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                <title>  swatantra prabha sampadkiya - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>  swatantra prabha sampadkiya RSS Feed</description>
                
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                <title>भारत इजराइल गठबंधन, भारत की शांति प्रयासों की नई भूमिका</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">भारत के प्रधानमंत्री की दूसरी इजरायल यात्रा भारत के शांति प्रयासों की एक नई भूमिका तय करेगा। इजरायली संसद में प्रधानमंत्री ने संबोधन में कहा आतंकवाद किसी स्तर पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा एवं उग्रवाद एवं आतंकवाद हर स्तर पर गलत है। इसराइल के प्रधानमंत्री ने भारत को एक अभिन्न मित्र एवं सहयोगी बताया उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना भाई मित्र और हितेषी भी निरूपित किया है। भारत के प्रधानमंत्री की इजरायल यात्रा पर दुनिया के हर देश की नजर लगी हुई है। इजरायली संसद में संबोधन के बाद प्रधानमंत्री को वहां ऐतिहासिक तौर पर सम्मानित भी किया गया।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/171479/india-israel-alliance-new-role-in-indias-peace-efforts"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/भारत-इजराइल-गठबंधन,-भारत-की-शांति-प्रयासों-की-नई-भूमिका.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत के प्रधानमंत्री की दूसरी इजरायल यात्रा भारत के शांति प्रयासों की एक नई भूमिका तय करेगा। इजरायली संसद में प्रधानमंत्री ने संबोधन में कहा आतंकवाद किसी स्तर पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा एवं उग्रवाद एवं आतंकवाद हर स्तर पर गलत है। इसराइल के प्रधानमंत्री ने भारत को एक अभिन्न मित्र एवं सहयोगी बताया उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना भाई मित्र और हितेषी भी निरूपित किया है। भारत के प्रधानमंत्री की इजरायल यात्रा पर दुनिया के हर देश की नजर लगी हुई है। इजरायली संसद में संबोधन के बाद प्रधानमंत्री को वहां ऐतिहासिक तौर पर सम्मानित भी किया गया। प्रधानमंत्री की इस यात्रा में भारत इजरायली संबंधों का एक नए युग का सूत्रपात किया है। भारत इजराइल के सहयोग से एक सुरक्षात्मक आयरन डोम बनाने की तकनीक भारत में तैयार करेगा। जिससे भारत और भी सुरक्षित एवं मजबूत होगा और भारत अपनी रक्षात्मक प्रणाली की नई तैयारी करने में सक्षम हो सकेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत हमेशा से शांति सद्भावना और सौहाद्र का सर्वकालिक समर्थक रहा है। भारत ने रूस यूक्रेन युद्ध मैं शांति प्रयासों की हमेशा सकारात्मक भूमिका निभाई है। युद्ध में भारत की तरफ से लगातार प्रयास किए जाते रहे हैं कि युद्ध विराम हो जाए और इसके लिए भारत में अथक प्रयास भी किए हैं ,यह अलग बात है कि विस्तारवादी दृष्टिकोण को लेकर पुतिन और जेलेन्सकी अजीब सी राजनीतिक और कूटनीतिक परिस्थितियों में एक दूसरे के सामने खड़े तथा अड़े है । अब इजराइल हमास युद्ध में भारत की नीति स्पष्ट रूप से आतंकवादी गतिविधियों और उग्रवाद के विरोध में रही है। भारत ने आतंकवादी संगठन हमास, हिज्बुल्लाह और फिलिस्तीन इस्लामी जिहाद का खुलकर विरोध किया है पर दूसरी तरफ इजरायल की बमबारी से घायल हुए पिलिस्तिनी नागरिकों के लिए 38 टन खाद्य सामग्री दवाएं और आवश्यक वस्तुएं तत्काल मुहैया कराई है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत के संबंध अरब देशों के साथ-साथ यूरोप,अमेरिका ,ब्रिटेन, फ्रांस और नाटो देशों से भी मधुर हैं इन परिस्थितियों में अरब देश भारत के प्रति युद्ध विराम की संभावनाओं की तलाश में भारतीय पहल का  इंतजार कर रहा है। पूर्व में भी भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ की सभा में जॉर्डन के शांति प्रस्ताव में वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया ,120 देशों के मतों से प्रस्ताव पारित हो गया, 45 देशों ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया। चूंकि जॉर्डन हमास को उग्रवादी संगठन नहीं मानता और भारत हमास को कट्टर उग्रवादी मानने की नीति पर चल रहा है। अब भारत को आगे बढ़कर पूरे विश्व का नेतृत्व करने का समय आ गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतवर्ष अर्वाचीन काल से अहिंसा का पुजारी रहा है| पुरातन काल से ही  राजा, महाराजा और सम्राटों ने अपने राज्य कार्य में हिंसा को कभी प्रथम पंक्ति में महत्त्व नहीं दिया था |तथा विस्तार वाली नीतियों में भी सेना प्रयास करती रही की आक्रमण के दौरान कम से कम सैनिक हताहत हो| ऑपरेशन सिंदूर में भी पाकिस्तान के सैनिक ठिकानों पर ही हमला किया गया ताकि कम से कम नागरिक हताहत हों और भारत में ऑपरेशन सिंदूर पाकिस्तान की गुहार तथा निवेदन पर तत्काल रोक दिया था फलस्वरूप कॉल स्वरूप दोनों देशों के काम से कम नागरिक जख्मी तथा मृत हुये।</p>
<p style="text-align:justify;">प्राचीन काल में भी राजा, महाराजा तथा सम्राटो ने  सदैव अहिंसा के पुजारी बनकर  ही राजकाज किया था| पहले से आक्रमण न करने की नीति तथा अहिंसा वादी नीति के कारण भारत पहले मुगलों का तथा बाद में अंग्रेजों का गुलाम हो गया था| इसके उपरांत बहुत  संघर्ष तथा मेहनत के बाद 1947 में भारत को आजादी मिली| और इसके उपरांत भारत लगातार “अहिंसा परमो धर्म” की नीति पर अपने कदम  बढ़ाता रहा है| कुछेक उदाहरण को छोड़ दिया जाए जैसे पाकिस्तान द्वारा लगातार भारत पर आक्रमण करने से भारत ने मुंह तोड़ जवाब भी दिया| और इसी के परिणाम स्वरूप बांग्लादेश का जन्म भी हुआ| पर इस घटना में भी भारत की वैश्विक स्तर पर शांतिदूत की भूमिका ही रही| भारत की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छवि एक शांति के संप्रभुता वाले गणतांत्रिक लोकतंत्र की रही| भारत ने ऐतिहासिक तौर पर कभी किसी राष्ट्र पर अपनी तरफ से आक्रमण हमला नहीं किया| और यही कारण है की संयुक्त राष्ट्र संघ के 75 वर्ष के निर्माण काल के पश्चात संयुक्त राष्ट्र संघ हमेशा शांति प्रयासों में भारत की सहायता लेता रहा है और भारत की संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ वैश्विक स्तर पर शांति प्रयासों में योगदान की महत्वपूर्ण रहा है|</p>
<p style="text-align:justify;">भारत की स्वतंत्रता के बाद मोदी सरकार ने भी वसुधैव कुटुंबकम की नीति का परिचालन कर विश्व को संदेश दे दिया है की भारत गांधी का देश है बुध और विवेकानंद का देश है| वह अपने साथ विश्व में भी शांति और सौहार्द्र बनाए रखना चाहता है| और इसी कार्यक्रम में  26 सितंबर 2020 को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना दिवस की 77 वीं  वर्षगांठ के अवसर पर  आभासी आयोजन में हिंदी में संभाषण किया था। यह उनकी संयुक्त राष्ट्र संघ की सभा को संबोधित करने का हिंदी में तीसरा अवसर था| उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा किए जा रहे शांति प्रयासों में अपनी भूमिका का स्मरण दिलाया| उन्होंने कहा की भारत विभिन्न समय में संयुक्त राष्ट्र संघ से कंधे से कंधा मिलाकर शांति प्रयासों में महत्वपूर्ण योगदान देता आया है. इसके साथ ही उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद के लोकतांत्रिक होने के प्रयासों में अपना दावा भी पेश किया  था|</p>
<p style="text-align:justify;">यह उल्लेखनीय है की भारत में संयुक्त राष्ट्र संघ की सभी शांति प्रयास की योजनाओं तथा अभियान में अपनी सशक्त जिम्मेदारी निभाते हुए अपना सहयोग तथा शांति सेना हेतु अपनी सेनाओं को भेजकर एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है| संयुक्त राष्ट्र संघ की अपनी धर्म तथा संविधान तथा घोषणा पत्र मैं शांति प्रयासों के लिए सेना को भेजने का कहीं उल्लेख नहीं है किंतु विश्व के कई युद्ध रत तथा मुसीबत में पड़े राष्ट्रों को जहां गृह युद्ध जैसी स्थिति बनी है| वहां भारतीय गणतंत्र ने अपनी सेनाएं भेज कर हजारों लाखों मानव  की रक्षा कर, मानव जाति की सेवा की है. |और अवांछित युद्ध जैसी स्थिति पर अपनी सेनाओं द्वारा नियंत्रण स्थापित किया है|</p>
<p style="text-align:justify;">इस बात को संयुक्त राष्ट्र संघ अलग-अलग महासभा में स्वीकार भी करता है| अब तक भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा आहूत शांति प्रयासों तथा शांति निर्वहन संक्रियाओं  का समर्थन कर रचनात्मक सहयोग हर संभव किया है\ भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ के आव्हान पर कोरिया, वियतनाम,लागोस,मिस्र, सीरिया , लाइबेरिया, युगोस्लाविया,नामीबिया,  सोमालिया, सूडान सहित अनगिनत देशों में अपनी सेनाएं वहां पर शांति बहाली हेतु अलग-अलग समय में उपलब्ध करवाई थी|</p>
<p style="text-align:justify;">भारत द्वारा विश्व शांति की स्थापना की दिशा में संयुक्त राष्ट्र संघ शांति अभियानों में अनथक एवं बहुत बड़ा सहयोग किया है| उन्होंने कई देशों के मध्य पर्यवेक्षक की भूमिका भी  सफलतापूर्वक निभाई है| इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र संघ ने भारत को शांति निरीक्षण आयोगों, समितियों तथा अंतरिम विश्वास बहाली कार्यक्रमों में बतौर सदस्य नामित भी किया है| इस भूमिका को भी भारत ने बहुत सफलतापूर्वक निर्वहन किया है, वैसे भी भारत की विदेश नीति सदैव वैश्विक विवादों के शांतिपूर्ण समाधान का प्रबल पक्षधर रही है|</p>
