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                <title>editorial hindi - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>रील बनाम रियल लाइफ </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">आज आपको अभिनेता आमिर खान का टीवी शो सत्यमेव जयते  याद दिलाते हैं जिसमें वह हिन्दू मान्यताओं को केंद्र में रखते हुए आलोचना कर अपना ज्ञान बांटते थे  और सामाजिक न्याय एवं विज्ञान की व्याख्या करते नहीं थकते। वहीं आमिर खान ने एक वालीबुड फिल्म पीके बनायी और इसके जरिए हिन्दू धर्म की आस्था और श्रद्धा पर काफी उल्टा सीधा मनमाना फिल्माया और देवी देवताओं का मजाक उड़ाया लेकिन सेकुलरिज्म के नाम पर बहुसंख्यकों के धर्म और आस्था पर चोट करने के कल्चर को पैदा करने वाली तत्कालीन सरकार और उसके अधीनस्थ सेंसर बोर्ड ने फिल्म पर</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182704/reel-vs-real-life"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/aamir-khan-325_073012084046.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज आपको अभिनेता आमिर खान का टीवी शो सत्यमेव जयते  याद दिलाते हैं जिसमें वह हिन्दू मान्यताओं को केंद्र में रखते हुए आलोचना कर अपना ज्ञान बांटते थे  और सामाजिक न्याय एवं विज्ञान की व्याख्या करते नहीं थकते। वहीं आमिर खान ने एक वालीबुड फिल्म पीके बनायी और इसके जरिए हिन्दू धर्म की आस्था और श्रद्धा पर काफी उल्टा सीधा मनमाना फिल्माया और देवी देवताओं का मजाक उड़ाया लेकिन सेकुलरिज्म के नाम पर बहुसंख्यकों के धर्म और आस्था पर चोट करने के कल्चर को पैदा करने वाली तत्कालीन सरकार और उसके अधीनस्थ सेंसर बोर्ड ने फिल्म पर आई आपत्तियों को दरकिनार कर फिल्म को प्रदर्शन की मंजूरी दी थी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दरअसल अक्सर आरोप लगाया गया है कि आमिर पूरी तरह तास्सुबी और जेहादी जहनियत वाला अभिनेता है। इसने हिन्दू मान्यताओं पर तो प्रहार किया मजाक उड़ाया अनाप शनाप फिल्मांकन किया लेकिन कभी अपने इस्लाम धर्म के सम्बन्ध में एक शब्द एक दृश्य एक कमेंट तक कभी नहीं किया। इस जैहादी ने सभी हिन्दू युवतियों से निकाह किया। और तलाक दे दिया। इन से पैदा बच्चों के मुस्लिम नाम रखकर मुसलिम मजहब दिया। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बॉलीवुड के ये स्वयंभू मिस्टर परफेक्शनिस्ट आमिर खान तीसरी बार अपना घर बसाने जा रहे हैं. 61 साल की उम्र में वो अपनी गर्लफ्रेंड गौरी स्प्रैट संग शादी करेंगे, जिनकी उनसे काफी पुरानी दोस्ती रही. आमिर और गौरी पिछले कुछ सालों से एक-दूसरे को डेट कर रहे थे, मगर अब उन्होंने एक होने का फैसला किया है. 5 जुलाई, संडे को उनकी अपने ही घर में रजिस्टर्ड मैरिज होगी. आमिर के मुताबिक, वो एक छोटा सा सेलिब्रेशन रखेंगे, जिसमें उनके करीबी दोस्त और परिवार वाले ही मौजूद रहेंगे.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बॉलीवुड अभिनेता आमिर खान ने अपनी पहली शादी साल 1986 में रीना दत्ता से की थी। इस शादी से उनके दो बच्चे- जुनैद खान और आइरा खान हैं। आपसी सहमति से साल 2002 में दोनों का तलाक हो गया था। उन्होंने साल 2005 में फिल्म निर्देशक किरण राव से दूसरी शादी की। इस जोड़े का एक बेटा, आजाद राव खान है। साल 2021 में दोनों ने तलाक ले लिया, लेकिन वे आज भी अच्छे दोस्त हैं।