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                <title>चंद्रशेखर आज़ाद - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>चंद्रशेखर आज़ाद RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>आजाद पार्क से गूंजा देशभक्ति का संदेश, ‘हर घर तिरंगा अभियान-2026’ का शुभारंभ</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>प्रयागराज।</strong> आजादी के अमृत भाव और राष्ट्रभक्ति के संदेश के साथ रविवार को प्रयागराज में ‘हर घर तिरंगा अभियान-2026’ का भव्य शुभारंभ हुआ। अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद की प्रतिमा स्थल से अभियान की शुरुआत करते हुए शहर में तिरंगा रैली निकाली गई। हाथों में तिरंगा लेकर निकले लोगों ने देशभक्ति के नारों के साथ स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और शहीदों के बलिदान को याद किया।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">कार्यक्रम के तहत चंद्रशेखर आजाद पार्क के गेट नंबर-1 से तिरंगा रैली निकाली गई, जिसे मुख्य विकास अधिकारी श्रीमती हर्षिका सिंह ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। रैली में अधिकारी-कर्मचारी, विद्यार्थी, स्वयंसेवी संगठनों से जुड़े लोग</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184983/patriotic-message-echoed-from-azad-park-launch-of-har-ghar"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/img-20260809-wa0127.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>प्रयागराज।</strong> आजादी के अमृत भाव और राष्ट्रभक्ति के संदेश के साथ रविवार को प्रयागराज में ‘हर घर तिरंगा अभियान-2026’ का भव्य शुभारंभ हुआ। अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद की प्रतिमा स्थल से अभियान की शुरुआत करते हुए शहर में तिरंगा रैली निकाली गई। हाथों में तिरंगा लेकर निकले लोगों ने देशभक्ति के नारों के साथ स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और शहीदों के बलिदान को याद किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कार्यक्रम के तहत चंद्रशेखर आजाद पार्क के गेट नंबर-1 से तिरंगा रैली निकाली गई, जिसे मुख्य विकास अधिकारी श्रीमती हर्षिका सिंह ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। रैली में अधिकारी-कर्मचारी, विद्यार्थी, स्वयंसेवी संगठनों से जुड़े लोग तथा गणमान्य नागरिक शामिल हुए। तिरंगे के साथ आगे बढ़ती रैली ने पूरे वातावरण को राष्ट्रभक्ति के रंग में रंग दिया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">रैली के अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद की प्रतिमा स्थल पर पहुंचने के बाद मुख्य अतिथि एवं उपस्थित लोगों ने अमर शहीद की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं पुष्पार्चन कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। इस दौरान स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान और देश की आजादी के लिए दिए गए सर्वोच्च बलिदान को याद किया गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कार्यक्रम का संयोजन पाण्डुलिपि अधिकारी गुलाम सरवर एवं क्षेत्रीय अभिलेख अधिकारी राकेश कुमार वर्मा द्वारा किया गया, जबकि कार्यक्रम का संचालन संस्कृति विभाग के हरिश्चंद्र दुबे ने किया।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 09 Aug 2026 21:54:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>11जून को पंडित रामप्रसाद बिस्मिल की जयंती है!इस अवसर पर यह आलेख है</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div><div><div style="text-align:justify;"><strong>शाहजहाँपुर </strong>की मिट्टी ने 11 जून 1897 को मुझे जन्म दिया था। माँ का नाम मूलमती, पिता का नाम मुरलीधर। घर गरीब था, पर सीना गर्व से भरा था। दादा ग्वालियर से अकाल के दिनों में भागकर यहाँ आए थे। दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष देखा, इसलिए बचपन से ही मन में ठान लिया था कि इस गुलामी को उखाड़ फेंकना है।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">तुम मुझे आज "सरफरोशी की तमन्ना" वाले शायर के नाम से जानते हो। पर मैं पहले क्रांतिकारी था, बाद में कवि बना। कलम और बंदूक दोनों मेरे हथियार थे। आज मैं तुम्हें वही रात सुनाऊँगा जिसने</div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180928/11th-june-is-the-birth-anniversary-of-pandit-ram-prasad"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/img-20260610-wa0050.