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                <title>  18वें लोकसभा चुनाव- रोमांचक है मुकाबला </title>
                                    <description><![CDATA[<div>दोस्तो भूतकाल के सभी चुनावों के दौर से गुजरते हुए हम अब आ पहुंचे है वर्तमान में हो रहे 18वीं लोकसभा गठन के चुनावी दौर में यानि लोकसभा चुनाव 2024 में। यदि हम इस लोकसभा चुनाव की पृष्टभूमि की बात करें तो 17वें लोकसभा चुनावों में बम्पर जीत के बाद भाजपा गठबंधन की ओर से नरेंद्र मोदी ने 30 मई 2019 को लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री के रूप में पदभार संभाला। महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए सरकार ने 30 जुलाई 2019 को भारत की संसद में तीन तलाक की प्रथा को अवैध और असंवैधानिक घोषित कर दिया और 1 अगस्त 2019</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141420/18th-lok-sabha-elections-%E2%80%93-the-contest-is-exciting"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/dasfds.jpg" alt=""></a><br /><div>दोस्तो भूतकाल के सभी चुनावों के दौर से गुजरते हुए हम अब आ पहुंचे है वर्तमान में हो रहे 18वीं लोकसभा गठन के चुनावी दौर में यानि लोकसभा चुनाव 2024 में। यदि हम इस लोकसभा चुनाव की पृष्टभूमि की बात करें तो 17वें लोकसभा चुनावों में बम्पर जीत के बाद भाजपा गठबंधन की ओर से नरेंद्र मोदी ने 30 मई 2019 को लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री के रूप में पदभार संभाला। महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए सरकार ने 30 जुलाई 2019 को भारत की संसद में तीन तलाक की प्रथा को अवैध और असंवैधानिक घोषित कर दिया और 1 अगस्त 2019 से इसे दंडनीय अधिनियम बना दिया। इसके कुछ दिनों बाद एक बहुत बड़ा एवंम ऐतिहासिक फैसला जम्मू-कश्मीर पर लिया गया। 5 अगस्त 2019 को मोदी सरकार ने जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 को खत्म कर दिया, साथ ही राज्य को 2 हिस्सों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में बांट दिया। और दोनों को केंद्र शासित प्रदेश बना दिया।</div>
<div> </div>
<div>निस्संदेह यह देश हित में लिया गया शानदार और अतीत में की गई गलती को सुधारने वाला फैसला था। एनडीए सरकार 2.0 ने अभी एक साल भी पूरा नही किया था कि तभी वैश्विक महामारी कोरोना (कोविड-19) ने भारत में दस्तक दी। यह महामारी बड़ी तेजी से पूरे विश्व के साथ-साथ भारत के लोगों को अपनी चपेट में ले रही थी। अन्य देशों के साथ-साथ विकसित देश भी इस महामारी से बुरी तरह प्रभावित हुए। कई देशों में लॉकडाउन की घोषणा हो चुकी थी। भारत में संक्रमित मरीजों की संख्या अभी 500 तक ही पहुंची थी कि तभी मोदी सरकार ने पहले 22 मार्च 2020 को 14 घंटे के स्वैच्छिक जनता कर्फ्यू की घोषणा की। महामारी को भारत सहित पूरे विश्व में भयंकर रूप धारण करता देख 24 मार्च 2020 की शाम को मोदी सरकार ने पूरे देश में कोविड -19 महामारी को फैलने से रोकने के लिए 21 दिन के देशव्यापी तालाबंदी यानि लॉकडाउन के आदेश जारी किए। लॉकडाउन 5 चरणों में 30 मई तक लागू रहा।</div>
<div> </div>
<div>5 जून  2020 को मोदी सरकार तीन कृषि बिलों को अध्यादेश के जरिए लेकर आई। कोरोना काल के बीच लाए गए अध्यादेश को लेकर विपक्षी दलों ने विरोध किया। 14 सितंबर को पहली बार केंद्र सरकार ने इन अध्यादेशों को संसद में पेश किया। भारी हंगामे के बीच 17 सितंबर 2020 को तीनों कृषि बिल लोकसभा से पारित हुए। 20 सितंबर 2020 को तीनों कृषि बिल विपक्ष के भारी विरोधी के बावजूद राज्यसभा में भी पारित हो गए।  27 सितंबर 2020 के दिन तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने तीनों कृषि बिलों पर हस्ताक्षर किए और यह तीनों बिल कानून बन गए। किसान संगठनो ने इन कानूनों को किसान विरोधी बता इन्हें वापिस करवाने के लिए संघर्ष आरम्भ किया। धरना-प्रदर्शनों से कुछ होता ना देख नवंबर में किसान संगठनों ने दिल्ली चलो आंदोलन का आह्वान किया।</div>
<div> </div>
<div>पंजाब, हरियाणा, यू.पी, राजस्थान के किसान ट्रैक्टर- ट्रॉलीयां ले दिल्ली के बॉर्डरों की ओर चल पड़े। पुलिस ने किसानों को दिल्ली की ओर बढ़ने से रोकने के लिए वॉटर कैनन, आंसू गैस के गोले, बैरिकेडिंग और लाठी चार्ज आदि का उपयोग किया पर किसान इन सब से पार पाते हुए दिल्ली तक आ पहुंचे और दिल्ली के बॉर्डरों को घेर कर बैठ गए। 3 दिसंबर 2020 को सरकार और किसानों के बीच बातचीत का दौर शुरू हुआ पर किसान बिल वापसी से कम पर मानने को तैयार नही थे। किसान और सरकार में हर वार्ता बेनतीजा खत्म हो रही थी। संघर्ष चलते चलते एक साल से ज्यादा का वक्त गुजर गया। किसान बड़ी संख्या में गर्मी,सर्दी, बरसात, आंधी-तूफान का सामना करते हुए दिल्ली बॉर्डरों पर बैठे रहे।</div>
<div> </div>
<div>इस बीच करीब 700 से ज्यादा किसानों की इस संघर्ष में शिरकत करते हुए मौत हो चुकी थी। पूरे विश्व में किसान आंदोलन एक चर्चित विषय बन गया था। आखिरकार मोदी सरकार को किसानों की मांगे मानने के लिए मजबूर होना पड़ा। 19 नवंबर 2021 को खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों कृषि कानूनों को वापिस लेने का ऐलान किया। मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में एक बार फिर नोटबंदी हुई। इस बार सिर्फ 2000 के नोट ही बंद किए गए। अपने पहले कार्यकाल में मोदी सरकार  ही 2000 का नोट लाई थी और उसी ने अपने दूसरे कार्यकाल में इस नोट को बंद किया। इसी सरकार के कार्यकाल में अर्थव्यवस्था के लिहाज से भारत ने 2022 में ऐतिहासिक मुकाम हासिल किया। 31 मार्च 2022 को खत्म हुई तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था 854.7 अरब डॉलर के आंकड़े को छूते हुए आगे निकल गई। ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था 816 अरब डॉलर के साथ छठे पायदान पर खिसक गई।</div>
<div> </div>
<div>इस तरह भारतीय अर्थव्यवस्था ब्रिटेन को पीछे छोड दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गई। 28 मई 2023 के दिन नए संसद भवन का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा किया गया। इसके बाद से संसद की सभी कार्यवाही नए भवन से होने लगी। इसी सरकार के कार्यकाल में 22 जनवरी 2024 अयोध्या जी में बने भव्य श्रीराम  जन्मभूमि मन्दिर में भगवान श्रीराम की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा स्वंय प्रधानमंत्री मोदी ने की। 17वीं लोकसभा का कार्यकाल 16 जून 2024 को समाप्त हो जाएगा। 18वीं लोकसभा के गठन के लिए चुनाव पूरे देश में चल रहे हैं। यह लोकसभा चुनाव 19 अप्रैल 2024 से 01 जून 2024 तक सात चरणों में पूर्ण होंगे। नतीजों की तारीख 04 जून 2024 है।</div>
<div> </div>
<div> </div>
<div>इस बार चुनावी मुकाबला मुख्य तौर पर भाजपा नेतृत्व में लड़ रहे 42 दलों के गठबंधन एनडीए और कांग्रेस नेतृत्व में लड़ रहे 40 दलों के गठबंधन आईएनडीआईए के बीच है। कुछ राजनीतिक दल इन दोनों गठबंधनो से दूरी बनाकर भी चुनाव लड़ रहे हैं। एनडीए की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर एक बार फिर नरेंद्र मोदी चुनावी मैदान में है। वहीं दूसरी ओर आईएनडीआईए गठबंधन ने अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा अभी तक नही की है। इन चुनावों में कुल 6 राजनीतिक  दल राष्ट्रीय पार्टी की हैसियत से चुनाव लड़ेंगे। ये 6 राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, बहुजन समाज पार्टी , नेशनल पीपुल्स पार्टी और आम आदमी पार्टी हैं।</div>
<div> </div>
<div>इन चुनावों में लोकसभा की 543 सीटों के लिए मतदान हो रहा है। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक इन चुनावों में कुल मतदाता लगभग 96 करोड़ हैं। जिनमें से लगभग 47 करोड़ महिला वोटर हैं।</div>
<div>इन चुनावों के लिए पूरे भारत में 12 लाख से अधिक मतदान केंद्र स्थापित किए गए हैं और </div>
<div>संसदीय चुनावों का सुचारू संचालन सुनिश्चित करने के लिए लगभग 1.5 करोड़ मतदान कर्मियों को तैनात किया गया है। अब तक हुए मतदान को देखकर यही लग रहा है कि एनडीए गठबंधन और आईएनडीआईए गठबंधन के बीच कड़ा और रोमांचक मुकाबला हो रहा है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 19 May 2024 17:21:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Office Desk Lucknow]]></dc:creator>
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                <title>  और अब नामांकन भी गया उत्सव ... </title>
                                    <description><![CDATA[<div>  <strong>चाहे वह प्रधानमंत्री का शपथ ग्रहण समारोह हो, चुनाव प्रचार में रैली या रोड शो करना हो,जी एस टी जैसी नीति लागू करनी हो यहां तक कि कोविड जैसी विश्व की अब तक की सबसे बड़ी आपदा ही क्यों न हो, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन जैसे सभी अवसरों में 'उत्सव' तलाशने में विशेष महारत रखते हैं । हालांकि समय समय पर ज़रुरत के अनुसार वे यह भी बताने से भी नहीं चूकते कि उनकी परवरिश बेहद ग़रीबी में हुई। वह सार्वजनिक तौर पर भी कई बार अपनी ग़रीबी का ज़िक्र करते हुये अपने बचपन की कई दास्तानें सुना चुके हैं।</strong></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141334/and-now-the-nomination-has-also-become-a-celebration"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/modi-faqeer2.jpg" alt=""></a><br /><div> <strong>चाहे वह प्रधानमंत्री का शपथ ग्रहण समारोह हो, चुनाव प्रचार में रैली या रोड शो करना हो,जी एस टी जैसी नीति लागू करनी हो यहां तक कि कोविड जैसी विश्व की अब तक की सबसे बड़ी आपदा ही क्यों न हो, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन जैसे सभी अवसरों में 'उत्सव' तलाशने में विशेष महारत रखते हैं । हालांकि समय समय पर ज़रुरत के अनुसार वे यह भी बताने से भी नहीं चूकते कि उनकी परवरिश बेहद ग़रीबी में हुई। वह सार्वजनिक तौर पर भी कई बार अपनी ग़रीबी का ज़िक्र करते हुये अपने बचपन की कई दास्तानें सुना चुके हैं। वे स्वयं अपने  व अपनी मां के पीड़ादायक दिनों का जिक्र करते हुये बता चुके हैं -'कि बेचारी मेरी मां बर्तन साफ़ किया करती थीं। मैंने अपनी मां को दूसरों के घरों में बर्तन मांजते देखा है। साथ ही वह हमारा पालन पोषण भी बखूबी करती थीं। उन्होंने यह भी बताया था कि -' हम बिनौले छीलते थे, सुबह बेचने जाते थे, जिससे हमें जीने के लिए कुछ मज़दूरी मिलती थी'।</strong></div>
<div> </div>
<div><strong> मोदी ने कहा कि मजबूरियों से घिरी मां के बोझ को कम करने के लिए मैंने ख़ुद चाय बेची थी। प्रायः वे अपनी परवरिश के लिए दिये गये अपनी मां के बलिदान को याद करते रहते हैं। उनकी इस बाल कथा को सुनकर निश्चित रूप से सुनने वालों का मन यह सोचकर द्रवित हो उठता है कि इतनी ग़रीबी में पलने वाला व्यक्ति </strong><strong> किस तरह भारतीय संविधान व लोकतंत्र की महिमा से </strong><strong>देश के सर्वोच्च पद तक पहुँच सका। और जब वही मोदी यह कहते हैं कि मैं प्रधानमंत्री नहीं बल्कि प्रधानसेवक हूँ। वे स्वयं को फ़क़ीर भी बताते हैं। यहाँ तक कि जब उनसे यह पूछा जाने लगता है कि उनमें यह 'फ़क़ीरी ' आई कहाँ से ? और वे ख़ुद ही यह भी कहते हैं कि -'विरोधी मेरा क्या कर लेंगे? हम तो फ़क़ीर आदमी हैं, झोला लेकर चल पड़ेंगे।यह फ़क़ीरी है, जिसने मुझे गरीबों के लिए लड़ने की ताक़त दी है'। </strong></div>
<div> </div>
<div><strong>संघ से जुड़े अपने शुरूआती दिनों पर रौशनी डालते हुये वे यह भी बता चुके हैं कि काफ़ी दिनों तक वे अहमदाबाद के मणिनगर में डॉ. हेडगेवार भवन में रुके थे ,वहां वे सफ़ाई करते थे।  वहां उनका यही काम था,सुबह 5 बजे उठना, झाड़ू-पोछा लगाना. सबके लिए चाय बनाना और 5.20 बजे सबको उठाकर चाय देना। मोदी यह भी कह चुके हैं कि - 'कोई भरोसा नहीं करेगा, लेकिन मैं 35 साल तक भिक्षा मांग कर खाया हूं।  बेशक ये बात किसी के गले नहीं उतरेगी। हालांकि, मैं कहीं बता कर नहीं जाता था। वहां जाने पर जो भी मिल जाता, मैं खा लेता।  अगर नहीं मिलता तो नहीं खाता। मेरा जीवन ऐसे ही गुज़रा है।  कभी पार्टी के काम से देर से आया तो खिचड़ी बना कर खा लेता था'। </strong></div>
<div> </div>
