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                <title>संपादकीय - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>हिंसा राजनीतिक अस्थिरता और मानवाधिकार संकट के बीच घिरा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="gs">
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<div style="text-align:justify;">पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) एक बार फिर गंभीर अशांति और हिंसा का केंद्र बन गया है। विधानसभा चुनावों से पहले भड़की हिंसा ने पूरे क्षेत्र को तनाव और अनिश्चितता के माहौल में धकेल दिया है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार अब तक लगभग 30 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 200 से अधिक लोग घायल बताए जा रहे हैं। हालात इतने खराब हो चुके हैं कि मृतकों की संख्या बढ़ने की आशंका व्यक्त की जा रही है। मुजफ्फराबाद, रावलकोट और अन्य प्रमुख शहरों में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए हैं, जिनमें स्थानीय लोगों का गुस्सा खुलकर सामने आया है। स्थिति</div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180926/pakistan-occupied-kashmir-surrounded-by-violence-political-instability-and-human"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas2.jpg" alt=""></a><br /><div class="gs">
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<div style="text-align:justify;">पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) एक बार फिर गंभीर अशांति और हिंसा का केंद्र बन गया है। विधानसभा चुनावों से पहले भड़की हिंसा ने पूरे क्षेत्र को तनाव और अनिश्चितता के माहौल में धकेल दिया है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार अब तक लगभग 30 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 200 से अधिक लोग घायल बताए जा रहे हैं। हालात इतने खराब हो चुके हैं कि मृतकों की संख्या बढ़ने की आशंका व्यक्त की जा रही है। मुजफ्फराबाद, रावलकोट और अन्य प्रमुख शहरों में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए हैं, जिनमें स्थानीय लोगों का गुस्सा खुलकर सामने आया है। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पाकिस्तान को अतिरिक्त सुरक्षा बल और रेंजर्स तैनात करने पड़े हैं, लेकिन इसके बावजूद हालात सामान्य नहीं हो पाए हैं।</div>
<div style="text-align:justify;">यह हिंसा केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है, बल्कि इसके पीछे राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक असंतोष की लंबी पृष्ठभूमि मौजूद है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि उनकी लोकतांत्रिक आकांक्षाओं और अधिकारों की लगातार अनदेखी की जा रही है। चुनाव से पहले जिस प्रकार सीटों के आरक्षण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर विवाद पैदा हुआ, उसने लोगों के भीतर पहले से मौजूद नाराजगी को और अधिक भड़का दिया। यही कारण है कि प्रदर्शन केवल किसी एक निर्णय के विरोध तक सीमित नहीं रहे, बल्कि वे व्यापक असंतोष के रूप में सामने आए हैं।</div>
