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                <title>vande matram - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>vande matram RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>Vande Mataram New Guideline: विवादित पंक्तियां जो पहले हटाई गई थीं, अब फिर जोड़ी गईं</title>
                                    <description><![CDATA[<h3>  </h3>
<p>केंद्र सरकार ने देश के राष्ट्रगीत <strong>‘वंदे मातरम्’</strong> को लेकर नई गाइडलाइन जारी की है। नए निर्देशों के अनुसार अब सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों और सार्वजनिक आयोजनों में <strong>वंदे मातरम् के सभी छह अंतरे</strong> गाए जाएंगे। इसकी कुल अवधि लगभग <strong>3 मिनट 10 सेकंड</strong> होगी।</p>
<p>अब तक केवल इसके <strong>पहले दो अंतरे</strong> ही गाए जाते थे, क्योंकि बाकी हिस्सों को लेकर आज़ादी से पहले विवाद हुआ था।</p>
<p>  </p>
<p><img src="https://images.tv9hindi.com/wp-content/uploads/2025/12/bankim-chandra-chattopadhyay.webp" alt="Bankim Chandra Chattopadhyay" /></p>
<p style="text-align:center;"><strong>बंकिम चंद्र चटर्जी (फाइल फोटो)</strong></p>
<hr />
<h2>🔹 पहले क्यों हटाए गए थे बाकी अंतरे?</h2>
<p>बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित वंदे मातरम् (1870) को उपन्यास <strong>‘आनंदमठ’</strong> में शामिल किया गया था। यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन के</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/169184/vande-mataram-new-guideline-disputed-lines-which-were-removed-earlier"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/vande-matram.jpg" alt=""></a><br /><h3> </h3>
<p>केंद्र सरकार ने देश के राष्ट्रगीत <strong>‘वंदे मातरम्’</strong> को लेकर नई गाइडलाइन जारी की है। नए निर्देशों के अनुसार अब सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों और सार्वजनिक आयोजनों में <strong>वंदे मातरम् के सभी छह अंतरे</strong> गाए जाएंगे। इसकी कुल अवधि लगभग <strong>3 मिनट 10 सेकंड</strong> होगी।</p>
<p>अब तक केवल इसके <strong>पहले दो अंतरे</strong> ही गाए जाते थे, क्योंकि बाकी हिस्सों को लेकर आज़ादी से पहले विवाद हुआ था।</p>
<p> </p>
<p><img src="https://images.tv9hindi.com/wp-content/uploads/2025/12/bankim-chandra-chattopadhyay.webp" alt="Bankim Chandra Chattopadhyay"></img></p>
<p style="text-align:center;"><strong>बंकिम चंद्र चटर्जी (फाइल फोटो)</strong></p>
<hr />
<h2>🔹 पहले क्यों हटाए गए थे बाकी अंतरे?</h2>
<p>बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित वंदे मातरम् (1870) को उपन्यास <strong>‘आनंदमठ’</strong> में शामिल किया गया था। यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लोकप्रिय हुआ।</p>
<p>लेकिन इसके कुछ अंतरों में <strong>भारत को देवी दुर्गा के रूप में प्रस्तुत किया गया</strong>, जिससे विवाद पैदा हुआ।</p>
<p>मुस्लिम नेताओं का कहना था कि—</p>
<ul>
<li>
<p>गीत में देवी-पूजा का उल्लेख है</p>
</li>
<li>
<p>यह इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ है</p>
</li>
<li>
<p>देश को दुर्गा के रूप में दिखाया गया है</p>
</li>
</ul>
<p>इसी वजह से इसका विरोध शुरू हुआ।</p>
<hr />
<h2>🔹 कौन-सी पंक्तियां बनी थीं विवाद की वजह?</h2>
