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                <title>सुप्रीम कोर्ट - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>सुप्रीम कोर्ट RSS Feed</description>
                
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                <title>अरविंद केजरीवाल ने किया जस्टिस स्वर्णकांता के कोर्ट का बहिष्कार, कहा- न्याय की उम्मीद नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>अरविंद केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्णकांता को पत्र लिखकर बताया कि उनके कोर्ट के समक्ष वो खुद या वकील के जरिए पेश नहीं होंगे। मेरी जस्टिस स्वर्णकांता से न्याय मिलने की उम्मीद टूट गई है, इसलिए मैंने गांधीजी के सत्याग्रह पर चलने का फैसला लिया है।आप नेता ने कहा, “मैंने यह फैसला अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनकर लिया है।” साथ ही उन्होंने कानूनी विकल्प भी खुला रखा। पत्र में उन्होंने जोड़ा, “मैं जस्टिस स्वर्णकांता के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार सुरक्षित रखता हूं।”</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">यह घटनाक्रम उन दिनों बाद आया है जब जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने खुद</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177435/arvind-kejriwal-boycotted-justice-swarnakantas-court-and-said-there"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/justice-swarana-kanta-arvind-kejriwal-2026-04-daca29956d6964f435922dd3db6b6bc3-1200x900.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>अरविंद केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्णकांता को पत्र लिखकर बताया कि उनके कोर्ट के समक्ष वो खुद या वकील के जरिए पेश नहीं होंगे। मेरी जस्टिस स्वर्णकांता से न्याय मिलने की उम्मीद टूट गई है, इसलिए मैंने गांधीजी के सत्याग्रह पर चलने का फैसला लिया है।आप नेता ने कहा, “मैंने यह फैसला अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनकर लिया है।” साथ ही उन्होंने कानूनी विकल्प भी खुला रखा। पत्र में उन्होंने जोड़ा, “मैं जस्टिस स्वर्णकांता के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार सुरक्षित रखता हूं।”</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह घटनाक्रम उन दिनों बाद आया है जब जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने खुद को मामले से हटाने (रिक्यूज) से इनकार कर दिया। केजरीवाल ने पूर्व में पक्षपात और हितों के टकराव का आरोप लगाते हुए रिक्यूजल की मांग की थी, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया। अदालत ने अपने आदेश में न्यायिक स्वतंत्रता के सिद्धांत पर जोर दिया और निष्पक्षता पर उठाए गए सवालों को अस्वीकार किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">केजरीवाल का पत्र और संदेशपत्र में केजरीवाल ने जोर देकर कहा कि वे जज के न्याय देने की क्षमता पर भरोसा खो चुके हैं। उन्होंने गांधीजी के अहिंसक विरोध के रास्ते को अपनाने का फैसला लिया है। इस कदम ने दिल्ली एक्साइज पॉलिसी घोटाले से जुड़े मामले में उनकी कानूनी लड़ाई को नया मोड़ दे दिया है।इससे पहले हुई सुनवाई पर जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने दिल्ली आबकारी नीति मामले से रिक्यूज करने यानी खुद को अलग करने से इनकार कर दिया था। उनके रिक्यूजल को लेकर दायर की गई याचिका पर सुनवाई के बाद जस्टिस शर्मा ने कहा, 'मैं इस केस से रिक्यूज़ नहीं करूंगी। मैं इस केस की सुनवाई करूंगी।' इसके साथ ही उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तथा अन्य आरोपियों की याचिका खारिज कर दी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">फरवरी 2026 में ट्रायल कोर्ट ने शराब नीति मामले में केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, कविता और अन्य 23 आरोपियों को बरी कर दिया था। कोर्ट ने सीबीआई की जांच की भी कड़ी आलोचना की थी। सीबीआई ने हाईकोर्ट में अपील दायर की है। इस अपील की सुनवाई जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा कर रही हैं। केजरीवाल के अलावा मनीष सिसोदिया, दुर्गेश पाठक और अन्य ने भी रिक्यूजल की याचिका दायर की थी।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
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                <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 18:38:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>कांग्रेस नेता पवन खेड़ा पहुंचे सुप्रीम कोर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने गौहाटी उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। बता दें कि, गौहाटी उच्च न्यायालय ने मानहानि और जालसाजी के एक मामले में उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी।  यह मामला असम पुलिस ने उनके खिलाफ दर्ज किया है। पवन खेड़ा ने अपनी अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने के बाद शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के मुताबिक, खेड़ा ने रविवार को एक स्पेशल लीव पिटीशन (एसएलपी) दायर की है, और इस मामले को डायरी नंबर 25523/2026 के तौर</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177433/congress-leader-pawan-kheda-reached-supreme-court-and-challenged-assam"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/8figkh4o_pawan-khera-pti_625x300_27_april_23.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने गौहाटी उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। बता दें कि, गौहाटी उच्च न्यायालय ने मानहानि और जालसाजी के एक मामले में उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी।  यह मामला असम पुलिस ने उनके खिलाफ दर्ज किया है। पवन खेड़ा ने अपनी अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने के बाद शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के मुताबिक, खेड़ा ने रविवार को एक स्पेशल लीव पिटीशन (एसएलपी) दायर की है, और इस मामले को डायरी नंबर 25523/2026 के तौर पर रजिस्टर किया गया है। शाम करीब 6.26 बजे दायर की गई यह याचिका फिलहाल 'पेंडिंग' के तौर पर लिस्टेड है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह याचिका गौहाटी हाईकोर्ट की ओर से खेड़ा को गिरफ्तारी से पहले जमानत देने से इनकार करने के दो दिन बाद आई है। जस्टिस पार्थिवज्योति सैकिया की सिंगल-जज बेंच ने फैसला सुनाया था कि कांग्रेस नेता 'गिरफ्तारी से पहले जमानत का विशेषाधिकार पाने के हकदार नहीं हैं।'</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">गौहाटी हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज करते हुए कहा था कि इस मामले को सिर्फ मानहानि का मामला नहीं कहा जा सकता। भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 की धारा 339 के तहत पहली नजर में मामला बनने के सबूत मौजूद हैं।असम पुलिस ने उनके खिलाफ मानहानि और जालसाजी का मामला दर्ज किया था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह मामला असम के मुख्यमंत्री हिमंत कुमार सरमा की पत्नी रिनिकी भुइयां सरमा ने दर्ज कराया है। उन्होंने खेड़ा के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई थी। खेड़ा ने हाल ही में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया था कि रिनिकी भुइयां सरमा के पास कई विदेशी पासपोर्ट और विदेशों में अघोषित संपत्तियां हैं।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 18:35:31 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>मुकदमों की पेंडिंग लिस्ट बढ़ने का सबसे बड़ा कारण जजों की संख्या है.।</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</strong></p>
<p style="text-align:justify;">इलाहाबाद हाईकोर्ट में केवल 110 जज हैं. इन जजों के भरोसे ये 12 लाख पेंडिंग केस हैं. केस निपटाने को लेकर जजों पर प्रेशर भी है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के तहत केसों की पेंडिंसि खत्म करनी है.</p>