<div style="text-align:justify;">रावलकोट में हुई झड़पों ने स्थिति को और विस्फोटक बना दिया। प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच टकराव के बाद हिंसा तेजी से फैल गई। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े गए और कई स्थानों पर गोलीबारी भी हुई। आरोप लगाए जा रहे हैं कि कुछ इलाकों में बिना पर्याप्त चेतावनी के बल प्रयोग किया गया, जिससे भगदड़ मच गई और बड़ी संख्या में लोग घायल हो गए। इन घटनाओं ने स्थानीय जनता के भीतर सेना और सुरक्षा एजेंसियों के प्रति असंतोष को और गहरा कर दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;">वर्तमान संकट का एक बड़ा कारण 27 जुलाई को प्रस्तावित विधानसभा चुनाव भी हैं। चुनावों में 45 में से 12 सीटों को शरणार्थियों के लिए आरक्षित किए जाने के फैसले का व्यापक विरोध हो रहा है। विरोधी संगठनों का कहना है कि इस व्यवस्था से स्थानीय निवासियों के राजनीतिक अधिकार प्रभावित होंगे और उनकी वास्तविक भागीदारी कम हो जाएगी। इसी मुद्दे को लेकर विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक संगठनों ने आंदोलन तेज किया है। बंद और प्रदर्शन की घोषणाओं ने पूरे क्षेत्र में राजनीतिक माहौल को और अधिक तनावपूर्ण बना दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;">पीओके में बढ़ते विरोध प्रदर्शनों का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अब यह असंतोष केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रहा। विदेशों में रहने वाले कश्मीरी समुदाय और मानवाधिकार संगठनों ने भी इस मुद्दे पर आवाज उठानी शुरू कर दी है। ब्रिटेन में पाकिस्तान के दूतावास के बाहर प्रदर्शन किए गए, जहां प्रदर्शनकारियों ने पीओके में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों और बल प्रयोग के खिलाफ नारे लगाए। इससे स्पष्ट होता है कि यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान आकर्षित कर रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;">ब्रिटेन के लगभग 50 सांसदों द्वारा इस विषय पर चिंता व्यक्त किया जाना भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सांसदों ने ब्रिटिश सरकार से मामले पर ध्यान देने और राजनयिक स्तर पर हस्तक्षेप की संभावनाओं पर विचार करने का आग्रह किया है। उनका मानना है कि किसी भी क्षेत्र में लोकतांत्रिक अधिकारों और मानवाधिकारों का सम्मान होना चाहिए तथा राजनीतिक मतभेदों का समाधान संवाद और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के माध्यम से किया जाना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठती ऐसी आवाजें पाकिस्तान के लिए नई कूटनीतिक चुनौतियां खड़ी कर सकती हैं।</div>
<div style="text-align:justify;">दूसरी ओर, भारत ने भी इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया व्यक्त की है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा है कि पाकिस्तान अपनी आंतरिक विफलताओं और मानवाधिकार संबंधी प्रश्नों से ध्यान हटाने के लिए भ्रामक सूचनाओं और दुष्प्रचार का सहारा ले रहा है। भारत का यह भी कहना है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को पीओके में घट रही घटनाओं पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वहां रहने वाले लोगों के अधिकारों का सम्मान हो। भारत लंबे समय से पीओके में लोकतांत्रिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं की स्थिति पर चिंता व्यक्त करता रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;">पीओके में इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध और संचार व्यवस्था में व्यवधान की खबरों ने भी चिंता बढ़ाई है। कई इलाकों में लोगों को सूचना और संवाद के साधनों से वंचित होना पड़ा है। आधुनिक लोकतांत्रिक समाज में सूचना तक पहुंच को एक महत्वपूर्ण अधिकार माना जाता है। ऐसे में संचार माध्यमों पर नियंत्रण से लोगों के बीच असुरक्षा और अविश्वास की भावना और अधिक बढ़ सकती है। इससे प्रशासन और जनता के बीच संवाद की संभावनाएं भी कमजोर होती हैं।</div>
