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                <description>legal news RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>पार्क प्रकरण में मुख्यमंत्री कार्यालय का हस्तक्षेप, नगर विकास विभाग को भेजा गया मामला</title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>कानपुर। </strong>गोविंद नगर ब्लॉक-8 स्थित सार्वजनिक पार्क  में कथित अतिक्रमण, धार्मिक संरचना एवं नवीन निर्माण के मामले में मुख्यमंत्री कार्यालय ने शिकायत को गंभीरता से लेते हुए प्रकरण को नगर विकास तथा नगरीय रोजगार एवं गरीबी उन्मूलन विभाग के अपर मुख्य सचिव/प्रमुख सचिव/सचिव को अग्रसारित किया है। मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से यह कार्रवाई 18 अगस्त 2026 को की गई है।</div>
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<div>जनहित याचिका संख्या 1023/2026 के याचिकाकर्ता प्रकाश वीर आर्य की ओर से मुख्यमंत्री कार्यालय को भेजी गई शिकायत में कहा गया है कि माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 22 अप्रैल 2026 को सार्वजनिक पार्क को अतिक्रमणमुक्त कर उसके मूल</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/186418/chief-ministers-offices-intervention-in-park-issue-case-sent-to"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/1002244502.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>कानपुर। </strong>गोविंद नगर ब्लॉक-8 स्थित सार्वजनिक पार्क  में कथित अतिक्रमण, धार्मिक संरचना एवं नवीन निर्माण के मामले में मुख्यमंत्री कार्यालय ने शिकायत को गंभीरता से लेते हुए प्रकरण को नगर विकास तथा नगरीय रोजगार एवं गरीबी उन्मूलन विभाग के अपर मुख्य सचिव/प्रमुख सचिव/सचिव को अग्रसारित किया है। मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से यह कार्रवाई 18 अगस्त 2026 को की गई है।</div>
<div> </div>
<div>जनहित याचिका संख्या 1023/2026 के याचिकाकर्ता प्रकाश वीर आर्य की ओर से मुख्यमंत्री कार्यालय को भेजी गई शिकायत में कहा गया है कि माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 22 अप्रैल 2026 को सार्वजनिक पार्क को अतिक्रमणमुक्त कर उसके मूल स्वरूप में बहाल करने तथा पार्क की भूमि का उपयोग पार्क/खेल मैदान के रूप में सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।</div>
<div> </div>
<div>शिकायतकर्ता का आरोप है कि इसके बावजूद जिलाधिकारी कार्यालय को भेजे गए प्रकरण में उद्यान विभाग द्वारा 21 जुलाई 2026 को ऐसी जांच आख्या प्रस्तुत की गई, जिसमें विवादित निर्माण को ‘पूर्व से निर्मित मंदिर’ बताया गया, जबकि उनके अनुसार निरीक्षण के समय भी संबंधित संरचना पर गुंबद का निर्माण कार्य चल रहा था और नवीन निर्माण के प्रत्यक्ष प्रमाण मौजूद थे।</div>
<div> </div>
<div>शिकायत में जांच आख्या पर सवाल उठाते हुए कहा गया है कि यदि संबंधित भूमि नगर निगम/केडीए के अभिलेखों में सार्वजनिक पार्क/ओपन स्पेस के रूप में दर्ज है तो विवादित निर्माण के निर्माण वर्ष, आयु, स्वीकृति, अनुमति तथा वैधानिक अभिलेखों का परीक्षण किया जाना चाहिए था। केवल स्थल का फोटो लेकर किसी निर्माण को ‘पूर्व से निर्मित’ बता देना अभिलेखीय एवं निष्पक्ष जांच का विकल्प नहीं हो सकता।</div>
<div>प्रकाश वीर आर्य ने मुख्यमंत्री कार्यालय से 21 जुलाई की जांच आख्या को निरस्त कर स्वतंत्र एवं वरिष्ठ अधिकारी से पुनः जांच कराने की मांग की है। साथ ही यह भी मांग की गई है कि विवादित निर्माण को ‘पूर्व से निर्मित मंदिर’ बताने का आधार स्पष्ट किया जाए और यह बताया जाए कि इसके समर्थन में कौन-कौन से सरकारी अभिलेख, स्वीकृति, अनुमति अथवा अन्य वैधानिक दस्तावेज उपलब्ध हैं।</div>
<div> </div>
<div>शिकायत में पार्क में कथित अतिक्रमण एवं नवीन निर्माण के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका और पूर्व एवं वर्तमान कार्यप्रणाली की भी जांच कर व्यक्तिगत जवाबदेही निर्धारित करने की मांग की गई है।</div>
<div> </div>
<div>शिकायतकर्ता ने मुख्यमंत्री कार्यालय से माननीय हाईकोर्ट के 22 अप्रैल 2026 के आदेश का प्रभावी अनुपालन सुनिश्चित कराने तथा पार्क को सभी अवैध अतिक्रमण एवं नवीन निर्माण से मुक्त कर उसके मूल स्वरूप में बहाल कराने का भी अनुरोध किया है।</div>
<div> </div>
<div>मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा 18 अगस्त को प्रकरण नगर विकास विभाग के उच्च अधिकारियों को अग्रसारित किए जाने के बाद अब इस मामले में शासन स्तर पर होने वाली कार्रवाई महत्वपूर्ण मानी जा रही है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 26 Aug 2026 17:28:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>बदले की भावना : फर्जी मुकदमों में एससी-एसटी और पाक्सो एक्ट का जबरदस्त उपयोग</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कानून कमजोरों की ढाल है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बदले का हथियार नहीं। लेकिन जब किसी गंभीर कानून का इस्तेमाल किसी व्यक्ति को सबक सिखाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दबाव बनाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संपत्ति या पारिवारिक विवाद में बढ़त हासिल करने अथवा व्यक्तिगत दुश्मनी निकालने के लिए किया जाने लगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो सवाल केवल आरोपी का नहीं रहता—सवाल कानून की विश्वसनीयता और न्याय व्यवस्था पर जनता के भरोसे का भी बन जाता है। </span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम और पॉक्सो कानून ऐसे ही अत्यंत संवेदनशील कानून हैं। दोनों कानूनों का उद्देश्य बेहद महत्वपूर्ण है। एससी-एसटी एक्ट सामाजिक भेदभाव और जातीय अत्याचार से पीड़ित लोगों</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/186416/feeling-of-revenge-heavy-use-of-sc-st-and-pocso-act"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/rajeev.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कानून कमजोरों की ढाल है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बदले का हथियार नहीं। लेकिन जब किसी गंभीर कानून का इस्तेमाल किसी व्यक्ति को सबक सिखाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दबाव बनाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संपत्ति या पारिवारिक विवाद में बढ़त हासिल करने अथवा व्यक्तिगत दुश्मनी निकालने के लिए किया जाने लगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो सवाल केवल आरोपी का नहीं रहता—सवाल कानून की विश्वसनीयता और न्याय व्यवस्था पर जनता के भरोसे का भी बन जाता है। </span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम और पॉक्सो कानून ऐसे ही अत्यंत संवेदनशील कानून हैं। दोनों कानूनों का उद्देश्य बेहद महत्वपूर्ण है। एससी-एसटी एक्ट सामाजिक भेदभाव और जातीय अत्याचार से पीड़ित लोगों को कानूनी सुरक्षा देने के लिए बनाया गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि पॉक्सो एक्ट बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए कठोर कानूनी व्यवस्था प्रदान करता है। इसलिए इन कानूनों की सख्ती आवश्यक है। लेकिन सख्ती और अंधी कार्रवाई में अंतर है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या किसी कानून की गंभीरता का अर्थ यह हो सकता है कि शिकायत मिलते ही हर आरोप को बिना पर्याप्त जांच के सत्य मान लिया जाए</span>?<span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्तिगत विवादों में आपसी रंजिश कोई नई बात नहीं है। जमीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मकान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारिवारिक विवाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैवाहिक कलह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेन-देन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नौकरी अथवा स्थानीय राजनीति—इनमें विवाद बढ़ने पर पुलिस और अदालत का दरवाजा खटखटाया जाता है। समस्या तब पैदा होती है जब आरोपों की गंभीरता को ही दबाव बनाने का साधन बना दिया जाए।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> किसी व्यक्ति पर एससी-एसटी एक्ट या पॉक्सो जैसी गंभीर धाराएं लगते ही सामाजिक प्रतिष्ठा पर गहरा असर पड़ सकता है। गिरफ्तारी का डर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नौकरी और कारोबार पर असर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवार की सामाजिक स्थिति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अदालतों के चक्कर और वर्षों तक चलने वाली कानूनी प्रक्रिया—ये सब किसी व्यक्ति को मानसिक और आर्थिक रूप से तोड़ सकते हैं।