आमिर खान 5 जुलाई 2026 को अपनी पार्टनर गौरी स्प्रैट (गौरी खान) के साथ तीसरी शादी कर रहे है। यह एक बहुत ही सादा और निजी समारोह होगा , जिसमें उनके घर पर केवल करीबी परिवार और दोस्त ही शामिल होंगे। आमिर खान की होने वाली पार्टनर (और तीसरी पत्नी) गौरी स्प्रैट  किसी एक विशेष रूढ़िवादी धर्म को मानने के बजाय एक विविध सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से आती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उनका परिवार बहु-सांस्कृतिक (मल्टी-कल्चरल) है - उनकी मां तमिल मूल की हैं और पिता ब्रिटिश-आयरिश मूल के है। उनके दादा फिलिप स्प्रैट ब्रिटिश लेखक और भारत के स्वतंत्रता सेनानी थे, जो 1920 के दशक में भारत आए थे। गौरी स्प्रैट वर्तमान में 47 वर्ष की हैं, जिनका जन्म 21 अगस्त 1978 को बेंगलुरु, कर्नाटक में हुआ था। गौरी स्प्रैट के बारे में कुछ मुख्य जानकारी वह 61 वर्षीय अभिनेता आमिर खान से उम्र में 14 साल छोटी है. वह बेंगलुरु की एक उद्यमी  और फैशन-लाइफस्टाइल प्रोफेशनल है। पारिवारिक पृष्ठभूमि: उनकी मां तमिलियन और पिता आयरिश मूल के हैं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आमिर खान की तीसरी शादी को लेकर फैंस और फिल्म इंडस्ट्री में काफी उत्सुकता है.  मिली जानकारी के मुताबिक, सुपरस्टार की शादी में 150 के आसपास मेहमान होने की संभावना है. एक करीबी सूत्रों का कहना है, शादी में करीब 100 से 150 मेहमान शामिल होंगे. इसमें दोनों परिवारों के लोग, करीबी दोस्त और फिल्म इंडस्ट्री के कुछ खास लोग ही मौजूद रहेंगे. आमिर और गौरी ने खुद मेहमानों की लिस्ट तैयार की है और शादी के लंच का मेन्यू भी अपनी पसंद से चुना है.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सवाल फिर वही है कि आज तक आमिर खान उन मामलों पर क्यों नहीं बोलते जहां मुस्लिम पुरुष हिंदू महिलाओं को रिश्तों में फंसाने के लिए अपनी पहचान छुपाते हैं, जिससे जबरन धर्म परिवर्तन और धोखा होता है? साथ ही, वे अपने ही समुदाय के उन सदस्यों को सलाह क्यों नहीं देते जिन्होंने मुस्लिम लड़कियों से प्यार करने के लिए हिंदू लड़कों की हत्या कर दी ? बॉलीवुड अभिनेता आमिर खान  मुख्य रूप से उनके सामाजिक-राजनीतिक बयानों, फिल्मों में धार्मिक चित्रण, और उनकी व्यक्तिगत पसंदों को लेकर विवादास्पद रहें है। उन्हें अपने करियर में कई बार तीखी प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ा है।</div>
<div style="text-align:justify;">आपको याद दिला दें असहिष्णुता पर दिया गया बयान मुख्य विवाद का कारण बना था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">साल 2015 में आमिर खान ने देश में बढ़ती असहिष्णुता पर एक बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि उनकी तत्कालीन पत्नी किरण राव को बच्चों की सुरक्षा के लिए भारत में डर लगता है और उन्होंने देश छोड़ने तक का विचार किया था।आलोचना का कारण: इस बयान को बड़े पैमाने पर 'राष्ट्र-विरोधी' और देश की छवि खराब करने वाला माना गया। इसके बाद उन्हें अतुल्य भारत इंक्रडिबल इंडिया Incredible India के ब्रांड एंबेसडर पद से भी हटा दिया गया था। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसी तरह फिल्मों में धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के आरोप'पीके'  फिल्म विवाद की जनक बनी। साल 2014 में आई फिल्म 'पीके' में हिंदू देवी-देवताओं और धार्मिक कर्मकांडों के चित्रण को लेकर उनकी भारी आलोचना हुई। आलोचकों और कई संगठनों ने उन पर 'हिंदू विरोधी' होने और 'लव जिहाद' को बढ़ावा देने के आरोप लगाए।