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                <title>hindi editorial - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>पतनः 13 साल की नाबालिग बच्ची चार होटल और 32! दरिंदे</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल</strong></div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">राजस्थान के श्रीगंगानगर में उस समय बेटी पढ़ाओ और बेटी बचाओ अभियान व नारी सशक्तिकरण के तमाम नारे धूल धुसरित हो गए जब एक तेरह साल की नाबालिग बच्ची को चार होटलों में ले जाकर तीस से अधिक नर पिचाश दरिंदों ने बेरहमी से दरिंदगी की। जहां एक शर्मनाक और खौफनाक वारदात ने इंसानियत और कानून व्यवस्था दोनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. महज 13 साल की एक बच्ची के साथ ऐसी हैवानियत की गई, जिसने हर किसी को झकझोर कर रख दिया. इस घिनौनी वारदात के सामने आने के बाद पूरे जिले में गुस्सा</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182840/fall-13-year-old-minor-girl-four-hotels-and-32"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/images-(3)1.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल</strong></div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">राजस्थान के श्रीगंगानगर में उस समय बेटी पढ़ाओ और बेटी बचाओ अभियान व नारी सशक्तिकरण के तमाम नारे धूल धुसरित हो गए जब एक तेरह साल की नाबालिग बच्ची को चार होटलों में ले जाकर तीस से अधिक नर पिचाश दरिंदों ने बेरहमी से दरिंदगी की। जहां एक शर्मनाक और खौफनाक वारदात ने इंसानियत और कानून व्यवस्था दोनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. महज 13 साल की एक बच्ची के साथ ऐसी हैवानियत की गई, जिसने हर किसी को झकझोर कर रख दिया. इस घिनौनी वारदात के सामने आने के बाद पूरे जिले में गुस्सा फूट पड़ा और लोग सड़कों पर उतर आए हैं. पुलिस प्रशासन, संगठित अपराधियों और अवैध होटलों के नेटवर्क को लेकर कई सवाल उठने लगे हैं. मगर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उस मासूम को इंसाफ मिल पाएगा?</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">आपको बता दें 18 जून 2026 के दिन  जब इस खौफनाक कहानी की शुरुआत हुई. पुलिस थाने में दर्ज एफआईआर के मुताबिक, 13 साल की पीड़ित बच्ची अपनी एक सहेली से मिलने श्रीविजयनगर गई थी. परिवार को उम्मीद थी कि वह जल्द घर लौट आएगी, लेकिन अचानक घरवालों से उसका संपर्क टूट गया. और वो लौटकर घर नहीं आई. उसे तलाश किया गया,  लेकिन उसका कुछ पता नहीं चला. उसकी कोई खबर ना मिलने से घरवालों की चिंता बढ़ती गई और कुछ ही घंटों में यह मामला एक रहस्यमय गुमशुदगी में बदल गया.घरवाले पुलिस के पास पहुंचे. मदद की गुहार लगाई. तहरीर लेने के बाद पुलिस हरकत में आ गई. पुलिस जांच के मुताबिक, उसी रात बच्ची श्रीगंगानगर पहुंची थी और घर जाने के लिए एक ई-रिक्शा में बैठी. शैतान की एंट्री - आरोप है कि उसी दौरान रामबाबू नाम का एक ई-रिक्शा चालक उसे मिल गया.</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> उसने बच्ची को बातों ही बातों में विश्वास में ले लिया और उसे घर छोड़ने का भरोसा दिया. लड़की उसके साथ ई रिक्शा में बैठ गई. उसे इस बात का अंदाजा भी नहीं था कि अगले कुछ मिनटों में उसके साथ क्या होने वाला है. रामबाबू उसे घर पहुंचाने के बजाय एक होटल में ले गया. जहां उसने लड़की को होटल संचालक के हवाले कर दिया. बताया जा रहा है कि इसके बदले उसे अच्छे खासे पैसे मिले. अब वो मासूम बच्ची ऐसे जाल में फंस चुकी थी, जहां से निकलना उसके लिए नामुमकिन सा हो गया था.इस मामले की तफ्तीश में जुटी पुलिस बताती है कि जांच में सामने आया कि बच्ची को सबसे पहले 'होटल जॉय इन' ले जाया गया था. इसके बाद अगले कई दिनों तक उसे एक होटल से दूसरे होटल में ले जाया जाता रहा. शुरुआती जांच में तीन होटलों की जानकारी पुलिस को मिली थी, लेकिन बाद में बीरबल चौक के पास मौजूद 'ड्रीम' नाम के चौथे होटल का भी पता चला. पुलिस के अनुसार, एक बाद एक इन सभी होटलों में बच्ची को छिपाकर रखा गया था. और वहीं उसकी आबरू लूटी गई.</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">जिस्म का धंधा - आरोप है कि होटल मालिकों और मैनेजरों ने पांच दिनों के भीतर उस मासूम बच्ची को 30 से ज्यादा लोगों के सामने परोसा किया. आरोपों के मुताबिक, दिन के समय भी कई कई लोग उसके साथ रेप करते थे. कहा जाए तो उसके साथ लगातार गैंग रेप किया गया. दरिदों ने मौका मिलते ही उसके साथ दरिंदगी की. मामले में यह भी आरोप लगाया गया है कि जब दरिंदगी के दौरान वो बच्ची दर्द से तड़पती थी, तब उसे शांत करने और सुलाने के लिए जबरन उसे शराब पिलाई जाती थी. और फिर उसकी इज्जत को तार तार किया जाता था. बताया जा रहा है कि होटल मालिकों ने एक एक दिन में कई लोगों को बच्ची के साथ दरिंदगी करने की छूट दी थी.</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> इस पूरी कहानी ने प्रदेश को ही नहीं देश को झकझोर दिया है.वहशीपन की ये कहानी यहीं खत्म नहीं हो जाती. इस मामले में एक और सनसनीखेज आरोप तब सामने आया, जब जांच एजेंसियों को पता चला कि एक होटल मैनेजर ने उस बच्ची की तस्वीरें खींचकर सोशल मीडिया पर भेजी थीं. इसी के बाद दरिंदगी का वो शर्मनाक खेल शुरू हुआ, जिसके चलते कई लोगों ने उस बच्ची को अपनी हवस का शिकार बनाया. इसी तरह से कई अन्य लोग भी इस गुनाह की कड़ी से जुड़ते चले गए. ये वही लोग थे, जो बच्ची की आबरू का सौदा करने के लिए बारी-बारी से होटल पहुंचे थे. </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">पुलिस का शिकंजा - पुलिस के अनुसार, बच्ची की उन्हीं तस्वीरों के जरिए कई अहम सुराग जांच करने वाली टीम के हाथ लगे.