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div><div><div style="text-align:justify;"><strong>शाहजहाँपुर </strong>की मिट्टी ने 11 जून 1897 को मुझे जन्म दिया था। माँ का नाम मूलमती, पिता का नाम मुरलीधर। घर गरीब था, पर सीना गर्व से भरा था। दादा ग्वालियर से अकाल के दिनों में भागकर यहाँ आए थे। दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष देखा, इसलिए बचपन से ही मन में ठान लिया था कि इस गुलामी को उखाड़ फेंकना है।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">तुम मुझे आज "सरफरोशी की तमन्ना" वाले शायर के नाम से जानते हो। पर मैं पहले क्रांतिकारी था, बाद में कवि बना। कलम और बंदूक दोनों मेरे हथियार थे। आज मैं तुम्हें वही रात सुनाऊँगा जिसने मेरी ज़िंदगी बदल दी। 9 अगस्त 1925 की काकोरी की रात।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">बैठो, ये कहानी छोटी नहीं है। ये वो दास्तान है जो खून, पसीने और मिट्टी की खुशबू से लिखी गई है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">1925 का हिंदुस्तान देखो। अंग्रेज़ हर चीज़ पर टैक्स लगा रहे थे। नमक पर, कपड़े पर, रेल के टिकट पर। किसान की फसल सस्ते में लूट ली जाती, और उसी फसल को दुगने दाम पर बेचा जाता। लगान न दे पाने पर गाँव के गाँव उजड़ जाते थे। कांग्रेस वाले सत्याग्रह कर रहे थे, लाठी खा रहे थे, जेल जा रहे थे। मैं उनका सम्मान करता हूँ। गांधी जी का अहिंसा का रास्ता लाखों को जोड़ रहा था। पर मेरा दिल कहता था कि जो राज़ बंदूक के दम पर आया है, वो बंदूक के दम पर ही जाएगा।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">1924 में हमने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन बनाई। मैं, चंद्रशेखर आज़ाद, अशफाक उल्ला खाँ, रोशन सिंह, राजेंद्र लाहिड़ी, सचिंद्र बख्शी, मनमथनाथ गुप्त। सबकी उम्र 25 से कम थी। पर हौसला पहाड़ से ऊँचा था। हमारा मकसद साफ था। अंग्रेजों के पास हथियार हैं, पैसा है, ताकत है। हमारे पास कुछ नहीं। तो हम उनका ही खजाना लूटेंगे। उसी पैसे से हथियार खरीदेंगे। उसी हथियार से क्रांति का अलाव जलाएंगे। लोग कहते थे ये डकैती है। मैं कहता हूँ, जब एक देश को लूटा जा रहा हो, तो लुटेरों से लूटना डकैती नहीं, कर्तव्य है।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">मौका मिला 9 अगस्त 1925 को। लखनऊ से सहारनपुर जाने वाली पैसेंजर ट्रेन रोज़ सरकारी खजाना ले जाती थी। लखनऊ, शाहजहाँपुर, बरेली, मुरादाबाद के सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाह इसी ट्रेन में होती थी। गार्ड के डिब्बे में लोहे की पेटियाँ रखी होती थीं। वही हमारा निशाना था। काकोरी लखनऊ से 15 मील दूर एक छोटा स्टेशन है। हमने तय किया कि ट्रेन जैसे ही काकोरी पार करेगी, चेन खींचकर रोक देंगे। गार्ड का डिब्बा तोड़ेंगे, खजाना निकालेंगे और जंगल में गायब हो जाएंगे।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">टीम में दस लोग थे। मैं "राम" बनकर बैठा था। अशफाक "अहमद" बनकर। चंद्रशेखर आज़ाद हमारा बाहुबल था। राजेंद्र लाहिड़ी का दिमाग ठंडा था, निशाना पक्का था। मनमथनाथ सबसे छोटा था, पर हिम्मत में सबसे बड़ा। सचिंद्र बख्शी, मुरारी शर्मा, मुकुंदी लाल, केशव चक्रवर्ती भी साथ थे। हमने हफ्तों तक रिहर्सल की। शाहजहाँपुर के जंगलों में रात-रात भर अभ्यास किया। कैसे चेन खींचनी है, कैसे ताला तोड़ना है, कैसे भागना है। मैंने उस दिन अपनी डायरी में लिखा था: "अगर हम मर गए तो शहीद कहलाएँगे। अगर बच गए तो क्रांति का बीज बो देंगे।"</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">9 अगस्त की दोपहर। धूप आग बरसा रही थी। हम अलग-अलग स्टेशनों से ट्रेन में चढ़े। टिकट लेकर, आम मुसाफिर बनकर। ट्रेन चली। दिल की धड़कनें तेज थीं। पर चेहरे पर कोई भाव नहीं था। जैसे ही ट्रेन काकोरी स्टेशन पार कर जंगल की तरफ बढ़ी, मनमथनाथ ने चेन खींच दी। कड़क की आवाज़ आई। ट्रेन हिली और रुक गई। हम आठ लोग एक साथ उठे। गार्ड के डिब्बे की तरफ लपके। ताला तोड़ा। अंदर लोहे की पेटियाँ थीं। चंद्रशेखर ने रिवॉल्वर तान दी और कहा, "खोलो जल्दी!" गार्ड का चेहरा पीला पड़ गया। उसने कांपते हाथों से चाबी दे दी।