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> इसीलिए यदि किसी मामले में आरोप वास्तविक हैं तो कानून की पूरी शक्ति पीड़ित के साथ खड़ी होनी चाहिए। लेकिन यदि आरोप जानबूझकर झूठे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मनगढ़ंत या बदले की भावना से लगाए गए हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो जांच एजेंसियों और अदालतों की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी हो जाती है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> एससी-एसटी एक्ट के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने अलग-अलग मामलों में यह स्पष्ट किया है कि कानून का संरक्षण वास्तविक पीड़ितों के लिए आवश्यक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जहां शिकायत प्रथम दृष्टया दुर्भावनापूर्ण या कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग का मामला हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहां न्यायिक हस्तक्षेप संभव है। एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शिकायत और एफआईआर को प्रथम दृष्टया निराधार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परेशान करने वाली और प्रतिशोध की भावना से जुड़ी हुई माना था। साथ ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल कुछ मामलों में कथित दुरुपयोग के आधार पर पूरे एससी-एसटी समुदाय की शिकायतों को संदेह की दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। इस कानून का मूल उद्देश्य ऐतिहासिक सामाजिक अन्याय से पीड़ित लोगों को सुरक्षा देना है। </span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यही संतुलन न्याय व्यवस्था की असली परीक्षा है न तो वास्तविक पीड़ित को न्याय से वंचित किया जाए और न ही निर्दोष व्यक्ति को बदले की कार्रवाई का शिकार बनाया जाए।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> पॉक्सो एक्ट की आवश्यकता पर कोई सवाल नहीं हो सकता। बच्चों के खिलाफ यौन अपराध अत्यंत गंभीर अपराध हैं और ऐसे मामलों में पुलिस तथा न्याय व्यवस्था को संवेदनशीलता और तत्परता से काम करना चाहिए।लेकिन </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों में भी चिंता व्यक्त की है जहां वैवाहिक या पारिवारिक विवादों की पृष्ठभूमि में पॉक्सो कानून के आरोपों का इस्तेमाल कथित तौर पर दबाव बनाने के लिए किया गया।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> मई </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">के एक मामले में अदालत ने अस्पष्ट और सामान्य आरोपों के आधार पर परिवार के कई सदस्यों को आपराधिक प्रक्रिया में घसीटे जाने की स्थिति पर गंभीरता से विचार किया और कार्यवाही रद्द की। यह टिप्पणी किसी भी वास्तविक पॉक्सो मामले को कमजोर करने का आधार नहीं होनी चाहिए।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> बल्कि इसका संदेश यह है कि हर शिकायत की निष्पक्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक और तथ्यपरक जांच होनी चाहिए। क्योंकि अगर झूठे मामले बढ़ते हैं तो उसका सबसे बड़ा नुकसान वास्तविक पीड़ितों को ही होता है। समाज में यह धारणा बनने लगती है कि गंभीर आरोप भी कभी-कभी व्यक्तिगत विवादों में हथियार की तरह इस्तेमाल किए जा सकते हैं। </span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इससे वास्तविक पीड़ितों की आवाज कमजोर पड़ती है।हमारे समाज में एक बड़ी समस्या यह है कि एफआईआर दर्ज होते ही आरोपी को दोषी मानने की प्रवृत्ति पैदा हो जाती है। लेकिन एफआईआर अदालत का फैसला नहीं है। एफआईआर आरोप की शुरुआत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपराध सिद्ध होने का अंतिम प्रमाण नहीं। जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि घटना वास्तव में हुई या नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आरोपों के पीछे क्या तथ्य हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपलब्ध साक्ष्य क्या कहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गवाहों के बयान कितने विश्वसनीय हैं और घटनाक्रम की स्वतंत्र पुष्टि होती है या नहीं। यही कारण है कि पुलिस को न शिकायतकर्ता का पक्ष लेकर जांच करनी चाहिए और न आरोपी को बचाने के लिए। पुलिस की भूमिका सत्य तक पहुंचने की होनी चाहिए। जिस व्यक्ति पर गंभीर आरोप लगा दिए जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके लिए केवल अदालत में बरी हो जाना पर्याप्त न्याय नहीं है।कई बार मुकदमा वर्षों चलता है। वकील की फीस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत की तारीखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुलिस जांच</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नौकरी या कारोबार पर असर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवार की चिंता और समाज में बदनामी—इनका कोई सीधा मुआवजा नहीं होता।और यदि वर्षों बाद अदालत यह कह दे कि आरोप सिद्ध नहीं हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब भी आरोपी की जिंदगी में जो नुकसान हो चुका होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे पूरी तरह वापस लाना मुश्किल होता है। इसलिए झूठा मुकदमा भी सामाजिक हिंसा का एक रुप बन सकता है। </span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">फर्जी मुकदमों की चर्चा करते समय यह मान लेना कि एससी-एसटी एक्ट या पॉक्सो एक्ट में दर्ज अधिकांश मामले झूठे हैं—एक खतरनाक और गलत निष्कर्ष होगा। जातीय अत्याचार और बच्चों के खिलाफ यौन अपराध वास्तविक समस्याएं हैं। अनेक पीड़ित सामाजिक दबाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डर और आर्थिक कमजोरी के कारण शिकायत तक नहीं कर पाते।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> इसलिए कानून को कमजोर करने की नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कानून के निष्पक्ष इस्तेमाल को मजबूत करने की जरूरत है। ऐसे मामलों में पुलिस जांच की गुणवत्ता निर्णायक भूमिका निभाती है। जांच में घटनास्थल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल साक्ष्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेडिकल रिकॉर्ड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कॉल रिकॉर्ड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सीसीटीवी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्र गवाह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दस्तावेज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयु संबंधी प्रमाण और घटना से जुड़े अन्य तथ्यों को निष्पक्ष रूप से देखा जाना चाहिए। केवल शिकायतकर्ता का बयान ही अंतिम सत्य नहीं हो सकता और केवल आरोपी का इनकार भी जांच समाप्त करने का आधार नहीं हो सकता। यदि किसी मामले में जांच के बाद आरोप सही पाए जाते हैं तो दोषी के खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन यदि जांच या न्यायिक प्रक्रिया से स्पष्ट हो कि किसी निर्दोष व्यक्ति को जानबूझकर झूठे आरोपों में फंसाया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कानून में उपलब्ध प्रावधानों के अनुसार जिम्मेदार व्यक्ति के विरुद्ध भी कार्रवाई पर विचार होना चाहिए। इससे एक महत्वपूर्ण संदेश जाएगा कि कानून का संरक्षण पीड़ित के लिए है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन कानून का दुरुपयोग करने की छूट किसी को नहीं है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 26 Aug 2026 15:41:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>रजिस्ट्री व्यवस्था पर बवाल, दूसरे दिन भी ठप रही रजिस्ट्रियां</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मोहनलालगंज, संवाददाता।</strong>    नई रजिस्ट्री व्यवस्था के विरोध में मोहनलालगंज तहसील में दूसरे दिन भी अधिवक्ताओं का आक्रोश देखने को मिला। मोहनलालगंज बार एसोसिएशन के आह्वान पर अधिवक्ताओं ने अनिश्चितकालीन कार्य बहिष्कार जारी रखा, जिससे तहसील परिसर में रजिस्ट्री का काम प्रभावित रहा।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">अधिवक्ताओं ने शासन की नई अधिसूचना को जनविरोधी बताते हुए कहा कि इससे ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले लोगों को अनावश्यक भागदौड़ और आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा। उनका कहना है कि वर्षों से स्थानीय उप-निबंधक कार्यालय में सुचारु रूप से रजिस्ट्री का कार्य होता रहा है, ऐसे में नई व्यवस्था से आम जनता की मुश्किलें बढ़ेंगी।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">बार एसोसिएशन</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184878/ruckus-over-registry-system-registries-remained-stalled-for-the-second"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/img-20260806-wa0051.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मोहनलालगंज, संवाददाता।</strong>  नई रजिस्ट्री व्यवस्था के विरोध में मोहनलालगंज तहसील में दूसरे दिन भी अधिवक्ताओं का आक्रोश देखने को मिला। मोहनलालगंज बार एसोसिएशन के आह्वान पर अधिवक्ताओं ने अनिश्चितकालीन कार्य बहिष्कार जारी रखा, जिससे तहसील परिसर में रजिस्ट्री का काम प्रभावित रहा।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">अधिवक्ताओं ने शासन की नई अधिसूचना को जनविरोधी बताते हुए कहा कि इससे ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले लोगों को अनावश्यक भागदौड़ और आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा। उनका कहना है कि वर्षों से स्थानीय उप-निबंधक कार्यालय में सुचारु रूप से रजिस्ट्री का कार्य होता रहा है, ऐसे में नई व्यवस्था से आम जनता की मुश्किलें बढ़ेंगी।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">बार एसोसिएशन ने सरकार से तत्काल अधिसूचना वापस लेकर पुरानी व्यवस्था बहाल करने की मांग की। अधिवक्ताओं ने साफ कहा कि जब तक मांगें पूरी नहीं होतीं, तब तक कार्य बहिष्कार जारी रहेगा। जरूरत पड़ने पर आंदोलन को और व्यापक बनाया जाएगा।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">कार्य बहिष्कार में वरिष्ठ अधिवक्ता एवं पूर्व महामंत्री देवेश सिंह, विनय कुमार मिश्रा, नितिन तिवारी, अंकित यादव, विपिन कुमार पाल सहित बड़ी संख्या में अधिवक्ता शामिल रहे।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/184878/ruckus-over-registry-system-registries-remained-stalled-for-the-second</link>
