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                <title>political turmoil - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>political turmoil RSS Feed</description>
                
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                <title>बालासाहेब की विरासत से राजनीतिक संघर्ष तक: क्यों मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं उद्धव ठाकरे और बदलती शिवसेना</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना केवल एक राजनीतिक दल नहीं रही, बल्कि वह एक भावनात्मक आंदोलन और मराठी अस्मिता का प्रतीक भी रही है। इस आंदोलन की नींव शिवसेना संस्थापक  बालासाहेब ठाकरे ने रखी थी। उनकी आक्रामक शैली, स्पष्ट विचारधारा और कार्यकर्ताओं पर मजबूत पकड़ ने शिवसेना को महाराष्ट्र की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक शक्तियों में शामिल कर दिया था। लेकिन समय के साथ राजनीति बदली, परिस्थितियां बदलीं और नेतृत्व भी बदला। आज शिवसेना के वर्तमान प्रमुख  उद्धव ठाकरे ऐसे दौर से गुजर रहे हैं जिसे उनके राजनीतिक जीवन का सबसे कठिन समय माना जा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">पिछले कुछ वर्षों में</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181559/from-balasahebs-legacy-to-political-struggle-why-uddhav-thackeray-and"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas14.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना केवल एक राजनीतिक दल नहीं रही, बल्कि वह एक भावनात्मक आंदोलन और मराठी अस्मिता का प्रतीक भी रही है। इस आंदोलन की नींव शिवसेना संस्थापक  बालासाहेब ठाकरे ने रखी थी। उनकी आक्रामक शैली, स्पष्ट विचारधारा और कार्यकर्ताओं पर मजबूत पकड़ ने शिवसेना को महाराष्ट्र की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक शक्तियों में शामिल कर दिया था। लेकिन समय के साथ राजनीति बदली, परिस्थितियां बदलीं और नेतृत्व भी बदला। आज शिवसेना के वर्तमान प्रमुख  उद्धव ठाकरे ऐसे दौर से गुजर रहे हैं जिसे उनके राजनीतिक जीवन का सबसे कठिन समय माना जा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पिछले कुछ वर्षों में उद्धव ठाकरे की राजनीतिक स्थिति लगातार कमजोर होती दिखाई दी है। महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी सरकार बनने के बाद उन्होंने मुख्यमंत्री पद संभाला, लेकिन इसी फैसले ने उनके सामने नई चुनौतियां भी खड़ी कर दीं। भाजपा के साथ दशकों पुराने गठबंधन को छोड़कर कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ सरकार बनाने का निर्णय शिवसेना के पारंपरिक समर्थकों के एक बड़े वर्ग को स्वीकार नहीं हुआ। पार्टी के भीतर भी असंतोष धीरे-धीरे बढ़ने लगा। यही असंतोष आगे चलकर बड़े राजनीतिक संकट में बदल गया।</div>
<div style="text-align:justify;">साल 2022 में शिवसेना को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बड़ी संख्या में विधायकों ने बगावत कर दी। यह केवल विधायकों का विद्रोह नहीं था, बल्कि शिवसेना की संगठनात्मक ताकत और नेतृत्व क्षमता पर भी बड़ा सवाल था। शिंदे गुट ने दावा किया कि वह बालासाहेब ठाकरे की मूल विचारधारा का प्रतिनिधित्व कर रहा है। इसके बाद चुनाव आयोग द्वारा पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह शिंदे गुट को मिलने से उद्धव ठाकरे को एक और बड़ा झटका लगा।</div>