<p style="text-align:justify;">इसीलिए भारत सरकार ने न सिर्फ संयुक्त राष्ट्र संघ के शांति बहाल अभियान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है बल्कि विश्व के अनेक तनावग्रस्त संकटग्रस्त एवं युद्ध देशों के मध्य अपनी कूटनीतिक राजनैतिक भूमिका भी कर्मठता से निभाई है| संयुक्त राष्ट्र संघ बहुत महत्वपूर्ण होकर जटिल भी होते हैं| ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में संयुक्त राष्ट्र संघ की हर भूमिका को बड़े ही शांति और सौहार्दपूर्ण वातावरण में निपटाने का कार्य बखूबी निभाया है| और भारत राष्ट्र जिस तरीके से आत्मनिर्भर होकर विदेश की सरकारों से अपने संबंध स्तापित  किए हैं, उससे यह दिन दूर नहीं जब भारत को संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्य बनाकर, वैश्विक शांति के लिए शांतिदूत का दर्जा दिया जाएगा|<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 26 Feb 2026 17:38:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>राष्ट्र सुरक्षा का नवदर्शन: अब प्रतिक्रिया नहीं, पूर्वप्रहार</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत ने </span>23 <span lang="hi" xml:lang="hi">फरवरी </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">को अपनी पहली व्यापक राष्ट्रीय आतंकवाद-रोधी नीति</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रहार</span>' (PRAHAAR) <span lang="hi" xml:lang="hi">के शुभारंभ के साथ सुरक्षा क्षेत्र में एक ऐतिहासिक और दूरदर्शी कदम उठाया है। गृह मंत्रालय द्वारा जारी आठ पृष्ठों वाले इस नीति दस्तावेज में केवल दशकों से चले आ रहे आतंकवाद विरोधी प्रयासों का औपचारिकीकरण नहीं किया गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भविष्य में उभरते खतरों—जैसे साइबर हमले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ड्रोन का दुरुपयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रिप्टोकरेंसी के जरिए वित्त पोषण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और डार्क वेब पर रेडिकलाइजेशन—से निपटने के लिए ठोस और निर्णायक रणनीतियाँ भी प्रस्तुत की गई हैं। नीति में स्पष्ट रूप</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/171146/the-new-vision-of-national-security-is-no-longer-reaction"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/hindi-divas43.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत ने </span>23 <span lang="hi" xml:lang="hi">फरवरी </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">को अपनी पहली व्यापक राष्ट्रीय आतंकवाद-रोधी नीति</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रहार</span>' (PRAHAAR) <span lang="hi" xml:lang="hi">के शुभारंभ के साथ सुरक्षा क्षेत्र में एक ऐतिहासिक और दूरदर्शी कदम उठाया है। गृह मंत्रालय द्वारा जारी आठ पृष्ठों वाले इस नीति दस्तावेज में केवल दशकों से चले आ रहे आतंकवाद विरोधी प्रयासों का औपचारिकीकरण नहीं किया गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भविष्य में उभरते खतरों—जैसे साइबर हमले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ड्रोन का दुरुपयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रिप्टोकरेंसी के जरिए वित्त पोषण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और डार्क वेब पर रेडिकलाइजेशन—से निपटने के लिए ठोस और निर्णायक रणनीतियाँ भी प्रस्तुत की गई हैं। नीति में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि आतंकवाद का न तो कोई धर्म है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कोई जाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कोई राष्ट्रीयता और न ही कोई सभ्यता। यह एक कृत्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे किसी भी वैचारिक या धार्मिक औचित्य के साथ सही नहीं ठहराया जा सकता।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">केंद्र सरकार की यह नीति सामाजिक सद्भाव को बनाये रखते हुए सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने वाली दूरदर्शिता का प्रतीक है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रहार</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">शब्द का चयन स्वयं सरकार की अडिग इच्छाशक्ति और सक्रिय रणनीति की अभिव्यक्ति है। यह नीति केवल रक्षात्मक प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि प्रोएक्टिव और खुफ़िया-आधारित अभियान संचालित करने की दिशा में स्पष्ट संकेत देती है। यह नीति सात अडिग स्तंभों की उस संगठित शक्ति पर खड़ी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्हें ‘</span>PRAHAAR’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के अक्षरों में इस तरह संहिताबद्ध किया गया है कि हर अक्षर स्वयं एक रणनीतिक संकल्प बन जाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इनमें पहला है</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रिवेंशन</span>—<span lang="hi" xml:lang="hi">आतंकवादी हमलों की पूर्वानुमानित रोकथाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो पूरी तरह से खुफ़िया जानकारी और विश्लेषण पर आधारित होगी।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरा स्तंभ है</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">रिस्पॉन्स</span>—<span lang="hi" xml:lang="hi">तेज़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संतुलित और प्रभावी प्रतिक्रिया सुनिश्चित करने की क्षमता। तीसरा स्तंभ है एग्रीगेटिंग कैपेसिटीज़—सरकारी आंतरिक क्षमताओं का समन्वय और एकीकृत उपयोग। चौथा है</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ह्यूमन राइट्स और रूल ऑफ़ लॉ</span>—<span lang="hi" xml:lang="hi">सभी ऑपरेशंस में मानवाधिकारों और कानूनी ढांचे का कड़ाई से पालन।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पांचवां स्तंभ है</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अटेन्यूएटिंग कंडीशन्स</span>—<span lang="hi" xml:lang="hi">वे सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियाँ जिन्हें कम करके रेडिकलाइजेशन और आतंकवाद के बीजारोपण को रोका जा सके।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">छठा स्तंभ है</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अलाइनिंग इंटरनेशनल एफर्ट्स</span>—<span lang="hi" xml:lang="hi">वैश्विक सहयोग और साझेदारी के माध्यम से आतंकवादियों को वित्तीय संसाधनों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हथियारों की आपूर्ति और सुरक्षित पनाहगाहों से वंचित करना। यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समन्वित कार्रवाई और कूटनीतिक सक्रियता का स्पष्ट संकेत देता है। सातवां स्तंभ है</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">रिकवरी और रिज़िलियंस</span>—<span lang="hi" xml:lang="hi">आतंकवादी घटनाओं से प्रभावित पीड़ितों की समुचित सहायता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज की सामूहिक मानसिक और सामाजिक मजबूती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा पुनर्निर्माण की प्रक्रिया को सर्वोच्च प्राथमिकता देना।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ये सातों स्तंभ सामूहिक रूप से भारत की</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जीरो टॉलरेंस</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नीति को एक व्यवस्थित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समग्र और बहुआयामी ढांचा प्रदान करते हैं। यह केवल सिद्धांतों का संकलन नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि एक सुसंगठित और क्रियान्वयन-केन्द्रित रणनीति का आधार है। पारंपरिक और सीमित रिएक्टिव सोच की परिधि से बाहर निकलते हुए यह नीति अब प्रिवेंटिव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रोएक्टिव और फ्यूचर-प्रूफ दृष्टिकोण को आत्मसात करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत की सुरक्षा प्रतिबद्धता को और अधिक सुदृढ़ करता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ पहले आतंकवाद को मुख्यतः सीमा-पार गतिविधियों तक सीमित समझा जाता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span>‘<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रहार’</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अब जल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">थल और आकाश—तीनों आयामों में उभरते खतरों की व्यापक पहचान करता है। यह नीति सुरक्षा की पारंपरिक परिभाषा से आगे बढ़कर बहु-स्तरीय और सर्वांगीण दृष्टिकोण अपनाती है। इसमें बिजली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रेलवे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एविएशन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पोर्ट्स</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिफेंस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्पेस और एटॉमिक एनर्जी जैसे महत्वपूर्ण आर्थिक एवं सामरिक क्षेत्रों के लिए मल्टी-लेयर सुरक्षा प्रावधानों को सुदृढ़ रूप से शामिल किया गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि राष्ट्रीय अवसंरचना किसी भी प्रकार की आतंकी या विघटनकारी गतिविधि से सुरक्षित रह सके।