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                <pubDate>Thu, 06 Aug 2026 22:33:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जमीन विवाद में पुलिस पर मारपीट और अभद्रता का आरोप</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>बस्ती।</strong> बस्ती जिले के कलवारी थाना क्षेत्र के ग्राम कुसौरा में जमीन कब्जे के विवाद के बीच पुलिस पर मारपीट और अभद्रता का गंभीर आरोप लगाया गया है। पीड़िता सबा, पुत्री स्वर्गीय मोहम्मद कासिम, निवासी कुसौरा ने पुलिस उपमहानिरीक्षक (डीआईजी) और पुलिस अधीक्षक (एसपी) को प्रार्थना पत्र देकर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">प्रार्थना पत्र के अनुसार, 5 जुलाई को सुबह करीब 11 बजे गांव निवासी नागेंद्र पुत्र रामजतन कथित रूप से उस जमीन पर दीवार बनाकर कब्जा करने का प्रयास कर रहे थे, जहां पीड़िता के अनुसार उसके पूर्वजों</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182881/police-accused-of-assault-and-indecency-in-land-dispute"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/img-20260707-wa0070.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>बस्ती।</strong> बस्ती जिले के कलवारी थाना क्षेत्र के ग्राम कुसौरा में जमीन कब्जे के विवाद के बीच पुलिस पर मारपीट और अभद्रता का गंभीर आरोप लगाया गया है। पीड़िता सबा, पुत्री स्वर्गीय मोहम्मद कासिम, निवासी कुसौरा ने पुलिस उपमहानिरीक्षक (डीआईजी) और पुलिस अधीक्षक (एसपी) को प्रार्थना पत्र देकर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रार्थना पत्र के अनुसार, 5 जुलाई को सुबह करीब 11 बजे गांव निवासी नागेंद्र पुत्र रामजतन कथित रूप से उस जमीन पर दीवार बनाकर कब्जा करने का प्रयास कर रहे थे, जहां पीड़िता के अनुसार उसके पूर्वजों की आरा मशीन संचालित होती थी। सूचना मिलने पर सबा, उसकी मां कुलसुम बानो और भाई सुफियान मौके पर पहुंचे तथा निर्माण कार्य रोकने का अनुरोध किया। आरोप है कि इस दौरान दोनों पक्षों के बीच विवाद की स्थिति बन गई।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पीड़िता का कहना है कि इसके बाद परिवार ने महिला हेल्पलाइन पर सूचना दी, जिसके बाद पुलिस मौके पर पहुंची। आरोप है कि नागेंद्र के बुलाने पर पहुंचे दरोगा एस.एन. सिंह ने बिना मामले की जांच किए ही सबा और उसके परिवार के साथ अभद्र व्यवहार किया।सबा का आरोप है कि दरोगा ने उसका कॉलर और गला पकड़कर धक्का दिया तथा जबरन थाने ले गए। परिवार का कहना है कि उन्हें शाम तक हवालात में रखा गया और बाद में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की निवारक धाराओं 107/151 के तहत चालान कर एसडीएम न्यायालय भेज दिया गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पीड़ित परिवार ने उच्च अधिकारियों से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने, जमीन कब्जे के आरोपों की भी जांच कराने तथा दोषी पाए जाने पर संबंधित दरोगा के विरुद्ध वैधानिक कार्रवाई किए जाने की मांग की है।हालांकि, इस मामले में पुलिस विभाग की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया या पक्ष सामने नहीं आया है। ऐसे में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। अब जांच के बाद ही पूरे मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/182881/police-accused-of-assault-and-indecency-in-land-dispute</link>
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                <pubDate>Tue, 07 Jul 2026 21:59:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title> उच्च न्यायालय का बड़ा आदेश: पुलिस एसआई भर्ती में विवादित ऊंचाई मापी जाएगी, वीडियोग्राफी अनिवार्य</title>
                                    <description><![CDATA[<blockquote class="format1"><strong>सचिन बाजपेई </strong><br /><strong>लखनऊ।</strong></blockquote>
<p style="text-align:justify;">इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश पुलिस सब-इंस्पेक्टर सिविल पुलिस भर्ती 2025 में ऊंचाई मापने को लेकर उठे विवाद में याचिकाकर्ता   शुभम शर्मा को महत्वपूर्ण राहत देते हुए उनकी ऊंचाई दोबारा मापने का आदेश दिया है। </p>
<p style="text-align:justify;">न्यायमूर्ति राजीव सिंह की एकलपीठ ने राज्य सरकार और पुलिस विभाग को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता शुभम शर्मा की ऊंचाई 6 जुलाई 2026 को सुबह 11:30 बजे लखनऊ स्थित रिजर्व पुलिस लाइंस में विशेषज्ञों की पैनल द्वारा दोबारा मापी जाए। पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी अनिवार्य रूप से की जाएगी और रिपोर्ट अदालत में 16 जुलाई 2026 को पेश की</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182684/big-order-of-high-court-controversial-height-measurement-in-police"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/high-court-lucknow.jpg" alt=""></a><br /><blockquote class="format1"><strong>सचिन बाजपेई </strong><br /><strong>लखनऊ।</strong></blockquote>
<p style="text-align:justify;">इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश पुलिस सब-इंस्पेक्टर सिविल पुलिस भर्ती 2025 में ऊंचाई मापने को लेकर उठे विवाद में याचिकाकर्ता   शुभम शर्मा को महत्वपूर्ण राहत देते हुए उनकी ऊंचाई दोबारा मापने का आदेश दिया है। </p>
<p style="text-align:justify;">न्यायमूर्ति राजीव सिंह की एकलपीठ ने राज्य सरकार और पुलिस विभाग को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता शुभम शर्मा की ऊंचाई 6 जुलाई 2026 को सुबह 11:30 बजे लखनऊ स्थित रिजर्व पुलिस लाइंस में विशेषज्ञों की पैनल द्वारा दोबारा मापी जाए। पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी अनिवार्य रूप से की जाएगी और रिपोर्ट अदालत में 16 जुलाई 2026 को पेश की जाएगी।</p>
<p style="text-align:justify;">याचिका में शुभम शर्मा ने आरोप लगाया था कि भर्ती प्रक्रिया के दौरान दस्तावेज सत्यापन और शारीरिक मानक परीक्षण में उनकी ऊंचाई गलत तरीके से 167.0 सेमी और 167.1 सेमी मापी गई, जबकि आगरा जिला अस्पताल के मेडिकल अधिकारी द्वारा जारी प्रमाण-पत्र में उनकी ऊंचाई 168.2 सेमी बताई गई है। याचिकाकर्ता ने तत्काल आपत्ति दर्ज कराई थी, लेकिन दोबारा मापने पर भी वही ऊंचाई दर्ज की गई।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने याचिकाकर्ता के आगरा जिला अस्पताल के प्रमाण-पत्र को गंभीरता से लिया और मामले में हस्तक्षेप किया। राज्य की ओर से अतिरिक्त मुख्य स्थायी वकील ने तर्क दिया कि ऊंचाई मापने की उचित प्रक्रिया है और आपत्ति पर दोबारा माप लिया गया था, इसलिए अदालती हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">अधिवक्ता सुभाष चन्द्र यादव  ने याची की तरफ से पूरा मामला कोर्ट को बताया जिसपर कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद याचिका पर विचार योग्य पाया और ऊंचाई मापने की नई प्रक्रिया शुरू करने का आदेश पारित किया। अधिवक्ता सुभाष चन्द्र यादव के पक्ष में यह आदेश  भर्ती प्रक्रिया के लिए प्रेरणा दायक बन सकता है l </p>
<p style="text-align:justify;"><strong>यह आदेश उन युवाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जो भर्ती परीक्षा में ऊंचाई मापने को लेकर विवाद में फंस जाते हैं। </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/182684/big-order-of-high-court-controversial-height-measurement-in-police</link>
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                <pubDate>Sat, 04 Jul 2026 15:46:10 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: मदरसों की ATS जांच पर रोक से इनकार, टीचर्स एसोसिएशन की याचिका खारिज।</title>
                                    <description><![CDATA[<div>
<blockquote class="format1">
<div><strong>स्वतंत्र प्रभात  </strong></div>
<div><strong>प्रयागराज। </strong></div>
</blockquote>
</div>
<div>  </div>
