<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://www.swatantraprabhat.com/tag/322/sampadkiye" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>Swatantra Prabhat RSS Feed Generator</generator>
                <title>sampadkiye - Swatantra Prabhat</title>
                <link>https://www.swatantraprabhat.com/tag/322/rss</link>
                <description>sampadkiye RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>कैम्पस की आज़ादी बनाम UGC का नया कानून – असली सच क्या है?</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;" align="center">  </p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ.दीपकुमार शुक्ल (स्वतन्त्र टिप्पणीकार)</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वर्तमान समय में भारत के न केवल उच्च शिक्षण संस्थानों बल्कि अन्य संस्थानों में भी शायद ही इस तरह के मामले कहीं देखने या सुनने में आते हों, जहाँ किसी के साथ जाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लिंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जन्म-स्थान और दिव्यांगता के आधार पर भेदभाव किया जाता हो| इसके बावजूद यदि यूजीसी का नया कानून लाना पड़ा तो निश्चित ही</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सरकार</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के पास इस तरह के आंकड़ें होंगे जिनसे यह पता चलता हो कि विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में जाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लिंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जन्म-स्थान और दिव्यांगता के आधार पर भेदभाव की घटनाएँ हो रही हैं।</span></p>...]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/168283/campus-freedom-vs-new-ugc-law-%E2%80%93-what-is-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/deep-shukla-(3).jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;" align="center"> </p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ.दीपकुमार शुक्ल (स्वतन्त्र टिप्पणीकार)</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वर्तमान समय में भारत के न केवल उच्च शिक्षण संस्थानों बल्कि अन्य संस्थानों में भी शायद ही इस तरह के मामले कहीं देखने या सुनने में आते हों, जहाँ किसी के साथ जाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लिंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जन्म-स्थान और दिव्यांगता के आधार पर भेदभाव किया जाता हो| इसके बावजूद यदि यूजीसी का नया कानून लाना पड़ा तो निश्चित ही</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सरकार</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के पास इस तरह के आंकड़ें होंगे जिनसे यह पता चलता हो कि विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में जाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लिंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जन्म-स्थान और दिव्यांगता के आधार पर भेदभाव की घटनाएँ हो रही हैं। यह बिल </span>2012<span lang="hi" xml:lang="hi"> के पुराने दिशा-निर्देशों को प्रतिस्थापित करता है और अब कानूनी रूप से बाध्यकारी है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे </span>UGC Bill 2026<span lang="hi" xml:lang="hi"> कहा जा रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस बिल का मूल उद्देश्य यह बताया जा रहा है कि हर छात्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षक और कर्मचारी को समान अवसर मिले और किसी भी प्रकार का भेदभाव समाप्त हो। इसके लिए कई नयी व्यवस्थाएँ अनिवार्य की गयी हैं। प्रत्येक उच्च शिक्षा संस्थान को समान अवसर केन्द्र स्थापित करना होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो वंचित समूहों के लिए नीतियों और कार्यक्रमों की निगरानी करेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कानूनी सहायता प्रदान करेगा और सामाजिक विविधता को बढ़ावा देगा। इसके साथ ही </span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">इक्विटी </span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कमेटी और </span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">इक्विटी स्क्वॉड</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> का गठन किया जाएगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो परिसर में निरीक्षण करेंगे और भेदभाव की घटनाओं को रोकने के लिए रिपोर्ट देंगे। हर विभाग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुस्तकालय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हॉस्टल और अन्य इकाइयों में </span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">इक्विटी </span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अम्बेसडर</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नियुक्त किये जाएंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो समता के प्रतीक होंगे और शिकायत दर्ज कराने में मदद करेंगे। इसके अलावा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर संस्थान को समता हेल्पलाइन और ऑनलाइन पोर्टल बनाना होगा ताकि छात्र आसानी से अपनी शिकायत दर्ज कर सकें।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस बिल की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह केवल दिशा-निर्देश नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि कानूनन लागू है। इसके उल्लंघन पर कठोर दण्डात्मक कार्रवाई का प्रावधान किया गया है। यदि कोई संस्थान इन नियमों का पालन नहीं करता है तो </span><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वविद्यालय अनुदान आयोग</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">उसकी मान्यता रद्द कर सकता है</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi"> फण्डिंग </span><span lang="hi" xml:lang="hi">रोक सकता है और सार्वजनिक रूप से चेतावनी जारी कर सकता है। दोषी शिक्षक या कर्मचारी पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें नौकरी से निलम्बन या बर्खास्तगी शामिल हो सकती है। गम्भीर मामलों में कानूनी मुकदमा चलाया जाएगा और जेल तक की सज़ा भी दी जा सकती है। छात्रों की सुरक्षा के लिए विशेष प्रावधान किये गये हैं| ताकि शिकायत दर्ज करने वाले छात्र को प्रतिशोध से बचाया जा सके।