बैंक विज्ञापन विवाद: साल 2022 में एक निजी बैंक के विज्ञापन में शादी के बाद दूल्हे को दुल्हन के घर जाते हुए दिखाया गया था, जिसे पारंपरिक हिंदू रीति-रिवाजों के खिलाफ बताकर उनकी आलोचना की गई।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हाल ही में तुर्किए  के राष्ट्रपति और प्रथम महिला से मुलाकात कर अंतरराष्ट्रीय विवाद में भी आमिर खान का नाम जुड़ गया। साल 2020 में अपनी फिल्म की शूटिंग के दौरान आमिर खान ने तुर्किए (तुर्की) के राष्ट्रपति रेसेप तय्यिप एर्दोगन की पत्नी (प्रथम महिला) से मुलाकात की थी।आलोचना का कारण: तुर्किए द्वारा कश्मीर और अन्य भू-राजनीतिक मुद्दों पर भारत विरोधी और पाकिस्तान समर्थक रुख रखने के कारण, भारतीय नेटिजन्स ने आमिर की इस मुलाकात को असंवेदनशील माना और सोशल मीडिया पर उनकी फिल्मों के बहिष्कार की मांग की। राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों में भागीदारीनर्मदा बचाओ आंदोलन: साल 2006 में उन्होंने मेधा पाटकर के 'नर्मदा बचाओ आंदोलन' का समर्थन किया था, जो गुजरात में बांध निर्माण के खिलाफ था। इसके कारण गुजरात में उनकी फिल्म 'फना' का भारी विरोध और बहिष्कार हुआ था। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">फिल्म 'पीके' में, एक लालची पुजारी द्वारा दान पेटी से पैसे इकट्ठा करना, भगवान शिव के वेश में एक अभिनेता का डर के मारे भाग जाना, पत्थरों पर सिंदूर लगाकर लोगों को मूर्ख बनाना और हिंदू संतों को धोखेबाज के रूप में चित्रित करना, ये सभी दृश्य हिंदू धर्म को बदनाम करने वाले तरीके से दिखाए गए थे। यह दावा करना कि फिल्म 'पीके', जिसमें हिंदू धर्म की महानता को दर्शाने वाला एक भी दृश्य नहीं है, बल्कि धर्म का उपहास किया गया है, हिंदू विरोधी नहीं है, आमिर खान की बेईमानी और बेशर्मी का स्पष्ट उदाहरण है!</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">टीवी शो में ज्ञान बांटने और बड़ी वैचारिकी व्यक्त करने वाला व्यक्ति निजी जीवन में कितना अलग और स्वार्थी व नारी शोषक हो सकता है इसका अंदाजा लगा पाना कितना कठिन हो सकता है और रील लाइफ व रियल लाइफ का अन्तर इससे समझा जा सकता है। कहा गया है कि "हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी /जिसको भी देखना है कई बार देखिए। </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 04 Jul 2026 19:37:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>वसुधैव कुटुम्बकम भारत की वैश्विक धारणा और भावना</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">भारतीय संस्कृति का मूल दर्शन केवल अपने परिवार या राष्ट्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने संपूर्ण मानवता को एक परिवार मानने की उदात्त दृष्टि प्रदान की है। उपनिषदों का प्रसिद्ध वाक्य "वसुधैव कुटुम्बकम्" केवल एक आदर्श वाक्य नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन जीने की ऐसी शैली है जिसमें समस्त सृष्टि के प्रति आत्मीयता, करुणा, सह-अस्तित्व और समरसता का भाव निहित है। आज जब दुनिया स्वार्थ, हिंसा, युद्ध, आर्थिक असमानता और सामाजिक विघटन जैसी समस्याओं से जूझ रही है, तब यह भारतीय जीवन-दर्शन पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">मनुष्य की महानता उसके धन के परिमाण से नहीं,</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182700/global-perception-and-sentiment-of-vasudhaiva-kutumbakam-india"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/images.