<div>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मदरसों की एंटी टेररिस्ट स्क्वाड (ATS) द्वारा की जा रही जांच के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए जांच पर रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने टीचर्स एसोसिएशन मदारिस अरबिया की ओर से दायर याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें ATS की जांच पर तत्काल रोक लगाने की मांग की गई थी।</div>
<div>  </div>
<div>याचिकाकर्ता का कहना था कि प्रदेश के विभिन्न मदरसों में ATS द्वारा की जा रही जांच से शिक्षण कार्य प्रभावित हो रहा है और जांच की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए अदालत से हस्तक्षेप की</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182665/big-decision-of-allahabad-high-court-refusal-to-ban-ats"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-06/ald.jpg" alt=""></a><br /><div>
<blockquote class="format1">
<div><strong>स्वतंत्र प्रभात  </strong></div>
<div><strong>प्रयागराज। </strong></div>
</blockquote>
</div>
<div> </div>
<div>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मदरसों की एंटी टेररिस्ट स्क्वाड (ATS) द्वारा की जा रही जांच के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए जांच पर रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने टीचर्स एसोसिएशन मदारिस अरबिया की ओर से दायर याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें ATS की जांच पर तत्काल रोक लगाने की मांग की गई थी।</div>
<div> </div>
<div>याचिकाकर्ता का कहना था कि प्रदेश के विभिन्न मदरसों में ATS द्वारा की जा रही जांच से शिक्षण कार्य प्रभावित हो रहा है और जांच की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए अदालत से हस्तक्षेप की मांग की गई थी। हालांकि, डिवीजन बेंच ने मामले में अंतरिम राहत देने से इनकार करते हुए याचिका को ही खारिज कर दिया।</div>
<div> </div>
<div>अदालत के इस फैसले के बाद स्पष्ट हो गया है कि प्रदेश में मदरसों को लेकर ATS की ओर से चल रही जांच पर फिलहाल कोई न्यायिक रोक नहीं रहेगी और जांच एजेंसी अपनी कार्रवाई जारी रख सकेगी।</div>
<div class="yj6qo"> </div>
<div class="adL"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/182665/big-decision-of-allahabad-high-court-refusal-to-ban-ats</link>
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                <pubDate>Fri, 03 Jul 2026 21:41:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>स्टिंग ऑपरेशन के बाद दर्ज रंगदारी केस में हाईकोर्ट से पत्रकारों को बड़ी राहत</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;"><strong>भोपाल।</strong> </p><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने देवास में कथित भ्रूण लिंग परीक्षण, अवैध गर्भपात और कन्या भ्रूण हत्या के खुलासे से जुड़े स्टिंग ऑपरेशन के बाद दर्ज रंगदारी के मामले में पत्रकारों को महत्वपूर्ण राहत प्रदान की है। न्यायालय ने <strong>तहलका डिजिटल न्यूज</strong> के पत्रकार <strong>विनय अरोड़ा</strong> को अग्रिम जमानत (एंटीसिपेटरी बेल) मंजूर कर दी है। इससे पहले 25 जून को इसी मामले में सह-आरोपी पत्रकार <strong>रजनी</strong> को नियमित जमानत मिल चुकी थी।</p><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">दोनों मामलों की सुनवाई मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की एकल पीठ के न्यायमूर्ति <strong>पवन कुमार द्विवेदी</strong> ने की। अदालत ने उपलब्ध अभिलेखों का अवलोकन करते हुए पाया कि स्टिंग</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182652/big-relief-to-journalists-from-high-court-in-extortion-case"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/476977-madhya-pradesh-high-court-gwalior-bench.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;"><strong>भोपाल।</strong> </p><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने देवास में कथित भ्रूण लिंग परीक्षण, अवैध गर्भपात और कन्या भ्रूण हत्या के खुलासे से जुड़े स्टिंग ऑपरेशन के बाद दर्ज रंगदारी के मामले में पत्रकारों को महत्वपूर्ण राहत प्रदान की है। न्यायालय ने <strong>तहलका डिजिटल न्यूज</strong> के पत्रकार <strong>विनय अरोड़ा</strong> को अग्रिम जमानत (एंटीसिपेटरी बेल) मंजूर कर दी है। इससे पहले 25 जून को इसी मामले में सह-आरोपी पत्रकार <strong>रजनी</strong> को नियमित जमानत मिल चुकी थी।</p><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">दोनों मामलों की सुनवाई मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की एकल पीठ के न्यायमूर्ति <strong>पवन कुमार द्विवेदी</strong> ने की। अदालत ने उपलब्ध अभिलेखों का अवलोकन करते हुए पाया कि स्टिंग ऑपरेशन के दौरान तैयार किए गए वीडियो एफआईआर दर्ज होने से पहले ही राज्य एवं केंद्र सरकार के संबंधित अधिकारियों को भेजे जा चुके थे। अदालत ने प्रथम दृष्टया इसी तथ्य को राहत दिए जाने का महत्वपूर्ण आधार माना।</p><h3 style="text-align:justify;"><strong>एफआईआर से पहले अधिकारियों को भेजे गए थे वीडियो</strong></h3><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, 2 जुलाई को पारित आदेश में हाईकोर्ट ने उल्लेख किया कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि 6 अप्रैल 2026 को स्टिंग ऑपरेशन के वीडियो मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य आयुक्त, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) की अध्यक्ष, पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) तथा देवास के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) को भेजे गए थे। इसके अतिरिक्त 6 और 7 अप्रैल को भी संबंधित अधिकारियों को वीडियो उपलब्ध कराए गए। इसके बाद 7 अप्रैल को पुलिस ने एफआईआर दर्ज की।</p><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अदालत ने इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए विनय अरोड़ा को अग्रिम जमानत प्रदान की। इससे पहले पत्रकार रजनी को जमानत देते समय भी न्यायालय ने इसी प्रकार की परिस्थितियों का उल्लेख किया था।</p><h3 style="text-align:justify;"><strong>क्या है पूरा मामला</strong></h3><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">देवास के कोतवाली थाने में दर्ज एफआईआर में आरोप लगाया गया है कि पत्रकार विनय अरोड़ा, रजनी और अन्य लोगों ने स्टिंग ऑपरेशन के दौरान रिकॉर्ड किए गए वीडियो के आधार पर शिकायतकर्ता से रंगदारी वसूलने और दबाव बनाने का प्रयास किया।</p><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पुलिस ने मामले में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 308(5) एवं 308(6) (रंगदारी), धारा 61(2) (आपराधिक साजिश) तथा धारा 3(5) (समान उद्देश्य) के तहत प्रकरण दर्ज किया है।</p><h3 style="text-align:justify;"><strong>पत्रकारों का पक्ष</strong></h3><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पत्रकारों की ओर से अदालत में दलील दी गई कि स्टिंग ऑपरेशन का उद्देश्य समाज में चल रही कथित अवैध गतिविधियों का पर्दाफाश करना था। उनके अनुसार, स्टिंग के दौरान <strong>पीसीपीएनडीटी अधिनियम, 1994</strong> तथा <strong>मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) अधिनियम, 1971</strong> के उल्लंघन से जुड़े कथित अवैध भ्रूण लिंग परीक्षण, गैरकानूनी गर्भपात और कन्या भ्रूण हत्या के मामलों का खुलासा किया गया था।</p><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि स्टिंग ऑपरेशन के वीडियो एफआईआर दर्ज होने से पहले ही संबंधित सरकारी अधिकारियों को सौंप दिए गए थे। ऐसे में रंगदारी के आरोप निराधार हैं और यह कार्रवाई कथित अवैध गतिविधियों के खुलासे के बाद प्रतिशोध स्वरूप की गई है।</p><h3 style="text-align:justify;"><strong>राज्य सरकार ने जताया विरोध</strong></h3><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">राज्य सरकार की ओर से अग्रिम जमानत का विरोध करते हुए कहा गया कि आरोप गंभीर प्रकृति के हैं। सरकारी पक्ष का तर्क था कि पत्रकारों ने स्टिंग ऑपरेशन के दौरान रिकॉर्ड किए गए वीडियो का इस्तेमाल शिकायतकर्ता को ब्लैकमेल करने और दबाव बनाने के लिए किया।</p><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस स्तर पर मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की जा रही है और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर दोनों पत्रकारों को कानून के अनुरूप राहत प्रदान की गई है।</p><h3 style="text-align:justify;"><strong>जमानत की शर्तें</strong></h3><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने अपने 2 जुलाई के आदेश में निर्देश दिया कि यदि विनय अरोड़ा को इस मामले में गिरफ्तार किया जाता है, तो उन्हें 50 हजार रुपये के निजी मुचलके तथा समान राशि के एक सक्षम जमानतदार पर रिहा किया जाए।</p><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">वहीं, 25 जून को पारित आदेश में पत्रकार रजनी को एक लाख रुपये के निजी मुचलके एवं एक सक्षम जमानतदार पर नियमित जमानत देने का निर्देश दिया गया था। साथ ही उन्हें ट्रायल कोर्ट में नियमित रूप से उपस्थित रहने की शर्त का पालन करने को कहा गया है।