<div style="text-align:justify;">इसके बाद उद्धव ठाकरे ने शिवसेना (यूबीटी) के रूप में अपनी राजनीतिक लड़ाई जारी रखी। लोकसभा चुनावों में कुछ सफलता मिलने से ऐसा लगा कि पार्टी फिर से मजबूती की ओर बढ़ रही है, लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने एक बार फिर उनकी मुश्किलें बढ़ा दी हैं। पार्टी के सांसदों में असंतोष और संभावित टूट की खबरों ने यह संकेत दिया है कि संगठन अभी भी स्थिर नहीं हो पाया है। यदि सांसदों का बड़ा समूह अलग रास्ता चुनता है तो यह शिवसेना (यूबीटी) के लिए एक और बड़ा राजनीतिक आघात साबित हो सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;">उद्धव ठाकरे की सबसे बड़ी चुनौती यह रही है कि वे अपने पिता बालासाहेब ठाकरे जैसी जननेता की छवि नहीं बना सके। बालासाहेब कभी चुनाव नहीं लड़े, लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति में उनकी बात अंतिम मानी जाती थी। उनकी सभाओं में हजारों लोग जुटते थे और उनके एक बयान से राजनीतिक माहौल बदल जाता था। वे अपने समर्थकों के लिए एक करिश्माई नेता थे जिनकी पकड़ संगठन पर पूरी तरह बनी रहती थी।</div>
<div style="text-align:justify;">इसके विपरीत उद्धव ठाकरे का व्यक्तित्व अपेक्षाकृत शांत और संयमित माना जाता है। वे टकराव की राजनीति की बजाय संवाद और संगठनात्मक प्रबंधन को प्राथमिकता देते रहे हैं। मुख्यमंत्री के रूप में उनके कामकाज की कई लोगों ने सराहना की, विशेषकर कोविड-19 महामारी के दौरान। लेकिन राजनीति में केवल प्रशासनिक क्षमता ही पर्याप्त नहीं होती। संगठन को एकजुट रखना, कार्यकर्ताओं में उत्साह बनाए रखना और नेतृत्व के प्रति अटूट विश्वास कायम रखना भी उतना ही आवश्यक होता है। यही वह क्षेत्र है जहां उद्धव ठाकरे को लगातार चुनौतियों का सामना करना पड़ा।</div>
<div style="text-align:justify;">बालासाहेब ठाकरे और उद्धव ठाकरे के बीच सबसे बड़ा अंतर नेतृत्व शैली का दिखाई देता है। बालासाहेब की राजनीति भावनात्मक जुड़ाव, प्रखर हिंदुत्व और आक्रामक वक्तव्यों पर आधारित थी। वे सीधे कार्यकर्ताओं से संवाद करते थे और पार्टी के भीतर असहमति की गुंजाइश बहुत कम रहती थी। दूसरी ओर उद्धव ठाकरे अपेक्षाकृत सौम्य और संस्थागत शैली के नेता हैं। वे गठबंधन राजनीति में विश्वास रखते हैं और कई मुद्दों पर नरम रुख अपनाते दिखाई दिए हैं। यही कारण है कि शिवसेना के कुछ पुराने कार्यकर्ताओं और नेताओं को लगा कि पार्टी अपनी मूल पहचान से दूर जा रही है।</div>
<div style="text-align:justify;">राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा से अलग होने का फैसला उद्धव ठाकरे के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ। भाजपा और शिवसेना का गठबंधन दशकों पुराना था और दोनों दलों का मतदाता आधार भी काफी हद तक समान था। जब यह गठबंधन टूटा तो शिवसेना के सामने अपनी नई राजनीतिक पहचान स्थापित करने की चुनौती खड़ी हो गई। कांग्रेस और एनसीपी के साथ गठबंधन ने तत्काल सत्ता तो दिलाई, लेकिन लंबे समय में इस फैसले की राजनीतिक कीमत भी चुकानी पड़ी।</div>
<div style="text-align:justify;">आज स्थिति यह है कि शिवसेना दो हिस्सों में बंटी हुई दिखाई देती है। एक ओर एकनाथ शिंदे का गुट सत्ता में है और उसके पास संगठन का बड़ा हिस्सा तथा आधिकारिक पार्टी पहचान है। दूसरी ओर उद्धव ठाकरे के पास सहानुभूति, एक समर्पित कार्यकर्ता वर्ग और ठाकरे परिवार की विरासत है। लेकिन केवल विरासत के आधार पर राजनीति लंबे समय तक नहीं चल सकती। इसके लिए मजबूत संगठन, प्रभावी नेतृत्व और लगातार जनसंपर्क की आवश्यकता होती है।</div>