<p>विवादित हिस्सों में ये पंक्तियां शामिल थीं:</p>
<blockquote>
<p>"बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीम्,<br />रिपुदलवारिणीं मातरम्…"</p>
</blockquote>
<blockquote>
<p>"तुमि विद्या तुमि धर्म…<br />तोमारेई प्रतिमा गड़ि मन्दिरे-मन्दिरे…"</p>
</blockquote>
<blockquote>
<p>"त्वम् हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी…"</p>
</blockquote>
<p>इन पंक्तियों में मातृभूमि को दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसी देवियों से जोड़ा गया है।</p>
<p><img src="https://images.tv9hindi.com/wp-content/uploads/2026/02/vande-matram-full-version.jpeg" alt="Vande Matram Full Version"></img></p>
<hr />
<h2>🔹 1937 की कमेटी ने क्या फैसला किया था?</h2>
<p>विवाद बढ़ने पर कांग्रेस ने 1937 में एक समिति बनाई, जिसमें शामिल थे—</p>
<ul>
<li>
<p>रवींद्रनाथ टैगोर</p>
</li>
<li>
<p>सुभाष चंद्र बोस</p>
</li>
<li>
<p>मौलाना आज़ाद</p>
</li>
<li>
<p>जवाहरलाल नेहरू</p>
</li>
</ul>
<h3>समिति का निष्कर्ष:</h3>
<ul>
<li>
<p>पहले दो अंतरे देशभक्ति और मातृभूमि की प्रशंसा पर आधारित हैं</p>
</li>
<li>
<p>बाद के अंतरे धार्मिक प्रतीकों से जुड़े हैं</p>
</li>
</ul>
<p>👉 इसलिए तय किया गया कि <strong>सिर्फ पहले दो अंतरे ही राष्ट्रगीत के रूप में गाए जाएंगे।</strong></p>
<hr />
<h2>🔹 आज़ादी के बाद क्या हुआ?</h2>
<p>इसके बावजूद मुस्लिम लीग संतुष्ट नहीं हुई। मोहम्मद अली जिन्ना ने 1938 में इसे पूरी तरह हटाने की मांग की थी।</p>
<p>लेकिन—</p>
<p>📌 <strong>24 जनवरी 1950</strong> को<br />राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा में वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार करने की घोषणा की।</p>
<p>तब से इसके पहले दो अंतरे ही प्रचलन में रहे।</p>
<hr />
<h2>🔹 नई गाइडलाइन में क्या बदला?</h2>
<p>नई सरकारी गाइडलाइन के अनुसार—</p>
<p>✅ अब सभी 6 अंतरे गाए जाएंगे<br />✅ यदि ‘जन गण मन’ और ‘वंदे मातरम्’ दोनों हों, तो पहले वंदे मातरम् होगा<br />✅ स्कूलों और सरकारी कार्यक्रमों में अनिवार्य प्रस्तुति होगी</p>
<p>इस तरह, वर्षों बाद पहले हटाए गए अंतरों को फिर से आधिकारिक मान्यता दी गई है।</p>
<hr />
<h2>🔹 क्यों है यह फैसला अहम?</h2>
<ul>
<li>
<p>यह फैसला सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करता है</p>
</li>
<li>
<p>ऐतिहासिक विवाद पर नया दृष्टिकोण दिखाता है</p>
</li>
<li>
<p>राष्ट्रगीत को उसके मूल स्वरूप में प्रस्तुत करता है</p>
</li>
</ul>
<p>हालांकि, इसे लेकर आगे राजनीतिक और सामाजिक बहस भी संभव है।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 11 Feb 2026 17:02:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वंदे मातरम पर चर्चा : सवाल नीति और नीयत का</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">भारतीय संसद में शीतकालीन सत्र 2025 के दौरान "वंदे मातरम" की 150वीं वर्षगांठ मनाने के लिए एक विशेष चर्चा आयोजित की गयी। ग़ौर तलब है कि संस्कृत और बांग्ला भाषा के मिश्रण से तैयार किया गया यह गीत पहली बार 1882 में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित उनकी बांग्ला उपन्यास आनंदमठ में प्रकाशित हुआ था। 