उधर, बच्ची के लापता होने के बाद परिवार ने पुलिस में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई थी. पुलिस ने जांच शुरू की और 22 जून को 'होटल जॉय इन' से बच्ची को बरामद कर लिया गया. इसके बाद मामले की परतें खुलनी शुरू हुईं. जांच आगे बढ़ी तो यह मामला कथित तौर पर संगठित अपराध और मानव तस्करी के एंगल तक पहुंच गया.पुलिस ने इस मामले में अब तक 12 आरोपियों को गिरफ्तार किया है. </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">गिरफ्तार किए गए लोगों में ई-रिक्शा चालक रामबाबू, होटल मालिक मयंक सैन, होटल मैनेजर हरदीप नाथ और सचिन सहित कई अन्य आरोपी शामिल हैं. इसके अलावा दीपक और तरुण नामक दो अन्य लोगों को भी गिरफ्तार किया गया है. पुलिस का कहना है कि कुछ आरोपियों ने सीधे अपराध किया, जबकि कुछ ने इस गुनाह में सहयोग किया है। बुलडोजर एक्शन - होटलों पर चला बुलडोजर जिला प्रशासन ने उन होटलों को चिन्हित किया जहां इस वारदात को अंजाम दिया गया था और जो अवैध रूप से निर्मित थे। इनमें होटल जॉय इन , होटल सफायर और होटल ड्रीम लैंड शामिल हैं, जिन्हें पूरी तरह जमींदोज कर दिया गया।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">सवाल सिर्फ एक नाबालिग बालिका के साथ दरिंदगी का नहीं है सवाल उस घिनौनी मानसिकता का है जो तेरह साल की एक मासूम बच्ची के अपरिपक्व और अविकसित शरीर को भूखे गिद्धों के झुंड की तरह नौंचने में पुलिस कानून सजा अदालत अथवा समाज और ईश्वर किसी का भी भय नहीं मानती है। क्या ईरिकशा वाले की करतूत से यह जाहिर नहीं होता है कि वह पहले भी इसी तरह मासूम लड़कियों को फंसा कर बहला फुसला कर इन होटल वालों के हाथों बेचता रहा होगा? एक शहर में होटल से होटल मासूम नाबालिग लड़की के जिस्म को दरिंदे नोचते रहे और पुलिस को भनक तक नहीं लगी?</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> दरअसल पुलिस ऐसे धंधेबाजो से बंधी रकम माहवार वसूल कर इनके कारनामों से आंखें बंद कर लेती है इसी का नतीजा है कि इस तरह होटल वाले एक मासूम लडकी के जिस्म को भेड़ियों को परोसते रहे। ऐसे घृणित और समाज विरोधी अपराध के लिए सख्त से सख्त कार्यवाही की जानी चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोका जा सके।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 06 Jul 2026 22:10:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>वसुधैव कुटुम्बकम भारत की वैश्विक धारणा और भावना</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">भारतीय संस्कृति का मूल दर्शन केवल अपने परिवार या राष्ट्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने संपूर्ण मानवता को एक परिवार मानने की उदात्त दृष्टि प्रदान की है। उपनिषदों का प्रसिद्ध वाक्य "वसुधैव कुटुम्बकम्" केवल एक आदर्श वाक्य नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन जीने की ऐसी शैली है जिसमें समस्त सृष्टि के प्रति आत्मीयता, करुणा, सह-अस्तित्व और समरसता का भाव निहित है। आज जब दुनिया स्वार्थ, हिंसा, युद्ध, आर्थिक असमानता और सामाजिक विघटन जैसी समस्याओं से जूझ रही है, तब यह भारतीय जीवन-दर्शन पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">मनुष्य की महानता उसके धन के परिमाण से नहीं,</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182700/global-perception-and-sentiment-of-vasudhaiva-kutumbakam-india"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/images.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारतीय संस्कृति का मूल दर्शन केवल अपने परिवार या राष्ट्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने संपूर्ण मानवता को एक परिवार मानने की उदात्त दृष्टि प्रदान की है। उपनिषदों का प्रसिद्ध वाक्य "वसुधैव कुटुम्बकम्" केवल एक आदर्श वाक्य नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन जीने की ऐसी शैली है जिसमें समस्त सृष्टि के प्रति आत्मीयता, करुणा, सह-अस्तित्व और समरसता का भाव निहित है। आज जब दुनिया स्वार्थ, हिंसा, युद्ध, आर्थिक असमानता और सामाजिक विघटन जैसी समस्याओं से जूझ रही है, तब यह भारतीय जीवन-दर्शन पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">मनुष्य की महानता उसके धन के परिमाण से नहीं, बल्कि उसके हृदय की विशालता से आँकी जाती है। किसी धनी व्यक्ति द्वारा अपनी विपुल संपत्ति का थोड़ा-सा भाग दान करना निश्चित रूप से प्रशंसनीय है, किंतु उससे कहीं अधिक महान वह व्यक्ति है, जिसके पास सीमित संसाधन होने के बावजूद वह अपनी आवश्यकताओं में कटौती कर किसी जरूरतमंद की सहायता करता है। यही वास्तविक परोपकार है। संत कबीर ने कहा है वृक्ष कबहुँ नहीं फल भखै, नदी न संचै नीर। परमारथ के कारने, साधुन धरा शरीर, अर्थात प्रकृति का प्रत्येक तत्व दूसरों के लिए जीना सिखाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">जियो और जीने दो का सिद्धांत तथा वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना जिस समाज में सशक्त होती है, उस समाज की प्रगति को कोई रोक नहीं सकता। ऐसे समाज में विश्वास, सहयोग, नैतिकता और संवेदनशीलता का वातावरण निर्मित होता है। महात्मा गांधी का कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है