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                <title>Sampadkiya - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>चाँद मियां से चाँद तक का सफर</title>
                                    <description><![CDATA[<p>रोजाना लिखकर दिहाड़ी कमाने वाले हम जैसे लोग आजकल चकरघिन्नी बने हुए है । लिखने के लिए इतने मुद्दे और विषय कुकुरमुत्तों की तरह उग आते हैं।  तय कर पाना कठिन हो जाता है कि  कौन से मुद्दे पर लिखा जाये और कौन से छोड़ दिया जाये ? आज भी समाने चाँद मियां हैं, गांधी बब्बा  हैं, सर्वपितृ  मोक्ष अमावस्या है और नितिन गडकरी की विषकन्या है। बात चाँद मियाँ से शुरू करते है।  ये चाँद मियां अपने चिर-परिचित साईं बाबा हैं।  काशी के ब्राम्हणो ने अपने शहर के मंदिरों से चाँद मियां की 14  प्रतिमाएं ऐसे हटा दीं जैसे</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/145274/journey-from-chand-miyan-to-chand"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-10/hindi-divas1.jpg" alt=""></a><br /><p>रोजाना लिखकर दिहाड़ी कमाने वाले हम जैसे लोग आजकल चकरघिन्नी बने हुए है । लिखने के लिए इतने मुद्दे और विषय कुकुरमुत्तों की तरह उग आते हैं।  तय कर पाना कठिन हो जाता है कि  कौन से मुद्दे पर लिखा जाये और कौन से छोड़ दिया जाये ? आज भी समाने चाँद मियां हैं, गांधी बब्बा  हैं, सर्वपितृ  मोक्ष अमावस्या है और नितिन गडकरी की विषकन्या है। बात चाँद मियाँ से शुरू करते है।  ये चाँद मियां अपने चिर-परिचित साईं बाबा हैं।  काशी के ब्राम्हणो ने अपने शहर के मंदिरों से चाँद मियां की 14  प्रतिमाएं ऐसे हटा दीं जैसे वे कोई आतंकवादी हों। साईं बाबा का नाम चाँद मियां हो या अब्दुल इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। फर्क इस बात से पड़ रहा है कि  समाज में नफरत मनुष्यों से होती हुई अब बुतों पर आ गयी है। साईं बाबा उर्फ़ चाँद मियां के खिलाफ नफरत का श्रीगणेश दिवंगत शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने किया था ।  काशी के ब्राम्हणों की करतूत देखकर स्वामी जी की आत्मा गदगद हो रही होगी। स्वाभाविक है ऐसा होना।</p>
<p>हमारे देश में किसी चाँद मियां को पूजने की गुंजाईश नहीं है ।  काशी के पंडितों का पंडितों के बूते से बाहर है अन्यथा वे चाँद मियां के बुतों के साथ ही अजमेर जाकर ख्वाजा साहब की मजार भी उखाड़ फेंकते क्योंकि वे भी मियां हैं। काशी के ब्राम्हण दरअसल साईं बाबा की पूजा को प्रेत पूजा मानकर इसको सनातन विरोधी  बता रहे हैं जैसे सनातनी प्रेत,भूत,मशान की पूजा करते ही नहीं हैं। वे पूरे पितृपक्ष में क्या करते हैं वे खुद नहीं जानते। दरअसल काशी के ब्राम्हण न चाँद का अर्थ जानते हैं और न मियाँ का। उनके लिए तो ये दोनों म्लेच्छ हैं,विजातीय हैं,विधर्मी हैं ,उन्हें मंदिरों में पूजने की तो छोड़िये इस मुल्क में भी रहने की इजाजत नहीं दी जाना चाहिए।</p>
<p>कोई चार दशक पहले मैंने भी साईं बाबा के मंदिर जाकर शायद पाप किया था ।  मुझे उस समय किसी ब्राम्हण या शंकराचार्य ने बताया   ही नहीं कि साईं   बाबा चाँद मियां हैं इसलिए उनके दर्शन करने से पाप लगता है। शिरडी के साईं मंदिर में जाने वालों को ये काशी वाले कैसे रोकेंगे मुझे पता नहीं क्योंकि वहां आज भी हर दिन हजारों लोग जाते हैं। काशी वालों कि संसद आजकल देश कि प्रधानमंत्री भी हैं उन्हें चाहिए कि  वे देश में जहँ-जहाँ चाँद मियां कि मंदिर हैं उनके ऊपर बुलडोजर चलवा दें।  शिरडी में तो ये काम और आसान है क्योंकि वहां उनकी अपनी डबल इंजिन की सरकार है। इसके लिए संसद में कोई विधेयक लाने या अध्यादेश  जारी करने की भी जरूरत नहीं है</p>
<p>इस देश की खासियत ये है कि  यहां के ब्राम्हणों को अपना   मूल काम करने की तो फुरसत नहीं है और ऊल-जलूल काम करने कि लिए वे हमेशा तैयार रहते हैं। मैं अभी तक ब्राम्हणों को विद्व्त परिषद का सम्माननीय सदस्य मानता था लेकिन मुझे अब लगता है कि काशी के ब्राम्हण मंडन मिश्र की परम्परा कि ब्राम्हण नहीं है।  वे कूप मंडूक हैं ,उन्हें भी सियासत करना आ गया है। वे भी सरकार की हिन्दू राष्ट्र की कल्पना में डुबकियां लगा रहे हैं। जन्मना मै भी एक ब्राम्हण हूँ लेकिन मुझे ईश्वर की कृपा से न ऐसे सपने आते हैं और न मुझे किसी की पूजा-रचा से कोई आपत्ति है। जिसे ,जो पसंद है वो उसे पूजे। मंदिर बांये,मस्जिद बनाये ,गुरूद्वारे बनाये ,गिरजाघर बनाये। चाहे तो अपने नेताओं की प्रतिमाएं बनाकर उन्हें चाँद मियां के स्थान   पर लगवा कर प्राण- प्रतिष्ठित कर दे।</p>
<p>मुझे l लगता  है कि काशी में जो हुआ है उससे एक बात तो प्रमाणित हो गयी है की नितिन गडकरी की विषकन्या अपना काम करने में कामयाबी कि बहुत नजदीक है। विषकन्या अर्थात सत्ता ने समाज में इतना जहर घोल दिया है की वो अब आदमियों कि साथ-साथ बुतों से भी अदावत मानने लगा है। मेरा आज भी मानना है की काशी कि ब्राम्हण हों या उनके स्मार्टक हिन्दू धर्म में आयी संकीर्णता की वजह से धर्म की दरकती ईंटों को देखकर आतंकित हैं ,उन्हें अपनी रोजी-रोटी पर  खतरा मंडराता दिखाई दे रहा है ।  ये खतरा है या नहीं अलग बात है लेकिन उन्हें ये खतरा महसूस कराया जा रहा है फर्जी आंकड़े दिखाकर ।काशी कि ब्राम्हण नहीं जानते कि चाँद मियां की बिरादरी में बुत परस्ती की मुमानियत है । उनके यहां पांच वक्त की आरती नहीं नमाज होती है  ये तो हम हिन्दुओं में ही मुमकिन है। चाँद मियां कि मंदिर और बुत किसी मुसलमान ने नहीं बनवाये,हिन्दुओं ने बनवाये  है।वाहन पांच वक्त की आरती चाँद मियां की बिरादरी वालों ने शुरू नहीं की बल्कि हिन्दुओं ने शुरू की है।   ऐसे लोगों को देशद्रोही, धर्मविरोधी करार देकर देश के बाहर कर देना चाहिए।</p>
<p>दरअसल ये मंगल पर जाने का नहीं अपितु गाय और गोबर की और लौटने का युग है।  यहां गाय को राजमाता बनाने की होड़ चल  रही है और इसके पीछे वे ही पावन हाथ हैं जो गोमांस  का निर्यात करते हैं। लेकिन काशी कि पंडितों का जोर इनके ऊपर नहीं चलता।  काशी वाले चाँद मियां की प्रतिमाएं तो हटा और हटवा सकते हैं लेकिन गोमांस  का भक्षण करने वाले किसी केंद्रीय मंत्री को मंत्रिमंडल से नहीं निकलवा सकते। । आज जब मै ये सब लिख रहा हूँ  तब मुझे महात्मा गाँधी की याद आती है ।</p>
<p> आज उनका जन्मदिन है। अच्छा हुआ कि वे आज नहीं हैं अन्यथा काशी वालों की करतूत उन्हें भी बहुत परेशान करती। वे परेशान होकर आज भी -' सबको सन्मति दे भगवान ' का भजन गाते दिखाई देते। चाँद मियां के बुतों कि दुश्मनों के लिए तो बाबा गाँधी कि बुत भी कांटे की तरह चुभते हैं। लेकिन सियासी मजबूरी है कि उन्हें देश में भी और विदेश में भी गांधी कि बुतों कि आगे बुत बनकर  अपना शीश  झुकाना  पड़ता है।काशी ब्रांड पंडितों का जोर नहीं है अन्यथा वे गाँधी के बुतों की जगह क्रांतिवीरों कि बुत स्थापित कर चुके होते।<br />बहरहाल आज पितृमोक्ष अमवस्या है।</p>
<p> आज अपने पूर्वजों कि तर्पण का आखरी दिन है ।  काशी कि पंडित अपने पूर्वजों को कैसे विदा करते हैं ये आप सभी ने देख  लिया है।  काशी के पंडितों को पहले मियाँ शब्द कि अर्थ को जान लेना चाहिये ।  चाँद मियां कि साथ जो मियां शब्द बाबस्ता है  वो फ़ारसी का शब्द है। संस्कृत में भी होता तो भी उसका अर्थ  स्त्री का पति, स्वामी, मालिक सादात ही होता।  मियां का अर्थ अल्लाह,मुर्शिद, पीर ,संगीतज्ञ, मिरासी,  मूर्ख, दीवाना, बावला मीरान अर्थात सरदार,आक़ा, मालिक, हाकिम, सरदार, बुज़ुर्ग, वाली वारिस उस्ताद, पढ़ाने वाला, मुल्ला ही होता।</p>
<p> वैसे पहाड़ी राजपूत, राजाओं के ख़ानदानी लोग, ठाकुर, शहज़ादे, शाही ख़ानदान के लोग भी एक -दूसरे के लिए जाने-अनजाने  मियां शब्द का इस्तेमाल  करते रहे हैं। हम तो उन शाइरों को जानते हैं जिनके  नाम कि आगे मियां ऐसे जुड़ा होता है जैसे किसी शहजादे की टोपी में सुर्खाब का पर।  मियां नासिख़, मियां मुसहफ़ी, मियां जुराअत, मियां इशक़ का नाम तो आपने भी सुना ही होगा। हमारे शिवदयाल अष्ठाना  तो हमें  हमेशा मियां ही कहकर पुकारते थे। वे लखनऊ के थे ।  वे भी आज हंस रहें होंगे कहीं स्वर्ग में ये सब देखकर।</p>
<p><strong> राकेश अचल</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 02 Oct 2024 17:26:38 +0530</pubDate>
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                <title>संविधान खतरे में या सिर्फ राजनीति </title>
                                    <description><![CDATA[<div>आज संसद भवन में विपक्ष का एक नया रुप देखने को मिला। इंडी गठबंधन और विपक्ष की अन्य पार्टियों के सांसदों ने जब पहले दिन संसद भवन में प्रवेश किया तो उनके हाथों में संविधान की किताब थी। और वह यह जताने की कोशिश कर रहे थे कि विपक्ष भारत का संविधान बचाने के लिए लड़ रहा है। सोनिया गांधी हों या अखिलेश यादव सभी के हाथों में संविधान था। क्या वास्तव में विपक्ष को संविधान की इतनी चिंता है और क्या वास्तव में एनडीए सरकार संविधान बदलना चाहती है इस पर एक लबी बहस हो सकती है। एनडीए सरकार</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/142458/constitution-in-danger-or-just-politics%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-06/20240624_121437.jpg" alt=""></a><br /><div>आज संसद भवन में विपक्ष का एक नया रुप देखने को मिला। इंडी गठबंधन और विपक्ष की अन्य पार्टियों के सांसदों ने जब पहले दिन संसद भवन में प्रवेश किया तो उनके हाथों में संविधान की किताब थी। और वह यह जताने की कोशिश कर रहे थे कि विपक्ष भारत का संविधान बचाने के लिए लड़ रहा है। सोनिया गांधी हों या अखिलेश यादव सभी के हाथों में संविधान था। क्या वास्तव में विपक्ष को संविधान की इतनी चिंता है और क्या वास्तव में एनडीए सरकार संविधान बदलना चाहती है इस पर एक लबी बहस हो सकती है। एनडीए सरकार ने अपने दस वर्षों के कार्यकाल को पूरा कर लिया है और तीसरी बार वह संसद में पहुंची है। इन दस वर्षों के कार्यकाल की बात करें तो अभी तक संविधान में ऐसा कोई बदलाव नहीं हुआ है जो देश की जनता के लिए हानिकारक हो। हां इसके राजनैतिक कारण हो सकते हैं। वोटरों को लुभाने के लिए बहुत सी बातें कह दी जाती हैं लेकिन उनको पूरा करना इतना आसान नहीं होता है।</div>
<div> </div>
<div> कुछ बदलाव यदि होते भी हैं तो उनको गहराई से देखना होगा क्या इससे वास्तव में भारतीय जनता का कोई अहित हो सकता है। अभी तक ऐसा कुछ भी देखने को नहीं मिला है। एनडीए के पिछले दो कार्यकाल के बाद इस तीसरे कार्यकाल में विपक्ष मजबूत हुआ है। इधर लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी को भी अकेले पूर्ण बहुमत हासिल नहीं हुआ है। एनडीए के घटक दलों में कुछ तकरार होती है तो सरकार भी अस्थिर हो सकती है। विपक्ष बस इसी का फायदा उठाने की कोशिश कर रहा है। यह तो राजनीति में चलता रहता है। पिछले दो कार्यकाल में भारतीय जनता पार्टी को अकेले ही प्रचंड बहुमत मिला था और उसके सहयोगी दल केवल हां में हां मिलाते दिखाई देते थे या फिर शांत होकर देखते रहते थे लेकिन इस बार ऐसा नहीं होगा। जहां गैर जरूरी लगेगा वहां विपक्ष भी सरकार का विरोध करेगा और सरकार के घटक दल भी असहमति व्यक्त कर सकते हैं। इसलिए इस बार एनडीए को बहुत ही साधकर चलना होगा।</div>
<div> </div>
<div>आज जब अचानक से विपक्ष को संसद में प्रवेश करते समय संविधान की किताबों के साथ देखा तो मानो ऐसा लगा कि यह एक सोची समझी रणनीति है। भारतीय जनता पार्टी पिछले दो कार्यकाल में संविधान में जिन नये कानूनों को लाने की बात करती थी आज विपक्ष शाय़द उसी के बल पर मजबूत हुआ है। जनता में शाय़द यह भ्रम हो गया है कि भारतीय जनता पार्टी वास्तव में संविधान बदलना चाहती है। इसलिए विपक्षी खेमा एकमत हो गया। भारतीय जनता पार्टी की पिछली सरकार ने जिन नये कानूनों को लागू करने की बात कही थी शायद उसमें जनता का कुछ भी बुरा नहीं होना था हां यह अवश्य है कि विपक्ष को इससे नुकसान अवश्य हो सकता था।</div>