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">साइबर और ड्रोन युग में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब दुश्मन अदृश्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल और तकनीकी रूप से अत्याधुनिक हो चुका है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरकार ने क्रिमिनल हैकर्स</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नेशन-स्टेट एक्टर्स</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डार्क वेब नेटवर्क</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रिप्टोकरेंसी के माध्यम से होने वाली फंडिंग तथा सोशल मीडिया के दुरुपयोग पर कठोर और निर्णायक कार्रवाई का स्पष्ट संकल्प व्यक्त किया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">‘<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रहार’</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उसका समावेशी और सहभागी दृष्टिकोण है। यह नीति आतंकवाद को केवल सुरक्षा बलों की जिम्मेदारी नहीं मानती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पूरे समाज को सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करती है। स्कूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कॉलेज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मीडिया संस्थान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामुदायिक नेतृत्व और जागरूक नागरिक—सभी को रेडिकलाइजेशन की रोकथाम और सामाजिक समरसता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नीति में स्पष्ट किया गया है कि</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अल-कायदा और आईएसआईएस</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे संगठनों पर कड़ी निगरानी रखी जाएगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किंतु किसी भी समुदाय को सामूहिक रूप से दोषी ठहराने की प्रवृत्ति को स्थान नहीं दिया जाएगा। यह संतुलित और संवेदनशील दृष्टिकोण सुरक्षा की कठोरता तथा सामाजिक सौहार्द—दोनों के बीच सार्थक सामंजस्य स्थापित करता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत अब आतंकवाद की स्पष्ट और सर्वमान्य परिभाषा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा तथा प्रभावी वैश्विक सहयोग के पक्ष में दृढ़ और सशक्त आवाज उठाएगा। यह नीति भारत की दशकों पुरानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुभव-सिद्ध आतंकवाद विरोधी लड़ाई को न केवल संरचित और दस्तावेजीकृत स्वरूप देती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उसे निरंतर विकसित और अद्यतन रखने की दिशा भी सुनिश्चित करती है। सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह केवल रक्षात्मक रणनीति तक सीमित नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि आवश्यक होने पर निर्णायक और प्रभावी प्रहार करने की क्षमता तथा अटूट इच्छाशक्ति भी रखती है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">साइबर और ड्रोन जैसे उभरते खतरों पर विशेष फोकस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खुफ़िया-आधारित रोकथाम की सुदृढ़ व्यवस्था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा ‘होल-ऑफ-सोसाइटी’ दृष्टिकोण भारत को </span>21<span lang="hi" xml:lang="hi">वीं सदी के जटिल और बहुआयामी आतंकवाद के विरुद्ध अधिक सशक्त और सक्षम बनाते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">‘<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रहार’</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नीति एक स्पष्ट और ठोस संदेश देती है—भारत अब केवल घटनाओं पर प्रतिक्रिया नहीं करेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि संभावित खतरों का पूर्वानुमान लगाकर समय रहते निर्णायक कार्रवाई करेगा। आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परंतु उसके विरुद्ध भारत की लड़ाई अब अधिक एकजुट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धिमत्तापूर्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रणनीतिक और अडिग होगी। केंद्र सरकार की यह पहल राष्ट्रीय सुरक्षा को नई ऊँचाइयों तक ले जाने का संकल्प प्रदर्शित करती है और भारत को वैश्विक स्तर पर आतंकवाद-रोधी रणनीतियों में अग्रणी राष्ट्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होती है। यह नीति भविष्य की सुरक्षा चुनौतियों के लिए एक मजबूत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूरदर्शी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समग्र और दीर्घकालिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 24 Feb 2026 17:38:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>भारत की सुरक्षा के खिलाफ साजिशें और सतर्कता की जीत आतंकवाद के बदलते स्वरूप पर गंभीर चिंतन</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">देश की राजधानी दिल्ली और कोलकाता जैसे महानगरों में हाल ही में जिस प्रकार की आतंकी साजिश का खुलासा हुआ, उसने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि आतंकवाद का खतरा केवल सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि वह अपने रूप बदलकर समाज के भीतर घुसपैठ करने की कोशिश करता रहता है। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल और अन्य सुरक्षा एजेंसियों की तत्परता से एक बड़े षड्यंत्र को समय रहते विफल कर दिया गया। यह घटना केवल कुछ पोस्टर लगाने या संदिग्ध गतिविधियों तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसके पीछे एक संगठित मॉड्यूल, विदेशी निर्देश और व्यापक नेटवर्क</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/171003/conspiracies-against-indias-security-and-victory-of-vigilance-serious-reflection"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/hindi-divas41.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">देश की राजधानी दिल्ली और कोलकाता जैसे महानगरों में हाल ही में जिस प्रकार की आतंकी साजिश का खुलासा हुआ, उसने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि आतंकवाद का खतरा केवल सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि वह अपने रूप बदलकर समाज के भीतर घुसपैठ करने की कोशिश करता रहता है। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल और अन्य सुरक्षा एजेंसियों की तत्परता से एक बड़े षड्यंत्र को समय रहते विफल कर दिया गया। यह घटना केवल कुछ पोस्टर लगाने या संदिग्ध गतिविधियों तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसके पीछे एक संगठित मॉड्यूल, विदेशी निर्देश और व्यापक नेटवर्क की आशंका सामने आई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सात फरवरी को कश्मीरी गेट और आसपास के क्षेत्रों में लगाए गए देशविरोधी पोस्टरों ने सुरक्षा एजेंसियों को सतर्क कर दिया। इन पोस्टरों में भारत विरोधी संदेश और आतंकवादी संगठनों से जुड़े व्यक्तियों की तस्वीरें थीं। सबसे पहले इस गतिविधि पर सीआईएसएफ की नजर पड़ी और सूचना मिलते ही दिल्ली पुलिस की पेट्रोलिंग यूनिट सक्रिय हुई। मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल को सौंपी गई। स्पेशल सेल के अतिरिक्त पुलिस आयुक्त प्रमोद कुमार कुशवाहा के नेतृत्व में जांच आगे बढ़ी और संदिग्धों की धरपकड़ शुरू हुई।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जांच में यह खुलासा हुआ कि इस साजिश के तार बांग्लादेश से जुड़े हुए थे। कोलकाता से एक बांग्लादेशी नागरिक सहित दो आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। पूछताछ में उन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने दिल्ली और कोलकाता के विभिन्न स्थानों पर पोस्टर लगाए थे। यह भी सामने आया कि कोलकाता के कई मेट्रो स्टेशनों पर इसी प्रकार की गतिविधियां की गई थीं। आरोपियों को निर्देश देने वाला शख्स शब्बीर अहमद लोन बताया गया, जो जम्मू कश्मीर के गंदेरबल का निवासी है और पूर्व में लश्कर ए तैयबा से जुड़ा रहा है। वर्ष 2007 में उसकी गिरफ्तारी के बाद वह जेल में रहा और 2019 में रिहा हुआ। जांच एजेंसियों का दावा है कि रिहाई के बाद उसने फिर से आतंकी संपर्क स्थापित किए और एक नया मॉड्यूल खड़ा करने की कोशिश की।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आतंकवाद की यही प्रवृत्ति सबसे अधिक चिंताजनक है कि वह बार बार नए चेहरों और नई रणनीतियों के साथ सामने आता है। कभी वह हथियारों के जरिए हमला करता है, कभी वैचारिक युद्ध के माध्यम से समाज में जहर घोलने की कोशिश करता है। पोस्टर जैसे प्रतीत होने वाले साधारण माध्यम का उपयोग भी यदि किसी बड़े षड्यंत्र का हिस्सा हो सकता है, तो यह सुरक्षा तंत्र के लिए गंभीर चेतावनी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तमिलनाडु से छह बांग्लादेशी नागरिकों की गिरफ्तारी ने इस पूरे प्रकरण को और व्यापक बना दिया है। जांच में यह संकेत मिले कि इन लोगों को किसी बड़ी वारदात के लिए तैयार किया जा रहा था। सुरक्षा एजेंसियां अब इनके नेटवर्क, फंडिंग और अंतरराष्ट्रीय संपर्कों की पड़ताल कर रही हैं। यह भी जांच का विषय है कि किस प्रकार सीमापार बैठे हैंडलर भारत के भीतर युवाओं को प्रभावित करने या भ्रमित करने का प्रयास करते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे घटनाक्रम के समानांतर अरब सागर में विदेशी सामान की तस्करी का मामला भी सामने आया, जिसमें अल मुख्तार नामक नाव से लगभग पांच करोड़ रुपये मूल्य की विदेशी सिगरेट बरामद की गई। चार ईरानी नागरिकों को हिरासत में लिया गया और उनके पास से सैटेलाइट फोन जब्त किए गए। यद्यपि यह मामला सीधे तौर पर आतंकवाद से जुड़ा हुआ सिद्ध नहीं हुआ है, परंतु तस्करी, अवैध वित्तीय लेनदेन और आतंकी गतिविधियों के बीच संबंधों को नकारा नहीं जा सकता। कई बार ऐसे अवैध माध्यम ही आतंकवाद की फंडिंग का आधार बनते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आतंकवाद केवल बंदूक और बम का नाम नहीं है। यह एक विचारधारा भी है जो असंतोष, कट्टरता और भ्रम के सहारे पनपती है। जब कोई संगठन युवाओं को राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के लिए प्रेरित करता है, तो वह केवल कानून का उल्लंघन नहीं करता बल्कि समाज की एकता और विश्वास को भी तोड़ने का प्रयास करता है। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में जहां अनेक धर्म, भाषाएं और संस्कृतियां साथ रहती हैं, वहां ऐसी गतिविधियां सामाजिक सौहार्द के लिए बड़ा खतरा बन सकती हैं।</div>