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">पेटियाँ खुलीं। नोटों की गड्डियाँ, सिक्के, सरकारी कागज। हमने अंदाजा लगाया, लगभग आठ हजार रुपये। आज के हिसाब से करीब पंद्रह लाख। लेकिन तभी गलती हो गई। शायद गार्ड ने ब्रेक छोड़ा, या ट्रेन अपने आप हिल गई। राजेंद्र ने जल्दी में एक पेटी धक्का देकर नीचे फेंक दी। धमाके की आवाज़ हुई। उसी धमाके में एक यात्री अहमद अली नीचे गिर गया। सिर पर चोट लगी और उसकी मौत हो गई। उस पल मेरा कलेजा बैठ गया। हम लुटेरे नहीं थे। हमारा मकसद किसी की जान लेना नहीं था। पर क्रांति में खून बहता ही है। उस दिन मैंने जाना कि आज़ादी की कीमत सिर्फ हमारा खून नहीं होता, कभी-कभी बेगुनाहों का खून भी बहता है। उस यात्री की मौत का बोझ आज भी मेरे सीने पर है। हमने जितना हो सका खजाना समेटा और जंगल में भागे। पीछे पुलिस की सीटी बज रही थी।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">लूट के बाद हम बिखर गए। पर अंग्रेज़ों की सीआईडी कोई कम नहीं थी। गाँव-गाँव, घर-घर छान मारा। मुखबिरों को पैसा दिया गया। सबसे पहले राजेंद्र लाहिड़ी पकड़े गए। फिर मैं 1 नवंबर 1925 को शाहजहाँपुर में पकड़ा गया। अशफाक दिल्ली में गिरफ्तार हुआ। चंद्रशेखर आज़ाद बच निकले। वो 1931 तक लड़े, और जब चारों तरफ से घिर गए तो खुद को गोली मार ली। जिंदा पकड़े जाने से बेहतर मौत थी उनके लिए।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">मुकदमा चला लखनऊ में। नाम दिया गया "काकोरी षड्यंत्र केस"। कठघरे में खड़े होकर मैंने जज से कहा: "हम चोर नहीं हैं। हम वो लोग हैं जो अपनी माँ भारत को आज़ाद कराना चाहते हैं। अगर इसके लिए फाँसी भी मिले, तो वो हमारे लिए माला है।" अदालत ने 40 लोगों पर मुकदमा चलाया। 16 को सज़ा हुई। मुझे, अशफाक उल्ला खाँ, रोशन सिंह और राजेंद्र लाहिड़ी को फाँसी की सज़ा सुनाई गई। फैसला सुनकर मैं हँस पड़ा। "मौत से डरते तो हम 14 साल की उम्र में आर्य समाज न ज्वाइन करते।" मुकदमे के दौरान हमने कोर्ट को ही अपना मंच बना लिया। हर पेशी पर देशभक्ति के नारे लगते थे। "इंकलाब ज़िंदाबाद" की गूँज पूरे लखनऊ में सुनाई देती थी।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">मुझे गोरखपुर जेल की कोठरी नंबर 11 में रखा गया। फाँसी 19 दिसंबर 1927 को तय हुई। मेरे पास 40 दिन थे। मैं रोया नहीं। माफी नहीं माँगी। मैंने कलम उठाई। पेंसिल से 120 पन्ने लिखे। मेरी आत्मकथा _कातिल की कलम से_। मैंने लिखा कि कैसे मेरा दादा अकाल में ग्वालियर छोड़कर आया था। कैसे माँ ने मुझे भूखे पेट सुलाया था। कैसे 14 साल की उम्र में स्वामी दयानंद सरस्वती की _सत्यार्थ प्रकाश_ ने मेरे अंदर आग लगा दी थी। कैसे मैंने "मैनपुरी षड्यंत्र" में हिस्सा लिया था 1918 में।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">रात को नींद नहीं आती थी। अशफाक पास वाली कोठरी में था। हम दीवार के उस पार बात करते थे। एक रात मैंने उससे कहा, "अशफाक, अगर हम बच गए तो साथ मिलकर मदरसा खोलेंगे। जहाँ हिंदू-मुस्लिम दोनों पढ़ेंगे।" उसने जवाब दिया, "बिस्मिल भाई, हम बचेंगे नहीं। लेकिन हमारे मरने के बाद हिंदुस्तान देखेगा कि हिंदू-मुस्लिम एक साथ मर सकते हैं।" उसी जेल में मैंने "मेरा रंग दे बसंती चोला" लिखा।  </div><div style="text-align:justify;">_"मेरा रंग दे बसंती चोला,  </div><div style="text-align:justify;">माय रंग दे बसंती चोला।"_  </div><div style="text-align:justify;">सोचो, जिसे कल फाँसी होनी है, वो बसंत की बात कर रहा है। मौत से डरने वाला ऐसा नहीं लिखता। जेल में मुझे रोज़ गीता पढ़ने का मौका मिलता था। मैंने पाया कि गीता में भी कर्म और त्याग की बात है। कृष्ण ने अर्जुन से कहा था, "कर्म करो, फल की चिंता मत करो।" वही मैं कर रहा था।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">लोग पूछते हैं, हिंदू-मुस्लिम एक साथ कैसे लड़ सकते हैं? मैं कहता हूँ, देखो अशफाक को। अशफाक उल्ला खाँ शाहजहाँपुर का ही था। उसकी उम्र मुझसे दो साल छोटी थी। जब पहली बार मिला था, तो लगा जैसे बरसों का साथी हो। वो उर्दू का शायर था। मैं हिंदी का। वो कुरान पढ़ता था, मैं गीता। पर जब देश की बात आती, तो हम एक थे। काकोरी की रात उसने मुझसे कहा था, "बिस्मिल भाई, अगर आज हम मर गए तो हिंदुस्तान देखेगा कि हिंदू-मुस्लिम अलग नहीं हैं।" और वही हुआ। 19 दिसंबर 1927 को हम एक साथ फाँसी पर चढ़े। अशफाक की आखिरी ख्वाहिश थी कि उसकी लाश को शाहजहाँपुर में दफनाया जाए। अंग्रेजों ने मना कर दिया। उसे फैजाबाद में दफनाया गया। आज भी उसकी मजार पर हिंदू-मुस्लिम दोनों चादर चढ़ाते हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">18 दिसंबर की रात जेलर आया। बोला, "बिस्मिल, कल सुबह छह बजे फाँसी है।" मैंने नहाया, नए कपड़े पहने, गीता का पाठ किया। अशफाक ने कुरान पढ़ी। रोशन सिंह ने गुरुवाणी गाई। रात को मैंने आखिरी शेर लिखा:  </div><div style="text-align:justify;">_"अगर एक झटके में कुर्बानी दे दूँ तो क्या है,  </div><div style="text-align:justify;">बार-बार मरूँ वतन पर यही आरजू है।"