<div> </div>
<div>भारतीय जनता पार्टी हिंदू हितों की बात करती है लेकिन अल्पसंख्यक भी देश में उतने ही सुरक्षित हैं जितने कि हिंदू हैं। भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव में कुछ भी बोला हो लेकिन चुनाव के बाद अल्पसंख्यकों को भी पूरे वही अधिकार प्राप्त हैं जो पहले भी थे। लेकिन विपक्ष जनता को यह समझाने में कामयाब हो गया कि भारतीय जनता पार्टी अल्पसंख्यकों के अधिकार छीनना चाहती है। विपक्ष अपनी हर जनसभा में लगातार इस बात को दोहराता रहा। विधानसभा की बात हो या लोकसभा सत्र की विपक्ष ने यही आरोप सरकार पर लगाया कि भाजपा अल्पसंख्यक विरोधी है। और भारतीय जनता पार्टी विपक्ष के इन सवालों पर केवल अपना बचाव करती नजर आई। और यही कारण रहा कि भारतीय जनता पार्टी की बातों को विरोधी मतों को एकजुट कर दिया जब कि यहां सिर्फ राजनीति का खेल खेला जा रहा था।</div>
<div> </div>
<div>हिंदू हितों की रक्षा करने वाली एनडीए की सरकार ने कभी यह बात नहीं कही कि वह अल्पसंख्यकों के अधिकार छीन लेगी। भारतीय जनता पार्टी हमेशा कहती रही कि वह सभी धर्मों का सम्मान करती है और किसी भी धर्म के अधिकार छीनने का उसका कोई मकसद नहीं है हां लेकिन वह साथ में यह भी एजेंडा चलाती रही कि वह हिंदुत्व का अहित नहीं होने देगी और यह कहने में कोई बुराई भी नहीं है। जनता केवल राजनीति में गुमराह होती है। सदन में इस बार विपक्ष तगड़ा है। कांग्रेस पार्टी दहाई अंकों को पीछे छोड़ कर सैकड़ा पर पहुंची है। समाजवादी पार्टी जिसके पिछले सदन में सिर्फ पांच सांसद थे आज वह 37 की संख्या पर पहुंची है। इसलिए यह निश्चित है कि इस बार जितने भी सत्र होंगे हंगामे दार होंगे और आज विपक्ष ने यह जाहिर भी कर दिया जब वह संविधान की किताबों को लेकर संसद भवन पहुंचे।</div>
<div> </div>
<div>आज भी देश की आधी आबादी को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी में आस्था है लेकिन भारतीय जनता पार्टी हिंदूत्ववादी पार्टी बनने के चक्कर में विपक्ष को एक करती चली गई और इसका खामियाजा उसे लोकसभा चुनाव में भुगतना पड़ा। जबकि विपक्ष जो कुछ भी कर रहा है यह केवल एक राजनैतिक रणनीति है जो उसे कामयाब होती दिखाई दे रही है। सरकार के फैसले यदि अच्छे होते हैं तो कुछ फैसलों में कमियां भी नजर आती हैं और विपक्ष उन्हीं कमियों को निशाना बनाता है। भारतीय जनता पार्टी आज भी देश की सबसे बड़ी पार्टी है। और यह निश्चित है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व तक कोई उसको नंबर दो पर नहीं पहुंचा सकता। लेकिन इस तरह का दिखावा जो आज संसद भवन में दिखाई दिया यह केवल एक राजनैतिक स्टंट ही मालूम पड़ता है। संविधान न भाजपा के पिछले दो कार्यकाल में ख़तरे में था और न आगे ख़तरे में होगा। भारत का संविधान इतना कमजोर नहीं है जिसे आसानी से कोई बदल सके।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
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                <pubDate>Tue, 25 Jun 2024 15:34:45 +0530</pubDate>
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                <title>कांग्रेस का बसपा को आफर - मानेंगे अखिलेश ?</title>
                                    <description><![CDATA[<div>लोकसभा चुनाव में 66 से 99 पर पहुंची कांग्रेस गदगद है और विशेषकर उत्तर प्रदेश में समाजवादी और कांग्रेस के गठबंधन ने जो प्रदर्शन किया है वह तो अलग ही कहानी लिख रहा है। कांग्रेस का मानना है कि यदि बहुजन समाज पार्टी साथ में होती तो शायद हम इससे कहीं और अधिक सीटें उत्तर प्रदेश में जीतते। कहा जाता है कि दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है और इस चुनाव में भी यह सच ही साबित हुआ। हालांकि उत्तर प्रदेश में पिछड़ने के बाद एनडीए की सरकार तो बन गई लेकिन भारतीय जनता पार्टी को लोकसभा</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/142308/congresss-offer-to-bsp-akhilesh-will-accept"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-06/mayawati-akhilesh-108526355-(1).jpg" alt=""></a><br /><div>लोकसभा चुनाव में 66 से 99 पर पहुंची कांग्रेस गदगद है और विशेषकर उत्तर प्रदेश में समाजवादी और कांग्रेस के गठबंधन ने जो प्रदर्शन किया है वह तो अलग ही कहानी लिख रहा है। कांग्रेस का मानना है कि यदि बहुजन समाज पार्टी साथ में होती तो शायद हम इससे कहीं और अधिक सीटें उत्तर प्रदेश में जीतते। कहा जाता है कि दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है और इस चुनाव में भी यह सच ही साबित हुआ। हालांकि उत्तर प्रदेश में पिछड़ने के बाद एनडीए की सरकार तो बन गई लेकिन भारतीय जनता पार्टी को लोकसभा में अकेले बहुमत नहीं मिला। यह उत्तर प्रदेश की ही खासियत है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सदस्य प्रमोद तिवारी ने बहुजन समाज पार्टी को खुला निमंत्रण दिया है कि वह चाहें तो आगे के लिए गठबंधन में शामिल हो सकतीं हैं।</div>
<div> </div>
<div>प्रमोद तिवारी का कहना है कि उत्तर प्रदेश में गठबंधन ऐसी 16 सीटें हारा है जहां यदि बहुजन समाज पार्टी के वोट उसे मिल जाते तो वह 16 सीटें और जीत सकते थे। मायावती की बहुजन समाज पार्टी का अस्तित्व खतरे में है क्योंकि लोकसभा में उनकी संख्या शून्य हो गई है और विधानसभा में केवल एक विधायक है। इस लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी अपना कोर वोट भी नहीं बचा सकी। इस तरह से यह निश्चित है कि मायावती भी कोई न कोई विकल्प जरुर ढूंढ रहीं होंगी कि भविष्य में उनकी पार्टी का इतना बुरा हाल न हो जो इस बार हुआ है। हालांकि यदि बात करें तो भारतीय जनता पार्टी का कोर वोट भी उत्तर प्रदेश में कम हुआ है जिसका सीधा फायदा समाजवादी पार्टी को मिला है।</div>
<div> </div>
<div>इस चुनाव की बात करें तो मतदाताओं ने जातिगत बंधन को तोड़ कर मतदान किया है। समाजवादी पार्टी को 37 लोकसभा सीट ऐसे ही नहीं मिली हैं। कुछ भारतीय जनता पार्टी की कमियां और कुछ अखिलेश यादव का प्रबंधन इसके लिए अहम है। लेकिन सवाल यह है कि इतनी सफलता पाने के बाद क्या अखिलेश यादव बहुजन समाज पार्टी को गठबंधन में आने देंगे। आज लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है और यदि यही हाल विधानसभा चुनाव में रहा तो यह मामला अखिलेश यादव के पक्ष में आ सकता है।‌ फिर अखिलेश यादव कैसे मायावती से समझौता कर सकते हैं। और मायावती विधानसभा चुनाव में किसी भी हालत में समाजवादी पार्टी से कम सीटों में तैयार नहीं होंगी।
<div> </div>
<div> पिछले लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन था और उस गठबंधन ने 15 लोकसभा सीटें जीती थीं जिसमें बहुजन समाज पार्टी को 10 और समाजवादी पार्टी को 5 सीटों पर विजय प्राप्त हुई थी। और चुनाव बाद मायावती ने तुरंत गठबंधन यह कहकर तोड़ दिया कि सपा अपना वोट बसपा में ट्रांसफर नहीं करा सकी जिससे बसपा को काफी नुकसान हुआ है। जब कि हकीकत कुछ और थी। आज भी समाजवादी पार्टी लोकप्रियता में भारतीय जनता पार्टी के साथ बराबर में खड़ी है। यदि बसपा पिछले लोकसभा चुनाव में सपा के साथ गठबंधन नहीं करती तो उसको एक सीट भी मिलना मुश्किल हो जाती बल्कि उस गठबंधन में समाजवादी पार्टी का ही नुकसान हुआ था।</div>
<div> </div>
<div>और समाजवादी पार्टी केवल पांच सीटें ही जीत सकी थी। उसका कारण स्पष्ट था कि उस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी का वोट समाजवादी पार्टी में ट्रांसफर नहीं हो सका था। यदि हम बात करें 2014 के लोकसभा चुनावों की तो वहां भी बहुजन समाज पार्टी शून्य पर सिमट गई थी और आज भी शून्य पर है। विधानसभा चुनाव अकेले लड़ा वहां भी लगभग शून्य है मतलब 2014 से बसपा जितने चुनाव अकेले लड़ी है उसे शून्य ही मिल रहा है। ऐसे में आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी गठबंधन में आती है तो अखिलेश यादव किसी भी हालत में बहुजन समाज पार्टी को ज्यादा सीटें देने पर सहमत नहीं होंगे। इस बार उत्तर प्रदेश में वोट प्रतिशत में बहुजन समाज पार्टी कांग्रेस से भी पीछे रह गई। और जिस समाजवादी पार्टी के लिए कहा जा रहा था कि वह अपने परिवार की पांच सीटों पर सिमट कर रह जाएगी वह प्रदेश में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी।</div>
<div> </div>
<div>37 सांसदों के साथ समाजवादी पार्टी लोकसभा में देश की तीसरे नंबर की पार्टी बन गई है। कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में उम्मीद दिख रही है लेकिन बिना समाजवादी पार्टी के कांग्रेस किसी हालत में बढ़त नहीं बना सकती। बहुजन समाज पार्टी के लिए आज समय बहुत ही चिंतन का है क्योंकि बहुजन समाज पार्टी ने शून्य से अपना सफर शुरू किया था और फिर से शून्य पर ही आ गई। इसमें सबसे बड़ा कारण है बहुजन समाज पार्टी में टूट। बहुजन समाज पार्टी में अब वो नेता नहीं बचे हैं जिनका अपना वजूद हो वह केवल पार्टी के वोटों की ही मदद से जीतना चाहते हैं।</div>
<div> </div>
<div>बसपा के तमाम नेता सप और कांग्रेस में चले गए हैं और कई तितर-बितर हो गये हैं। पूर्वांचल में कई छोटी छोटी पार्टियां बन जाने से भी बसपा के वोट बैंक पर असर पड़ा है। इस बार समाजवादी पार्टी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश, बुंदेलखंड, मध्य उत्तर प्रदेश और पूर्वी उत्तर प्रदेश में सभी जगह सीटें जीती हैं। यहां तक कि बड़े बड़े भाजपा के नेता भी चुनाव हार चुके हैं। इस तरह से भविष्य समाजवादी पार्टी का ही दिख रहा है। इसके लिए भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश में लगाम कसनी शुरू कर दी है। इस बार उत्तर में भारतीय जनता पार्टी में भितरघात भी हुआ है जिसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ा है। ऐसे में यदि कांग्रेस बहुजन समाज पार्टी को गठबंधन में आमंत्रित कर रही है तो यह समाजवादी पार्टी के लिए एक कठिन निर्णय होगा। सपा सहजता से बहुजन समाज पार्टी को स्वीकार नहीं कर पाएगी।</div>
<div> </div>
<div>इस चुनाव में बसपा का जो कोर वोट खिसका है उसका फायदा समाजवादी पार्टी को काफी मिला है। जो वोट सपा को 2019 के चुनाव में बसपा के साथ मिलकर लड़ने पर नहीं मिल सका था वह 2024 के चुनाव में बिना बसपा के मिल गया। इसलिए अब अखिलेश यादव के लिए यह सहज नहीं होगा कि वह भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन कर सके। और बसपा का कोई भरोसा भी नहीं है कि वह कब गठबंधन से अपना हाथ खींच ले।</div>
<div> </div>
<div>सही मायने में उत्तर प्रदेश में अब लड़ाई भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच ही रह गई है। दूसरे दल अब केवल वोट कटुआ साबित हो रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी में इस बार को लेकर काफी चिंतन मनन हो रहा है हर एक पहलू को देखा जा रहा है कि आखिरकार कमी कहां पर रहा गई है। इसे देखते हुए उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी मंत्रिमंडल में फेरबदल देखने को मिल सकते हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अभी से ही शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। लोकसभा चुनाव सम्पन्न होते ही वही सभी विधायकों और पदाधिकारियों से एक करके मिल रहे हैं। उधर कैबिनेट की मीटिंग भी की जा रही हैं और अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि किसी तरह से जनता के कार्यों में रुकावट न आ सके। अखिलेश यादव ने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है और इसका मतलब यह है कि वह अब केन्द्र में अपनी आवाज बुलंद करेंगे।</div>