<div style="text-align:justify;">सुरक्षा एजेंसियों की सफलता इस बात का प्रमाण है कि देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था मजबूत है और किसी भी संदिग्ध गतिविधि को हल्के में नहीं लिया जाता। तकनीकी निगरानी, खुफिया सूचनाओं का आदान प्रदान और राज्यों के बीच समन्वय ने इस साजिश को नाकाम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। किंतु यह भी सत्य है कि आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई केवल सुरक्षा बलों के भरोसे नहीं लड़ी जा सकती। समाज की सजगता, नागरिकों की जिम्मेदारी और युवाओं में सकारात्मक सोच का विकास भी उतना ही आवश्यक है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया और इंटरनेट के माध्यम से कट्टरपंथी विचारों का प्रसार तेज गति से होता है। सीमापार बैठे तत्व भ्रामक सूचनाओं और उकसावे के जरिए युवाओं को अपने जाल में फंसाने की कोशिश करते हैं। ऐसे में शिक्षा, जागरूकता और संवाद की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि युवाओं को सही दिशा, रोजगार और अभिव्यक्ति के स्वस्थ अवसर मिलें, तो वे किसी भी भटकाव का शिकार नहीं होंगे।</div>
<div style="text-align:justify;">भारत ने पिछले दशकों में आतंकवाद की भारी कीमत चुकाई है। जम्मू कश्मीर से लेकर महानगरों तक अनेक निर्दोष लोगों ने अपनी जान गंवाई है। इसलिए प्रत्येक साजिश का समय रहते पर्दाफाश होना न केवल सुरक्षा की जीत है, बल्कि यह उन सभी नागरिकों के प्रति उत्तरदायित्व का निर्वाह भी है जो शांति और विकास का सपना देखते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;">इस घटना से यह स्पष्ट संदेश जाता है कि आतंकवाद चाहे वैचारिक हो या सशस्त्र, उसकी जड़ें काटने के लिए बहुआयामी रणनीति आवश्यक है। सीमाओं की सुरक्षा, खुफिया तंत्र की मजबूती, वित्तीय लेनदेन पर निगरानी और समाज में जागरूकता का विस्तार एक साथ चलना चाहिए। साथ ही, जो लोग भटक चुके हैं, उनके पुनर्वास और मुख्यधारा में लौटने के प्रयास भी किए जाने चाहिए, ताकि वे फिर किसी साजिश का हिस्सा न बनें।</div>
<div style="text-align:justify;">अंततः यह समझना होगा कि आतंकवाद का लक्ष्य केवल भय फैलाना नहीं होता, बल्कि वह राष्ट्र की एकता और विश्वास को कमजोर करना चाहता है। जब देश की एजेंसियां सतर्कता और समन्वय के साथ ऐसी साजिशों को विफल करती हैं, तो यह लोकतंत्र की शक्ति और सामूहिक संकल्प का प्रतीक बनता है। भारत की विविधता, लोकतांत्रिक मूल्यों और नागरिकों की सजगता ही आतंकवाद के विरुद्ध सबसे बड़ी ढाल है। यदि हम सभी मिलकर शांति, सद्भाव और कानून के प्रति सम्मान की भावना को मजबूत करें, तो कोई भी आतंकी साजिश हमारे राष्ट्रीय आत्मविश्वास को डिगा नहीं सकती है।</div>
<div style="text-align:justify;">          *कांतिलाल मांडोत*</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 23 Feb 2026 18:48:21 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>भारत की पावन धरा पर रचे वेदों, उपनिषदों और प्रमाणिक शास्त्रों की तथ्यात्मक जानकारी प्रत्येक सनातनी के लिए अनिवार्य है </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">वेद मानव सभ्यता के आदि स्रोत हैं—ज्ञान, विज्ञान और मानवीय कल्याण के अक्षय भंडार। चारों वेदों को प्राचीनतम ऋषियों ने मानवीय हितार्थ रचा। विश्व की सांस्कृतिक परंपरा में ऋग्वेद को सर्वाधिक प्राचीन धर्मग्रंथ माना जाता है। ‘वेद’ का अर्थ है—ज्ञान, और यह ज्ञान विश्वहित में है। वेदों में वर्णित सत् कालातीत है। सृष्टि कब और कैसे हुई—इस पर मतभेद संभव हैं, पर किसी मत का खंडन या मीनमेख निकालना उद्देश्य नहीं।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">सनातन परंपरा के अनुसार ब्रह्मांड की सृष्टि क्रम में आदि शक्ति ने विष्णु को प्रकट किया, उनके नाभिकमल से ब्रह्मा प्रकट हुए और फिर शिव का उद्भव हुआ। पारस्परिक</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/170882/factual-knowledge-of-the-vedas-upanishads-and-authentic-scriptures-written"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/news-211.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">वेद मानव सभ्यता के आदि स्रोत हैं—ज्ञान, विज्ञान और मानवीय कल्याण के अक्षय भंडार। चारों वेदों को प्राचीनतम ऋषियों ने मानवीय हितार्थ रचा। विश्व की सांस्कृतिक परंपरा में ऋग्वेद को सर्वाधिक प्राचीन धर्मग्रंथ माना जाता है। ‘वेद’ का अर्थ है—ज्ञान, और यह ज्ञान विश्वहित में है। वेदों में वर्णित सत् कालातीत है। सृष्टि कब और कैसे हुई—इस पर मतभेद संभव हैं, पर किसी मत का खंडन या मीनमेख निकालना उद्देश्य नहीं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सनातन परंपरा के अनुसार ब्रह्मांड की सृष्टि क्रम में आदि शक्ति ने विष्णु को प्रकट किया, उनके नाभिकमल से ब्रह्मा प्रकट हुए और फिर शिव का उद्भव हुआ। पारस्परिक परिचय के बाद देवी ने उनके कार्य निर्धारण किए—ब्रह्मा सृष्टिकर्ता, विष्णु पालनकर्ता और शिव संहारकर्ता। माता ने उनके लिए लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती का भी प्राकट्य किया। इसी तरह स्वर्ग, मृत्युलोक, पाताल और प्रकृति की शोभा भी प्रकट हुई।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मानवीय सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा ने दक्ष प्रजापति और एक नारी को उत्पन्न कर उन्हें पति-पत्नी के धर्म बताए। दक्ष से 27 नक्षत्र कन्याएँ तथा दीति-अदीति का जन्म हुआ, जिनका विवाह कश्यप ऋषि से हुआ। दीति से दैत्य और अदीति से देव उत्पन्न हुए, और उनके स्वभावानुसार देव-दानव संघर्ष आरंभ हुआ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सृष्टि विस्तार से पूर्व ब्रह्मा ने सात प्रजापति ऋषियों—वशिष्ठ, भृगु, कश्यप आदि—को उत्पन्न कर उन्हें ज्ञान-विज्ञान का प्रसार करने का आदेश दिया। उन्होंने नारद को भी सृष्टि विस्तार का दायित्व देने का प्रयास किया, जिसे नारद ने अस्वीकार किया। क्रोधित ब्रह्मा ने उन्हें लोक-लोकांतर में विचरण का अभिशाप दिया। इसी क्रम में 60 हजार पुत्र उत्पन्न हुए जिन्हें ब्रह्मा ने सृष्टि को आगे बढ़ाने का आदेश दिया। वे नारद के पास ज्ञान के लिए गए और नारद ने उन्हें विष्णु का नामजप कराया। इसे अवज्ञा मान ब्रह्मा ने उन्हें भी अभिशाप दिया कि गंगा अवतरण के समय उसके जलस्पर्श से वे पुनर्जीवित होंगे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सनातन संस्कृति की विराटता और गहराई को पूर्णतः निरूपित करना कठिन है। मान्यता है कि चारों वेद विष्णु ने अपनी भुजाओं से प्रकट किए और नई सृष्टि के समय मनु-शतरूपा तथा सप्तऋषियों को सौंप कर कहा कि वेदों के ज्ञाता और प्रसारक यही ऋषि होंगे और मनु उनका संरक्षण करेंगे। सतयुग, त्रेता, द्वापर और प्रारंभिक कलियुग तक चक्रवर्ती सम्राटों ने धर्म, न्याय और संस्कृति की रक्षा की। विक्रमादित्य, चंद्रगुप्त मौर्य आदि के शासनकाल तक भारत पर विदेशी आक्रमण लगभग असंभव था। सिकंदर का पराभव इसका उदाहरण है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सनातन मान्यताओं के अनुसार कोई कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, प्रकृति उसे दंडित करती है। यही भारतभूमि की विशिष्टता है। किंतु सातवीं शताब्दी के बाद जब केंद्र में शक्तिशाली सम्राट नहीं रहे, तब विदेशी आक्रांताओं—कासिम, गौरी, गजनवी, खिलजी आदि—ने भारत पर आक्रमण कर लूटपाट और अत्याचार किए। राजाओं की पारस्परिक बैमनस्यता के कारण भारत 7वीं से 20वीं सदी तक पराधीनता की पीड़ा झेलता रहा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">स्वतंत्र भारत में वामपंथी इतिहासकारों ने पराधीनता काल के अत्याचार, लूट, धर्मांतरण आदि के सत्य को इतिहास से हटाकर सनातनियों के साथ अन्याय किया। मुगल और अंग्रेज कालीन भारत को ही भारतीय इतिहास का केंद्र दिखाना ऐतिहासिक अपराध है। करोड़ों बलिदानों के बाद अंग्रेजी शासन समाप्त हुआ, पर उनकी विभाजनकारी नीति ने भारत के साथ पाकिस्तान का निर्माण कराया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">स्वतंत्र भारत में संविधान का निर्माण हुआ जिसमें अनेक विद्वान शामिल थे। 1952 के प्रथम चुनाव में पंडित नेहरू प्रधानमंत्री बने। परंतु स्वतंत्रता के बाद भी सनातन संस्कृति, शिक्षा केंद्रों, वैज्ञानिक मान्यताओं और धार्मिक परंपराओं पर चोटें जारी रहीं। अंग्रेजों की तरह ही स्वतंत्र भारत में भी सामाजिक भ्रम, जातिवाद और क्षेत्रवाद को बढ़ावा देकर राष्ट्रीय चेतना कमजोर की गई।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महर्षि वेदव्यास ने गणेशजी की लेखनी से वेदों को सरल कर जन-जन तक पहुँचाया। विक्रमादित्य, चंद्रगुप्त, अशोक, हर्ष जैसे सम्राटों ने भारत को सांस्कृतिक और वैज्ञानिक ऊँचाई पर पहुँचाया। पर प्रश्न उठता है—स्वतंत्र भारत में हम अपनी वैज्ञानिक व सांस्कृतिक मान्यताओं के प्रति भ्रमित क्यों? राष्ट्रविरोधी गतिविधियों पर कठोर कार्रवाई न होने और संस्कृति विरोधी राजनीति के कारण सामूहिक प्रगति बाधित होती रही।