_  </div><div style="text-align:justify;">सुबह पाँच बजे दरवाजा खुला। मैं बाहर निकला। फाँसी का तख्ता तैयार था। जेलर ने पूछा, "आखिरी इच्छा?" मैंने कहा, "मेरे शरीर को तिरंगे में लपेट देना। और हाँ, मेरे मरने के बाद मेरी कविताएँ मत जलाना।" फंदा मेरे गले में डाला गया। मैंने ऊपर देखा। आसमान साफ था। और मेरे मुँह से निकला:  </div><div style="text-align:justify;">_"देश हित पैदा हुए हैं, देश पर मर जाएंगे।  </div><div style="text-align:justify;">मरते-मरते देश को ज़िंदा मगर कर जाएंगे।"_  </div><div style="text-align:justify;">धड़ाम की आवाज़ आई। और सब शांत हो गया। उसी दिन अशफाक, रोशन सिंह और राजेंद्र लाहिड़ी भी फाँसी पर चढ़े। चार नौजवान। चार धर्म। एक मकसद।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">हमारी फाँसी ने हिंदुस्तान को झकझोर दिया। अखबारों में लिखा गया, "चार नौजवान, चार धर्म, एक मकसद"। हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल बन गई हमारी फाँसी। काकोरी के बाद क्रांति की आग और भड़क गई। भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु ने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन बनाई। भगत सिंह कहते थे, "बिस्मिल का खून बेकार नहीं जाएगा।" उन्होंने "मेरा रंग दे बसंती चोला" को अपना नारा बनाया। लाहौर षड्यंत्र केस में फाँसी से पहले वही गीत गाया था। 1947 में जब आज़ादी मिली, तो नेहरू ने लाल किले से कहा था कि आज़ादी में उन अनाम शहीदों का खून शामिल है जिनके नाम इतिहास में नहीं लिखे गए। मेरा नाम लिखा गया। पर मैं अनाम रहना पसंद करता। क्योंकि क्रांति किसी एक नाम से नहीं होती।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">आज 2025 है। हिंदुस्तान आज़ाद है। पर मैं देखता हूँ कि तुम लोग आपस में लड़ रहे हो। हिंदू-मुस्लिम, जाति-धर्म, भाषा-प्रांत। अशफाक और मैं अगर आज ज़िंदा होते, तो हमारा पहला काम ये होता कि तुम्हें समझाते। दुश्मन बाहर नहीं, अंदर है। नफरत ही असली अंग्रेज है। मेरी कविता याद रखो:  </div><div style="text-align:justify;">_"देश हित पैदा हुए हैं, देश पर मर जाएंगे।"_  </div><div style="text-align:justify;">देश हित मतलब सिर्फ सीमा पर लड़ना नहीं। देश हित मतलब भूखे को खाना खिलाना, बीमार का इलाज करना, लड़की को पढ़ाना। अगर तुम ऐसा करोगे, तो मेरी फाँसी बेकार नहीं जाएगी।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">काकोरी कांड में हमने आठ हजार रुपये लूटे थे। पर जो हमने लूटा वो पैसा नहीं था। हमने अंग्रेजों का डर लूटा था। हमने नौजवानों का खौफ तोड़ा था। हमने साबित किया कि 20-25 साल के लड़के भी साम्राज्य को चुनौती दे सकते हैं। आज तुम मोबाइल चलाते हो, मैं कलम चलाता था। ज़माना बदला है, लेकिन दुश्मन वही है। अन्याय, गरीबी, नफरत। मेरी कलम अब तुम्हारे हाथ में है। लिखो। बोलो। लड़ो। लेकिन याद रखो, बंदूक से पहले दिल जीतना ज़रूरी है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">जेल में मैंने कई गीत लिखे। कुछ छपे, कुछ खो गए। "सरफरोशी की तमन्ना" तो तुम जानते ही हो। पर एक और गीत था जो मैं अक्सर गाता था:  </div><div style="text-align:justify;">_"वतन पर जो फिदा होगा,  </div><div style="text-align:justify;">अमर वो नौजवान होगा।  </div><div style="text-align:justify;">रहेगा याद दुनिया में,  </div><div style="text-align:justify;">वही बेनामो-निशान होगा।"_  </div><div style="text-align:justify;">मैं चाहता था कि नौजवान डरना छोड़ दे। मरना नहीं, जीना सीखे। पर ऐसे जीना जो गुलामी में न हो। भगत सिंह ने लिखा था कि वो मेरी कविताएँ पढ़कर ही क्रांतिकारी बना। अगर मेरी एक कविता ने भगत सिंह को बना दिया, तो मेरा जीवन सफल है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">मैं रामप्रसाद बिस्मिल। शाहजहाँपुर का बेटा। हिंदुस्तान का दीवाना। 30 साल की उम्र में फाँसी पर चढ़ गया। पर मेरे शब्द आज भी ज़िंदा हैं। अगर तुम "सरफरोशी की तमन्ना" गुनगुनाओगे, तो मैं मरा नहीं कहलाऊँगा।  </div><div style="text-align:justify;">_"सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,  </div><div style="text-align:justify;">देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-कातिल में है।"_  </div><div style="text-align:justify;">मेरी कहानी खत्म हुई। अब तुम्हारी शुरू होती है। तुम क्या करोगे? क्या तुम भी देश के लिए कुछ करोगे? या सिर्फ इतिहास पढ़कर भूल जाओगे? फैसला तुम्हारा है।