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दण्डात्मक प्रक्रिया का विस्तृत उल्लेख इस बिल की सबसे बड़ी ताक़त है। पहले के दिशा-निर्देश केवल सलाह मात्र थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनका पालन करना संस्थानों की इच्छा पर निर्भर था। लेकिन अब यह कानूनन लागू है और इसके उल्लंघन पर कठोर कार्रवाई होगी। उदाहरण के लिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि किसी कॉलेज में जाति या धर्म के आधार पर प्रवेश से इनकार किया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह सीधे तौर पर बिल का उल्लंघन होगा और संस्थान पर कार्रवाई होगी। इसी तरह यदि किसी छात्र को दिव्यांगता के कारण सुविधाओं से वंचित किया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो दोषी कर्मचारी या अधिकारी पर अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हालाँकि इस बिल के क्रियान्वयन में कई चुनौतियाँ भी सामने आएंगी। छोटे कॉलेजों के लिए नये केन्द्र और समितियाँ बनाना कठिन होगा, क्योंकि उनके पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। कुछ छात्रों का मानना है कि इससे कैम्पस में और अधिक विभाजन हो सकता है। आलोचकों का कहना है कि बिना व्यापक परामर्श के इतना बड़ा बदलाव लागू करना जल्दबाज़ी है। इन चुनौतियों का समाधान सरकार को वित्तीय और तकनीकी सहायता देकर करना होगा। छात्रों और शिक्षकों को जागरूक करने के लिए कार्यशालाएँ और प्रशिक्षण आयोजित किये जाने चाहिए। </span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">इक्विटी स्क्वॉड</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> को स्वतन्त्र और पारदर्शी तरीके से काम करने देना होगा| ताकि यह केवल औपचारिकता न रह जाए बल्कि वास्तविक सुधार का साधन बने।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जैसी कि अपेक्षा की जा रही है कि इस बिल से उच्च शिक्षा संस्थानों में विविधता और समावेशन को बढ़ावा मिलेगा। विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों के बीच शैक्षणिक संवाद और स्वस्थ अन्तरवैयक्तिक सम्बन्धों का विकास होगा। इससे न केवल शिक्षा का स्तर ऊँचा होगा बल्कि समाज में भी समानता और न्याय की भावना मजबूत होगी। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों के दृष्टिगत इसके विपरीत  परिणाम मिलने की सम्भावना अधिक दिखाई दे रही है|</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">UGC Bill 2026<span lang="hi" xml:lang="hi"> के लागू होने के बाद सोशल मीडिया पर व्यापक बहस शुरू हो गयी है। कुछ लोग इसे शिक्षा संस्थानों पर अतिरिक्त बोझ मानते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि समर्थकों का कहना है कि यह छात्रों और शिक्षकों को सुरक्षित वातावरण देने के लिए आवश्यक है। इस खींचतान में कई भ्रान्तियाँ भी पैदा हो रही हैं। उदाहरण के लिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ लोग मानते हैं कि यह बिल केवल आरक्षण से जुड़ा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि वास्तविकता यह है कि इसका उद्देश्य सभी प्रकार के भेदभाव को समाप्त करना है</span><span lang="hi" xml:lang="hi">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">चाहे वह जाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लिंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जन्म-स्थान या दिव्यांगता के आधार पर हो। समाज का एक वर्ग इस बिल को उच्च वर्ग के साथ भेदभाव करने वाला बता रहा है| जिसके कारण समाज में जातीय वैमनस्य की खाई बढ़नी प्रारम्भ हो गयी है| जो किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है|</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बिल के अनुसार समता समिति का गठन प्रत्येक उच्च शिक्षा संस्थान में अनिवार्य रूप से किया जाएगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका उद्देश्य भेदभाव की शिकायतों की जाँच और समता केन्द्र के कार्यों का प्रबन्धन करना है। इस समिति के अध्यक्ष संस्थान प्रमुख</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span>(<span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे कुलपति या प्राचार्य) होंगे</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और इसमें तीन वरिष्ठ संकाय सदस्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक गैर</span><span dir="rtl" lang="ar-sa" xml:lang="ar-sa">-</span><span dir="rtl" lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षण कर्मचारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दो नागरिक समाज के प्रतिनिधि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दो विशेष आमन्त्रित छात्र प्रतिनिधि तथा समता केन्द्र का समन्वयक सदस्य </span><span dir="rtl" lang="ar-sa" xml:lang="ar-sa">-</span><span dir="rtl" lang="hi" xml:lang="hi">सचिव के रूप में शामिल होगा। समिति में अनुसूचित जाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जनजाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अन्य पिछड़ा वर्ग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्यांगजन और महिलाओं का प्रतिनिधित्व भी होना चाहिए। इसका कार्यकाल दो वर्ष का होगा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और यह वर्ष में कम से कम दो बार बैठक कर भेदभाव से सम्बन्धित मामलों की समीक्षा करेगी| इस समिति को लेकर भी कई तरह के भ्रम फैलाये जा रहे हैं|</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"> <span lang="hi" xml:lang="hi">सभी प्रकार के भ्रम दूर करने के लिए आवश्यक है कि संस्थान और सरकार स्पष्ट रूप से संचार करें। विश्वविद्यालयों को अपने छात्रों और कर्मचारियों को बिल की प्रति के साथ उसकी स्पष्ट व्याख्या करनी चाहिए| ताकि उन्हें पता चल सके कि यह बिल उनके अधिकारों की रक्षा करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि उन्हें सीमित करता है। सोशल मीडिया पर फैली गलत सूचनाओं का मुकाबला करने के लिए आधिकारिक पोर्टल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हेल्पलाइन और जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए। </span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">इक्विटी एम्बेसडर</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> और </span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">इक्विटी स्क्वॉड</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> को भी यह जिम्मेदारी दी जा सकती है कि वे छात्रों को सही जानकारी दें और अफवाहों का खण्डन करें।