<div style="text-align:justify;">वर्तमान संकट पाकिस्तान के सामने एक बड़े राजनीतिक प्रश्न को भी खड़ा करता है। यदि किसी क्षेत्र में लगातार विरोध प्रदर्शन, जनाक्रोश और प्रशासन के प्रति अविश्वास बढ़ रहा हो, तो केवल सुरक्षा बलों के सहारे स्थिति को लंबे समय तक नियंत्रित नहीं किया जा सकता। इसके लिए आवश्यक है कि जनता की शिकायतों को सुना जाए, राजनीतिक संवाद को बढ़ावा दिया जाए और लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत बनाया जाए। इतिहास गवाह है कि जब भी जनभावनाओं की उपेक्षा की जाती है, तब असंतोष और अधिक तीव्र रूप में सामने आता है।</div>
<div style="text-align:justify;">पीओके की मौजूदा स्थिति यह संकेत देती है कि वहां के लोग अपने राजनीतिक अधिकारों, बेहतर प्रशासन और सम्मानजनक प्रतिनिधित्व की मांग को लेकर पहले से अधिक मुखर हो चुके हैं। यदि इन मांगों को समय रहते गंभीरता से नहीं लिया गया, तो आने वाले दिनों में स्थिति और जटिल हो सकती है। चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता, प्रशासन की जवाबदेही और मानवाधिकारों की रक्षा जैसे मुद्दे आने वाले समय में और अधिक महत्वपूर्ण बनेंगे।</div>
<div style="text-align:justify;">कुल मिलाकर, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में भड़की हिंसा केवल एक स्थानीय घटना नहीं है, बल्कि यह उस गहरे असंतोष का परिणाम है जो लंबे समय से वहां मौजूद है। बढ़ती मौतें, सैकड़ों घायल, व्यापक प्रदर्शन, अंतरराष्ट्रीय चिंता और राजनीतिक विवाद यह दर्शाते हैं कि पीओके एक संवेदनशील मोड़ पर खड़ा है। आने वाले दिनों में पाकिस्तान सरकार किस प्रकार इस संकट का समाधान करती है, यह न केवल क्षेत्र की स्थिरता बल्कि उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि और लोकतांत्रिक विश्वसनीयता को भी प्रभावित करेगा। पीओके के लोगों की आकांक्षाओं और अधिकारों का सम्मान करते हुए शांतिपूर्ण एवं लोकतांत्रिक समाधान ही इस संकट से बाहर निकलने का सबसे प्रभावी मार्ग साबित हो सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"><strong>           </strong></div>
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<div style="text-align:justify;"><strong>*कांतिलाल मांडोत*</strong></div>
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                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 16:24:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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                <title>मौत की फैक्ट्री ने खोली व्यवस्था की पोल,सबूतों के बाद भी यदि जिम्मेदार बच जाएं तो न्याय अधूरा रहेगा</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="gs">
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<div style="text-align:justify;">जयपुर के खोह नागोरियान क्षेत्र में अवैध पटाखा फैक्ट्री में हुए भीषण विस्फोट और आगजनी की घटना केवल एक हादसा नहीं है, बल्कि यह हमारे प्रशासनिक तंत्र, निगरानी व्यवस्था और जवाबदेही की वास्तविक तस्वीर को सामने लाने वाली त्रासदी है। आठ लोगों की दर्दनाक मौत, जिनमें एक मासूम बच्चा भी शामिल था, केवल आंकड़ा नहीं है बल्कि उन परिवारों की जिंदगी का वह अंधेरा अध्याय है जिसे वे कभी भुला नहीं पाएंगे। इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर ऐसी अवैध गतिविधियां वर्षों तक प्रशासन और पुलिस की नजरों से कैसे बची रहती</div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180920/the-death-factory-has-opened-the-systems-polls-even-after"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/feec3084-87ae-405c-9cf7-318a98f01ecb.jpg" alt=""></a><br /><div class="gs">