</div></div></div><div class="yj6qo" style="text-align:justify;"><br /></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div></div></div></div><div class="hq gt"><div class="hp"><br /></div><div class="eqJbab cZD3Qb"><br /></div></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 16:34:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>स्वाधीनता संग्राम में अमर नाम है राम प्रसाद बिस्मिल का</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div dir="ltr"><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में वैचारिक चेतना और सशस्त्र क्रांति का एक ऐसा अनूठा संगम देखने को मिलता है जिसने दमनकारी ब्रिटिश सत्ता की नींव हिलाकर रख दी थी। इस अद्वितीय संगम के सबसे प्रखर प्रतीक पुरुष थे अमर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल। वे केवल एक निर्भीक सेनानी ही नहीं थे बल्कि एक संवेदनशील कवि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेखक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुवादक और बहुभाषाविद भी थे। उनकी कलम से निकले शब्द जहाँ युवाओं के भीतर देशभक्ति की ज्वाला धधका देते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं उनके हाथों में थमी पिस्तौल विदेशी शासकों के मन में भय का संचार करती थी। कलम और पिस्तौल का</span></p></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180910/ram-prasad-bismils-immortal-name-in-the-freedom-struggle"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas1.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div dir="ltr"><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में वैचारिक चेतना और सशस्त्र क्रांति का एक ऐसा अनूठा संगम देखने को मिलता है जिसने दमनकारी ब्रिटिश सत्ता की नींव हिलाकर रख दी थी। इस अद्वितीय संगम के सबसे प्रखर प्रतीक पुरुष थे अमर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल। वे केवल एक निर्भीक सेनानी ही नहीं थे बल्कि एक संवेदनशील कवि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेखक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुवादक और बहुभाषाविद भी थे। उनकी कलम से निकले शब्द जहाँ युवाओं के भीतर देशभक्ति की ज्वाला धधका देते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं उनके हाथों में थमी पिस्तौल विदेशी शासकों के मन में भय का संचार करती थी। कलम और पिस्तौल का ऐसा अद्भुत संतुलन इतिहास में विरला ही देखने को मिलता है। उन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की आहुति हंसते-हंसते दे दी और आने वाली पीढ़ियों के लिए राष्ट्रवाद का एक ऐसा अनुपम आदर्श स्थापित किया जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस महान क्रांतिकारी का जन्म 11 जून 1897 को उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर नामक नगर में हुआ था। उनके पिता मुरलीधर एक साधारण और स्वाभिमानी व्यक्ति थे जबकि उनकी माता मूलमती धार्मिक और दृढ़ संकल्प वाली महिला थीं। बिस्मिल के व्यक्तित्व के निर्माण में उनकी माता का प्रभाव सबसे गहरा था जिन्होंने उन्हें सदा सत्य और देशप्रेम के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। बचपन में उनकी शिक्षा-दीक्षा स्थानीय स्तर पर हुई जहाँ उन्होंने हिंदी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उर्दू और संस्कृत भाषाओं का गहन अध्ययन किया। वे उर्दू में बिस्मिल उपनाम से कविताएँ लिखते थे जबकि हिंदी में राम और अज्ञात के नाम से उनकी रचनाएँ प्रकाशित होती थीं। किशोरावस्था में स्वामी दयानंद सरस्वती के विचारों और आर्य समाज के सिद्धांतों ने उनके जीवन को एक नई दिशा दी जिससे उनके भीतर अनुशासन और राष्ट्र सेवा का संकल्प और अधिक सुदृढ़ हो गया।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश की पराधीनता और देशवासियों पर होने वाले अत्याचारों ने उन्हें सक्रिय क्रांति के मार्ग पर अग्रसर होने के लिए विवश कर दिया। वर्ष 1918 में उन्होंने मैनपुरी षड्यंत्र के माध्यम से ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी जहाँ उन्होंने युवाओं का एक दल बनाकर देशभक्ति साहित्य का वितरण किया। इसके बाद वे स्वतंत्रता आंदोलन को एक अधिक संगठित और राष्ट्रव्यापी रूप देने के प्रयास में जुट गए। इसी उद्देश्य से उन्होंने अन्य क्रांतिकारियों के साथ मिलकर हिंदुस्तान गणतंत्र संघ नामक एक शक्तिशाली क्रांतिकारी संगठन की स्थापना की। इस संगठन का मुख्य लक्ष्य भारत को पूर्ण स्वतंत्रता दिलाना और एक लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना करना था। बिस्मिल इस संगठन के मुख्य रणनीतिकार और सेनापति थे। उनके नेतृत्व में चंद्रशेखर आज़ाद और अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ जैसे महान क्रांतिकारियों ने अपनी देशभक्ति का पाठ सीखा।