<p style="text-align:justify;">इन्हीं दबावों के बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस सुभाष विद्यार्थी का बयान भी चर्चा में है. हाल ही में जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने एक सुनवाई के दौरान कहा था-मुझे भूख लग रही है, थकान महसूस हो रही है और मैं शारीरिक रूप से निर्णय देने में असमर्थ हूं. इसलिए फैसले की सुरक्षित रखा जाता है.</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसी बात कहने</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173065/the-biggest-reason-for-increasing-the-pending-list-of-cases"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/allahabad-high-court.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</strong></p>
<p style="text-align:justify;">इलाहाबाद हाईकोर्ट में केवल 110 जज हैं. इन जजों के भरोसे ये 12 लाख पेंडिंग केस हैं. केस निपटाने को लेकर जजों पर प्रेशर भी है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के तहत केसों की पेंडिंसि खत्म करनी है.</p>
<p style="text-align:justify;">इन्हीं दबावों के बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस सुभाष विद्यार्थी का बयान भी चर्चा में है. हाल ही में जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने एक सुनवाई के दौरान कहा था-मुझे भूख लग रही है, थकान महसूस हो रही है और मैं शारीरिक रूप से निर्णय देने में असमर्थ हूं. इसलिए फैसले की सुरक्षित रखा जाता है.</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसी बात कहने के पीछ जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की मजबूरी यह थी कि 24 फरवरी को ऋण वसूली न्यायाधिकरण (डीआरटी) के एक आदेश के खिलाफ सुनवाई के बाद न्यायाधीश ने तत्काल आदेश पारित करने के बजाय, टिप्पणी के साथ फैसला सुरक्षित रख लिया.</p>
<p style="text-align:justify;">24 फरवरी का दिन जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की अदालत के लिए बेहद व्यस्त रहा. उनकी लिस्ट में कुल 235 मामले लगे थे. इनमें 92 नए केस, 101 नियमित मामले, 39 विविध आवेदन और 3 एडिशनल लिस्ट के मामले शामिल थे. दोपहर 4:15 बजे तक जस्टिस विद्यार्थी केवल 29 नए मामलों की ही सुनवाई कर पाए थे.</p>
<p style="text-align:justify;">इसी बीच उन्हें सूचित किया गया कि अगला मामला सुप्रीम कोर्ट द्वारा रिमांड (वापस भेजा गया) किया गया है और इसकी समय सीमा 24 फरवरी को ही समाप्त हो रही है. इसके बाद जस्टिस विद्यार्थी ने इस विशेष मामले की सुनवाई शुरू की, जो लगातार शाम 7 बजे तक चली.</p>
<p style="text-align:justify;">जज की इस टिप्पणी ने एक नई बहस छेड़ दी है. यह वाकया दर्शाता है कि भारतीय अदालतों में जजों पर काम का कितना दबाव है. एक ही दिन में 200 से अधिक केस लिस्ट होना और फिर देर शाम तक सुनवाई करना किसी भी व्यक्ति के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से चुनौतीपूर्ण होता है.</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल  सुप्रीम कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट तक केस की बड़ी पेंडेंसी है. वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में लगभग 92800 मामले पेंडिंग हैं. जिनमें से 72000 मामले सिविल के हैं और 20800 मामले अपराधिक (फौजदारी) के हैं. पिछले एक साल में सुप्रीम कोर्ट में 10000 से अधिक पेंडेंसी बढ़ी है.</p>
<p style="text-align:justify;">पूरे देश में सबसे ज्यादा पेंडेंसी इलाहाबाद हाईकोर्ट में है. इलाहाबाद हाईकोर्ट में लगभग 12 लाख केस पेंडिंग हैं. बड़ी बात यह है कि पूरे देश में हाईकोर्ट में जितने केस पेंडिंग हैं उसका 20% यानी की पांचवां हिस्सा अकेले इलाहाबाद हाईकोर्ट में है. इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में 22265 मामले पेंडिंग हैं.</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट में जजों के 34 पद हैं, जिनमें से 33 पदों पर वर्तमान में नियुक्तियां हैं, एक पद खाली है. निर्धारित पदों के सापेक्ष जजों की नियुक्ति होने के बावजूद भी पेंडेंसी 92828 है, जो यह दर्शाती है कि कोर्ट में आने वाले केसों की रफ्तार काफी तेज है. इलाहाबाद हाईकोर्ट की बात करें तो कुल 160 जजों के पद हैं, जिनमें से 110 पदों पर नियुक्ति है. 50 पद खाली हैंं. यानि इलाहाबाद हाईकोर्ट में 31% जजों के पद खाली हैं.</p>
<p style="text-align:justify;">अगर पूरे देश के हाईकोर्ट की बात करें तो सभी 25 हाईकोर्ट में कुल 1114 पद सृजित हैं, जिनमें से 804 पदों पर जज नियुक्त हैं. पूरे देश में हाईकोर्ट के 310 पदों पर जजों की नियुक्ति नहीं है. इसका मतलब पूरे देश में हाईकोर्ट के 27.8 प्रतिशत जजों के पद खाली हैं.</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट ही नहीं जिला कोर्ट में भी केस की संख्या अधिक होने के चलते जज पर काम का प्रेशर होता है. वहीं पक्षकारों को भी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. कोर्ट पर अधिक दबाव होने के चलते मुकदमे की सुनवाई समय से नहीं हो पाती है. एक दिन में अधिक मामले सुनाने पड़ते हैं जिसके चलते केस पर जज अधिक समय नहीं दे पाते और तारीख पर तारीख का खेल चलता रहता है.</p>
<p style="text-align:justify;">आपराधिक मामलों में कोर्ट पर ओवर बर्डन होने के चलते बेल मिलने में समस्या होती है. एक हियरिंग के लिए लिस्टिंग करने के बाद दूसरी हियरिंग की लिस्टिंग होने में महीनों का समय लग जाता है. ऐसे में अगर एक हियरिंग पर किन्ही कारणों से बेल रिजेक्ट होती है, तो दूसरी बेल का मौका मिलने में कई बार महीनों का समय लगता है.</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 09 Mar 2026 23:01:09 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
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                <title>जजों को भी नहीं पता कि कॉलेजियम कहाँ बैठता है: सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता।</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</strong></p><p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता ने शनिवार को कॉलेजियम के कामकाज में पारदर्शिता न होने पर चिंता जताई, जो हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों को अपॉइंट करता है। उन्होंने कहा कि ज्यूडिशियल अपॉइंटमेंट आखिरकार जेंडर के आधार पर नंबरों के आधार पर नहीं, बल्कि मेरिट के आधार पर होने चाहिए।वह महिला दिवस मनाने के लिए इंडियन वीमेन इन लॉ (IWiL) द्वारा आयोजित एक कॉन्फ्रेंस में बोल रहे थे।</p><p style="text-align:justify;">जस्टिस दत्ता ने कहा कि ट्रांसपेरेंसी की कमी इतनी है कि जजों को भी अक्सर इस बारे में बहुत कम क्लैरिटी होती है कि कॉलेजियम</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173063/even-judges-do-not-know-where-the-collegium-sits-supreme"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/supreme-court-4.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</strong></p><p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता ने शनिवार को कॉलेजियम के कामकाज में पारदर्शिता न होने पर चिंता जताई, जो हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों को अपॉइंट करता है। उन्होंने कहा कि ज्यूडिशियल अपॉइंटमेंट आखिरकार जेंडर के आधार पर नंबरों के आधार पर नहीं, बल्कि मेरिट के आधार पर होने चाहिए।वह महिला दिवस मनाने के लिए इंडियन वीमेन इन लॉ (IWiL) द्वारा आयोजित एक कॉन्फ्रेंस में बोल रहे थे।</p><p style="text-align:justify;">जस्टिस दत्ता ने कहा कि ट्रांसपेरेंसी की कमी इतनी है कि जजों को भी अक्सर इस बारे में बहुत कम क्लैरिटी होती है कि कॉलेजियम कैसे काम करता है और यह कहाँ मिलता है।उन्होंने कहा, "आपको यह जानकर हैरानी होगी कि न केवल हम जानते हैं कि क्या हो रहा है... हमें यह भी नहीं पता कि कॉलेजियम कहाँ बैठ रहा है।"</p><p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि ज्यूडिशियल अपॉइंटमेंट आखिरकार जेंडर के आधार पर नंबरों के आधार पर नहीं, बल्कि मेरिट के आधार पर होने चाहिए।वह महिला दिवस मनाने के लिए इंडियन वीमेन इन लॉ (IWiL) द्वारा आयोजित एक कॉन्फ्रेंस में बोल रहे थे।</p><p style="text-align:justify;">जस्टिस दत्ता, जो पहले बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रह चुके हैं, ने कहा कि उनके कार्यकाल के दौरान, ऑब्जेक्टिव क्राइटेरिया की कमी का मतलब था कि जजों को अपने सामने पेश होने वाले वकीलों के अपने असेसमेंट पर निर्भर रहना पड़ता था।