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारतीय संस्कृति का मूल दर्शन केवल अपने परिवार या राष्ट्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने संपूर्ण मानवता को एक परिवार मानने की उदात्त दृष्टि प्रदान की है। उपनिषदों का प्रसिद्ध वाक्य "वसुधैव कुटुम्बकम्" केवल एक आदर्श वाक्य नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन जीने की ऐसी शैली है जिसमें समस्त सृष्टि के प्रति आत्मीयता, करुणा, सह-अस्तित्व और समरसता का भाव निहित है। आज जब दुनिया स्वार्थ, हिंसा, युद्ध, आर्थिक असमानता और सामाजिक विघटन जैसी समस्याओं से जूझ रही है, तब यह भारतीय जीवन-दर्शन पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">मनुष्य की महानता उसके धन के परिमाण से नहीं, बल्कि उसके हृदय की विशालता से आँकी जाती है। किसी धनी व्यक्ति द्वारा अपनी विपुल संपत्ति का थोड़ा-सा भाग दान करना निश्चित रूप से प्रशंसनीय है, किंतु उससे कहीं अधिक महान वह व्यक्ति है, जिसके पास सीमित संसाधन होने के बावजूद वह अपनी आवश्यकताओं में कटौती कर किसी जरूरतमंद की सहायता करता है। यही वास्तविक परोपकार है। संत कबीर ने कहा है वृक्ष कबहुँ नहीं फल भखै, नदी न संचै नीर। परमारथ के कारने, साधुन धरा शरीर, अर्थात प्रकृति का प्रत्येक तत्व दूसरों के लिए जीना सिखाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">जियो और जीने दो का सिद्धांत तथा वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना जिस समाज में सशक्त होती है, उस समाज की प्रगति को कोई रोक नहीं सकता। ऐसे समाज में विश्वास, सहयोग, नैतिकता और संवेदनशीलता का वातावरण निर्मित होता है। महात्मा गांधी का कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है कि स्वयं को पाने का सर्वोत्तम तरीका है कि स्वयं को दूसरों की सेवा में खो दिया जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">मनुष्य का जीवन उत्साह, संघर्ष और निरंतर विकास की यात्रा है। जीवन में परिवर्तन स्वाभाविक है और विकास की संभावनाएँ भी परिवर्तन के साथ ही जन्म लेती हैं। जो व्यक्ति स्वयं के साथ-साथ समाज और मानवता के कल्याण के लिए जीता है, वही जीवन की वास्तविक सार्थकता को प्राप्त करता है। स्वामी विवेकानंद का यह प्रेरक संदेश प्रत्येक व्यक्ति के लिए मार्गदर्शक है— उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">शास्त्रों में पुनर्जन्म की अवधारणा का विस्तार से वर्णन मिलता है। अनेक लोग यह मानते हैं कि इस जन्म के शुभ कर्म अगले जन्म को श्रेष्ठ बनाते हैं। यह आस्था भारतीय अध्यात्म का महत्वपूर्ण पक्ष है। किंतु यदि दार्शनिक दृष्टि से विचार करें तो वर्तमान जीवन ही हमारे हाथ में उपलब्ध सबसे बड़ा सत्य है। भविष्य या अगले जन्म की कल्पनाओं में वर्तमान के कर्तव्यों की उपेक्षा करना उचित नहीं कहा जा सकता। इसलिए आवश्यक है कि हम इसी जीवन को उत्कृष्ट बनाएं, इसी जीवन में मानवता के लिए उपयोगी कार्य करें और समाज के लिए ऐसी विरासत छोड़ जाएँ, जो आने वाली पीढ़ियों का मार्ग आलोकित करे।</p>