<div> </div>
<div>उत्तर प्रदेश में नेता प्रतिपक्ष का कार्यभार शिवपाल सिंह यादव को मिलने की उम्मीद की जा रही है। लेकिन समाजवादी पार्टी के लिए वास्तव में यह एक सुनहरा काल है कि वह लोकसभा को देखते हुए विधानसभा में भी अच्छा प्रदर्शन कर सकती है। भारतीय जनता पार्टी का अयोध्या सीट हार जाना एक छोटी बात नहीं है और इसका संदेश पूरे देश में गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का बनारस में वोट प्रतिशत कम होना भी भारतीय जनता पार्टी के लिए एक चिंता का विषय है। जनता क्या चाहती है यह सरकारों को समझना होगा केवल वोट पाकर अपनी चलाना बिल्कुल भी जनता को पसंद नहीं आ रहा है। बरहाल प्रमोद तिवारी ने बहुजन समाज पार्टी को जिस तरह से आफर दिया है यह समाजवादी पार्टी आसानी से पूरा नहीं होने देगी और यदि गठबंधन होता भी है तो वह समाजवादी पार्टी की शर्तों पर ही होगा क्योंकि अब समाजवादी पार्टी के हौसले बुलंद हैं और वह जानती है कि भारतीय जनता पार्टी से टक्कर लेने के लिए वह उत्तर प्रदेश में अकेले काफी है।</div>
</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 15 Jun 2024 17:14:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>आखिर कथित शाहजादे का इतना खौफ क्यों है ?</title>
                                    <description><![CDATA[<p>देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी जी चुनाव का चौथा चरण आते-आते तक एकदम अमर्यादित हो गए हैं।  वे जिस जबान का इस्तेमाल अस्सी साल के बूढ़े डॉ मनमोहन सिंह के लिए करते थे उसी जबान का इस्तेमाल पचास पार के राहुल गांधी के लिए कर रहे हैं। यहां तक कि वे अब खीज कर कह रहे हैं कि - कांग्रेस के शाहजादे की पार्टी को उनकी उम्र से कम सीटें मिलेंगी।  मै कहता हूँ कि  राहुल गांधी को एक भी सीट न मिले किन्तु प्रधानमंत्री जी को तो अपने शब्दों के गाम्भीर्य को नहीं खोना चाहिए ।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141200/after-all-why-is-there-so-much-fear-of-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/modi-rahul1.jpg" alt=""></a><br /><p>देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी जी चुनाव का चौथा चरण आते-आते तक एकदम अमर्यादित हो गए हैं।  वे जिस जबान का इस्तेमाल अस्सी साल के बूढ़े डॉ मनमोहन सिंह के लिए करते थे उसी जबान का इस्तेमाल पचास पार के राहुल गांधी के लिए कर रहे हैं। यहां तक कि वे अब खीज कर कह रहे हैं कि - कांग्रेस के शाहजादे की पार्टी को उनकी उम्र से कम सीटें मिलेंगी।  मै कहता हूँ कि  राहुल गांधी को एक भी सीट न मिले किन्तु प्रधानमंत्री जी को तो अपने शब्दों के गाम्भीर्य को नहीं खोना चाहिए ।</p>
<p>मोदी जी का मुकाबला कांग्रेस से नहीं बल्कि अपने आप से होना चाहिए  था ।  आखिर कथित शाहजादे का इतना खौफ क्यों है मोदी जी को  ?  .<br />देश और दुनिया देख रही है कि  माननीय मोदी जी  ही नहीं बल्कि उनकी पूरी टीम की बौखहेत में लगातार इजाफा हो रहा है । वे हिंदी शब्दकोश के सबसे परित्यक्त शब्दों का इस्तेमाल कर अपनी गरिमा समाप्त करने में लगे हैं । दुर्भाग्य ये है कि  देश का केंद्रीय चुनाव आयोग माननीय और उनकी फ़ौज को इस मामले में हटक नहीं सकता ,अन्यथा सत्तारूढ़ दल के नेताओं के तमाम ब्यान ऐसे हैं जो उन्हें चुनाव प्रचार से बाहर करने के लिए काफी हैं । लेकिन जब सैयां ही कोतवाल हो तो डर काहे का ? केंचुआ मोदी जी और उनकी  कम्पनी को हड़काने के बजाय पूरे विपक्ष को हड़काने में लगा है ।</p>
<p>मोदी  जी और उनकी फ़ौज शायद नहीं जानती कि  सत्ता हरजाई होती है । ये किसी की नहीं होती . जनता सत्ताधीशों को रोटी की तरह उलटती -पलटती रहती है ,इसलिए सत्ता से चिपके रहने में किसी की भलाई नहीं । कांग्रेस को भी सत्ता से बाहर जाना पड़ा और एक बार नहीं ,अनेक बार । भाजपा को भी सत्ता से बाहर जाने के लिए हर समय कमर कसकर तैयार रहना चाहिए । वैसे भी भाजपा भले ही एक दशक से सत्ता में है किन्तु उसका व्यवहार विपक्षी दलों जैसा ही है।  भाजपा खुद जबाबदेह न हो कर   हमेशा कांग्रेस से सवाल करती है । भूल जाती है कि  कांग्रेस को सत्ता से बाहर गए एक दशक हो चुका है। अब देश की दशा,दुर्दशा के लिए कांग्रेस को नहीं बल्कि भाजपा को ही कोसा जाएगा,निशाने पर लिया जाएगा।</p>
<p>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने  चतरा  की सभा में कहा कि लोकसभा चुनाव 2024 के बीच ‘इंडिया’ अलायंस ने अपनी हार मान ली हैं। पीएम मोदी ने बिना नाम लिए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा- 'शहजादे को उनकी उम्र से भी कम सीटें मिलेंगी। प्रधानमंत्री ने कहा- ‘तीन चरणों के चुनाव के बाद ही कांग्रेस और उसके साथियों ने एक तरह से अपनी हार स्वीकार कर ली है। तीन चरण का मतदान अभी मशीनों में कैद है किन्तु केंद्रीय गृहमंत्री अपनी तीसरी आँख से देखकर कह रहे हैं की भाजपा 190 सीटें तो जीत चुकी है ।</p>
<p>जाहिर है कि  दाल में काला ही काला  है अन्यथा इस तरह की गैरजिम्मेदाराना बात कौन करता है ?<br />मुझे दरअसल आज मातृ दिवस पर राजनीति की राजमाताओं के बारे में लखना था ,लेकिन मोदी जी ने मुझे ऐसा नहीं करने दिया । वे उस राहुल गांधी को शाहजादा कहते हैं जो एक दशक से सत्ता से दूर है। उनकी नजर में राहुल की माँ  और दादी ही नहीं बल्कि नाना भी किसी मुगलिया खानदान के हैं । मोदी जी के मन से अपनी हैसियत की दीनता जाने का नाम नहीं ले रही ।</p>
<p>वे इसीलिए लगातार राहुल-राहुल का नाम जपते रहते हैं। पूरे चुनाव अभियान में शुरू के चार दिन छोड़ दें तो सत्तारूढ़ भाजपा अपने चुनाव घोषणा पत्र और दस साल की उपलब्धियों पर बोलने के बजाय केवल और केवल कांग्रेस तथा राहुल पर केंद्रित है । कभी भाजपा को कांग्रेस का मुसलमान प्रेम खलता है तो कभी वे कांग्रेस के सत्ता में आने पर विरासत कर लगाने की बात करते हैं और जब कुछ नहीं बचता तो कांग्रेस के शुभचिंतक रहे अमरीका में रहने वाले सैम अंकल के विचारों को कांग्रेस का विचार मानकर हल्ला मचाने लगते हैं।</p>
<p>अगर कल मतदान का चौथा चरण न होता  तो तय मानिये मैं मोदी जी के मातृप्रेम   के बारे में लिखता,राहुल गाँधी ,ज्योतिरादित्य सिंधिया के अलावा देश के तमाम  राजनेताओं के मातृप्रेम का उल्लेख करता लेकिन मोदी जी तो अपनी माताराम के स्वर्गवास के बाद किसी की माँ  को माँ  मानते ही नहीं दिखाई दे रहे।  वे राहुल की माँ  को भी अपना राजनितिक शत्रु मानते हैं जबकि श्रीमती सोनिया गाँधी उनसे पुरानी नेता हैं ।  वे १९९१ से देश के सबसे बड़े राजनितिक दल कांग्रेस का प्रत्यक्ष और परोक्ष नेतृत्व कर रहीं हैं। मोदी जी जब अपने गुजरात के मुख्यमंत्री भी नहीं बने थे तब सोनिया गाँधी संसद में प्रतिपक्ष की नेता थीं।  यानि संसदीय जीवन में भी वे माननीय मोदी से कम से कम डेढ़ दशक वरिष्ठ हैं।</p>
<p>बहरहाल  मसला ये है कि  माननीय मोदी जी अपनी जबान का कड़वापन कब दूर कर पाएंगे ।  उनकी जबान की कड़वाहट विपक्षी दलों के लिए ही नहीं बल्कि अपनी पार्टी के नेताओं के लिए भी हैं ।  खासतौर पर उन भाजपा नेताओं के लिए जो या तो उनके समक्ष हैं या उनके लिए प्रतिद्वंदी बन सकते हैं।</p>
<p>देश में चुनाव तो होते आये हैं और आगे भी होंगे। मोदी जी लाख कोशिश कर लें किन्तु ये देश उनके सपनों का देश नहीं बन सकता ।  यहां का संविधान ,खानपान,भाईचारा बदलने वाला नहीं है ।  यहां का 20  करोड़ मुसलमान देश छोड़कर जाने वाला नहीं है। वो यही रहकर मुल्क की तरक्की में भागीदारी करेगा। हमारे बुंदेलखंड में एक कहावत है कि  - कौवों के कोसने से ढोर नहीं मरा करते' अर्थात मोदी जी और उनकी पार्टी देश के मुसलमानों को भले ही भारतीय न माने ,भले ही उन्हें हौवा बनाकर राजनीति करे किन्तु अब मुसलमान देश की एक हकीकत हैं उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक नहीं बनाया जा सकता।</p>
<p>लोकसभा चुनाव के लिए शेष चार चरणों के मतदान के बाद क्या परिणाम आएंगे ये बाद की बात है ,किन्तु अभी इस बात की सख्त जरूरत है कि  नेताओं को बेलगाम होने से रोका जाये। अदावत,नफरत की सियासत पर रोक लगाईं जाये अन्यथा जैसे तमाम गलतियों के लिए भाजपा आज कांग्रेस   को पानी पी-पीकर कोसती है वैसे ही आने वाले कल में भाजपा को भी कोसा जा सकता है। अभी भी समय है सम्हलने का। भाजपा को अटल बिहारी भाजपा बनाने की कोशिश होना चाहिए न की मोशा वाली भाजपा।  </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 13 May 2024 16:14:01 +0530</pubDate>
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                <title>प्रकाश व्यवस्था के माध्यम से ऐतिहासिक महत्व को बढ़ाना </title>
                                    <description><![CDATA[<div>प्रकाश व्यवस्था भारत की स्थापत्य विरासत को बहुत बढ़ाती है, ऐतिहासिक स्थलों को मनोरम दृश्यों में बदल देती है भारत की स्थापत्य विरासत इतिहास, संस्कृति और परंपरा के मिश्रण को दर्शाती है। हलचल भरे शहरी वातावरण में, हमारे विरासत स्मारक हमारे समृद्ध अतीत के शाश्वत गवाह के रूप में खड़े हैं। हालाँकि, शहर के जीवंत दृश्यों के बीच ये वास्तुशिल्प चमत्कार अक्सर पृष्ठभूमि में फीके पड़ जाते हैं।</div>
<div>  </div>
<div>फिर भी, प्रकाश व्यवस्था के रणनीतिक अनुप्रयोग के माध्यम से, इन संरचनाओं को जीवंत बना दिया जाता है, जो कल्पना को मंत्रमुग्ध कर देती हैं और शाम ढलने के बाद उनके आकर्षण</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141198/enhancing-historical-significance-through-lighting"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/hindi-divas34.jpg" alt=""></a><br /><div>प्रकाश व्यवस्था भारत की स्थापत्य विरासत को बहुत बढ़ाती है, ऐतिहासिक स्थलों को मनोरम दृश्यों में बदल देती है भारत की स्थापत्य विरासत इतिहास, संस्कृति और परंपरा के मिश्रण को दर्शाती है। हलचल भरे शहरी वातावरण में, हमारे विरासत स्मारक हमारे समृद्ध अतीत के शाश्वत गवाह के रूप में खड़े हैं। हालाँकि, शहर के जीवंत दृश्यों के बीच ये वास्तुशिल्प चमत्कार अक्सर पृष्ठभूमि में फीके पड़ जाते हैं।</div>
<div> </div>
<div>फिर भी, प्रकाश व्यवस्था के रणनीतिक अनुप्रयोग के माध्यम से, इन संरचनाओं को जीवंत बना दिया जाता है, जो कल्पना को मंत्रमुग्ध कर देती हैं और शाम ढलने के बाद उनके आकर्षण को बढ़ा देती हैं। प्रकाश व्यवस्था के माध्यम से ऐतिहासिक महत्व को बढ़ाना सावधानीपूर्वक डिज़ाइन की गई बाहरी प्रकाश व्यवस्था विरासत स्थलों में नई जान फूंकने, उनके जटिल विवरण और ऐतिहासिक महत्व को उजागर करने की शक्ति रखती है।</div>
<div> </div>
<div>प्रौद्योगिकी, जो अपनी ऊर्जा दक्षता और नियंत्रणीयता के लिए प्रसिद्ध है, इन स्मारकों को आधुनिक दर्शकों को लुभाने के साथ-साथ उनकी विरासत का सम्मान करने वाले तरीके से प्रदर्शित करने का एक अनूठा अवसर प्रदान करती है। प्रकाश समाधानों का लाभ उठाकर, भारत भर के शहर अपने वास्तुशिल्प खजाने को पुनर्जीवित कर रहे हैं, यह सुनिश्चित करते हुए कि वे आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक बने रहें।</div>
<div> </div>
<div>प्रकाश व्यवस्था के साथ भारतीय वास्तुकला परिदृश्य को बदलना कोणार्क के राजसी सूर्य मंदिर से लेकर लखनऊ के प्रतिष्ठित रूमी गेट तक, प्रकाश व्यवस्था ने भारत के स्थापत्य दृश्य को बदल दिया है, जिससे इन संरचनाओं में नई भव्यता और भव्यता आ गई है। सूर्य मंदिर, मोढेरा: गुजरात के मध्य में स्थित, सूर्य मंदिर प्राचीन शिल्प कौशल और स्थापत्य प्रतिभा के प्रमाण के रूप में खड़ा है। गतिशील प्रकाश व्यवस्था के माध्यम से, सूर्यास्त के बाद मंदिर की जटिल नक्काशी और राजसी रूपरेखा को जीवंत बना दिया जाता है।</div>
<div> </div>