उन्होंने कहा, “बॉम्बे हाई कोर्ट में, क्योंकि कोई ऑब्जेक्टिव क्राइटेरिया नहीं था, इसलिए हमने अपने सामने वकीलों के परफॉर्मेंस का असेसमेंट किया।”</p><p style="text-align:justify;">बाद में जज बनी महिलाओं का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा:“जस्टिस शंपा सरकार, जस्टिस अमृता सिन्हा, जस्टिस मौसमी भट्टाचार्य, जब मैं वहां (कलकत्ता हाई कोर्ट) था तो मैंने जिस तरह की पूछताछ की… अब मुझे यकीन है कि वे सभी वकीलों को संभाल सकती हैं।”जस्टिस दत्ता ने ज्यूडिशियरी में महिलाओं के रिप्रेजेंटेशन पर बातचीत को सिर्फ नंबरों तक सीमित करने के खिलाफ चेतावनी दी।</p><p style="text-align:justify;">“जब  समय का एक किस्सा भी सुनाया जब उन्होंने एक महिला वकील के प्रमोशन के सुझाव को मना कर दिया था।“एक जज ने मुझे फ़ोन किया और कहा कि छह लोगों के नाम रिकमेंड किए जा रहे हैं। महिला के नाम क्यों नहीं? मैंने उस जज से कहा नहीं। मैंने कहा कि वह वकील मेरे सामने पेश हुई और वह नासमझ है और मुझे उसे मैच्योर होने के लिए समय देना होगा।”</p><p style="text-align:justify;">जम्मू और कश्मीर हाई कोर्ट की पूर्व चीफ जस्टिस गीता मित्तल ने रविवार को खुलकर उन चुनौतियों के बारे में बात की जिनका सामना महिलाओं को ज्यूडिशियरी में आने और आगे बढ़ने में करना पड़ता है।</p><p style="text-align:justify;">सरकार ने कहा, "एक पुराना क्लाइंट आया और जब मैं आगे बढ़ी तो उसने कहा 'अरे यह सब लड़की दुल्हन मत दीजिए'। फिर एक पुरुष सहकर्मी उसके साथ चला गया। अगर मैंने तब आपत्ति जताई होती, तो यह खत्म हो गया होता।"</p><p style="text-align:justify;">सरकार ने आगे कहा कि महिला वकीलों को मेंटरशिप की कमी, सैलरी में अंतर और कोर्टरूम के अंदर के रवैये जैसी दूसरी रुकावटों का भी सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा, “मेंटरिंग की कमी है और उन्हें अच्छे सीनियर नहीं मिलते। फिर स्ट्रक्चरल पेमेंट का मुद्दा है। उनसे पूछा जाता है ‘कितना काम लेती हो? इतना तो पॉकेट मनी देंगे’। तो यह एक और मुद्दा है। फिर कोर्टरूम बायस आता है। जजों ने भी कई बार हमें गंभीरता से नहीं लिया है।”</p><h4 style="text-align:justify;"><strong> 12 लाख पेंडिंग केस, जज महज 110, 'भूखा और थका हूं' कहने वाले जज की क्या है मजबूरी</strong></h4><p style="text-align:justify;">इलाहाबाद हाईकोर्ट मुकदमों के बोझ तले दबा हुआ है. यहां नए-पुराने करीब 12 लाख केसेज पेंडिंग हैं. इनमें कई पुराने मुकदमे ऐसे हैं जिनका नए मुकदमों के बीच नंबर ही नहीं आ रहा है. मतलब साफ है न्याय के लिए लंबी वेटिंग चल रही है.<br /></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>जन समस्याएं</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 09 Mar 2026 22:57:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>छह साल तक फैसला न सुनाने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, इलाहाबाद हाइकोर्ट से तीन मामले अपने पास मंगाए</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाइकोर्ट द्वारा छह साल तक फैसला सुरक्षित रखने के बावजूद निर्णय न सुनाए जाने पर कड़ा रुख अपनाते हुए तीन आपराधिक पुनर्विचार याचिकाएं अपने पास स्थानांतरित कर ली हैं। इन मामलों के लंबित रहने के कारण वर्ष 1994 के एक हत्या मामले की सुनवाई वर्षों से ठप पड़ी हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 139ए का प्रयोग करते हुए कहा कि सामान्यतः अदालतें अनुच्छेद 32 की याचिका में इस तरह की असाधारण शक्ति का उपयोग नहीं करतीं लेकिन इस मामले में न्याय में हो रही असाधारण देरी से</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172572/supreme-court-strict-on-not-giving-verdict-for-six-years"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/supream-court1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाइकोर्ट द्वारा छह साल तक फैसला सुरक्षित रखने के बावजूद निर्णय न सुनाए जाने पर कड़ा रुख अपनाते हुए तीन आपराधिक पुनर्विचार याचिकाएं अपने पास स्थानांतरित कर ली हैं। इन मामलों के लंबित रहने के कारण वर्ष 1994 के एक हत्या मामले की सुनवाई वर्षों से ठप पड़ी हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 139ए का प्रयोग करते हुए कहा कि सामान्यतः अदालतें अनुच्छेद 32 की याचिका में इस तरह की असाधारण शक्ति का उपयोग नहीं करतीं लेकिन इस मामले में न्याय में हो रही असाधारण देरी से पीड़ित पक्ष के त्वरित न्याय के अधिकार पर सीधा असर पड़ रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">पीठ ने कहा कि संबंधित तीनों आपराधिक पुनर्विचार याचिकाओं पर इलाहाबाद हाइकोर्ट में 5 फरवरी 2020 को सुनवाई पूरी हो चुकी थी और उसी दिन फैसला सुरक्षित रख लिया गया। इसके बाद अब तक कोई निर्णय नहीं दिया गया और मामले बार-बार सूचीबद्ध होकर टलते रहे। हाल ही में 4 फरवरी 2026 को भी मामले सूची में आए, लेकिन फिर स्थगित कर दिए गए।</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इन याचिकाओं पर लगी रोक के कारण ट्रायल कोर्ट में चल रहा मुकदमा आगे नहीं बढ़ सका, जिसके चलते 30 मई 1994 की घटना से जुड़ी आपराधिक कार्यवाही दशकों से रुकी हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">पीठ ने कहा, “इन मामलों का लंबित रहना केवल पक्षकारों का निजी विवाद नहीं रह गया। यह इस बात से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है कि मुकदमों में लंबी देरी न्याय प्रक्रिया की विश्वसनीयता को कैसे प्रभावित करती है और इससे अपूरणीय क्षति हो सकती है।”</p>
<p style="text-align:justify;">इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 139ए के तहत इलाहाबाद हाइकोर्ट में लंबित तीनों पुनर्विचार याचिकाओं को अपने पास मंगाने का आदेश दिया और उन्हें वर्तमान रिट याचिका के साथ जोड़कर सुनवाई करने का निर्णय लिया। अदालत ने इलाहाबाद हाइकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि तीन सप्ताह के भीतर सभी अभिलेख सुप्रीम कोर्ट भेजे जाएं।</p>
<p style="text-align:justify;">यह याचिका मृतक के कानूनी उत्तराधिकारी द्वारा अनुच्छेद 32 के तहत दायर की गई। याचिका में अनुच्छेद 14 और 21 के तहत त्वरित न्याय के अधिकार के उल्लंघन का मुद्दा उठाया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">मामले की शुरुआत वर्ष 1995 में दर्ज FIR से हुई, जिसमें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 147, 148, 149, 302 और 307 के तहत नौ लोगों को आरोपी बनाया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">एक अन्य आरोपी के खिलाफ मामला वर्ष 2004 में दर्ज हुआ, क्योंकि वह पहले फरार था। वर्ष 2008 में उत्तर प्रदेश सरकार ने आरोपी छोटेय सिंह के खिलाफ मुकदमा वापस लेने का प्रस्ताव दिया और 2012 में CrPC की धारा 321 के तहत आवेदन दाखिल किया। बाद में सरकार ने सभी आरोपियों के खिलाफ मुकदमा वापस लेने की मांग भी की।</p>
<p style="text-align:justify;">19 मई 2012 को ट्रायल कोर्ट ने छोटेय सिंह के खिलाफ अभियोजन वापसी की अनुमति दी, लेकिन अन्य आरोपियों के खिलाफ मुकदमा वापस लेने की मांग खारिज की।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी आदेश को चुनौती देते हुए आरोपियों ने हाइकोर्ट में आपराधिक पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल कीं, जबकि पीड़ित पक्ष ने छोटेय सिंह के खिलाफ मुकदमा वापस लेने के फैसले को चुनौती दी। इन याचिकाओं की सुनवाई इलाहाबाद हाइकोर्ट में पूरी होने के बाद 5 फरवरी 2020 को फैसला सुरक्षित रख लिया गया। उसी दौरान मुकदमे की सुनवाई पर रोक भी लगा दी गई, जो आज तक जारी रही।</p>