<p style="text-align:justify;">जीवन के उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग-अलग हो सकते हैं। कोई आर्थिक समृद्धि चाहता है, कोई राजनीति में प्रतिष्ठा, कोई विज्ञान के क्षेत्र में उपलब्धि, कोई साहित्य, कला, संस्कृति, शिक्षा या व्यवसाय में उत्कृष्टता प्राप्त करना चाहता है। लक्ष्य चाहे जो भी हो, उसकी प्राप्ति के लिए अपनाए गए साधनों की शुद्धता ही व्यक्ति के चरित्र का वास्तविक परिचय देती है। महात्मा गांधी का यह विचार सदैव स्मरणीय है साध्य जितना पवित्र हो, साधन भी उतने ही पवित्र होने चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">मनुष्य को अपने जीवन में साहस, संयम, आत्मविश्वास, अनुशासन और तपस्या के साथ आगे बढ़ना चाहिए। असफलता से घबराने के स्थान पर उसे सीख के रूप में स्वीकार करना चाहिए। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम कहा करते थे कि सपने वे नहीं होते जो सोते समय आते हैं, सपने वे होते हैं जो आपको सोने नहीं देते। यही स्वप्न जब कठोर परिश्रम और सकारात्मक चिंतन से जुड़ते हैं, तब वे समाज के लिए प्रेरणा बन जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">मानवीय संवेदनाएँ ही मनुष्य को अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ बनाती हैं। यदि जीवन केवल व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं तक सीमित रह जाए तो उसकी सार्थकता अधूरी रह जाती है। सच्चा जीवन वही है जो अपने तन, मन और धन का कुछ अंश समाज के वंचित, पीड़ित और असहाय वर्ग के उत्थान के लिए समर्पित कर सके। गौतम बुद्ध ने कहा था— हजारों दीपक एक दीपक से जल सकते हैं, फिर भी उस दीपक का प्रकाश कम नहीं होता। ठीक उसी प्रकार दूसरों के जीवन में आशा का प्रकाश फैलाने से हमारा जीवन और अधिक प्रकाशित होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अनेक चिंतकों ने जीवन को रंगमंच की संज्ञा दी है। हम सभी विभिन्न भूमिकाएँ निभाते हुए अपने जीवन का अभिनय करते हैं। किंतु इन भूमिकाओं की सफलता हमारे पद, प्रतिष्ठा या वैभव से नहीं, बल्कि हमारी सच्चाई, ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और मानवीय व्यवहार से निर्धारित होती है। यही गुण व्यक्ति को समाज में स्थायी सम्मान दिलाते हैं। सफलता और असफलता जीवन के दो अविभाज्य पक्ष हैं। जो व्यक्ति सफलता में विनम्र और असफलता में धैर्यवान रहता है, वही वास्तव में परिपक्व व्यक्तित्व का स्वामी होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">लोभ, लालच, अहंकार और असीमित इच्छाएँ मनुष्य को भीतर से खोखला बना देती हैं, जबकि संतोष, संयम और नैतिकता उसे आत्मिक समृद्धि प्रदान करते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि आर्थिक उन्नति का प्रयास छोड़ दिया जाए। आवश्यकता इस बात की है कि आध्यात्मिक मूल्यों, सांस्कृतिक चेतना और आर्थिक प्रगति के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। यही संतुलित दृष्टिकोण एक स्वस्थ समाज का निर्माण करता है। जीवन का प्रत्येक क्षण परिवर्तनशील है। परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है। किंतु परिवर्तन का अर्थ भाग्यवाद नहीं है। भाग्य और कर्म दोनों समानांतर चलने वाली प्रक्रियाएँ हैं। भाग्य परिस्थितियाँ दे सकता है, परंतु कर्म उन परिस्थितियों का परिणाम बदलने की क्षमता रखता है।</p>