24 जनवरी 1950 को भारत की संविधान सभा ने  इसी गीत अर्थात "वन्दे मातरम्" को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया। आज देश में इस गीत को भी राष्ट्रगान अर्थात  "जन गण मन" के ही समकक्ष सम्मान प्राप्त है। सभी सरकारी और आधिकारिक कार्यक्रमों में जब इसे</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/163141/discussion-on-vande-mataram-is-a-question-of-policy-and"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-12/vande-matram.2.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">भारतीय संसद में शीतकालीन सत्र 2025 के दौरान "वंदे मातरम" की 150वीं वर्षगांठ मनाने के लिए एक विशेष चर्चा आयोजित की गयी। ग़ौर तलब है कि संस्कृत और बांग्ला भाषा के मिश्रण से तैयार किया गया यह गीत पहली बार 1882 में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित उनकी बांग्ला उपन्यास आनंदमठ में प्रकाशित हुआ था। 24 जनवरी 1950 को भारत की संविधान सभा ने  इसी गीत अर्थात "वन्दे मातरम्" को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया। आज देश में इस गीत को भी राष्ट्रगान अर्थात  "जन गण मन" के ही समकक्ष सम्मान प्राप्त है। सभी सरकारी और आधिकारिक कार्यक्रमों में जब इसे गाया या बजाया जाता है, तो सभी लोग इसके सम्मान में खड़े होते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">परन्तु हमारे देश में मुस्लिम उलेमा का एक वर्ग ऐसा है जिनका मानना है कि धरती-माँ को इस तरह देवी के रूप में पूजना और उसके सामने सजदा करना इस्लाम विरोधी (शिर्क ) है। और अल्लाह के सिवा किसी को सजदा करना हराम है। इस विचारधारा का प्रतिनिधित्व ख़ासतौर पर देवबंदी अथवा जमाअत-ए-इस्लामी से सम्बंधित अतिवादी वर्ग के लोग ही करते हैं। जबकि अधिकांश मुस्लिम राष्ट्रप्रेम का हिस्सा मानते हुये इसे गाते भी हैं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> परन्तु राष्ट्रगान "जन गण मन" का विरोध करने वाले हिंदूवादी विचारधारा से जुड़े लोग ख़ासकर संघ व भाजपा वंदे मातरम को लेकर कांग्रेस पार्टी पर मुस्लिम परस्त होने का इलज़ाम लगाती रहती है। यही कोशिश गत दिनों संसद में "वंदे मातरम" पर चर्चा के दौरान देखने को भी मिली। ख़ासकर इस चर्चा का ऐसे समय में होना जबकि अगले वर्ष बंगाल में चुनाव भी प्रस्तावित हैं, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिशों की तरफ़ इशारा करता है। कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने लोकसभा में "वंदे मातरम" पर बहस के दौरान सरकार पर तीखा प्रहार करते हुये यह कहा भी कि राष्ट्रगान पर बहस की कोई ज़रूरत नहीं क्योंकि यह पहले से ही राष्ट्रगान है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रियंका गांधी ने भी यही दावा किया कि यह चर्चा बंगाल चुनावों को ध्यान में रखकर जनता के मुद्दों से  ध्यान भटकाने का प्रयास है। उन्होंने "वंदे मातरम" को भारत की आत्मा का हिस्सा बताया, जो ग़ुलामी से जागरण का प्रतीक है और आधुनिक राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति है। उल्टे प्रियंका गांधी ने संविधान सभा में दो छंद अपनाने पर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विरोध न करने का ही सवाल उठा कर भाजपा को ही घेरने की कोशिश की। राजयसभा में नेता विपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी सत्ता से सवाल किया कि जब भाजपा के पुरखे श्यामा प्रसाद मुखर्जी, मुस्लिम लीग के साथ बंगाल में सरकार चला रहे थे, तब आपकी देशभक्ति कहां थी? </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> बहरहाल, इसी