<div><strong>और प्रधानमंत्री बनने के बाद जब वे कभी कभी संतों की वेशभूषा में कहीं कहीं शाष्टांग दंडवत करते दिखाई देते हैं तो भी यही गुमान भी होने लगता है कि वास्तव में देश को ग़रीबी में परवरिश पाने वाला कोई संत फ़क़ीर रुपी प्रधानमंत्री मिला है। ज़ाहिर है ऐसे घोर ग़रीबी में पलने वाले ऐसे व्यक्ति से तो यही उम्मीद की जा सकती है कि उसका सारा जीवन सादगी से भरा हुआ होगा उसके रहन सहन व क्रिया कलापों में भी सादगी की झलक नज़र आएगी। और उसका सारा जीवन ग़रीबों के कल्याण में व उनका जीवन स्तर ऊपर लेजाने में गुज़रेगा। </strong></div>
<div> </div>
<div><strong>परन्तु इन्हीं नरेंद्र मोदी का एक ऐसा रूप भी है जो उनकी बालकथा से बिल्कुल विपरीत है।  उनका खान पान परिधान आदि तो शाही हैं ही साथ ही उनके राजनैतिक व सरकारी क्रिया कलाप व आयोजन भी इतने ख़र्चीले हैं जितने कि पूर्व के किसी भी प्रधानमंत्री के नहीं रहे। मोदी ने प्रधानमंत्री बनते ही अपनी यात्रा के लिए लगभग 8,458 करोड़ रुपये की लागत से अत्याधुनिक दो बोईंग 777-300ER विमान ख़रीदे। यह विमान अमेरिकी राष्ट्रप‍ति के एयरफ़ोर्स वन की तरह के हैं। बल्कि कई मामलों में उससे भी आधुनिक हैं। एक 'ग़रीब प्रधानमंत्री' के इस क़दम की बहुत आलोचना हुई  थी क्यूंकि इसमें देश की ग़रीब जनता का पैसा लगा था।</strong><strong> इसी के साथ मोदी ने सेंट्रल विस्टा नामक परियोजना के तहत नया संसद भवन बनवा डाला।</strong></div>
<div> </div>
<div><strong> इस परियोजना की लागत अनुमानतः ₹13,450 करोड़ थी। यह भी जनता के टैक्स के पैसों से बनाया गया ऐसा प्रोजेक्ट था जिसकी देश को कोई आपातकालीन ज़रुरत नहीं थी। पुराना संसद भवन भी अभी पूरी तरह मज़बूत अवस्था में है। मगर यह सब एक 'फ़क़ीर प्रधानमंत्री' के फ़ैसले थे। मोदी जी को जहां मंहगे व बेशक़ीमती परिधान पहनने व दिन में कई बार लिबास बदलने का शौक़ है वहीँ इनकी घड़ियाँ व पेन आदि भी लाखों रूपये क़ीमत के और विदेशी होते हैं। याद कीजिये राष्ट्रपति ओबामा के भारत दौरे पर मुलाक़ात के समय नरेंद्र मोदी ने जो कोट सूट पहना था उसके फ़ैब्रिक में ही नरेंद्र दामोदरदास मोदी बुना हुआ था। जब इस आलीशान शहंशाही परिधान की ख़ूब आलोचना हुई तो इसे नीलाम कर दिया गया। उसी के बाद विपक्षी मोदी सरकार को सूट बूट वाली सरकार कहते हैं। मेकअप कराना फ़ोटो शूट कराना,पोज़ देना ,कैमरे में अपने सिवा अन्यों को फ़्रेम से बाहर रखना जैसी 'फ़क़ीरी भरी ' बातों से तो सभी वाक़िफ़ हैं।</strong></div>
<div> </div>
<div><strong>इतना ही नहीं बल्कि सरकारी ख़र्च पर बड़े बड़े आयोजन करना चुनावी सभाओं व रैलियों को करोड़ों ख़र्च कर उत्सव का रूप देना ,अपनी छवि चमकाने के लिया एजेंसियां अनुबंधित करने व विज्ञापन आदि पर जनता का पैसा ख़र्च करना भी इनके शग़ल में शामिल है। गुजरात में चुनाव प्रचार के दौरान सी प्लेन मोदी ने सी प्लेन उद्घाटित किया और वोट बटोरने की कोशिश की परन्तु बाद में वह सेवा ही बंद हो गयी। जी एस टी जैसा कथित तौर पर व्यावसायिक विरोधी कहा जाने वाला क़ानून जिस रात लागू हुआ उस रात तो ऐसा जश्न मनाया गया गोया देश को नई आज़ादी मिली हो। चुनावों में होने वाले इनके रोड शो बेहद ख़र्चीले होते हैं। इनके रोड शो में ट्रकों में भरकर फूल मंगाए जाते हैं।</strong></div>
<div> </div>
<div><strong> एक स्थान पर सैकड़ों कार्यकर्त्ता उनकी पंखुड़ियां अलग करते हैं। फिर पूरे रस्ते में पार्टी कार्यकर्त्ता निर्धारित दूरी व स्थान पर थैलों में उन पंखुड़ियों को लेकर सड़कों व छतों पर खड़े होते हैं। और 'शहंशाह रुपी फ़क़ीर' के वहां से गुज़रने पर उनपर पुष्प वर्षा करते हैं। जबकि देश को टी वी पर देखने में यही लगता है कि जनता फूल बरसा कर उनका स्वागत कर रही है। पिछले दिनों वाराणसी में उनके नामांकन के दौरान भी इसी तरह का दृश्य देखने को मिला। पहले उन्होंने 13 मई को  वाराणसी में 6 किमी लंबा बेहद ख़र्चीला रोड शो किया। </strong></div>
<div> </div>
<div><strong>उसके बाद क्रूज़ पर बैठ वाराणसी के घाटों का भ्रमण किया। उसी क्रूज़ पर एक 'गोदी मीडिया ' के सदस्य टी वी चैनल को एक सुगम साक्षात्कार दिया। उसमें अपनी भावुकता जमकर दर्शायी। उसके बाद 14 मई को नामांकन में तो काशी में भाजपा के दिग्गजों का जमावड़ा लग गया। इनमें गृह मंत्री अमित शाह और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा,केंद्रीय मंत्रिमंडल के कई मंत्री,उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री व अनेक मंत्रियों के अलावा कई राज्य के मुख्यमंत्री भी वहां मौजूद रहे। गोया करोड़ों रूपये ख़र्च कर 'फ़क़ीर' की इस नामांकन प्रक्रिया को भी एक उत्सव का रूप दे दिया गया। </strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
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                <pubDate>Wed, 15 May 2024 16:39:31 +0530</pubDate>
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                <title>मोदी बनाम मुद्दा बना चुनावी विमर्श</title>
                                    <description><![CDATA[<div>  <strong>देश में 18 वीं लोकसभा निर्वाचित करने का चुनावी दौर जैसे जैसे आगे बढ़ता जा रहा है वैसे वैसे चुनावी माहौल में भी तल्ख़ी बढ़ती जा रही है। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुंह से ऐसी तमाम बातें सुनी जा रही हैं जिसकी  देश के प्रधानमंत्री जैसे सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति से उम्मीद भी नहीं की जा सकती। वैसे तो प्रधानमंत्री पद पर बैठते ही मोदी ने अपने बड़पोलेपन और झूठ से देश और दुनिया को आश्चर्य चकित करना शुरू कर दिया था। परन्तु उससे भी बड़े आश्चर्य की बात तो यह कि उन्होंने अपने इस बड़पोलेपन,झूठ और अवैज्ञानिक</strong></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141166/modi-vs-issue-becomes-election-discussion"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/rahul-modi.jpg" alt=""></a><br /><div> <strong>देश में 18 वीं लोकसभा निर्वाचित करने का चुनावी दौर जैसे जैसे आगे बढ़ता जा रहा है वैसे वैसे चुनावी माहौल में भी तल्ख़ी बढ़ती जा रही है। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुंह से ऐसी तमाम बातें सुनी जा रही हैं जिसकी  देश के प्रधानमंत्री जैसे सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति से उम्मीद भी नहीं की जा सकती। वैसे तो प्रधानमंत्री पद पर बैठते ही मोदी ने अपने बड़पोलेपन और झूठ से देश और दुनिया को आश्चर्य चकित करना शुरू कर दिया था। परन्तु उससे भी बड़े आश्चर्य की बात तो यह कि उन्होंने अपने इस बड़पोलेपन,झूठ और अवैज्ञानिक बातों पर विराम लगाने के बजाये इसे और भी बढ़ाना शुरू कर दिया। शायद उन्होंने देश की जनता को मूर्ख और अनपढ़ समझ रखा था। नाली से गैस निकालकर चाय बनाना,ट्रैक्टर के ट्यूब में गोबर गैस भरकर उससे इंजन चलाकर खेतों की सिंचाई करना, बादल में रडार का काम न करना जैसी अनेक बेतुकी व तथ्यविहीन बातें बोलकर प्रधानमंत्री ने अपने पद की गरिमा को दाग़दार किया।</strong></div>
<div> </div>
<div><strong> इसके अतिरिक्त उनका दूसरा प्रिय मिशन रहा गांधी नेहरू परिवार का निम्न स्तर तक विरोध,कांग्रेस मुक्त भारत की उनकी दिली मनोकामना, मुसलमानों का हद दर्जे तक विरोध और विपक्षी नेताओं विशेषकर कांग्रेस नेता राहुल गाँधी द्वारा बोली गयी बातों को अपनी सुविधा के हिसाब से ट्विस्ट देना और बात का बतंगड़ बना देना। मिसाल के तौर पर राहुल गाँधी ने 21 मार्च को ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ के समापन के अवसर पर मुंबई के शिवाजी पार्क में एक रैली को संबोधित करते हुये कहा था, कि ‘‘हिन्दू धर्म में शक्ति शब्द होता है। हम शक्ति से लड़ रहे हैं...एक शक्ति से लड़ रहे हैं। </strong></div>
<div> </div>
<div><strong>बाद में उन्होंने 'शक्ति ' शब्द की और व्याख्या करते हुये कहा कि - वह शक्ति क्या है? हमारी लड़ाई ‘नफ़रत भरी आसुरी शक्ति’ के ख़िलाफ़ है। ‘हमारी आसुरी शक्ति से लड़ाई हो रही है, नफ़रत भरी आसुरी शक्ति से। ’परन्तु प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘शक्ति’ शब्द का प्रयोग अपनी सुविधानुसार करते हुये कहा कि 'उनके लिए हर मां-बेटी ‘शक्ति’ का स्वरूप है और वह उनके लिए अपनी जान की बाज़ी लगा देंगे। इस तरह के अनेक उदाहरण हैं जिससे यह साबित होता है कि मोदी सिर्फ़ फ़ुज़ूल की बातों में लोगों को उलझाकर जनता से जुड़े वास्तविक मुद्दों से लोगों का ध्यान भटकाना चाहते हैं। </strong></div>
<div><strong><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2024-05/modi-elligation.jpg" alt="modi elligation"></img></strong></div>
<div><strong>परन्तु  2024 के इस ऐतिहासिक चुनाव में इंडिया गठबंधन के नेता विशेषकर राहुल व प्रियंका गांधी अपने चुनाव प्रचार अभियान को जनता से जुड़े वास्तविक मुद्दों पर केंद्रित करने में पूरी तरह सफल रहे हैं। इतना ही नहीं बल्कि कांग्रेस नेता, मोदी की घटिया व निम्नस्तरीय बातों से भी लोगों को अवगत कराकर यह बताने में भी सफल रहे हैं कि जनता से मोदी का निरर्थक इकतरफ़ा संवाद दरअसल जनता का ध्यान भटकाने के लिये है।  और यह भी कि प्रधानमंत्री कि इस तरह की संवाद शैली देश के प्रधानमंत्री जैसे पद पर बैठे व्यक्ति के लिए अशोभनीय है तथा देश की बदनामी का सबब भी है। </strong><strong>साथ ही विपक्ष जनता को यह बताने में भी कामयाब हुआ है कि किस तरह मोदी फ़ुज़ूल की बातों में लोगों को उलझाकर और लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ कर जनसरोकार से जुड़ी वास्तविक समस्याओं से लोगों का ध्यान भटकने की कोशिश कर रहे हैं। </strong></div>
<div> </div>
<div><strong>जब मोदी कहते हैं कि कांग्रेस ने 70 वर्षों में देश के लिये कुछ बनाया ही नहीं तो प्रियंका गाँधी उसके जवाब में मोदी से ही पूछ रही हैं कि जिन दर्जनों सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पी एस यू ) को आप अपने चंद मित्रों के हवाले कर रहे हैं वह कांग्रेस के नहीं तो किसके बनवाये हुये हैं ? विपक्ष मोदी से उन्हीं के वादों को याद दिलाते हुये यह भी पूछ रहा है कि 10 साल पहले आपने लोगों के खाते  में 15 लाख रुपये डालने को कहा था, वह क्यों नहीं आये ? जबकि चंद पूंजीपतियों के 16 लाख करोड़ रुपये क़र्ज़ मुआफ़ कर दिये गये ? कहाँ हैं आपके वादे के 10 वर्ष पूर्व घोषित किये गये 100 स्मार्ट सिटी ? कहाँ हैं आपके वादों के 2 करोड़ रोज़गार ? 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का वचन कहां गया ?</strong></div>
<div> </div>
<div><strong>आर जे डी नेता तेजस्वी यादव ने तो अपने चुनाव प्रचार के दौरान एक नये तरीक़े का प्रयोग किया। उन्होंने पूर्व में नरेंद्र मोदी द्वारा जनता से किये गए वादों का एक ऑडियो उन्हीं की आवाज़ में अपनी जनसभा में सुना डाला। अपनी तरह का यह अनूठा प्रयोग था। मोदी को उन्हीं के वादों की याद दिलाकर उन्हें कटघरे में खड़ा करना कितना विपक्ष के लिये कितना कारगर साबित हो रहा है इसका अंदाज़ा चुनाव प्रचार अभियान के दौरान प्रधानमंत्री मोदी के दिनोंदिन बिगड़ते जा रहे लहजों व उनके द्वारा उठाये जा रहे निरर्थक व बचकाना क़िस्म के मुद्दों से लगाया जा सकता है। </strong></div>
<div><strong><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2024-05/modi-rahul.jpg" alt="modi rahul"></img></strong></div>
<div><strong>कभी कहते हैं कि कांग्रेस के लोग मटन बनाने का मौज ले रहे हैं। कभी बोलते हैं कि अगर आपके पास दो भैंस है तो कांग्रेस उसमें से एक भैंस छीन कर ले जाएगी। कभी कांग्रेस व विपक्षी गठबंधन को हिन्दू विरोधी  बताते हुये कहते हैं कि यह हिन्दू धर्म को ख़त्म करना चाहते हैं। तो कभी यह कि कांग्रेस सत्ता में आयी तो क्रिकेट टीम में मुसलमानों को भर देगी। यहाँ तक कि कांग्रेस सत्ता में आयी तो बहनों का मंगल सूत्र छीन लेगी और आपका सोना ले लेगी। यानी अजीब अजीब सी बदहवासी भरी बातें जिसका राजनीति से कोई वास्ता ही नहीं, इसतरह की बातें कर वह उन सवालों से बचना चाहते हैं जो जनता के वास्तविक सवाल हैं। </strong></div>
<div> </div>
<div><strong>नरेंद्र मोदी के फ़ुज़ूल,निम्नस्तरीय,ग़ैर राजनैतिक व साम्प्रदायिक विद्वेष से भरे बयान निश्चित रूप से इस बात का सुबूत हैं कि वे विपक्ष द्वारा उठाये जा रहे जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों के सामने बौखला से गए हैं। जब कांग्रेस व इण्डिया गठबंधन सत्ता में आने पर अग्निवीर योजना ख़त्म कर सैनिकों की पूर्ववत भर्ती करने की बात करती है तो देश के युवाओं में उम्मीद जगती है। किसानों के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य का क़ानून बनाने की बात कर विपक्ष किसानों में आस जगाता नज़र आता है। कांग्रेस पार्टी की 5 गारंटी ने तो नरेंद्र मोदी को इतना असहज कर दिया है कि वह बौखला कर कांग्रेस के घोषणा पत्र को मुस्लिम लीग का घोषणा पत्र बताने लगे हैं। बेशक यह हालात इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिये काफ़ी हैं कि विपक्षी इंडिया गठबंधन चुनावी विमर्श को मोदी बनाम मुद्दा बनाने में पूरी तरह कामयाब रहा है। </strong></div>