<p style="text-align:justify;">भगवद्गीता का प्रसिद्ध संदेश है कि कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन,आज भी मनुष्य को निष्काम कर्म की प्रेरणा देता है। जब व्यक्ति कर्म को अपना धर्म मान लेता है और परिणामों की अत्यधिक चिंता से मुक्त होकर कार्य करता है, तब उसके भीतर निराशा की संभावनाएँ स्वतः कम होने लगती हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्य अपनी व्यक्तिगत उपलब्धियों से आगे बढ़कर वैश्विक मानवता के हित में सोचने की आदत विकसित करे। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन का कुछ अंश समाज के लिए समर्पित कर दे, तो गरीबी, भेदभाव, हिंसा और असमानता जैसी अनेक समस्याओं का समाधान स्वतः संभव हो सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">यही "वसुधैव कुटुम्बकम्" का वास्तविक स्वरूप है— जहाँ समस्त मानवता एक परिवार है और प्रत्येक व्यक्ति दूसरे के सुख-दुःख में सहभागी है। जीवन की सफलता केवल लंबा जीवन जीने में नहीं, बल्कि उपयोगी जीवन जीने में है। यदि हमारा जीवन किसी एक व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान ला सके, किसी निराश मन में आशा जगा सके और समाज में सद्भाव, करुणा तथा मानवता के बीज बो सके, तभी हमारा जन्म सार्थक कहलाएगा। यही भारतीय संस्कृति का संदेश है, यही मानव जीवन का परम उद्देश्य है और यही "वसुधैव कुटुम्बकम्" की सच्ची साधना है।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 04 Jul 2026 19:28:42 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>एनसीईआरटी द्वारा पाठ्यक्रम में किये गये बदलाव के निहितार्थ</title>
                                    <description><![CDATA[<p>  </p>
<p><strong>डॉ.दीपकुमार शुक्ल (स्वतन्त्र पत्रकार)</strong></p>
<p>राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान और प्रशिक्षण परिषद् (एनसीईआरटी) ने 10वीं, 11वीं तथा 12वीं कक्षा के कुछ विषयों के पाठ्यक्रम में बदलाव किये हैं| जिसे लेकर पूरे देश में इस समय विवादात्मक बहस छिड़ी हुई है| इसे राजनीतिक रंग देने का भी प्रयास किया जा रहा है| जबकि एनसीईआरटी का दावा है कि पाठ्यक्रम को युक्तिसंगत बनाने के उद्देश्य से बीते वर्ष जून माह में अप्रासंगिक अंशों को हटाया गया था| नया पाठ्यक्रम 2023-24 के सत्र से पढ़ाया जायेगा| एनसीईआरटी के निदेशक प्रोफ़ेसर दिनेश कुमार सकलानी का कथन है कि पाठ्यक्रम में बदलाव एक सतत प्रक्रिया है| उनका</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/129111/implications-of-the-changes-made-by-ncert-in-the-syllabus"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-05/एनसीईआरटी-द्वारा-पाठ्यक्रम-में-किये-गये-बदलाव-के-निहितार्थ.jpg" alt=""></a><br /><p> </p>
<p><strong>डॉ.दीपकुमार शुक्ल (स्वतन्त्र पत्रकार)</strong></p>
<p>राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान और प्रशिक्षण परिषद् (एनसीईआरटी) ने 10वीं, 11वीं तथा 12वीं कक्षा के कुछ विषयों के पाठ्यक्रम में बदलाव किये हैं| जिसे लेकर पूरे देश में इस समय विवादात्मक बहस छिड़ी हुई है| इसे राजनीतिक रंग देने का भी प्रयास किया जा रहा है| जबकि एनसीईआरटी का दावा है कि पाठ्यक्रम को युक्तिसंगत बनाने के उद्देश्य से बीते वर्ष जून माह में अप्रासंगिक अंशों को हटाया गया था| नया पाठ्यक्रम 2023-24 के सत्र से पढ़ाया जायेगा| एनसीईआरटी के निदेशक प्रोफ़ेसर दिनेश कुमार सकलानी का कथन है कि पाठ्यक्रम में बदलाव एक सतत प्रक्रिया है| उनका कहना है कि कोरोना काल में छात्र तनाव में थे, इसलिए पहली प्राथमिकता उनका बोझ कम करना था| अतः पाठ्क्रम में 30 से 40 प्रतिशत कटौती करते हुए उन अंशों को हटाया गया है जो या तो दोहराव वाले थे या जिनके हटाने से कोई विशेष अन्तर नहीं पड़ना था| इसे खास नजरिये से देखना पूरी तरह गलत है|</p>