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<div style="text-align:justify;">जयपुर के खोह नागोरियान क्षेत्र में अवैध पटाखा फैक्ट्री में हुए भीषण विस्फोट और आगजनी की घटना केवल एक हादसा नहीं है, बल्कि यह हमारे प्रशासनिक तंत्र, निगरानी व्यवस्था और जवाबदेही की वास्तविक तस्वीर को सामने लाने वाली त्रासदी है। आठ लोगों की दर्दनाक मौत, जिनमें एक मासूम बच्चा भी शामिल था, केवल आंकड़ा नहीं है बल्कि उन परिवारों की जिंदगी का वह अंधेरा अध्याय है जिसे वे कभी भुला नहीं पाएंगे। इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर ऐसी अवैध गतिविधियां वर्षों तक प्रशासन और पुलिस की नजरों से कैसे बची रहती हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जिस मकान में यह फैक्ट्री संचालित हो रही थी, वह रिहायशी इलाके के बीचोंबीच स्थित था। वहां करीब डेढ़ सौ मकानों में छह सौ से अधिक लोग रहते हैं। ऐसे घनी आबादी वाले क्षेत्र में लगभग पचास किलो बारूद का भंडारण और पटाखों का निर्माण किसी भी समय बड़े हादसे को निमंत्रण देने जैसा था। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि फैक्ट्री के पास कोई वैध लाइसेंस नहीं था। मकान किराए पर दिया गया था, लेकिन न तो पुलिस सत्यापन कराया गया और न ही विधिवत किरायानामा तैयार किया गया। यह स्थिति बताती है कि नियम केवल कागजों तक सीमित रह गए हैं।</div>
<div style="text-align:justify;">घटना के बाद सामने आए तथ्यों ने व्यवस्था की कई परतों को उजागर किया है। बताया जा रहा है कि फैक्ट्री पिछले कई वर्षों से संचालित थी और स्थानीय लोगों को इसकी जानकारी थी। यदि आसपास रहने वाले लोग जानते थे कि यहां पटाखों का काम होता है तो फिर पुलिस, प्रशासन और अन्य जिम्मेदार विभागों को इसकी भनक क्यों नहीं लगी। थाना क्षेत्र में होने वाली गतिविधियों पर नजर रखना स्थानीय पुलिस की जिम्मेदारी होती है। बीट कांस्टेबल से लेकर थाना प्रभारी तक की जवाबदेही तय होती है। ऐसे में यह मान लेना कठिन है कि किसी को इसकी जानकारी नहीं थी।</div>
<div style="text-align:justify;">इस घटना का सबसे दुखद पहलू यह है कि हादसे के समय वहां काम करने वाले मजदूर बेहद असुरक्षित परिस्थितियों में कार्य कर रहे थे। बारूद के बीच मजदूरों से काम लिया जा रहा था। वहीं खाना भी बनाया जाता था और घरेलू गैस सिलेंडर भी रखा हुआ था। सुरक्षा मानकों की ऐसी घोर अनदेखी किसी भी क्षण विनाश का कारण बन सकती थी। जब आग लगी तो मजदूर जान बचाने के लिए बाहर भागे। कई लोग बुरी तरह झुलस गए। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार उनके कपड़ों के साथ चमड़ी तक निकल गई थी। यह दृश्य किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर देने वाला है।</div>
<div style="text-align:justify;">घटना के बाद राहत और बचाव कार्यों को लेकर भी कई सवाल उठे हैं। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि शुरुआती समय में आग इतनी भयावह थी कि घटनास्थल के निकट पहुंचना मुश्किल था। स्थानीय लोगों ने अपनी जान जोखिम में डालकर घायलों को बाहर निकाला। यदि स्थानीय नागरिक साहस नहीं दिखाते तो मृतकों की संख्या और अधिक हो सकती थी। यह तथ्य भी चिंताजनक है कि इतने बड़े हादसे के बावजूद घटनास्थल पर तत्काल और व्यवस्थित आपदा प्रबंधन व्यवस्था दिखाई नहीं दी। ऐसी घटनाओं में शुरुआती कुछ मिनट सबसे महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन अक्सर हमारी व्यवस्थाएं इन्हीं क्षणों में कमजोर पड़ जाती हैं।</div>