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके अलावा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मीडिया और प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि दण्डात्मक प्रावधानों को "सज़ा देने का हथियार" नहीं बल्कि "न्याय सुनिश्चित करने का साधन" के रूप में प्रस्तुत किया जाए। जब छात्रों और शिक्षकों को यह समझ आएगा कि यह बिल उनके हितों की रक्षा करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो भ्रम स्वतः दूर होगा। सोशल मीडिया पर चल रही बहस को सकारात्मक दिशा देने के लिए संवाद और पारदर्शिता सबसे बड़ा उपाय है। यदि विश्वविद्यालय नियमित रूप से अपने कदमों की जानकारी साझा करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इक्विटी सेंटर्स</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> छात्रों के साथ खुली चर्चा करें और शिकायत निवारण तन्त्र को पारदर्शी बनाया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो धीरे-धीरे यह खींचतान कम होगी और बिल को लेकर विश्वास बढ़ेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अन्ततः कहा जा सकता है कि </span>UGC Bill 2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">उच्च शिक्षा में समानता और समावेशन सुनिश्चित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। यह न केवल भेदभाव को रोकता है बल्कि इसके उल्लंघन पर कठोर दण्डात्मक कार्रवाई का प्रावधान करता है। इससे छात्रों और शिक्षकों को सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण मिलेगा। हालांकि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके सफल क्रियान्वयन के लिए प्रशासनिक सहयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वित्तीय संसाधन और सामाजिक जागरूकता बेहद ज़रूरी है। साथ ही सोशल मीडिया पर फैली भ्रान्तियों को दूर करने के लिए पारदर्शी संवाद और सही जानकारी का प्रसार आवश्यक है।</span></p>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/168283/campus-freedom-vs-new-ugc-law-%E2%80%93-what-is-the</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/168283/campus-freedom-vs-new-ugc-law-%E2%80%93-what-is-the</guid>
                <pubDate>Thu, 05 Feb 2026 16:48:06 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-02/deep-shukla-%283%29.jpg"                         length="98116"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator>
                        <![CDATA[Swatantra Prabhat]]>
                    </dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ईरान का आर्थिक संकट: रियाल की गिरावट से वैश्विक ऊर्जा संकट और भारत की नयी चुनौती</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[<p>  </p>
<p><strong>डॉ.दीपकुमार शुक्ल(स्वतन्त्र टिप्पणीकार)</strong></p>
<p>ईरान इस समय अपने इतिहास के सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। आर्थिक संकट ने न केवल देश की जनता को झकझोर दिया है बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाज़ार और भारत जैसे बड़े आयातक देशों पर भी गहरा असर डाला है। ईरानी मुद्रा रियाल की रिकॉर्ड गिरावट, महँगाई का चालीस प्रतिशत से ऊपर पहुँचना और विदेशी मुद्रा भण्डार पर दबाव ने ईरान की अर्थव्यवस्था को लगभग पंगु बना दिया है। एक डॉलर के लिए लगभग 1.42 से 1.45 मिलियन रियाल देने पड़ रहे हैं, जो यह दर्शाता है कि देश की मुद्रा किस हद तक कमजोर हो</p>...]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/165490/irans-economic-crisis-due-to-the-fall-of-rial-global"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-01/deep-shukla.jpg" alt=""></a><br /><p> </p>
<p><strong>डॉ.दीपकुमार शुक्ल(स्वतन्त्र टिप्पणीकार)</strong></p>
<p>ईरान इस समय अपने इतिहास के सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। आर्थिक संकट ने न केवल देश की जनता को झकझोर दिया है बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाज़ार और भारत जैसे बड़े आयातक देशों पर भी गहरा असर डाला है। ईरानी मुद्रा रियाल की रिकॉर्ड गिरावट, महँगाई का चालीस प्रतिशत से ऊपर पहुँचना और विदेशी मुद्रा भण्डार पर दबाव ने ईरान की अर्थव्यवस्था को लगभग पंगु बना दिया है। एक डॉलर के लिए लगभग 1.42 से 1.45 मिलियन रियाल देने पड़ रहे हैं, जो यह दर्शाता है कि देश की मुद्रा किस हद तक कमजोर हो चुकी है। इस स्थिति ने आयात क्षमता को बुरी तरह प्रभावित किया है और आम जनता के लिए रोज़मर्रा की ज़रूरतें पूरी करना कठिन हो गया है। अनाप-शनाप कीमतें बढ़ने से खाद्य पदार्थों से लेकर आवश्यक वस्तुओं तक आम नागरिकों की पहुँच से बाहर होते जा रहे हैं। यही कारण है कि जनता सड़कों पर उतर आयी है| विरोध प्रदर्शन अब केवल आर्थिक सुधार की माँग तक सीमित ना रहकर शासन परिवर्तन की माँग तक पहुँच चुके हैं।</p>
<p>दिसम्बर-2025 के अन्त में व्यापारियों की हड़ताल से शुरू हुआ आन्दोलन धीरे-धीरे पूरे देश में फैल गया। तेहरान ग्रैंड बाज़ार और मोबाइल मार्केट्स में दुकानदारों ने कारोबार बन्द कर दिया। विश्वविद्यालयों के छात्र भी इस आन्दोलन में शामिल हो गये और धीरे-धीरे यह असन्तोष राजनीतिक विद्रोह का रूप ले चुका है। प्रदर्शनकारी खुले आम शासन की वैधता पर सवाल उठाते हुए “Death to the oppressor—whether Shah or Supreme Leader” जैसे नारे लगा रहे हैं। जिसका अर्थ है “अत्याचारी का नाश हो- चाहे वह शाह हो या सर्वोच्च नेता”। जनता का मानना है कि मौजूदा नेतृत्व अक्षम हो चुका है। हालात इतने बिगड़े कि मौजूदा केन्द्रीय बैंक गवर्नर को इस्तीफ़ा देना पड़ा और राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन ने नया गवर्नर नियुक्त किया। लेकिन यह बदलाव भी जनता के गुस्से को शान्त नहीं कर पाया| क्योंकि संकट की जड़ें कहीं अधिक गहरी हैं।</p>
<p>लगातार बढ़ती महँगाई, विदेशी मुद्रा भण्डार की कमी और आयात पर अत्यधिक निर्भरता ने रियाल को बुरी तरह कमजोर कर दिया है। दरअसल सितम्बर -2025 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा “स्नैपबैक प्रतिबन्ध” लागू कर देने से तेल और गैस निर्यात पर रोक लग गयी| जिससे ईरान की विदेशी मुद्रा आय घट गयी। मध्य-पूर्व में हालिया संघर्षों ने व्यापार मार्ग और ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित किया, जिससे निवेशकों का भरोसा घटा और पूँजी पलायन बढ़ा। राजनीतिक भ्रष्टाचार और शासन की प्राथमिकताएँ भी इस संकट के लिए जिम्मेदार हैं। सरकार ने घरेलू आर्थिक सुधारों की बजाय “एक्सिस ऑफ रजिस्टेंस” अर्थात क्षेत्रीय सैन्य गठबन्धन को फण्डिंग की  प्राथमिकता दी। इसके बाद घरेलू स्तर पर पानी और ऊर्जा संकट की उत्पादन लागत बढ़ गयी| जिसका सीधा असर उद्योग तथा कृषि पर पड़ा।</p>