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हाल में राजधानी में हुए विस्फोट ने देश को पुनः चिंतन हेतु विवश किया। इसके विपरीत राजनीतिक स्वार्थवश कुछ नेता सांप्रदायिक दलों को धर्मनिरपेक्ष बताते हैं और सनातन संस्कृति को सांप्रदायिक कहकर मिथ्या प्रचार करते हैं। हिन्दुत्व जीवन-पद्धति है, भारतीयता का स्वरूप है; जबकि धार्मिक कट्टरवाद विस्तारवादी विचार है, जिसका इतिहास साक्षी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत अनगिनत बलिदानों से स्वतंत्र हुआ, पर मानसिक रूप से मुगल-मैकाले प्रभाव से पूर्णतः मुक्त नहीं हो पाया। इसी कारण साम्प्रदायिक सद्भाव, राष्ट्रीय एकता और सामूहिक प्रगति समय-समय पर बाधित होती रही है।अतः आवश्यक है कि राष्ट्र के प्रति निष्ठा और सनातन सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति सम्मान को सर्वोपरि रखा जाए। तभी भारत में समरसता और समानता का भाव पुष्ट होगा और सामूहिक प्रयास से भारत विकसित राष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठित होगा। </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 22 Feb 2026 20:03:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>प्रेम का उत्सव या बाज़ार का प्रभाव?</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">प्रतिवर्ष 14 फरवरी को विश्वभर में प्रेम दिवस के रूप में ‘वेलेंटाइन डे’ मनाया जाता है। भारत में भी पिछले कुछ दशकों से यह दिन विशेष रूप से युवाओं के बीच लोकप्रिय हुआ है। हालांकि समाज का एक वर्ग इसे पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव मानते हुए इसका विरोध करता रहा है, फिर भी यह सच है कि प्रेम जैसी सार्वभौमिक भावना किसी सीमा या संस्कृति की मोहताज नहीं होती। यदि हम इस दिन को केवल पश्चिमी परंपरा के चश्मे से देखने के बजाय व्यापक सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से समझें, तो पाएंगे कि प्रेम और वसंत का संबंध हमारी अपनी</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/169497/kantilal-mandot-sir-please-write-my-name-in-my-article"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/images-(1)21.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">प्रतिवर्ष 14 फरवरी को विश्वभर में प्रेम दिवस के रूप में ‘वेलेंटाइन डे’ मनाया जाता है। भारत में भी पिछले कुछ दशकों से यह दिन विशेष रूप से युवाओं के बीच लोकप्रिय हुआ है। हालांकि समाज का एक वर्ग इसे पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव मानते हुए इसका विरोध करता रहा है, फिर भी यह सच है कि प्रेम जैसी सार्वभौमिक भावना किसी सीमा या संस्कृति की मोहताज नहीं होती। यदि हम इस दिन को केवल पश्चिमी परंपरा के चश्मे से देखने के बजाय व्यापक सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से समझें, तो पाएंगे कि प्रेम और वसंत का संबंध हमारी अपनी परंपराओं में भी गहराई से जुड़ा हुआ है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वेलेंटाइन नामक संत के बारे में मान्यता है कि उन्होंने प्रेम को सामाजिक बंधनों से ऊपर माना और प्रेमी युगलों का विवाह करवाने के कारण उन्हें मृत्युदंड दिया गया। उनकी शहादत प्रेम की पवित्रता और समर्पण का प्रतीक बन गई। भारतीय संदर्भ में देखें तो प्रेम की यह भावना कोई नई नहीं है। भगवान श्रीकृष्ण और राधा का संबंध केवल लौकिक प्रेम का नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक माना गया है। कृष्ण का प्रेम मर्यादा और माधुर्य दोनों का अद्भुत संगम है। संस्कृत साहित्य में भी वसंत ऋतु को प्रेम की ऋतु कहा गया है। कालिदास, भास और शूद्रक जैसे साहित्यकारों ने अपने नाटकों और काव्यों में वसंत को मिलन और अनुराग का प्रतीक बताया है। ‘मदनोत्सव’ और ‘वसंतोत्सव’ जैसी परंपराएं इस बात की साक्षी हैं कि प्रेम और उल्लास का उत्सव मनाना भारतीय संस्कृति का भी अभिन्न अंग रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वेलेंटाइन डे के आसपास ही भारत में वसंत ऋतु का आगमन होता है। बसंत पंचमी से लेकर होली तक का समय प्रकृति के नवोन्मेष का काल होता है। सरसों के पीले फूल, कोयल की कूक और मंद समीर वातावरण में एक मधुर भाव जगाते हैं। सूफी संतों ने भी वसंत को प्रेम और भक्ति से जोड़ा। अमीर खुसरो ने अपने गुरु हजरत निजामुद्दीन औलिया के प्रति प्रेम को व्यक्त करने के लिए बसंत और होली के गीतों की रचना की। यह प्रेम सांसारिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उत्कर्ष का प्रतीक था। इससे स्पष्ट होता है कि प्रेम का उत्सव मनाने की परंपरा केवल पश्चिम की देन नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतना का भी हिस्सा रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जहां तक ‘बेलन टाइम डे’ से ‘वेलेंटाइन डे’ तक की हास्यपूर्ण कथा का प्रश्न है, वह एक व्यंग्यात्मक प्रस्तुति है, जो सामाजिक संबंधों में सम्मान और समानता की आवश्यकता को रेखांकित करती है। इसका ऐतिहासिक आधार चाहे जो भी हो, संदेश यह है कि दांपत्य संबंध प्रेम और आदर पर आधारित होने चाहिए, न कि उत्पीड़न पर। आधुनिक समाज में भी यह संदेश प्रासंगिक है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज के समय में युवाओं का वेलेंटाइन डे के प्रति बढ़ता आकर्षण कई कारणों से है। एक ओर वैश्वीकरण और सोशल मीडिया ने सांस्कृतिक सीमाओं को धुंधला कर दिया है, वहीं दूसरी ओर युवा पीढ़ी अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त करने में विश्वास करती है। उनके लिए यह दिन अपने प्रियजनों के प्रति स्नेह प्रकट करने का अवसर है। वे इसे केवल प्रेमी-प्रेमिका के संबंध तक सीमित नहीं रखते, बल्कि मित्रता, पारिवारिक स्नेह और आत्म-प्रेम तक भी विस्तारित कर रहे हैं। विद्यालयों और महाविद्यालयों में ‘फ्रेंडशिप डे’ या ‘रोज डे’ जैसी गतिविधियां युवाओं को अभिव्यक्ति का मंच देती हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">किन्तु इसके साथ कुछ प्रश्न भी जुड़े हैं। क्या प्रेम को केवल एक दिन तक सीमित कर देना उचित है? क्या उपहार, महंगे फूल और रेस्टोरेंट में डिनर ही प्रेम की अभिव्यक्ति हैं? आज वेलेंटाइन डे पर बाजार का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। कंपनियां विशेष ऑफर और विज्ञापनों के माध्यम से युवाओं को आकर्षित करती हैं। इससे प्रेम का भाव कहीं-कहीं प्रदर्शन और प्रतिस्पर्धा का रूप ले लेता है। जिन युवाओं के पास आर्थिक साधन कम होते हैं, वे स्वयं को हीन महसूस कर सकते हैं। इस प्रकार प्रेम का सहज और सरल भाव उपभोगवाद की चकाचौंध में दब जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">समाज पर पड़ने वाले संभावित दुष्प्रभावों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कई बार अपरिपक्व आयु में आकर्षण को प्रेम समझ लिया जाता है, जिससे भावनात्मक आघात या पढ़ाई पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। सोशल मीडिया पर दिखावटी रिश्तों का दबाव भी युवाओं को भ्रमित करता है। कुछ मामलों में सार्वजनिक स्थानों पर अनुचित व्यवहार सामाजिक असहजता का कारण बनता है। अतः आवश्यक है कि युवा प्रेम और आकर्षण के अंतर को समझें और अपनी मर्यादाओं का ध्यान रखें।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके विपरीत, यदि वेलेंटाइन डे को सकारात्मक दृष्टि से देखा जाए, तो यह आपसी सम्मान, संवाद और संवेदनशीलता को बढ़ाने का अवसर भी हो सकता है। प्रेम केवल रोमांटिक संबंध नहीं, बल्कि सहानुभूति, करुणा और सहयोग की भावना है। यदि इस दिन को हम माता-पिता, मित्रों, शिक्षकों या समाज के जरूरतमंद लोगों के प्रति आभार व्यक्त करने के रूप में मनाएं, तो इसका स्वरूप अधिक व्यापक और सार्थक हो सकता है। भारतीय संस्कृति ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का संदेश देती है, जिसमें समस्त विश्व को परिवार माना गया है। इस दृष्टि से प्रेम दिवस का अर्थ केवल युगल प्रेम तक सीमित नहीं, बल्कि मानवीय संबंधों के सुदृढ़ीकरण से है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज वेलेंटाइन डे आवश्यक है या नहीं, इसका उत्तर व्यक्ति की सोच पर निर्भर करता है। प्रेम तो हर दिन व्यक्त किया जा सकता है, फिर भी विशेष दिवस हमें ठहरकर अपने संबंधों को संवारने का अवसर देते हैं। यदि हम इसे अंधानुकरण या उग्र विरोध के बजाय संतुलित दृष्टिकोण से अपनाएं, तो यह सांस्कृतिक संघर्ष का कारण नहीं बनेगा। भारतीय समाज की विशेषता यह रही है कि उसने बाहरी प्रभावों को आत्मसात करते हुए उन्हें अपनी संवेदना के अनुरूप रूपांतरित किया है। ठीक उसी प्रकार वेलेंटाइन डे को भी हम भारतीय मूल्यों के साथ जोड़ सकते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः प्रेम एक सार्वभौमिक और शाश्वत भावना है। इसमें वासना नहीं, बल्कि समर्पण और सम्मान का भाव होना चाहिए। चाहे वह राधा-कृष्ण का आध्यात्मिक प्रेम हो, सूफी संतों की भक्ति हो या संत वेलेंटाइन की शहादत।</div>
<div style="text-align:justify;">सभी का मूल संदेश यही है कि प्रेम मनुष्य को श्रेष्ठ बनाता है। आवश्यकता इस बात की है कि हम प्रेम को दिखावे या बाजारवाद से ऊपर उठाकर उसकी पवित्रता को बनाए रखें। यदि वेलेंटाइन डे हमें यही सीख देता है, तो यह केवल एक विदेशी पर्व नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना का उत्सव बन सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>
<div class="yj6qo" style="text-align:justify;"> </div>