<div>पर्यटक मंत्रमुग्ध हो जाते हैं क्योंकि मंदिर एक उज्ज्वल दृश्य के रूप में उभरता है, जो उन्हें समय और इतिहास के माध्यम से यात्रा पर जाने के लिए आमंत्रित करता है। रूमी गेट, लखनऊ: लखनऊ की समृद्ध मुगल विरासत के प्रतीक के रूप में, रूमी गेट भव्यता और ऐतिहासिक महत्व दर्शाता है। गतिशील प्रकाश व्यवस्था गेट के जटिल रूपांकनों और वास्तुशिल्प विशेषताओं को निखारती है, जिससे एक मंत्रमुग्ध कर देने वाली चमक आती है जो दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देती है।</div>
<div> </div>
<div>रात के आकाश में रोशनी से जगमगाता रूमी गेट शहर की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है, जो स्थानीय लोगों और पर्यटकों को इसकी सुंदरता से आश्चर्यचकित होने के लिए आमंत्रित करता है। गुजरात भवन: नई दिल्ली के केंद्र में स्थित, गुजरात भवन गुजरात की जीवंत विरासत का प्रतिनिधित्व करने वाले एक सांस्कृतिक केंद्र के रूप में कार्य करता है। गतिशील प्रकाश व्यवस्था के एकीकरण के माध्यम से, भवन बदल जाता है, एक चमकदार श्रद्धांजलि बन जाता है जो राज्य की समृद्ध परंपराओं का सम्मान करता है।</div>
<div> </div>
<div>प्रकाश की परस्पर क्रिया इसकी विशिष्ट विशेषताओं को बढ़ाती है, जिससे आगंतुकों और राहगीरों के लिए एक मनोरम दृश्य कथा का निर्माण होता है। सिग्नेचर ब्रिज: सिग्नेचर ब्रिज की पूरी संरचना को रोशन करने का दिल्ली सरकार का निर्णय शहर के वास्तुशिल्प स्थलों को बढ़ाने की प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है। शहर के क्षितिज के ऊपर ऊंचा यह पुल अब रात में चमकता है, जिससे आगंतुकों और निवासियों को एक शानदार दृश्य दिखाई देता है।</div>
<div> </div>
<div>मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, अयोध्या: इस वास्तुशिल्प चमत्कार में गतिशील प्रकाश व्यवस्था है जो मंदिर वास्तुकला की नागर शैली से प्रेरित इसके अद्वितीय डिजाइन को पूरा करती है। समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के साथ आधुनिक सुविधाओं का मिश्रण, हवाई अड्डा यात्रियों और आगंतुकों के लिए एक मनोरम अनुभव प्रदान करता है। प्रकाश व्यवस्था भारत की स्थापत्य विरासत को बहुत बढ़ाती है, ऐतिहासिक स्थलों को मनोरम दृश्यों में बदल देती है।</div>
<div> </div>
<div>इस तकनीक को अपनाने से अनुमति मिलती हैशहर अपनी सांस्कृतिक विरासत का प्रदर्शन करें और जीवंत सार्वजनिक स्थान बनाएं, जिससे निवासियों और आगंतुकों का जीवन समृद्ध हो। जैसे-जैसे भारत प्रगति कर रहा है, प्रकाश व्यवस्था नवाचार का प्रतीक है, जो इसके वास्तुशिल्प परिदृश्य के उज्जवल भविष्य की ओर मार्गदर्शन करती है</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 13 May 2024 16:10:19 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>अपनी माटी की ओर चलें एक कदम</title>
                                    <description><![CDATA[<p>हम सब भारत की माटी में जन्मे पले बढ़े। हम सबके जीवन में माटी का बड़ा महत्व है। चाहे हम भारत में हो या दुनिया के किसी देश में हों। बात जब माटी की होगी तब भारत का ही नाम लेते हैं। अपनी माटी अपनी ही है। हमारे लोक जीवन में बार-बार माटी की बात आती है। आधुनिक कथित सोंच ने मिट्टी को डस्ट और एलर्जी वाली वस्तु बताना काफी पहले शुरू किया। मगर एलर्जी वह भी माटी से कोई ठोस तथ्य ना आ सके। पहले घर भी माटी के होते थे। अब भी प्रायः गाँवों में माटी के घर</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/138971/take-a-step-towards-your-soil"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-02/hindi-divas13.jpg" alt=""></a><br /><p>हम सब भारत की माटी में जन्मे पले बढ़े। हम सबके जीवन में माटी का बड़ा महत्व है। चाहे हम भारत में हो या दुनिया के किसी देश में हों। बात जब माटी की होगी तब भारत का ही नाम लेते हैं। अपनी माटी अपनी ही है। हमारे लोक जीवन में बार-बार माटी की बात आती है। आधुनिक कथित सोंच ने मिट्टी को डस्ट और एलर्जी वाली वस्तु बताना काफी पहले शुरू किया। मगर एलर्जी वह भी माटी से कोई ठोस तथ्य ना आ सके। पहले घर भी माटी के होते थे। अब भी प्रायः गाँवों में माटी के घर हैं। आर्थिक सामाजिक परिवर्तन के कारण अब पक्के घर अधिक दिखाई देते है।</p>
<p>माटी के घरों की पुताई माटी से ही होती थी। नीचे माटी ऊपर माटी सब तरफ माटी ही प्रयोग होती रही है। घर में गृहस्थी के नाम पर सबसे अधिक माटी के बर्तन होते थे। जिन्हें हम गगरी,घड़ा ,कलश,मटका,सुराही,मटकी जैसे शब्द प्रयोग अपनी सुविधा और क्षेत्र लोक भाषा के आधार पर नाम रखते थे। अब गाँव और नगर दोनों में सुराही के पानी पर चर्चा होती है।अपने गाँव में कुम्हार परिवार माटी के खिलौने,गगरी,कलश,सुराही, मट का ,मटकी, दिया,डियाली के अलावा विभिन्न प्रकार माटी के उत्पादो को बनाते थे। अब परम्परा टूट गयी। कुम्हार परिवारो के सामने रोजी रोटी का संकट है।वे उपेक्षा का शिकार हैं।</p>
<div>गांव में भी प्लास्टिक की बाल्टी टोंटी वाली पहुंच गई है।जिसे वाटर बैग कहते हैं। माटी के सोंधेपन पर हम सब गांव वाले सीधे ही जुड़े हैं। कोई एक गिलास सुराही,घड़े का पानी पिला दे तो लगता है यह मेरा वही बचपन वाला पानी है। जिन लोंगो को माटी के कुएं ,ईट से बने कुए का पानी पीने का सौभाग्य मिला वही उसकी तासीर को आत्मसात कर सकते हैं। मांगलिक कार्यक्रमों विवाह, तिलकोत्सव, (फलदान ) मुंडन ,छेदन,उपनयन संस्कार में माटी के बर्तन ही प्रयोग होते थे। माडौ (मंडप) के नीचे कलश माटी का ही जल भरकर रखा जाता है। रंगविरंगे अक्षत लगाए जाते हैं ।उसकी सतरंगी छटा हम सब ने देखी है। हमें याद है पच्चासी छियासी के दशक तक रसगुल्ला, जलेबी, बर्फी, कुल्फी ,माटी की ही तश्तरियों (प्लेट)में ही अतिथियों को मांगलिक कार्यक्रमों में दी जाती थी।</div>
<div> </div>
<div>पानी पीने के लिए जिन्हें कुछ लोग हुंडा कहते हैं। कुछ लोक भाषा में कुज्जा भी कहा जाता है। प्रयोग होते थे। तब की स्थिति में उसे हम सब तालाब से आई माटी ही जानते हैं। एक प्रक्रिया से कुम्हार तालाब से माटी लाते। माटी को कूटते , पीसते पानी डालकर चाक पर बर्तन बनाते। आवां में बर्तन पकाया और प्रयोग के लिए तैयार करते। यही बर्तन लोगों को प्रयोग के लिए देते थे। प्रत्येक कुम्हार के अलग अलग किसान होते थे। बर्तन प्रयोग के बाद फिर वापस माटी में मिल जाते। माटी माटी हो गई। मिट्टी मिट्टी हो गई।यह प्राकृतिक समन्वय था। इस पर मीटिंग और बैठकों के प्रस्ताव न थे।</div>
<div> </div>
<div>इसका यह अर्थ भी हमारे कवि मनीषियों ने बताया है कहा कि हमारा शरीर भी माटी है। कुछ भी कर लो, लगा लो,महका लो। चमेली से जूही से गुलाब से पारिजात से मगर माटी को माटी ही होना है। इसे कबीर दास ने कागद कहा। यहु संसार कागद की पुड़िया बूंद परे घुलि जाना है। अब हम अति शहरी जीवन की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। कुम्हारों का भारी नुकसान हुआ है। उन्हें प्रजापति भी कहा जाता है। हो सकता है वह प्रजापति। दक्ष प्रजापति के वंशज हों। माटी के बर्तनों का काम आदिकाल से करते हैं। पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों मृदभांडों से सभ्यताओं और संस्कृतियों के निष्कर्ष निकालते हैं। सिंधु घाटी और मोहनजोदड़ो में यही जांचा। राखीगढ़ी और धोलावीरा को जांचा। मिले रथो को भी जांचा। अर्थात माटी हमारे आदि अनादि के प्रमाण दे रही है।</div>
<div> </div>
<div> मगर आधुनिक विज्ञानियों ने प्लास्टिक की बोतल बनाई। पहले बड़ी अब छोटी भी उपलब्ध हैं। एक बड़ा हिस्सा हमारे जीवन में प्लास्टिक का है। वह हमें प्रतिपल प्रभावित कर रहा है हम जिस पेन से लिख रहे हैं इसका का भी 98% भाग प्लास्टिक का ही है। प्लास्टिक ने हमें माटी से दूर किया, कि परंपरा को प्लास्टिक ने नष्ट किया। कुम्हारों का व्यवसाय तहस-नहस किया। सामग्री रखने के लिए आधुनिक डिब्बे हैं। कुछ डिब्बे खुलने के और बंद होने की मशीनों से युक्त हैं। मगर माटी से तो पृथक ही किया प्लास्टिक ने। आज हमारे कुम्हार परिवार अपनी महान परंपरा से बाहर हैं।</div>
<div> </div>
<div>अन्य व्यवसाय के लिए पीड़ित ह सरकारों ने कुछ नाम मात्र कुम्हारों को भूमि पट्टा माटी के लिए दिए भी। मगर कुम्हारों का अपनी माटी बर्तन काम से पलायन नहीं रोक पाए। इससे जहां रासायनिक कचरे को अपने भीतर ,समुद्र के भीतर ,जल में घुलनशील बना रहे हैं। इधर उधर की बातें हैं ।अपनी माटी अपना देश अपना पर्यावरण नहीं करते । तब तक हम प्रदूषण, प्लास्टिक प्रदूषण ,और बर्तनों के प्रदूषण को शरीर में पहुंचाते रहेंगे। शरीर रुग्ण रहेंगे। बीमारियां बढ़ती रहेंगी। लाखों रुपए दवा इलाज कराने में खर्च होते रहेंगे।</div>
<div> </div>
<div>माटी का स्वास्थ्य खराब हो रहा है जिस तरह से हमारे अंदर प्राण हैं उसी तरह से धरती में प्राणवायु है। पृथ्वी में एक विशेष गंध है उसे सगंधा कहा गया। वह गंध अनेक जहरीले रसायनों से खराब हुई है । खेती करने की परंपरा को काफी पहले खाद से हटाकर वैज्ञानिकों ने किसानों को उर्वरकों की ओर ध्यान आकर्षित कराया था । फिर फसलों को कीटों पतंगों से बचाने के लिए रसायनों के छिड़काव के परामर्श आकाशवाणी और अन्य समाचार माध्यमों से प्रसारित किए गए। अब कृषि वैज्ञानिक ही कह रहे हैं कि रसायनों के प्रयोग से बचे। हम कह सकते हैं कि भारत की आदिकालीन कृषि परंपरा में रसायन खोलकर कर क्षेत्र को भारी नुकसान पहुंचाया गया है ।</div>
<div> </div>
<div>इसकी भरपाई हाल-फिलहाल होती नहीं दिख रही है। आज भी नवरात्र में हम कलश स्थापित करते हैं। माटी के कलश से ही स्वर्ण कलश की यात्रा है।वही कुम्भ है । कुम्भ ही अर्द्धकुम्भ और महाकुम्भ है। वही अमृतकलश है। उसी के पीछे देव और दानव दोनों भागे। कुम्भ कलश से जो पदार्थ बाहर गिरा वह अमृत है। मगर कलश वही। प्राचीन साहित्य में खेती की विशद चर्चा है। हमारे ऋषियों ने कहा थोड़ी से असावधानीकृषि और पशुओं को नष्ट कर देती है। जीवन का आधारभूत तत्व पृथ्वी है। इसी पर सारे प्राणी जन्म लेते है।</div>
<div> </div>
<div>पृथ्वी ही सबको धारण करती है। इसी से नाम पृथ्वी पड़ा। पृथ्वी ही सभी प्राणियों वनस्पतियों का मधु है। सभी प्राणी इस पृथ्वी के सारतत्व है। भूमि पर ही एश्वर्य है। भूमि पर सारे भोग है। यही हमारी संस्कृति है। हमारी सीता है। पृथ्वी विविध रंगधमा्र हैं कही काली हैं। कहीं भूरी है, लाल है,कंकड़ है। भिन्न भिन्न तरह की हैं। भारत का संस्कृति में प्रातः काल धरती को प्रणाम करने की ऋषि परम्परा हैं जिसे हम प्रणाम करते है। उसके प्रति श्रद्धाभाव और आदर होता है। आईये हम सब अपनी मातृभूमि माटी की रक्षा और उसके स्व के लिए मिलकर काम करें। जिम्मेदारी हमारी आपकी भी है। आओ अपनी माटी के लिए माटी के लिए एक कदम चलें।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 27 Feb 2024 20:01:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Office Desk Lucknow]]></dc:creator>
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                <title>राम अयोध्या आ गये हैं, अब चार सौ पार</title>