<p>ईरान का संकट केवल घरेलू स्तर तक सीमित नहीं है। यह दुनिया के सबसे बड़े तेल और गैस उत्पादक देशों में से एक है। आर्थिक अस्थिरता और राजनीतिक संकट ने इसके निर्यात तन्त्र को कमजोर कर दिया है। अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिबन्धों और घरेलू संकट के कारण ईरान का तेल निर्यात घट रहा है। जिससे वैश्विक बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता बढ़ गयी है। एशियाई देशों, विशेषकर भारत और चीन को वैकल्पिक सप्लाई चैन तलाशनी पड़ रही हैं। ईरान की अस्थिरता से ओपेक देशों पर दबाव बढ़ा है कि वे उत्पादन बढ़ाएँ। इससे अमेरिका और सऊदी अरब जैसे बड़े उत्पादक देशों को बाज़ार स्थिर करने का अवसर मिला है। यूरोप में ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिन्ता बढ़ी है,  खासकर सर्दियों के मौसम में जब ऊर्जा की माँग अधिक होती है। इस संकट ने वैश्विक राजनीति को भी प्रभावित किया है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान में चल रहे विरोध प्रदर्शनों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यदि ईरान शान्तिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर गोलियाँ चलाता है या उन्हें मारता है तो अमेरिका उनकी सहायता के लिए आगे आएगा। यह बयान सीधे तौर पर ईरान के सुप्रीम लीडर को चुनौती माना जा रहा है। हालाकि ईरान ने पलटवार करते हुए ट्रम्प को हद में रहने की चेतवानी दी है| अब सबकी नज़र इस बात पर है कि चीन और रूस जैसे देश ईरान के मौजूदा हालात पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं। रूस ने ईरान के ताजा हालात पर चिन्ता जतायी है, परन्तु भारत ने अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन ने प्रदर्शनकारियों से अपील की है कि उनकी सरकार सभी को धैर्यपूर्वक सुनने को तैयार है और बैंकिंग सिस्टम में सुधार लाने के प्रयास किये जा रहे हैं। लेकिन जनता का गुस्सा इतना गहरा है कि इन बयानों से हालात सुधरते नहीं दिख रहे हैं।</p>
<p>भारत पर इस संकट का सीधा असर पड़ रहा है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है। ईरान का संकट और मध्य-पूर्व की अस्थिरता से कच्चे तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं। भारत मुख्य रूप से इराक, सऊदी अरब और रूस से तेल आयात करता है लेकिन ईरान की अस्थिरता से वैश्विक बाज़ार में कीमतें ऊपर जाएँगी। यदि ईरान “होर्मुज जलडमरूमध्य” को प्रभावित करता है तो 20 से 25 प्रतिशत वैश्विक तेल और एलएनजी सप्लाई बाधित होगी, जिससे भारत की ऊर्जा लागत बढ़ेगी। ईंधन महँगा होने से परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ेगी। खाद्य वस्तुओं और उपभोक्ता सामानों की कीमतें ऊपर जाएँगी। डॉलर की मज़बूती से रुपया कमजोर होगा, जिससे आयात महँगा पड़ेगा। भारत-ईरान व्यापार भी प्रभावित होगा। भारत ईरान से पेट्रोकेमिकल्स और खनिज आयात करता है। ईरान के वर्तमान संकट से यह व्यापार घट सकता है। भारतीय दवाइयाँ और कृषि उत्पाद ईरान में महँगे हो सकते हैं। वैश्विक बाज़ार में अस्थिरता से भारतीय शेयर बाज़ार पर दबाव बढ़ेगा, जैसा कि हाल ही में सेंसेक्स में गिरावट देखी गयी। इस संकट से सोने की कीमतें भी बढ़ेंगी क्योंकि निवेशक सुरक्षित विकल्प चुनते हैं। भारत दुनिया का सबसे बड़ा सोना आयातक है, इसलिए घरेलू बाज़ार में सोना महँगा होगा। यह संकट भारत के लिए जोखिम और अवसर दोनों लेकर आया है। जोखिम यह है कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर दबाव बढ़ेगा, महँगाई और व्यापार घाटा बढ़ सकता है। अवसर यह है कि भारत रूस और सऊदी अरब से आयात बढ़ाकर वैकल्पिक सप्लाई चैन मजबूत कर सकता है। घरेलू नवीकरणीय ऊर्जा निवेश को तेज़ करने का भी यह सही समय है। भारत के पास विविध आयात स्रोत और मज़बूत मैक्रोइकोनॉमिक संकेतक हैं, लेकिन तेल कीमतों और डॉलर की मज़बूती से घरेलू महँगाई बढ़ने की सम्भावना  है। आने वाले महीनों में यह संकट मध्य-पूर्व की स्थिरता और अन्तर्राष्ट्रीय बाज़ारों के लिए गम्भीर चुनौती बन सकता है।</p>
<p>फिलहाल ईरान में हालात सामान्य होते हुए नहीं दिखाई दे रहे हैं। बढ़ती महँगाई ने मिडिल ईस्ट के इस देश के लोगों की चिन्ता बढ़ा दी है। कारोबारी से लेकर छात्र तक आन्दोलन में शामिल हो चुके हैं। धीरे-धीरे यह प्रदर्शन ईरान के आध्यात्मिक शहर कोम तक पहुँच चुका है। कोम ईरान में इस्लाम की राह दिखाने वाला शहर है और शिया मुसलमानों के लिए सबसे पवित्र स्थल माना जाता है। वहाँ तक आन्दोलन का पहुँचना यह दर्शाता है कि जनता का असन्तोष धार्मिक और सांस्कृतिक केन्द्रों तक फैल गया है। विपक्षी मीडिया की रिपोर्टों के मुताबिक तेहरान, इस्फाहन, लोरेस्तान, मज़नदारन, खुजेस्तान, हमदान और फार्स में विरोध प्रदर्शन की आग फैल चुकी है। प्रदर्शनकारियों की भीड़ लगातार ईरान के सुप्रीम लीडर अयातोल्लाह खामनेई के खिलाफ नारेबाज़ी कर रही है।</p>
<p>स्पष्ट है कि ईरान का संकट केवल घरेलू समस्या नहीं है बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा का मुद्दा बन चुका है। यह संकट जहाँ घरेलू स्तर पर जनता की रोज़मर्रा की जिन्दगी को प्रभावित कर रहा है, राजनीतिक अस्थिरता को जन्म दे रहा है और शासन की वैधता पर सवाल खड़े कर रहा है। वहीँ अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर यह संकट ऊर्जा बाज़ार को अस्थिर कर रहा है, वैश्विक महँगाई को बढ़ा रहा है और भारत जैसे देशों की आर्थिक स्थिरता को चुनौती दे रहा है। भारत को इस संकट से निपटने के लिए अपनी ऊर्जा रणनीति को और अधिक मज़बूत करना होगा, वैकल्पिक सप्लाई चैन विकसित करनी होगी तथा नवीकरणीय ऊर्जा निवेश को तेज़ करना होगा।</p>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/165490/irans-economic-crisis-due-to-the-fall-of-rial-global</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/165490/irans-economic-crisis-due-to-the-fall-of-rial-global</guid>
                <pubDate>Wed, 07 Jan 2026 21:31:37 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-01/deep-shukla.jpg"                         length="98116"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator>