<div style="text-align:justify;">हाल के दिनों में सांसदों और नेताओं की नाराजगी की खबरें यह बताती हैं कि उद्धव ठाकरे को अभी भी संगठन को मजबूत करने के लिए काफी मेहनत करनी होगी। उन्हें यह साबित करना होगा कि शिवसेना (यूबीटी) केवल एक भावनात्मक मंच नहीं, बल्कि भविष्य की एक मजबूत राजनीतिक शक्ति भी है। यदि वे पार्टी के भीतर विश्वास बहाल करने और नए नेतृत्व को आगे लाने में सफल होते हैं तो राजनीतिक वापसी की संभावना बनी रह सकती है।</div>
<div style="text-align:justify;">महाराष्ट्र की राजनीति में ठाकरे नाम आज भी प्रभाव रखता है। लेकिन वर्तमान दौर केवल नाम या विरासत के सहारे नहीं जीता जा सकता। राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं और दलों के भीतर भी शक्ति संतुलन लगातार बदल रहा है। ऐसे में उद्धव ठाकरे के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी पार्टी को एकजुट रखना और जनता के बीच यह विश्वास कायम करना है कि शिवसेना (यूबीटी) भविष्य में भी एक मजबूत विकल्प बन सकती है।</div>
<div style="text-align:justify;">बालासाहेब ठाकरे ने जिस शिवसेना को संघर्ष, विचारधारा और संगठनात्मक अनुशासन के आधार पर खड़ा किया था, आज वही पार्टी कई हिस्सों में बंटी हुई दिखाई देती है। यह स्थिति केवल उद्धव ठाकरे के लिए ही नहीं, बल्कि उस राजनीतिक विरासत के लिए भी बड़ी परीक्षा है जिसे बालासाहेब ने दशकों की मेहनत से तैयार किया था। आने वाले वर्षों में यह तय होगा कि उद्धव ठाकरे इस संकट से उबरकर अपनी राजनीतिक जमीन फिर से मजबूत कर पाते हैं या महाराष्ट्र की राजनीति में उनका प्रभाव धीरे-धीरे सीमित होता चला जाएगा। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि वे अपने राजनीतिक जीवन के सबसे चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं और उनके सामने खड़ी चुनौतियां पहले से कहीं अधिक कठिन हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"><strong>        *कांतिलाल मांडोत*</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 14:43:20 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>उतरप्रदेश और बिहार में नींव से खिसकते अनेक राजनीतिक दल</title>
                                    <description><![CDATA[<div>राजनीतिक दल चुनाव लड़ने के लिए बनाए जाते जाते हैं।  उसका आधार एक विचार होता है। उसके लिए संगठ बनता है। जो लोगों को उस विचार के लिए प्रेरित करता है। यही नियम है। इसे उत्तर प्रदेश के  चुनाव मेंभी  ध्वस्त होते देखा गया  था। हर दल अपनी नींव से खिसक गए हैं। मानो उसमें भूकंप आ गया हो। इसे हर पल में घट रही घटनाओं के उदाहरण से समझा जा सकता है।पहले उस दल को देखना उचित ही होगा जो उत्तर प्रदेश में पांच साल से शासन में थ। वह सपा है। यह पार्टी सितंबर, 2016 से राजनीतिक भूकंप</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/156465/68df77f38ac57"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-10/उतरप्रदेश-और-बिहार-में-नींव-से-खिसकते-अनेक-राजनीतिक-दल.png" alt=""></a><br /><div>राजनीतिक दल चुनाव लड़ने के लिए बनाए जाते जाते हैं।  उसका आधार एक विचार होता है। उसके लिए संगठ बनता है। जो लोगों को उस विचार के लिए प्रेरित करता है। यही नियम है। इसे उत्तर प्रदेश के  चुनाव मेंभी  ध्वस्त होते देखा गया  था। हर दल अपनी नींव से खिसक गए हैं। मानो उसमें भूकंप आ गया हो। इसे हर पल में घट रही घटनाओं के उदाहरण से समझा जा सकता है।पहले उस दल को देखना उचित ही होगा जो उत्तर प्रदेश में पांच साल से शासन में थ। वह सपा है। यह पार्टी सितंबर, 2016 से राजनीतिक भूकंप के झटके लगातार झेल रही है। वह झटका जारी है। जिसने पार्टी बनाई वह बेगाने शादी में अब्दुल्ला दीवाना की तरह हो गए हैं। वे मुलायम सिंह थे। जो कब क्या बयान देकर विवाद छेड़ देते, इसे वे भी नहीं जानते थे।समाजवादी ड्रामा तीन महीने तक चला।</div>