<p style="text-align:justify;">इस मामले से जुड़े एक अन्य पहलू पर सुप्रीम कोर्ट ने 15 जुलाई, 2024 को भी हस्तक्षेप किया। उस समय अदालत ने हाइकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए मामले का पुनर्मूल्यांकन करने का निर्देश दिया था और मुकदमे में हो रही देरी पर गंभीर चिंता व्यक्त की थी।</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने अब कहा कि जब तक लंबित पुनरीक्षण याचिकाओं पर निर्णय नहीं होता, तब तक 2024 के आदेश का प्रभावी पालन संभव नहीं है। इसलिए न्याय प्रक्रिया को प्रभावी बनाने और त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के लिए इन मामलों को अपने पास स्थानांतरित करना आवश्यक हो गया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 05 Mar 2026 22:39:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>सीजेआई ऑफिस को पिछले 10 सालों में मौजूदा जजों के खिलाफ 8,630 शिकायतें मिलीं</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>केंद्रीय कानून मंत्रालय ने शुक्रवार को संसद में बताया कि पिछले दस सालों में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) के ऑफिस को मौजूदा जजों के खिलाफ 8,360 शिकायतें मिली हैं।यह जानकारी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के सांसद (MP) मथेश्वरन वी.एस. के शुक्रवार को लोकसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में दी गई। MP ने हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जजों के खिलाफ मिली भ्रष्टाचार, यौन दुर्व्यवहार या दूसरी गंभीर गड़बड़ियों से जुड़ी शिकायतों की लिस्ट मांगी थी।</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट से मिले डेटा के आधार पर, कानून और न्याय राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने एक लिखित</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/169573/cji-office-received-8630-complaints-against-sitting-judges-in-last"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/4654487.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>केंद्रीय कानून मंत्रालय ने शुक्रवार को संसद में बताया कि पिछले दस सालों में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) के ऑफिस को मौजूदा जजों के खिलाफ 8,360 शिकायतें मिली हैं।यह जानकारी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के सांसद (MP) मथेश्वरन वी.एस. के शुक्रवार को लोकसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में दी गई। MP ने हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जजों के खिलाफ मिली भ्रष्टाचार, यौन दुर्व्यवहार या दूसरी गंभीर गड़बड़ियों से जुड़ी शिकायतों की लिस्ट मांगी थी।</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट से मिले डेटा के आधार पर, कानून और न्याय राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने एक लिखित जवाब दिया जिसमें कहा गया कि 2016-2025 के बीच 8,360 शिकायतें मिलीं। मथेश्वरन ने यह भी पूछा कि क्या इन शिकायतों पर कोई कार्रवाई की गई। हालांकि, कानून मंत्रालय के जवाब में उस पहलू पर ध्यान नहीं दिया गया। यह भी नहीं बताया गया कि शिकायतों पर की गई कार्रवाई का कोई रिकॉर्ड क्यों नहीं था।</p>
<p style="text-align:justify;">एक और सवाल उठाया गया कि क्या केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जजों के खिलाफ मिली भ्रष्टाचार, यौन दुर्व्यवहार या अन्य गंभीर अनियमितताओं से संबंधित शिकायतों का रिकॉर्ड या डेटाबेस बनाए रखने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले किसी सिस्टम के बारे में पता है।</p>
<p style="text-align:justify;">जवाब में सिर्फ इतना कहा गया कि भारत के चीफ जस्टिस और हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस "इन-हाउस प्रोसीजर" के अनुसार जजों के खिलाफ शिकायतें लेने के लिए सक्षम हैं। जवाब में कहा गया कि हायर ज्यूडिशियरी के सदस्यों के खिलाफ सेंट्रलाइज्ड पब्लिक ग्रीवांस रिड्रेस एंड मॉनिटरिंग सिस्टम (CPGRAMS) या किसी और तरीके से मिली शिकायतें CJI या संबंधित हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस को भेजी जाती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">मंत्री ने मथेश्वरन के इस सवाल का भी जवाब नहीं दिया कि क्या सरकार हायर ज्यूडिशियरी के सदस्यों के खिलाफ शिकायतों की सिस्टमैटिक रिकॉर्डिंग, मॉनिटरिंग और अकाउंटेबिलिटी पक्का करने के लिए गाइडलाइन जारी करने या कदम उठाने का विचार कर रही है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/169573/cji-office-received-8630-complaints-against-sitting-judges-in-last</link>
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                <pubDate>Fri, 13 Feb 2026 21:00:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>प्राइमरी टीचरों को दस साल तक हर महीने 7000 रुपये देना बंधुआ मज़दूरी है: सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार से 17 हज़ार रुपये देने को कहा</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>  ब्यूरो प्रयागराज । </strong>सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (4 फरवरी) को उत्तर प्रदेश सरकार की "गलत हरकतों" के लिए आलोचना की। कोर्ट ने कहा कि राज्य के प्राइमरी स्कूल टीचरों/इंस्ट्रक्टरों को एक दशक से ज़्यादा समय तक हर महीने सिर्फ़ 7,000 रुपये का मामूली फिक्स्ड मानदेय देकर एक तरह की 'बेगार' करवाई जा रही है।ई</p>
<p>टीचरों को मिलने वाली सैलरी स्थिर और कम होने पर जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने राज्य सरकार को सभी टीचरों को हर महीने 17,000 रुपये का मानदेय देने का निर्देश दिया। यह फैसला फाइनेंशियल ईयर 2017-18 से लागू होगा और</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/168357/paying-rs-7000-per-month-to-primary-teachers-for-ten"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/supreme-court-ugc-regulations.webp" alt=""></a><br /><p><strong> ब्यूरो प्रयागराज । </strong>सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (4 फरवरी) को उत्तर प्रदेश सरकार की "गलत हरकतों" के लिए आलोचना की। कोर्ट ने कहा कि राज्य के प्राइमरी स्कूल टीचरों/इंस्ट्रक्टरों को एक दशक से ज़्यादा समय तक हर महीने सिर्फ़ 7,000 रुपये का मामूली फिक्स्ड मानदेय देकर एक तरह की 'बेगार' करवाई जा रही है।ई</p>
<p>टीचरों को मिलने वाली सैलरी स्थिर और कम होने पर जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने राज्य सरकार को सभी टीचरों को हर महीने 17,000 रुपये का मानदेय देने का निर्देश दिया। यह फैसला फाइनेंशियल ईयर 2017-18 से लागू होगा और बकाया छह महीने के अंदर देना होगा।</p>
<p>कोर्ट ने कहा, "...यूपी राज्य के अपर प्राइमरी स्कूलों में नियुक्त पार्ट टाइम कॉन्ट्रैक्ट टीचर/इंस्ट्रक्टर अपने 7,000 रुपये प्रति माह के मानदेय में बढ़ोतरी के हकदार हैं, जो शुरू में 2013 में ग्यारह महीने के कॉन्ट्रैक्ट पीरियड के लिए तय किया गया और यह बढ़ोतरी, अगर सालाना नहीं तो PAB के विवेक के अनुसार समय-समय पर होनी चाहिए। चूंकि 2017-18 के लिए PAB ने उक्त मानदेय 17,000 रुपये प्रति माह तय किया, इसलिए इस योजना के तहत नियुक्त सभी इंस्ट्रक्टर/टीचर 2017-18 से आगे की बढ़ोतरी होने तक 17,000 रुपये प्रति माह की दर से भुगतान के हकदार हैं।"</p>
<p>सुनवाई के दौरान, राज्य सरकार ने मुख्य कारण यह बताया कि केंद्र सरकार इस योजना के तहत अपने हिस्से की फंडिंग नहीं दे रही है। राज्य सरकार ने बताया कि समग्र शिक्षा योजना (जो सर्व शिक्षा अभियान की जगह लाई गई) के तहत ऐसी केंद्र प्रायोजित योजनाओं का वित्तीय बोझ 60:40 के अनुपात (केंद्र:राज्य) में बांटा जाता है। राज्य ने तर्क दिया कि अगर केंद्र सरकार अपना 60% हिस्सा जारी नहीं करती है, तो राज्य को पूरा खर्च उठाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।</p>
<p>कोर्ट ने कहा, "प्रशिक्षकों/शिक्षकों को मानदेय देने का शुरुआती बोझ राज्य सरकार पर है, जो 'भुगतान करो और वसूल करो' के सिद्धांत पर भारत संघ से केंद्र सरकार का योगदान वसूल करने के लिए स्वतंत्र है।"</p>
<p> कोर्ट ने आगे कहा, "उपरोक्त प्रावधान को साधारण रूप से पढ़ने से पता चलता है कि राज्य सरकार न केवल केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकार को दी गई रकम को ध्यान में रखेगी, बल्कि अपने अन्य संसाधनों को भी ध्यान में रखेगी और अधिनियम के प्रावधानों को लागू करने के लिए धन उपलब्ध कराने के लिए जिम्मेदार होगी। इसलिए राज्य सरकार पर अधिनियम के प्रावधानों को लागू करने के संबंध में प्रशिक्षकों/शिक्षकों को मानदेय के भुगतान के लिए भारी कर्तव्य डाला गया। इसलिए पूरी गंभीरता से अधिनियम या उसके तहत बनाई गई योजना के तहत नियुक्त प्रशिक्षकों/शिक्षकों को मानदेय देना राज्य सरकार का प्राथमिक कर्तव्य है।</p>
