमेरिका अपने घरेलू उद्योगों को प्राथमिकता देकर अंतरराष्ट्रीय नियमों को पुनर्परिभाषित कर रहा है। भारत के लिए यह संकेत स्पष्ट है कि अब केवल पारंपरिक व्यापार साझेदारों पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है। बजट </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">के माध्यम से भारत को यह संदेश देना होगा कि वह बदलती वैश्विक व्यवस्था में केवल अनुकूलन ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि नेतृत्व करने की क्षमता भी रखता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">निर्यात विविधीकरण इस पूरे विमर्श का सबसे मजबूत स्तंभ बनकर उभरता है। वर्षों से भारतीय निर्यात कुछ सीमित बाजारों पर केंद्रित रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे किसी एक झटके का असर व्यापक हो जाता है। ट्रंप टैरिफ़ ने इसी कमजोरी को उजागर किया है। अफ्रीका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लैटिन अमेरिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पश्चिम एशिया और यूरोप के उभरते बाजार भारत के लिए नए अवसर प्रस्तुत करते हैं। बजट </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">में यदि विशेष निर्यात प्रोत्साहन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाजार-विशेष रणनीतियां और लॉजिस्टिक समर्थन शामिल किए जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो भारतीय निर्यात नई दिशा पकड़ सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">टैरिफ़ का प्रभाव रोजगार पर भी गहरा पड़ सकता है। निर्यात आधारित उद्योगों में मांग घटने से उत्पादन में कटौती और नौकरियों में कमी का खतरा बढ़ गया है। छोटे और मध्यम उद्योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो पहले से ही सीमित संसाधनों पर निर्भर हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि भारत की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से घरेलू मांग पर आधारित है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर भी निर्यात क्षेत्र लाखों लोगों को रोजगार प्रदान करता है। बजट </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">में रोजगार संरक्षण और सृजन के लिए लक्षित उपाय इस चुनौती का प्रभाव कम कर सकते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के लिए यह बजट केवल वित्तीय संतुलन साधने का अभ्यास नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि आर्थिक आत्मरक्षा की रणनीति गढ़ने का अवसर है। नीति विशेषज्ञों की राय है कि गैर-टैरिफ़ बाधाओं को हटाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नियामक प्रक्रियाओं को सरल बनाना और नीति स्थिरता सुनिश्चित करना समय की सबसे बड़ी मांग है। विदेशी प्रत्यक्ष निवेश को आकर्षित करने के लिए स्पष्ट नियम और तेज निर्णय प्रक्रिया आवश्यक है। बजट </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि इस दिशा में ठोस संकेत देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो भारत वैश्विक निवेश मानचित्र पर और मजबूत स्थिति बना सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">घरेलू मांग को सशक्त बनाना ट्रंप टैरिफ़ के प्रभाव को कम करने का सबसे प्रभावी उपाय माना जा रहा है। जब देश का आंतरिक बाजार मजबूत होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब बाहरी झटके सीमित प्रभाव डाल पाते हैं। मध्यम वर्ग की क्रय शक्ति बढ़ाने के लिए आयकर राहत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपभोग को बढ़ावा देने वाले कदम और अप्रत्यक्ष कर सुधार बजट </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">की प्राथमिकताओं में शामिल हो सकते हैं। इससे न केवल खपत बढ़ेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उद्योगों को स्थिर और विश्वसनीय मांग का आधार भी मिलेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाएं इस रणनीति की केंद्रीय धुरी बन सकती हैं। घरेलू विनिर्माण को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अनुरूप बनाने के लिए तकनीक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूंजी और नवाचार का संगठित विकास आवश्यक है। बजट </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">में इन योजनाओं के विस्तार से आयात निर्भरता घटेगी और घरेलू उत्पादन को नई गति मिलेगी। इससे भारत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में केवल उपभोक्ता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि प्रभावशाली उत्पादक की भूमिका निभा सकेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्जा आयात और कच्चे माल की निर्भरता भी ट्रंप टैरिफ़ के संदर्भ में एक संवेदनशील मुद्दा है। रूसी तेल आयात को लेकर अमेरिकी आपत्तियों ने भारत के सामने कूटनीतिक और आर्थिक संतुलन की चुनौती खड़ी कर दी है। संकेत मिले हैं कि आयात नीति में समायोजन से शुल्क राहत संभव हो सकती है। बजट </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">में ऊर्जा स्रोतों के विविधीकरण और आत्मनिर्भर ऊर्जा नीति पर जोर देकर भारत अपने दीर्घकालिक हितों की रक्षा कर सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आधारभूत संरचना में निवेश किसी भी आर्थिक रणनीति की रीढ़ होता है। सड़क</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बंदरगाह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्जा और डिजिटल ढांचे में निवेश से उत्पादकता बढ़ती है और रोजगार के अवसर पैदा होते हैं। बजट </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">में यदि इन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह न केवल तात्कालिक आर्थिक गतिविधियों को गति देगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि दीर्घकालिक विकास को भी मजबूती प्रदान करेगा। यह निवेश भारत को वैश्विक अनिश्चितताओं से सुरक्षित रखने में सहायक होगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा और कौशल विकास पर खर्च भी इस बजट का एक महत्वपूर्ण आयाम हो सकता है। बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था में वही देश टिकाऊ प्रगति करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनके पास कुशल और अनुकूलनशील मानव संसाधन होता है। बजट </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">में नई तकनीकों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल कौशल और नवाचार को बढ़ावा देने वाले प्रावधान भारत के युवाओं को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार कर सकते हैं। यह निवेश भविष्य की आर्थिक सुरक्षा का मजबूत आधार बनेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बजट </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">ट्रंप टैरिफ़ से उत्पन्न दबाव को अवसर में बदलने का निर्णायक मंच साबित हो सकता है। निर्यात विविधीकरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घरेलू मांग की मजबूती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निवेश प्रोत्साहन और संरचनात्मक सुधार मिलकर भारत को नई आर्थिक ऊंचाइयों तक ले जाने की क्षमता रखते हैं। यह बजट केवल संकट प्रबंधन का दस्तावेज नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि आत्मनिर्भर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सशक्त और वैश्विक रूप से प्रभावशाली भारत की स्पष्ट घोषणा बन सकता है। यदि बड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साहसिक और दूरदर्शी ऐलान हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो बजट </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">आने वाले वर्षों के लिए आर्थिक दिशा निर्धारित करने वाला ऐतिहासिक पड़ाव सिद्ध होगा।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 25 Jan 2026 16:43:29 +0530</pubDate>
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