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                <title>muslim league - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>वंदे मातरम् पर विवाद: राष्ट्रगीत के सम्मान से बड़ी नहीं हो सकती राजनीत</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="gs"><div><div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div><div style="text-align:justify;">स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर देशभक्ति और राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि प्रत्येक भारतीय की सामूहिक जिम्मेदारी है। ऐसे समय में कांग्रेस मुख्यालय में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के गायन को लेकर उठे विवाद ने एक बार फिर राजनीति में राष्ट्रगीत की भूमिका, उसके सम्मान और दलों के पुराने रवैये पर बहस छेड़ दी है। 15 अगस्त को नई दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान वंदे मातरम् के गायन के समय सोनिया गांधी के कुछ हाव-भाव को लेकर भाजपा ने आपत्ति जताई। भाजपा नेताओं का आरोप है कि उन्होंने राष्ट्रगीत के गायन</div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/185453/controversy-over-vande-mataram-politics-cannot-be-bigger-than-respect"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/hindi-divas7.jpg" alt=""></a><br /><div class="gs"><div><div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div><div style="text-align:justify;">स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर देशभक्ति और राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि प्रत्येक भारतीय की सामूहिक जिम्मेदारी है। ऐसे समय में कांग्रेस मुख्यालय में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के गायन को लेकर उठे विवाद ने एक बार फिर राजनीति में राष्ट्रगीत की भूमिका, उसके सम्मान और दलों के पुराने रवैये पर बहस छेड़ दी है। 15 अगस्त को नई दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान वंदे मातरम् के गायन के समय सोनिया गांधी के कुछ हाव-भाव को लेकर भाजपा ने आपत्ति जताई। भाजपा नेताओं का आरोप है कि उन्होंने राष्ट्रगीत के गायन को रोकने का संकेत दिया। इस आरोप के आधार पर कर्नाटक के मंगलुरु में भाजपा नेता विकास पुत्तूर ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई और कार्रवाई नहीं होने पर कर्नाटक हाईकोर्ट जाने की चेतावनी दी है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यह मामला अभी आरोप और जांच के स्तर पर है। इसलिए किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना कानून की प्रक्रिया पूरी होने से पहले उचित नहीं होगा। कांग्रेस की ओर से इस पूरे आरोप को खारिज किया गया है। विवादित दृश्य को लेकर कांग्रेस का कहना है कि सोनिया गांधी मंच पर लंबे समय से खड़े कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के लिए कुर्सी लाने का संकेत दे रही थीं, न कि वंदे मातरम् रोकने का। दूसरी ओर भाजपा ने इसे राष्ट्रगीत के अपमान से जोड़ते हुए राजनीतिक और सार्वजनिक सवाल खड़े किए हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">लेकिन इस विवाद का एक बड़ा पक्ष केवल 15 अगस्त की घटना तक सीमित नहीं है। वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस और देश की राजनीति में बहस का इतिहास बहुत पुराना है। इसलिए आज जब राष्ट्रगीत के सम्मान को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप हो रहे हैं, तब यह समझना भी जरूरी है कि अतीत में कांग्रेस ने वंदे मातरम् के संबंध में क्या रुख अपनाया था।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">‘वंदे मातरम्’ भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से गहराई से जुड़ा हुआ गीत है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की रचना ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान देशवासियों में राष्ट्रीय चेतना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि समय के साथ इसके कुछ अंशों और धार्मिक संदर्भों को लेकर मुस्लिम लीग तथा कुछ मुस्लिम नेताओं ने आपत्ति जताई। 1930 के दशक में यह विषय कांग्रेस के सामने भी आया।