कि स्वयं को पाने का सर्वोत्तम तरीका है कि स्वयं को दूसरों की सेवा में खो दिया जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">मनुष्य का जीवन उत्साह, संघर्ष और निरंतर विकास की यात्रा है। जीवन में परिवर्तन स्वाभाविक है और विकास की संभावनाएँ भी परिवर्तन के साथ ही जन्म लेती हैं। जो व्यक्ति स्वयं के साथ-साथ समाज और मानवता के कल्याण के लिए जीता है, वही जीवन की वास्तविक सार्थकता को प्राप्त करता है। स्वामी विवेकानंद का यह प्रेरक संदेश प्रत्येक व्यक्ति के लिए मार्गदर्शक है— उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">शास्त्रों में पुनर्जन्म की अवधारणा का विस्तार से वर्णन मिलता है। अनेक लोग यह मानते हैं कि इस जन्म के शुभ कर्म अगले जन्म को श्रेष्ठ बनाते हैं। यह आस्था भारतीय अध्यात्म का महत्वपूर्ण पक्ष है। किंतु यदि दार्शनिक दृष्टि से विचार करें तो वर्तमान जीवन ही हमारे हाथ में उपलब्ध सबसे बड़ा सत्य है। भविष्य या अगले जन्म की कल्पनाओं में वर्तमान के कर्तव्यों की उपेक्षा करना उचित नहीं कहा जा सकता। इसलिए आवश्यक है कि हम इसी जीवन को उत्कृष्ट बनाएं, इसी जीवन में मानवता के लिए उपयोगी कार्य करें और समाज के लिए ऐसी विरासत छोड़ जाएँ, जो आने वाली पीढ़ियों का मार्ग आलोकित करे।</p>
<p style="text-align:justify;">जीवन के उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग-अलग हो सकते हैं। कोई आर्थिक समृद्धि चाहता है, कोई राजनीति में प्रतिष्ठा, कोई विज्ञान के क्षेत्र में उपलब्धि, कोई साहित्य, कला, संस्कृति, शिक्षा या व्यवसाय में उत्कृष्टता प्राप्त करना चाहता है। लक्ष्य चाहे जो भी हो, उसकी प्राप्ति के लिए अपनाए गए साधनों की शुद्धता ही व्यक्ति के चरित्र का वास्तविक परिचय देती है। महात्मा गांधी का यह विचार सदैव स्मरणीय है साध्य जितना पवित्र हो, साधन भी उतने ही पवित्र होने चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">मनुष्य को अपने जीवन में साहस, संयम, आत्मविश्वास, अनुशासन और तपस्या के साथ आगे बढ़ना चाहिए। असफलता से घबराने के स्थान पर उसे सीख के रूप में स्वीकार करना चाहिए। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम कहा करते थे कि सपने वे नहीं होते जो सोते समय आते हैं, सपने वे होते हैं जो आपको सोने नहीं देते। यही स्वप्न जब कठोर परिश्रम और सकारात्मक चिंतन से जुड़ते हैं, तब वे समाज के लिए प्रेरणा बन जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">मानवीय संवेदनाएँ ही मनुष्य को अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ बनाती हैं। यदि जीवन केवल व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं तक सीमित रह जाए तो उसकी सार्थकता अधूरी रह जाती है। सच्चा जीवन वही है जो अपने तन, मन और धन का कुछ अंश समाज के वंचित, पीड़ित और असहाय वर्ग के उत्थान के लिए समर्पित कर सके। गौतम बुद्ध ने कहा था— हजारों दीपक एक दीपक से जल सकते हैं, फिर भी उस दीपक का प्रकाश कम नहीं होता। ठीक उसी प्रकार दूसरों के जीवन में आशा का प्रकाश फैलाने से हमारा जीवन और अधिक प्रकाशित होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अनेक चिंतकों ने जीवन को रंगमंच की संज्ञा दी है। हम सभी विभिन्न भूमिकाएँ निभाते हुए अपने जीवन का अभिनय करते हैं। किंतु इन भूमिकाओं की सफलता हमारे पद, प्रतिष्ठा या वैभव से नहीं, बल्कि हमारी सच्चाई, ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और मानवीय व्यवहार से निर्धारित होती है। यही गुण व्यक्ति को समाज में स्थायी सम्मान दिलाते हैं। सफलता और असफलता जीवन के दो अविभाज्य पक्ष हैं। जो व्यक्ति सफलता में विनम्र और असफलता में धैर्यवान रहता है, वही वास्तव में परिपक्व व्यक्तित्व का स्वामी होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">लोभ, लालच, अहंकार और असीमित इच्छाएँ मनुष्य को भीतर से खोखला बना देती हैं, जबकि संतोष, संयम और नैतिकता उसे आत्मिक समृद्धि प्रदान करते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि आर्थिक उन्नति का प्रयास छोड़ दिया जाए। आवश्यकता इस बात की है कि आध्यात्मिक मूल्यों, सांस्कृतिक चेतना और आर्थिक प्रगति के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। यही संतुलित दृष्टिकोण एक स्वस्थ समाज का निर्माण करता है। जीवन का प्रत्येक क्षण परिवर्तनशील है। परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है। किंतु परिवर्तन का अर्थ भाग्यवाद नहीं है। भाग्य और कर्म दोनों समानांतर चलने वाली प्रक्रियाएँ हैं। भाग्य परिस्थितियाँ दे सकता है, परंतु कर्म उन परिस्थितियों का परिणाम बदलने की क्षमता रखता है।</p>
<p style="text-align:justify;">भगवद्गीता का प्रसिद्ध संदेश है कि कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन,आज भी मनुष्य को निष्काम कर्म की प्रेरणा देता है। जब व्यक्ति कर्म को अपना धर्म मान लेता है और परिणामों की अत्यधिक चिंता से मुक्त होकर कार्य करता है, तब उसके भीतर निराशा की संभावनाएँ स्वतः कम होने लगती हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्य अपनी व्यक्तिगत उपलब्धियों से आगे बढ़कर वैश्विक मानवता के हित में सोचने की आदत विकसित करे। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन का कुछ अंश समाज के लिए समर्पित कर दे, तो गरीबी, भेदभाव, हिंसा और असमानता जैसी अनेक समस्याओं का समाधान स्वतः संभव हो सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">यही "वसुधैव कुटुम्बकम्" का वास्तविक स्वरूप है— जहाँ समस्त मानवता एक परिवार है और प्रत्येक व्यक्ति दूसरे के सुख-दुःख में सहभागी है। जीवन की सफलता केवल लंबा जीवन जीने में नहीं, बल्कि उपयोगी जीवन जीने में है। यदि हमारा जीवन किसी एक व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान ला सके, किसी निराश मन में आशा जगा सके और समाज में सद्भाव, करुणा तथा मानवता के बीज बो सके, तभी हमारा जन्म सार्थक कहलाएगा। यही भारतीय संस्कृति का संदेश है, यही मानव जीवन का परम उद्देश्य है और यही "वसुधैव कुटुम्बकम्" की सच्ची साधना है।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 04 Jul 2026 19:28:42 +0530</pubDate>
