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                <title>Judiciary - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Judiciary RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>बराक घाटी में स्थायी हाईकोर्ट बेंच की मांग को मिला जनसमर्थन, श्रीभूमि में 300 से अधिक लोगों ने किए हस्ताक्षर।</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">
<blockquote class="format1"><strong>  श्रीभूमि संवाददाता स्वतंत्र प्रभात :</strong></blockquote>
</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">            असम के गुवाहाटी हाईकोर्ट की एक स्थायी बेंच बराक घाटी के किसी उपयुक्त स्थान पर स्थापित किए जाने की मांग के समर्थन में आज 27 जून शनिवार को श्रीभूमि जिले के बिपिन पाल स्मृति भवन में एक महत्वपूर्ण जन-जागरूकता सभा आयोजित की गई। रवींद्र सदन महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. सब्यसाची राय की पहल पर आयोजित इस बैठक में बराक घाटी में स्थायी हाईकोर्ट बेंच की संवैधानिक आवश्यकता, न्याय तक समान पहुंच तथा इस मांग को एक संगठित जनआंदोलन का रूप देने के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">बैठक की शुरुआत हाईकोर्ट बेंच</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182146/the-demand-for-a-permanent-high-court-bench-in-barak"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/1001579962.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">
<blockquote class="format1"><strong> श्रीभूमि संवाददाता स्वतंत्र प्रभात :</strong></blockquote>
</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">      असम के गुवाहाटी हाईकोर्ट की एक स्थायी बेंच बराक घाटी के किसी उपयुक्त स्थान पर स्थापित किए जाने की मांग के समर्थन में आज 27 जून शनिवार को श्रीभूमि जिले के बिपिन पाल स्मृति भवन में एक महत्वपूर्ण जन-जागरूकता सभा आयोजित की गई। रवींद्र सदन महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. सब्यसाची राय की पहल पर आयोजित इस बैठक में बराक घाटी में स्थायी हाईकोर्ट बेंच की संवैधानिक आवश्यकता, न्याय तक समान पहुंच तथा इस मांग को एक संगठित जनआंदोलन का रूप देने के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बैठक की शुरुआत हाईकोर्ट बेंच मांग कार्यान्वयन समिति के महासचिव निखिल पाल के स्वागत भाषण से हुई। उन्होंने इस महत्वपूर्ण आयोजन के लिए डॉ. सब्यसाची राय का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि बराक घाटी के लोगों की लंबे समय से चली आ रही इस न्यायसंगत मांग को पूरा करने के लिए समाज के सभी वर्गों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की जागरूकता सभाएं जनमत तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सभा में पूर्व सांसद मिशन रंजन दास, करीमगंज महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य राधिका रंजन चक्रवर्ती, बंग साहित्य एवं संस्कृति सम्मेलन की केंद्रीय समिति के अध्यक्ष सतु राय, सांस्कृतिक हस्ती सुलेखा दत्त चौधरी, प्रोफेसर विश्वतोष चौधरी, शिक्षाविद विभाष देव, महासचिव निखिल पाल, रसराज दास, धर्मानंद देव, अधिवक्ता देवोमिता चक्रवर्ती, अधिवक्ता तुहिना शर्मा, अधिवक्ता दुर्गा पुरकायस्थ, अधिवक्ता अर्चना दत्त सहित जिले के अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। इसके अलावा विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और नाट्य संगठनों के प्रतिनिधियों ने भी चर्चा में भाग लिया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वक्ताओं ने कहा कि बराक घाटी के लाखों लोगों को न्याय के लिए गुवाहाटी तक लंबी दूरी तय करनी पड़ती है, जो अत्यंत महंगा, समय लेने वाला और कठिन है। आर्थिक तथा भौगोलिक बाधाओं के कारण अनेक लोग प्रभावी रूप से न्याय प्राप्त करने से वंचित रह जाते हैं। इसलिए बराक घाटी के किसी उपयुक्त स्थान पर गुवाहाटी हाईकोर्ट की स्थायी बेंच की स्थापना समय की मांग है और यह संविधान में निहित समानता एवं न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह कोई क्षेत्रीय या राजनीतिक मांग नहीं है, बल्कि नागरिकों के संवैधानिक न्याय के अधिकार को सुनिश्चित करने की एक उचित मांग है। इस मांग को बराक घाटी के सभी वर्गों का व्यापक समर्थन प्राप्त है और सरकार तथा संबंधित अधिकारियों से इस दिशा में शीघ्र सकारात्मक कदम उठाने की अपील की गई।</div>