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">क्रांतिकारी गतिविधियों को सुचारू रूप से चलाने और अस्त्र-शस्त्र खरीदने के लिए धन की अत्यधिक आवश्यकता थी। विदेशी सरकार से धन मांगना असंभव था और देश की गरीब जनता को लूटना क्रांतिकारियों के सिद्धांतों के विरुद्ध था। इसलिए बिस्मिल ने अंग्रेजी सरकार का खजाना लूटने की एक अत्यंत साहसिक योजना बनाई। 9 अगस्त 1925 को उनके कुशल नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने लखनऊ के समीप काकोरी नामक स्थान पर सहारनपुर से लखनऊ जा रही एक यात्री रेलगाड़ी को रोककर सरकारी खजाने को अपने नियंत्रण में ले लिया। इस ऐतिहासिक घटना को काकोरी कांड के नाम से जाना जाता है। इस घटना ने ब्रिटिश साम्राज्य को भीतर तक झकझोर दिया और सरकार ने क्रांतिकारियों को पकड़ने के लिए अपनी पूरी शक्ति झोंक दी। व्यापक धरपकड़ के बाद बिस्मिल सहित कई प्रमुख क्रांतिकारियों को बंदी बना लिया गया।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कारागार की चारदीवारों के भीतर भी बिस्मिल का हौसला तनिक भी कम नहीं हुआ। उन्होंने बंदीगृह को ही अपनी साधना स्थली बना लिया और वहाँ रहते हुए प्रचुर मात्रा में उत्कृष्ट साहित्य की रचना की। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध आत्मकथा वहीं लिखी जो आज भी भारतीय क्रांतिकारी साहित्य का एक अनमोल रत्न मानी जाती है। इसके अतिरिक्त उन्होंने कई विदेशी क्रांतिकारी ग्रंथों का हिंदी में अनुवाद किया और अनेक प्रेरणादायक गीतों की रचना की। कारागार में रहते हुए उन्होंने अपने देशवासियों और विशेष रूप से युवाओं के नाम कई संदेश भेजे जिसमें उन्होंने सांप्रदायिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता बनाए रखने पर बल दिया। उनके विचार अत्यंत दूरदर्शी थे जो केवल अंग्रेजों को भगाने तक सीमित नहीं थे बल्कि वे एक शोषणमुक्त समाज का निर्माण करना चाहते थे।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रिटिश अदालत ने काकोरी घटना का मुख्य सूत्रधार मानते हुए राम प्रसाद बिस्मिल को मृत्युदंड की सजा सुनाई। 19 दिसंबर 1927 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर कारागार में उन्हें फांसी के फंदे पर लटका दिया गया। फांसी के चबूतरे की ओर बढ़ते हुए उनके चेहरे पर कोई भय नहीं था बल्कि एक अलौकिक तेज था। उन्होंने हंसते हुए फंदे को चूमा और अपनी मातृभूमि की वंदना करते हुए प्राण त्याग दिए। उनकी अंतिम इच्छा यही थी कि वे बार-बार भारत भूमि पर जन्म लें और तब तक देश की सेवा करते रहें जब तक कि वह पूरी तरह से स्वतंत्र न हो जाए। उनका यह सर्वोच्च बलिदान व्यर्थ नहीं गया और इसने पूरे देश में क्रांति की एक ऐसी लहर पैदा कर दी जिसने अंततः 15 अगस्त 1947 को भारत को औपनिवेशिक दासता से मुक्ति दिलाई।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राम प्रसाद बिस्मिल का जीवन और उनका कृतित्व इस बात का साक्षात प्रमाण है कि एक सच्चा देशभक्त केवल अस्त्रों से ही नहीं बल्कि अपने विचारों और नैतिक मूल्यों से भी लड़ता है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करना चाहिए। आज भले ही वे हमारे बीच भौतिक रूप से उपस्थित नहीं हैं लेकिन उनकी कविताएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके विचार और उनका अदम्य साहस हर भारतीय के हृदय में सदैव जीवित रहेगा। राष्ट्र निर्माण और देश की संप्रभुता की रक्षा के लिए उनका जीवन सदैव एक मार्गदर्शक प्रकाश स्तंभ की भांति हमें प्रेरणा देता रहेगा।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p></div><div class="yj6qo" style="text-align:justify;"><br /></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div></div></div></div><div class="hq gt" style="text-align:justify;"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 15:31:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रीय एकता के महायज्ञ को पूरा करने के लिए संकल्प ले, आगे आये</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">26 जनवरी यानी गणतंत्र दिवस केवल एक तारीख नहीं है, यह भारतीय लोकतंत्र की आत्मा का उत्सव है। यह वह ऐतिहासिक दिन है जब भारत ने स्वयं को केवल आज़ाद राष्ट्र ही नहीं बल्कि एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में स्थापित किया। इस दिन हमने अपने संविधान को अपनाया, जिसने हमें अधिकार ही नहीं दिए बल्कि कर्तव्यों की याद भी दिलाई। गणतंत्र दिवस हमें यह समझाता है कि राष्ट्र केवल सरकार से नहीं बनता, बल्कि हर नागरिक के आचरण, सोच और कर्म से बनता है। यही दिन लोकतंत्र की भावना का सम्मान करने, संविधान के मूल्यों</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/167127/come-forward-with-a-resolution-to-complete-the-great-sacrifice"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-01/hindi-divas35.