<p>यदि केंद्र सरकार अपने वित्त का हिस्सा देने में विफल रहती है तो राज्य सरकार इसे केंद्र सरकार से वसूल करने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन प्रशिक्षकों/शिक्षकों को भुगतान से इनकार नहीं कर सकती। 'भुगतान करो और वसूल करो' का सिद्धांत इस तरह लागू होगा और मान्य होगा।"</p>
<p>लाइव लॉ के अनुसार निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले गए:</p>
<p>पार्ट टाइम या कॉन्ट्रैक्ट पर रखे गए इंस्ट्रक्टर/टीचर की नियुक्ति असल में तब कॉन्ट्रैक्ट वाली नहीं रह जाती, जब ग्यारह महीने की कॉन्ट्रैक्ट अवधि, जिसके लिए उन्हें शुरू में नियुक्त किया गया, या बढ़ाई गई कॉन्ट्रैक्ट अवधि खत्म हो जाती है।</p>
<p>वे पार्ट टाइम इंस्ट्रक्टर/टीचर भी नहीं थे क्योंकि उन्हें खास तौर पर अपने खाली समय में कहीं और कोई नौकरी या पार्ट टाइम काम करने से मना किया गया।</p>
<p>असल में ये इंस्ट्रक्टर/टीचर जो लगातार दस साल से ज़्यादा समय से काम कर रहे हैं, उन्हें स्थायी पदों पर स्थायी रूप से नियुक्त माना जाएगा, क्योंकि समय बीतने के साथ और काम की निरंतरता को ध्यान में रखते हुए, ऐसे पद अपने आप बन जाते हैं।</p>
<p>PAB Act और स्कीम के तहत बजट और फाइनेंस को मैनेज करने और उसके तहत नियुक्त इंस्ट्रक्टर/टीचर के लिए मानदेय तय करने वाली एकमात्र केंद्रीय अथॉरिटी है। फाइनेंस और बजट से जुड़े मामले में, और नतीजतन मानदेय तय करने में, किसी अन्य अथॉरिटी का कोई दखल नहीं है। PAB द्वारा एक बार इन 44 इंस्ट्रक्टर/टीचर को प्रति माह 17,000/- रुपये मानदेय तय करने के प्रस्ताव को मंज़ूरी देने के बाद कोई भी अथॉरिटी ऐसे फैसले पर रोक नहीं लगा सकती और इसके विपरीत आदेश पारित नहीं कर सकती।</p>
<p>इंस्ट्रक्टर/टीचर को मानदेय देने का शुरुआती बोझ राज्य सरकार पर है, जो "भुगतान करो और वसूल करो" के सिद्धांत पर भारत संघ से केंद्र सरकार का योगदान वसूल करने के लिए स्वतंत्र है।</p>
<p>इन इंस्ट्रक्टर/टीचर को देय मानदेय को स्थिर नहीं रहने दिया जा सकता है। इसे PAB या किसी अन्य अथॉरिटी द्वारा, जैसा कि केंद्र सरकार/राज्य सरकार द्वारा स्कीम या संशोधित स्कीम के तहत तय किया जा सकता है, कम से कम हर तीन साल में एक बार संशोधित किया जाएगा। viii) राज्य/केंद्र सरकार का इंस्ट्रक्टर/टीचर को 7,000/- रुपये प्रति माह के निश्चित मानदेय पर नियुक्त करने का कोई भी कार्य, जैसा कि शुरू में 2013-14 में तय किया गया, 'बेगार' और अनुचित प्रथा के बराबर है, जो संविधान के अनुच्छेद 23 का उल्लंघन है।</p>
<p>चूंकि PAB ने इन इंस्ट्रक्टरों/टीचरों के लिए 2017-18 से 17,000/- रुपये प्रति माह की दर से फिक्स्ड मानदेय तय किया, इसलिए राज्य सरकार/केंद्र सरकार का उन्हें 8,470/- रुपये या 9,800/- रुपये या 7,000/- रुपये प्रति माह की बेसिक दर से कम भुगतान करना सही नहीं है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 05 Feb 2026 23:05:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">संवाददाता सचिन बाजपेई</p>
<div style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली।</strong> सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा जारी किए गए नए इक्विटी नियमों (UGC Equity Regulations, 2026) पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि जब तक इस मामले में कोई नया आदेश नहीं दिया जाता, तब तक वर्ष 2012 के UGC नियम ही लागू रहेंगे। यह आदेश मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने बुधवार को सुनवाई के दौरान दिया।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">UGC के नए नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अदालत ने प्रारंभिक टिप्पणी में कहा कि नियमों की भाषा</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/167617/supreme-court-ban-on-new-rules-of-ugc"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-01/fb_img_1769674509415.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">संवाददाता सचिन बाजपेई</p>
<div style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली।</strong> सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा जारी किए गए नए इक्विटी नियमों (UGC Equity Regulations, 2026) पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि जब तक इस मामले में कोई नया आदेश नहीं दिया जाता, तब तक वर्ष 2012 के UGC नियम ही लागू रहेंगे। यह आदेश मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने बुधवार को सुनवाई के दौरान दिया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">UGC के नए नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अदालत ने प्रारंभिक टिप्पणी में कहा कि नियमों की भाषा अस्पष्ट है और इनके दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने नए नियमों के क्रियान्वयन पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाने का निर्देश दिया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कोर्ट की अहम टिप्पणी</strong></div>
<div style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान CJI जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि जब किसी नियम की व्याख्या स्पष्ट नहीं होती, तो उसका गलत इस्तेमाल संभव है। उन्होंने कहा कि शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में ऐसे प्रावधानों का लागू होना गंभीर परिणाम पैदा कर सकता है। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि किसी भी नियामक व्यवस्था का उद्देश्य समानता और न्याय सुनिश्चित करना होना चाहिए, न कि भ्रम और विवाद को जन्म देना।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>2012 के नियम रहेंगे प्रभावी</strong></div>
<div style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में साफ किया कि UGC के 2012 के नियम ही फिलहाल प्रभावी रहेंगे। इसका मतलब यह है कि देशभर के विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में नए इक्विटी नियमों के तहत कोई नई व्यवस्था लागू नहीं होगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>नए नियमों को लेकर विवाद</strong></div>
<div style="text-align:justify;">UGC के 2026 के नए नियमों में प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्थान में इक्विटी कमेटी के गठन और भेदभाव से जुड़े मामलों की निगरानी के लिए विशेष तंत्र बनाने का प्रावधान था। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि नियमों के कई प्रावधान स्पष्ट नहीं हैं और इससे संस्थानों की स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है, साथ ही मनमानी कार्रवाई की गुंजाइश भी बनती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>केंद्र को समिति बनाने का सुझाव</strong></div>
<div style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को सुझाव दिया कि इन नियमों की व्यापक समीक्षा के लिए शिक्षाविदों और विशेषज्ञों की एक समिति गठित की जाए, ताकि सभी पक्षों से विचार-विमर्श कर अधिक संतुलित और स्पष्ट नियम बनाए जा सकें।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>अगली सुनवाई</strong></div>