तरह के मुद्दों को उठाकर कांग्रेस को मुस्लिम परस्त बताने व हमेशा ही कांग्रेस पर तुष्टीकरण की राजनीति करने का आरोप लगाने वाली भाजपा को कम से कम देश को एक बात यह भी बतानी चाहिये कि जिस दारुल उलूम देवबंद व जमाअत-ए-इस्लामी ने वंदे मातरम का विरोध किया था, जिस जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने 1937-39 में जारी अपने फ़तवे में वंदे मातरम को गाना 'हराम' बताया था। उसी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करने वाली अफ़ग़ानिस्तान की तालिबान सरकार से तो भारत बेहतर रिश्ते बनाने की तरफ़ आगे बढ़ रहा है ? गत अक्टूबर माह में ही  अफ़ग़ानिस्तान के कार्यवाहक विदेश मंत्री मौलवी आमिर ख़ान मुत्तक़ी ने भारत का छह-दिवसीय दौरा किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस दौरे के दौरान मुत्तक़ी ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाक़ात की, जिसमें द्विपक्षीय व्यापार, मानवीय सहायता, शिक्षा और आर्थिक सहयोग पर चर्चा हुई। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनुमति से संभव यह यात्रा भारत- अफ़ग़ानिस्तान संबंधों को मज़बूत करने का संकेत मानी गई। मुत्तक़ी ने अपने भारत प्रवास के दौरान केवल राजकीय यात्रा मात्र ही नहीं की बल्कि इस दौरान उन्होंने 11 अक्टूबर 2025 को उत्तर प्रदेश के सहारनपुर ज़िले में स्थित दारुल उलूम देवबंद अर्थात अपने 'वैचारिक प्रेरणा केंद्र' का भी दौरा किया। यह वही दारुल उलूम देवबंद तो है जिसने वंदे मातरम के एक हिस्से को गाने का विरोध किया था ? </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मुत्तक़ी ने अपने भारत दौरे के बीच दारुल उलूम देवबंद पहुंचकर व देवबंदी मसलक से जुड़े दारुल उलूम के उलेमा, छात्रों और अफ़ग़ान छात्रों से मिकर केवल अपनी अतिवादी वैचारिक प्रतिबद्धता ही नहीं दोहराई बल्कि उन्होंने दिल्ली में ही आयोजित अपनी पहली प्रेस कॉन्फ़्रेंस में महिलाओं को प्रवेश न देकर भी यह साबित कर दिया कि महिलाओं के प्रति इस सोच विचार के लोग कितनी असहिष्णुता का भाव रखते हैं। परन्तु आश्चर्य है कि भाजपा सरकार वंदे मातरम गायन का विरोध करने व इसे हराम बताने वाली विचारधारा व इसके रहनुमाओं को तो गले से लगाती है। इनके स्वागत में लाल क़ालीन बिछाती है परन्तु कांग्रेस पर वंदे मातरम विरोधी होने का आरोप मढ़ती है ? परन्तु जब कांग्रेस संविधान सभा में इस गीत के दो छंद अपनाने पर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विरोध न करने का सवाल उठाती है तो भाजपा बग़लें झाँकने लगती है ?</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज देश बेरोज़गारी व मंहगाई से बुरी तरह जूझ रहा है। डॉलर के मुक़ाबले रूपये की क़ीमत रसातल तक पहुँच गयी है। 2012-13 के मध्य जब डॉलर के मुक़ाबले भारतीय रुपये की कीमत 60-68 के बीच लुढ़क रही थी। उस समय नरेंद्र मोदी ने यूपीए सरकार पर कड़ा प्रहार करते हुये कहा था कि "हमारी मुद्रा मृत्युशैया पर है, यह टर्मिनल स्टेज पर है और इसे तुरंत डॉक्टर की ज़रूरत है"। उसी समय मोदी ने ज़ोर देकर यह भी कहा था कि रुपये की गिरावट से प्रधानमंत्री की इज़्ज़त गिरती है, क्योंकि रुपया केवल काग़ज़ का टुकड़ा नहीं, बल्कि देश की प्रतिष्ठा से जुड़ा होता है। उस समय मोदी ने इसे तत्कालीन यू पी ए सरकार की आर्थिक नाकामी क़रार दिया था। परन्तु आज तो 1 डॉलर के मुक़ाबले भारतीय मुद्रा 90 के क़रीब पहुँच चुकी है। आज देश की संसद में इसपर चर्चा क्यों नहीं