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                <title>बालासाहेब की विरासत से राजनीतिक संघर्ष तक</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना केवल एक राजनीतिक दल नहीं रही, बल्कि वह एक भावनात्मक आंदोलन और मराठी अस्मिता का प्रतीक भी रही है। इस आंदोलन की नींव शिवसेना संस्थापक  बालासाहेब ठाकरे ने रखी थी। उनकी आक्रामक शैली, स्पष्ट विचारधारा और कार्यकर्ताओं पर मजबूत पकड़ ने शिवसेना को महाराष्ट्र की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक शक्तियों में शामिल कर दिया था। लेकिन समय के साथ राजनीति बदली, परिस्थितियां बदलीं और नेतृत्व भी बदला। आज शिवसेना के वर्तमान प्रमुख  उद्धव ठाकरे ऐसे दौर से गुजर रहे हैं जिसे उनके राजनीतिक जीवन का सबसे कठिन समय माना जा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">पिछले कुछ वर्षों में</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181463/from-balasahebs-legacy-to-political-struggle"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/h89om7is_balasaheb-thackeray-uddhav-and-raj-thackeray_625x300_23_january_26.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना केवल एक राजनीतिक दल नहीं रही, बल्कि वह एक भावनात्मक आंदोलन और मराठी अस्मिता का प्रतीक भी रही है। इस आंदोलन की नींव शिवसेना संस्थापक  बालासाहेब ठाकरे ने रखी थी। उनकी आक्रामक शैली, स्पष्ट विचारधारा और कार्यकर्ताओं पर मजबूत पकड़ ने शिवसेना को महाराष्ट्र की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक शक्तियों में शामिल कर दिया था। लेकिन समय के साथ राजनीति बदली, परिस्थितियां बदलीं और नेतृत्व भी बदला। आज शिवसेना के वर्तमान प्रमुख  उद्धव ठाकरे ऐसे दौर से गुजर रहे हैं जिसे उनके राजनीतिक जीवन का सबसे कठिन समय माना जा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पिछले कुछ वर्षों में उद्धव ठाकरे की राजनीतिक स्थिति लगातार कमजोर होती दिखाई दी है। महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी सरकार बनने के बाद उन्होंने मुख्यमंत्री पद संभाला, लेकिन इसी फैसले ने उनके सामने नई चुनौतियां भी खड़ी कर दीं। भाजपा के साथ दशकों पुराने गठबंधन को छोड़कर कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ सरकार बनाने का निर्णय शिवसेना के पारंपरिक समर्थकों के एक बड़े वर्ग को स्वीकार नहीं हुआ। पार्टी के भीतर भी असंतोष धीरे-धीरे बढ़ने लगा। यही असंतोष आगे चलकर बड़े राजनीतिक संकट में बदल गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">साल 2022 में शिवसेना को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बड़ी संख्या में विधायकों ने बगावत कर दी। यह केवल विधायकों का विद्रोह नहीं था, बल्कि शिवसेना की संगठनात्मक ताकत और नेतृत्व क्षमता पर भी बड़ा सवाल था। शिंदे गुट ने दावा किया कि वह बालासाहेब ठाकरे की मूल विचारधारा का प्रतिनिधित्व कर रहा है। इसके बाद चुनाव आयोग द्वारा पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह शिंदे गुट को मिलने से उद्धव ठाकरे को एक और बड़ा झटका लगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके बाद उद्धव ठाकरे ने शिवसेना (यूबीटी) के रूप में अपनी राजनीतिक लड़ाई जारी रखी। लोकसभा चुनावों में कुछ सफलता मिलने से ऐसा लगा कि पार्टी फिर से मजबूती की ओर बढ़ रही है, लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने एक बार फिर उनकी मुश्किलें बढ़ा दी हैं। पार्टी के सांसदों में असंतोष और संभावित टूट की खबरों ने यह संकेत दिया है कि संगठन अभी भी स्थिर नहीं हो पाया है। यदि सांसदों का बड़ा समूह अलग रास्ता चुनता है तो यह शिवसेना (यूबीटी) के लिए एक और बड़ा राजनीतिक आघात साबित हो सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उद्धव ठाकरे की सबसे बड़ी चुनौती यह रही है कि वे अपने पिता बालासाहेब ठाकरे जैसी जननेता की छवि नहीं बना सके। बालासाहेब कभी चुनाव नहीं लड़े, लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति में उनकी बात अंतिम मानी जाती थी। उनकी सभाओं में हजारों लोग जुटते थे और उनके एक बयान से राजनीतिक माहौल बदल जाता था। वे अपने समर्थकों के लिए एक करिश्माई नेता थे जिनकी पकड़ संगठन पर पूरी तरह बनी रहती थी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके विपरीत उद्धव ठाकरे का व्यक्तित्व अपेक्षाकृत शांत और संयमित माना जाता है। वे टकराव की राजनीति की बजाय संवाद और संगठनात्मक प्रबंधन को प्राथमिकता देते रहे हैं। मुख्यमंत्री के रूप में उनके कामकाज की कई लोगों ने सराहना की, विशेषकर कोविड-19 महामारी के दौरान। लेकिन राजनीति में केवल प्रशासनिक क्षमता ही पर्याप्त नहीं