                                    <description><![CDATA[<div>भारतीय जनता पार्टी ने नया नारा दिया है अबकी बार चार सौ पार। और यह सब अचानक नहीं है इसकी रणनीति काफी पहले से तैयार हो रही थी। हां यह बात अलग है कि चार सौ पार नहीं तो नैया तो पार करा ही देंगे राम जी क्यों कि जनता का मूड भांपकर ही भारतीय जनता पार्टी कोई कदम उठाती है। और यही वजह है कि सभी भारतीय जनता पार्टी से जुड़ते चले जा रहे हैं। नितीश कुमार 15 महीना पहले भारतीय जनता पार्टी पर तमाम आरोप लगाकर आरजेडी से मिलकर सरकार बनाए थे। और कसम खाई थी कि अब</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/138635/ram-has-reached-ayodhya-now-he-has-crossed-four-hundred"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-02/hindi-divas1.jpg" alt=""></a><br /><div>भारतीय जनता पार्टी ने नया नारा दिया है अबकी बार चार सौ पार। और यह सब अचानक नहीं है इसकी रणनीति काफी पहले से तैयार हो रही थी। हां यह बात अलग है कि चार सौ पार नहीं तो नैया तो पार करा ही देंगे राम जी क्यों कि जनता का मूड भांपकर ही भारतीय जनता पार्टी कोई कदम उठाती है। और यही वजह है कि सभी भारतीय जनता पार्टी से जुड़ते चले जा रहे हैं। नितीश कुमार 15 महीना पहले भारतीय जनता पार्टी पर तमाम आरोप लगाकर आरजेडी से मिलकर सरकार बनाए थे। और कसम खाई थी कि अब कभी एनडीए में शामिल नहीं होंगे। जब कि नितीश ने ही भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ इंडिया गठबंधन को खड़ा किया था। ममता बनर्जी पहले ही इंडिया गठबंधन का साथ छोड़ चुकी थीं। और बाद में नितीश कुमार ने भी साथ छोड़ दिया हालांकि ममता किसी के साथ नहीं गई हैं और उन्होंने अकेले चुनाव लड़ने का मन बना लिया है। आम आदमी पार्टी ने असम में अपने दो प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं। यहां कुछ भी अप्रत्याशित नहीं है जो कुछ भी हो रहा है, होना ही था क्योंकि सभी दलों ने देश का मूड समझ लिया है। इसलिए कोई नहीं चाहता कि हम मूड को भांपने के बाद भी अपनी सीटों का बंटवारा करें। उत्तर प्रदेश में भी मामला गंभीर नजर आ रहा है। हालांकि अखिलेश यादव ने जयंत चौधरी को आठ सीटें दे दी हैं लेकिन अभी कुछ भी हो सकता है और अभी तो चुनाव की घोषणा भी नहीं हुई है। सूत्रों की मानें तो भारतीय जनता पार्टी जयंत की आरएलडी को चार सीटें दे रही है लेकिन उन चार सीटों में मंत्री पद भी शामिल हो सकता है। यदि भारतीय जनता पार्टी ने कुछ बहुत दरियादिली जयंत के साथ दिखाई तो शायद जयंत भी उसी खेमे में दिखाई देंगे। सत्ता से दूर रहने में कोई फायदा नहीं है, इससे पार्टी कमजोर होती है। बस यही इन दलों का मानना है। जिस तरह से इंडिया गठबंधन में एक एक जुड़े थे उसी तरह एक एक करके निकलते जा रहे हैं।</div>
<div> </div>
<div> अखिलेश यादव पीडीए का नारा देकर चुनाव मैदान में उतर रहे हैं। ऐसा समझा जा रहा है कि वह भी इंडिया से किनारा करने के मूड में हैं क्योंकि समाजवादी पार्टी ने अपनी पहली लिस्ट में उन सीटों पर भी अपने प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं जो कि कांग्रेस पार्टी लेना चाहती थी। पीडीए का मतलब है पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक। यदि देखा जाए तो कोम्बिनेशन तो अच्छा है लेकिन बात वही है कि वह कितना दलित कितना पिछड़ा और कितना अल्पसंख्यक अपने पक्ष में कर पाते हैं यह उस पर निर्भर करेगा। क्यों कि यही कोम्बिनेशन बहुजन समाज पार्टी का भी है। हालांकि बहिन जी इस बार काफी शांत दिखाई दे रही हैं लेकिन उनकी शांति भी दूसरों का खेल बिगाड़ने का दम रखती है। दलित वोट तो मायावती के साथ है ही, लेकिन इस बात का भी ख्याल रखना चाहिए कि उत्तर प्रदेश के किसी चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ही सर्वाधिक अल्पसंख्यक प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतारती है। भले ही उसके प्रत्याशी जीत न हासिल कर सकें लेकिन खेल बिगाड़ने के लिए वह पर्याप्त हैं। बहुजन समाज पार्टी का दलित वोट तो इस क़दर मायावती का सपोर्टर है कि यदि वह स्वयं कह दें कि दूसरी पार्टी के प्रत्याशी को वोट करना है तब भी वह शिफ्ट नहीं होगा। क्यों कि पिछले लोकसभा चुनाव में में ऐसा देखा जा चुका है। पिछला लोकसभा चुनाव समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने एक साथ मिल कर लड़ा था। उस चुनाव में समाजवादी पार्टी केवल पांच सीटों पर विजई हुई जब कि बहुजन समाज पार्टी ने दस सीटों पर कब्जा किया मतलब सपा से दोगुनी सीटें बहुजन समाज पार्टी ने हासिल की। जब कि उसके बाद हुऐ विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी केवल एक सीट ही जीत सकी। मतलब साफ था कि उस चुनाव में सपा का वोट तो बसपा में ट्रांसफर हो गया लेकिन बसपा का वोट सपा में ट्रांसफर नहीं हो सका। यदि बसपा का वोट सपा को मिलता तो इससे कहीं ज्यादा सीटें सपा की झोली में होती। इसलिए उत्तर प्रदेश में मुख्य मुकाबला भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच ही होने की ही उम्मीद है।</div>
<div>मध्य भारत की बात करें तो यहां भारतीय जनता पार्टी की स्थिति बहुत अच्छी है यह एक हिंदी भाषी क्षेत्र है जिसमें हम मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, और बिहार को ले सकते हैं। हाल ही में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने तीनों राज्यों में विजय हासिल की जब कि उत्तर प्रदेश में उनकी सरकार अच्छे खासे बहुमत के साथ चल रही है। जब कि बिहार में दूसरे नंबर की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में है और इस समय सरकार में भी शामिल है। हिंदी भाषी राज्यों में धार्मिक मान्यताओं को मानने वाले लोगों की संख्या अत्यधिक है और अयोध्या के आयोजन ने यह सिद्ध कर के दिखा भी दिया कि फिलहाल यहां पर किसी का भी टिक पाना बहुत मुश्किल है। यहां उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी बिहार में आरजेडी, राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस अच्छी टक्कर देगी परंतु भारतीय जनता पार्टी को पछाड़ने का माद्दा अभी किसी भी पार्टी में नहीं दिखाई दे रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने अयोध्या के आयोजन से यह सिद्ध कर दिया है कि वह इसी मुद्दे को अंततः प्रमुख बना के रखेगी क्यों कि अयोध्या में जनसैलाब ने जिस तरह के रिकार्ड तोड़े हैं। वह भारतीय जनता पार्टी के लिए संजीवनी बन गये हैं। हालांकि इन प्रदेशों में अन्य तमाम मुद्दों पर चर्चा की जाए तो काफी कुछ भारतीय जनता पार्टी के विरोध में भी जाता है लेकिन राममंदिर और सनातन धर्म मुद्दे ने सभी मुद्दों को दबा दिया है। और भारतीय जनता पार्टी इसी को अपना प्रमुख हथियार मान कर चल रही है। हमने देखा है कि चार बार से मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार चल रही थी और इस बार सभी राजनीतिक विश्लेषकों को पूरी उम्मीद थी कि वहां सत्ता का परिवर्तन होगा। लेकिन सारे कयासों पर उस समय विराम लग गया जब पांचवीं बार भी भारतीय जनता पार्टी ने सरकार का गठन कर लिया। राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार थी जिसे भारतीय जनता पार्टी ने उससे छीना है। यही कारण है कि भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने जो नारा दिया है कि अबकी बार 400 पार उसकी सुगबुगाहट दिखाई दे रही है। कहीं कोई परेशानी नजर नहीं आ रही है। लेकिन फिर भी सतर्कता तो रखनी ही होगी। क्यों कि यह राजनीति है और इसमें अप्रत्याशित परिणामों को होते देखा गया है।</div>
<div>दिल्ली और पंजाब पर आम आदमी पार्टी का कब्जा है लेकिन दिल्ली में मात्र लोकसभा की सात सीटें हैं और यहां बड़ा ही उलटफेर होता है। यहां का वोटर जहां एक ओर विधानसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत से आम आदमी पार्टी की सरकार बनाता है वहीं दूसरी तरफ लोकसभा चुनाव में साभी सातों सीटें भारतीय जनता पार्टी की झोली में डालता है। यहां पर या तो भारतीय जनता पार्टी दिल्ली का संगठन कमजोर है और वह केन्द्र में मोदी सरकार ही देखना चाहता है या केन्द्र में उसको कोई विकल्प नहीं नजर आता है। दिल्ली की तरह पंजाब में भी आम आदमी पार्टी की सरकार है और यहां से भारतीय जनता पार्टी को कोई विशेष उम्मीद भी नहीं है। क्यों कि कई प्रयासों के बाद भी भारतीय जनता पार्टी यहां के वोटर पर अपनी छाप नहीं छोड़ सकी। दक्षिण भारत के राज्यों की बात की जाए तो यहां पर कांग्रेस पार्टी काफी आगे है। और भारतीय जनता पार्टी को जो भी खतरा दिखाई दे रहा है वह दक्षिण के राज्यों में ही दिखाई दे रहा है। कर्नाटक, मिजोरम और असम में कांग्रेस की सरकारें हैं अन्य राज्यों में भी उसकी स्थिति मजबूत है लेकिन यहां भारतीय जनता पार्टी के पास न ही कुछ पाने के लिए है और न ही कुछ खोने के लिए। क्यों कि यहां कांग्रेस के अलावा क्षेत्रीय दलों की स्थिति भी मजबूत है। यदि हम महाराष्ट्र की बात करें तो यहां एनसीपी और शिव सेना को इस कदर तोड़ दिया है कि चुनाव आयोग उनको असली पार्टी ही नहीं मान रहा है। चाहे वह उद्धव ठाकरे की शिव सेना हो या शरद पवार की एनसीपी।</div>
<div>चुनाव आयोग ने अजित पवार की एनसीपी और सिंधे की शिव सेना को मुख्य पार्टी का दर्जा दिया है।</div>
<div>महाराष्ट्र में कांग्रेस की स्थिति मध्यम है और यदि शरद पवार और उद्धव ठाकरे के साथ मिलकर चुनाव लड़ती है तो परिणाम अच्छे ला सकती है। लेकिन यह सत्य है कि यदि इंडिया गठबंधन टूटा नहीं होता तो नजारा कुछ अलग ही दिखाई देता। लेकिन इंडिया गठबंधन के टूटने के बाद शायद भारतीय जनता पार्टी का नारा सही दिखाई दे रहा है।</div>
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<div style="text-align:right;"><strong>   ....जितेन्द्र सिंह पत्रकार</strong></div>
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<div style="text-align:right;"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 10 Feb 2024 12:06:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
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                <title>क्या सचमुच ही बदलाव की आंधी चल उठी ?</title>
                                    <description><![CDATA[<p>पूरे एक दशक बाद देश में क्या सचमुच बदलाव की आंधी चल उठी है ? ये सवाल उन सवालों में से निकला है जो आजकल पांच राज्यों के चुनावों की रैलियों में गूँज रहे है ।  खुद प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को   कहना पड़ रहा है कि बदलाव की आंधी चल रही है। मोदी जी ने हालाँकि ये बात तेलंगाना में कही,किन्तु मुझे लगता है कि मोदी जी ने पहली बार मन की बात सुनकर ही ये बात कही है।</p>
<p>बदलाव एक सहज प्रक्रिया है। ये कभी एक दशक ले लेती है तो कभी पूरी एक सदी। बदलाव न</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/136899/has-the-storm-of-change-really-started"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-11/22_07_2017-indian-politics.jpg" alt=""></a><br /><p>पूरे एक दशक बाद देश में क्या सचमुच बदलाव की आंधी चल उठी है ? ये सवाल उन सवालों में से निकला है जो आजकल पांच राज्यों के चुनावों की रैलियों में गूँज रहे है ।  खुद प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को   कहना पड़ रहा है कि बदलाव की आंधी चल रही है। मोदी जी ने हालाँकि ये बात तेलंगाना में कही,किन्तु मुझे लगता है कि मोदी जी ने पहली बार मन की बात सुनकर ही ये बात कही है।</p>
<p>बदलाव एक सहज प्रक्रिया है। ये कभी एक दशक ले लेती है तो कभी पूरी एक सदी। बदलाव न हो तो सब कुछ ठहरा-ठहरा लगता है। देश की जनता ने 2014  के आम चुनाव में देश की सियासत को बदला और अच्छे दिनों की आस में देश की बागडोर भाजपा को सौंप दी थी ।  देश ने बदलाव के इन्तजार में पांच नहीं बल्कि दस साल भी भाजपा को दिए किन्तु जितना और जैसा बदलाव जनता चाहती थी वैसा बदलाव शायद नहीं हुआ ,इसलिए अब फिर एक दशक बाद देश में बदलाव की आंधी चलना शुरू हो गयी है।</p>
<p>गनीमत है कि इस सच को माननीय मोदी जी ने भी स्वीकार कर लिया है। बदलाव की आंधी इस बार पूरब से शुरू हो रही है। पूरब में पहले मणिपुर जला और जलता ही रहा। आज भी जल रहा है। मणिपुर की आग ऐसी निकली की झुलसने के डर से माननीय प्रधानमंत्री वहां चाहकर भी नहीं गए। मणिपुर तो छोड़िये वे उस मिजोरम में भी नहीं गए जहां कल विधानसभा के लिए मतदान हो चुका है। मिजोरम में बहुत बड़ी संख्या में मतदान हुआ है। मिजोरम में चुनाव प्रचार का बहिष्कार कर भाजपा और मोदी ने पहले ही हार मान ली है।</p>