<div style="text-align:justify;">सभा के अंत में गुवाहाटी हाईकोर्ट की स्थायी बेंच की स्थापना के समर्थन में हस्ताक्षर अभियान चलाया गया, जिसमें लगभग 300 से अधिक नागरिकों ने हस्ताक्षर कर अपना समर्थन दर्ज कराया। यह इस मांग के प्रति जनता के व्यापक समर्थन का प्रमाण माना गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बैठक में सर्वसम्मति से बराक घाटी में शीघ्र स्थायी हाईकोर्ट बेंच स्थापित करने की मांग दोहराई गई तथा समाज के सभी वर्गों से लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से इस जनआंदोलन को और मजबूत बनाने का आह्वान किया गया।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>असम हिमाचल प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 27 Jun 2026 19:49:33 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>डिजिटल हल, मानवीय सम्मान: न्यायपालिका का नया चेहरा</title>
                                    <description><![CDATA[न्यायाधीश भले रिटायर हों, सम्मान कभी रिटायर नहीं होता]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/161093/digital-solution-new-face-of-human-dignity-judiciary"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-11/download8.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब न्यायपालिका की गरिमा तकनीक के साथ सहजता से मिलती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी समाज की असली प्रगति दिखाई देती है। मध्यप्रदेश हाई कोर्ट का हालिया फैसला केवल एक कागजी आदेश को रद्द करने तक सीमित नहीं है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">यह उन सभी सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के प्रति गहन सम्मान और कृतज्ञता का प्रतीक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्होंने दशकों तक न्याय के तराजू को निर्भीक और निष्पक्ष बनाए रखा। वे लोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्होंने अपना जीवन न केवल कानून बल्कि समाज की विश्वासनीयता और नैतिक संतुलन के लिए समर्पित किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब हर नवंबर की जटिल औपचारिकताओं से मुक्त रहेंगे। यह केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि मानवता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गरिमा और न्याय की असली भावना को पुनः प्रतिष्ठित करने वाला ऐतिहासिक कदम है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">13 <span lang="hi" xml:lang="hi">दिसंबर </span>2024 <span lang="hi" xml:lang="hi">को वित्त विभाग द्वारा जारी परिपत्र ने राज्य के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के लिए एक नई व्यवस्था लागू की थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके तहत मेडिकल भत्ता और घरेलू भत्ता जारी रखने के लिए उन्हें हर वर्ष अपने ही जिले में जाकर लाइफ सर्टिफिकेट जमा करना अनिवार्य था। यह नियम शायद सामान्य पेंशनभोगियों के लिए सहज और उपयुक्त प्रतीत हो सकता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उन लोगों के लिए जिन्होंने जीवनभर निष्पक्ष और निर्भीक न्याय के लिए समर्पण किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह प्रथा उनके सम्मान और गरिमा के अनुरूप नहीं थी। फार्मर जजेस वेलफेयर एसोसिएशन ने इस असंवैधानिक और अपमानजनक प्रथा को चुनौती देते हुए याचिका दायर की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्पष्ट करते हुए कि राज्य सरकार का अधिकार कभी भी न्यायपालिका की प्रतिष्ठा और सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की गरिमा को आहत करने के लिए प्रयोग नहीं किया जा सकता।