<div class="adL" style="text-align:justify;"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 13 Feb 2026 18:47:06 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>तेल के इर्द-गिर्द घूमता वैश्विक जगत</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">विश्व की राजनीति का पूरा का पूरा चक्र आज  प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से तेल और ऊर्जा संसाधनों के इर्द-गिर्द घूमता दिखाई दे रहा है। जहाँ किसी देश का लोकतंत्र, मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय नियम कानून केवल कागज में दिखाई देने लगे हैं। अमेरिका के चलते जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत चरितार्थ कर रही है। तेल और ऊर्जा संसाधन अब  वास्तविक प्रेरक शक्ति,भू-राजनीतिक हित तथा ऊर्जा सुरक्षा बन गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में सैन्य तथा कूटनीतिक हस्तक्षेप को जब तेल भंडारों, आपूर्ति मार्गों और रणनीतिक नियंत्रण के संदर्भ में जोड़ा जाता है तब यह स्पष्ट  है कि ऊर्जा</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/168399/the-global-world-revolves-around-oil"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/why-crude-oil-is-called-engine-of-global-economy.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">विश्व की राजनीति का पूरा का पूरा चक्र आज  प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से तेल और ऊर्जा संसाधनों के इर्द-गिर्द घूमता दिखाई दे रहा है। जहाँ किसी देश का लोकतंत्र, मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय नियम कानून केवल कागज में दिखाई देने लगे हैं। अमेरिका के चलते जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत चरितार्थ कर रही है। तेल और ऊर्जा संसाधन अब  वास्तविक प्रेरक शक्ति,भू-राजनीतिक हित तथा ऊर्जा सुरक्षा बन गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में सैन्य तथा कूटनीतिक हस्तक्षेप को जब तेल भंडारों, आपूर्ति मार्गों और रणनीतिक नियंत्रण के संदर्भ में जोड़ा जाता है तब यह स्पष्ट  है कि ऊर्जा संसाधनों पर प्रभुत्व वैश्विक नेतृत्व का केंद्रीय उपकरण बन गया  है, यही कारण है कि रूस से तेल खरीदने के प्रश्न पर भारत जैसे संप्रभु देश पर दबाव, प्रतिबंधों की धमकी और नैतिक उपदेशों की बौछार देखने को मिली, जबकि वही देश अपने हित में नियमों की व्याख्या बदलने से नहीं हिचकते; मध्य-पूर्व लंबे समय से इस राजनीति का केंद्र रहा है जहाँ तेल के साथ-साथ अब परमाणु ऊर्जा भी शक्ति संतुलन का निर्णायक कारण बन चुकी है।</p>
<p style="text-align:justify;">ईरान द्वारा परमाणु संधियों को लेकर अपनाया गया सतर्क या असहमति वाले रुख ने उसे वैश्विक दबावों के केंद्र बना दिया है और संभावित टकराव की आशंकाएँ इसी भय से उपज की परिणति हैं कि कहीं ऊर्जा और परमाणु क्षमता का संतुलन एकतरफा न हो जाए। यूरोप से एशिया तक बड़े देश तेल आयात-निर्यात, पाइपलाइन, समुद्री मार्गों और परमाणु ईंधन की आपूर्ति को लेकर जिस तरह से खेमे में लंम्बन्ध हो रहे हैं, उससे यह प्रतीत होता है कि वैश्वीकरण के युग में भी संसाधनों की राजनीति पहले से अधिक क्लिष्ट हो गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">ऊर्जा आत्मनिर्भरता अब केवल आर्थिक लक्ष्य नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न बन चुकी है । यही कारण है कि विश्व की अधिकांश नीतियाँ नैतिकता से अधिक बैरल, रिएक्टर और आपूर्ति श्रृंखलाओं की भाषा में लिखी जा रही जहाँ युद्ध की आहट भी अक्सर शांति के नारों के बीच सुनाई देती है। वैश्विक राजनीति और व्यापार का आधुनिक ताना-बाना भारत, चीन, रूस, ईरान और खाड़ी देशों के ऊर्जा-केंद्रित संबंधों से और अधिक स्पष्ट हो जाता है, जहाँ तेल, गैस और परमाणु ईंधन केवल वस्तुएँ नहीं बल्कि रणनीतिक शक्ति के उपकरण बन चुके हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हालिया वर्षों के व्यापारिक रुझान बताते हैं कि भारत ने अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए रूस से कच्चे तेल का आयात बढ़ाया, जिससे उसे अपेक्षाकृत सस्ती ऊर्जा मिली और घरेलू अर्थव्यवस्था को संबल मिला, जबकि यही कदम पश्चिमी देशों को असहज करता रहा, दूसरी ओर चीन ने रूस और ईरान दोनों के साथ दीर्घकालिक ऊर्जा और अवसंरचना समझौतों के माध्यम से अपने उद्योग और आपूर्ति शृंखलाओं को सुरक्षित किया है। जिससे वह वैश्विक विनिर्माण में अपनी बढ़त बनाए रख सके, रूस जो प्रतिबंधों के बीच नए बाज़ार तलाश रहा है, एशिया विशेषकर भारत और चीन को ऊर्जा निर्यात कर अपने व्यापार संतुलन को संभाल रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">वहीं ईरान अपने तेल, गैस और परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को राष्ट्रीय संप्रभुता से जोड़कर और खाड़ी देशों के साथ प्रतिस्पर्धा तथा सहयोग—दोनों के बीच संतुलन साधे हुए है। खाड़ी देश, जिनकी पूरी अर्थव्यवस्थाएँ ही तेल-गैस निर्यात पर टिकी हैं, अब व्यापार विविधीकरण, पेट्रोकेमिकल्स, हरित ऊर्जा और एशिया-केंद्रित बाज़ारों की ओर तेज़ी से बढ़ रहे हैं जहाँ भारत और चीन उनके सबसे बड़े ग्राहक बनते जा रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इन नए व्यापारिक आंकड़ों और प्रवृत्तियों से यह स्पष्ट होता है कि वैश्विक व्यवसाय अब केवल मुक्त बाज़ार का खेल नहीं रहा बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, मुद्रा लेन-देन, समुद्री मार्गों और राजनीतिक गठबंधनों से गहराई से जुड़ चुका है, और इसी कारण विश्व की बड़ी शक्तियाँ व्यापार समझौतों को रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही हैं। जहाँ तेल और परमाणु ऊर्जा आने वाले दशकों की राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों की दिशा तय करते दिखाई दे रहे हैं।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 06 Feb 2026 17:29:27 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>कब्र के नारे, मोदी के मारे: विरोधियों की छुट्टी</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right">  <strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-in" xml:lang="en-in">  </span>5 <span lang="hi" xml:lang="hi">फरवरी </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">को राज्यसभा में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का जवाब दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो सदन में अचानक एक गहरा सन्नाटा छा गया। शोर-शराबे</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बीच</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">उनके</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भाषण</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ने</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">विपक्ष</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पर</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तीखा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हमला</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">किया। यह भाषण केवल जवाब नहीं था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह इतिहास की आँख में आँख डालने जैसा था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छुपी नफरत का बेनकाब सामना। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मोहब्बत की दुकान</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">के मोहक शब्दों के पीछे छुपा जहर और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मोदी तेरी कब्र खुदेगी</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">की कड़वी चेतावनी सीधे लोकतंत्र पर वार कर रही थी। मोदी ने मुखौटे को</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/168393/grave-slogans-leave-modis-opponents-dead"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/pm-modi-speech-2-1770292368.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"> <strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-in" xml:lang="en-in"> </span>5 <span lang="hi" xml:lang="hi">फरवरी </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">को राज्यसभा में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का जवाब दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो सदन में अचानक एक गहरा सन्नाटा छा गया। शोर-शराबे</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बीच</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">उनके</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भाषण</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ने</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">विपक्ष</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पर</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तीखा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हमला</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">किया। यह भाषण केवल जवाब नहीं था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह इतिहास की आँख में आँख डालने जैसा था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छुपी नफरत का बेनकाब सामना। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मोहब्बत की दुकान</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">के मोहक शब्दों के पीछे छुपा जहर और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मोदी तेरी कब्र खुदेगी</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">की कड़वी चेतावनी सीधे लोकतंत्र पर वार कर रही थी। मोदी ने मुखौटे को चीरते हुए स्पष्ट संदेश दिया—शब्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म और नीयत कभी छिप नहीं सकते। विपक्ष की ताकत और आक्रोश उस क्षण थम गए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और सदन ने उनकी बातों को गंभीरता से सुना।