<div> </div>
<div><span style="font-size:large;"><strong>तनवीर जाफ़री   </strong></span></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 12 May 2024 16:20:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Office Desk Lucknow]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>गन्धर्वपुरी की सप्ततीर्थी सात प्राचीन प्रतिमाएँ</title>
                                    <description><![CDATA[<p>मध्यप्रदेश के देवास जिलान्तर्गत सोनकच्छ के निकट छोटे से गाँव गन्धर्वपुरी में प्रभूत पुरातत्त्व प्राप्त हुआ है। यहाँ तीन सौ से अधिक प्राचीन प्रतिमाएँ और प्रस्तर प्राप्त हुए हैं। यहां बहुतीर्थी तीर्थंकर प्रतिमाएँ भी बहु संख्या में हैं। उनमें से सात सप्ततीर्थी तीर्थंकर मूर्तियाँ हैं। उनका परिचय इस प्रकार है-<br /><br /><span style="color:#ff00ff;">प्रथम सप्ततीर्थी तीर्थंकर प्रतिमा-</span><br />सप्ततीर्थी अर्थात् एक ही शिलाफलक में एक साथ सात तीर्थंकरों का शिल्पांकन। अधिकतर बहुतीर्थी प्रतिमाओं में एक मुख्य मूर्ति होती है और उसके परिकर में अन्य तीर्थंकरों को उत्कीर्णित किया जाता है। बलुआ पाषाण की आदमकद इस प्रतिमा का पादपीठ उपलब्ध नहीं है। मूलनायक प्रतिमा के</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141063/saptatirthi-seven-ancient-statues-of-gandharvapuri"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/gandharvpuri,-saptteerthi,-devas-dic-mp.jpg" alt=""></a><br /><p>मध्यप्रदेश के देवास जिलान्तर्गत सोनकच्छ के निकट छोटे से गाँव गन्धर्वपुरी में प्रभूत पुरातत्त्व प्राप्त हुआ है। यहाँ तीन सौ से अधिक प्राचीन प्रतिमाएँ और प्रस्तर प्राप्त हुए हैं। यहां बहुतीर्थी तीर्थंकर प्रतिमाएँ भी बहु संख्या में हैं। उनमें से सात सप्ततीर्थी तीर्थंकर मूर्तियाँ हैं। उनका परिचय इस प्रकार है-<br /><br /><span style="color:#ff00ff;">प्रथम सप्ततीर्थी तीर्थंकर प्रतिमा-</span><br />सप्ततीर्थी अर्थात् एक ही शिलाफलक में एक साथ सात तीर्थंकरों का शिल्पांकन। अधिकतर बहुतीर्थी प्रतिमाओं में एक मुख्य मूर्ति होती है और उसके परिकर में अन्य तीर्थंकरों को उत्कीर्णित किया जाता है। बलुआ पाषाण की आदमकद इस प्रतिमा का पादपीठ उपलब्ध नहीं है। मूलनायक प्रतिमा के चरणों के समानान्तर चॅवरवाहक द्विभंगासन में खड़े हैं। उनके उपरान्त समानान्तर में ही दोेनों ओर यक्ष-यक्षी हैं। यक्ष बाईं ओर तथा यक्षी दाहिनी ओर उत्कीर्णित है। जबकि यक्ष को दाहिनी ओर और यक्षी को तीर्थंकर के बाम भाग में दर्शाये जाने का विधान है। दोनों चार-चार भुजाओं युक्त पर्यंकासन में हैं। खण्डित होने के कारण इनके आयुध स्पष्ट नहीं हैं, दोनों के आभरण एवं यक्षी के एक हाथ में फल स्पष्ट होता है। फल चौबीस तीर्थंकरों में से 10-11 की यक्षियों के है, इस कारण केवल फल आयुध के आधार पर यह निर्णीत होना कठिन है कि यह किस तीर्थंकर की यक्षी है। अतः तीर्थंकर निर्णीत नहीं हो पा रहे हैं। यक्ष-यक्षी के पीछे को एक-एक स्वतंत्र आकृति है, बायीं ओर स्त्री आकृति और दाएं तरफ पुरुष छवि है। यक्ष-यक्षी के ऊपर के स्थान पर छोटी-छोटी स्वतंत्र चरणचौकियों पर दोनों ओर एक-एक कायोत्सर्ग लघुजिन उत्कीर्णित हैं। उनके ऊपर के भाग में स्तंभ जैसी साज-सज्जा है। इन स्तंभों के ऊपरी भागों में मानस्तंभ की भांति देवकुलिका हैं उनमें एक-एक पद्मासन जिन हैं। इस शिलाकृति के वितान अर्थात् शीर्ष भाग मेें भी दोनों ओर देवकुलिका में ही एक-एक पद्मासन जिन उत्कीर्णित हैं। इस तरह परिकर में छह लघुजिन मूर्तियां हैं।</p>
<p><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2024-05/gandharvpuri,-saptteerthi-5,-devas-dic-mp.jpg" alt="Gandharvpuri, Saptteerthi 5, devas dic MP"></img>मुख्य मूर्ति का लिंग व टेहुनी से नीचे दोनों भुजाएं खण्डित हैं। उदर के नीचे त्रिवली है, वक्ष पर श्रीवत्स के किंचित् निशान अवशेष हैं, ग्रीवा-त्रिवली भी है। उष्णीष सहित कुंचित केश हैं। प्रभावल सुन्दर है, प्रभावल के बाह्य परिधि में मोटी कलात्मक बेल जैसी दर्शाई गई है, जिसके दोनों छोर मुख्य प्रतिमा के स्कंधों केे पीछे से निकले हुए मकर-मुखों में समाहित हैं। शिर पर भग्न त्रिछत्र, दुंदुभिवादक, गंधर्व, पुष्पवर्षक देव उत्कीर्णित हैं, जो प्रायः खण्डित हो गये हैं। इस प्रतिमाशिल्प मेें दोनों किनारों पर नीचे से ऊपर तक अतिरिक्त अंकन महत्वपूर्ण है। बायें तरफ सुन्दर आभरण भूषित, उच्च केश-सज्जा युक्त एक स्त्री बैठी हुई दर्शाई गई है। उससे ऊपर के स्थान में एक स्त्री कुछ कम सज्जित खड़ी हुई अंकित है, जो कायोत्सर्ग लघुजिन के समानान्तर है, वहिर्मुख शार्दूल उत्कीर्णित है, पश्चात् एक आराधिका खड़ी हुई है, जो स्तंभ की उपरिम कुलिका में पद्मासनस्थ लघुजिन के समानान्तर है। उपरान्त सबसे ऊपर माल्यधारी देव हैं। इसी तरह की संयोजना दाईं ओर है। अंतर यह है कि इस ओर पुरुष छवियां हैं। इस तरह यह सप्ततीर्थी प्रतिमा खण्डित होने पर भी मनोरम है। इसमें यक्ष-यक्षी का नियम विरुद्ध पार्श्वों में उत्कीर्णन भी इसकी विशेषता है।<br /><br /><span style="color:#ff00ff;">द्वितीय सप्ततीर्थी तीर्थंकर प्रतिमा-</span><br />पाषाणशिला-खण्ड में ही यह प्रतिमा प्रथम सप्ततीर्थी के ही समान है। इसमें अन्तर यह है कि इसके यक्ष-यक्षी नियमानुसार बायें यक्षी और दाहिने यक्ष अंकित है, ये दोनों भी चतुर्भुज हैं। यक्षी के पार्श्व में भी एक यक्षी ही प्रतीत होती है, क्योंकि वह भी पर्यंकासन में और फल लिये हुए दर्शाई गई है। स्तंभ के उपरिम देवकुलिका के लघु जिन के पार्श्व में यहाँ अंजलिबद्ध आराधिका बैठी है। जो जिनाभिमुख है। इस मुख्य प्रतिमा की भुजाएं कुछ अधिक भग्न हैं। शिर पूरी तरह खण्डित है।<br /><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2024-05/gandharvpuri,-saptteerthi-3,-devas-dic-mp.jpg" alt="Gandharvpuri, Saptteerthi 3, devas dic MP"></img><br /><span style="color:#ff00ff;">तृतीय सप्ततीर्थी तीर्थंकर प्रतिमा-</span><br />यह प्रतिमा भी प्रथम सप्ततीर्थी के ही समान है। इसका नीचे का भाग टूटा है या जमीन में धँसा हुआ है, इस कारण चरण व यक्ष-यक्षी आदि अदृष्ट हैं। शिर भग्न है, हाथ लगभग प्रथम प्रतिमा के समान टूटे हुए हैं। त्रिछत्र किंचित् भग्न होने से स्पष्ट है।<br /><br /><span style="color:#ff00ff;">चतुर्थ सप्ततीर्थी तीर्थंकर प्रतिमा-</span> बलुआ पाषाणशिलाखण्ड में निर्मित यह प्रतिमा तृतीय प्रतिमा के समान है। इसका अधो व ऊर्ध्व भाग खण्डित है। मस्तक तथा दाहिनी ओर का भाग भी भग्न है। शेष संरचना उपरोक्त प्रतिमाओं की भांति ही है।<br /><br /><span style="color:#ff00ff;">पंचम सप्ततीर्थी तीर्थंकर प्रतिमा-</span><br />बलुआ पाषाण में निर्मित कायोत्सर्गस्थ इस प्रतिमा का घुटनों से नीचे का शिला-भाग खण्डित व अनुपलब्ध है। इस कारण पादपीठ और यक्ष-यक्षी की स्थिति बताई नहीं जा सकती है। इसके परिकर में सभी कायोत्सर्गस्थ लघु जिन हैं। बाम पार्श्व में तीन लघु जिन हैं, दायें तरफ भी कम से कम तीन लघु जिन अवश्य होंगे, क्योंकि नीचे की शिला खंडित होने से दो ही लघु जिन दृष्ट हैं। मुख्य मूर्ति की भुजाएं भग्न हैं, वक्ष पर बड़ा सा श्रीवत्स है, केश कुंचित हैं, उष्णीष नहीं है। प्रभावल सामान्य कलात्मक है। इसके प्रभावल के बाह्य भाग में अतिरिक्त अंकन नहीं है। शिरोभाग के दोनों पार्श्वों में माल्यधारी विद्याधर सपत्नीक दर्शाये गये हैं। त्रिछत्र के ऊपर मृदंगवादक और उसके दोनों ओर एक-एक नर्तकी नृत्यमग्न उत्कीर्णित है। इस वितान भाग में दोनों ओर एक-एक गजलक्ष्मी का गज सवारयुक्त उत्कीर्णित है जो भग्न हैं।<br /><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2024-05/gandharvpuri,-saptteerthi-7,-devas-dic-mp.jpg" alt="Gandharvpuri, Saptteerthi 7, devas dic MP"></img><br /><span style="color:#ff00ff;">षष्ठ सप्ततीर्थी तीर्थंकर प्रतिमा-</span><br />बलुआ पाषाण में ही उत्कीर्णित यह मूर्ति पद्मासनस्थ है। पादपीठ में सिंहासन के विरुद्धाभिमुख दो सिंह हैं, मध्य में अर्धचन्द्र जैसा प्रतीत हो रहा है। प्रतिमा खुले आकाश में बीसों वर्षों से होने के कारण क्षरित हो गई है, इस कारण निर्मिति की सूक्ष्मता खत्म हो गई है। इस पादपीठ पर दाहिनी ओर यक्ष तथा बाईं ओर यक्षी उत्कीर्णित है। दोनों द्विभुज हैं। सिंहासन पर एक वृत्ताकार चरणचौकी है, उस पर मुख्य तीर्थंकर पद्मासन में आसीन हैं। वृत्ताकार आसन पर पद्मासन मूर्ति की मुड़े हुए पैरों के घुटनों का भाग बाहर निकला रहता है, ऐसे में मूर्तिभंजकों ने दोनों घुटने आसानी से तोड़ दिये होंगे। वक्ष पर श्रीवत्स का चिह्न अभी भी है, शिर पर उष्णीष युक्त कुंचित (घुंघराले) केश दर्शित हैं। कलात्मक प्रभावल के दो बाह्य परिधियां भी कलात्मक हैं।</p>
<p>मुख्य प्रतिमा के दोनों पार्श्वों में स्वतन्त्र आसन पर एक-एक कायोत्सर्ग मुद्रा में लघुजिन हैं, उनके बाह्य में एक एक परिचारक है। बाईं ओर के जिन के पार्श्व में सम्भवतः परिचारिका है। इन दोनों लघु जिनों का मस्तक सर्पफणों से अच्छादित है। मुख्य मूर्ति के शिर के दोनों ओर माल्यधारी देव सपत्नीक दर्शाये गये हैं, उनके समकक्ष कायोत्सर्गासन में एक-एक लघुजिन हैं। इनके उष्णीष युक्त कुंचित केश हैं, सर्पफणाटोप नहीं है। माल्यधारकों के ऊपर के भाग में एक-एक पद्मासन लघु जिन हैं। वितान में पूर्ण मृदंगवादक और उसके दोनों ओर एक-एक नर्तकी नृत्यमग्न उत्कीर्णित है। इस वितान भाग में दोनों ओर एक-एक गजलक्ष्मी का गज अभिषेकातुर उत्कीर्णित है। इसके भी परिकर में छह लघु तीर्थंकर और एक मुख्य मूर्ति होने से सप्ततीर्थी प्रतिमा है।<br /><br /><span style="color:#ff00ff;">सप्तम सप्ततीर्थी तीर्थंकर प्रतिमा-</span><br />उपरिवर्णित छहों प्रतिमाएँ गंधर्वपुरी के स्थानीय राजकीय संग्रहालय के अधीनस्थ एक खुले वाड़े में परिधिकृत संरक्षित हैं और प्रस्तुत प्रतिमा गंधर्वपुरी के स्थानीय दिगम्बर जैन मंदिर में स्थित है, जिसकी जैन श्रद्धालुओं द्वारा प्रतिदिन आराधना दर्शन किये जाते हैं। यह काले पाषाण में सपरिकर प्रतिमा है। इसके पादपीठ की स्थिति स्पष्ट नहीं है। चामरधारी असाधारण से कुछ पीछे को झुके हुए मानों मूलनायक को ऊपर की ओर देखते हुए चवॅर ढुरा रहे हों। मूलनायक के समानान्तर और चामरवाहकों के बाद एक-एक कायोत्सर्ग लघु तीर्थंकर उत्कीर्णित हैं। इनके पार्श्वों में भी चामरवाहक हैं। इन कायोत्सर्ग जिन के ऊपर के स्थान में एक-एक पद्मासन तीर्थंकर प्रतिमा है और उनके ऊपर भी एक-एक पद्मासन तीर्थंकर प्रतिमा है। इस तरह परिकर में दोनों ओर तीन-तीन प्रतिमाएँ हैं। परिकर की ऊपर की दोनों ओर की लघु प्रतिमाओं के शिर पर सर्पफणावलियाँ हैं। मुख्य मूर्ति के मस्तक के दोनों ओर एक-एक माल्यधारी उड्डीयमान देव है। वितान में त्रिछत्र, तदोपरि दुंदुभिवादक उत्कीर्णित किया गया है। इसमें यक्ष-यक्षी नहीं दर्शाये गये हैं।</p>
<p><br />इस तरह गंधर्वपुरी में बहुतीर्थी प्रतिमाओं में सात ऐसीं प्रतिमाएँ हैं जिनके परिकर में अन्य छह लघु तीर्थंकर प्रतिमाएँ भी हैं। इनमें अन्य विशेषताओं के अतिरिक्त तीन प्रमुख विशेषताएँ हैं- 1. परिकर में दोनों ओर स्तंभ या मानसतंभ के समान अंकन किया जाना, जिसमें अधोभाग में यक्ष अथवा यक्षी, मध्य भाग में कायोत्सर्ग तीर्थंकर और उपरिम भाग में देवकुलिका में पद्मासन तीर्थंकर का निरूपण। 2. एक साथ दो-दो यक्ष-यक्षी का अंकन और 3. नियम व परंपरा के विरुद्ध तीर्थंकर के दायें तरफ यक्षी तथा बायें तरफ यक्षी का दर्शाया जाना।</p>
<p><strong>-डॉ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’, इन्दौर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विचारधारा</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 May 2024 15:55:52 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>अक्षय लोकतंत्र का उत्सव है चुनाव</title>