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हाई कोर्ट ने अपने संक्षिप्त किन्तु निर्णायक फैसले में स्पष्ट किया कि सेवानिवृत्त न्यायाधीश कोई सामान्य पेंशनर नहीं हैं। उन्होंने संविधान की शपथ के तहत न्याय की स्वतंत्रता और निष्पक्षता का पालन किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और उनका जीवन न्याय की सेवा में समर्पित रहा। ऐसे व्यक्तियों को बार-बार अपनी जीवित उपस्थिति की पुष्टि करने के लिए बाध्य करना न्यायपालिका की आत्मा और गरिमा पर चोट है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जीवन की पुष्टि डिजिटल माध्यमों या बैंक रिकॉर्ड के माध्यम से सहजता से की जा सकती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे किसी पूर्व न्यायाधीश को अदालत में तलब करना न केवल अनावश्यक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सम्मान के विपरीत है। इसके परिणामस्वरूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरकार ने परिपत्र को वापस ले लिया और रिटायर्ड जजों को स्थायी राहत प्रदान की।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह निर्णय केवल मध्यप्रदेश तक सीमित नहीं रहेगा। यह पूरे देश में मिसाल बनेगा और अन्य राज्यों में भी रिटायर्ड न्यायाधीशों और उच्च अधिकारियों के लिए सम्मान और गरिमा की नई दिशा स्थापित करेगा। यह साबित करता है कि तकनीक और प्रशासनिक प्रक्रिया का वास्तविक उद्देश्य इंसान की सुविधा और सम्मान होना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि उनकी अपमानजनक जांच। डिजिटल इंडिया के युग में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब आधार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पैन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बैंक खाता और मोबाइल जैसी सुविधाएँ आपस में जुड़े हुए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर भी पुराने कागजी दस्तावेजों के लिए बुजुर्गों को समय और श्रम गंवाने के लिए बाध्य करना न केवल व्यर्थ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि संवेदनशीलता और सम्मान की कमी का भी प्रतीक है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल समाधान के माध्यम से सम्मान सुनिश्चित करना अब न केवल संभव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि अत्यंत प्रभावशाली भी है। आज के डिजिटल युग में यह सहज है कि सभी जीवन प्रमाणित प्रक्रियाएँ बिना किसी कठिनाई और झंझट के ऑनलाइन पूरी की जा सकें। बायोमेट्रिक आधार अपडेट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बैंक खाता सक्रियता का सत्यापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोबाइल संदेश के माध्यम से जीवन पुष्टि या निष्क्रियता पर अलर्ट जैसे उपाय तुरंत लागू किए जा सकते हैं। इससे न केवल रिटायर्ड न्यायाधीशों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सभी पेंशनभोगियों को सहज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्मानजनक और सुरक्षित तरीके से अपनी जीवन पुष्टि कराने की सुविधा मिलती है। तकनीक का यह प्रयोग केवल सुविधाजनक नहीं है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">यह समाज में सम्मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण को भी मजबूती से स्थापित करता है। मध्यप्रदेश का यह निर्णायक कदम स्पष्ट रूप से दिखाता है कि जब डिजिटल समाधान मानव सेवा और गरिमा के लिए काम करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब न्याय और समाज दोनों की भलाई सुनिश्चित होती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सच्ची प्रभावशीलता इस तथ्य में निहित है कि यह राहत किसी विशेष लाभ की मांग नहीं थी—यह केवल सम्मान की मांग थी। जब न्यायपालिका ने स्वयं अपने पूर्व सदस्यों का सम्मान सुनिश्चित किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो इसने यह साबित कर दिया कि संस्था न केवल जीवित है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि संवेदनशील और न्यायप्रिय भी है। छोटे प्रशासनिक निर्णय भी बड़े संदेश दे सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और यह फैसला यह संदेश देता है कि समाज और राज्य के लिए न्याय के कार्यकर्ताओं का ऋण चुकाना एक अनिवार्य कर्तव्य है। मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने यह ऋण पूरी गरिमा के साथ चुका दिया। अब समय आ गया है कि पूरे देश में रिटायर्ड न्यायाधीशों और सभी न्याय कर्मियों की गरिमा की रक्षा सुनिश्चित की जाए। न्यायाधीश भले ही रिटायर हो जाएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन न्याय और उसके सम्मान का गौरव कभी रिटायर नहीं होता।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 21 Nov 2025 17:00:13 +0530</pubDate>
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