<div style="text-align:justify;">मामले की अगली सुनवाई तक नए नियम लागू नहीं होंगे। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को उच्च शिक्षा क्षेत्र में एक अंतरिम राहत के रूप में देखा जा रहा है। साथ ही, यह आदेश सरकार और UGC के लिए नियमों को अधिक स्पष्ट, व्यावहारिक और पारदर्शी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 29 Jan 2026 18:09:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अरावली मामला: सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी बनाने के निर्देश दिए, अवैध खनन पर राज्य सरकार को सख्त निर्देश</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal"><strong>ब्यूरो प्रयागराज<span lang="hi" xml:lang="hi">।</span> </strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अरावली पर्वतमाला के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अगले आदेश तक यथास्थिति को बनाए रखने का आदेश दिया है। कोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार को अरावली में किसी भी अवैध खनन गतिविधि पर रोक सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">बुधवार को मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने मामले की सुनवाई की। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में एक कमेटी बनाने के निर्देश दिए हैं। सीजेआई ने कहा कि कोर्ट और कड़ी निगरानी पर विचार कर रहा है। उन्होंने कहा</span>, "<span lang="hi" xml:lang="hi">हम एक कमेटी बनाएंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें अपने-अपने</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/166965/aravalli-case-supreme-court-directs-to-form-a-committee-strict"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-01/supream-court5.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal"><strong>ब्यूरो प्रयागराज<span lang="hi" xml:lang="hi">।</span> </strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अरावली पर्वतमाला के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अगले आदेश तक यथास्थिति को बनाए रखने का आदेश दिया है। कोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार को अरावली में किसी भी अवैध खनन गतिविधि पर रोक सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">बुधवार को मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने मामले की सुनवाई की। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में एक कमेटी बनाने के निर्देश दिए हैं। सीजेआई ने कहा कि कोर्ट और कड़ी निगरानी पर विचार कर रहा है। उन्होंने कहा</span>, "<span lang="hi" xml:lang="hi">हम एक कमेटी बनाएंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें अपने-अपने क्षेत्र के एक्सपर्ट होंगे। यह कमेटी अरावली को लेकर रिपोर्ट देगी। कमेटी कोर्ट के निर्देश और गाइडेंस में काम करेगी।"</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">राजस्थान के किसानों की ओर से पेश वकील राजू रामचंद्रन ने कोर्ट को बताया कि जस्टिस ओका बेंच के 2024 के आदेशों के बावजूद खनन पट्टे दिए जा रहे हैं और पेड़ काटे जा रहे हैं। उन्होंने इस पर रोक की मांग की। इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने चिंता जताई और कहा कि अवैध खनन को रोकना होगा। यह एक अपराध है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने अधिकारियों से कहा कि आपको अपनी मशीनरी को काम में लाना होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि अवैध खनन के विनाशकारी परिणाम हो सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार से कहा कि वह सुनिश्चित करें कि कोई गैरकानूनी खनन न हो। कोर्ट ने सभी पक्षकारों से पर्यावरणविदों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिकों और माइनिंग एक्सपर्ट्स के नामों को लेकर सुझाव मांगे।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">अरावली पहाड़ियों की परिभाषा को लेकर जारी विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने फिर एक बार महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मुद्दा मात्र तकनीकी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि देश के पर्यावरण भविष्य से जुड़ा हुआ है. अदालत ने साफ निर्देश दिया कि अरावली क्षेत्र में किसी भी प्रकार का अवैध खनन बर्दाश्त नहीं किया जाएगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि ऐसे खनन के परिणाम “अपूर्णीय और दूरगामी” होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्हें बाद में सुधारना संभव नहीं होता.</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट ने यह भी दोहराया कि अरावली की वैज्ञानिक और स्पष्ट परिभाषा तय करने के लिए एक हाई</span>‑<span lang="hi" xml:lang="hi">पावर्ड कमेटी बनाई जाएगी. इस समिति में पर्यावरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वानिकी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भू</span>‑<span lang="hi" xml:lang="hi">विज्ञान और संबंधित क्षेत्रों के स्वतंत्र विशेषज्ञ शामिल होंगे. अदालत ने सभी पक्षों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें एमिकस क्यूरी भी शामिल हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">से समिति के संभावित सदस्यों के नाम और सुझाव चार हफ्ते में पेश करने को कहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">कोर्ट ने अपने उस पुराने फैसले पर लगी रोक को भी बढ़ा दिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को ही अरावली मानने की सिफारिश थी. पर्यावरण मंत्रालय की समिति की इस सिफारिश को अदालत ने पहले ही पुनर्विचार योग्य बताते हुए स्थगित कर दिया था. अदालत का मानना है कि यह मुद्दा संवेदनशील है और इसे जल्दबाजी में तय नहीं किया जा सकता. इसलिए नई विशेषज्ञ समिति तथ्यात्मक और वैज्ञानिक आधार पर नई परिभाषा की सिफारिश देगी।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुनवाई के दौरान एक वकील ने राजस्थान के कई क्षेत्रों में लगातार चल रहे अवैध खनन का मुद्दा उठाया. इस पर न्यायालय ने राजस्थान सरकार के वकील को तुरंत कार्रवाई सुनिश्चित करने का निर्देश दिया और कहा कि अरावली जैसा पर्यावरणीय क्षेत्र किसी भी प्रकार की लापरवाही का भार नहीं उठा सकता. अदालत ने साथ ही कहा कि अवैध खनन भविष्य की पीढ़ियों के पर्यावरण अधिकारों को सीधे प्रभावित करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए न्यायालय इस पूरे मामले में सभी पहलुओं की गहराई से जांच करेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पिछले साल दिसंबर में पारित अंतरिम आदेश अगले आदेश तक लागू रहेगा. साथ ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हस्तक्षेपकर्ताओं (</span>Intervenors) <span lang="hi" xml:lang="hi">को निर्देश दिया गया है कि वे एमिकस क्यूरी से संपर्क कर अपनी टिप्पणियां और रिपोर्ट सौंपें. एमिकस क्यूरी को इन सभी सुझावों को अपनी व्यापक रिपोर्ट में शामिल करने का निर्देश दिया गया है. अब इस मामले की अगली सुनवाई चार हफ्ते बाद होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें समिति गठन और आगे की प्रक्रिया पर अदालत फैसला ले सकती है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 22 Jan 2026 21:03:28 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच के खिलाफ याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रखा</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ब्यूरो प्रयागराज। </span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच की घटनाओं के खिलाफ कदम उठाने की मांग वाली कई याचिकाओं पर मंगलवार को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। हालांकि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता ने इस मामले में सभी पक्षकारों से दो हफ्ते में अपनी दलील</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्पष्टीकरण या सुझाव लिखित में जमा करने को कहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दरअसल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट को तय करना है कि क्या सांप्रदायिक आधार पर होने वाली भड़काऊ बयानबाजी पर लगाम लगाने के लिए कोई दिशानिर्देश तय किया जाए या कोई व्यवस्था बनाई जाए। </span>2018<span lang="hi" xml:lang="hi">  में दिए अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने भीड़</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुनवाई</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/166902/supreme-court-reserves-verdict-on-petitions-against-hate-speech"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-01/supream-court4.