<p>यह सत्य है कि शिक्षा के पाठ्यक्रम में बदलाव पहली बार नहीं हुआ है| बल्कि यह एक सतत प्रक्रिया है| वैदिक काल से लेकर आधुनिक काल तक समय-समय पर शिक्षा के पाठ्यक्रम में बदलाव होता रहा है| परन्तु इसके उद्देश्य को भी स्पष्ट करना आवश्यक है| वर्तमान बदलाव को समाज का एक वर्ग बस्ते का बोझ कम करने की अपेक्षा संघ तथा भाजपा को चुभने वाली विषयवस्तु को हटाने के प्रयास के रूप में देख रहा है| इतिहास के पाठ्यक्रम से अकबरनामा (अकबर के शासनकाल का इतिहास), बादशाहनामा (शाहजहाँ के शासनकाल का इतिहास), मुग़ल शासक और उनके साम्राज्य, आदर्श राज्य, राजधानियाँ और दरबार, शाही नौकरशाही तथा मुग़ल अभिजात्य वर्ग आदि को हटाने की बात सामने आई है| इस सन्दर्भ में प्रोफ़ेसर दिनेश कुमार सकलानी का कथन है कि 12वीं कक्षा में मुग़ल काल के दो पाठ थे, एक में सिर्फ राजाओं का गुणगान था, जबकि दूसरे में उनके कामों की जानकारी थी| यहाँ पर गुणगान वाले अंश को हटाया गया है|</p>
<p>नागरिक शास्त्र की पाठ्यपुस्तक से ‘विश्व राजनीति में अमेरिकी आधिपत्य’ तथा ‘शीत युद्ध काल’ जैसे अध्यायों को हटाया गया है| 12वीं कक्षा के राजनीति शास्त्र के पाठ्यक्रम से ‘जन आन्दोलन का उदय’ तथा ‘एक दलीय प्रभुत्व का युग’ नामक चैप्टर हटाये गये हैं| इनमें कांग्रेस, सोशलिस्ट पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी तथा भारतीय जनसंघ के बारे में पढ़ाया जा रहा था| 12वीं कक्षा के ही राजनीति शास्त्र विषय से ‘महात्मा गाँधी की हत्या से देश में साम्प्रदायिक राजनीति पर प्रभाव पड़ा’ को भी पाठ्यक्रम से हटा दिया गया है| इसमें महात्मा गाँधी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर कुछ समय के लिए लगाये गये प्रतिबन्ध के बारे में जानकारी दी गयी थी| प्रोफेसर सकलानी के अनुसार पाठ्यक्रम में गाँधी जी को पर्याप्त जगह दी गयी है, कुछ अंशों को हटाने से गाँधी जी की विचारधारा खत्म नहीं होती है| 12वीं कक्षा के इतिहास के पाठ्यक्रम में नाथूराम गोडसे को महात्मा गाँधी की हत्या करने वाले ‘पुणे के ब्राह्मण’ के रूप में सन्दर्भित करने वाला अंश भी हटा दिया गया है| 11वीं कक्षा की समाजशास्त्र की पाठ्यपुस्तक से गुजरात दंगों से सम्बन्धित अंश हटाये गये हैं| 10वीं कक्षा की किताब से ‘लोकतन्त्र और विविधता’, ‘लोकप्रिय संघर्ष और आन्दोलन’ तथा ‘लोकतन्त्र की चुनौतियाँ’ जैसे पाठ हटा दिये गये हैं| इंटरमीडिएट की हिन्दी साहित्य की पुस्तक से प्रसिद्ध गजलकार रघुपति सहाय ‘फ़िराक गोरखपुरी’ की गजल, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ का गीत ‘गाने दो मुझे’ तथा विष्णु खरे की कविता ‘सत्य’ को हटाने पर साहित्यकारों के एक वर्ग ने कड़ी आपत्ति दर्ज करायी है| वहीँ कुछ साहित्यकारों ने बदलाव का समर्थन करते हुए पाठ्यक्रम में परिवर्तन को समय की मांग बताया है|</p>
<p>परिवर्तन समय की मांग है| परन्तु एक अंश को हटाकर उसके स्थान पर जोड़ा क्या गया है, यह अपने आप में अति महत्वपूर्ण है| किसी भी भाषा के पाठ्यक्रम में सम्मिलित रचनाओं के माध्यम से छात्रों को उस भाषा के साहित्य से जोड़ना ही मुख्य उद्देश्य होता है| परन्तु इसके लिए आवश्यक है कि उक्त रचना साहित्य के सभी मानकों को पूरा करती हो| ऐसे में प्रश्न उठता है कि उपरोक्त साहित्यकारों की रचनाओं में आज ऐसी क्या कमी देखी गयी जो उन्हें हटाने का निर्णय लेना पड़ा| क्या केवल तीन रचनाएँ ही बच्चों के बस्ते पर भारी पड़ रहीं थीं या फिर भविष्य में इनकी जगह किसी आधुनिक साहित्यकार को स्थान देने की यह एक सुनियोजित कोशिश है?</p>