होती। संगठन को एकजुट रखना, कार्यकर्ताओं में उत्साह बनाए रखना और नेतृत्व के प्रति अटूट विश्वास कायम रखना भी उतना ही आवश्यक होता है। यही वह क्षेत्र है जहां उद्धव ठाकरे को लगातार चुनौतियों का सामना करना पड़ा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बालासाहेब ठाकरे और उद्धव ठाकरे के बीच सबसे बड़ा अंतर नेतृत्व शैली का दिखाई देता है। बालासाहेब की राजनीति भावनात्मक जुड़ाव, प्रखर हिंदुत्व और आक्रामक वक्तव्यों पर आधारित थी। वे सीधे कार्यकर्ताओं से संवाद करते थे और पार्टी के भीतर असहमति की गुंजाइश बहुत कम रहती थी। दूसरी ओर उद्धव ठाकरे अपेक्षाकृत सौम्य और संस्थागत शैली के नेता हैं। वे गठबंधन राजनीति में विश्वास रखते हैं और कई मुद्दों पर नरम रुख अपनाते दिखाई दिए हैं। यही कारण है कि शिवसेना के कुछ पुराने कार्यकर्ताओं और नेताओं को लगा कि पार्टी अपनी मूल पहचान से दूर जा रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा से अलग होने का फैसला उद्धव ठाकरे के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ। भाजपा और शिवसेना का गठबंधन दशकों पुराना था और दोनों दलों का मतदाता आधार भी काफी हद तक समान था। जब यह गठबंधन टूटा तो शिवसेना के सामने अपनी नई राजनीतिक पहचान स्थापित करने की चुनौती खड़ी हो गई। कांग्रेस और एनसीपी के साथ गठबंधन ने तत्काल सत्ता तो दिलाई, लेकिन लंबे समय में इस फैसले की राजनीतिक कीमत भी चुकानी पड़ी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज स्थिति यह है कि शिवसेना दो हिस्सों में बंटी हुई दिखाई देती है। एक ओर एकनाथ शिंदे का गुट सत्ता में है और उसके पास संगठन का बड़ा हिस्सा तथा आधिकारिक पार्टी पहचान है। दूसरी ओर उद्धव ठाकरे के पास सहानुभूति, एक समर्पित कार्यकर्ता वर्ग और ठाकरे परिवार की विरासत है। लेकिन केवल विरासत के आधार पर राजनीति लंबे समय तक नहीं चल सकती। इसके लिए मजबूत संगठन, प्रभावी नेतृत्व और लगातार जनसंपर्क की आवश्यकता होती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हाल के दिनों में सांसदों और नेताओं की नाराजगी की खबरें यह बताती हैं कि उद्धव ठाकरे को अभी भी संगठन को मजबूत करने के लिए काफी मेहनत करनी होगी। उन्हें यह साबित करना होगा कि शिवसेना (यूबीटी) केवल एक भावनात्मक मंच नहीं, बल्कि भविष्य की एक मजबूत राजनीतिक शक्ति भी है। यदि वे पार्टी के भीतर विश्वास बहाल करने और नए नेतृत्व को आगे लाने में सफल होते हैं तो राजनीतिक वापसी की संभावना बनी रह सकती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महाराष्ट्र की राजनीति में ठाकरे नाम आज भी प्रभाव रखता है। लेकिन वर्तमान दौर केवल नाम या विरासत के सहारे नहीं जीता जा सकता। राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं और दलों के भीतर भी शक्ति संतुलन लगातार बदल रहा है। ऐसे में उद्धव ठाकरे के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी पार्टी को एकजुट रखना और जनता के बीच यह विश्वास कायम करना है कि शिवसेना (यूबीटी) भविष्य में भी एक मजबूत विकल्प बन सकती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बालासाहेब ठाकरे ने जिस शिवसेना को संघर्ष, विचारधारा और संगठनात्मक अनुशासन के आधार पर खड़ा किया था, आज वही पार्टी कई हिस्सों में बंटी हुई दिखाई देती है। यह स्थिति केवल उद्धव ठाकरे के लिए ही नहीं, बल्कि उस राजनीतिक विरासत के लिए भी बड़ी परीक्षा है जिसे बालासाहेब ने दशकों की मेहनत से तैयार किया था। आने वाले वर्षों में यह तय होगा कि उद्धव ठाकरे इस संकट से उबरकर अपनी राजनीतिक जमीन फिर से मजबूत कर पाते हैं या महाराष्ट्र की राजनीति में उनका प्रभाव धीरे-धीरे सीमित होता चला जाएगा। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि वे अपने राजनीतिक जीवन के सबसे चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं और उनके सामने खड़ी चुनौतियां पहले से कहीं अधिक कठिन हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 17:52:24 +0530</pubDate>
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                <title>अब यह तस्वीर बदलनी चाहिए</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">नसमय बदला, तकनीक बदली, जीवन-शैली बदली, बाजार बदला और फैशन भी बदल गया। महिलाओं को उपभोक्तावादी संस्कृति ने विज्ञापनों और प्रदर्शन की वस्तु के रूप में प्रस्तुत करने के नए-नए तरीके खोज लिए। किंतु दुखद प्रश्न यह है कि क्या समाज की मूलभूत सोच बदली? क्या बालिका शिक्षा शत-प्रतिशत हो गई? क्या दहेज प्रथा समाप्त हो गई? क्या स्त्री उत्पीड़न इतिहास बन गया?</p>
<p style="text-align:justify;">दुर्भाग्य से इन प्रश्नों का उत्तर आज भी नकारात्मक है। अनेक समस्याएँ आज भी यथावत बनी हुई हैं, बल्कि कई मामलों में उन्होंने और अधिक विकराल रूप धारण कर लिया है। विशेष रूप से ग्रामीण भारत में</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180674/now-this-picture-should-be-changed"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/images.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">नसमय बदला, तकनीक बदली, जीवन-शैली बदली, बाजार बदला और फैशन भी बदल गया। महिलाओं को उपभोक्तावादी संस्कृति ने विज्ञापनों और प्रदर्शन की वस्तु के रूप में प्रस्तुत करने के नए-नए तरीके खोज लिए। किंतु दुखद प्रश्न यह है कि क्या समाज की मूलभूत सोच बदली? क्या बालिका शिक्षा शत-प्रतिशत हो गई? क्या दहेज प्रथा समाप्त हो गई? क्या स्त्री उत्पीड़न इतिहास बन गया?</p>