<div> </div>
<div>बाप-बेटे के बीच  विवादों की स्क्रिप्ट लिखी गई। लेकिन इतने समय के विरोधाभास के बाद आखिर जीत तो अखिलेश की हुई।कौन माता पिता इस दुनिया मे अपनी संतान से हारते हुए देखना चाहते है। हर अभिभावकों के मन मे एक ही इच्छा रहती है कि मैं भले ही हार जाऊ,लेकिन मेरी संतान हर कदम पर जीत की खुशियां मनाए और अंततः वही हुआ। मुलायम सिंह कोर्ट से हार गए। मान सकते हैं कि वे सदमे बहुत भारी थे। वैसे ही जैसे घर के ढेर हो जाने घर मालिक होता है। सपा के दूसरे कद्दावर नेता शिवपाल बोल पड़े थे कि चुनाव बाद नया दल बनाएंगे। इस तरह की उथल-पुथल ने अखिलेश यादव का मनोबल तोड़ दिया और वे उस कांग्रेस की गोद में जा बैठे।जोकि कांग्रेस का उतरप्रदेश में जनाधार नही था।अगर वो  जिंदा नही हुई और जिंदा हो जाती तो सपा को खा जाती।</div>
<div> </div>
<div>बसपा का हाल उससे भी बुरा था। वह कायदे से राजनीतिक दल बनने के रास्ते पर चली ही नहीं। वह जाति और मजहब के गठजोड़ की उपज है। बीते त 12 सालों से बसपा का घर उजड़ गया है। उसके ज्यादातर नेता भाजपा में जा चुके हैं। उनमें वे भी हैं जो बसपा के जन्मजात नेता रह थे। कुछ सालों पहले की बसपा को आज पहचानना कठिन है। हाथी की चाल मन्द पड़ चली है। मायावती की कोई राजनीतिक हलचल दिखाई नही देती है। कोई भी राजनीतिक दल दो बातों से पहचाना जाता है।</div>
<div> </div>
<div>विचार और नेतृत्व से। बसपा इन दोनों रूपों में भी अपनी पहचान खो चुकी है। वह खुद को खोज रही है। इस भटक़ाव में वह उत्तर प्रदेश में दलित-मुस्लिम गठजोड़ का ताना-बाना बुन रही होगी। ध्रुवीकरण पर उसकी आस टिकी है।योगी आदित्यनाथ के आने के बाद पूर्व पार्टियां सत्ता से बंधी हुई थी।आज के वर्तमान में उनके शासन को याद तक नही करते है।जंगलराज के तमगे से उपजी ये पार्टियां लोगो पर सितम ढाहने में अपना वर्चस्व स्थापित करचुकी थी। इनके शासनकाल में लखनऊ गुंडा और माफियो की शरणस्थली बन चुका था।</div>
<div> </div>
<div>कह सकते हैं कि2017 के पहले उत्तर प्रदेश गहरे राजनीतिक संक्रमण के दौर में  था।चुनाव ने उसे तेज कर दिया है। इसके साफ-साफ दो कारण थे। पहला यह कि विधानसभा का चुनाव पिछले परिणाम से उभरी राजनीति के उस चुनाव में हर दल ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था। भारी जोखिम मोल ले ली थी।दूसरा यह कि चुनाव परिणाम से हर दल बदल जाएगा। लेकिन हर दल में 'परकाया प्रवेश' हो चुका था।</div>
<div> </div>
<div>इर्द-गिर्द नहीं हो रहा था।2014 के लोकसभा चुनाव परिणाम से जो हस्तक्षेप उत्तर प्रदेश की राजनीति में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने किया, वही प्रमुख आधार हो गया था। दूसरा यह कि चुनाव उत्तर प्रदेश की सत्ता कौन संभाले, इसके लिए हो रहा था। पर यह 2019 के लोकसभा चुनाव का प्रहसन भी हो गया। इससे कोई दल बचा नहीं था। भाजपा भी नहीं। जितना असंतोष भाजपा के कार्यकर्ताओं और नेताओं मेंउस समय था  उतना कभी नहीं था।क्योकि भाजपा की 2014 के पहले शुरुआती दौर था। बगावत की आवाज चारों ओर से उठ रही थी। उसे शांत करने के लिए खून पसीना एक किया जा रहा था।</div>