<div style="text-align:justify;">यह पहला अवसर नहीं है जब अवैध पटाखा फैक्ट्री में विस्फोट हुआ हो। देश के विभिन्न हिस्सों में हर वर्ष ऐसे हादसे होते हैं और दर्जनों लोग जान गंवाते हैं। कुछ महीने पहले खैरथल-तिजारा क्षेत्र में भी इसी प्रकार का हादसा हुआ था। उसके बाद हजारों फैक्ट्रियों की जांच की गई और बड़ी संख्या में नोटिस जारी किए गए। लेकिन सवाल यह है कि नोटिस देने के बाद क्या हुआ। यदि कार्रवाई प्रभावी होती तो शायद जयपुर की यह घटना टाली जा सकती थी। केवल नोटिस जारी कर देना प्रशासनिक सफलता नहीं कहलाता। वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब नियमों का पालन सुनिश्चित हो और अवैध इकाइयों को समय रहते बंद कराया जाए।</div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण विषय जवाबदेही का है। अक्सर बड़े हादसों के बाद जांच समितियां गठित कर दी जाती हैं, रिपोर्ट मांगी जाती है और कुछ समय बाद मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। मृतकों के परिजनों को मुआवजा देकर सरकार अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेती है। लेकिन मुआवजा कभी किसी की जिंदगी वापस नहीं ला सकता। न्याय तभी होगा जब उन सभी लोगों की जिम्मेदारी तय होगी जिनकी लापरवाही या मिलीभगत के कारण यह अवैध कारोबार फलता-फूलता रहा। फैक्ट्री संचालक, मकान मालिक, निगरानी के लिए जिम्मेदार अधिकारी और नियमों के पालन की जांच करने वाले विभाग सभी की भूमिका की निष्पक्ष जांच आवश्यक है।</div>
<div style="text-align:justify;">समाज के सामने भी आत्ममंथन का अवसर है। कई बार लोग अपने आसपास चल रही अवैध गतिविधियों को देखकर भी चुप रहते हैं। भय, उदासीनता या व्यक्तिगत स्वार्थ के कारण शिकायत नहीं करते। परिणाम यह होता है कि एक दिन वही गतिविधि किसी बड़े हादसे का रूप ले लेती है। नागरिक सतर्कता और प्रशासनिक जवाबदेही दोनों मिलकर ही ऐसी घटनाओं को रोक सकते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;">आज जरूरत केवल शोक व्यक्त करने की नहीं है बल्कि कठोर और निर्णायक कार्रवाई की है। जिन परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया है, उनके लिए सबसे बड़ी सांत्वना यही होगी कि दोषियों को सजा मिले और भविष्य में किसी अन्य परिवार को ऐसी पीड़ा न झेलनी पड़े। यदि इस घटना के स्पष्ट सबूतों और तथ्यों के बावजूद जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई नहीं होती, तो यह व्यवस्था पर लोगों के भरोसे को और कमजोर करेगा।</div>
<div style="text-align:justify;">खोह नागोरियान की यह त्रासदी हमें याद दिलाती है कि प्रशासनिक लापरवाही, नियमों की अनदेखी और जवाबदेही के अभाव का परिणाम कितना भयावह हो सकता है। आठ लोगों की मौत केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का प्रमाण है। अब देखना यह है कि जांच और कार्रवाई का वादा केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है या फिर वास्तव में दोषियों को सजा देकर यह संदेश दिया जाता है कि लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ करने वालों के लिए कानून में कोई जगह नहीं है। पीड़ित परिवारों को वास्तविक राहत तभी मिलेगी जब न्याय केवल कागजों पर नहीं बल्कि धरातल पर दिखाई देगा।</div>
<div style="text-align:justify;">   </div>
<div style="text-align:justify;">    <strong> *कांतिलाल मांडोत*</strong></div>
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                <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 15:48:41 +0530</pubDate>
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                <title>भारतीयता गर्व की अनुभूति </title>