होती ? </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दरअसल मोदी सरकार ने अपनी पूरी ताक़त देश का साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण करने में झोंक रखी है। ख़ासकर चुनावों के समय ऐसी कोशिशों में और भी तेज़ी आ जाती है। बड़ा आश्चर्य है कि स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर राष्ट्रगान तक का विरोध करने वाले,गांधी की हत्या पर जश्न मनाने व मिठाइयां बांटने वाले,भारतीय संविधान को न पचा पाने वाले लोग आज सत्ता में आने के बाद बड़े ही शातिर तरीक़े से स्वयं को महान देशभक्त व धर्म के 'अभिरक्षक ' बनने की कोशिश कर रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">और देश के स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका निभाते हुये फांसी के फंदे पर झूलने व अंग्रेज़ों की यातनायें झेलने वाली कांग्रेस को वंदे मातरम विरोधी तो कभी मुस्लिम परस्त तो कभी पाक परस्त बातकर मुद्रा पतन से लेकर मंहगाई बेरोज़गारी जैसे मूल मुद्दों से ध्यान भटकने की कोशिश करती रहती है। गत दिनों संसद में वंदे मातरम पर हुई चर्चा भी जनहितकारी मुद्दों से ध्यान भटकने की ऐसी ही एक कोशिश थी जिसमें वंदे मातरम को लेकर भाजपा की नीति और नीयत का अंतर साफ़ नज़र आया।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 Dec 2025 17:06:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वंदे मातरम्: अतीत की शक्ति, वर्तमान का आधार, भविष्य की प्रेरणा</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">भारत के इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना में यदि किसी एक उद्घोष ने सर्वाधिक ऊर्जा, एकता और आत्मगौरव का संचार किया है, तो वह है “वंदे मातरम्”। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा की वह धड़कन है, जिसने स्वतंत्रता संग्राम के कठिनतम क्षणों में लाखों देशभक्तों को शक्ति, साहस और नैतिक दृढ़ता प्रदान की। फांसी के तख़्ते पर चढ़ते हुए वीरों के होंठों पर यही मंत्र था, जेल की यातनाओं को सहते स्वतंत्रता सेनानियों का संबल भी यही रहा। आज यह राष्ट्र की सांस्कृतिक अस्मिता और राष्ट्रीय एकता का अमर प्रतीक है- ऐसा प्रतीक जिस पर न विवाद</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/163137/vande-mataram-strength-of-the-past-foundation-of-the-present"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-12/download-(1).jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">भारत के इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना में यदि किसी एक उद्घोष ने सर्वाधिक ऊर्जा, एकता और आत्मगौरव का संचार किया है, तो वह है “वंदे मातरम्”। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा की वह धड़कन है, जिसने स्वतंत्रता संग्राम के कठिनतम क्षणों में लाखों देशभक्तों को शक्ति, साहस और नैतिक दृढ़ता प्रदान की। फांसी के तख़्ते पर चढ़ते हुए वीरों के होंठों पर यही मंत्र था, जेल की यातनाओं को सहते स्वतंत्रता सेनानियों का संबल भी यही रहा। आज यह राष्ट्र की सांस्कृतिक अस्मिता और राष्ट्रीय एकता का अमर प्रतीक है- ऐसा प्रतीक जिस पर न विवाद होना चाहिए, न विभाजन, बल्कि केवल आदर और समर्पण।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वंदे मातरम् का इतिहास केवल साहित्यिक नहीं, बल्कि क्रांतिकारी है। उन्नीसवीं शताब्दी में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत 1905 के बंग-भंग आंदोलन के समय जन-क्रांति की धमनी बन गया। इसने बिखरी हुई राष्ट्रीय चेतना को एक सूत्र में बांधा और भारतीयों में स्वाधीनता का विश्वास जगाया।