                        <![CDATA[Swatantra Prabhat]]>
                    </dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>प्रधानमंत्री मोदी ने भविष्य के अनुरूप शासन के लिए “कर्मचारी” से “कर्मयोगी” तक का खाका तैयार किया</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[<blockquote class="format1"><strong>  डॉ. आर. बालासुब्रमण्यम </strong></blockquote>
<p style="text-align:justify;"><br />  नई दिल्ली: देश लोक प्रशासन में सुधार के अभूतपूर्व प्रयास कर रहा है। अब न केवल अधिकारियों के प्रशिक्षण के तरीके बदल रहे हैं, बल्कि उनकी सेवा के मायनों में भी बदलाव आ रहा है। मिशन कर्मयोगी—लोक सेवा क्षमता निर्माण का राष्ट्रीय कार्यक्रम है और इस बदलाव में इंजन की भूमिका निभा रहा है। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूरदर्शी सोच झलकती है। 25 वर्षों से अधिक समय तक सरकार चलाने और पांच दशकों से अधिक सार्वजनिक जीवन का अनुभव रखने वाले मोदी, व्यवस्थाओं के प्रति एक संचालक जैसी समझ, जड़ आदतों के प्रति एक सुधारक</p>
<p style="text-align:justify;">मिशन</p>...]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/155268/prime-minister-modi-prepared-a-blueprint-from-employee-to-karmayogi"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-09/e2509160627371830_20250916062737_1.jpg" alt=""></a><br /><blockquote class="format1"><strong> डॉ. आर. बालासुब्रमण्यम </strong></blockquote>
<p style="text-align:justify;"><br /> नई दिल्ली: देश लोक प्रशासन में सुधार के अभूतपूर्व प्रयास कर रहा है। अब न केवल अधिकारियों के प्रशिक्षण के तरीके बदल रहे हैं, बल्कि उनकी सेवा के मायनों में भी बदलाव आ रहा है। मिशन कर्मयोगी—लोक सेवा क्षमता निर्माण का राष्ट्रीय कार्यक्रम है और इस बदलाव में इंजन की भूमिका निभा रहा है। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूरदर्शी सोच झलकती है। 25 वर्षों से अधिक समय तक सरकार चलाने और पांच दशकों से अधिक सार्वजनिक जीवन का अनुभव रखने वाले मोदी, व्यवस्थाओं के प्रति एक संचालक जैसी समझ, जड़ आदतों के प्रति एक सुधारक जैसी अधीरता, और ध्रुव तारे की तरह स्पष्ट —नागरिक-प्रथम, विकसित भारत के उद्देश्य को सामने रखते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">मिशन कर्मयोगी की खासियत यह है कि यह केवल दिखावे भर के लिये मानव संसाधन सुधार नहीं है। यह देश की लोक सेवाओं की मूल्य-आधारित परिवर्तनकारी पुनर्रचना है और इसका मुख्य ध्यान प्रदर्शन पर है। यह कार्यक्रम तीन निर्णायक बदलावों को संहिताबद्ध करता है: पहला बदलाव सरकारी अधिकारियों की मानसिकता में बदलाव है, यानी स्वयं को कर्मचारी मानने से लेकर कर्मयोगी मानने तक का सफर है। दूसरा बदलाव कार्यस्थल में बदलाव है, इसमें प्रदर्शन के लिए व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी सौंपने से लेकर प्रणालीगत प्रदर्शन बाधाओं का निदान और उन्हें दूर करने तक का बदलाव शामिल है। तीसरा- बदलाव सार्वजनिक मानव संसाधन प्रबंधन प्रणाली और उससे जुड़ी क्षमता निर्माण प्रणाली को नियम-आधारित से भूमिका-आधारित बनाना है। यह संरचना स्पष्ट रूप से मोदी के इक्कीसवीं सदी के शासन की मांगों के दूरदर्शी ढांचे से उभर कर सामने आयी है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह जीवंत नेतृत्व का परिणाम है। मुख्यमंत्री और फिर प्रधानमंत्री के रूप में, मोदी ने एक समग्र सरकारी संस्कृति को बढ़ावा दिया—अलग-अलग क्षेत्रों में अलगाव को खत्म किया, मंत्रियों के बीच विभिन्न क्षेत्रों में बहस पर बल दिया, और फाइलों को आगे बढ़ाने की बजाय सिस्टम समाधानों को प्राथमिकता दी। यह भावना महामारी के दौरान दिखाई दी, जब सरकार, उद्योग, नागरिक समाज और नागरिक स्वयंसेवकों के सभी स्तरों पर "टीम इंडिया" एक साझेदारी मॉडल के रूप में आगे बढ़ी। यही सहयोगात्मक शक्ति अब जीईएम और गतिशक्ति जैसे सुधारों को संस्थागत रूप दे रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने नेतृत्व की आदतों को संरचनाओं में भी ढाला। जो चिंतन शिविर—आवासीय, पदानुक्रम-समतल विचार-मंथन सत्र—गुजरात में शुरू किए गए थे वे अब केंद्र सरकार की कार्यपुस्तिका का हिस्सा हैं। निरंतर सीखने पर उनका बल व्यक्तिगत है। अपने ज्ञान और कौशल का निरंतर विस्तार करने के अलावा, वे यह भी जांचने के लिए जाने जाते हैं कि क्या प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारी आईजीओटी डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म का उपयोग करते हैं। संस्थागत स्मृति के साथ उनके व्यवहार में बहुत समावेशीता है। पदभार ग्रहण करने के तुरंत बाद, उन्होंने मंत्रियों से दशकों तक एक तरह से व्यवस्था से भली-भांति परिचित अपने सहायकों और अनुभाग अधिकारियों से सीखने का आग्रह किया। व्यवहार में संस्कृति परिवर्तन ऐसा ही दिखाई देता है।</p>
<p style="text-align:justify;">जमीनी स्तर पर, सुधार की रीढ़ उद्देश्यपूर्ण तकनीक है। आईजीओटी -कर्मयोगी प्लेटफ़ॉर्म एक व्यापक, कभी भी और कहीं भी सीखने का ईको सिस्टम है। इसमें 3,000 से ज़्यादा स्व-प्रगति पाठ्यक्रम हैं जो सभी के लिए सुलभ हैं और सीखने को लोकतंत्रात्मक बनाते हैं। यह सीखने को मानव संसाधन कार्यों जैसे योग्यता मानचित्रण, करियर नियोजन और मार्गदर्शन से जोड़ता है—देश को प्रदर्शन पुलिसिंग से सक्षम क्षमता की ओर ले जाता है। यह पहले से ही बड़े पैमाने पर शक्ति प्रदान कर रहा है। लाखों अधिकारियों को नए कानूनी ढांचों के अनुरूप प्रशिक्षित किया गया है; देश भर में लाखों पुलिस, डॉक्टर और अन्य कर्मचारी नागरिक संपर्क को मजबूत कर रहे हैं और सेवाभाव कार्यक्रमों में भाग ले रहे हैं; और बड़ी संख्या में लोग एआई और आईओटी जैसी उभरती तकनीकों में प्रमाणपत्र प्राप्त कर रहे हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि प्रधानमंत्री की "तकनीक-अनुकूल" प्राथमिकता संस्थागत ताकत में परिवर्तित हो चुकी है।</p>