                                    <description><![CDATA[<p dir="ltr" style="text-align:justify;"><strong>भारतीय</strong> संस्कृति आज भी सारगर्भित और कल भी देश में नहीं अपितु जग में आलोकित थी। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है। सत्यार्थ, कालांतर में  भारत वर्ष मे कभी छुआछुत रहा ही नहीं, और ना ही कभी जातियाँ भेदभाव का कारण होती थी। चलिए हजारो साल पुराना इतिहास पर नजर डालते हैं। सम्राट शांतनु ने विवाह किया एक मछवारे की पुत्री सत्यवती से। उनका बेटा ही राजा बने इसलिए भीष्म ने विवाह न करके, आजीवन संतानहीन रहने की भीष्म प्रतिज्ञा की। सत्यवती के बेटे बाद में क्षत्रिय बन गए, जिनके लिए भीष्म आजीवन अविवाहित रहे, क्या उनका शोषण होता होगा? महाभारत</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/131673/indian-pride-feeling"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-07/img_20230624_105721.jpg" alt=""></a><br /><p dir="ltr" style="text-align:justify;"><strong>भारतीय</strong> संस्कृति आज भी सारगर्भित और कल भी देश में नहीं अपितु जग में आलोकित थी। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है। सत्यार्थ, कालांतर में  भारत वर्ष मे कभी छुआछुत रहा ही नहीं, और ना ही कभी जातियाँ भेदभाव का कारण होती थी। चलिए हजारो साल पुराना इतिहास पर नजर डालते हैं। सम्राट शांतनु ने विवाह किया एक मछवारे की पुत्री सत्यवती से। उनका बेटा ही राजा बने इसलिए भीष्म ने विवाह न करके, आजीवन संतानहीन रहने की भीष्म प्रतिज्ञा की। सत्यवती के बेटे बाद में क्षत्रिय बन गए, जिनके लिए भीष्म आजीवन अविवाहित रहे, क्या उनका शोषण होता होगा? महाभारत लिखने वाले वेद व्यास भी मछवारे थे, पर महर्षि बन गए, गुरुकुल चलाते थे वो। विदुर, जिन्हें महापंडित कहा जाता है वो एक दासी के पुत्र थे, हस्तिनापुर के महामंत्री बने, उनकी लिखी हुई विदुर नीति, राजनीति का एक महाग्रन्थ है। भीम ने वनवासी हिडिम्बा से विवाह किया। </p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;"><strong>राम से मर्यादा पुरुषोत्तम राम </strong></p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">श्री कृष्ण ग्वालवंशी थे, उनके भाई बलराम खेती करते थे, हमेशा हल साथ रखते थे। यादव क्षत्रिय रहे हैं, कई प्रान्तों पर शासन किया और श्री कृष्ण सबके पूजनीय हैं, गीता जैसा ग्रन्थ विश्व को दिया। राम के साथ वनवासी निषादराज गुरुकुल में पढ़ते थे। रामजी ने वनवासी शबरी माता की जूठी बेर खायीं। राम ने वन के राजकाज में वनवास में वनवासी बंधुओं का संरक्षण करते हुए उनके साथ सदा जनकल्याण का भाव रखा। मूल रूप में राम से मर्यादा पुरुषोत्तम राम बनने में वनवासियों की सेवाएं ही प्रमुख रही। श्री राम के पुत्र लव कुश महर्षि वाल्मीकि के गुरुकुल में पढ़े जो वनवासी थे। तो ये हो गई वैदिक काल की बात। स्पष्ट है कोई किसी का शोषण नहीं करता था। सबको शिक्षा का अधिकार था। कोई भी पद तक पहुंच सकता था, अपनी योग्यता के अनुसार। वर्ण सिर्फ काम के आधार पर थे वो बदले जा सकते थे। जिसको आज अर्थशास्त्र में श्रम विभाजन कहते हैं वो ही।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;"><strong>शोषण कहा से हो गया</strong></p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">प्राचीन भारत की बात करें, तो भारत के सबसे बड़े जनपद मगध पर जिस नन्द वंश का राज रहा वो जाति से नाई थे । नन्द वंश की शुरुवात महापद्मनंद ने की थी जो की राजा नाई थे। बाद में वो राजा बन गए फिर उनके बेटे भी, बाद में सभी क्षत्रिय ही कहलाये। उसके बाद मौर्य वंश का पूरे देश पर राज हुआ, जिसकी शुरुआत चन्द्रगुप्त से हुई, जो कि एक मोर पालने वाले परिवार से थे और एक ब्राह्मण चाणक्य ने उन्हें पूरे देश का सम्राट बनाया । 506 साल देश पर मौर्यों का राज रहा। फिर गुप्त वंश का राज हुआ, जो कि घोड़े का अस्तबल चलाते थे और घोड़ों का व्यापार करते थे। 