                                    <description><![CDATA[<p>चुनाव लत्ता-लपेड़ी करने का नहीं बल्कि लोकतंत्र को अक्षय बनाने का उत्सव है, लेकिन दुर्भाग्य कि  हमारे नेता इस उत्सव को उत्सव की तरह न मनाकर एक-दूसरे का चीर-हरण करने में लगे हैं। राजनीतिक संवाद इतने निचले स्तर पर आ चुका है कि अब लज्जा आने लगी है। लज्जा आये भी  क्यों न ? आखिर हम विश्व गुरु हैं। बात चुनाव से पहले लोकतंत्र की करें।  हमारा लोकतंत्र अक्षय है ,ये मानने में पता नहीं क्यों लोगों को शर्म आती है।  पता नहीं क्यों लोग लोकतंत्र को लेकर आशंकित है।  एक-दूसरे कि सामने नए-नए हौआ खड़े कर रहे हैं।  कभी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141061/elections-are-a-celebration-of-eternal-democracy"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/लोकतंत्र-क्या-है-लोकतंत्र-की-परिभाषा-लोकतंत्र-शासन-प्रणाली.webp" alt=""></a><br /><p>चुनाव लत्ता-लपेड़ी करने का नहीं बल्कि लोकतंत्र को अक्षय बनाने का उत्सव है, लेकिन दुर्भाग्य कि  हमारे नेता इस उत्सव को उत्सव की तरह न मनाकर एक-दूसरे का चीर-हरण करने में लगे हैं। राजनीतिक संवाद इतने निचले स्तर पर आ चुका है कि अब लज्जा आने लगी है। लज्जा आये भी  क्यों न ? आखिर हम विश्व गुरु हैं। बात चुनाव से पहले लोकतंत्र की करें।  हमारा लोकतंत्र अक्षय है ,ये मानने में पता नहीं क्यों लोगों को शर्म आती है।  पता नहीं क्यों लोग लोकतंत्र को लेकर आशंकित है।  एक-दूसरे कि सामने नए-नए हौआ खड़े कर रहे हैं।  कभी मुसलमानों का हौआ ,कभी मंगलसूत्र छीने जाने का हौआ, और तो और अब सैम अंकल कि भाषण का हौआ।  सवाल ये है कि  क्या सचमुच इन हौओं  से हमारा लोक और हमारा लोकतंत्र भयभीत होकर फैसला करने लगेगा।</p>
<p>सत्ता हासिल करने कि लिए सत्तारूढ़ दल लगातार हौओं कि सहारे चुनाव लड़ रही है ,जबकि उसे एक दशक तक सत्ता में रहने कि बाद अपनी उपलब्धियों कि आधार पर चुनाव लड़ना चाहिए था। प्रतिपक्ष ये हौवे खड़े करे तो समझ में आता है ,लेकिन यहां तो उलटी गंगा बह रही है। सत्तारूढ़ दल प्रतिदिन एक नया हौआ खोजकर लाता है। मजे की बात ये है कि  ये तमाम हौवे ऐसे हैं जो मतदान को प्रभावित करने कि बजाय उलटे पड़ रहे हैं। हंसी तो तब आयी जब माननीय प्रधानमंत्री जी ने राहुल गांधी से सवाल किया कि  वे आजकल अडानी-अम्बानी   के खिलाफ क्यों नहीं बोल रहे ? क्या उन्हें टेम्पो में भरकर पैसे दे दिए हैं इन लोगों ने ? माननीय भूल गए की जब राहुल गांधी संसद से लेकर सड़क तक अडानी से मिले 20  लाख करोड़ के बारे में सवाल करते थे तब उनकी तारीफ तो किसी ने नहीं की ,बल्कि सत्तारूढ़ दल ,दल के नेता गुड़ खाकर बैठे रहे थे।</p>
<p>मुझे कभी-कभी ऐसा लगता है कि  अब शायद अडानी-अम्बानी ने भी सत्तारूढ़ दल से अपना हाथ खींच लिया है।  इन दोनों उद्योग घरानों को भी देश में संभावित परिवर्तन की आहट सुनाई देने लगी है। अन्यथा इन दोनों ने तो दस साल में खुद के साथ-साथ सत्तारूढ़ दल को भी मालामाल ही किया था। अडानी-अम्बानी केवल उद्योगपति ही नहीं बल्कि   मौसम वैज्ञानिक भी हैं।  उन्हें आभास हो  जाता है आने वाले दिनों का ।  वे जानते हैं कि  कब अच्छे दिन आएंगे और कब   बुरे दिन  आएंगे। तदनुसार ही वे अपने रुख तय करते हैं। लोकतंत्र के उत्सव के तीन चरण पूरे हो चुके हैं यानि आधी से ज्यादा लोकसभा सीटों के लिए जनता मतदान कर चुकी है। अब चौथा चरण 13  मई को है। ये ही सबसे कठिन चरण है। इसमें 96  सीटों के लिए चुनाव होना होना है।  इन 96  सीटों में से आधी तो उस तमिलनाडु और तेलंगाना में हैं जहां पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में भाजपा को तिल रखने के लिए भी जगह नहीं मिली थी।</p>
<p>चुनाव के चौथे चरण से पहले देश अक्षय तृतीया का पर्व मना चुकेगा। संयोग से इस वर्ष अक्षय तृतीया पर बहुत ही शुभ और दुर्लभ संयोग बना हुआ है। 100 वर्षो बाद अक्षय तृतीया पर गजकेसरी योग का संयोग है। इसके अलावा अक्षय तृतीया पर धन, शुक्रादित्य, रवि, शश और सुकर्मा योग का निर्माण हुआ है। अक्षय जिसका मतलब होता है कि जिसका कभी क्षय न हो। दुर्भाग्य से हम लोकतंत्र को अक्षय मानने के बजाय सोने-चांदी के आभूषण को अक्षय मानते हैं  और इस  तरह की चीजों की खरीदारी करते  हैं लेकिन लोकतंत्र पर ध्यान नहीं देते । अक्षय तृतीया के दिन मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु की पूजा उपासना करने से जीवन में सुख-समृद्धि और धन-वैभव की प्राप्ति होती है।शायद ऐसा होता भी हो लेकिन ये तभी मुमकिन है जब कि  देश में लोकतांत्र अक्षय हो।   अक्षय तृतीया से ही त्रेता और सतयुग का आरंभ हुआ था।मुझे लगता है कि  इस साल भी देश में अक्षय लोकतंत्र की बहाली  हो सकती है।</p>
<p><br />लोकतंत्र को बचाने के अभी अवसर हाथ से गए नहीं है ।  अभी देश की जनता ने कुल 282 लोकसभा सीटों के लिए मतदान किया है।  अभी 13  मई से 1  जून तक उसे 260  और सीटों के लिए मतदान करना है। जनता के पास अवसर है कि वो अपनी भूल-चूक को सुधार सकती है। देश की जनता को तय करना है कि  वो परिवर्तन चाहती है या भाजपा को 400  पार कराना चाहती है। लोकतंत्र में सही नतीजे हासिल करने कि लिए आवश्यक है कि  मतदाता को न तो भ्रमित किया जाये और न उसे कोई हौआ दिखाकर डराया जाये।<br /> हंसी आती है जब चुनाव कि वक्त सरकार हिन्दू-मुसलमान की आबादी कि आंकड़े जनता कि समक्ष परोसती है। ये एक तरह का अपराध है। इससे लोकतंत्र मजबूत नहीं होता। पता नहीं भाजपा क्या चाहती है ? उसका इरादा हिन्दुओं और मुसलमानों कि बीच प्रजनन दर बढ़ाने की प्रतिस्पर्द्धा करने का तो नहीं है ! मुश्किल ये है कि  इस तरह की मूर्खताओं को लेकर न हमारी अदालतें बोलतीं हैं और न सामाजिक संगठन। आरएसएस  तो इस मुद्दे पर सरकार कि सुर में सुर मिलता दिखाई देता है। जनता ही इन मूर्खताओं कि लिए राजनीतिक दलों को सजा दे सकती है मतदान कि जरिये। हालाँकि मशीनें अभी भी सरकार कि अधीन और स्वामिभक्त बनीं हुईं हैं।</p>
<p><strong>राकेश अचल</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 May 2024 15:50:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Office Desk Lucknow]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>नोटिस का जबाब है अयोध्या का मेगा रोड शो</title>
                                    <description><![CDATA[<p>भारतीय राजनीति  में निस्संदेह प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेंद्र मोदी जी सबसे बड़े शो मैन बन गए है ।  सिनेमा में जैसे किसी जमाने में राजकपूर  की हैसियत थी ठीक वैसी ही हैसियत माननीय मोदी जी ने भी बना ली है ।  उनके भक्त / अंधभक्त बेहतर हो की मोदी जी को भगवान का अवतार कहने के बजाय सियासत का राजकपूर कहें।राजनीति के राजकपूर नरेंद्र मोदी ने केंद्रीय चुनाव आयोग द्वारा दिए गए नोटिस का जबाब अयोध्या में राममंदिर से अपना चुनावी रोड शो कर दे दिया है।अब केंचुआ को समझ  लेना चाहिए की मोदी जी नहीं सुधरने वाले। बेहतर हो</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/140891/ayodhyas-mega-road-show-is-the-answer-to-the-notice"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/sdfsf.jpg" alt=""></a><br /><p>भारतीय राजनीति  में निस्संदेह प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेंद्र मोदी जी सबसे बड़े शो मैन बन गए है ।  सिनेमा में जैसे किसी जमाने में राजकपूर  की हैसियत थी ठीक वैसी ही हैसियत माननीय मोदी जी ने भी बना ली है ।  उनके भक्त / अंधभक्त बेहतर हो की मोदी जी को भगवान का अवतार कहने के बजाय सियासत का राजकपूर कहें।राजनीति के राजकपूर नरेंद्र मोदी ने केंद्रीय चुनाव आयोग द्वारा दिए गए नोटिस का जबाब अयोध्या में राममंदिर से अपना चुनावी रोड शो कर दे दिया है।अब केंचुआ को समझ  लेना चाहिए की मोदी जी नहीं सुधरने वाले। बेहतर हो की केंचुआ ही अपने आपको सुधार ले।  </p>
<p>माननीय मोदी जी के हिन्दू-मुसलमान वाले भाषणों को लेकर केंचुआ ने साहस दिखाते हुए मोदी जी के बजाय उनकी पार्टी को नोटिस जारी किया था ,हालाँकि नोटिस जाना चाहिए था राजनीति के राजकपूर यानि मोदी जी को। ऐसा ही नोटिस राहुल गांधी को भी मिला था। राहुल राजनीति के भारत कुमार यानि मनोज कुमार कहे जा सकते हैं। उनके शो कामयाब हों या न हों लेकिन वे -'भारत का रहने वाला हूँ ,भारत की बात सुनाता हूँ ' की तर्ज पर सियासत कर रहे हैं। दोनों को 29  अप्रेल तकनोटिस का जबाब देना थ।  दोनों दलों ने क्या जबाब दिया या नहीं दिया ये केंचुआ ही जानता है ,लेकिन मोदी जी ने आदर्श आचार संहिता की धज्जियां उड़ाकर अयोध्या में मेगा रोड शो कर केंचुआ को अपना जबाब दे दिया।</p>
<p>जाहिर है कि मोदी जी किसी से नहीं डरते ।  न संविधान से और न संवैधानिक संस्थाओं से।केंचुआ तो है किस खेत की मूली ? केंचुआ को नहीं पता कि  मोदी जी नागपुर के उस खेत की मूली हैं  जो किसी दूसरे खेत में पैदा नहीं होती। मोदी जी पहले नागपुर के संघ परिवार का हिस्सा होते थे,कालांतर में उनका अपना मोदी परिवार है।  यानी अब संघ परिवार मोदी परिवार का हिस्सा है। मोदी परिवार अब संघ परिवार से कहीं ज्यादा बड़ा हो गया है।  राजनीति में दिलचस्पी रखने वाली नई पीढ़ी संघ परिवार का हिस्सा बनने के बजाय अब मोदी परिवार का हिस्सा बनना ज्यादा पसंद कर रही है। क्योंकि मोदी जी हैं तो सब कुछ मुमकिन है।</p>
<p>मोदी जी के बढ़ते   परिवार के सामने जब नागपुर का संघ परिवार नहीं टिका तो नेहरू-गांधी का परिवार क्या ख़ाक टिकेगा ? केंचुआ  परिवार तो और छोटा है। उसे मोदी जी के भाषणों का संज्ञान लेना हीनहीं चाहिए था ।  नोटिस देना ही नहीं चाहिए था। मै तो कहता हूँ कि केंचुआ को अपने नोटिस को वापस लेकर माननीय मोदी जी से क्षमायाचना कर लेना चाहिए ,अन्यथा मोदी जी और उनका परिवार अबकी संविधान के साथ -साथ केंचुआ की शक्ल-सूरत भी बदल देगा। मोदी परिवार में शामिल होने के लिए संघ की किसी शाखा में जाकर संघ-दक्ष करने की जरूरत नहीं है। बस असंवैधानिक इलेक्टोरल बांड की तरह कुछ खरीदो और भाजपा को दे दो ! आपको मोदी परिवार में शामिल कर लिया जाएगा।</p>
<p>बहरहाल मैंने बात शुरू की थी  केंचुए के नोटिस और आदर्श आचार संहिता की। तो आपको जान लेना चाहिए कि केंचुआ केवल विपक्ष के लिए है, भाजपा के लिए नहीं। आदर्श आचार संहिता भी भाजपा के लिए नहीं बनी  है। भाजपा के अपने आदर्श हैं जो आदर्श आचार संहिता के आदर्शों के मुकाबले बहुत बड़े हैं।भाजपा का पहला  और आखरी  आदर्श सत्ता है और कुछ नहीं। इसलिए केंचुआ को मोदी जी से या उनकी भाजपा से पंगा  नहीं लेना चाहिये ।  जो और जैसा चल रहा है ,चलते देना चाहिए। भाजपा और मोदी जी के खिलाफ आने वाली विपक्ष की तमाम शिकायतों के लिए केंचुआ को अपने दफ्तर   की डस्टविन का इस्तेमाल करना चाहिए।</p>
<p>मोदी जी से सब हारे हैं। राम जी भी शायद। अपने मंदिर के बाहर अपने भक्त मोदी जी की आरती उतरते देख उनका मन खुश हुआ या खिन्न ये मुझे नहीं पता ,लेकिन रामराज्य में ये अनूठा प्रयोग है।  राम मंदिर से हो हुए मेगा शो के पहले मंदिर सजाने के लिए भगवा टेंट-ताम्बू और कार्पेट का खर्चा भाजपा के खाते से हुआ या मंदिर ट्रस्ट के खाते से इस पर भूले से भी शोध नहीं होना चाहिए ,क्योंकि  घी खिचड़ी में जाए या खिचड़ी घी में कोई फर्क नहीं पड़ता। राम जी की प्राण-प्रतिष्ठा मोदी जी ने कराई  है ,इसलिए अब राम जी की ड्यूटी है की वे मोदी जी को 400  पर कराएं। नहीं कराएँगे तो जग-हंसाई तो राम जी की होगी ,मोदी जी की नहीं।</p>
<p>राम जी की ताउम्र  सेवा करने वाले हनुमान जी भी 4  मई को मोदी जी का मेगा शो देखकर  दंग थे। उनकी मुख-मुद्रा  से लग  रहा था कि जैसे वे मोदी जी से ईर्ष्या  कर रहे हैं और राम जी से शिकायत ! 7  मई को मतदान का तीसरा चरण यानी लोकतंत्र के साथ सत्ता की तीसरी भांवर पड़ने वाली है। फैसला आपको करना है। आपके  सामने  अनेक  लोगों  की प्रतिष्ठा का सवाल  होगा ।  मोदी परिवार,संघ परिवार, गांधी परिवार ,यादव परिवार ,माया परिवार संविधान  और केंचुआ आदि ।  आपका वोट  तय  करेगा  कि देश  में क्या बचे  और क्या नहीं ?</p>
<p><strong>राकेश अचल </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 06 May 2024 16:12:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
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                <title>भारत को आकार देने में शिक्षा की भूमिका</title>
                                    <description><![CDATA[<div>सामाजिक परिवर्तन और राष्ट्र-निर्माण को बढ़ावा देने में नैतिक शिक्षा और अंतःविषय दृष्टिकोण के महत्व को कम करके आंका नहीं जा सकता है छात्रों का जीवन एक बड़े परिवर्तन के बीच है, जिसका मुख्य कारण दुनिया भर में तेजी से बदलती मूल्य प्रणालियाँ हैं। हालाँकि, केवल अधिग्रहण द्वारा संचालित इस परिवर्तन से सकारात्मक परिणाम मिलने की संभावना नहीं है। इसके बजाय, यह शिक्षा, एक अत्यधिक प्रतिष्ठित संस्थान, को केवल एक व्यावसायिक उद्यम में बदलने का जोखिम उठाता है जहां सफलता केवल भौतिक संपत्ति से मापी जाती है।</div>