<p style="text-align:justify;">दार्शनिक सार भी उतना ही महत्वपूर्ण है। मिशन कर्मयोगी प्राचीन सभ्यतागत ज्ञान को आधुनिक शासन-कला के साथ जोड़ता है—विकास, गर्व, कर्तव्य और एकता जैसे संकल्पों के साथ-साथ स्वाध्याय, सहकार्यता, राजकर्म और स्वधर्म (नागरिकों पर ध्यान) जैसे व्यक्तिगत गुणों को भी समाहित करता है। यह कोई पुरानी यादें नहीं हैं; यह उच्च तकनीक युग के लिए एक व्यावहारिक नैतिकता है, जो यह सुनिश्चित करती है कि योग्यता चरित्र में समाहित हो।<br />नागरिक-केंद्रितता—जनभागीदारी—दूसरा स्तंभ है। प्रधानमंत्री मोदी बार-बार इस बात पर ज़ोर देते रहे हैं कि प्रत्येक सार्वजनिक निर्णय के केंद्र में नागरिक होने चाहिए। यही उनका शासन मंत्र है। व्यवहार में नागरिक सहभागिता दोतरफा समझौता बन जाती है। नीति और क्रियान्वयन में लोगों की भागीदारी होती है और अधिकारी अंतिम छोर पर खड़े अंतिम नागरिक की सेवा के लिए तैयार होते हैं। मिशन कर्मयोगी इस समझौते के लिए मानसिकता और तरीके विकसित करने का राज्य का साधन है।</p>
<p style="text-align:justify;">आत्मनिर्भरता इसकी पूरक है। यह एकाकीपन नहीं है; यह खुलेपन और वैश्विक प्रतिस्पर्धा से प्रेरित क्षमता और आत्मविश्वास है। यही दृष्टिकोण क्षमता निर्माण के प्रयासों और माईगव जैसे प्लेटफ़ॉर्म के व्यापक प्रसार में भी दिखाई देता है, जो नागरिकों को निष्क्रिय प्राप्तकर्ता नहीं, बल्कि सह-निर्माता बनाता है। यह कथा भारत के सभ्यतागत लोकाचार में निहित है—और संस्थानों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के युग में फलने-फूलने के लिए तैयार करती है।<br />कार्यक्रम की संस्थागत संरचना प्रधानमंत्री मोदी की व्यावहारिकता को दर्शाती है। डिजिटल आधार और बाज़ार को आगे बढ़ाने के लिए एक विशेष प्रयोजन वाहन, कर्मयोगी भारत, समन्वय के लिए एक मंत्रीमंडल सचिवालय इकाई; संरक्षक और मानक-निर्धारक के रूप में क्षमता निर्माण आयोग (सीबीसी); और शीर्ष-स्तरीय संचालन के लिए प्रधानमंत्री ने मानव संसाधन परिषद का नेतृत्व किया । इसकी संरचना सहयोगात्मक, लेखा-परीक्षण योग्य और परिणाम-उन्मुख है—एक ऐसा शासन ढांचा जो "कहीं से भी काम करने" वाले देश के लिए उपयुक्त है।</p>
<p style="text-align:justify;">महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत जो सीखता है उसे संचित नहीं कर रहा है। वसुधैव कुटुम्बकम की भावना के अनुरूप, देश अपने ज्ञान, अनुभव और उपकरणों को साझा करने की तैयारी कर रहा है। इन्हें लोक प्रशासन में एक आदर्श के रूप में विकसित किया जा रहा है। यह वैश्विक दक्षिण के लिए महत्वपूर्ण है, वहां तकनीकी व्यवधानों के बीच देशों को समान क्षमता की कमी का सामना करना पड़ रहा है। मॉरीशस को इस दिशा में पहले ही सहायता की पेशकश की जा चुकी है—यह एक प्रारंभिक संकेत है कि मिशन कर्मयोगी विकासशील लोकतंत्रों में एक अभ्यास समुदाय का निर्माण कर सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">सीधे शब्दों में कहें तो, मिशन कर्मयोगी एक दूरदर्शी विचार को एक व्यवस्था में बदल देता है। यह प्रधानमंत्री मोदी के शासन के लंबे दायरे—उनकी सीमाओं को तोड़ने की सहज प्रवृत्ति, तकनीक के साथ उनका सहज व्यवहार, संस्थागत स्मृति के प्रति उनके सम्मान और उनकी नैतिक शब्दावली—को एक दोहराए जाने योग्य संचालन मॉडल में बदल देता है: भूमिका-आधारित मानव संसाधन; निरंतर, डिजिटल शिक्षा; नागरिक भागीदारी; और सभ्यता पर आधारित नैतिकता इसमें समाहित हैं। इस तरह आप किसी देश को भविष्य के लिए तैयार करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अगर भारत इसी राह पर चलता रहा तो इसका फ़ायदा सिर्फ़ तेज़ गति से आगे बढने वाली काम की फ़ाइलों और व्यवस्थित संगठनात्मक चार्ट में ही नहीं, बल्कि भरोसे में भी दिखेगा। नागरिक एक ऐसी सरकार का अनुभव करेंगे जो सुनती है, सीखती है और काम करती है। यही प्रधानमंत्री मोदी के दांव का मूल है और यही वजह है कि मिशन कर्मयोगी, हाल के दशकों के किसी भी प्रशासनिक सुधार से ज़्यादा, अपने असली रूप में देखा जाना चाहिए। यह लोगों की सेवा करने वाले लोगों में एक पीढ़ीगत निवेश है और इसे एक ऐसे नेता ने तैयार किया है जिसने अपना जीवन लोगों की सेवा में ही लगा दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/155268/prime-minister-modi-prepared-a-blueprint-from-employee-to-karmayogi</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/155268/prime-minister-modi-prepared-a-blueprint-from-employee-to-karmayogi</guid>
                <pubDate>Wed, 17 Sep 2025 11:20:14 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2025-09/e2509160627371830_20250916062737_1.jpg"                         length="236018"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator>
                        <![CDATA[Swatantra Prabhat]]>
                    </dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>गरीबी जात नहीं देखती – आरक्षण का आधार केवल आर्थिक स्थिति हो 78 साल बाद भी जातिगत आरक्षण की प्रासंगिकता पर सवाल</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[<p><strong>लेखक</strong></p>
<p><strong>बृजभूषण तिवारी पत्रकार गोंडा</strong></p>
<p>भारत आज़ादी के 78 वर्ष पूरे कर चुका है। यह वह समय है जब हमें गंभीरता से आत्मचिंतन करना चाहिए कि संविधान निर्माताओं ने आरक्षण की व्यवस्था क्यों दी थी और आज यह किस दिशा में जा रही है। डॉ. भीमराव अंबेडकर सहित संविधान सभा के महान विचारकों ने आरक्षण को एक सामाजिक न्याय और समान अवसर का साधन माना था। उद्देश्य था— सदियों से शोषित, वंचित और हाशिए पर पड़े समाज को मुख्यधारा से जोड़ना, ताकि वे शिक्षा और रोजगार में बराबरी से भाग ले सकें।लेकिन आज सवाल यह है कि क्या आरक्षण अपने</p>...]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/154271/poverty-does-not-see-the-caste-the-basis-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-08/1005712270.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>लेखक</strong></p>
<p><strong>बृजभूषण तिवारी पत्रकार गोंडा</strong></p>
<p>भारत आज़ादी के 78 वर्ष पूरे कर चुका है। यह वह समय है जब हमें गंभीरता से आत्मचिंतन करना चाहिए कि संविधान निर्माताओं ने आरक्षण की व्यवस्था क्यों दी थी और आज यह किस दिशा में जा रही है। डॉ. भीमराव अंबेडकर सहित संविधान सभा के महान विचारकों ने आरक्षण को एक सामाजिक न्याय और समान अवसर का साधन माना था। उद्देश्य था— सदियों से शोषित, वंचित और हाशिए पर पड़े समाज को मुख्यधारा से जोड़ना, ताकि वे शिक्षा और रोजगार में बराबरी से भाग ले सकें।लेकिन आज सवाल यह है कि क्या आरक्षण अपने मूल उद्देश्य में सफल हुआ है? क्या अब भी वही वर्ग, वही परिवार, और वही लोग बार-बार इसका लाभ उठा रहे हैं, जबकि वास्तविक जरूरतमंद आज भी वंचित हैं?</p>
<h4><strong>गरीबी जात देखकर नहीं आती</strong></h4>