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राजनीति में नारे अक्सर हथियार बन जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर कभी-कभी वे जहरीले बनकर लोकतंत्र की धमनियों में उतरते हैं। राहुल गांधी ने लगातार </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मोहब्बत की दुकान</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">का नारा दोहराया। मोदी ने सीधे सवाल उठाया—यह कैसी मोहब्बत है जो मौत और खतरों का संदेश देती है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यह व्यक्तिगत विरोध नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह संवैधानिक और राष्ट्रीय अपमान है। प्रधानमंत्री ने याद दिलाया कि पिछले पच्चीस वर्षों में कितनी गालियाँ झेली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर भी विकास की गति रुकी नहीं। </span>140 <span lang="hi" xml:lang="hi">करोड़ भारतीयों का विश्वास ही सरकार की असली शक्ति है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि किसी परिवार का रिमोट। यह तीखा संदेश सदन में गूंज गया और विपक्ष की आक्रोशित मुद्रा पर सन्नाटा छा गया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कांग्रेस के लिए मानना कठिन था कि एक चायवाले का बेटा देश का प्रधानमंत्री बन गया। मोदी ने कहा—वे मान बैठे थे कि प्रधानमंत्री पद उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। जब जनता ने वह अधिकार छीन लिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो नफरत की आग भड़क उठी। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मोदी तेरी कब्र खुदेगी</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल नारा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह उनके गहरे मन का सपना था। लोकतंत्र की बात करने वाले भी कभी-कभी मौत के नारे लगाते हैं। पीएम ने चेतावनी दी—इतिहास की कब्र उन्हीं के इंतजार में है। जनता सब देख रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समझ रही है। सदन में वॉकआउट हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर सच गूंजता रहा और हवा में लटक गया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मोदी ने अपने कार्यकाल की उपलब्धियाँ गिनाईं—आर्टिकल </span>370 <span lang="hi" xml:lang="hi">हटाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्वोत्तर से आतंकवाद मिटाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाकिस्तान में सर्जिकल स्ट्राइक की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नक्सलवाद पर प्रहार किया। यही वजह थी कि नफरत और कब्र के नारे उठे। उन्होंने स्पष्ट कहा—कितने भी नारे लगाओ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरी कब्र नहीं खोदी जा सकती। माँ-बहनों का आशीर्वाद मेरी सबसे मज़बूत ढाल है। गरीबों को घर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शौचालय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिजली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गैस और जल जीवन मिशन मिला। </span>25 <span lang="hi" xml:lang="hi">करोड़ लोग गरीबी की जकड़न से मुक्त हुए। कांग्रेस ने परिवार के लिए देश को दांव पर लगाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं जनता के लिए जीवन समर्पित कर रहा हूँ। फर्क इतना साफ था कि बहस का कोई स्थान नहीं बचा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रधानमंत्री ने भाषण में देश की आर्थिक उड़ान को भी बखूबी रेखांकित किया। स्वतंत्रता के समय छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था से फिसलकर ग्यारहवें स्थान पर पहुंची भारत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज फिर से तीसरे नंबर की ओर तेजी से बढ़ रहा है। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">फ्रेजाइल फाइव</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">से </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">विकसित भारत</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">की राह पर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उच्च विकास दर और कम मुद्रास्फीति के साथ दुनिया भारत की ओर आकर्षित हो रही है। यूरोपीय संघ (</span>27 <span lang="hi" xml:lang="hi">देशों के साथ </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मदर ऑफ ऑल डील्स</span>') <span lang="hi" xml:lang="hi">और अमेरिका जैसे बड़े समझौते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भविष्य-तैयार व्यापार सौदे—ये सब वैश्विक विश्वास की निशानी हैं। मोदी ने कहा—ये उपलब्धियां विपक्ष की नजर में नहीं आतीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए वे नफरत के नारे लगाते हैं। लेकिन </span>140 <span lang="hi" xml:lang="hi">करोड़ भारतीयों का आशीर्वाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गरीबों-युवाओं की ताकत ही असली ढाल है। कांग्रेस ने देश को लूटा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैंने जनता को सशक्त बनाया। यह फर्क इतना स्पष्ट है कि कोई बहस बाकी नहीं बचती। सदन में उनकी बातें विकास की नई गूंज बन गईं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह हमला केवल कांग्रेस पर नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूरे विपक्ष पर था। मोदी ने कहा—</span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मोहब्बत की दुकान</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">में आग लगी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए कब्र के नारे उठते हैं। वे हार से जलते हैं। चुनाव हारने पर नफरत दोगुनी हो जाती है। जनता समझदार है</span>, 140 <span lang="hi" xml:lang="hi">करोड़ लोग मेरे साथ खड़े हैं। उनकी सरकार रिमोट से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जन-विश्वास से चलती है। मोदी ने मुस्कान के साथ कहा—रोज़ गालियाँ सुनता हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर स्वास्थ्य बिल्कुल ठीक है। यह केवल हास्य नहीं था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह अटूट आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प का परिचायक था। सदन में तालियों की गड़गड़ाहट गूँज उठी। विपक्ष चुप था</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">बहस का कोई अवसर नहीं बचा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पीएम ने स्पष्ट संदेश दिया—नफरत से कुछ नहीं बनता। अगर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मोहब्बत की दुकान</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">कब्र खोदने वाली बन जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वह दुकान बंद होनी चाहिए। देश विकास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एकता और प्रगति चाहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि नफरत। जो लोग </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मोदी तेरी कब्र खुदेगी</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">कहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे खुद समय की कब्र में समा जाएंगे। जनता ने अपना निर्णय सुना दिया है। यह भाषण विपक्ष पर तीखा हमला और सरकार की उपलब्धियों का बयान था। मोदी ने साबित कर दिया—शब्द भी क्रांति ला सकते हैं। सदन खाली हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उनकी गूँज हवा में गूँजती रही और लोकतंत्र की चेतना में अमिट छाप छोड़ गई।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हर शब्द में तीव्रता थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर वाक्य में </span><span lang="hi" xml:lang="hi">दृढ़</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिबद्धता। यह केवल राजनीतिक हमला नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि राष्ट्रीय चेतना को जगाने का </span><span lang="hi" xml:lang="hi">साहसिक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रयास था। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">विपक्ष के नारे और झूठ कभी छिप नहीं सकते। मोदी ने साबित किया कि जनता के विश्वास और कामकाज का सामना किसी नफरत से नहीं किया जा सकता।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यह भाषण इतिहास में दर्ज होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि इसमें केवल जवाब नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि राष्ट्र के भविष्य का संदेश था। विकास और एकता की राह में नफरत की आग को बुझाने का प्रतीक बन गया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सदन से बाहर लोग सोच में डूबे थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर मन में सवाल उठ रहा था—क्या लोकतंत्र की सुरक्षा इतनी मजबूत है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">मोदी ने साबित किया कि लोकतंत्र केवल संविधान में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि जनता के विश्वास और नेताओं की जिम्मेदारी में जीवित रहता है। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मोहब्बत की दुकान</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मोदी तेरी कब्र खुदेगी</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे नारे इतिहास में चेतावनी बनकर हमेशा गूंजेंगे। यह भाषण वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के लिए संदेश बन गया—नफरत से कुछ नहीं बनता। देश विकास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एकता और प्रगति चाहता है। जो लोग प्रधानमंत्री की कब्र की कामना करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे समय की कब्र में समा जाएँगे। जनता ने अपना फैसला सुना दिया है। मोदी ने साबित किया कि शब्द भी परिवर्तन ला सकते हैं। सदन खाली हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर उनकी गूँज लोकतंत्र की चेतना में अमिट छाप छोड़ गई।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 06 Feb 2026 17:19:06 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>उतरप्रदेश और बिहार में नींव से खिसकते अनेक राजनीतिक दल</title>