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ब्यूरो प्रयागराज। </span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच की घटनाओं के खिलाफ कदम उठाने की मांग वाली कई याचिकाओं पर मंगलवार को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। हालांकि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता ने इस मामले में सभी पक्षकारों से दो हफ्ते में अपनी दलील</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्पष्टीकरण या सुझाव लिखित में जमा करने को कहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दरअसल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट को तय करना है कि क्या सांप्रदायिक आधार पर होने वाली भड़काऊ बयानबाजी पर लगाम लगाने के लिए कोई दिशानिर्देश तय किया जाए या कोई व्यवस्था बनाई जाए। </span>2018<span lang="hi" xml:lang="hi"> में दिए अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने भीड़ की हिंसा को रोकने के लिए दिशानिर्देश तय किए थे। कोर्ट में दायर याचिकाओं में इस आदेश पर सही तरह से अमल न होने और भड़काऊ बयानबाजी पर लगाम लगने के लिए कोर्ट के दखल की मांग की है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुनवाई के दौरान वकील निजाम पाशा ने कहा कि शिकायतों के बाद भी एफआईआर दर्ज नहीं होतीं। अगर एफआईआर दर्ज होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो सही धाराएं नहीं लगाई जातीं। शरारत जैसी हल्की धाराएं लगाई जाती हैं। फिर वही लोग राज्यों में ऐसे ही भाषण देते दिखते हैं। जब व्यक्तियों की पहचान हो जाती है तो राज्य कार्रवाई करने में क्यों नाकाम हो रहा है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">हेट स्पीच से हेट क्राइम होते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एडवोकेट एमआर शमशाद ने कहा कि सामान्य हेट स्पीच के अलावा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक ट्रेंड है कि वे सिर्फ धार्मिक हस्तियों को निशाना बनाते हैं। जब हम शिकायत दर्ज कराते हैं तो एफआईआर सिर्फ इसलिए दर्ज नहीं होती क्योंकि मंजूरी की जरूरत होती है। हिंदू सेना के वकील बरुण सिन्हा ने कहा कि ओवैसी और स्टालिन ने हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ सांप्रदायिक बयान दिए हैं। मैंने शिकायत दर्ज कराई थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एडवोकेट संजय हेगड़े ने कोर्ट को बताया कि एक न्यूज चैनल ने कहा था कि एक समुदाय का अपनी कम्युनिटी के लिए यूपीएससी की कोचिंग का इंतजाम करना </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">यूपीएससी जिहाद</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">है। सुप्रीम कोर्ट ने कम से कम दो फैसले दिए हैं। दिक्कत यह है कि अक्सर एक आदमी या एक संगठन जिसे अपनी बोलने की आजादी समझता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह दूसरे के लिए हेट स्पीच बन जाती है। यह किसी ऐसे व्यक्ति पर हमला करने का सवाल है जिसका सामाजिक स्तर कम है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने वकीलों को स्पष्टीकरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुझाव और तर्क आदि वाली अपनी बातें फाइल करने के लिए दो हफ्ते का समय दिया है। कोर्ट ने आदेश में कहा कि पक्षकार दो हफ्ते के अंदर अपने संक्षिप्त नोट्स फाइल कर सकते हैं। सभी पक्षकारों के अपनी दलील लिखित में पेश करने के बाद मामले पर दोबारा सुनवाई होगी।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 21 Jan 2026 21:32:50 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दोष सिद्ध होने से पहले जमानत मिलना एक अधिकार - पूर्व सीजेआई  चंद्रचूड़</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उमर खालिद की जमानत को लेकर भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि दोष सिद्ध होने से पहले जमानत मिलना एक अधिकार की तरह होना चाहिए। हालाँकि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके इस बयान पर ही सवाल खड़े किए जा रहे हैं और सोशल मीडिया पर पूछा जा रहा है कि जब वह सुप्रीम कोर्ट के सीजेआई थे तब भी उमर खालिद को जमानत नहीं मिली।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट के मशहूर वकील और एक्टिविस्ट प्रशांत भूषण ने कहा है</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा पूर्व सीजेआई का कहना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्होंने उमर खालिद की ज़मानत</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/166759/getting-bail-before-conviction-is-a-right-%E2%80%93-former-cji"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-01/images2.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong><span lang="hi" xml:lang="hi">उमर खालिद की जमानत को लेकर भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि दोष सिद्ध होने से पहले जमानत मिलना एक अधिकार की तरह होना चाहिए। हालाँकि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके इस बयान पर ही सवाल खड़े किए जा रहे हैं और सोशल मीडिया पर पूछा जा रहा है कि जब वह सुप्रीम कोर्ट के सीजेआई थे तब भी उमर खालिद को जमानत नहीं मिली।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट के मशहूर वकील और एक्टिविस्ट प्रशांत भूषण ने कहा है</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा पूर्व सीजेआई का कहना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्होंने उमर खालिद की ज़मानत याचिका जस्टिस बेला त्रिवेदी की बेंच को भेजी थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो पहले मोदी की लॉ सेक्रेटरी रह चुकी हैं और मोदी सरकार की इच्छाओं के खिलाफ न जाने के लिए जानी जाती हैं।</span>'</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तो प्रशांत भूषण जैसे वकील यह सवाल क्यों उठा रहे हैं</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्या उमर खालिद को जमानत देने के मामले में ईमानदार कोशिश की गई</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">आख़िर उमर खालिद के साथ अब तक क्या हुआ है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">इन सवालों के जवाब जानने से पहले यह जान लें कि आख़िर पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ ने क्या कहा है। चंद्रचूड़ जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में एक कार्यक्रम में पत्रकार वीर सांघवी के सवाल का जवाब दे रहे थे। यह सवाल 2020 दिल्ली दंगों के साजिश मामले में उमर खालिद की जमानत याचिका को सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज किए जाने पर आधारित था। उमर खालिद पिछले पांच साल से जेल में हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">चंद्रचूड़ ने कहा</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं अपनी अदालत की आलोचना करने में हिचकिचाता हूं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि मैंने एक साल पहले ही इस संस्थान का नेतृत्व किया था। लेकिन ये सिद्धांत कहते हैं कि आप शर्तें लगा सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन तेज ट्रायल सुनिश्चित करना चाहिए। अगर तेज ट्रायल संभव नहीं है तो जमानत नियम होनी चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपवाद नहीं।</span>'</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">चंद्रचूड़ ने कहा</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं अब जज के रूप में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि एक नागरिक के रूप में बोल रहा हूँ। यह दोष सिद्ध होने से पहले जमानत के अधिकार के बारे में है। हमारा कानून निर्दोष होने की धारणा पर आधारित है- हर आरोपी तब तक निर्दोष है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब तक मुक़दमे में दोषी साबित न हो। ट्रायल से पहले जमानत सजा नहीं हो सकती। अगर कोई व्यक्ति पांच-सात साल जेल में रहता है और फिर बरी हो जाता है तो गँवाए हुए समय की भरपाई कैसे होगी</span>?'</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ख़बरें</category>