<p style="text-align:justify;">दुर्भाग्य से इन प्रश्नों का उत्तर आज भी नकारात्मक है। अनेक समस्याएँ आज भी यथावत बनी हुई हैं, बल्कि कई मामलों में उन्होंने और अधिक विकराल रूप धारण कर लिया है। विशेष रूप से ग्रामीण भारत में महिलाओं की स्थिति अभी भी अपेक्षित सम्मान और अवसरों से काफी दूर दिखाई देती है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता जैसे क्षेत्रों में सुधार तो हुआ है, किंतु वह इतना व्यापक नहीं है कि समाज को संतोष हो सके।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारे बुजुर्ग कहा करते थे कि शिक्षा का प्रसार होगा तो समाज की कुरीतियाँ स्वतः समाप्त हो जाएँगी। स्त्रियाँ पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ेंगी और बेटी को बोझ नहीं, अवसर माना जाएगा। कुछ क्षेत्रों में प्रगति अवश्य हुई है, किंतु धरातल पर तस्वीर अभी भी अधूरी है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण  के अनुसार देश में 10 वर्ष या उससे अधिक शिक्षा प्राप्त महिलाओं का प्रतिशत बढ़कर लगभग 46.4 प्रतिशत तक पहुँचा है, जो पहले 41 प्रतिशत था।</p>
<p style="text-align:justify;">यह सुधार उत्साहजनक है, किंतु इसका अर्थ यह भी है कि आधी से अधिक महिलाएँ अभी भी दस वर्ष की बुनियादी शिक्षा से वंचित हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में विद्यालय छोड़ने वाली बालिकाओं की संख्या आज भी चिंता का विषय बनी हुई है।  शिक्षा के क्षेत्र में असमानता का एक कारण बाल विवाह, गरीबी, सामाजिक रूढ़ियाँ तथा सुरक्षा संबंधी चिंताएँ भी हैं। अनेक परिवार आज भी पुत्र की शिक्षा को निवेश और पुत्री की शिक्षा को व्यय मानते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यही सोच आगे चलकर दहेज जैसी कुप्रथा को जन्म देती और इससे भी अधिक चिंताजनक तथ्य यह है कि शिक्षा और आधुनिकता के दावों के बीच दहेज का दानव आज भी जीवित है। राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2023 में दहेज निषेध अधिनियम के अंतर्गत 15,489 मामले दर्ज किए गए तथा दहेज से संबंधित घटनाओं में 6,156 महिलाओं की मृत्यु हुई। अर्थात प्रतिदिन लगभग 17 महिलाओं ने दहेज की कीमत अपने जीवन से चुकाई। महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की व्यापक तस्वीर भी चिंता उत्पन्न करती है।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्ष 2023 में देशभर में महिलाओं के विरुद्ध लगभग 4.48 लाख अपराध दर्ज किए गए। इनमें सबसे बड़ी संख्या पति अथवा रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता के मामलों की रही, जो कुल अपराधों का लगभग 30 प्रतिशत है। यह स्थिति केवल आँकड़ों की कहानी नहीं है; यह उन लाखों बेटियों, बहनों और माताओं की पीड़ा का दस्तावेज है जो आज भी भेदभाव, हिंसा और असमानता का सामना कर रही हैं। समाज सुधारिका सावित्रीबाई फुले ने कहा था यदि तुम शिक्षित हो जाओगे तो तुम्हें अपने अधिकारों का ज्ञान होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">वहीं डॉ. भीमराव आंबेडकर का प्रसिद्ध कथन है कि किसी समाज की प्रगति का आकलन उसकी महिलाओं की प्रगति से किया जाना चाहिए। महात्मा गांधी ने भी कहा था यदि आप एक पुरुष को शिक्षित करते हैं तो केवल एक व्यक्ति शिक्षित होता है, किंतु यदि आप एक स्त्री को शिक्षित करते हैं तो पूरा परिवार शिक्षित होता है। इसी प्रकार स्वामी विवेकानंद का मानना था कि जिस राष्ट्र ने अपनी स्त्रियों का सम्मान करना नहीं सीखा, वह कभी महान नहीं बन सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">क्योंकि केवल विद्यालयों की संख्या बढ़ा देना पर्याप्त नहीं है; आवश्यक यह है कि बालिका शिक्षा को सामाजिक सम्मान, आर्थिक सुरक्षा और समान अवसरों से जोड़ा जाए। जब तक बेटी को परिवार की उत्तराधिकारी नहीं माना जाएगा, जब तक विवाह को आर्थिक लेन-देन का माध्यम समझा जाएगा, तब तक दहेज की मानसिकता समाप्त नहीं होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">विडंबना यह है कि एक ओर हम महिला सशक्तिकरण के नारे लगाते हैं, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान चलाते हैं, महिलाओं की उपलब्धियों पर गर्व करते हैं, दूसरी ओर कन्या के जन्म पर चिंता और विवाह के समय दहेज की चर्चा अभी भी अनेक घरों में सामान्य बात मानी जाती है। यह दोहरा सामाजिक चरित्र हमारी सबसे बड़ी चुनौती है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज आवश्यकता केवल कानूनों की नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना की है। विद्यालयों में लैंगिक समानता के संस्कार, परिवारों में बेटियों के प्रति समान व्यवहार, महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता, दहेज लेने-देने वालों का सामाजिक बहिष्कार तथा पंचायत स्तर तक जनजागरण अभियान ही वास्तविक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। यदि हम सचमुच विकसित भारत का स्वप्न देखते हैं तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि बालिका शिक्षा, स्त्री सम्मान और दहेज उन्मूलन केवल महिला मुद्दे नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण के प्रश्न हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">जिस दिन हर बेटी निर्भय होकर शिक्षा प्राप्त करेगी, अपने जीवन के निर्णय स्वयं ले सकेगी और विवाह दहेज नहीं बल्कि समानता, सम्मान और प्रेम पर आधारित होगा, उसी दिन हम सच्चे अर्थों में आधुनिक, प्रगतिशील और सभ्य समाज कहलाने के अधिकारी होंगे। अब समय की आवश्यकता यह है  कि हम केवल परिवर्तन की प्रतीक्षा न करें, बल्कि स्वयं परिवर्तन बनें। क्योंकि बेटी का सम्मान ही समाज का सम्मान है, और स्त्री की प्रगति ही राष्ट्र की वास्तविक प्रगति है।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 18:49:27 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>कर्नाटक विधानसभा का चुनाव नेहरू-गांधी परिवार की नैतिक व राजनीतिक ताकत तय करेगी</title>