<div>  </div>
<div>नैतिक और नैतिक शिक्षा सफलता की कुंजी है, जो नई पीढ़ी को उन</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/140236/role-of-education-in-shaping-india"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-04/education3.jpg" alt=""></a><br /><div>सामाजिक परिवर्तन और राष्ट्र-निर्माण को बढ़ावा देने में नैतिक शिक्षा और अंतःविषय दृष्टिकोण के महत्व को कम करके आंका नहीं जा सकता है छात्रों का जीवन एक बड़े परिवर्तन के बीच है, जिसका मुख्य कारण दुनिया भर में तेजी से बदलती मूल्य प्रणालियाँ हैं। हालाँकि, केवल अधिग्रहण द्वारा संचालित इस परिवर्तन से सकारात्मक परिणाम मिलने की संभावना नहीं है। इसके बजाय, यह शिक्षा, एक अत्यधिक प्रतिष्ठित संस्थान, को केवल एक व्यावसायिक उद्यम में बदलने का जोखिम उठाता है जहां सफलता केवल भौतिक संपत्ति से मापी जाती है।</div>
<div> </div>
<div>नैतिक और नैतिक शिक्षा सफलता की कुंजी है, जो नई पीढ़ी को उन मूल्यों और दृष्टिकोणों को अपनाने में सक्षम बनाती है जो तेजी से बदलाव वाले वातावरण में छात्र समुदाय की रचनात्मक इच्छाओं को पोषित कर सकते हैं। फिर भी, हमें इस संक्रमणकालीन चरण से उत्पन्न चुनौतियों को स्वीकार करना चाहिए। ज्ञान, बुद्धिमत्ता, रचनात्मकता, प्रेरणा और प्रोत्साहन जैसे कीवर्ड एक सफल शिक्षा प्रणाली के लिए आवश्यक शर्तें हैं। एक सक्षम शिक्षा प्रणाली में अप्रत्याशित चुनौतियों से निपटने के लिए असंख्य रणनीतियों को लागू करने में सक्षम आंतरिक शक्ति होनी चाहिए।</div>
<div> </div>
<div>नवीनतम कौशल को बढ़ावा देना और नए नैतिक कोड और संज्ञानात्मक सोच को सूक्ष्मता से प्रसारित करना महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं जो भारत के विकास अभियान के लिए एक मजबूत नींव रख सकते हैं। जबकि हमारी शिक्षा प्रणाली छात्रों और शिक्षाविदों के रचनात्मक आग्रह को आकार देने वाले मूल्यों और दृष्टिकोणों को अपनाने के लिए जानी जाती है, इस संक्रमणकालीन चरण के दौरान इसे बढ़ती चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। अंतःविषय और बहु-विषयक अध्ययन के समकालीन महत्व के संबंध में मौजूदा ज्ञान में अंतर को पाटने के प्रयास किए जाने चाहिए। भारत में उच्च शिक्षा संस्थानों को प्रत्येक अनुशासन को विविध सामग्री और विचारों से समृद्ध करने की आवश्यकता है।</div>
<div> </div>
<div>यहां तक ​​कि विज्ञान के छात्रों को भी एनईपी 2020 द्वारा शुरू की गई बहु-विषयक प्रथाओं के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय, सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों से अवगत कराया जाना चाहिए। ऐसी नीतियां नवाचार के लिए उत्प्रेरक के रूप में काम करती हैं और कई विषयों और उच्च शिक्षा संस्थानों में अकादमिक सहयोग को बढ़ावा देती हैं। हाल के वर्षों में, नई शिक्षा प्रणाली ढांचे में लोकतंत्र, पर्यावरण, वैश्वीकरण और शासन के वास्तविक जीवन के प्रयोगों को एकीकृत करने के लिए एक केंद्रित दृष्टिकोण के साथ, विभिन्न विषयों की सामग्री और प्रकृति में पर्याप्त बदलाव आया है। यह प्रदर्शित करना महत्वपूर्ण है कि उच्च शिक्षा के नए दृष्टिकोण कैसे परिवर्तन ला सकते हैं और जनता के बीच विश्वास पैदा कर सकते हैं।</div>
<div> </div>
<div>अनुसंधान और शिक्षण को तदनुसार उन्नत करने के लिए विश्व स्तर पर शिक्षा में नवीनतम अनुसंधान और विकास का प्रसार किया जाना चाहिए। उच्च शिक्षा प्रणाली की ताकत उसकी आंतरिक गतिशीलता, समावेशी विकास सुनिश्चित करने और विकसित भारत अभियान में महत्वपूर्ण योगदान देने में निहित है। भारत के उद्यमशीलता कौशल ने तृतीयक बाधाओं पर काबू पाकर और नवाचार को बढ़ावा देकर हमें आगे बढ़ाया है। उल्लेखनीय पहलों ने केवल बाजार या कड़ी प्रतिस्पर्धा पर निर्भर रहने के बजाय कनेक्टिविटी और नए कनेक्शन विकसित करने पर ध्यान केंद्रित किया है। जैसा कि लुसी लारकॉम ने एक बार कहा था, "यदि दुनिया आपको ठंडी लगती है, तो इसे गर्म करने के लिए आग जलाएं।"</div>
<div> </div>
<div>यह भावना पारंपरिक मूल्यों और नैतिकता की हमारी भूली हुई सराहना के लिए सच है। छात्रों में रचनात्मकता और जिम्मेदारी को बढ़ावा देकर, उन्हें नैतिक ज्ञान और रोजगार योग्य कौशल से लैस करके भारत के दृष्टिकोण को प्राप्त किया जा सकता है। यह न केवल नैतिक क्षितिज को व्यापक बनाता है और निर्णय लेने की क्षमताओं को बढ़ाता है बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि नैतिक और नैतिक रूप से क्या सही है।व्यावहारिक दृष्टिकोण और कार्यशालाएँ आलोचनात्मक सोच और अभिव्यक्ति के विविध रूपों के माध्यम से कौशल विकसित करने में मदद कर सकती हैं। नैतिकता घिसी-पिटी बातों से परे है, जो जो है उससे जो होना चाहिए, उसमें बदलाव को प्रेरित करती है।</div>
<div> </div>
<div>कलात्मक और शैक्षणिक स्वतंत्रता के साथ-साथ जिम्मेदारी की मजबूत भावना पैदा करना आवश्यक है। प्रमुख खतरों को खत्म करने के वर्षों के प्रयासों के बावजूद, आतंकवाद, जातिगत हिंसा और वर्ग संघर्ष जारी है। इन मुद्दों के लिए दूसरों को दोष देना मूर्खतापूर्ण है; हमें उनमें अपनी भूमिका स्वीकार करनी चाहिए। पहचान का संरक्षण महत्वपूर्ण है, लेकिन सांस्कृतिक, भाषाई, क्षेत्रीय या धार्मिक पहचान को संरक्षित करने के प्रयास कभी-कभी सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था के ताने-बाने को नुकसान पहुंचाते हैं। दुनिया को संकीर्ण विचारधारा वाले विश्वास के प्रसार का भी सामना करना पड़ता है, लेकिन इतिहास बताता है कि ऐसा विश्वास शायद ही कभी टिक पाता है। हमारे देश के विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले युवाओं में जिम्मेदारी पैदा करने के लिए एक मजबूत शिक्षा प्रणाली की आवश्यकता है।</div>
<div> </div>
<div>कम लागत, गहन वेबिनार के माध्यम से छात्रों और समाज को संवेदनशील बनाना इस संबंध में अत्यधिक प्रभावी हो सकता है, खासकर तेजी से वैश्वीकरण के युग में। मास मीडिया राजनीतिक और सामाजिक लामबंदी में भूमिका निभा सकता है, जिसमें छात्रों की भागीदारी से जन जागरूकता को बढ़ावा मिलता है। अकादमिक प्रवचन के माध्यम से पाठ्यक्रम सामग्री में सुधार और सामाजिक विज्ञान में नवीन तंत्र शुरू करने से शिक्षा की प्रासंगिकता बढ़ सकती है। शैक्षणिक कार्यक्रमों और सेवाओं को कक्षा के अंदर और बाहर दोनों जगह सामुदायिक विकास को बढ़ावा देते हुए शिक्षण और सीखने में पूरक सहायता प्रदान करनी चाहिए। सामाजिक विज्ञान में अकादमिक उत्कृष्टता सुनिश्चित करने के लिए अनुसंधान केंद्र स्थापित किए जाने चाहिए।</div>
<div> </div>
<div>बौद्धिक कौशल को छात्रों को वैश्विक स्तर पर सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों से जुड़ने के लिए तैयार करना चाहिए, अन्य संस्थानों के हितधारकों के साथ सहयोग को बढ़ावा देना चाहिए। सामुदायिक शिक्षा कार्यक्रमों को आजीवन सीखने को प्रोत्साहित करना चाहिए। छात्र मानकों को बढ़ाने के लिए, सहयोगात्मक वातावरण में समस्या-समाधान और पूछताछ-आधारित शिक्षण गतिविधियों को शामिल करते हुए, स्व-शैक्षणिक अभिविन्यास और उत्कृष्टता विकसित की जानी चाहिए। एक नए पाठ्यक्रम को आतंकवाद की समस्या और उसके कारणों के बारे में जानकारी प्रदान करनी चाहिए, जिससे इससे निपटने के लिए एक व्यापक रणनीति का मार्ग प्रशस्त हो सके। संगठित अपराध और आतंकवाद के बीच संबंध को समझना महत्वपूर्ण है।</div>
<div> </div>
<div>छात्रों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान सामाजिक विभाजनों से ऊपर उठकर सद्भाव और रचनात्मकता को बढ़ावा दे सकता है। सामाजिक चिंताओं को प्रभावी ढंग से संबोधित करने के लिए अनुभवजन्य और मानक समझ पर ध्यान केंद्रित करना अनिवार्य है। भविष्य के लिए सरकार की प्रेरक दृष्टि आशाजनक है, जो भारत को विश्व स्तर पर सबसे आगे रखती है। निष्कर्षतः, विकसित भारत@2047 की दिशा में शिक्षा की परिवर्तनकारी यात्रा के लिए एक समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें अकादमिक उत्कृष्टता के साथ-साथ नैतिक और नैतिक शिक्षा पर जोर दिया जाए। तीव्र वैश्विक परिवर्तनों से उत्पन्न चुनौतियों के लिए ज्ञान अंतराल को पाटने और अंतःविषय सहयोग को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय उपायों की आवश्यकता है। समसामयिक मुद्दों को प्रभावी ढंग से संबोधित करने के लिए छात्रों में जिम्मेदारी की भावना पैदा करना और रचनात्मकता पैदा करना जरूरी है।</div>
<div> </div>
<div>प्रयासों को शिक्षा प्रणाली में वास्तविक जीवन के अनुभवों को एकीकृत करने और महत्वपूर्ण सोच और समस्या-समाधान कौशल को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। शिक्षा में विविधता और समावेशिता को अपनाने से समाज का ताना-बाना मजबूत होगा और राष्ट्रीय विकास लक्ष्यों में योगदान मिलेगा। इसके अलावा, कम लागत वाले वेबिनार और मास मीडिया जुड़ाव जैसी पहल शिक्षा के प्रभाव को बढ़ा सकती हैं, युवाओं के बीच सामाजिक जागरूकता और नागरिक जुड़ाव को बढ़ावा दे सकती हैं। जैसा कि डब्ल्यूजटिल सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्यों से गुजरते हुए, नवाचार और प्रगति को अपनाते हुए पारंपरिक मूल्यों को बनाए रखना महत्वपूर्ण है।</div>
<div> </div>
<div>नैतिक स्पष्टता और व्यावहारिक कौशल से सुसज्जित पीढ़ी का पोषण करके, हम भारत और दुनिया के लिए एक उज्जवल भविष्य का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। संक्षेप में, शिक्षकों, नीति निर्माताओं और बड़े पैमाने पर समाज की ओर यात्रा। नैतिक शिक्षा को प्राथमिकता देकर, अंतःविषय शिक्षा को बढ़ावा देकर और विविधता को अपनाकर, हम एक समृद्ध और समावेशी भविष्य के लिए एक मजबूत नींव बना सकते हैं। आइए, हम सब मिलकर सत्यनिष्ठा, सहानुभूति और लचीलेपन के सिद्धांतों द्वारा निर्देशित होकर उत्कृष्टता की ओर इस यात्रा पर आगे बढ़ें। </div>
<div> </div>
<div><strong>विजय गर्ग</strong></div>
<div><strong>सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य शैक्षिक स्तंभकार</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 Apr 2024 16:43:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Office Desk Lucknow]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>चुनावी चन्दा बांड की वकालत का मतलब</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>स्वतंत्र प्रभात </strong><br /><br />आप भी परेशान हैं और एक लेखक के नाते मै भी परेशान हूँ ,क्योंकि हर बात अब राजनीति से शुरू होकर राजनीति पर ही समाप्त हो रही है।  ,जबकि माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी कहते हैं कि- हर बात में राजनीति नहीं देखना चाहिए। मै चाहता हूँ कि मुझे हर दिन मोदी जी का नाम न सुमरना पड़े,लेकिन दुर्भाग्य कि मोदी जी का नाम लिए बिना कोई बात न बनती है और न बिगड़ती है। मोदी यानि ' 56  इंच का सीना ',मोदी जी यानि ' उलटा चोर कोतवाल को डाटे'।</p>
<p>पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट द्वारा असंवैधानिक</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/140030/meaning-of-advocacy-of-electoral-donation-bonds"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-04/jvs4urnk_pm-modi-ani_625x300_01_april_24.webp" alt=""></a><br /><p><strong>स्वतंत्र प्रभात </strong><br /><br />आप भी परेशान हैं और एक लेखक के नाते मै भी परेशान हूँ ,क्योंकि हर बात अब राजनीति से शुरू होकर राजनीति पर ही समाप्त हो रही है।  ,जबकि माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी कहते हैं कि- हर बात में राजनीति नहीं देखना चाहिए। मै चाहता हूँ कि मुझे हर दिन मोदी जी का नाम न सुमरना पड़े,लेकिन दुर्भाग्य कि मोदी जी का नाम लिए बिना कोई बात न बनती है और न बिगड़ती है। मोदी यानि ' 56  इंच का सीना ',मोदी जी यानि ' उलटा चोर कोतवाल को डाटे'।</p>
<p>पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट द्वारा असंवैधानिक घोषित किये जा चुके चुनावी चन्दा बांड्स को लेकर प्रधानमंत्री मोदी जी गर्व के साथ ही नहीं बल्कि सीना ठोंक कर कह रहे हैं कि जो लोग आज इलेक्टोरल बांड्स को लेकर नाच रहे हैं ,वे कल पछतायेंगे। 'मोदी जी ने बात जिस दमखम से कही है उससे लगता है कि वे सुप्रीम कोर्ट के फैसले को नहीं मानते । उनकी नजर  में इलेक्टोरल बांड्स आज भी गंगाजल की तरह पावन हैं। एक टीवी इंटरव्‍यू के दौरान जब उनसे यह पूछा गया कि- क्या चुनावी बॉण्ड डेटा से सत्तारूढ़ भाजपा को झटका लगा है ? तो माननीय  मोदी ने  कहा, "मुझे बताइए कि हमने ऐसा क्या कर दिया कि मैं इसे एक झटके के तौर पर देखूं !  मेरा दृढ़ विश्वास है कि जो इसे (बॉन्‍ड के विवरण) को लेकर हंगामा कर रहे हैं और इसपर गर्व कर रहे हैं उन्हें पछतावा होगा। "</p>