                                            <category>ब्रेकिंग न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 19 Jan 2026 22:12:58 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>क्या सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद ही विद्या के मंदिरों में शिक्षकों की कमी दूर होगी ?</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हाल ही में देश की सर्वोच्च अदालत की दो सदस्यीय पीठ माननीय न्यायमूर्ति जे.बी. पार्दीवाला एवं महादेवन ने देशभर के शासकीय एवं निजी कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के रिक्त पदों को लेकर कड़ी टिप्पणी करते हुए राज्य सरकारों को चार माह के भीतर भर्ती प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश दिए हैं । </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा के क्षेत्र में छात्रों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश निस्संदेह छात्र हित में उठाया गया एक स्वागतयोग्य कदम है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी देशभर के विद्यार्थी सराहना कर रहे हैं । यह सर्वविदित है कि शिक्षा और स्वास्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देश के</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/166670/will-the-shortage-of-teachers-in-the-temples-of-vidya"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-01/क्या-सुप्रीम-कोर्ट-की-फटकार-के-बाद-ही-विद्या-के-मंदिरों-में-शिक्षकों-की-कमी-दूर-होगी.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हाल ही में देश की सर्वोच्च अदालत की दो सदस्यीय पीठ माननीय न्यायमूर्ति जे.बी. पार्दीवाला एवं महादेवन ने देशभर के शासकीय एवं निजी कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के रिक्त पदों को लेकर कड़ी टिप्पणी करते हुए राज्य सरकारों को चार माह के भीतर भर्ती प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश दिए हैं । </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा के क्षेत्र में छात्रों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश निस्संदेह छात्र हित में उठाया गया एक स्वागतयोग्य कदम है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी देशभर के विद्यार्थी सराहना कर रहे हैं । यह सर्वविदित है कि शिक्षा और स्वास्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देश के नागरिकों के मूलभूत अधिकारों में शामिल हैं । </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही यह भी सत्य है कि सामाजिक क्षेत्र की सेवाएँ होने के कारण केंद्र और राज्य सरकारों को इन दोनों क्षेत्रों पर अपने बजट का एक बड़ा हिस्सा प्रतिवर्ष खर्च करना पड़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि प्रत्यक्ष आर्थिक आय बहुत कम या नगण्य होती है । इसके बावजूद यदि शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में लगातार कमी दिखाई दे रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह सरकारों और समाजदोनों के लिए गंभीर चिंतन का विषय होना चाहिए ।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षकों की कमी को लेकर सुप्रीम कोर्ट की फटकार ने एक बार फिर देश की वास्तविक स्थिति को उजागर कर दिया है । आज समस्या केवल कॉलेजों और विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सरकारी स्कूलों की हालत और भी चिंताजनक है । </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा का अधिकार अधिनियम</span>, 2009 <span lang="hi" xml:lang="hi">में निर्धारित छात्र-शिक्षक अनुपात आज भी अधिकांश स्कूलों में पूरा नहीं हो पा रहा है । देशभर में अनेक स्कूल शिक्षकविहीन या एकल शिक्षक के भरोसे संचालित हो रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं कई विद्यालय अतिथि शिक्षकों (गेस्ट फैकल्टी) के सहारे चल रहे हैं ।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> उच्च शिक्षा संस्थानों की स्थिति भी इससे अलग नहीं है । यदि गेस्ट फैकल्टी की व्यवस्था न होती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो हालात और भी दयनीय होते । यही स्थिति स्वास्थ्य सेवाओं में भी देखने को मिलती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ चिकित्सकों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों के अनेक पद वर्षों से रिक्त पड़े हैं । अब प्रश्न यही है क्या सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद ही शिक्षकों की कमी दूर होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या फिर सरकारें आर्थिक तंगी का हवाला देकर समय मांगती रहेंगी </span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राज्य सरकारें शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में भर्तियाँ तो करती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किंतु ये भर्तियाँ आवश्यकता के अनुपात में अपर्याप्त रहती हैं । इसके पीछे प्रमुख कारण आर्थिक सीमाएँ हैं । वर्तमान में केंद्र और राज्य सरकारों के बजट का बड़ा हिस्सा मुफ्त योजनाओं पर खर्च हो रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनका लाभ कई बार आर्थिक रूप से सक्षम लोग भी उठा रहे हैं । </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि मुफ्त योजनाओं का लाभ वास्तव में केवल आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों तक सीमित किया जाए और महँगाई के अनुरूप सीधी आर्थिक सहायता दी जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो जरूरतमंदों की वास्तविक सहायता संभव हो सकती है। इसके साथ ही वृद्धावस्था पेंशन योजनाओं की राशि में भी महँगाई के अनुरूप वृद्धि आवश्यक है और इसका लाभ </span>60 <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्ष की आयु पूर्ण कर चुके सभी महिला-पुरुषों को मिलना चाहिए । </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आधुनिक समय में एकल परिवारों की बढ़ती प्रवृत्ति के कारण कई बुजुर्ग अपने ही बच्चों द्वारा उपेक्षित होकर असहाय स्थिति में जीवन जीने को मजबूर हैं । ऐसे में सरकार की योजनाएँ ही उनके लिए अंतिम सहारा बनती हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि सभी राजनीतिक दल और सरकारें आर्थिक मापदंड तय कर मुफ्त योजनाओं का सही लक्षित वितरण करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो राज्य सरकारों के पास इतना संसाधन अवश्य बचेगा कि वे रिक्त पदों की पूर्ति कर सकें और युवाओं को रोजगार दे सकें । </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पदों की पूर्ति करना राज्य सरकारों का दायित्व है । जब सरकारें शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सेवाओं में ही वित्तीय संकट का हवाला देकर असमर्थता जताती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब सर्वोच्च अदालत का हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है । एक प्रसिद्ध कहावत है यदि किसी राज्य का विकास कुछ वर्षों के लिए करना हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो अच्छी  सड़कें बनाइए यदि</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पचास-सौ वर्षों के लिए राज्य का विकास करना हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वहा अच्छे  बाँध और जलस्रोत बनाइए </span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और यदि हजारों वर्षों तक राज्य का विकास चाहते हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो अपनी  शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाइए ।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था इतनी समृद्ध और वैभवशाली थी कि तक्षशिला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नालंदा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काशी और उज्जैन जैसे ज्ञान के केंद्रों ने विश्व को दिशा दी । शून्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दशमलव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शल्य चिकित्सा और जीवन-दर्शन जैसे ज्ञान का उल्लेख हमारे वेदों और ग्रंथों में हजारों वर्ष पहले ही मिल जाता है । </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज आवश्यकता है कि केंद्र और राज्य सरकारें अपनी गैर-जरूरी योजनाओं की समीक्षा कर शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में निवेश बढ़ाएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर्याप्त शिक्षकों और संसाधनों की व्यवस्था करें और विद्या के मंदिरों को पुनः ज्ञान का केंद्र बनाएं। तभी भारत एक बार फिर विश्वगुरु बनने की दिशा में अग्रसर हो सकेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;" align="center"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>अरविंद रावल</strong></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 19 Jan 2026 18:43:56 +0530</pubDate>
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