</p><h3 style="text-align:justify;"><strong>अधिवक्ताओं ने रखा पक्ष</strong></h3><p style="text-align:justify;">मामले में पत्रकारों की ओर से अधिवक्ता <strong>अमन मालवीय</strong> ने पैरवी की, जबकि राज्य सरकार की ओर से सरकारी अधिवक्ता <strong>सुरेंद्र सिंह अलावा</strong> एवं <strong>हेमंत शर्मा</strong> ने न्यायालय में अपना पक्ष रखा। अब मामले की आगे की सुनवाई ट्रायल कोर्ट में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार जारी रहेगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Jul 2026 21:04:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हिरासत में मौत और पुलिसिया हिंसा के मामलों में अभियोजन मंजूरी जरूरी नहीं: ।मध्य प्रदेश हाईकोर्ट।</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज </span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि हिरासत में मौत या पुलिसिया हिंसा के मामलों में पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता (</span>CrPC) <span lang="hi" xml:lang="hi">की धारा 197 के तहत पूर्व सरकारी मंजूरी की आवश्यकता नहीं होती।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने दो पुलिस आरक्षकों की याचिका खारिज करते हुए कहा कि ऐसे कृत्यों का सरकारी कर्तव्य के निर्वहन से कोई उचित संबंध नहीं माना जा सकता। जस्टिस गजेंद्र सिंह की एकल पीठ इंदौर में वर्ष 2015 में हुई एक युवक की कथित हिरासत मौत से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181536/prosecution-sanction-is-not-necessary-in-cases-of-custodial-death"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas7.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज </span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि हिरासत में मौत या पुलिसिया हिंसा के मामलों में पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता (</span>CrPC) <span lang="hi" xml:lang="hi">की धारा 197 के तहत पूर्व सरकारी मंजूरी की आवश्यकता नहीं होती।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने दो पुलिस आरक्षकों की याचिका खारिज करते हुए कहा कि ऐसे कृत्यों का सरकारी कर्तव्य के निर्वहन से कोई उचित संबंध नहीं माना जा सकता। जस्टिस गजेंद्र सिंह की एकल पीठ इंदौर में वर्ष 2015 में हुई एक युवक की कथित हिरासत मौत से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही थी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">याचिकाकर्ता पुलिसकर्मियों ने तर्क दिया कि उनके खिलाफ अभियोजन चलाने से पहले सरकार की मंजूरी आवश्यक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि कथित घटनाएं उनके आधिकारिक कर्तव्यों से जुड़ी हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मामले के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुसूचित जाति समुदाय से संबंध रखने वाले 24 वर्षीय पंकज वैष्णव को 19 दिसंबर 2015 को स्कूटर चोरी के मामले में पूछताछ के लिए इंदौर के एमआईजी थाने लाया गया। उसी रात उसकी पुलिस हिरासत में मौत हो गई। पुलिस ने इसे आत्महत्या बताया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">घटना के बाद </span>CrPC <span lang="hi" xml:lang="hi">की धारा 176 के तहत स्वतंत्र जांच कराई गई। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा की गई जांच में निष्कर्ष निकाला गया कि यह मामला आपराधिक मानव वध का प्रतीत होता है।इसके बाद दो आरक्षकों और एक थाना प्रभारी के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अवैध निरुद्ध करने और झूठे साक्ष्य देने सहित विभिन्न आरोपों में आरोपपत्र दायर किया गया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 197 के संरक्षण का लाभ तभी मिल सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब आरोपित कृत्य और सरकारी कर्तव्य के निर्वहन के बीच स्पष्ट और उचित संबंध हो। लेकिन वर्तमान मामले में ऐसा कोई संबंध नहीं पाया गया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने कहा</span>, “<span lang="hi" xml:lang="hi">यह ऐसा मामला नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें पुलिसकर्मी किसी हिंसक भीड़ को नियंत्रित कर रहे थे और बल प्रयोग करते हुए अपनी सीमा से आगे बढ़ गए हों। यहां आरोपित बल प्रयोग उस समय किया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब मृतक पुलिस हिरासत में था और थाने के नियंत्रण में था। ऐसी स्थिति में बल प्रयोग या शारीरिक हमला करने का कोई औचित्य नहीं था।”</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"> </p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हाईकोर्ट ने कहा कि कानून पुलिस को कुछ विशेष परिस्थितियों में बल प्रयोग की अनुमति देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे हिंसक भीड़ को तितर-बितर करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गिरफ्तारी</span><span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों का भी उल्लेख किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें कहा गया कि हिरासत में हिंसा और मौत सभ्य समाज में सबसे गंभीर अपराधों में से हैं तथा यह व्यक्ति के मूल मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने आरक्षकों की पुनरीक्षण याचिका खारिज की और स्पष्ट किया कि हिरासत में मौत या पुलिसिया हिंसा जैसे मामलों में धारा 197 के तहत अभियोजन मंजूरी का संरक्षण उपलब्ध नहीं होगा।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 13:57:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>चार दीवारों के भीतर, सार्वजनिक शांति में कोई खलल नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong><span lang="hi" xml:lang="hi">इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार को गोहत्या के आरोपी दो लोगों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">1980 (एनएसए</span>) <span lang="hi" xml:lang="hi">के तहत जारी हिरासत आदेश रद्द किया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि कथित घटना घर की चारदीवारी के भीतर हुई थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि किसी सार्वजनिक स्थान पर।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जस्टिस राजीव मिश्रा और जस्टिस डॉ. अजय कुमार-</span>II <span lang="hi" xml:lang="hi">की खंडपीठ ने इस प्रकार इशम उर्फ इसम और समीर द्वारा दायर दो बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं को स्वीकार किया और निर्देश दिया कि उन्हें तत्काल हिरासत से रिहा किया जाए।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  कोर्ट ने टिप्पणी की कि कथित घटना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें केवल</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180333/no-disturbance-of-public-peace-within-the-four-walls"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/allahabad-high-court1.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong><span lang="hi" xml:lang="hi">इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार को गोहत्या के आरोपी दो लोगों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">1980 (एनएसए</span>) <span lang="hi" xml:lang="hi">के तहत जारी हिरासत आदेश रद्द किया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि कथित घटना घर की चारदीवारी के भीतर हुई थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि किसी सार्वजनिक स्थान पर।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जस्टिस राजीव मिश्रा और जस्टिस डॉ. अजय कुमार-</span>II <span lang="hi" xml:lang="hi">की खंडपीठ ने इस प्रकार इशम उर्फ इसम और समीर द्वारा दायर दो बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं को स्वीकार किया और निर्देश दिया कि उन्हें तत्काल हिरासत से रिहा किया जाए।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> कोर्ट ने टिप्पणी की कि कथित घटना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें केवल एक गाय की हत्या शामिल थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके कारण न तो कोई हिंसा हुई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न ही सार्वजनिक शांति और व्यवस्था में कोई खलल पड़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और न ही सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा</span>, "<span lang="hi" xml:lang="hi">उपर्युक्त चर्चा के आलोक में यह अकाट्य निष्कर्ष निकलता है कि याचिकाकर्ता के खिलाफ एनएसए</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के तहत जारी हिरासत आदेश न तो कानून की दृष्टि से और न ही तथ्यों के आधार पर कायम रखा जा सकता है। अतः</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह आदेश इस न्यायालय द्वारा रद्द किए जाने योग्य है।"