140 साल देश पर गुप्ताओं का राज रहा। केवल पुष्यमित्र शुंग के 36 साल के राज को छोड़ कर 92 फीसद समय प्राचीन काल में देश में शासन उन्ही का  रहा। जिन्हें आज दलित, पिछड़ा कहते हैं तो शोषण कहा से हो गया? यहां भी कोई शोषण वाली बात नहीं है। </p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;"><strong>मुग़ल काल से देश में गंदगी शुरू </strong></p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">फिर शुरू होता है मध्यकालीन भारत का समय जो सन 1100- 1750 तक है। इस दौरान अधिकतर समय, अधिकतर जगह मुस्लिम आक्रमणकारियो का समय रहा और कुछ स्थानों पर उनका शासन भी चला। अंत में मराठों का उदय हुआ। बाजी राव पेशवा जो कि ब्राह्मण थे, ने गाय चराने वाले गायकवाड़ को गुजरात का राजा बनाया, चरवाहा जाति के होलकर को मालवा का राजा बनाया। अहिल्या बाई होलकर खुद बहुत बड़ी शिवभक्त थी। ढेरों मंदिर गुरुकुल उन्होंने बनवाये। मीरा बाई जो कि राजपूत थी। उनके गुरु एक चर्मकार रविदास थे और रविदास के गुरु ब्राह्मण रामानंद थे|। यहां भी शोषण वाली बात कहीं नहीं है। मुग़ल काल से देश में गंदगी शुरू हो गई और यहां से पर्दा प्रथा, गुलाम प्रथा, बाल विवाह जैसी चीजें शुरू होती हैं।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;"><strong>स्वार्थ में राजनीतिकरण किया</strong></p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">1800 -1947 तक अंग्रेजो के शासन रहा और यहीं से जातिवाद शुरू हुआ। जो उन्होंने फूट डालो और राज करो की नीति के तहत किया। अंग्रेज अधिकारी निकोलस डार्क की किताब "कास्ट ऑफ़ माइंड" में मिल जाएगा कि कैसे अंग्रेजों ने जातिवाद, छुआछूत को बढ़ाया और कैसे स्वार्थी भारतीय नेताओं ने अपने स्वार्थ में इसका राजनीतिकरण किया। </p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;"><strong>भेदभाव के षड्यंत्रों से बचाना होगा</strong></p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">इन हजारों सालों के इतिहास में देश में कई विदेशी आये जिन्होंने भारत की सामाजिक स्थिति पर किताबें लिखी हैं। जैसे कि मेगास्थनीज ने इंडिका लिखी, फाहियान,  ह्यू सांग और अलबरूनी जैसे कई। किसी ने भी नहीं लिखा की यहां किसी का शोषण होता था। अनुसूचित जाति वर्ग के रामनाथ कोंविंद देश के महामहिम राष्ट्रपति बने। अब अनुसूचित जनजाति वर्ग से श्रीमती द्रौपदी मुर्मू देश की प्रथम नागरिक हैं। क्रमवत पिछड़े वर्ग के कर्मयोगी प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मंत्री और उच्च पदाधिकारी की आसंदी को शोभामान कर रहे हैं या कर चुके हैं। </p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;"><strong>हिंदुत्व जगत में सराबोर </strong></p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">अनुकरणीय, ऐसा समानता का भाव हमारा संविधान भी हमें सिखाता है। यथेष्ठ, आज अनेकों सतमार्गी जो ब्राह्मण नहीं हैं, बावजूद मंदिरों के पुजारी, संत, महंत, मंडलेश्वर और पीठाधीश्वर हैं। जन्म आधारित जाति को छुआछुत व्यवस्था हिन्दुओ को कमजोर करने के लिए लाई गई थी। जो समय के साथ धराशाई हो गई। इसलिए भारतीयता पर गर्व और गौरव अनुभूति है। बेहतर, घृणा, द्वेष और भेदभाव के षड्यंत्रों से खुद और औरों को भी बचाना होगा। यथा सांस्कारिक, शिक्षित, वैचारिक और संगठित बनने का  समय है। तभी हमारी संस्कृति, सभ्यता और हिंदुत्व जगत में सराबोर होगी।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;"><strong>हेमेन्द्र क्षीरसागर, पत्रकार, लेखक व स्तंभकार</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 01 Jul 2023 22:57:21 +0530</pubDate>
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