<p>गरीबी न किसी धर्म को देखती है, न किसी जात को। यह हर वर्ग में मौजूद है। आज भी उच्च जातियों के लाखों परिवार बेहद दयनीय स्थिति में जी रहे हैं। दूसरी तरफ, कुछ जातियों के विशेष वर्ग ऐसे भी हैं, जिनकी आर्थिक स्थिति आरक्षण का लाभ पाकर पहले ही मजबूत हो चुकी है, लेकिन फिर भी वे लगातार इसी व्यवस्था के संरक्षण में फल-फूल रहे हैं।यह स्थिति आरक्षण के मूल उद्देश्य पर सवाल खड़ा करती है। यदि लक्ष्य गरीब और पिछड़े को उठाना था, तो फिर मापदंड जाति क्यों, आर्थिक स्थिति क्यों नहीं?</p>
<h4><br /><strong>शिक्षा पर हो फोकस, नौकरी पर नहीं</strong></h4>
<p>आरक्षण का सबसे बड़ा लाभ शिक्षा क्षेत्र में होना चाहिए। जब गरीब बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, किताबें, छात्रवृत्ति, कोचिंग और तकनीकी साधन मिलेंगे तभी वह अपनी प्रतिभा के बल पर आगे बढ़ सकेगा।लेकिन हकीकत यह है कि आरक्षण का अधिकतम उपयोग सरकारी नौकरियों में किया जा रहा है। इससे योग्यता और प्रतिस्पर्धा पर आघात होता है।यदि आरक्षण शिक्षा तक सीमित हो और नौकरी पूरी तरह से योग्यता के आधार पर दी जाए, तो न केवल व्यवस्था पारदर्शी बनेगी बल्कि समाज का हर वर्ग सक्षम भी होगा।</p>
<h4><br /><strong>एक बार लाभ, तो अगली पीढ़ी बाहर</strong></h4>
<p>आरक्षण को स्थायी सुविधा नहीं बनाया जाना चाहिए। यदि किसी परिवार ने आरक्षण के माध्यम से नौकरी, पद अथवा आर्थिक लाभ पा लिया है और उसकी स्थिति सुधर गई है, तो उस परिवार की अगली पीढ़ी को आरक्षण की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।<br />आरक्षण का लाभ बार-बार एक ही परिवार तक सीमित रहने से वही वर्ग और सशक्त होता है, जबकि असली गरीब और जरूरतमंद पिछड़ जाते हैं।यदि यह प्रावधान लागू हो कि— “एक बार आरक्षण का लाभ, तो अगली पीढ़ी बाहर” —तो आरक्षण का फायदा लगातार नए वंचित परिवारों तक पहुँचेगा। यही सामाजिक न्याय की असली भावना होगी।</p>
<h4><br /><strong>समान अवसर ही सच्चा न्याय</strong></h4>
<p>लोकतंत्र का सार यही है कि हर नागरिक को बराबरी का अवसर मिले। जातिगत आरक्षण से समाज में विभाजन की खाई और गहरी होती है। एक वर्ग को लगता है कि उसे केवल जाति की वजह से अवसर से वंचित किया जा रहा है,</p>
<p>जबकि दूसरे वर्ग को बिना योग्यता भी अवसर मिल रहे हैं।इससे असंतोष बढ़ता है और सामाजिक एकता कमजोर होती है।आर्थिक आधार पर आरक्षण ही वह रास्ता है जो गरीब को जाति की परिभाषा से ऊपर उठाकर बराबरी का हक दिला सकता है।</p>
<h4><strong>आज़ादी के 78 साल और अभी भी वही सवाल</strong></h4>
<p>भारत आज स्वतंत्रता के 78 वर्ष पूरे कर चुका है। इतने लंबे समय बाद भी यदि वही समाज, वही जातियाँ और वही परिवार अब भी आरक्षण की बैसाखियों पर खड़े हैं, तो यह आरक्षण की सफलता नहीं बल्कि उसकी असफलता है।</p>
<p><br />संविधान सभा ने आरक्षण को स्थायी व्यवस्था नहीं, बल्कि अस्थायी उपाय के रूप में सोचा था। परंतु आज यह स्थायी राजनीतिक हथियार बन गया है। हर चुनाव में जातिगत आरक्षण को मुद्दा बनाया जाता है और वोट बैंक की राजनीति हावी रहती है।अब यह गंभीर सवाल है कि— “क्या आरक्षण ने वास्तव में समाज को बराबरी पर खड़ा किया है, या केवल कुछ वर्गों और परिवारों को सशक्त बनाने का साधन बन गया है?”</p>
<h4><br /><strong>राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत</strong></h4>
<p>सभी जानते हैं कि जातिगत आरक्षण वोट बैंक की राजनीति का सबसे बड़ा हथियार है। यही कारण है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण की चर्चा होते हुए भी यह नीति पूरी तरह लागू नहीं हो पाई।<br />यदि भारत को वास्तव में विकसित राष्ट्र की ओर ले जाना है, तो राजनीतिक दलों को जातिगत सोच से ऊपर उठना होगा। आरक्षण को शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वरोज़गार तक सीमित करके केवल आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों तक पहुँचाना ही सही दिशा होगी।</p>
<blockquote class="format1">
<p><strong>समाधान क्या हो?</strong></p>
<p>1. आरक्षण का आधार केवल आर्थिक स्थिति बने।</p>
<p><br />2. आरक्षण शिक्षा और अवसरों तक सीमित हो, नौकरी में नहीं।</p>
<p><br />3. एक बार लाभ पाने वाले परिवार की अगली पीढ़ी को बाहर किया जाए।</p>
<p><br />4. गरीब विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और संसाधन उपलब्ध कराए जाएँ।</p>
<p><br />5. राजनीति में आरक्षण का दुरुपयोग बंद हो।</p>
</blockquote>
<p style="text-align:justify;"><br />गरीबी जाति-धर्म की मोहताज नहीं। वह हर घर में दस्तक देती है। अब समय है कि आरक्षण की परिभाषा बदली जाए। इसे जातिगत ढाँचे से बाहर निकालकर आर्थिक आधार पर, शिक्षा और अवसरों तक सीमित किया जाए।एक बार लाभ पा चुके परिवार को इसका हकदार न मानकर नए-नए वंचित परिवारों तक आरक्षण पहुँचाया जाए। तभी यह व्यवस्था अपने असली उद्देश्य को पूरा करेगी और भारत वास्तव में सामाजिक समानता की ओर बढ़ेगा।<br />आरक्षण राजनीति का हथियार नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का साधन बने—यही आज़ादी के 78 वर्षों बाद इस लोकतंत्र की असली आवश्यकता है।</p>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/154271/poverty-does-not-see-the-caste-the-basis-of</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/154271/poverty-does-not-see-the-caste-the-basis-of</guid>
                <pubDate>Sun, 31 Aug 2025 21:48:49 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2025-08/1005712270.jpg"                         length="236197"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator>
                        <![CDATA[Swatantra Prabhat Media]]>