<p>ये पूरब के वे ही राज्य  हैं जहां पहले प्रधानमंत्री जी ने   50  से अधिक दौरे किये थे। मोदी जी ने भांप लिया की पूरब  में फिलहाल भाजपा की दाल गलने वाली नहीं है। मिजोरम के साथ ही कल छत्तीसगढ़ में भी मतदान का पहला चरण नक्सलियों के विरोध के बावजूद सम्पन्न हो गया। यहां भाजपा और मोदी-शाह की जोड़ी ने हालाँकि पूरा कस-बल लगाया है और आखिर-आखिर में महादेव ऐप में भ्र्ष्टाचार का नमक भी मिलाया ,लेकिन यहां भी भाजपा की दाल गलती दिखाई नहीं दे रही।  बदलाव की आंधी जो चल रही है।</p>
<p>कायदे से इस आंधी में सत्तारूढ़ कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार को उखड़ जाना चाहिए था,लेकिन कांग्रेस ने पांच साल में छत्तीसगढ़ में जिस तरह से लोगों को अच्छे दिन दिखाए हैं उनके चलते महादेव ऐप का कथित भ्र्ष्टाचार भी दबता नजर आ रहा है। हालाँकि हम चाहते हैं कि इस मामले की उच्च स्तरीय जांच भी हो और दोषियों को सजा भी मिले। बदलाव तो राजस्थान के डीएनए में भी है। यहां हर पांच साल में सरकार बदलने की एक अघोषित रिवायत है। किन्तु इस बार लग रहा है कि राजस्थान भी इस रिवायत को बदलते दिखाई दे रहा है।</p>
<p> यहां भी बात छत्तीसगढ़ जैसी ही है। यहां जादूगर  अशोक का जादू काटने में भाजपा को पसीना आ रहा है ,हालाँकि  भाजपा की मोदी- शाह की जोड़ी ने यहां भी पसीना तो खूब बहाया है।राजस्थान में भाजपा का तम्बू 2018  में उखड़ा था।  राजस्थान की सीमा से लगे मध्यप्रदेश में भी बदलाव की सुगबुहाट साफ़ सुनाई और दिखाई दे रही है ।  यहां तीन दर्जन से ज्यादा विधानसभा सीटों पर सत्तारूढ़ भाजपा को कांग्रेस के साथ ही अपनों से यानि बागियों से भी लड़ना पड़ रहा है। ये बाग़ी ही सत्तारूढ़ भाजपा के दुर्ग में आग  लगा रहे हैं।  </p>
<p>यहां तीन साल पहले जैसे तैसे 2018  में ढहे अपने दुर्ग पर काबिज हुई भाजपा के सामने अपने दुर्ग को  बचाने के लिए एक-एक सीट का महत्व है जबकि यहां तो पूरी 30  सीटें खतरे में हैं।यहां कांग्रेस के जय-वीरू को जोड़ी भाजपा के लिए सबसे बड़ी बाधा है। सुदूर दक्षिण में भाजपा को बदलाव की आंधी चलती दिखाई दे रही है। कर्नाटक से उठी इस आंधी का रुख अब तेलंगाना कि और है।  खुद मोदी जी ने कहा है कि तेलंगाना में बदलाव होगा,किन्तु सवाल ये है कि इस बदलाव में भाजपा की कितनी भूमिका होगी,क्योंकि यहां यदि बदलाव हुआ भी तो भाजपा मुख्य प्रतिद्वंदी दल है ही नही।  यहां तो मोर्चे पर कांग्रेस खड़ी दिखाई दे रही है।</p>
<p>बहरहाल जो भी है सब भविष्य के गर्त में है ,भविष्य के बारे में ज्योतिषी ही गुणा-भाग कर सकते है। हम तो केवल अनुमान लगा सकते हैं ,वो भी मोदी जीकी ही तरह। इन पाँचों राज्यों के चुनाव में जनता से जुड़े असल मुद्दे उभरते-उभरते रह गये।  कांग्रेस और भाजपा ने शुरूमें जनता से जुड़े मुद्दों पर राजनीति की ,किन्तु कांग्रेस ने अचानक हवा का रुख बदल दिया। कांग्रेस ने स्थानीय गारंटियों के अलावा जैसे ही जातीय जनगणना की बात   की वैसे ही भाजपा की हवा   खुश्क हो गयी। अब भाजपा भी जातीय जनगणना के जबाब में ओबीसी का मुद्दा उठा रही है।  </p>
<p>भाजपा की पूरी कोशिश है कि कैसे भी वो कांग्रेस को ओबीसी विरोधी साबित कर दे। खुद मोदी जी को पहली बार कांग्रेस द्वारा बनाई गयी पिच पर खेलना पड़ रहा है। वे बार-बार कांग्रेस को ओबीसी विरोधी बता रहे है। दलित महिला  राष्ट्रपति से लेकर ओबीसी सूचना आयुक्त की नियुक्ति तक का जिक्र उन्हें करना पड़ रहा है। यानि कांग्रेस ने भाजपा को अपनी ही जांघ उघाड़कर दिखने पर विवश कर दिया है।</p>
<p>सबसे  ज्यादा हैरानी की बात ये है कि जातीय  गणना का बोतल में बंद जिन्न बाहर निकालने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तक इस मामले में अपना संयम  भूल गए है।  उन्होंने राज्य विधानसभा में इस मुद्दे पर बोलते हुए जिस तरह की शब्दावली और मुहावरे का इस्तेमाल किया है उसे पूरे देश में महिला विरोधी और अपमानजनक माना जा रहा है।</p>
<p>आपको याद दिला दूँ कि  इस देश में राजनीति की रेल को बेपटरी करने के लिए हर बार फिश प्लेटें निकालने के लिए कोई न कोई सामने आ ही जाता है। 2014  में भाजपा थी ,तो अब 2023  में जेडीयू और कांग्रेस है जो पटरी बदलकर सत्ता की रेल को अपने स्टेशनों पर लाकर खड़ी करना चाहती है।  बसपा और सपा जैसे राजनीतिक दल हड़बड़ाकर राजनीति की रेल से उतर कूदने की कोशिश भी करते दिखाई दे रहे हैं।</p>
<p>मध्य्प्रदेश में आईएनडीआइए [इंडिया ] की रेल में स्वर सपा के अखिलेश यादव की परेशानी मध्य्प्रदेश में साफ़ दिखाई दे रही ह। उनकी ही तरह परेशां आम आदमी पार्टी भी है। कुल जमा सबको दिखाई दे रहा है की कहीं न कहीं कुछ न कुछ बदलने  जा रहा है। जनता खुद इस बदलाव की ध्वजवाहक है। मोदी जी और राहुल गाँधी तथा नितीश कुमार की अपनी भूमिकाएं हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
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                <pubDate>Thu, 09 Nov 2023 10:10:21 +0530</pubDate>
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                <title>आटा ले लो आटा, मोदी ब्रांड सस्ता आटा</title>
                                    <description><![CDATA[<p>पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बीच केंद्र सरकार ने ' सस्ता आटा,सस्ती दाल ' लांच कर एक नेक काम किया है ।  सरकार की ये जनकल्याणकारी योजना है क्योंकि देश में अब एक तरफ अडानी का फार्च्यून आटा  आम जनता का खून पी रहा है तो दूसरी तरफ अडानी दाल।  ऐसे में अडानी के कान खींचने के बजाय सरकार ने अपनी ही देशी सहकारी संस्थाओं को अडानी के मुकाबले मैदान में उतार दिया या यूं कहिये खुद मैदान में मोर्चा सम्हाल लिया।  खुद प्रधानमंत्री मोदी जी ने इस ' भारत आटे ' की ब्रांडिंग करने की उदारता दिखाई है।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/136840/take-flour-modi-brand-cheap-flour"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-11/bharat-atta-1-1699277113.webp" alt=""></a><br /><p>पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बीच केंद्र सरकार ने ' सस्ता आटा,सस्ती दाल ' लांच कर एक नेक काम किया है ।  सरकार की ये जनकल्याणकारी योजना है क्योंकि देश में अब एक तरफ अडानी का फार्च्यून आटा  आम जनता का खून पी रहा है तो दूसरी तरफ अडानी दाल।  ऐसे में अडानी के कान खींचने के बजाय सरकार ने अपनी ही देशी सहकारी संस्थाओं को अडानी के मुकाबले मैदान में उतार दिया या यूं कहिये खुद मैदान में मोर्चा सम्हाल लिया।  खुद प्रधानमंत्री मोदी जी ने इस ' भारत आटे ' की ब्रांडिंग करने की उदारता दिखाई है।</p>
<p>केंद्र सरकार देशभर में 27.50 रुपए प्रति किलो की कीमत पर 'भारत आटा' उपलब्ध कराएगी। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने  6 नवंबर को दिल्ली में आटे के वितरण वाहनों  को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। इसे 10 किग्रा  और 30 किग्रा  के पैक में उपलब्ध कराया जाएगा। मोदी जी देश  के पहले उदार प्रधानमंत्री हैं जो चीनी पेटीएम से लेकर देशी भारत आटा बेचने तक के लिए अपनी तस्वीर के इस्तेमाल की इजाजत देते हैं। वे पांच किलो मुफ्त अन्न का थैला हो या कोरोना से बचाव के लिए लगाए गए टीके का प्रमाणपत्र सभी जगह छपने के लिए राजी हो जाते है।  </p>
<p>इतना सहज,सरल और उदार प्रधानमंत्री कम से कम मैंने तो अपने जीवन में अभी तक नहीं देखा। इस समय सचमुच जनता महगाई की मार से सिसक रही है ।  आर्तनाद कर रही है। बाजार पर अडानी और अम्बानी  जी का कब्जा  है। ये दोनों महानुभाव आटा-दाल से लेकर हर माल पर हावी हैं और इनकी चाबी सरकार के पास भी नहीं है। ऐसे में जनता को राहत देने के लिए सरकार ने मोदी ब्रांड   सस्ता भारत आटा और अरहर की दाल बेचने का समानांतर इंतजाम कर सचमुच लोकल्याणकारी काम किया है।</p>
<p>सरकार देश की 80  करोड़ आबादी को पहले से मुफ्त का राशन दे रही है। अब जो शेष 60  करोड़ लोग बचे वे मोदी ब्रांड सस्ता भारत आटा और दाल खरीदकर अपना जीवनयापन आसानी से कर सकते हैं। अपने आपको सच्चा भारतीय साबित करने कि लिए ससताभारत आटा खाने से सस्ता दूसरा क्या रास्ता हो सकता है ? आपको मै इस योजना के बारे में तफ्सील से बताये देता हूँ।  आधिकारिक जानकारी के मुताबिक़  देशभर में  कोई 2 हजार ठिकानों  पर यह मोदी ब्रांड सस्ता आटा मिलेगा। इसे नेशनल एग्रीकल्चरल कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड के साथ ही  नेशनल कोऑपरेटिव कंज्यूमर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया , सफल, मदर डेयरी और अन्य सहकारी संस्थानों के माध्यम से  बेचा जाएगा।</p>
<p>देश में इस समय अलग-अलग ब्रांड का आटा 35  से 50  रूपये किलो के भाव से बिक रहा है। जिसकी जैसी हैसियत है ,वो वैसा आटा खरीदता है। मैंने भी अपनी हैसियत कि मुताबिक कल ही सबसे सस्ता 35  रूपये किलो के भाव से दस किलो आटा खरीदा। पहले हम लोग पूरे साल के लिए गेंहूं खरीदकर रखते थे और फिर चक्की पर जाकर गेंहूं पिसवा लाते थे। अब न गेंहूं खरीदकर भंडारण की क्षमता बची है और न चक्की तक जाने का हौसला ,सो मजबूरन अडानी,अम्बानी  आशीर्वाद ब्रांड  आटे पर निर्भर रहना पड़ता है। सरकार बताती है कि मोदी ब्रांड भारत आटा बनाने केलिए ढ़ाई लाख मीट्रिक टन गेहूं काआवंटन विभिन्न सरकारी एजेंसियों को किया गया है।</p>
<p>उपभोक्ता मामलों के विभाग ने भी माना है कि  देश में आटे की औसत कीमत 35 से 50  रुपए किलो है। गेहूं की लगातार बढ़ती कीमत की वजह से त्योहारी सीजन में आटे की कीमत में तेजी को देखते हुए सरकार ने सस्ते दाम पर आटा बेचने का फैसला किया है। हमारी सरकार मॅंहगाई से जूझने कि लिए आजकल सीधे बाजार में बनिया बनकर उतर आती है। ये दुस्साहस का काम है अन्यथा सरकार का काम प्रशासन करना होता है न कि दाल-आटा बेचना ।  पिछले दिनों जब प्याज मंहगी हुई तो सरकार प्याज बेचने लगी थी। दाम बढ़ने से रोकने कि बजाय खुद ही उस जिंस को बेचना ज्यादा आसान काम है। हमारी सरकार हमेशा आसान काम को प्राथमिकता देती है।</p>
<p>प्याज की बढ़ी कीमतों से उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए सरकार ₹25 किलो की दर  से प्याज बेच रही है। नेशनल कोऑपरेटिव कंज्यूमर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया  और नेफेड ₹25 किलो के भाव  से सस्ती  प्याज पहले से ही बेच रही हैं।<br />नेशनल कोऑपरेटिव कंज्यूमर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया  20 राज्यों के 54 शहरों में 457 खुदरा भंडारों  पर कम दाम  पर प्याज बेच रही है। जबकि नेफेड 21 राज्यों के 55 शहरों में 329 खुदरा भंडारों कि माध्यम से घटी ड्रोन  पर प्याज बेच रही है।केंद्रीय भंडार ने भी बीते शुक्रवार से दिल्ली-एनसीआर  में प्याज की खुदरा बिक्री  के अपने  आउटलेट्स से शुरू कर दिए ।  सरकार 60 रुपए प्रति किलो के भाव पर भारत (चने की दाल उपलब्ध करा रही है। अगर आपको ये सस्ता माल नहीं मिल रहा है तो आप बदनसीब हैं।</p>
<p>आपको मालूम ही है कि हमारी केंद्र सरकार सबको साथ लेकर सबका विकास करने के अलावा बेचने में सिद्धहस्त है ।  पिछले दस साल ने देश का जितना सामान बेचने लायक था सीना ठोंक कर बेच डाला। लेकिन देश का दीवाला नहीं निकलने दिया ।  आखिर सरकार सरकारी सम्पदा को बेचे न तो देश की 80 करोड़ आबादी को मुफ्त में पांच किलो अन्न कहाँ से दे ? इसके लिए कोई अडानी,अम्बानी तो अपने खजाने खोलेंगे नहीं ! अडानी-अम्बानी तो खुद व्यापारी है। मिलकर देश में समानांतर सरकार चलते हैं। खुद सरकार को उनके इशारे पर भरतनाट्यम करना पड़ता है ।  वे अपने दम पर दुनिया  को मुठ्ठी में कर लेते हैं। पहले भी कर लेते थे और अब भी कर रहे हैं।</p>