                                    <description><![CDATA[<p>  </p>
<p><span lang="hi" style="font-size:14pt;font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';" xml:lang="hi">कर्नाटक विधानसभा का चुनाव कांग्रेस के लिए सिर्फ सरकार बनाने का चुनाव नहीं है</span><span style="font-size:14pt;font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';">, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि आगे की राजनीतिक दिशा बनाने वाला चुनाव है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका एक पहलू यह है कि पार्टी इसके बहाने नेहरू-गांधी परिवार का करिश्मा लौटाने की कोशिश कर रही है। अगर यह कोशिश कामयाब होती है तो राजस्थान से लेकर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी यह संदेश जाएगा कि सोनिया गांधी का परिवार अब भी कांग्रेस को सत्ता दिला सकता है। यह संदेश बनाना इसलिए जरूरी है क्योंकि अभी प्रदेश के सभी क्षत्रप यह मानने लगे हैं कि अगर कांग्रेस जीतती है तो उनकी वजह</span></span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/129080/karnataka-assembly-elections-will-determine-the-moral-and-political-strength"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-05/कर्नाटक-विधानसभा-का-चुनाव-नेहरू-गांधी-परिवार-की-नैतिक-व-राजनीतिक-ताकत-तय-करेगी.jpg" alt=""></a><br /><p> </p>
<p><span lang="hi" style="font-size:14pt;font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';" xml:lang="hi">कर्नाटक विधानसभा का चुनाव कांग्रेस के लिए सिर्फ सरकार बनाने का चुनाव नहीं है</span><span style="font-size:14pt;font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';">, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि आगे की राजनीतिक दिशा बनाने वाला चुनाव है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका एक पहलू यह है कि पार्टी इसके बहाने नेहरू-गांधी परिवार का करिश्मा लौटाने की कोशिश कर रही है। अगर यह कोशिश कामयाब होती है तो राजस्थान से लेकर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी यह संदेश जाएगा कि सोनिया गांधी का परिवार अब भी कांग्रेस को सत्ता दिला सकता है। यह संदेश बनाना इसलिए जरूरी है क्योंकि अभी प्रदेश के सभी क्षत्रप यह मानने लगे हैं कि अगर कांग्रेस जीतती है तो उनकी वजह से उसमें आलाकमान की कोई भूमिका नहीं होती है। इससे कांग्रेस आलाकमान यानी नेहरू-गांधी परिवार की नैतिक व राजनीतिक सत्ता कमजोर होती है।</span></span></p>
<p><span lang="hi" style="font-size:14pt;font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';" xml:lang="hi">कर्नाटक में भी पहले दिन से यह माहौल बनाया गया है कि कांग्रेस को डीके शिवकुमार और सिद्धरमैया चुनाव लड़ा रहे हैं और अगर कांग्रेस जीतेगी तो इन दो नेताओं की वजह से जीतेगी। उसमें ज्यादा से ज्यादा पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को थोड़ा श्रेय दिया जा सकता है क्योंकि वे भी कर्नाटक के हैं। यह माहौल सिर्फ राजनीतिक कारणों से नहीं बना था</span><span style="font-size:14pt;font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';">, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि मीडिया ने भी चुनाव को इसी तरह से प्रचारित किया था। मीडिया ने ऐसी धारणा बनाई कि अगर कांग्रेस जीतती है तो वह स्थानीय नेतृत्व की वजह से जीतेगी और हारेगी तो कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व की कमजोरी से हारेगी। इसी तरह भाजपा के बारे में यह धारणा बनाई गई कि अगर भाजपा जीतती है तो नरेंद्र मोदी की वजह से जीतेगी और हारती है तो प्रदेश नेतृत्व की कमजोरी से हारेगी।</span></span></p>
<p><span lang="hi" style="font-size:14pt;font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';" xml:lang="hi">मीडिया के इस नैरेटिव को कांग्रेस आलाकमान ने समझा और उसके बाद प्रादेशिक नेतृत्व पर से फोकस हटाने का काम हुआ। उसके बाद ही तय हुआ कि पूरा गांधी परिवार प्रचार करेगा। राहुल गांधी की रैलियां बढ़ाई गईं और साथ ही प्रियंका गांधी वाड्रा की भी ज्यादा रैली कराने का फैसला हुआ। इससे पहले प्रियंका गांधी वाड्रा ने हिमाचल प्रदेश में प्रचार किया था और राहुल गांधी गुजरात गए थे। प्रियंका को हिमाचल की जीत का श्रेय मिला था और राहुल के नेतृत्व पर सवाल उठे थे। तभी यह कहा जा रहा था कि कर्नाटक में प्रियंका सिर्फ औपचारिकता के लिए प्रचार करने जाएंगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने अनेक रोड शो किए और रैलियां कीं।</span></p>