<p>देश कि सबसे बड़ी अदालत के फैसले को देश का सबसे बड़ा और जिम्मेदार आदमी ही यदि खारिज करता दिखाई दे तो किसी दूसरे  से कोई क्या उम्मीद कर सकता है ? उन्होंने जोर देकर कहा कि -'कहा कि कोई भी प्रणाली पूरी तरह से सही नहीं है और खामियों को दूर किया जा सकता है।  उन्होंने यह भी कहा कि इस विषय पर हंगामा करने वाले लोग पछताएंगे। ' जाहिर है कि मोदी जी हैं तो ,न संविधान  बड़ा है और न कोई अदालत।  वे सबसे ऊपर थे,हैं और रहेंगे।और ये स्वाभाविक है। यदि उनकी सरकार तीसरी बार बनी तो तय मानिये कि मोदी जी इस असंवैधानिक घोषित किये जा चुके ' इलेक्टोरल बांड ' को ससम्मान संवैधानिक बना देंगे ,क्योंकि ये बांड उनकी पार्टी के लिए ' कामधेनु' साबित हुए हैं।</p>
<p>दरअसल मै मोदी जी का जितना बड़ा और मुखर आलोचक हूँ उतना ही प्रशंसक भी। वे जिस हिकमत अमली  से गलत को सही और सही को गलत साबित करने में माहिर हैं ,वैसा देश में आज कोई दूसरा नेता नहीं है। मोदी जी जैसा दमखम पूर्व के किसी प्रधानमंत्री में था ही नहीं। इंदिरा गाँधी में भी नहीं ,जबकि वे तो तबकी भाजपा [जनसंघ ]के लिए दुर्गा थीं। इंदिरा जी को भाजपा [ जनसंघ ]ने उदारतापूर्वक 1971  के भारत-पाक संग्राम के बाद बांग्लादेश बनवाने के लिए दुर्गा कहा गया था ,कांग्रेससियों को चाहिए कि वो मोदी जी को देश को जबरन विश्वगुरु बनाने के लिए तांडव करने वाला ' शिव ' कहकर उऋण हो जाये। मोदी जी ने कांग्रेस द्वारा पिछले साढ़े छह दशक में जितना कुछ किया था ,उसे एक दशक में ध्वस्त कर दिया।  </p>
<p>निर्माण और ध्वंश दो समानांतर क्रियाएं हैं ,कोई देश बनाता है तो कोई देश बिगाड़ता है। मोदी जी दोनों काम एक साथ कर रहे हैं। वे अपने सपनों का देश बना रहे हैं ,जिसमें उनके अलावा कोई दूसरा सुप्रीम नहीं है। फिल्म निर्माता मनोज कुमार यदि आज अपनी कोई नई फिल्म  बनाते तो उसमें गीत के बोल होते -' मै उस देश का वासी हूँ ,जिस देश में मोदी होते हैं " इस देश को एक मोदी बना रहा है तो दस मोदी बिगाड़ रहे हैं। आज किसी भी राजनीतिक दल में ,किसी सामाजिक कार्यकर्ता में इतनी क्षमता नहीं है कि वो इलेक्टोरल बांड के मामले में मोदी जी पैरवी को सुप्रीम कोर्ट कि  अवमानना बताने का दुस्साहस कर सके। खुद सुप्रीम कोर्ट भी शायद मोदी जी के वक्तव्य को चुपचाप सुनकर अपमान का घूँट पीकर रह जाएगा।</p>
<p><br />इलेक्टोरल बांड के समर्थन में सीना ठोंककर खड़े होना कोई आसान बात नहीं है। ये वो शौर्य है जिसके लिए मोदी जी को परमवीर चक्र दिया जा सकता है। प्रधानमंत्री श्री मोदी जी ने ने कहा कि उनकी सरकार की चुनावी बॉण्ड योजना के कारण ही चंदे के स्रोतों और इसके लाभार्थियों का पता लगाया जा सका।  उन्होंने कहा कि अगर आज जानकारी उपलब्ध हुई है तो उसकी वजह बॉन्‍ड हैं।  मोदी ने सवाल किया कि क्या कोई एजेंसी 2014 में उनके केंद्र की सत्ता में आने से पहले के चुनावों के लिए धन के स्रोत और उनके लाभार्थियों के बारे में बता सकती है ?  उन्होंने कहा, "कोई भी प्रणाली बिल्कुल सही नहीं होती। कुछ खामियां हो सकती हैं, जिन्हें दूर किया जा सकता है। "</p>
<p><br />कोई मोदी जी से सवाल नहीं कर सकता,क्योंकि इस देश में सवाल करना यानि देशद्रोह करना है । अन्यथा उनसे पूछा जा सकता था कि जिस तरह से इलेक्टोरल बांड खरीदने और दान करने के लिए गोपनीयता बरतने की व्यवस्था कि गयी उससे पहले किसी और बांड्स  के लिए की गयी थी क्या ? इलेक्टोरल बांड के जरिये जो खुलासा हुआ है वो क्या सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप न करता तो क्या सम्भव था ? शायद नहीं था। लेकिन हमारा असमंजस ये है कि हम सुप्रीम कोर्ट कि जय बोलें या मोदी जी की जय बोलें। सुप्रीम कोर्ट से ज्यादा डर नहीं लगता लेकिन मोदी जी से लगता है ,क्योंकि वे अदावत करने  में माहिर है।  वे ख़ास आदमी से ही नहीं आम आदमी से भी अपना हिसाब बराबर कार सकते हैं।</p>
<p><br />आपको  याद  दिला  दूँ  कि विपक्षी दलों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हुए खुलासे का हवाला देते हुए सरकार के प्रति हमलवार रुख अपना रखा है।  न्यायालय ने गुमनाम तरीके से चंदा देने को असंवैधानिक घोषित करते हुए चुनावी बॉण्ड से संबंधित सभी जानकारी सार्वजनिक करने का निर्देश दिया था।  आपराधिक जांच का सामना कर रहीं कई कंपनियों ने बड़ी मात्रा में बॉन्‍ड खरीदे थे।  मोदी जी अब इसी मुद्दे को लेकर जनता की अदालत में खड़े हैं। सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला सुना चुका है ।  बारी जनता की है। देखना है कि जनता की अदालत में ' इलेक्टोरल बांड्स का मामला और खुद मोदी जी हारते हैं या जीतते हैं ?<br />@ राकेश अचल</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 02 Apr 2024 17:00:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Office Desk Lucknow]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मुख्तार की मौत: राजनीतिक संरक्षणदाताओं का विधवा विलाप ! </title>
                                    <description><![CDATA[मनोज कुमार अग्रवाल ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/139933/mukhtars-death-widow-laments-political-patrons"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-03/dasff.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>स्वतंत्र प्रभात </strong></div>
<div>यूपी के बांदा जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे माफिया मुख्तार अंसारी की ह्रदयाघात से मौत पर काफी सवाल उठाए जा रहे हैं । कभी दहशत और आतंक का पर्याय बना अपराध की दुनिया के बेताज बादशाह मुख्तार को पिछले तीन साल से मौत का भय सता रहा था जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही संगीन हत्या को अंजाम देकर जरायम की दुनिया में कदम रखने वाले मुख्तार को लगातार इस बात का अहसास हो रहा था कि मौत दबे पांव उसकी ओर बढ़ी आ रही है पंजाब की जेल से बांदा यूपी की जेल में सख्त निगरानी में आते ही मुख्तार का सुख और मनमानी का समय हवा हो गया जिस पैसे ताकत और राजनीतिक संरक्षण के बूते पर उसने अपना आतंक का साम्राज्य स्थापित किया था वो अब उसके पहुंच से दूर जा रहे थे। </div>
<div> </div>
<div>गाजीपुर में मुख्तार अंसारी के परिवार की पहचान एक प्रतिष्ठित राजनीतिक खानदान की है. पहली बार मुख्‍तार ने अपराध की दुनिया में साल 1988 में कदम रखा था. 25 अक्टूबर 1988 को आजमगढ़ के ढकवा के संजय प्रकाश सिंह उर्फ मुन्ना सिंह ने मुख्तार अंसारी के खिलाफ हत्या की कोशिश का मुकदमा दर्ज कराया था. हालांकि, अगस्‍त 2007 में इस मामले में मुख्तार दोषमुक्त हो गया थामुख्तार अंसारी की अपराध की कुंडली ऐसी थी कि जानकर रोंगटे खड़े हो जाएं, और इस अपराध की आड़ में उसने अकूत दौलत बनाई. उनके खिलाफ कुल 155 एफआईआर दर्ज की गईं। </div>
<div> </div>
<div>देशभर के आठ राज्यों दिल्ली, पंजाब और उत्तर प्रदेश में मुख्तार अंसारी पर कुल 65 मामले दर्ज हैं. मुख्तार अंसारी पर हत्या, लूट, डकैती, अपहरण, रंगदारी, गैंगस्टर, रासुका जैसी विभिन्न जघन्य प्रकृति के अपराधों के ये मुकदमे हैं. इनमें पंजाब में एक और दिल्ली में तीन मुकदमे दर्ज हैं. बाकी मुकदमे उत्तर प्रदेश के गाजीपुर, वाराणसी, आजमगढ़ और मऊ सहित अन्य जिलों में दर्ज हैं. 19 साल से जेल में बंद मुख्तार अंसारी को पिछले डेढ़ सालों में आठ मामलों में सजा हो चुकी थी।</div>
<div> </div>
<div>मुख्तार के सबसे ज्यादा चर्चित मामलों में गाजीपुर में भाजपा विधायक कृष्णानंद राय की हत्या.मन्ना हत्याकांड के गवाह रामचंद्र मौर्य की हत्या.फर्जी तरीके से शस्त्र लाइसेंस लेने का केस.कांग्रेस के नेता अजय राय के भाई अवधेश राय की हत्या.मऊ में ए श्रेणी ठेकेदार मन्ना सिंह हत्याकांड.रामचंद्र मौर्य के बॉडी गार्ड सिपाही सतीष का मर्डर.26 फरवरी 1996 को गाजीपुर में ASP शंकर जायसवाल पर जानलेवा हमला.1997 में पूर्वांचल के सबसे बड़े कोयला कारोबारी रूंगटा को अगवा करने का आरोप। </div>
<div> </div>
<div>रिपोर्ट्स के मुताबिक यूपी पुलिस के रिकार्ड में , 1988 में मुख्तार अंसारी का नाम क्राइम की दुनिया में पहली बार आया. मंडी परिषद की ठेकेदारी को लेकर स्थानीय ठेकेदार सच्चिदानंद राय की हत्या के मामले में मुख्तार का नाम सामने आया. इसके बाद मुख्तार ने कभी जरायम की दुनिया पीछे मुड़कर नहीं देखा. 90 के दशक से लेकर अब तक मुख्तार पर 65 मुकदमे दर्ज हुए. यूपी के गाजीपुर, वाराणसी, चंदौली, आजमगढ़, मऊ, सोनभद, लखनऊ, बाराबंकी और आगरा में लूट, डकैती, अपहरण, रंगदारी और हत्या से संबंधित धाराओं में मामले दर्ज हुए. इनमें सबसे ज्यादा मामले उसके गृह जिले गाजीपुर में दर्ज हैं. आठ मुकदमे ऐसे हैं, जो मुख्तार अंसारी के जेल रहने के दौरान दर्ज किए गए थे। </div>
<div> </div>
<div>कांग्रेस नेता अवधेश राय देश की 3 अगस्त 1991 को बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। 33 साल पहले हुए हत्याकांड ने यूपी में दहशत पैदा कर दी थी और मुख्य आरोपी के रूप में पहचान मुख्तार अंसारी की हुई। ये घटना वाराणसी के चेतगंज थाना क्षेत्र के लहुरा पीर इलाके में हुई थी।दूसरी सबसे चर्चित व दहलाने वाला मामला कृष्णानंद राय हत्याकांड  है।</div>
<div> </div>
<div>एक पदस्थ विधायक की अंसारी ने अपने शूटरों से हत्या करवा दी थी, 400 से ज्यादा गोलियां चली थीं,एके-47 का इस्तेमाल किया गया था इस को बाद में बरामद किया गया। उस हत्याकांड में कुल 6 लोगों को मुख्तार अंसारी के आदमियों ने मौत के घाट उतार दिया था। इस रंजिश की कहानी साल 2002 में शुरू हुई थी। तब गाजीपुर जिले की मोहम्मदाबाद सीट पर सबसे बड़ा सियासी खेल हुआ था। जिस सीट को मुख्तार अंसारी का गढ़ माना जाता था, वहां से बीजेपी के कृष्णानंद राय ने बड़ी जीत हासिल की थी। </div>
<div> </div>
<div>आपको बता दें कि 1990 के दशक में मुख्तार अंसारी ने अपना गैंग बना लिया. उसने कोयला खनन, रेलवे जैसे कामों में 100 करोड़ का काला कारोबार खड़ा कर लिया. फिर वो गुंडा टैक्स, जबरन वसूली और अपहरण के धंधे में आ गया था। उसका सिंडिकेट मऊ, गाजीपुर, बनारस और जौनपुर में एक्टिव था. पूर्वांचल में उस वक्त दो बड़े गैंग थे- ब्रजेश सिंह और मुख्तार अंसारी गैंग।दोनों में वर्चस्व की जंग थी मुख्तार अंसारी पर हत्या, हत्या के प्रयास, धमकी, धोखाधड़ी और कई अन्य आपराधिक कृत्यों में कुल 65 मामले दर्ज थे. इनमें से 18 मामले हत्या के थे.</div>
<div> </div>
<div>लेकिन इसके अलावा मन्ना हत्याकांड के गवाह रामचंद्र मौर्य की हत्या, मऊ में ए श्रेणी ठेकेदार मन्ना सिंह हत्याकांड, 1996 में गाजीपुर के एसपी शंकर जायसवाल पर जानलेवा हमला करना, 1997 में पूर्वांचल के सबसे बड़े कोयला कारोबारी रुंगटा का अपहरण, ये कुछ ऐसे जुर्म थे जिन्होंने प्रदेश को मुख्तार के आतंक से दहला दिया था। उसके खिलाफ लखनऊ, गाजीपुर, चंदौली, वाराणसी, सोनभद्र, मऊ, आगरा, बाराबंकी, आजमगढ़ के अलावा नई दिल्ली और पंजाब में भी मुकदमे दर्ज थे. अंसारी के खिलाफ 2010 में कपिल देव सिंह की हत्या और 2009 में उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में मीर हसन नामक व्यक्ति की हत्या के प्रयास मामले में आरोप साबित हो चुके थे। अक्टूबर 2005 में मुख्तार अंसारी पर मऊ जिले में हिंसा भड़काने का आरोप लगा. इसी दौरान मुख्तार अंसारी ने गाजीपुर पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया था।</div>
<div> </div>
<div>2017 में योगी आदित्यनाथ की सरकार बनने के बाद ऐसे अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई शुरू हुई तो पुलिस और कानून का इकबाल बुलंद हुआ और अदालत ने अपना काम शुरू किया नतीजतन उसे की मामलों में सजा सुनाई गई।पंजाब की रोपड़ जेल से अपने गैंग को संचालित कर शान शौकत से जेल को आरामगाह बना चुके मुख्तार को वहां से बांदा जेल लाया गया और कड़ी निगरानी में रखा गया। योगी सरकार के शासन में उसकी करीब छह सौ करोड़ की सम्पत्ति भी जब्त की जा चुकी है। </div>
<div> </div>