<p>मै तो कहता हूँ कि केंद्रीय चुनाव आयोग [केंचुआ ] भी सरकार की ही तरह उदारता दिखाए और पांच राज्यों के लिए होने वाले चुनावों में मतदान के दिन मतदान केंद्रों के बाहर लगने वाले राजनीतिक दलों के बूथों पर भारत आटा बेचने की व्यवस्था करे। जनता अपना कीमती वोट सर्कार को दे और लौटते में सस्ता आटा साथ लेकर जाए। वैसे भी चुनाव के समय 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन की योजना के विस्तार की घोषणा जब आदर्श आचार संहिता का उललंघन नहीं है तो मोदी ब्रांड भारत आटा बेचने से कौन से आदर्श   आचार संहिता का उललंघन हो जाएगा ? यूं तो ये संहितायें होती ही उललंघन करने कि लिए हैं। उस लक्ष्मण रेखा का क्या लाभ जिसे कोई लांघे ही न।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
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                <pubDate>Wed, 08 Nov 2023 10:21:01 +0530</pubDate>
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                <title>दम घुटती दिल्ली को कौन बचाएगा ?</title>
                                    <description><![CDATA[<p>आजकल मै लोकतंत्र से ज्यादा दिल्ली को लेकर परेशान हूँ,क्योंकि दिन-ब-दिन दिल्ली का दम घुटते देख रहा हूँ ।  दिल्ली कभी खांसती है, कभी खखारती है,कभी बलगम थूकती है,कभी हांफती है। ये दिल्ली देश की राजधानी है ,इसकी ऐसी दशा कम से कम मुझसे तो देखी नहीं जाती। ऐसी  ही हालत  कोविड काल में आम आदमी की  हुई थी। आम आदमी को तो टीकाकरण ने बचा लिया था किन्तु दिल्ली को कौन और कैसे बचाएगा।</p>
<p>वर्षों पहले जब मै चीन गया था तब वहां ऐसी ही दशा मैंने बीजिंग की देखी थी। वहां रात को आसमान से अम्ल की वर्षा</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/136680/who-will-save-the-suffocating-delhi"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-11/dilli1.jpg" alt=""></a><br /><p>आजकल मै लोकतंत्र से ज्यादा दिल्ली को लेकर परेशान हूँ,क्योंकि दिन-ब-दिन दिल्ली का दम घुटते देख रहा हूँ ।  दिल्ली कभी खांसती है, कभी खखारती है,कभी बलगम थूकती है,कभी हांफती है। ये दिल्ली देश की राजधानी है ,इसकी ऐसी दशा कम से कम मुझसे तो देखी नहीं जाती। ऐसी  ही हालत  कोविड काल में आम आदमी की  हुई थी। आम आदमी को तो टीकाकरण ने बचा लिया था किन्तु दिल्ली को कौन और कैसे बचाएगा।</p>
<p>वर्षों पहले जब मै चीन गया था तब वहां ऐसी ही दशा मैंने बीजिंग की देखी थी। वहां रात को आसमान से अम्ल की वर्षा होती थी ।  सड़क किनारे खड़ी कारों को सुबह पहचानना कठिन होता था क्योंकि कारों पर धूल  की गहरी परत के साथ पानी की बूंदों की ऐसी वर्षा होती थी कि  कारों पर कोलाज बन जाता था। मै तीन दिन बीजिंग में था ,लेकिन मैंने वहां एक दिन भी ढंग से सूरज को मुस्कराते नहीं देखा। सूरज बीजिंग में हमेशा धुंध के नीचे ही दबा सिसकता दिखाई देता था ।  यहां तब भी लोग मास्क लगते थे जब दुनिया में कोविड नहीं था । उस समय मुझे अपनी दिल्ली की बहुत याद आती थी ,क्योंकि दिल्ली भी बीजिंग होती दिखाई देने लगी थी।</p>
<p>दिल्ली केवल आम  आदमी पार्टी की दिल्ली नहीं है। दिल्ली भाजपा और कांग्रेस की भी दिल्ली नहीं है। दिल्ली मुगलों की भी दिल्ली नहीं है,दिल्ली तोमरों की भी दिल्ली नहीं है। दिल्ली पूरे देश की दिल्ली है ।  यहां देश के सभी प्रांतों के लोग रहते है। दिल्ली में देश की आत्मा धड़कती है। कोई एक करोड़ सत्तर लाख लोग दिल्ली की जान हैं और आज इन सभी की जान सांसत में है। आजकल तो दिल्ली हांफने के साथ कांपने भी लगी है। दिल्ली में कभी भी भूकंप के झटके महसूस किये जाने लगते हैं।</p>
<p>दिल्ली की गंभीर हालत को देखते हुए सर्दी शुरू होने से पहले ही  दिल्ली में प्रदूषण गंभीर स्तर पर पहुंच गया। गुरुवार शाम पांच बजे दिल्ली में ऐ क्यों आई 402 दर्ज किया गया। पूर्वानुमान के अनुसार प्रदूषण को बेहद खराब स्तर पर बने रहना था। पांच बजे स्थितियां बिगड़ती देखकर कमिशन फॉर एयर क्वॉलिटी एंड मैनेजमेंट (सीएक्यूएम) ने इमरजेंसी मीटिंग बुलाई और दिल्ली एनसीआर में जी आर ऐ पी  के स्टेज-3 को लागू करने का फैसला ले लिया गया। इसके तहत अब दिल्ली-एनसीआर में निजी निर्माण पर रोक होगी।</p>
<p>दिवाली से पहले लोग रंगाई-पुताई, ड्रिलिंग का काम भी नहीं करवा सकेंगे।जी आर ऐ पी  प्रदूषण से निबटने का ऐसा सिस्टम है जिसमें प्रदूषण का लेवल बढ़ने के साथ बंदिशें अपने आप लागू हो जाती हैं।दिल्ली में जब भी बीमारी बढ़ती है सबसे पहले बच्चों का स्कूल जाना ब्नद हो जाता है करीब 1483 वर्ग किलोमीटर में फैली  दिल्ली जनसंख्या के तौर पर भारत का दूसरा सबसे बड़ा महानगर है। दिल्ली के एक तरफ दक्षिण पश्चिम में अरावली पहाड़ियां हाँ तो  पूर्व में  पहले से बीमार यमुना नदी  बहती है । दिल्ली पहले भी  गंगा के मैदान से होकर जाने वाले वाणिज्य पथों के रास्ते में पड़ने वाला मुख्य पड़ाव था और आज भी है ।  </p>
<p>दिल्ली के बिना देश बनता ही नहीं है ।  दिल्ली के बिना मुगल भी अधूरे थे,अंग्रेज भी और आज भाजपा और कांग्रेस के लिए दिल्ली जरूरी है । लेकिन एक बीमार दिल्ली का उपचार करने की फुरसत किसी के पास नहीं है ।  दिल्ली सरकार के दो मंत्री जेल में है।  दिल्ली के मुख्यमंत्री को जेल भेजने की तैयारी है ,लेकिन इसका दिल्ली की गंभीर  रूप से खराब हो चुकी आवो-हवा से कोई लेना देना नहीं है। आम आदमी पार्टी की सरकार को जेल में डालने से यदि दिल्ली का स्वास्थ्य  ठीक हो जाता तो इसे भी बर्दास्त कर लिया जाता ,किन्तु ऐसा कुछ हो नहीं रहा।</p>
<p>दिल्ली की बीमारी कोई नई नहीं है ।  दिल्ली सर्दियां शुरू होने से पहले हर साल बीमार होती है ।  दिल्ली का दम घुटने का एक कारण पराली का धुंआं है तो दूसरा कारण सड़कों पर आयी वाहनों की बाढ़ भी है। दिल्ली कब जहरीली गैसों के चैंबर में तब्दील हो जाये,कोई नहीं जानता ।  दिल्ली में कब दिन में अन्धेरा छा जाये ये भी किसी को पता नहीं है ।  यहां दिन में तारे नजर आना आम बात है। गौतमबुद्ध नगर,गुरुग्राम,गाजियाबाद ,झझर ,फरीदाबाद सबके सब प्रदूषित हो गए हैं। दिल्ली और दिल्ली के आसपास मेरे तमाम प्रियजन और परिजन रहते हैं। मुझे उन सबकी चिंता लगी रहती है। सरकार को भी सभी की चिंता होती है लेकिन सरकार सब कुछ अकेले नहीं कर सकती।</p>
<p>जनता को भी कुछ -कुछ करना होता है जो जनता करती नही।  हमारी जनता सनातनी और धार्मिक है ।  वो करवा चौथ हो या दशहरा बिना पटाखे चलाये रह नहीं सकती भले ही फेंफड़े धुंए से काले पड़ जाएँ ,सिकुड़ जाएँ।  प्रतिबंधों का जनता पर कोई असर नहीं होता। आज की दिल्ली कल की दिल्ली से अलग थी ।  मुगलों की दिल्ली में भी इतना दम नहीं घुटता था जितना आज घुट रहा है । अंग्रेजों की दिल्ली में भी दम तो घुटता था लेकिन आज की तरह नही।।  आज की दिल्ली में तो सब कुछ अपना है ।  </p>
<p>आजादी है, संविधान है,सरकार है लेकिन दम फिर भी घुट रहा है। महाभारत काल में इंद्रप्रस्थ कही जाने वाली दिल्ली आजकल प्रदूषणप्रस्थ बन चुकी है। मुझे कभी-कभी लगता है कि  दिल्ली का लाल किला नेताओं की तरह बोल नहीं पाता अन्यथा प्रदूषण के घबड़ाकर वो भी अन्यंत्र जाने की मांग   कर बैठता। एक जमाने में हमारा ग्वालियर भी एनसीआर का हिस्सा बनाया जाने वाला था ,लेकिन अच्छा हुआ की हमारे निकम्मे नेताओं की वजह से ऐसा नहीं हुआ,अन्यथा आज हमारे शहर का भी दम दिल्ली की तरह ही घुट रहा होता।</p>
<p> दिल्ली की बीमारी कोई नई नहीं है। हमारे पत्रकार साथी  बताते हैं कि दिल्ली की वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) आम तौर पर जनवरी से सितंबर के बीच 101-200  के  स्तर पर रहती  है,  यह तीन महीनों में बहुत खराब (301-400), गंभीर (401-500) या यहां तक कि खतरनाक (500+) के स्तर में भी हो जाती है। अक्टूबर से दिसंबर के बीच, तो दिल्ली मरते-मरते बचती है। दिल्ली को अस्थमा है, दिल्ली को नजला है,दिल्ली को ब्रोन्काइट्स है।</p>
<p>दिल्ली के फेंफड़े दागदार है। दिल्ली का दिल फिर भी जैसे -तैसे  धड़क रहा है। कल्पना कीजिये यदि दिल्ली को यूक्रेन और फिलिस्तीन की तरह यदि कभी बारूद का समान करना पड़े तो क्या हाल होगा दिल्ली का। सो प्लीज दिल्ली को बचाइए ,सरकारें तो आती-जातीं रहेंगी किन्तु अगर दिल्ली ही न रही तो फिर क्या होगा ? दूसरे शहरों का क्या होगा ?</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 05 Nov 2023 10:44:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Office Desk Lucknow]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>दलितों को लुभाने की कोशिश में कितने कामयाब हो सकते हैं अन्य दल</title>
                                    <description><![CDATA[<p>चुनावों का मौसम चल रहा है एक के बाद एक चुनाव देश भर में होने हैं। अभी नवंबर में पांच राज्यों मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, तेलंगाना, और मिजोरम में विधानसभा चुनावो की तारीखों की घोषणा चुनाव आयोग कर चुका है। जिनके चुनाव परिणाम दिसंबर में घोषित कर दिए जाएंगे और उसी के बाद नये वर्ष में देश में नई लोकसभा के लिए चुनाव होने हैं। उत्तर प्रदेश में समेत हर राज्य में चुनाव की आहटें सुनाई दे रही हैं।</p>
<p>हम बात कर रहे हैं उत्तर प्रदेश की राजनीति की और यहां वर्षों से चुनाव जातियों को आधार बनाकर ही लड़े जाते</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/136481/how-successful-can-other-parties-be-in-trying-to-woo"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-10/img_20231029_105821.jpg" alt=""></a><br /><p>चुनावों का मौसम चल रहा है एक के बाद एक चुनाव देश भर में होने हैं। अभी नवंबर में पांच राज्यों मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, तेलंगाना, और मिजोरम में विधानसभा चुनावो की तारीखों की घोषणा चुनाव आयोग कर चुका है। जिनके चुनाव परिणाम दिसंबर में घोषित कर दिए जाएंगे और उसी के बाद नये वर्ष में देश में नई लोकसभा के लिए चुनाव होने हैं। उत्तर प्रदेश में समेत हर राज्य में चुनाव की आहटें सुनाई दे रही हैं।</p>
<p>हम बात कर रहे हैं उत्तर प्रदेश की राजनीति की और यहां वर्षों से चुनाव जातियों को आधार बनाकर ही लड़े जाते हैं। जातियों के समीकरण बनाने में कोई दल अछूता नहीं है। सभी अपनी अपनी तरह से हर जाति को लुभाने की कोशिश में लगे हुए हैं। जहां एक ओर भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जैसी बड़ी पार्टियां उत्तर प्रदेश में हैं तो वहीं ऐसी छोटी छोटी पार्टियां भी हैं जो केवल एक एक जाति की राजनीति करती हैं। इन राजनैतिक दलों में अनुप्रिया पटेल की अपना दल औम प्रकाश राजभर की सुभासपा, संजय निषाद की निषाद पार्टी, केशव देव मौर्या की महान् दल, और अपना दल कमेरावादी जैसी पार्टियां शामिल हैं।</p>
<p>इस समय प्रदेश में सभी पार्टियां दलितों को रिझाने की कोशिश में लगी हुई हैं। यदि केवल उत्तर प्रदेश की बात की जाए तो यहां दलितों के एक विशेष वर्ग पर बहुजन समाज पार्टी का अच्छा खासा एकाधिकार है वह है जाटव वर्ग। मायावती का इस वर्ग पर बहुत बड़ा भरोसा है। और अभी तक इस वर्ग ने मायावती को निराश भी नहीं किया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस वर्ग के एक और नेता अपनी अच्छी खासी पकड़ बनाने में कामयाब दिख रहे हैं लेकिन अभी तक उनको कामयाबी हासिल नहीं हो सकी है क्योंकि किसी अन्य वर्ग को साधने में वह कामयाब नही हो पाये हैं। किसी अन्य दल से कोई गठबंधन भी नहीं हो सका जिससे वह आगे बढ़ सकें। </p>
<div>