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">1937 में मुस्लिम लीग ने वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस पर आपत्ति जताई थी। नेहरू अभिलेखागार में दर्ज दस्तावेजों के अनुसार, 17 अक्टूबर 1937 को मुस्लिम लीग ने कांग्रेस पर वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत के रूप में थोपने का आरोप लगाया था। इसके बाद कांग्रेस के भीतर भी इस विषय पर गंभीर चर्चा हुई।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">20 अक्टूबर 1937 को जवाहरलाल नेहरू ने सुभाषचंद्र बोस को लिखे पत्र में वंदे मातरम् की पृष्ठभूमि और उसके कुछ हिस्सों को लेकर चर्चा की। नेहरू ने लिखा कि गीत की ‘आनंदमठ’ वाली पृष्ठभूमि मुसलमानों को असहज कर सकती है। साथ ही उन्होंने यह भी लिखा कि वंदे मातरम् को लेकर पैदा हुआ विरोध काफी हद तक सांप्रदायिक तत्वों द्वारा निर्मित था। यानी इतिहास को केवल एक पक्ष से देखने के बजाय यह समझना जरूरी है कि उस समय कांग्रेस के भीतर भी गीत को लेकर गहन विचार-विमर्श हुआ था।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इसके बाद कांग्रेस कार्यसमिति ने वंदे मातरम् के इस्तेमाल पर विचार किया और 1937 में यह निर्णय सामने आया कि गीत के उन शुरुआती अंशों का इस्तेमाल किया जाए जिन पर व्यापक सहमति थी। नेहरू के अपने वक्तव्य से स्पष्ट है कि कांग्रेस ने इस विषय पर लंबे विचार-विमर्श के बाद निर्णय लिया था।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यहीं से आज की राजनीतिक बहस को एक ऐतिहासिक संदर्भ मिलता है। भाजपा इसे कांग्रेस की तुष्टीकरण की राजनीति का उदाहरण बताती है, जबकि कांग्रेस और उसके समर्थक इसे उस समय की सामाजिक और धार्मिक संवेदनशीलताओं को ध्यान में रखकर लिया गया निर्णय बताते हैं। इतिहास में दर्ज तथ्यों को देखते हुए यह कहना अधिक उचित है कि वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस के भीतर उस दौर में महत्वपूर्ण राजनीतिक और वैचारिक बहस हुई थी।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि वंदे मातरम् भारत का राष्ट्रगीत है, जबकि ‘जन गण मन’ राष्ट्रगान है। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि ‘जन गण मन’ राष्ट्रगान होगा और स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाले ‘वंदे मातरम्’ को भी समान सम्मान दिया जाएगा। इसलिए वंदे मातरम् को केवल एक राजनीतिक दल या विचारधारा से जोड़कर देखना उसके ऐतिहासिक महत्व को छोटा करना होगा।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">राष्ट्रगीत का सम्मान किसी सरकार, पार्टी या नेता की निजी संपत्ति नहीं है। यह स्वतंत्रता आंदोलन की उस विरासत का हिस्सा है जिसमें असंख्य लोगों ने देश की आजादी के लिए संघर्ष किया। यही कारण है कि इसके गायन के दौरान किसी भी प्रकार की अवमानना का आरोप गंभीरता से लिया जाना चाहिए। लेकिन उतना ही जरूरी यह भी है कि आरोप को प्रमाण मान लेने के बजाय निष्पक्ष जांच और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर निष्कर्ष निकाला जाए।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">भाजपा लंबे समय से कांग्रेस पर तुष्टीकरण और अल्पसंख्यक वोट बैंक की राजनीति के आरोप लगाती रही है। इसके समर्थन में वह कांग्रेस नेताओं के पुराने बयानों का भी उल्लेख करती है। उदाहरण के लिए 2010 में तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने ‘सैफ्रन टेररिज्म’ यानी ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द का इस्तेमाल किया था। इस बयान पर बड़ा राजनीतिक विवाद हुआ। कांग्रेस के तत्कालीन महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने बाद में कहा था कि आतंकवाद का कोई रंग नहीं होता और भगवा रंग को आतंकवाद से जोड़ना उचित नहीं है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">2013 में तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे के ‘हिंदू आतंकवाद’ संबंधी बयान पर भी विवाद हुआ। इसके बाद कांग्रेस ने स्वयं को उस शब्दावली से अलग करते हुए कहा था कि आतंकवाद को किसी धर्म से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इन घटनाओं से यह जरूर स्पष्ट होता है कि कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं के बयान समय-समय पर बड़े राजनीतिक विवादों का कारण बने हैं। हालांकि किसी नेता के बयान को पूरे दल की आधिकारिक विचारधारा मान लेना भी उचित नहीं है। राजनीति में बयान आते हैं, उन पर विवाद होता है और कई बार स्वयं दल को सफाई भी देनी पड़ती है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">वंदे मातरम् पर वर्तमान विवाद का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि राष्ट्रीय प्रतीकों को राजनीतिक संघर्ष का हथियार बनाने की प्रवृत्ति कब समाप्त होगी। भाजपा कांग्रेस पर राष्ट्रगीत के प्रति असम्मान का आरोप लगा रही है, जबकि कांग्रेस भाजपा पर राष्ट्रवाद के नाम पर राजनीतिक मुद्दा बनाने का आरोप लगा रही है। दोनों दलों की अपनी राजनीतिक दलीलें हैं, लेकिन आम नागरिक के लिए इससे बड़ा प्रश्न राष्ट्रीय सम्मान का है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">सोनिया गांधी के मामले में भी यदि कोई आपत्तिजनक व्यवहार हुआ है तो उसकी जांच होनी चाहिए और यदि आरोप गलत हैं तो यह भी स्पष्ट रूप से सामने आना चाहिए। लोकतंत्र में न तो किसी नेता को केवल पद के कारण कानून से ऊपर माना जा सकता है और न ही किसी राजनीतिक विरोधी पर बिना प्रमाण आरोप को अंतिम सत्य माना जा सकता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">देशभक्ति किसी दल की बपौती नहीं है।कांग्रेस हो या भाजपा, कोई भी राजनीतिक दल देशभक्ति का प्रमाणपत्र जारी करने का अधिकार नहीं रखता। भारत की आजादी किसी एक परिवार, पार्टी या संगठन की देन नहीं है। करोड़ों भारतीयों के संघर्ष, बलिदान और त्याग से देश स्वतंत्र हुआ। इसलिए ‘हमने देश आजाद कराया’ जैसी राजनीतिक मानसिकता से ऊपर उठना जरूरी है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस की ऐतिहासिक भूमिका पर सवाल उठाए जा सकते हैं। 1937 के निर्णयों और उसके पीछे की परिस्थितियों पर राजनीतिक बहस भी हो सकती है। कांग्रेस नेताओं के विवादित बयानों की आलोचना भी लोकतंत्र में स्वाभाविक है। लेकिन इस बहस का अंतिम उद्देश्य किसी दल को देशद्रोही साबित करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि राष्ट्रगीत, राष्ट्रगान और राष्ट्रीय ध्वज जैसे प्रतीकों का सम्मान राजनीतिक मतभेदों से ऊपर रहे।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">आज जरूरत इस बात की है कि वंदे मातरम् को लेकर आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति से आगे बढ़कर देश की नई पीढ़ी को उसके इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन में उसके योगदान के बारे में बताया जाए। जो गीत स्वतंत्रता सेनानियों के भीतर राष्ट्रभावना जगाता रहा, उसके सम्मान में किसी भी प्रकार की कमी देश के लोकतांत्रिक संस्कारों के लिए उचित नहीं हो सकती। लेकिन सम्मान के साथ न्याय और तथ्य भी जरूरी हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">सोनिया गांधी के खिलाफ दर्ज शिकायत अब जांच का विषय है। पुलिस और जरूरत पड़ने पर न्यायपालिका यह तय करेगी कि लगाए गए आरोपों में कितना तथ्य है। राजनीतिक दल अपनी-अपनी व्याख्या करते रहेंगे, लेकिन राष्ट्रगीत किसी दल का नहीं, पूरे राष्ट्र का है। इसलिए वंदे मातरम् का सम्मान राजनीतिक विवाद का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना और लोकतांत्रिक मर्यादा का विषय होना चाहिए।</div><div style="text-align:justify;">        *कांतिलाल मांडोत*</div><div class="yj6qo" style="text-align:justify;"><br /></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div></div></div></div><div class="WhmR8e"></div></div></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 17 Aug 2026 20:08:40 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>वंदे मातरम पर चर्चा : सवाल नीति और नीयत का</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">भारतीय संसद में शीतकालीन सत्र 2025 के दौरान "वंदे मातरम" की 150वीं वर्षगांठ मनाने के लिए एक विशेष चर्चा आयोजित की गयी। ग़ौर तलब है कि संस्कृत और बांग्ला भाषा के मिश्रण से तैयार किया गया यह गीत पहली बार 1882 में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित उनकी बांग्ला उपन्यास आनंदमठ में प्रकाशित हुआ था। 