                                    <description><![CDATA[<div>राजनीतिक दल चुनाव लड़ने के लिए बनाए जाते जाते हैं।  उसका आधार एक विचार होता है। उसके लिए संगठ बनता है। जो लोगों को उस विचार के लिए प्रेरित करता है। यही नियम है। इसे उत्तर प्रदेश के  चुनाव मेंभी  ध्वस्त होते देखा गया  था। हर दल अपनी नींव से खिसक गए हैं। मानो उसमें भूकंप आ गया हो। इसे हर पल में घट रही घटनाओं के उदाहरण से समझा जा सकता है।पहले उस दल को देखना उचित ही होगा जो उत्तर प्रदेश में पांच साल से शासन में थ। वह सपा है। यह पार्टी सितंबर, 2016 से राजनीतिक भूकंप</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/156465/68df77f38ac57"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-10/उतरप्रदेश-और-बिहार-में-नींव-से-खिसकते-अनेक-राजनीतिक-दल.png" alt=""></a><br /><div>राजनीतिक दल चुनाव लड़ने के लिए बनाए जाते जाते हैं।  उसका आधार एक विचार होता है। उसके लिए संगठ बनता है। जो लोगों को उस विचार के लिए प्रेरित करता है। यही नियम है। इसे उत्तर प्रदेश के  चुनाव मेंभी  ध्वस्त होते देखा गया  था। हर दल अपनी नींव से खिसक गए हैं। मानो उसमें भूकंप आ गया हो। इसे हर पल में घट रही घटनाओं के उदाहरण से समझा जा सकता है।पहले उस दल को देखना उचित ही होगा जो उत्तर प्रदेश में पांच साल से शासन में थ। वह सपा है। यह पार्टी सितंबर, 2016 से राजनीतिक भूकंप के झटके लगातार झेल रही है। वह झटका जारी है। जिसने पार्टी बनाई वह बेगाने शादी में अब्दुल्ला दीवाना की तरह हो गए हैं। वे मुलायम सिंह थे। जो कब क्या बयान देकर विवाद छेड़ देते, इसे वे भी नहीं जानते थे।समाजवादी ड्रामा तीन महीने तक चला।</div>
<div> </div>
<div>बाप-बेटे के बीच  विवादों की स्क्रिप्ट लिखी गई। लेकिन इतने समय के विरोधाभास के बाद आखिर जीत तो अखिलेश की हुई।कौन माता पिता इस दुनिया मे अपनी संतान से हारते हुए देखना चाहते है। हर अभिभावकों के मन मे एक ही इच्छा रहती है कि मैं भले ही हार जाऊ,लेकिन मेरी संतान हर कदम पर जीत की खुशियां मनाए और अंततः वही हुआ। मुलायम सिंह कोर्ट से हार गए। मान सकते हैं कि वे सदमे बहुत भारी थे। वैसे ही जैसे घर के ढेर हो जाने घर मालिक होता है। सपा के दूसरे कद्दावर नेता शिवपाल बोल पड़े थे कि चुनाव बाद नया दल बनाएंगे। इस तरह की उथल-पुथल ने अखिलेश यादव का मनोबल तोड़ दिया और वे उस कांग्रेस की गोद में जा बैठे।जोकि कांग्रेस का उतरप्रदेश में जनाधार नही था।अगर वो  जिंदा नही हुई और जिंदा हो जाती तो सपा को खा जाती।</div>
<div> </div>
<div>बसपा का हाल उससे भी बुरा था। वह कायदे से राजनीतिक दल बनने के रास्ते पर चली ही नहीं। वह जाति और मजहब के गठजोड़ की उपज है। बीते त 12 सालों से बसपा का घर उजड़ गया है। उसके ज्यादातर नेता भाजपा में जा चुके हैं। उनमें वे भी हैं जो बसपा के जन्मजात नेता रह थे। कुछ सालों पहले की बसपा को आज पहचानना कठिन है। हाथी की चाल मन्द पड़ चली है। मायावती की कोई राजनीतिक हलचल दिखाई नही देती है। कोई भी राजनीतिक दल दो बातों से पहचाना जाता है।</div>
<div> </div>
<div>विचार और नेतृत्व से। बसपा इन दोनों रूपों में भी अपनी पहचान खो चुकी है। वह खुद को खोज रही है। इस भटक़ाव में वह उत्तर प्रदेश में दलित-मुस्लिम गठजोड़ का ताना-बाना बुन रही होगी। ध्रुवीकरण पर उसकी आस टिकी है।योगी आदित्यनाथ के आने के बाद पूर्व पार्टियां सत्ता से बंधी हुई थी।आज के वर्तमान में उनके शासन को याद तक नही करते है।जंगलराज के तमगे से उपजी ये पार्टियां लोगो पर सितम ढाहने में अपना वर्चस्व स्थापित करचुकी थी। इनके शासनकाल में लखनऊ गुंडा और माफियो की शरणस्थली बन चुका था।</div>
<div> </div>
<div>कह सकते हैं कि2017 के पहले उत्तर प्रदेश गहरे राजनीतिक संक्रमण के दौर में  था।चुनाव ने उसे तेज कर दिया है। इसके साफ-साफ दो कारण थे। पहला यह कि विधानसभा का चुनाव पिछले परिणाम से उभरी राजनीति के उस चुनाव में हर दल ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था। भारी जोखिम मोल ले ली थी।दूसरा यह कि चुनाव परिणाम से हर दल बदल जाएगा। लेकिन हर दल में 'परकाया प्रवेश' हो चुका था।</div>
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<div>इर्द-गिर्द नहीं हो रहा था।2014 के लोकसभा चुनाव परिणाम से जो हस्तक्षेप उत्तर प्रदेश की राजनीति में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने किया, वही प्रमुख आधार हो गया था। दूसरा यह कि चुनाव उत्तर प्रदेश की सत्ता कौन संभाले, इसके लिए हो रहा था। पर यह 2019 के लोकसभा चुनाव का प्रहसन भी हो गया। इससे कोई दल बचा नहीं था। भाजपा भी नहीं। जितना असंतोष भाजपा के कार्यकर्ताओं और नेताओं मेंउस समय था  उतना कभी नहीं था।क्योकि भाजपा की 2014 के पहले शुरुआती दौर था। बगावत की आवाज चारों ओर से उठ रही थी। उसे शांत करने के लिए खून पसीना एक किया जा रहा था।</div>
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<div>हर चुनाव में थोड़ा बहुत असंतोष तो होता ही है। उस बार का अकल्पनीय था। इसके कारण बहुत साफ थे।</div>
<div>भाजपा में शामिल होने वालों की संख्या हर रिकार्ड तोड़ चुकी थी। कांग्रेस, सपा और बसपा से आए नेताओं को भाजपा ने अपना उम्मीदवार बनाया था। उनकी संख्या 155 से ज्यादा थी।यानी इतने क्षेत्रों में भाजपा नेता अवसर से वंचित हो गए थे। वे बड़ी उम्मीद में थे। तब भाजपा का उम्मीदवार होना ही चुनाव जीतने की पक्की गारंटी मानी जा रही थी।</div>
<div> </div>
<div> भाजपा में आए हुए समूह मेंकोई गीले शिकवे नही थे। अक्सर चुनाव में परिणाम के बाद भाजपा अपनी समीक्षा में पाती रही है कि टिकट का बंटवारा ठीक नहीं हुआ था। उससे सबक लेकर कोई कदम भाजपा नेतृत्व पहले नहीं उठाता था। तब अमित शाह ने जो उम्मीदवार चयन की प्रणाली अपनाई वह हस्तक्षेप से अछूती रही थी। उन नेताओं की नहीं चली जो टिकट की बंदरबाट के लिए बदनाम हुए। इसमें वे भी कुछ नहीं कर सके जो 'नैतिक सत्ता' का दबाव बनाकर हस्तक्षेप कर लेते थे।</div>
<div> </div>
<div>उतरप्रदेश में कांग्रेस सालों से हासिए पर है। अपने पुनरोदय के लिए हाथ-पांव मार रही थी। राहुल गांधी की खाट यात्रा उसी कड़ी में थी। अगर वही राह कांग्रेस ने ली होती तो वह अपने बलबूते पर चुनाव लड़ती। उसने बिहार के अनुभव से फायदा इसमें ही देखा कि सपा की सहयोगी पार्टी बन जाए। इसी तरह अजीत सिंह का लोकदल कहीं आसरे की खोज में था। उसे सहयोगी बनाने से सपा हिचक गई। क्योंकि अफसरों ने अखिलेश यादव को बताया कि अजीत सिंह के आने से -प्रतिक्रिया में मुसलमान बसपा में चले जाएंगे।</div>
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<div>हर दल की राजनीति पर सरसरी निगाह डालने से कुछ निष्कर्ष निकलते हैं। एक यह है कि इस चुनाव में हर दल ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था। भारी जोखिम मोल ले ली थी। दूसरा यह कि चुनाव परिणाम से हर दल बदल जाएगा। वह नहीं रहेगा जो होता था और है। क्योंकि हर दल में 'परकाया प्रवेश' हो चुका था।</div>
<div> तीसरा यह कि हर दल में पीढ़ी और पद परिवर्तन का दृश्य है। नई पीढ़ी नेतृत्व संभालने वाली रही। चौथा यह कि हर दल की नजर युवा मतदाता पर थी। युवा के नखरे पर राजनीति का कदम ताल तय होने  जा रहा था।बिहार की यही हालत है।</div>
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<div>लालू की राजद कई वर्षों से राजनीतिक गलियारों से बाहर है।नीतीश कुमार के गठबंधन के कारण तेजस्वी कुछ समय के लिए उपमुख्यमंत्री बन गए थे।जेडीयू कई वर्षों से गठबंधन की सरकार चला रही है। बिहार में कई प्रादेशिक दल है जो जशिये पर धकेल दिए गए है।उनका नाम राजनैतिक मंच पर चुनाव के समय ही सुनने को मिलता है। उतरप्रदेश में समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश ने भूल की थी,वही भूल तेजस्वी यादव कांग्रेस को साथ लेकर कर रहे है।बिहार की राजनीति में तीस वर्षों से सत्ता से बाहर कांग्रेस का भविष्य एक सर्वे पर भरोसा करें तो कांग्रेस के पास आज भी बिहार में जनाधार नही  है।नीतीश कुमार में चुनाव से पूर्व 75 लाख महिलाओं के खाते में दस दस हजार ट्रांसफर किये है।उससे और अधिक रकम ऋण के तौर पर देने के लिए मुख्यमंत्री नीतीश ने घोषणा की है।</div>
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<div><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विचारधारा</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 04 Oct 2025 18:20:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sandeep Kumar ]]></dc:creator>
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