<div>आपको बता दें कि मुख्तार की मौत पर परिवार से लेकर तमाम विपक्षी दल भी सवाल उठा रहे हैं, जिसके बाद इस मामले की न्यायिक जांच के आदेश दे दिए गए हैं. इस मामले में एक महीने के अंदर रिपोर्ट जमा करानी होगी। बांदा कोर्ट के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट भगवान दास गुप्ता ने मुख्तार अंसारी की मौत की न्यायिक जांच के आदेश दिए है. इस मामले की जांच के लिए अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट गरिमा सिंह को जिम्मेदारी दी गई है. प्रशासन को मुख्तार अंसारी के इलाज से लेकर तमाम जानकारियां तीन दिन में उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं. एक महीने के अंदर जांच रिपोर्ट देनी होगी। </div>
<div> </div>
<div>मुख्तार अंसारी के परिवार की ओर से इस मौत को लेकर कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं. परिजनों ने जेल प्रशासन पर उन्हें धीमा जहर दिए जाने का आरोप लगाया है. इससे पहले कोर्ट में पेशी के दौरान मुख्तार अंसारी ने भी ऐसे ही आरोप लगाए थे. जिसके बाद से इस मामले पर कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं।दूसरी तरफ कई विपक्षी दल भी इसे लेकर प्रदेश सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं. समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव  बसपा सुप्रीमो मायावती  एआइएमआइएम के प्रमुख असदुददीन औवेसी आदि ने मुख्तार की मौत को संदिग्ध बताते हुए कानून के शासन पर अंगुली उठाई है। हालांकि तमाम रिकार्डिग और पोस्टमार्टम रिपोर्ट हार्टअटैक से मौत की पुष्टि कर रहे हैं। </div>
<div> </div>
<div> दहशत और आतंक के एक पहरूए का अंत हो गया है इस मौत को कुछ राजनीतिक रोटियां सेकने के ईच्छुक राजनीतिक दलों के नेता मुख्तार को धीमा जहर देने और उसकी मौत के पीछे साजिश की आशंका व्यक्त कर प्रदेश की योगी सरकार के खिलाफ बयान बाजी कर रहे हैं लेकिन इनमें ज्यादातर वहीं लोग हैं जिनका इस तरह के बड़े अपराधी माफियाओं पर हाथ रहा जिनके संरक्षण में अतीक मुख्तार मुन्ना बजरंगी जैसे दुर्दांत अपराधी माफिया पनपते रहे और प्रदेश में दहशत और अपराध का बोलबाला कायम हुआ था ।</div>
<div> </div>
<div><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div><strong>(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विचारधारा</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 30 Mar 2024 17:28:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Office Desk Lucknow]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title> कब तक चलेगी जेल से दिल्ली सरकार?</title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>स्वतंत्र प्रभात </strong></div>
<div>पिछले हफ्ते प्रवर्तन निदेशालय पीएमएलए कानून के तहत अरविंद केजरीवाल को गिरफ्तार कर लिया। इस कानून के तहत गिरफ्तार हुए लोगों के केस उदाहरण के तौर पर देखें तो पता चलता है कि पीएमएलए में जमानत मिलना आसान नहीं है या यूं कहें की आमतौर पे इसमें जमानत हो नही पाती। इसका सबसे बड़ा उदाहरण दिल्ली के पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया हैं। जो पिछले साल से ही जेल में हैं। इसके अलावा संजय सिंह भी कई महीनों से जेल में है।</div>
<div>  </div>
<div>हेमंत सोरेन को भी जमानत नही मिल पा रही है। अरविंद केजरीवाल के केस में फिल्हाल</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/139874/how-long-will-delhi-government-last-from-jail"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-03/asfsdf.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>स्वतंत्र प्रभात </strong></div>
<div>पिछले हफ्ते प्रवर्तन निदेशालय पीएमएलए कानून के तहत अरविंद केजरीवाल को गिरफ्तार कर लिया। इस कानून के तहत गिरफ्तार हुए लोगों के केस उदाहरण के तौर पर देखें तो पता चलता है कि पीएमएलए में जमानत मिलना आसान नहीं है या यूं कहें की आमतौर पे इसमें जमानत हो नही पाती। इसका सबसे बड़ा उदाहरण दिल्ली के पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया हैं। जो पिछले साल से ही जेल में हैं। इसके अलावा संजय सिंह भी कई महीनों से जेल में है।</div>
<div> </div>
<div>हेमंत सोरेन को भी जमानत नही मिल पा रही है। अरविंद केजरीवाल के केस में फिल्हाल उन्हें 6 दिन के रिमांड पर ईडी को सौंप दिया गया है। दिल्ली का नया सी.एम कौन होगा के जबाब में आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं द्वारा तय किया गया है कि अरविंद केजरीवाल ही मुख्यमंत्री हैं और वो ही मुख्यमंत्री रहेंगे। दिल्ली विधानसभा स्पीकर ने कहा कि हमें भी चाहें तो गिरफ्तार कर लें, लेकिन केजरीवाल सरकार चलती रहेगी। कोर्ट से जाते हुए अरविंद केजरीवाल ने भी जेल से सरकार चलाने की बात कही। वैसे विधि विशेषज्ञों की मानें तो इस बात में कोई संवैधानिक अड़चन नहीं आएगी। </div>
<div> </div>
<div>कानून के विशेषज्ञों का मानना है कि आबकारी नीति से जुड़े धनशोधन मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बावजूद अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री पद पर बने रह सकते हैं क्यों कि कानून के तहत ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो जनता के चुने हुए नुमाइंदे की गिरफ्तारी के बाद उस व्यक्ति को पद पर बने रहने से प्रतिबंधित करता हो। एक बार गिरफ्तार होने के बाद किसी व्यक्ति के मुख्यमंत्री बने रहने पर कानून में कोई रोक नहीं है।</div>
<div> </div>
<div>विधी विशेषज्ञों के अनुसार जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत दोषसिद्धि के बाद ही किसी विधायक या जनप्रतिनिधि को अयोग्य माना जा सकता है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा-8, उपबंध-3 एक विधायक की अयोग्यता से संबंधित है, जिसमें प्रावधान है कि यदि किसी जनप्रतिनिधि को किसी अपराध के लिए दोषी ठहराया जाता है और 2 साल या उससे अधिक की सजा दी जाती है तो वह सजा की तारीख से ही अयोग्य हो जाएगा। इसमें कहा गया है कि ऐसे जनप्रतिनिधि अपनी रिहाई के बाद 6 साल की अवधि के लिए अयोग्य करार दिये जाएंगे।</div>
<div> </div>
<div>संविधान के अनुच्छेद 361 के तहत केवल राष्ट्रपति और राज्यपाल को गिरफ्तारी और अदालत के समक्ष कार्यवाही से छूट दी गई है। प्रधानमंत्री और किसी राज्य के मुख्यमंत्री को ऐसी कोई छूट नहीं दी जाती है परन्तु जब तक दोष सिद्ध नही होता या केस का फैंसला ना आने तक जेल से काम करना तकनीकी रूप से संभव है। बेशक कानूनी तौर पर जेल के अंदर से सरकार चलाने में कोई रोक नहीं है परन्तु प्रशासनिक तौर पर यह लगभग असंभव लगता है।</div>
<div> </div>
<div>मुख्यमंत्री के कंधों पर पूरे प्रदेश की जिम्मेदारी होती है। उसके कार्यों में कैबिनेट की बैठक से लेकर अलग-अलग विभागों के काम काज को देखने के साथ सरकार फाइलें मंगवाने या आदेश देने का काम भी होता है। मुख्यमंत्री के तौर पर मंत्रियों और अधिकारियों के साथ दिन में कई-कई बैठकें भी करनी होती है। नए प्रोजेक्ट्स पर विचार-विमर्श, नई नीतीयों पर चर्चा, लोक कल्याण कार्यों की देख रेख जैसे अनगिनत अहम कार्य मुख्यमंत्री की दिनचर्या में शामिल रहते है। उन्हें जेल में ही कैबिनेट की बैठकें करनी होंगी, फाइलें साइन करनी होंगी, चेक साइन करने होंगे, अधिकारियों को ऑर्डर पास करने होंगे, शासन और प्रशासन के रोज दर्जनों लोगों को केजरीवाल से मिलना होगा। </div>
<div> </div>
<div>यह सारी गतिविधिया जेल मे रह कर पूर्ण करनी संभव नहीं है। जेल नियमावली में जेल से सरकार चलाने का कोई प्रावधान नहीं है। इस लिए मुख्यमंत्री को भी जेल मैनुअल के मुताबिक ही कार्यों की इजाजत मिलेगी। अरविंद केजरीवाल जेल में रहते हुए केवल पत्र लिख सकते हैं, वह भी नियमित नहीं बल्कि समय समय पर। केजरीवाल को जेल में सरकारी फाइलें मंगवाने या कोई आदेश जारी करने की छूट कैसे मिलेगी अभी इस पर भी फैसला बाकि है।</div>
<div> </div>
<div>इसके अलावा जेल में कैबिनेट बैठक करना आसान नहीं होगा। जेल में रहते हुए केजरीवाल को किसी भी व्यक्ति को किसी से मिलने की अनुमति भी जेल नियमावली के अनुरूप ही होगी। ऐसे में सीधे तौर पर अदालत पर निर्भर होगा कि वह उन्हें मुख्यमंत्री पद के दायित्व का निर्वहन करने देती है या नहीं। इसे लेकर संवैधानिक नियम-कायदे जैसी कोई बात नहीं है।</div>
<div> </div>
<div>ऐसे में यदि अरविंद केजरीवाल जेल से सरकार चलाते हैं तो सीएम ऑफिस से जुड़े ऐसे दर्जनों कामों के लिए एक दिन में उन्हें अदालत से दर्जनों परमिशन लेनी होंगी, जो कि स्वभाविक तौर पर असंभव ही है। केजरीवाल 28 मार्च तक ईडी की रिमांड कस्टडी में है। अगली कोर्ट पेशी में उन्हें जमानत मिल जाए ऐसे कानूनी तौर पर आसार कम ही दिखाई देते है। वैसे व्यवाहारिक तौर पर यह संभव नही लगता कि जेल से सरकार चल पाए। ऐसे में आम आदमी पार्टी को आज नही तो कल राज्य के कार्यों को सुचारू रूप से चलाते रहने के लिए अरविंद केजरीवाल के स्थान पर नया मुख्यमंत्री बिठाना ही पड़ेगा।</div>
<div class="yj6qo"> </div>
<div class="adL">(नीरज शर्मा'भरथल') </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विचारधारा</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 28 Mar 2024 16:05:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Office Desk Lucknow]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>तर्कसंगत नही है एक देश एक चुनाव </title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>स्वतंत्र प्रभात </strong></div>
<div><strong>(नीरज शर्मा'भरथल') </strong></div>
<div>पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद  की अध्यक्षता वाली समिति ने अपनी 'एक देश, एक चुनाव ' संबंधित 18,626 पन्नो की रिपोर्ट 14 मार्च को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंप दी है। इस उच्च स्तरीय समिति के अनुसार विशेषज्ञों के साथ व्यापक विचार-विमर्श कर यह रिपोर्ट तैयार की गई है। यदि कोविंद समिति की सिफारिशे राष्ट्रपति द्वारा मान ली जाती हैं तो 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद जितने भी विधानसभा चुनाव होंगे उनकी अवधि 2029 के लोकसभा चुनाव के साथ खत्म हो जाएगी। जैसे 2026 में केरल में चुनाव होने हैं अगर सिफारिश मान ली जाती है</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/139584/one-country-one-election-is-not-logical"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-03/avcv.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>स्वतंत्र प्रभात </strong></div>
<div><strong>(नीरज शर्मा'भरथल') </strong></div>
<div>पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद  की अध्यक्षता वाली समिति ने अपनी 'एक देश, एक चुनाव ' संबंधित 18,626 पन्नो की रिपोर्ट 14 मार्च को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंप दी है। इस उच्च स्तरीय समिति के अनुसार विशेषज्ञों के साथ व्यापक विचार-विमर्श कर यह रिपोर्ट तैयार की गई है। यदि कोविंद समिति की सिफारिशे राष्ट्रपति द्वारा मान ली जाती हैं तो 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद जितने भी विधानसभा चुनाव होंगे उनकी अवधि 2029 के लोकसभा चुनाव के साथ खत्म हो जाएगी। जैसे 2026 में केरल में चुनाव होने हैं अगर सिफारिश मान ली जाती है तो उस समय की केरल विधानसभा का कार्यकाल 2029 में ही खत्म हो जाएगा जिससे 2029 में पूरे देश में एक साथ चुनाव हो सकें।</div>
<div> </div>
<div>कोविंद समिति ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल, डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव आज़ाद पार्टी (डीपीएपी) के प्रमुख गुलाम नबी आज़ाद और अन्य सहित समिति के सभी सदस्यों की उपस्थिति में रिपोर्ट सौंपी। हाल ही में उच्च स्तरीय समिति ने भाजपा, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, सीपीआई, सीपीआई (एम), एआईएमआईएम, आरपीआई, अपना दल आदि सहित कई राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से भी मुलाकात की और बातचीत की। इन दलों के प्रतिनिधियों ने समिति को लिखित रूप में अपने सुझाव भी सौंपे। इस रिपोर्ट में आने वाले वक्त में लोकसभा और विधानसभा चुनावों के साथ-साथ नगरपालिकाओं और पंचायत चुनाव करवाने के मुद्दे से जुड़ी सिफारिशें दी गई हैं।</div>
<div> </div>
<div>191 दिनों में तैयार इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 47 राजनीतिक दलों ने अपने विचार समिति के साथ साझा किए थे जिनमें से 32 राजनीतिक दल 'वन नेशन वन इलेक्शन' के समर्थन में थे। रिपोर्ट में कहा गया है केवल 15 राजनीतिक दलों को छोड़कर शेष 32 दलों ने न केवल साथ-साथ चुनाव प्रणाली का समर्थन किया बल्कि सीमित संसाधनों की बचत, सामाजिक तालमेल बनाए रखने और आर्थिक विकास को गति देने के लिए ये विकल्प अपनाने की ज़ोरदार वकालत की है।</div>