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">26 जनवरी यानी गणतंत्र दिवस केवल एक तारीख नहीं है, यह भारतीय लोकतंत्र की आत्मा का उत्सव है। यह वह ऐतिहासिक दिन है जब भारत ने स्वयं को केवल आज़ाद राष्ट्र ही नहीं बल्कि एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में स्थापित किया। इस दिन हमने अपने संविधान को अपनाया, जिसने हमें अधिकार ही नहीं दिए बल्कि कर्तव्यों की याद भी दिलाई। गणतंत्र दिवस हमें यह समझाता है कि राष्ट्र केवल सरकार से नहीं बनता, बल्कि हर नागरिक के आचरण, सोच और कर्म से बनता है। यही दिन लोकतंत्र की भावना का सम्मान करने, संविधान के मूल्यों को आत्मसात करने और राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका पर आत्ममंथन करने का अवसर देता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत की पहचान उसकी समृद्ध संस्कृति, उसकी एकता और उसकी विविधता से है। गणतंत्र दिवस पर हम केवल परेड, झांकियों और तिरंगे को देखकर भावुक नहीं होते, बल्कि उन असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों को भी याद करते हैं जिन्होंने इस देश की मिट्टी को अपने रक्त से सींचा। भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, चंद्रशेखर आज़ाद, अशफाक उल्ला खाँ, रामप्रसाद बिस्मिल जैसे वीरों ने हँसते-हँसते फाँसी का फंदा चुना। गांधी जी ने सत्य और अहिंसा के बल पर साम्राज्यवाद की नींव हिला दी। जलियाँवाला बाग की अमानवीय घटना आज भी हमें याद दिलाती है कि आज़ादी कितनी भारी कीमत चुकाकर मिली है। अंग्रेजों की गोलियाँ हमारे शरीर को छलनी कर सकती थीं, लेकिन हमारे हौसलों को नहीं। उसी संघर्ष का परिणाम है कि आज हमारा तिरंगा स्वतंत्र आकाश में गर्व से लहरा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">गणतंत्र दिवस हमें केवल अतीत पर गर्व करने के लिए नहीं, बल्कि वर्तमान की समीक्षा और भविष्य की दिशा तय करने के लिए प्रेरित करता है। स्वतंत्रता दिवस हो या गणतंत्र दिवस, यदि हम इन्हें केवल औपचारिक उत्सव बनाकर संतुष्ट हो जाएँ तो यह उन बलिदानों के साथ अन्याय होगा। ऐसे राष्ट्रीय पर्व मूल्यांकन दिवस होने चाहिए, जब हम खुले मस्तिष्क और शांत हृदय से यह सोचें कि हमने सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और नैतिक स्तर पर क्या हासिल किया और क्या करना अभी बाकी है। हमें स्वयं से पूछना चाहिए कि क्या हम संविधान में निहित न्याय, स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे के आदर्शों को अपने जीवन में उतार पाए हैं।</div>
<div style="text-align:justify;">राम के जीवन का एक प्रसंग हमें वचन की महत्ता समझाता है। दिए हुए वचन को निभाने के लिए राम ने राजपाट तक त्याग दिया। आज जब राजनीति में बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं और वे पूरे नहीं होते, तब राम का जीवन हमें आत्मचिंतन के लिए विवश करता है। लोकतंत्र में जनता सर्वोच्च होती है और सत्ता सेवा का माध्यम होनी चाहिए, स्वार्थ का नहीं। नेता और सरकार यदि राम के चरित्र से प्रेरणा लें तो शासन का स्वरूप अपने आप बदल सकता है। प्रजा से राजा है, राजा से प्रजा नहीं, यह भावना यदि व्यवहार में उतर जाए तो शासन जनकल्याण का सच्चा माध्यम बन सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">गांधी जी ने स्वतंत्र भारत का जो सपना देखा था, उसका केंद्र रामराज्य था। रामराज्य का अर्थ किसी धार्मिक शासन से नहीं बल्कि सद्गुणों के साम्राज्य से है, जहाँ सत्य, न्याय, करुणा और नैतिकता सर्वोपरि हों। आज स्वतंत्रता के दशकों बाद भी हम गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, असमानता और सामाजिक विषमता जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। सत्ता का मोह और स्वार्थ इन समस्याओं को और गहरा कर देता है। गणतंत्र दिवस पर यह संकल्प लेने की आवश्यकता है कि शासन व्यवस्था जनकल्याण की भावना से संचालित हो और नागरिक भी अपने आचरण से राष्ट्र को मजबूत बनाएँ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">गरीबी उन्मूलन आज भी