24 जनवरी 1950 को भारत की संविधान सभा ने  इसी गीत अर्थात "वन्दे मातरम्" को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया। आज देश में इस गीत को भी राष्ट्रगान अर्थात  "जन गण मन" के ही समकक्ष सम्मान प्राप्त है। सभी सरकारी और आधिकारिक कार्यक्रमों में जब इसे</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/163141/discussion-on-vande-mataram-is-a-question-of-policy-and"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-12/vande-matram.2.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">भारतीय संसद में शीतकालीन सत्र 2025 के दौरान "वंदे मातरम" की 150वीं वर्षगांठ मनाने के लिए एक विशेष चर्चा आयोजित की गयी। ग़ौर तलब है कि संस्कृत और बांग्ला भाषा के मिश्रण से तैयार किया गया यह गीत पहली बार 1882 में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित उनकी बांग्ला उपन्यास आनंदमठ में प्रकाशित हुआ था। 24 जनवरी 1950 को भारत की संविधान सभा ने  इसी गीत अर्थात "वन्दे मातरम्" को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया। आज देश में इस गीत को भी राष्ट्रगान अर्थात  "जन गण मन" के ही समकक्ष सम्मान प्राप्त है। सभी सरकारी और आधिकारिक कार्यक्रमों में जब इसे गाया या बजाया जाता है, तो सभी लोग इसके सम्मान में खड़े होते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">परन्तु हमारे देश में मुस्लिम उलेमा का एक वर्ग ऐसा है जिनका मानना है कि धरती-माँ को इस तरह देवी के रूप में पूजना और उसके सामने सजदा करना इस्लाम विरोधी (शिर्क ) है। और अल्लाह के सिवा किसी को सजदा करना हराम है। इस विचारधारा का प्रतिनिधित्व ख़ासतौर पर देवबंदी अथवा जमाअत-ए-इस्लामी से सम्बंधित अतिवादी वर्ग के लोग ही करते हैं। जबकि अधिकांश मुस्लिम राष्ट्रप्रेम का हिस्सा मानते हुये इसे गाते भी हैं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> परन्तु राष्ट्रगान "जन गण मन" का विरोध करने वाले हिंदूवादी विचारधारा से जुड़े लोग ख़ासकर संघ व भाजपा वंदे मातरम को लेकर कांग्रेस पार्टी पर मुस्लिम परस्त होने का इलज़ाम लगाती रहती है। यही कोशिश गत दिनों संसद में "वंदे मातरम" पर चर्चा के दौरान देखने को भी मिली। ख़ासकर इस चर्चा का ऐसे समय में होना जबकि अगले वर्ष बंगाल में चुनाव भी प्रस्तावित हैं, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिशों की तरफ़ इशारा करता है। कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने लोकसभा में "वंदे मातरम" पर बहस के दौरान सरकार पर तीखा प्रहार करते हुये यह कहा भी कि राष्ट्रगान पर बहस की कोई ज़रूरत नहीं क्योंकि यह पहले से ही राष्ट्रगान है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रियंका गांधी ने भी यही दावा किया कि यह चर्चा बंगाल चुनावों को ध्यान में रखकर जनता के मुद्दों से  ध्यान भटकाने का प्रयास है। उन्होंने "वंदे मातरम" को भारत की आत्मा का हिस्सा बताया, जो ग़ुलामी से जागरण का प्रतीक है और आधुनिक राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति है। उल्टे प्रियंका गांधी ने संविधान सभा में दो छंद अपनाने पर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विरोध न करने का ही सवाल उठा कर भाजपा को ही घेरने की कोशिश की। राजयसभा में नेता विपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी सत्ता से सवाल किया कि जब भाजपा के पुरखे श्यामा प्रसाद मुखर्जी, मुस्लिम लीग के साथ बंगाल में सरकार चला रहे थे, तब आपकी देशभक्ति कहां थी? </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> बहरहाल, इसी तरह के मुद्दों को उठाकर कांग्रेस को मुस्लिम परस्त बताने व हमेशा ही कांग्रेस पर तुष्टीकरण की राजनीति करने का आरोप लगाने वाली भाजपा को कम से कम देश को एक बात यह भी बतानी चाहिये कि जिस दारुल उलूम देवबंद व जमाअत-ए-इस्लामी ने वंदे मातरम का विरोध किया था, जिस जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने 1937-39 में जारी अपने फ़तवे में वंदे मातरम को गाना 'हराम' बताया था। उसी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करने वाली अफ़ग़ानिस्तान की तालिबान सरकार से तो भारत बेहतर रिश्ते बनाने की तरफ़ आगे बढ़ रहा है ? गत अक्टूबर माह में ही  अफ़ग़ानिस्तान के कार्यवाहक विदेश मंत्री मौलवी आमिर ख़ान मुत्तक़ी ने भारत का छह-दिवसीय दौरा किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस दौरे के दौरान मुत्तक़ी ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाक़ात की, जिसमें द्विपक्षीय व्यापार, मानवीय सहायता, शिक्षा और आर्थिक सहयोग पर चर्चा हुई। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनुमति से संभव यह यात्रा भारत- अफ़ग़ानिस्तान संबंधों को मज़बूत करने का संकेत मानी गई। मुत्तक़ी ने अपने भारत प्रवास के दौरान केवल राजकीय यात्रा मात्र ही नहीं की बल्कि इस दौरान उन्होंने 11 अक्टूबर 2025 को उत्तर प्रदेश के सहारनपुर ज़िले में स्थित दारुल उलूम देवबंद अर्थात अपने 'वैचारिक प्रेरणा केंद्र' का भी दौरा किया। यह वही दारुल उलूम देवबंद तो है जिसने वंदे मातरम के एक हिस्से को गाने का विरोध किया था ? </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मुत्तक़ी ने अपने भारत दौरे के बीच दारुल उलूम देवबंद पहुंचकर व देवबंदी मसलक से जुड़े दारुल उलूम के उलेमा, छात्रों और अफ़ग़ान छात्रों से मिकर केवल अपनी अतिवादी वैचारिक प्रतिबद्धता ही नहीं दोहराई बल्कि उन्होंने दिल्ली में ही आयोजित अपनी पहली प्रेस कॉन्फ़्रेंस में महिलाओं को प्रवेश न देकर भी यह साबित कर दिया कि महिलाओं के प्रति इस सोच विचार के लोग कितनी असहिष्णुता का भाव रखते हैं। परन्तु आश्चर्य है कि भाजपा सरकार वंदे मातरम गायन का विरोध करने व इसे हराम बताने वाली विचारधारा व इसके रहनुमाओं को तो गले से लगाती है। इनके स्वागत में लाल क़ालीन बिछाती है परन्तु कांग्रेस पर वंदे मातरम विरोधी होने का आरोप मढ़ती है ? परन्तु जब कांग्रेस संविधान सभा में इस गीत के दो छंद अपनाने पर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विरोध न करने का सवाल उठाती है तो भाजपा बग़लें झाँकने लगती है ?</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज देश बेरोज़गारी व मंहगाई से बुरी तरह जूझ रहा है। डॉलर के मुक़ाबले रूपये की क़ीमत रसातल तक पहुँच गयी है। 2012-13 के मध्य जब डॉलर के मुक़ाबले भारतीय रुपये की कीमत 60-68 के बीच लुढ़क रही थी। उस समय नरेंद्र मोदी ने यूपीए सरकार पर कड़ा प्रहार करते हुये कहा था कि "हमारी मुद्रा मृत्युशैया पर है, यह टर्मिनल स्टेज पर है और इसे तुरंत डॉक्टर की ज़रूरत है"। उसी समय मोदी ने ज़ोर देकर यह भी कहा था कि रुपये की गिरावट से प्रधानमंत्री की इज़्ज़त गिरती है, क्योंकि रुपया केवल काग़ज़ का टुकड़ा नहीं, बल्कि देश की प्रतिष्ठा से जुड़ा होता है। उस समय मोदी ने इसे तत्कालीन यू पी ए सरकार की आर्थिक नाकामी क़रार दिया था। परन्तु आज तो 1 डॉलर के मुक़ाबले भारतीय मुद्रा 90 के क़रीब पहुँच चुकी है। आज देश की संसद में इसपर चर्चा क्यों नहीं होती ? </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दरअसल मोदी सरकार ने अपनी पूरी ताक़त देश का साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण करने में झोंक रखी है। ख़ासकर चुनावों के समय ऐसी कोशिशों में और भी तेज़ी आ जाती है। बड़ा आश्चर्य है कि स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर राष्ट्रगान तक का विरोध करने वाले,गांधी की हत्या पर जश्न मनाने व मिठाइयां बांटने वाले,भारतीय संविधान को न पचा पाने वाले लोग आज सत्ता में आने के बाद बड़े ही शातिर तरीक़े से स्वयं को महान देशभक्त व धर्म के 'अभिरक्षक ' बनने की कोशिश कर रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">और देश के स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका निभाते हुये फांसी के फंदे पर झूलने व अंग्रेज़ों की यातनायें झेलने वाली कांग्रेस को वंदे मातरम विरोधी तो कभी मुस्लिम परस्त तो कभी पाक परस्त बातकर मुद्रा पतन से लेकर मंहगाई बेरोज़गारी जैसे मूल मुद्दों से ध्यान भटकने की कोशिश करती रहती है। गत दिनों संसद में वंदे मातरम पर हुई चर्चा भी जनहितकारी मुद्दों से ध्यान भटकने की ऐसी ही एक कोशिश थी जिसमें वंदे मातरम को लेकर भाजपा की नीति और नीयत का अंतर साफ़ नज़र आया।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Wed, 10 Dec 2025 17:06:03 +0530</pubDate>
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