<div> </div>
<div>लोकसभा और राज्यों के विधानसभा चुनाव एक साथ करवाने के पीछे कई तरह के तर्क दिए जाते रहे हैं। दावा किया जाता है कि इससे देश के विकास कार्यों में तेज़ी आएगी। चुनावों के लिए आदर्श आचार संहिता लागू होते ही सरकार कोई नई योजना लागू नहीं कर सकती है। आचार संहिता के दौरान नए प्रोजेक्ट की शुरुआत, नई नौकरी या नई नीतियों की घोषणा भी नहीं की जा सकती है और इससे विकास के काम पर असर पड़ता है। यह भी तर्क दिया जाता है कि एक चुनाव होने से चुनावों पर होने वाले खर्च भी कम होगा। इससे सरकारी कर्मचारियों को बार-बार चुनावी ट्यूटी से भी छुटकारा मिलेगा।</div>
<div> </div>
<div>भारत में साल 1967 तक केरल को छोड़कर लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए चुनाव एक साथ ही होते थे। पहले आम चुनाव साल 1952 और 1957 में लोकसभा और सभी राज्यों  की विधानसभाओं में एक साथ हुए। केरल में साल 1957 के चुनावों में बनी सरकार को उस वक़्त की केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 356 के अधीन राष्ट्रपति शासन लगाकर हटा दिया था। केरल में दोबारा साल 1960 में विधानसभा चुनाव कराए गए थे। इसके अलावा 1967 से 1972 के बीच पुराने राज्यों के पुनर्गठन और नए राज्यों के बदलने के साथ अलग अलग समय पर विधानसभा चुनाव होते रहे। इस तरह से साल 1967 के बाद बड़े पैमाने पर लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ होने का सिलसिला टूट गया। वैसे आज के परिपेक्ष एक देश एक चुनाव का नारा तर्कसंगत नही लगता।</div>
<div> </div>
<div>देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव अलग मुद्दों पर होते हैं। इसलिए दोनों एक साथ होंगे तो विविधता और विभिन्न स्थितियों वाले देश में स्थानीय मुद्दे हाशिये पर चले जाएंगे। ‘एक चुनाव’ के आइडिया में तस्वीर दूर से तो अच्छी दिख सकती है, लेकिन पास से देखने पर इसमें कई कमियां दिखाई देती हैं। लोकतांत्रिक ढांचे के तहत य​ह आइडिया सुनने में भले ही आकर्षक लगे, लेकिन इसमें तकनीकी समस्याएं काफी हैं। देश में केंद्र और राज्य के चुनाव एक साथ हो भी जाए तब भी यह निश्चित नहीं है कि सभी सरकारें पूर्ण बहुमत से बनेगी और सरकारें 5 साल चलेंगी ही चलेंगी।</div>
<div> </div>
<div>इन हालातों में सरकार गिरने पर दोबारा चुनाव होंगे। कोविंद समिति की सिफारिशों में ऐसे हालातों में दोबारा </div>
<div>चुनी नई सरकार का कार्यकाल लोकसभा के कार्यकाल के साथ ही खत्म होगा। इस तरह एक राज्य की सामान्य हालातों में चलती सरकार को पांच साल पहले ही हटाना सविंधान का उल्लंघन होगा। यही नहीं इस विचार को अमल में लाने के लिए संविधान के कम से कम छह अनुच्छेदों और कुछ कानूनों में संशोधन किए जाने की जरूरत पेश आएगी।</div>
<div> </div>
<div>आबादी के हिसाब से भारत चूंकि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है इसलिए जानकारों के मुताबिक यहां एक साथ सभी राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों के साथ ही संसद के लिए चुनाव करवाए जाने के लिए मौजूदा संसाधनों और मशीनरी से कई गुणा ज्यादा संसाधनो की जरूरत पेश आएगी। यदि हम देश को स्कूल समझे 1 से 12वीं को अलग-अलग राज्य और विभिन्न विषयों को लोकसभा, विधानसभा के चुनाव तो क्यों नही अलग अलग चरणों में एक-एक कक्षा के सभी विषयों की परीक्षा एक साथ एक ही समय में ले लेते।</div>
<div> </div>
<div>ऐसा नही करने का स्पष्ट कारण यही है कि हर विषय का स्तर अलग है, समस्या अलग है और उनके जबाव भी अलग हैं। इस लिए एक देश एक चुनाव में अलग-अलग स्तर के चुनाव एक दूसरे को प्रभावित करेंगे और जनता का जबाव इस प्रभाव में दब कर रह जायेगा।</div>
<div class="yj6qo"> </div>
<div class="adL"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/139584/one-country-one-election-is-not-logical</link>
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                <pubDate>Tue, 19 Mar 2024 16:10:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अनुभवी,परिपक्व,चिंतक समाज और देश के दिग्दर्शक, राष्ट्र की धरोहर। </title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>स्वतंत्र प्रभात </strong></div>
<div>यह विडंबना है जब मनुष्य अत्यंत अनुभवी परिपक्व,प्रबुद्ध शालीन हो जाता है तब उसके अनुभव कार्य की लगनशीलता और परिपक्व मस्तिष्क का हम सदुपयोग नहीं करते उन्हें अवकाश प्रदान कर देते हैं। यह भी इस सिक्के का दूसरा पहलू है कि इस उम्र में शरीर में थकावट और वृद्धावस्था आ जाती है पर हम उन्हें सम्मान और यथा योग्य महत्व देकर उनके मार्गदर्शन और परामर्श का यथोचित लाभ लेकर अपने जीवन,व्यवसाय अथवा नई नीतियों में सफलता प्राप्त कर सकते हैं, पर अमूमन ऐसा होता नहीं है।</div>
<div>  </div>
<div>वृद्धावस्था को जीवन का अंतिम पड़ाव एवं समस्याओं से गिरी हुई अवस्था</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/139428/draft-add-your-titleexperienced-mature-thinker-leader-of-society-and"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-03/adas.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>स्वतंत्र प्रभात </strong></div>
<div>यह विडंबना है जब मनुष्य अत्यंत अनुभवी परिपक्व,प्रबुद्ध शालीन हो जाता है तब उसके अनुभव कार्य की लगनशीलता और परिपक्व मस्तिष्क का हम सदुपयोग नहीं करते उन्हें अवकाश प्रदान कर देते हैं। यह भी इस सिक्के का दूसरा पहलू है कि इस उम्र में शरीर में थकावट और वृद्धावस्था आ जाती है पर हम उन्हें सम्मान और यथा योग्य महत्व देकर उनके मार्गदर्शन और परामर्श का यथोचित लाभ लेकर अपने जीवन,व्यवसाय अथवा नई नीतियों में सफलता प्राप्त कर सकते हैं, पर अमूमन ऐसा होता नहीं है।</div>
<div> </div>
<div>वृद्धावस्था को जीवन का अंतिम पड़ाव एवं समस्याओं से गिरी हुई अवस्था माना जाता है, क्योंकि इस अवस्था में वृद्धों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है।समय की रफ्तार के साथ समाज में अनेक परिवर्तन होने लगे हैं। नवीन पीढ़ी के लोग पुराने विचारों के लोगों का उनके जीवन में हस्तक्षेप उचित ना समझ कर बर्दाश्त नहीं करते हैं,इसी कारण युवा पीढ़ी बुजुर्गों और वृद्धों के विचारों की गहन उपेक्षा करने लगते हैं और बुजुर्गों को लगता है कि उनकी समाज में उपयोगिता धीरे धीरे कम हो रही है। जीवन का सांध्य काल आने पर मनुष्य कई समस्याओं से घिर जाता है।</div>
<div> </div>
<div>सबसे बड़ी समस्या शारीरिक क्षमता में कमी आ जाने की है, शरीर की सभी इंद्रियां धीमी पड़ जाती हैं,अनेक प्रकार की व्याधियों से शरीर घिर जाता है और मनुष्य धीरे-धीरे शरीर पर नियंत्रण खोता जाता है। उम्र के वृद्धावस्था के पड़ाव पर अनेक शारीरिक बीमारियों के साथ-साथ मूल समस्या मानसिक व्याधि की होती है। सरकारी तथा गैर सरकारी संगठनों में वेतन भोगी कर्मचारी को एक निर्धारित आयु के बाद सेवानिवृत्त कर दिया जाता है और यह मान लिया जाता है कि वह व्यक्ति अब शारीरिक एवं मानसिक श्रम के योग्य नहीं रहा चाहे वह व्यक्ति स्वस्थ ही क्यों ना हो।</div>
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<div>इसके बाद उस व्यक्ति के जीवन में अनेक कठिनाई आने लगती हैं। जैसे ही व्यक्ति की आर्थिक उपयोगिता समाज में कम होने लगती है, वह समाज के लिए अनुपयोगी मान लिया जाता है और इस अवस्था में पहुंचने के बाद मानसिक तनाव की स्थिति बनने लगती है। लोगों के संपर्क में न रहना, सहयोगी तथा मित्रों की मृत्यु भी मानसिक तनाव का बड़ा कारण होती है। आत्मविश्वास की धीरे-धीरे कमी होने लगती है, जिससे मानसिक विकृति अकेलापन आदि जैसे रोगों का निर्माण होने लगता है। इस अवस्था में मान सम्मान की कमी की समस्या तो होती ही है, दूसरी तरफ सीमित तथा अल्प धन की उपलब्धता के कारण आर्थिक कष्ट भी वृद्धों को उठाना पड़ता है।</div>
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<div>इसके साथ ही परिवार तथा समाज की नजरों में व्यक्ति अनुपयोगी, बोझ, फालतू समझा जाने लगता है, जिससे बुजुर्ग व्यक्ति के मन में एक प्रकार की वितृष्णा आने लगती है। और कई बुजुर्ग इस अवहेलना को ना बर्दाश्त कर आत्महत्या तक कर बैठते हैं। जो व्यक्ति कुछ समय पहले तक महत्वपूर्ण था, विशिष्ट था वह अचानक ही बोझ समझा जाने लगता है। उसके मान सम्मान एवं भावनाओं का महत्व बहुत कम हो जाता है।</div>
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<div>भागदौड़ वाली इस जिंदगी में युवा पीढ़ी अपने बुजुर्गों से एक दूरी बनाना शुरु कर देती है और वह व्यक्ति अकेला ही रह जाता है। जब मनुष्य अपने को एकाकी समझने लगता है तो यह उसके जीवन का सर्वाधिक कठिन समय एवं पल होता है। आत्मविश्वास जनित प्रेरणा की कमी वृद्धावस्था को बोझिल बना देती है। व्यक्ति की स्थिति अत्यंत दयनीय हो जाती है, दूसरों पर निर्भरता बढ़ने लगती है। नई पीढ़ी द्वारा उसे अकेला छोड़ दिया जाता है। यही परिस्थिति वृद्धा अवस्था के लिए एक अभिशाप की तरह होती है।</div>
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<div>वृद्धावस्था में मनुष्य के मानसिक तथा शारीरिक कष्ट के प्रमुख कारणों में से संयुक्त परिवार का विघटन भी है। युवा पीढ़ी द्वारा अपने मां-बाप से अलग होकर रहने की चाहत हमारे देश में एक गंभीर समस्या पैदा करती है। वृद्ध व्यक्ति या दंपत्ति को जिस आयु में पुत्र, पुत्रियों की सबसे ज्यादा आवश्यकता होती है, ऐसे समय में पुत्र द्वारा उनकी देखभाल छोड़कर अलग रहने के लिए अलग मकान बनाना या किराए पर रहना, उस दंपत्ति या व्यक्ति को मानसिक रूप से प्रताड़ित भी करती है।</div>
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<div>भारत देश वही देश है यहां की संस्कृति में परिवार के बुजुर्ग को भगवान के समान माना जाता था, किंतु संयुक्त परिवार प्रणाली के विघटन के कारण आज की नई युवा पीढ़ी ना तो बड़ों के अनुशासन में रहना चाहती है नहीं उन्हें किसी प्रकार का आदर सम्मान देना चाहती है। औद्योगिकरण और विसंस्कृतिकरण प्रणाली के फल स्वरुप युवा पीढ़ी के रहन-सहन एवं जीवन शैली में तीव्र बदलाव देखा जा रहा है। इस युग में व्यक्ति जितना अपने कार्यों में व्यस्त हो गया है कि उसको परिवार के साथ बैठने, रहने की फुर्सत ही नहीं मिल पाती। भारत में बदलते परिवेश में ओल्ड एज होम की अवधारणा तेजी से बल पकड़ती जा रही है।</div>
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<div>नई पीढ़ी तरह पुरानी पीढ़ी के बीच एक तरह कम्युनिकेशन गैप भी आ जाता है, जो बुजुर्गों के लिए एक बड़ी समस्या होती है। बुजुर्ग दंपत्ति हो या व्यक्ति के पास जब तक धन रहता है तब तक उनके पुत्र, पुत्री उनका ख्याल रखते हैं और जब वह धनहीन हो जाते हैं, तो उन्हें नकार दिया जाता है ।यह एक बड़ी समस्या आज बुजुर्गों के सामने यक्ष प्रश्न बनकर खड़ी है। व्यक्ति को बुजुर्ग अवस्था में जब सबसे ज्यादा धन की आवश्यकता होती है तब उसके पास धन नहीं होता है। यह धन की कमी उपेक्षा का बड़ा कारण भी बनती है।</div>
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<div>युवा पीढ़ी का व्यक्तिगत स्वार्थ एवं धन के प्रति आकर्षण भी बुजुर्गों के प्रति प्रभाव तथा उपेक्षा का मूल कारण होता है। व्यक्ति का जब सर्वश्रेष्ठ काल होता है तब उपेक्षित और समस्या ग्रस्त होकर अवसाद ग्रस्त हो जाता है। अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि रॉबर्ट ब्राउनिंग वृद्धावस्था के बारे में लिखा है मेरे साथ रहो, रुको वृद्ध हो,</div>
<div>अभी जीवन का सर्वोत्तम शेष है। वृद्ध व्यक्ति भी मानव है, उसे भी संवेदना, सहानुभूति और प्यार की आवश्यकता होती है।</div>
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<div>नई पीढ़ी को चाहिए कि वृद्धों के साथ सम्मानजनक व्यवहार करें उनकी लगातार सेवा करनी चाहिए, उनके मार्गदर्शन उनका परामर्श परिवार तथा समाज के लिए जल कल्याणकारी होता है। भारतीय संस्कृति के अनुसार उनका आशीर्वाद उनकी शुभकामनाएं लोक मंगलकारी होती हैं यह माना जाता है कि बुजुर्ग का आशीर्वाद ईश्वर के आशीर्वाद जैसा ही होता है।</div>
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<div><strong>संजीव ठाकुर, स्तंभकार, चिंतक,लेखक, </strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 16 Mar 2024 15:59:04 +0530</pubDate>
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