<p>आजादी के बाद शैक्षिक पाठ्यक्रमों में हुए परिवर्तन के इतिहास पर यदि दृष्टि डालें तो राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान और प्रशिक्षण परिषद् (एनसीईआरटी) के सन 1961 में गठन के बाद लभगभ सभी सरकारों ने अपने-अपने तरह से पाठ्यक्रमों में बदलाव करने का प्रयास किया है| इन बदलावों के माध्यम से अपनी नीतियों तथा दृष्टिकोण को नयी पीढ़ी पर थोपना ही सरकारों का एकमात्र उद्देश्य रहा है| पश्चिमी सभ्यता से प्रेरित पाठ्यक्रमों तथा सम्प्रदाय को धर्म के पर्यायवाची शब्द के रूप में प्रस्तुत करके ‘धर्म निरपेक्षता’ जैसा नवीन शब्द युग्म इस तरह के परिवर्तन का उदाहरण है| एनडीए सरकार के समय में भी पाठ्यक्रम बदलने का प्रयास किया गया था| जिसे मार्क्सवादी प्रभाव को हटाने वाला बताया गया था| उसके बाद वर्ष 2005 में संप्रग सरकार ने एनडीए सरकार के समय हुए बदलावों को पूर्ववत करने का प्रयास किया था| प्राप्त जानकारी के मुताबिक 2017 के बाद एनसीईआरटी ने 182 पाठ्य पुस्तकों में बदलाव किये हैं| जो कि वर्तमान सरकार की नीतियों से मेल खाते हैं| स्वच्छ भारत, डिजिटल इण्डिया, जीएसटी, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ तथा नोटबन्दी जैसे विषय भी पाठ्यक्रम में सम्मिलित किये गये हैं| ताकि नई पीढ़ी को इन मुद्दों की स्पष्ट जानकारी मिल सके| इसके साथ ही भारत की परम्पराओं और प्रथाओं के ज्ञान, शिवाजी महाराज, सुभाष चन्द्र बोस, महाराणा प्रताप तथा स्वामी विवेकानन्द आदि को भी इतिहास के पाठ्यक्रम से जोड़ा गया है|</p>
<p>निश्चित ही इन महापुरुषों को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना समीचीन है| शिक्षा का उद्देश्य नई पीढ़ी को न केवल सही तथ्यों से अवगत कराना है बल्कि संस्कारवान बनाना भी है| अतः प्रत्येक वह विषय पाठ्यक्रम का हिस्सा होना चाहिए जो इस उद्देश्य की पूर्ति करता हो| लेकिन यह तभी सम्भव है जब हमारे नीति नियन्ता स्वार्थपूर्ण दलगत राजनीति से ऊपर उठकर विचार करें| इतिहास का ज्ञान तथ्यों पर आधारित होता है| दलगत राजनीति से प्रेरित होकर सही तथ्यों को छुपाना या अनावश्यक रूप से किसी शासक को महिमामंडित करना, किसी भी दृष्टि से इतिहास के साथ न्याय नहीं कहा जा सकता| मुसलिम शासकों द्वारा भारत पर अधिकार करना कन्नौज के राजा जयचन्द की देन है या संयोगिता के तथाकथित प्रणय निवेदन के बाद पृथ्वीराज चौहान द्वारा उसके अपहरण से उपजे प्रतिष्ठाजनित प्रतिशोध का परिणाम था? अकबर और महाराणा प्रताप के बीच हुआ युद्ध सत्ता विस्तार की लड़ाई थी या साम्प्रदायिक संघर्ष था? स्वतन्त्रता का इतिहास 1857 से ही प्रारम्भ होता है या उसके पूर्व भी अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने के अनगिनत प्रयासों में युवाओं का रक्त बहा है? ऐसे अनेक तथ्य हैं जिनकी वास्तिवकता से देश को दूर रखने का प्रयास किया गया है| आखिर क्यों? आज जब राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान और प्रशिक्षण परिषद् (एनसीईआरटी) नामक एक संस्था वास्तविक तथ्यों को नई पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए अधिकृत है तथा युवाओं को संस्कारवान बनाते हुए नये भारत का सृजन करने की क्षमता रखती है| तब फिर देश को उससे किस तरह की अपेक्षा रखनी चाहिए?   </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 07 May 2023 16:19:18 +0530</pubDate>
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