<p><span lang="hi" style="font-size:14pt;font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';" xml:lang="hi">अब कहा जा रहा है कि सोनिया गांधी भी एक रैली करेंगी। सोचें</span><span style="font-size:14pt;font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';">, <span lang="hi" xml:lang="hi">पिछले कई चुनावों से वे कोई जनसभा नहीं कर रही हैं। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में भी सोनिया गांधी ने एक वर्चुअल रैली की थी। उसके अलावा हर राज्य के चुनाव के समय उनका एक वीडियो संदेश जारी होता था और वे एक चिट्ठी लिख देती थीं। लेकिन वे कर्नाटक के हुबली में छह मई को एक चुनावी रैली करेंगी। इस तरह सोनिया और राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा ने कर्नाटक प्रचार की कमान संभाली है। कांग्रेस के जीतने पर श्रेय उनको मिलेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे उनकी धमक बनेगी और इसका असर बाकी राज्यों में भी दिखेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां साल के अंत में चुनाव होने वाले हैं।</span></span></p>
<p><span lang="hi" style="font-size:14pt;font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';" xml:lang="hi">भले ही कर्नाटक में </span><span style="font-size:14pt;font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';">10 <span lang="hi" xml:lang="hi">मई को मतदान होगा और</span> 13 <span lang="hi" xml:lang="hi">मई को नतीजे आने हैं। उसके बाद ही तय होगा कि किसकी सरकार बनेगी और कौन मुख्यमंत्री होंगा। लेकिन सीएसडीएस और एनडीटीवी के सर्वे ने कम से कम कांग्रेस में चल रहा विवाद खत्म करा दिया है। अगर कांग्रेस चुनाव जीतती है तो पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरमैया एक बार फिर मुख्यमंत्री बन सकते हैं। कर्नाटक में मुख्यमंत्री पद के बाकी घोषित या अघोषित दावेदारों में वे सर्वाधिक लोकप्रिय माने गए हैं। ध्यान रहे सीएसडीएस का सर्वेक्षण बाकी किसी भी एजेंसी के मुकाबले ज्यादा वस्तुनिष्ठ और तटस्थ होता है। ऊपर से वह सर्वे एनडीटीवी पर चला है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अदानी समूह के मालिकाने वाला चैनल है। अगर यह सर्वे सही साबित होता है तो बड़े अंतर से कांग्रेस जीतेगी और तब कांग्रेस नेतृत्व की मजबूरी होगी सिद्धरमैया को सीएम बनाने की है।</span></span></p>
<p><span lang="hi" style="font-size:14pt;font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';" xml:lang="hi">इस सर्वेक्षण के मुताबिक कर्नाटक के </span><span style="font-size:14pt;font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';">18 <span lang="hi" xml:lang="hi">से </span>25 <span lang="hi" xml:lang="hi">साल के युवाओं में से </span>40 <span lang="hi" xml:lang="hi">फीसदी ने सिद्धरमैया को और </span>28 <span lang="hi" xml:lang="hi">फीसदी ने बसवराज बोम्मई को अपनी पसंद बताया है। इससे ज्यादा उम्र के लोगों के बीच सिद्धरमैया की लोकप्रियता और ज्यादा है।</span> 56 <span lang="hi" xml:lang="hi">साल तक की उम्र के लोगों में </span>44 <span lang="hi" xml:lang="hi">फीसदी ने सिद्धरमैया को पसंद किया है और सिर्फ </span>22 <span lang="hi" xml:lang="hi">फीसदी ने बोम्मई को। कांग्रेस की ओर से सीएम पद के दूसरे दावेदार डीके शिवकुमार हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनको हर वर्ग के औसत के हिसाब से सिर्फ पांच फीसदी लोगों ने पसंद किया है। ध्यान रहे शिवकुमार लोकप्रिय हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साधन संपन्न हैं और कांग्रेस को चुनाव लड़वा रहे हैं लेकिन वे वोक्कालिगा हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका अधिकतर वोट जेडीएस के साथ जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि सिद्धरमैया ओबीसी समुदाय से आते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी आबादी </span>36 <span lang="hi" xml:lang="hi">फीसदी के करीब है और उसका बहुसंख्यक उनके साथ होता है। यह उनकी ताकत है। इसलिए भी उनको मजबूत दावेदार माना जा रहा था। लेकिन इस सर्वेक्षण के बाद यह लगभग तय हो गया है कि अगर कांग्रेस जीतती है तो सिद्धरमैया मुख्यमंत्री बनेंगे।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="margin-bottom:8pt;line-height:106%;background-image:initial;background-position:initial;background-size:initial;background-repeat:initial;"><strong><span><span lang="hi" style="font-size:14pt;line-height:106%;font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';color:#000000;" xml:lang="hi">अशोक भाटिया</span></span><span style="font-size:14pt;line-height:106%;font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';color:#000000;">,</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="margin-bottom:8pt;line-height:106%;background-image:initial;background-position:initial;background-size:initial;background-repeat:initial;"><strong><span lang="hi" style="font-size:14pt;line-height:106%;font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';color:#000000;" xml:lang="hi">वरिष्ठ</span><span style="font-size:14pt;line-height:106%;font-family:'Nirmala UI', 'sans-serif';color:#000000;">  <span lang="hi" xml:lang="hi">लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार </span></span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 06 May 2023 13:15:58 +0530</pubDate>
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