<div>दलितों में जाटव के अलावा भी कई वर्ग हैं और उन्हीं जातियों पर सभी राजनैतिक पार्टियां नज़र गड़ाए बैठी हुई हैं। और जगह जगह बौद्ध और बाल्मीकि समारोह के आयोजन आयोजित किए जा रहे हैं। 24 का लोकसभा चुनाव बहुत ही खास हो चुका है। क्यों एक तरफ प्रचंड बहुमत वाली भारतीय जनता पार्टी है तो दूसरी तरफ समूचे विपक्ष का समूह इंडिया गठबंधन है। अभी तक विपक्ष अपने अपने प्रत्याशी को उतारता था लेकिन इस चुनाव में संयुक्त प्रत्याशी उतारने की प्रक्रिया पर बड़ी तेजी से काम चल रहा है।</div>
<div> </div>
<div>विपक्ष की एक जुटता पर भारतीय जनता पार्टी की नजर है। और यही इस चुनाव को दिलचस्प बनाती है। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के छोटे छोटे जातिगत राजनैतिक दलों में से ज्यादातर भाजपा समर्थित एनडीए के साथ हैं। ये दल हमेशा सत्ता के करीब रहना चाहते हैं। सपा, बसपा और कांग्रेस ने भी जातिगत समीकरण साधना शुरू कर दिया है। और हर पार्टी ने अपने अपने दलित नेताओं को दलित वोट साधने के लिए आगे कर दिया है। समाजवादी पार्टी ने यादव तथा अन्य ओबीसी वोटों के साथ मुस्लिम मतदाताओं का समीकरण बनाकर राजनीति की है। लेकिन पिछले काफी समय से ओबीसी की कई जातियां समाजवादी पार्टी से छिटक कर भारतीय जनता पार्टी के साथ चली गई हैं और इसी कमी को पूरा करने के लिए वह अन्य दलित वर्ग को साधने में जुटी है। </div>
<div> </div>
<div>एक समय में दलित वर्ग कांग्रेस का एक बहुत बड़ा वोट बैंक होता था। लेकिन जब से कांशीराम और मायावती ने दलितों की राजनीति शुरू की तो वह पूरा वोट उनकी तरफ शिफ्ट हो गया। कुल मिलाकर आज जिस वर्ग की राजनीति सपा, बसपा और अन्य विपक्षी दल कर रहे हैं यह सारा वोट कांग्रेस का ही जनाधार था। लेकिन अब उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पास तो किसी वर्ग का जनाधार नहीं है और वह अपना जनाधार बनाने की पूरी कोशिश में लगी है। भारतीय जनता पार्टी भी जातिगत राजनीति से अछूती नजर नहीं आती है।</div>
<div> </div>
<div>भले ही भाजपा अपने को यह दर्शाने की कोशिश करे कि वह सभी जातियों को एक समान देखती है। लेकिन जगह जगह पर उसे भी जातिगत समीकरण बनाने पड़ते हैं। स्वयं भी और अपने सहयोगी दलों के द्वारा वह अच्छे समीकरण बनाने में कामयाब हुई है। दलितों में काफी संख्या में एक ऐसा वोट है जो चुनावों के दौरान आसानी से शिफ्ट हो जाता है। और इसी वोट पर सभी राजनैतिक दलों की निगाहें जमी रहती हैं।</div>
<div> </div>
<div>प्रदेश में सभी राजनैतिक पार्टियां इस समय बौद्ध और बाल्मीकि सम्मेलन अपनी अपनी तरह से आयोजित कर रही हैं। अभी हाल ही में कानपुर में हुए बाल्मीकि सम्मेलन में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी शिरकत की। अखिलेश यादव भी कई सम्मेलनों में इस वर्ग को साधने में देखे गए हैं। वहीं मायावती का कहना है कि दलितों के लिए किसी पार्टी ने कुछ नहीं किया। और वह पार्टियां अब उनका वोट पाने के लिए ढकोसला कर रही हैं।</div>
<div> </div>
<div>उत्तर प्रदेश में दलित वोटों की संख्या का कुल प्रतिशत लगभग 19 प्रतिशत है जो कि एक बहुत बड़ी संख्या है। इसमें से ज्यादातर तो बहुजन समाज पार्टी के साथ है लेकिन अन्य वोट जो आसानी से शिफ्ट हो जाता है उस पर ही इस समय सभी पार्टियों का फोकस है। दलितों के मसीहा कहे जाने वाले बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर अब सबको याद आने लगे हैं। जब कि पहले उनको सिर्फ संविधान रचैता के रुप में ही देखा जाता था।</div>
<div> </div>
<div>परंतु अब भीमराव अम्बेडकर की जयंती पर कोई दल ऐसा नहीं है जो उनके अनुयायियों को लुभाने की कोशिश न करे। दरअसल यह वर्ग ही पहले समाज में सबसे शोषित और वंचित था। लेकिन अब ऐसा नहीं है। दलित वर्ग ने भी आजादी के बाद से अब तक काफी प्रगति की है। लेकिन यह भी निश्चित है कि अन्य जातियों के मुकाबले यह वर्ग अभी भी काफी पीछे है। और मायावती इस वर्ग की सबसे हिमायती नेता के रुप में देखी जाती हैं।</div>
<div> </div>
<div>पश्चिमी उत्तर प्रदेश में युवा नेता के रुप में चन्द्रशेखर आजाद उर्फ रावण ने भी अपनी आजाद समाज पार्टी का गठन किया है। और वह पूरी कोशिश में है कि बहुजन समाज पार्टी के वोटरों को अपनी तरफ आकर्षित कर सके। कुल मिलाकर लोकसभा चुनाव से पहले दलित वोटों का खेल खेला जाना शुरू हो गया है। अब देखना है कि चुनावों में कौन सा दल इनको प्रभावित करने में कामयाब हो सकेगा। </div>
</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 31 Oct 2023 17:33:09 +0530</pubDate>
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                <title>दिल्ली से दिमनी तक मुन्ना ही मुन्ना  </title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>मध्यप्रदेश </strong>की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री उमा भारती और गृहमंत्री डॉ नरोत्तम मिश्रा के बाद आज आपको  देश के एक ऐसे नाकाम कृषि मंत्री का किस्सा बताता हूँ जो मोदी सरकार की नाक नीची कराने के लिए हमेशा याद किया जायेगा ।  केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को प्रधानमंत्री ने इसी नाकामी की सजा देते हुए मप्र विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए चम्ब्ल वापस भेज दिया है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान जहाँ नामांकन पत्र भरने के बाद चुनाव प्रचार के लिए अपने निर्वाचन क्षेत्र में नहीं जाते वहीं केंद्रीय कृषिमंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के लिए उनका</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/136480/munna-hi-munna-from-delhi-to-dimni"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-10/muna3.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>मध्यप्रदेश </strong>की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री उमा भारती और गृहमंत्री डॉ नरोत्तम मिश्रा के बाद आज आपको  देश के एक ऐसे नाकाम कृषि मंत्री का किस्सा बताता हूँ जो मोदी सरकार की नाक नीची कराने के लिए हमेशा याद किया जायेगा ।  केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को प्रधानमंत्री ने इसी नाकामी की सजा देते हुए मप्र विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए चम्ब्ल वापस भेज दिया है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान जहाँ नामांकन पत्र भरने के बाद चुनाव प्रचार के लिए अपने निर्वाचन क्षेत्र में नहीं जाते वहीं केंद्रीय कृषिमंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के लिए उनका विधानसभा क्षेत्र रात-दिन चिंता का विषय  बना रहता है।</p>
<p>राजनीति में ठीक 40  साल पहले ग्वालियर नगर निगम के पार्षद का चुनाव लड़कर कदम रखने वाले नरेंद्र सिंह तोमर को चालीस साल बाद एक बार फिर विधानसभा का चुनाव लड़ने के लिए मैदान में उतारा गया है। वे मुरैना जिले की दिमनी सीट से भाजपा के प्रत्याशी है ।  मजे की बात ये है कि वे भाजपा चुनाव अभियान समिति के प्रमुख भी हैं और पार्टी के स्टार प्रचारक भी।  मोदी जी ने अपनी इस तलवार से सुई का काम लेने का प्रयोग किया है क्योंकि उनकी ये तलवार  दो साल पहले देश में हुए किसान आंदोलन के समय मौथरी साबित हुई थी। मोदी सरकार को जितना नीचा कभी संसद के दोनों सदनों में नहीं देखना पड़ा था, उससे ज्यादा नीचा इस किसान आंदोलन को समाप्त कराने में असफल रहे कृषि मंत्री नरेंद्र</p>
<p>सिंह तोमर की वजह से तीन किसान विधेयक वापस लेने की वजह से देखना पड़ा था। मध्य्प्रदेश विधानसभा के चुनावी रण में उतारे गए तीन केंद्रीय मंत्रियों और सात सांसदों में से नरेंद्र सिंह तोमर अकेले ऐसे हैं जिनके लिए अपना विधानसभा क्षेत्र छोड़ना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है ।  मप्र में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की तरह विधानसभा क्षेत्र अपने बेटों और कार्यकर्ताओं के भरोसे छोड़ना न नरेंद्र सिंह तोमर के लिए आसान है और न प्रह्लाद पटेल के लिये । फग्गन सिंह कुलस्ते के लिए तो बिलकुल नहीं। पार्टी के राष्ट्रिय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय की भी यही दशा है ।</p>
<p> विजयवर्गीय इंदौर शहर से चुनाव लड़ रहे हैं। वे भी कहने को पार्टी की तलवार हैं लेकिन उनका इस्तेमाल सुई की ही तरह किया जा रहा है। विजयवर्गीय को उनके बेटे आकाश विजयवर्गीय की जगह चुनाव लड़ने के लिए विवश किया गया है<br />भाजपा के राज में मध्य्प्रदेश ऐसा अजब प्रदेश बन गया है जहां बेटे अपने बाप के लिए जनता से वोटों की भिक्षा मांग रहे हैं। जबकि होना उलटा था ।  इन सभी को अपने बेटों के लिए जनता से वोट मांगना थे,लेकिन मोदी जी हैं तो सब कुछ मुमकिन है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी और उनके हनुमान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अकेले नरेंद्र  सिंह तोमर ,प्रह्लाद पटेल और फग्गन सिंह कुलस्ते की पीठ पर बस्ते नहीं लादे बल्कि 73  साल की श्रीमती माया सिंह और 81  साल के नागेंद्र सिंह और जयंत मलैया को भी भजन करने की उम्र में चुनावी समर  में उतार दिय। ये सभी उम्र दराज नेता अपने बेटों के सहारे हैं।</p>
<p>चम्ब्ल के औरेठी गांव में जन्मे केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर का नसीब हमेशा से अच्छा रहा ।  वे 1983  में पार्षद का चुनाव लड़े और जीते। उन्हें नसीब से भाजुमो के अध्यक्ष पद से लेकर पार्टी की मप्र इकाई के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी भी मिली ।  वे 1998  में विधायक बने और 2003  में प्रदेश में भाजपा की सरकार  बनते ही मंत्री भी बने ।  उन्हें 2009  में निर्विरोध राज्य सभा भेजा गया। वे 2009  में ही मुरैना से लोकसभा के लिए चुने गये ।  </p>
<p>2014  में वे ग्वालियर से लोकसभा का चुनाव लड़कर जीते । 2019  में उन्हें दोबारा मुरैना से लोकसभा चुनाव लड़ाया और जिताया गया । तोमर को पिछले दस साल में केंद्र में एक छोड़ दस विभागों में काम करने का मौक़ा मिला लेकिन इतने होनहार और काबिल  नेता को मोदी जी ने   अचानक विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए दिल्ली सी दिमनी भेज दिया । कारण मै आपको बता ही चुका हूँ। मोदी जी अपने अपमान का हिसाब पूरा कर रहे हैं।</p>
<p>नरेंद्र सिंह तोमर को उनके प्रशंसक मुन्ना के नाम से पुकारते है।  जैसा मैंने पूर्व के लेखों में बताया था की ग्वालियर चंबल की भाजपाई  राजनीति में अन्ना,मुन्ना और गन्ना तीन प्रमुख युवा तुर्क हैं ।  गन्ना यानि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के भांजे अनूप मिश्रा  को पार्टी ने विधानसभा का टिकिट नहीं दिया।  </p>
<p>गन्ना यानि मप्र के गृहमंत्री डॉ नरोत्तम  मिश्रा  दत्या से विधानसभा का चुनाव लड़ रहे हैं। और मुन्ना को भी दिमनी में फंसा दिया है। भाजपा नेतृत्व को उम्मीद है की मुन्ना भैया इस बार भी इस अग्निपरीक्षा में उत्तीर्ण होकर बाहर आएंगे लेकिन मुन्ना भैया के आसपास के लोगों को मुन्ना भैया के भविष्य को लेकर चिंता  है। हालांकि मुन्ना भैया के दोनों होनहार बेटे सपरिवार दिमनी में मोर्चा सम्हाले हुए हैं। उन्हें हाथ के साथ हाथी ने भी घेर रखा है।</p>
<p>मुन्ना के समथकों का मानना है कि यदि मुन्ना भैया जीते और मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार बनी तो वे प्रदेश के मुख्यमनत्री होंगे,और न जीते तो पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव बनाये जायेंगे।  मुमकिन है कि विधानसभा चुनाव जीतने के बाद उन्हें तीसरी बार मुरैना से ही लोकसभा का चुनाव लड़ने को कह दिया जाये।  आखिर मुन्ना संघ परिवार का आर्शीवाद प्राप्त नेता जो हैं। कहने का मतलब मुन्ना अभी खाली बैठने वाले नहीं है।  </p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Tue, 31 Oct 2023 17:30:44 +0530</pubDate>
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