1905 से 1947 तक का पूरा स्वाधीनता संघर्ष इस उद्घोष से ऊर्जा पाता रहा।सत्याग्रहियों के लिए यह सत्य और निर्भीकता का प्रतीक बना;युवाओं के लिए यह समर्पण और नेतृत्व का मार्गदर्शक;और आम भारतीयों के लिए यह देशभक्ति का भावनात्मक स्रोत।कई सेनानी जेल जाते समय, लाठियाँ खाते समय और फांसी चढ़ते समय भी यही उद्घोष बोलते रहे-“वंदे मातरम्।” यह अतीत की वह शक्ति थी, जिसने गुलामी की जंजीरों को तोड़ने का संकल्प जन-जन में जगाया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज का भारत तकनीक, रक्षा, विज्ञान, अर्थव्यवस्था और कूटनीति आदि विविध क्षेत्रों में विश्व पटल पर तेज़ी से उभर रहा है। लेकिन आधुनिक विकास के इस दौर में सामाजिक जिम्मेदारी, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता पहले से अधिक बढ़ गई है।यह विभिन्न भाषाओं, धर्मों और परम्पराओं को एक साझा भारतीय पहचान में पिरोता है। यह भारत की प्रकृति— नदियों, वनों, खेतों, धरती और मातृभूमि के सौंदर्य का काव्यमय उत्सव है, जो भौतिकतावादी युग में भी संवेदनाओं को जीवित रखता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भ्रष्टाचार, पर्यावरण संकट, सामाजिक असमानता और नैतिक विचलन के दौर में यह उद्घोष नागरिक कर्तव्य, अनुशासन और राष्ट्रधर्म की याद दिलाता है।विशेषतः युवाओं के लिए वंदे मातरम् जड़ों से जुड़ने का मार्ग है। यह बताता है कि आधुनिकता का अर्थ अपनी पहचान खो देना नहीं, बल्कि उसे और मजबूत बनाना है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भविष्य का भारत तकनीकी रूप से अत्याधुनिक होगा, लेकिन उसकी आत्मा भारतीयता में ही रची-बसी रहेगी। वंदे मातरम् उसी भारतीयता का शाश्वत प्रतीक है। एक ऐसी प्रेरणादायक ध्वनि, जो समय, परिस्थितियों और पीढ़ियों की सीमाओं से परे है।आने वाले समय में जब भारत वैश्विक मंच पर संस्कृति, ज्ञान, शांति और मानवता के आधार पर नेतृत्व करेगा, तब यह उद्घोष और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगा क्योंकि उस समय यह याद दिलाएगा कि राष्ट्रभक्ति किसी धर्म या जाति की नहीं, बल्कि भारत की साझा विरासत है।यह संकेत देगा कि पर्यावरण संरक्षण केवल वैज्ञानिक आवश्यकता नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक दायित्व है।और यह भाव जगाएगा कि देशभक्ति केवल राजनीतिक विचार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और नैतिक आदर्श है।इस प्रकार वंदे मातरम् भविष्य का वह प्रेरणास्रोत बनेगा, जो प्रगति और परंपरा को संतुलन में रखते हुए भारत को विश्वगुरु बनने की दिशा में मार्गदर्शन देगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अतः यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि </div>
<div style="text-align:justify;">वंदे मातरम् केवल स्वतंत्रता आंदोलन का गीत नहीं, बल्कि भारत के राष्ट्रीय चरित्र, सांस्कृतिक चेतना और आध्यात्मिक गौरव का शाश्वत घोष है।अतीत में इसने शक्ति और त्याग का संचार किया,वर्तमान में यह एकता और आत्मविश्वास का आधार है,और भविष्य में यह राष्ट्र की प्रेरणा और चेतना की अमर ध्वनि बना रहेगा।</div>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Wed, 10 Dec 2025 16:59:46 +0530</pubDate>
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