</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हिरासत जारी करने वाले प्राधिकारी (जिला मजिस्ट्रेट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शामली) ने मूल रूप से एनएसए की धारा 3(2) के तहत विवादित हिरासत आदेश जारी किया। यह आदेश याचिकाकर्ताओं के खिलाफ </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">यूपी गोहत्या निवारण अधिनियम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">1955</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">की धारा 3</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">5</span>A <span lang="hi" xml:lang="hi">और 8 के तहत दर्ज </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एफआईआर </span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के आधार पर जारी किया गया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हिरासत के कारणों के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुलिस को 23 अप्रैल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">2025 को शिकायतकर्ता से सूचना मिली थी कि कुछ लोग गोहत्या कर रहे हैं। घर के भीतर तलाशी लेने पर पुलिस को एक कटा हुआ सिर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पैर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खाल और मांस बरामद हुआ। पशु चिकित्सक द्वारा किए गए वैज्ञानिक परीक्षण के बाद बरामद मांस की पहचान </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बीफ</span>' (<span lang="hi" xml:lang="hi">गोमांस) के रूप में हुई।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शेष सामग्री की पहचान गाय की संतान (बछड़े/बछिया) के अवशेषों के रूप में की गई। जहां आरोपी हासिम को अगले ही दिन (24 अप्रैल) गिरफ्तार कर लिया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं आरोपी समीर को 27 जून को ही गिरफ्तार किया जा सका।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आगे भेजी गई रिपोर्ट मिलने पर ज़िला मजिस्ट्रेट ने 7 जुलाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">2025 को हिरासत के आदेश जारी किए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें निर्देश दिया गया कि याचिकाकर्ताओं को 12 महीने की अवधि के लिए हिरासत में रखा जाए। राज्य सरकार ने आखिरकार 19 अगस्त को इस आदेश की पुष्टि की। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">   </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हिरासत को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ताओं के वकील गौतम बघेल ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं का कथित कृत्य उनके घर की सीमाओं के बाहर नहीं हुआ। इसलिए यह निजी तौर पर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोगों की नज़र से दूर किया गया। यह भी कहा गया कि प्रतिवादियों द्वारा दायर जवाबी हलफनामे में ऐसा कोई दावा नहीं था कि याचिकाकर्ता के कृत्य के कारण कोई सांप्रदायिक हिंसा हुई हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके परिणामस्वरूप सार्वजनिक शांति भंग हुई हो या किसी व्यक्ति को चोट लगी हो।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उपरोक्त के परिणामस्वरूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न तो कोई हिंसा हुई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न ही सार्वजनिक शांति और व्यवस्था में कोई बाधा आई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और न ही सांप्रदायिक सौहार्द में कोई खलल पड़ा।" इसलिए इस निष्कर्ष पर पहुंचते हुए कि हिरासत का आदेश न तो कानून की नज़र में और न ही तथ्यों के आधार पर सही ठहराया जा सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेंच ने हिरासत के आदेश को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और उसके बाद राज्य सरकार द्वारा जारी किए गए पुष्टि आदेश को भी रद्द कर दिया।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/180333/no-disturbance-of-public-peace-within-the-four-walls</link>
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                <pubDate>Sat, 30 May 2026 22:21:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बांग्लादेश डिपोर्ट किए गए कुछ लोगों को वापस भारत लाया जाएगा</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ब्यूरो प्रयागराज -</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi">केंद्र सरकार ने शुक्रवार को उच्चतम न्यायालय को बताया कि उसने निर्वासित करके बांग्लादेश भेजे गए कुछ लोगों को भारत वापस लाने का फैसला किया है और उसके बाद उनकी भारतीय नागरिकता के दावे की पुष्टि की जाएगी। केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ को बताया कि मामले के विशिष्ट तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए और इसे अन्य मामलों में अनुकरणीय मिसाल न मानते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरकार ने उन्हें वापस लाने का निर्णय लिया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मेहता ने न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/179984/some-people-deported-to-bangladesh-will-be-brought-back-to"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/img-20260523-wa0013-960x640.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ब्यूरो प्रयागराज -</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi">केंद्र सरकार ने शुक्रवार को उच्चतम न्यायालय को बताया कि उसने निर्वासित करके बांग्लादेश भेजे गए कुछ लोगों को भारत वापस लाने का फैसला किया है और उसके बाद उनकी भारतीय नागरिकता के दावे की पुष्टि की जाएगी। केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ को बताया कि मामले के विशिष्ट तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए और इसे अन्य मामलों में अनुकरणीय मिसाल न मानते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरकार ने उन्हें वापस लाने का निर्णय लिया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मेहता ने न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की सदस्यता वाली पीठ से कहा कि सरकार उन्हें वापस लाएगी और उसके बाद उनकी स्थिति की जांच करेगी। परिणाम के आधार पर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम तदनुसार कदम उठाएंगे। शीर्ष विधि अधिकारी ने कहा कि इन व्यक्तियों को भारत वापस लाने में 8-10 दिन लग सकते हैं। पीठ ने मामले की अगली सुनवाई की तारीख जुलाई में तय की है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उच्चतम न्यायालय केंद्र सरकार की उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था जिसमें कलकत्ता उच्च न्यायालय के 26 सितंबर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">2025 के उस आदेश को चुनौती दी गई थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें उच्च न्यायालय ने सुनाली खातून और अन्य को बांग्लादेश निर्वासित करने के केंद्र सरकार के फैसले को रद्द कर दिया था और इसे ‘अवैध’ करार दिया था।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पिछले साल तीन दिसंबर को शीर्ष अदालत ने ‘मानवीय आधार’ पर खातून और उनके आठ वर्षीय बच्चे को बांग्लादेश भेजे जाने के महीनों बाद भारत में प्रवेश की अनुमति दी थी।अदालत ने पश्चिम बंगाल सरकार को बच्चे की देखभाल करने का निर्देश दिया था और बीरभूम जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी को गर्भवती खातून को मुफ्त प्रसव की सुविधा सहित हर संभव चिकित्सा सहायता प्रदान करने का निर्देश दिया था।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">न्यायालय ने 24 अप्रैल को केंद्र सरकार को अंतिम अवसर दिया और उसके अधिवक्ता को इस मामले में निर्देश लेकर अदालत को अवगत कराने को कहा। खातून के पिता भोदु शेख की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और संजय हेगड़े ने कहा कि केंद्र सरकार का यह रवैया ‘कुछ हद तक अनुचित’ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने इस मामले में न्यायालय को अपने विचार नहीं बताए हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">क्षेत्र के सेक्टर 26 में दो दशकों से अधिक समय से दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम कर रहे इन परिवारों को पिछले साल 18 जून को बांग्लादेशी होने के संदेह में पुलिस ने हिरासत में लिया और बाद में 27 जून को सीमा पार धकेल दिया। कि निर्वासित किए गए छह नागरिकों को एक महीने के भीतर भारत वापस लाया जाए और आदेश पर अस्थायी रोक लगाने की सरकार की अपील को खारिज कर दिया था।