भारत के सामने एक बड़ी चुनौती है। केवल सरकारी योजनाओं से ही गरीबी समाप्त नहीं होगी, इसके लिए समाज और नागरिकों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। शिक्षा, कौशल विकास, स्वरोजगार और समान अवसर ही गरीबी के स्थायी समाधान हैं। गणतंत्र दिवस हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि हम अपने स्तर पर क्या कर सकते हैं। क्या हम किसी ज़रूरतमंद बच्चे की पढ़ाई में सहयोग कर सकते हैं, क्या हम ईमानदारी से कर देकर राष्ट्र की अर्थव्यवस्था को मजबूत बना सकते हैं, क्या हम अपने काम में उत्कृष्टता लाकर देश की उत्पादकता बढ़ा सकते हैं। जब हर नागरिक अपने कर्तव्य को समझेगा, तभी गरीबी जैसी समस्याओं पर विजय संभव होगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">गणतंत्र केवल शासन की एक प्रणाली नहीं है, बल्कि यह नागरिकों को निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी का अधिकार देता है। वोट देना केवल अधिकार नहीं बल्कि जिम्मेदारी है। जागरूक और विवेकपूर्ण मतदान से ही स्वस्थ लोकतंत्र बनता है। गणतंत्र दिवस हमें यह याद दिलाता है कि हमें जाति, धर्म या तात्कालिक लाभ से ऊपर उठकर राष्ट्रहित में निर्णय लेने चाहिए। लोकतंत्र तभी उपयोगी है जब उसमें जनता की आवाज़ सशक्त हो और शासन जवाबदेह हो। संविधान ने हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है, लेकिन उसके साथ यह दायित्व भी दिया है कि हम उसका प्रयोग जिम्मेदारी से करें।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज के वैश्विक परिदृश्य में भारत की भूमिका लगातार बढ़ रही है। विदेशी व्यापार और विदेश नीति में संतुलित और दूरदर्शी बदलाव भारत को आर्थिक और सामरिक रूप से शक्तिशाली बना सकते हैं। आत्मनिर्भर भारत का संकल्प केवल नारा नहीं बल्कि व्यवहार में उतरने वाली सोच है। स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा देकर, नवाचार को प्रोत्साहित करके और वैश्विक मंचों पर आत्मविश्वास के साथ अपनी बात रखकर भारत विश्वगुरु की दिशा में आगे बढ़ सकता है। गणतंत्र दिवस पर यह संकल्प दोहराना आवश्यक है कि भारत न केवल आर्थिक महाशक्ति बने बल्कि नैतिक नेतृत्व भी प्रदान करे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सरकार के दायित्व और नागरिकों के कर्तव्य एक-दूसरे के पूरक हैं। सरकार का कर्तव्य है कि वह पारदर्शी, जवाबदेह और संवेदनशील शासन दे, वहीं नागरिकों का कर्तव्य है कि वे कानून का पालन करें, सामाजिक सद्भाव बनाए रखें और राष्ट्रहित में योगदान दें। स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण, महिला सम्मान, सामाजिक समरसता जैसे विषय केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं हैं, बल्कि हर नागरिक की जिम्मेदारी हैं। गणतंत्र दिवस पर आम नागरिक यह संकल्प ले सकता है कि वह संविधान का सम्मान करेगा, दूसरों के अधिकारों का आदर करेगा और समाज में सकारात्मक भूमिका निभाएगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज जब हम तिरंगे को सलामी देते हैं, तो हमें यह याद रखना चाहिए कि यह ध्वज केवल कपड़े का टुकड़ा नहीं, बल्कि हमारे त्याग, संघर्ष और उम्मीदों का प्रतीक है। न्याय, स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे के आदर्श केवल संविधान की प्रस्तावना तक सीमित न रहें, बल्कि हमारे व्यवहार का हिस्सा बनें। गणतंत्र दिवस हमें यह अवसर देता है कि हम आत्ममंथन करें, संकल्प लें और कर्मपथ पर आगे बढ़ें।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंत में यही कहा जा सकता है कि गणतंत्र हमारे लिए तभी उपयोगी है जब हम उसे जीएँ, समझें और निभाएँ। यह दिन हमें अतीत के बलिदानों को नमन करने, वर्तमान की जिम्मेदारियों को समझने और भविष्य के भारत का सपना देखने की प्रेरणा देता है। आइए, इस गणतंत्र दिवस पर हम सब मिलकर यह प्रण लें कि हम एक सजग, जिम्मेदार और संवेदनशील नागरिक बनेंगे, अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करेंगे और भारत को सशक्त, समृद्ध और गौरवशाली बनाने में अपना योगदान देंगे। तिरंगे को सलाम, संविधान को प्रणाम और राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य के लिए एकजुट कदम बढ़ाएँ। जय हिंद, जय भारत।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>
<div class="yj6qo" style="text-align:justify;"> </div>
<div class="adL" style="text-align:justify;"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 24 Jan 2026 18:46:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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