<div> </div>
<div>हर चुनाव में थोड़ा बहुत असंतोष तो होता ही है। उस बार का अकल्पनीय था। इसके कारण बहुत साफ थे।</div>
<div>भाजपा में शामिल होने वालों की संख्या हर रिकार्ड तोड़ चुकी थी। कांग्रेस, सपा और बसपा से आए नेताओं को भाजपा ने अपना उम्मीदवार बनाया था। उनकी संख्या 155 से ज्यादा थी।यानी इतने क्षेत्रों में भाजपा नेता अवसर से वंचित हो गए थे। वे बड़ी उम्मीद में थे। तब भाजपा का उम्मीदवार होना ही चुनाव जीतने की पक्की गारंटी मानी जा रही थी।</div>
<div> </div>
<div> भाजपा में आए हुए समूह मेंकोई गीले शिकवे नही थे। अक्सर चुनाव में परिणाम के बाद भाजपा अपनी समीक्षा में पाती रही है कि टिकट का बंटवारा ठीक नहीं हुआ था। उससे सबक लेकर कोई कदम भाजपा नेतृत्व पहले नहीं उठाता था। तब अमित शाह ने जो उम्मीदवार चयन की प्रणाली अपनाई वह हस्तक्षेप से अछूती रही थी। उन नेताओं की नहीं चली जो टिकट की बंदरबाट के लिए बदनाम हुए। इसमें वे भी कुछ नहीं कर सके जो 'नैतिक सत्ता' का दबाव बनाकर हस्तक्षेप कर लेते थे।</div>
<div> </div>
<div>उतरप्रदेश में कांग्रेस सालों से हासिए पर है। अपने पुनरोदय के लिए हाथ-पांव मार रही थी। राहुल गांधी की खाट यात्रा उसी कड़ी में थी। अगर वही राह कांग्रेस ने ली होती तो वह अपने बलबूते पर चुनाव लड़ती। उसने बिहार के अनुभव से फायदा इसमें ही देखा कि सपा की सहयोगी पार्टी बन जाए। इसी तरह अजीत सिंह का लोकदल कहीं आसरे की खोज में था। उसे सहयोगी बनाने से सपा हिचक गई। क्योंकि अफसरों ने अखिलेश यादव को बताया कि अजीत सिंह के आने से -प्रतिक्रिया में मुसलमान बसपा में चले जाएंगे।</div>
<div> </div>
<div>हर दल की राजनीति पर सरसरी निगाह डालने से कुछ निष्कर्ष निकलते हैं। एक यह है कि इस चुनाव में हर दल ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था। भारी जोखिम मोल ले ली थी। दूसरा यह कि चुनाव परिणाम से हर दल बदल जाएगा। वह नहीं रहेगा जो होता था और है। क्योंकि हर दल में 'परकाया प्रवेश' हो चुका था।</div>
<div> तीसरा यह कि हर दल में पीढ़ी और पद परिवर्तन का दृश्य है। नई पीढ़ी नेतृत्व संभालने वाली रही। चौथा यह कि हर दल की नजर युवा मतदाता पर थी। युवा के नखरे पर राजनीति का कदम ताल तय होने  जा रहा था।बिहार की यही हालत है।</div>
<div> </div>
<div>लालू की राजद कई वर्षों से राजनीतिक गलियारों से बाहर है।नीतीश कुमार के गठबंधन के कारण तेजस्वी कुछ समय के लिए उपमुख्यमंत्री बन गए थे।जेडीयू कई वर्षों से गठबंधन की सरकार चला रही है। बिहार में कई प्रादेशिक दल है जो जशिये पर धकेल दिए गए है।उनका नाम राजनैतिक मंच पर चुनाव के समय ही सुनने को मिलता है। उतरप्रदेश में समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश ने भूल की थी,वही भूल तेजस्वी यादव कांग्रेस को साथ लेकर कर रहे है।बिहार की राजनीति में तीस वर्षों से सत्ता से बाहर कांग्रेस का भविष्य एक सर्वे पर भरोसा करें तो कांग्रेस के पास आज भी बिहार में जनाधार नही  है।नीतीश कुमार में चुनाव से पूर्व 75 लाख महिलाओं के खाते में दस दस हजार ट्रांसफर किये है।उससे और अधिक रकम ऋण के तौर पर देने के लिए मुख्यमंत्री नीतीश ने घोषणा की है।</div>
<div> </div>
<div><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Sat, 04 Oct 2025 18:20:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sandeep Kumar ]]></dc:creator>
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