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 23 May 2026 21:31:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>एक ओर यूएपीए में जमानत,दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद का मामला बड़ी पीठ को भेजा</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> ब्यूरो प्रयागराज। </span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi">एक ओर यूएपीए में बंद उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत के मामले पर अब बड़ी बेंच फैसला करेगी। इस मामले में शुक्रवार को दिन में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने ज़ोर देकर कहा था कि इस मामले को एक बड़ी बेंच के पास भेजा जाए। दूसरी ओर एक दूसरे मामले में अन्य बातों के अलावा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साढ़े चार साल से ज़्यादा समय तक हिरासत में रहने की बात पर ध्यान देते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर के </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बड़ी साज़िश</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">मामले में यूएपीए के आरोपी सुहैल अहमद ठोकर को ज़मानत दे दी। यह</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/179982/on-one-hand-bail-in-uapa-on-the-other-hand"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/images10.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> ब्यूरो प्रयागराज। </span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi">एक ओर यूएपीए में बंद उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत के मामले पर अब बड़ी बेंच फैसला करेगी। इस मामले में शुक्रवार को दिन में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने ज़ोर देकर कहा था कि इस मामले को एक बड़ी बेंच के पास भेजा जाए। दूसरी ओर एक दूसरे मामले में अन्य बातों के अलावा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साढ़े चार साल से ज़्यादा समय तक हिरासत में रहने की बात पर ध्यान देते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर के </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बड़ी साज़िश</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">मामले में यूएपीए के आरोपी सुहैल अहमद ठोकर को ज़मानत दे दी। यह मामला संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के बाद सामने आया था। सीजेआई सूर्यकांत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने यह आदेश पारित किया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस बीच अब सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को आतंकवाद और यूएपीए यानी गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के तहत मामलों में जमानत देने के नियमों पर अहम फ़ैसला सुना दिया। कोर्ट ने दिल्ली दंगे मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत न देने वाले अपने पुराने फैसले पर सवाल उठाते हुए मामले को बड़ी बेंच के पास भेज दिया है। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले की बेंच ने यह आदेश दिया। इसके साथ ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस मामले में शामिल दो अन्य आरोपियों- तसलीम अहमद और खालिद सैफी को 6 महीने की अंतरिम जमानत भी दे दी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दिल्ली में फरवरी 2020 में </span>CAA <span lang="hi" xml:lang="hi">विरोधी प्रदर्शनों के दौरान उत्तर-पूर्वी दिल्ली में सांप्रदायिक दंगे हुए थे। इन दंगों में 50 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई थी। पुलिस ने कई लोगों पर आरोप लगाया कि उन्होंने दंगों की साज़िश रची थी। उमर खालिद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरजील इमाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तसलीम अहमद और खालिद सैफी समेत कई लोग यूएपीए के तहत गिरफ्तार किए गए थे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने कोर्ट से कहा कि यूएपीए मामलों में जमानत के नियमों पर दोबारा विचार होना चाहिए। उन्होंने हाल के एक फ़ैसले पर सवाल उठाया। इससे पहले न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने नार्को-टेरर मामले में स्येद इफ्तिखार अंदरबी को जमानत देते हुए कहा था कि यूएपीए मामलों में भी </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">जमानत नियम है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जेल अपवाद</span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">। उन्होंने उमर खालिद वाले पुराने फ़ैसले पर संदेह जताया था।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एसजी राजू ने कहा कि यूएपीए जैसे गंभीर मामलों में सभी आरोपियों को एक जैसी छूट नहीं दी जा सकती है। हर मामले को अलग-अलग देखना चाहिए।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बहरहाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि के ए नजीब वाले पुराने फैसले में दिए गए सिद्धांतों को लेकर अब भ्रम है। खासकर यूएपीए की धारा 43</span>D(<span lang="hi" xml:lang="hi">5) यानी जमानत के सख्त नियम और अनुच्छेद 21 यानी जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह तय करना जरूरी है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ किया कि एक बेंच दूसरे बराबर की बेंच के फ़ैसले को आसानी से नहीं बदल सकती। क़ानून में स्पष्टता होनी चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए यह मुद्दा मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा जा रहा है ताकि बड़ी बेंच बने और अंतिम फैसला दे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तसलीम अहमद और खालिद सैफी को 6 महीने के लिए अंतरिम जमानत मिल गई है। दिल्ली हाईकोर्ट ने पहले इनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी। बता दें कि उमर खालिद और शरजील इमाम को अभी जमानत नहीं मिली है। उनका मामला अब बड़ी बेंच तय करेगी।जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी.बी. वराले की बेंच 2020 दिल्ली दंगे के दो आरोपियों- तसलीम अहमद और खालिद सैफी की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इससे पहले शुक्रवार को दिन में सुनवाई के दौरान आतंकवाद और </span>UAPA <span lang="hi" xml:lang="hi">मामलों में जमानत को लेकर मतभेद के बीच केंद्र सरकार ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट से कहा कि इस मुद्दे को बड़ी बेंच को भेज दिया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि अलग-अलग दो-जज की बेंचों के फैसले एक-दूसरे से उलट हैं। केंद्र सरकार ने सवाल उठाया कि क्या </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बेल नियम है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जेल अपवाद है</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">वाला सिद्धांत आतंकवाद जैसे गंभीर मामलों में भी लागू होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अगर ट्रायल में देरी हो रही हो</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">सरकार ने 26/11 मुंबई हमले के दोषी अजमल कसाब और लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिज सईद का उदाहरण दिया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू और वकील रजत नायर ने कोर्ट में कहा</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">अगर अजमल कसाब 7-8 साल जेल में रहने के बाद बेल मांगता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो क्या उसे बेल दे देते</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">सैकड़ों गवाह हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सबूत इकट्ठा करने में समय लगता है। इसी तरह अगर हाफिज सईद पाकिस्तान से आकर ट्रायल में 5 साल जेल में रह जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो क्या सिर्फ देरी के आधार पर उसे बेल दे देंगे</span>?' <span lang="hi" xml:lang="hi">सरकार का कहना है कि हर केस के तथ्यों को देखकर बेल देनी चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि सिर्फ जेल में कितना समय बीता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस आधार पर।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह फ़ैसला आने वाले समय में आतंकवाद और यूएपीए से जुड़े सभी जमानत मामलों पर असर डालेगा। सुप्रीम कोर्ट ने यूएपीए जमानत क़ानून को और साफ़ करने के लिए बड़े फ़ैसले की तैयारी कर ली है। दो आरोपियों को राहत मिल गई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उमर खालिद समेत बड़े सवाल अब बड़ी बेंच के सामने हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक अन्य मामले में  सीजेआई सूर्यकांत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने  अन्य बातों के अलावा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साढ़े चार साल से ज़्यादा समय तक हिरासत में रहने की बात पर ध्यान देते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट ने आज जम्मू-कश्मीर के </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बड़ी साज़िश</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">मामले में यूएपीए के आरोपी सुहैल अहमद ठोकर को ज़मानत दे दी।पीठ ने यह भी कहा कि अगर अपीलकर्ता चल रहे मुक़दमे में सहयोग करने में नाकाम रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो इसे दी गई राहत का दुरुपयोग माना जाएगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">खास बात यह है कि कोर्ट ने पहले समय-समय पर आदेश जारी किए थे ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि याचिकाकर्ता के खिलाफ गवाही देने वाले अहम/सुरक्षित गवाह बिना किसी डर के अपने बयान दर्ज करा सकें (याचिकाकर्ता की रिहाई से पहले)। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आज की सुनवाई के दौरान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एडिशनल सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने बताया कि हालांकि कुछ अहम/सुरक्षित गवाहों की जांच अभी बाकी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उनके बयान सह-आरोपी की भूमिका से जुड़े हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि याचिकाकर्ता से।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह देखते हुए कि कुछ सह-आरोपियों को ज़मानत मिल चुकी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कि मुक़दमे के पूरा होने में समय लग सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और हिरासत में पहले ही बिताई जा चुकी अवधि को ध्यान में रखते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने याचिकाकर्ता को ज़मानत दे दी। ज़मानत बांड संबंधित </span>NIA <span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत की संतुष्टि के अनुसार जमा करने का निर्देश दिया गया। उक्त अदालत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">याचिकाकर्ता की संबंधित पुलिस थाने में उपस्थिति सुनिश्चित करते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी मर्ज़ी के अनुसार शर्तें लगाएगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उनके वकील के अनुरोध पर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने याचिकाकर्ता को </span>NIA <span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत से वर्चुअली (सह-आरोपियों की तरह) पेश होने की अनुमति मांगने की भी छूट दी</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">इस अनुरोध पर अदालत द्वारा कानून के अनुसार विचार किया जाएगा। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यह </span><span lang="hi" xml:lang="hi"> बड़ी साज़िश का मास्टरमाइंड विभिन्न आतंकवादी संगठनों के बड़े नेता थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें लश्कर-ए-तैयबा (</span>LeT), <span lang="hi" xml:lang="hi">हिज़्ब-उल-मुजाहिदीन (</span>HM), <span lang="hi" xml:lang="hi">अल-बद्र और पाकिस्तान में मौजूद अन्य संगठन शामिल थे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">चार्जशीट में आगे आरोप लगाया गया है कि यह साज़िश अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के बाद रची गई थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका मकसद जम्मू-कश्मीर के साथ-साथ भारत के अन्य हिस्सों में भी आतंकवाद की घटनाओं को फिर से भड़काना था।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">राज्य एजेंसी के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आतंकवादी समूह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाकिस्तान में मौजूद अपने मददगारों और नेताओं के साथ-साथ भारत के भीतर मौजूद अपने ओवर-ग्राउंड वर्करों (</span>OGWs) <span lang="hi" xml:lang="hi">के सहयोग से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आसानी से प्रभावित होने वाले स्थानीय युवाओं को अपने प्रभाव में लेने और उन्हें कट्टरपंथी बनाने में शामिल थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि उन्हें आतंकवाद की घटनाओं में शामिल होने के लिए भर्ती और प्रशिक्षित किया जा सके।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">STF <span lang="hi" xml:lang="hi">ने बताया कि यह गैंग केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सचिवालय सुरक्षा बल और  ब राइफल्स की भर्ती परीक्षाओं में धांधली कर रहा था. आरोपियों ने ऑनलाइन परीक्षा सिस्टम को तकनीकी तरीके से प्रभावित कर उम्मीदवारों तक सही जवाब पहुंचाने की व्यवस्था बना रखी थी. बताया गया कि प्रत्येक उम्मीदवार से परीक्षा पास कराने के लिए करीब 4 लाख रुपये वसूले जाते थे.</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जांच में सामने आया कि आरोपियों ने सीधे </span>SSC <span lang="hi" xml:lang="hi">के सर्वर को हैक नहीं किया था. इसके बजाय परीक्षा केंद्र पर प्रॉक्सी सर्वर इंस्टॉल किया गया था. स्क्रीन शेयरिंग एप्लिकेशन के जरिए प्रश्नपत्र बाहर बैठे सॉल्वरों तक पहुंचाया जाता था. वहां से सवाल हल कर उम्मीदवारों को सही जवाब भेजे जाते थे.</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पुलिस ने बताया कि अरुण कुमार तकनीकी काम संभालता था और वही प्रॉक्सी सर्वर सिस्टम को ऑपरेट करता था. </span>STF <span lang="hi" xml:lang="hi">पूरे नेटवर्क की गहराई से जांच कर रही है. एजेंसियां यह भी पता लगाने में जुटी हैं कि क्या इसी तरीके का इस्तेमाल अन्य भर्ती परीक्षाओं में भी किया गया था.</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 23 May 2026 21:29:21 +0530</pubDate>
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                <title>गैंगस्टर से सिर्फ रिश्तेदारी के आधार पर संपत्ति जब्त नहीं: इलाहाबाद हाइकोर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाइकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि किसी व्यक्ति की संपत्ति केवल इस आधार पर जब्त नहीं की जा सकती कि वह किसी गैंगस्टर का रिश्तेदार है। अदालत ने स्पष्ट किया कि संपत्ति जब्ती के लिए अपराध और संपत्ति के बीच सीधा संबंध (नेक्सस) साबित होना जरूरी है। जस्टिस राज बीर सिंह की पीठ ने मंसूर अंसारी की अपील स्वीकार करते हुए उनकी संपत्ति जब्त करने का आदेश रद्द कर दिया। मंसूर अंसारी, कुख्यात गैंगस्टर मुख्तार अंसारी के चचेरे भाई हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">मामले में जिला मजिस्ट्रेट द्वारा मंसूर अंसारी की दुकानों और भवन को 'बेनेमी संपत्ति' बताते</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/173551/allahabad-high-court-will-not-confiscate-property-from-gangster-merely"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/allahabad-high-court2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाइकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि किसी व्यक्ति की संपत्ति केवल इस आधार पर जब्त नहीं की जा सकती कि वह किसी गैंगस्टर का रिश्तेदार है। अदालत ने स्पष्ट किया कि संपत्ति जब्ती के लिए अपराध और संपत्ति के बीच सीधा संबंध (नेक्सस) साबित होना जरूरी है। जस्टिस राज बीर सिंह की पीठ ने मंसूर अंसारी की अपील स्वीकार करते हुए उनकी संपत्ति जब्त करने का आदेश रद्द कर दिया। मंसूर अंसारी, कुख्यात गैंगस्टर मुख्तार अंसारी के चचेरे भाई हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">मामले में जिला मजिस्ट्रेट द्वारा मंसूर अंसारी की दुकानों और भवन को 'बेनेमी संपत्ति' बताते हुए जब्त किया गया, जिसे गाजीपुर के विशेष न्यायालय (गैंगस्टर एक्ट) ने भी सही ठहराया।</p>
<p style="text-align:justify;">हाइकोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश गैंगस्टर एवं असामाजिक क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम 1986 के तहत संपत्ति जब्त करने की शक्ति असीमित नहीं है। इसके लिए यह साबित करना आवश्यक है कि संबंधित व्यक्ति ने गैंग के सदस्य या संचालक के रूप में किसी अपराध से अर्जित धन से संपत्ति बनाई।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने कहा, “सिर्फ आरोप या संदेह के आधार पर संपत्ति जब्त नहीं की जा सकती। अपराध और संपत्ति के बीच स्पष्ट संबंध होना अनिवार्य है।” कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि विश्वास करने का कारण केवल शक या अंदाजे पर आधारित नहीं हो सकता बल्कि ठोस साक्ष्यों पर आधारित होना चाहिए। इस मामले में अदालत ने पाया कि राज्य ऐसा कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सका जिससे यह साबित हो कि संपत्ति अपराध से अर्जित धन से बनाई गई।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने यह भी कहा कि कानून के तहत यह जरूरी नहीं है कि संपत्ति वापस पाने के लिए व्यक्ति खुद अपनी आय का स्रोत साबित करे। पहले राज्य को यह सिद्ध करना होगा कि संपत्ति अपराध से जुड़ी है। सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि मंसूर अंसारी के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट के तहत कोई आपराधिक इतिहास नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">हाइकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल मुख्तार अंसारी का रिश्तेदार होने के आधार पर संपत्ति जब्त करना पूरी तरह गलत है। अदालत ने जिला मजिस्ट्रेट और स्पेशल कोर्ट के आदेशों को मनमाना और बिना आधार बताते हुए रद्द कर दिया और राज्य सरकार को तत्काल संपत्ति मुक्त करने का निर्देश दिया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 18 Mar 2026 21:06:23 +0530</pubDate>
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