                    </dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कथावाचकों के लिए भी  बने एक मानक</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;" align="center">  </p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ.दीपकुमार शुक्ल (स्वतन्त्र टिप्पणीकार)</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इटावा की घटना के बाद कथावाचकों को लेकर पूरे देश में बहस छिड़ी हुई है| यद्यपि भारतीय संस्कृति में कथावाचक जैसा कोई पद सृजित नहीं है| परन्तु बदले  परिवेश में यह शब्द धार्मिक अनुष्ठान का एक अंग जैसा बन गया है| प्राचीन गुरुकुलों में विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करने वाले गुरुजनों को आचार्य और उपाध्याय कहा जाता था| मनुस्मृति के दूसरे अध्याय के श्लोक संख्या 140 के अनुसार जो ब्राह्मण अपने शिष्य का यज्ञोपवीत कर उसे यज्ञ-विद्या और उपनिषद युक्त वेद पढ़ाता है, उसे आचार्य कहते है| श्लोक संख्या 141 के अनुसार जो ब्राह्मण वेद के</span></p>...]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/152923/a-standard-made-for-storytellers-also"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-07/deep-shukla.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;" align="center"> </p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ.दीपकुमार शुक्ल (स्वतन्त्र टिप्पणीकार)</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इटावा की घटना के बाद कथावाचकों को लेकर पूरे देश में बहस छिड़ी हुई है| यद्यपि भारतीय संस्कृति में कथावाचक जैसा कोई पद सृजित नहीं है| परन्तु बदले  परिवेश में यह शब्द धार्मिक अनुष्ठान का एक अंग जैसा बन गया है| प्राचीन गुरुकुलों में विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करने वाले गुरुजनों को आचार्य और उपाध्याय कहा जाता था| मनुस्मृति के दूसरे अध्याय के श्लोक संख्या 140 के अनुसार जो ब्राह्मण अपने शिष्य का यज्ञोपवीत कर उसे यज्ञ-विद्या और उपनिषद युक्त वेद पढ़ाता है, उसे आचार्य कहते है| श्लोक संख्या 141 के अनुसार जो ब्राह्मण वेद के एक भाग अथवा वेदांगों को जीविका के लिए पढ़ाता है, वह उपाध्याय कहलाता है| आचार्य का पद उपाध्याय से दस गुना अधिक बड़ा बताया गया है| क्योंकि आचार्य की सेवाएँ निःस्वार्थ होती थीं| एक समय इन्हीं गुरुजनों के माध्यम से गुरुकुल के विद्यार्थी वेद, वेदान्त, वेदांग तथा स्मृतियों आदि का ज्ञान प्राप्त करते थे| कालान्तर में वेद व्यास ने जब पुराणों की रचना की तब ये पुराण भी गुरुकुलों के पाठ्यक्रमों में क्रमशः शामिल किये गये| जिनमें वर्णित महापुरुषों की कथाएं विद्यार्थियों के ज्ञानार्जन तथा मार्गदर्शन का महत्वपूर्ण माध्यम बनीं| इन पुराणों को गुरुकुलों तक पहुँचाने के मुख्य सूत्रधार व्यास जी के शिष्य लोमहर्षण सूत जी थे| सूत जी ऋषियों को पुराण सुनाते और ऋषिगण अपने शिष्यों को|</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यद्यपि माता-पिता और गुरुओं द्वारा बच्चों को पुरानी कथाएं सुनाने की परम्परा तो अति प्राचीन है| इसके अलावा लोकगीतों में भी प्रायः प्राचीन कथाएं ही सुनाई जाती रही हैं| लोक गायक प्राचीन कथाएं सुनाकर समाज के समृद्ध वर्ग का मनोरंजन करके इनाम इकराम पाते रहे हैं| डिजिटल मीडिया के बढ़ते प्रभाव से इनकी संख्या धीरे धीरे कम हो रही है| वर्ना गाँव गली में महफ़िल जोड़कर लोकगीतों के माध्यम से पुरानी कथाएं सुनाना आम बात थी| इन लोकगीतों में संस्कार गीत, गाथा गीत, पर्व गीत, पेशा गीत तथा जातीय गीत शामिल हैं| गाथा गीत में मुख्यतः कथा या वृतान्त सुनाया जाता है| प्रचलित लोकगीतों में मुख्य रूप से सोहर, कहरवा, चनैनी, नौका, झक्कड़, बंजारा, कजरी, जरेवा, सदावजरा सारंगा, बिहू, ददरिया, बाउल, आल्हा और बिरहा आदि हैं| बिरहा में जहाँ श्रीकृष्ण और गोपियों का विरह वर्णन है वहीं आल्हा महोबा के वीर आल्हा ऊदल का गाथा गीत है| ऐसे ही लगभग सभी लोकगीत किसी न किसी प्राचीन कथानक की पृष्ठभूमि से जुड़े हुए हैं| लोकगीतों की प्रस्तुती के लिए किसी बड़े साधन की आवश्यकता नहीं होती है| प्राचीन समय में लोकगीत गाने वाले प्रायः निम्न जाति के लोग होते थे| जो पीढ़ी दर पीढ़ी लोकगायन के माध्यम से पुरानी कहानियां सुनाकर जीवकोपार्जन करते रहे हैं| अतः आज यदि उन लोकगायकों की सन्ताने कथा सुनाने के अपने अधिकार का दावा करते हैं तो इसे सीधे तौर पर नकारा नहीं जा सकता|</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वहीँ दूसरी ओर पाश्चात्य संस्कृति के बढ़ते प्रभाव से जब गुरुकुलों का अस्तित्व संकट में पड़ने लगा| तब इनके आचार्यों ने समाज को प्राचीन संस्कृति से जोड़े रखने के उद्देश्य से लोगों को संकल्प दिलाकर अनुष्ठानपूर्वक साप्ताह, पक्ष एवं मासिक रूप से पुराणों की कथाएं सुनानी प्रारम्भ कर दीं| बदले में दक्षिणा स्वरुप श्रोताओं से मिला धन आचार्यगणों की उदरपूर्ति में सहायक बना| इससे जहाँ समाज को संस्कृति से जोड़ने की एक नवीन प्रक्रिया शुरू हुई| वहीँ आचार्यों की जीविका भी ससम्मान चलने लगी| कथा सुनाने वाले को व्यास तथा वह जिस आसन पर बैठकर कथा सुनाते उसे व्यास-पीठ की संज्ञा दी गयी| जिन कथाओं को  आचार्यगण व्यास पीठ पर बैठकर सुनाते, लगभग वही कथाएं लोकगायक अपने लोकगीतों के माध्यम से सुनाया करते| व्यासपीठ पर बैठे वक्ता पुराणों की व्याख्या प्रस्तुत करते हुए जन मानस को प्राचीन कथाओं के साथ-साथ साहित्य का भी बोध करवाते थे| जबकि लोकगायक परम्परा से प्राप्त लोकगीतों को बिना किसी साधन के प्रस्तुत करते|</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थ युग के बढ़ते प्रभाव से कथावाचकों की शैली और उद्देश्य बदलने लगे| आज पुराणों की व्याख्या कम, गीत गायन तथा नृत्य, कथा के महत्वपूर्ण अंग बन गये हैं| जो काम कभी लोकगायक करते थे, कालान्तर में वही काम अपने ज्ञान की कमी को छुपाने के लिए व्यास पीठ पर आसीन तथाकथित कथावाचक करने लगे| इसका प्रभाव यह हुआ कि लोकगायक भी धीरे धीरे व्यास गद्दी पर आसीन होकर अपनी शैली में कथा सुनाने लगे| अब तो कथा पाण्डालों में कथा कम होती है, परन्तु भजन के नाम पर आधुनिक वाद्य यंत्रों के साथ फ़िल्मी पैरोडी खूब गूंजती हैं| जिन पर श्रोताओं को थिरकते हुए कभी भी देखा जा सकता है| पूछने पर उत्तर मिलता है कि पण्डित जी भजन गा रहे हैं और भक्तगण भक्ति रस में डूबकर नृत्य कर रहे हैं| वर्तमान में यही भक्ति की नई परिभाषा है| पुराणों की कथाओं के माध्यम से नई पीढ़ी को संस्कृति से जोड़कर सदाचारी बनाने का उद्देश्य तो न जाने कहाँ और कब छूट गया| व्याकरण के धरातल से पुराणों की व्याख्या करके नई पीढ़ी में संस्कृति और संस्कारों का बीजारोपण करने वाले आचार्य तो अब बिरले ही हैं| शेष तो मात्र गायक हैं| अब तो आडम्बर और भौड़ापन भी खूब दिखाई देता है| मनमानी शैली और मनमुखी व्याख्या प्रस्तुत करके समाज को दिग्भ्रमित करना ही एकमात्र उद्देश्य समझ में आता है| जिसके कारण अन्ध विश्वास भी निरन्तर अपने पैर पसार रहा है|</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पुराणों की कथाएं सुनाने के जो नियम और विधान पूर्वजों ने बनाये हैं, उन्हें भी सर्वथा ताक पर इस कुतर्क के साथ रख दिया जाता है कि भगवान की भक्ति में कोई नियम नहीं लगता, केवल भाव चाहिए| गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित श्रीमद्भागवत महापुराण में पृष्ठ संख्या 10 से 31 तक श्रीमद्भागवत का महात्म्य, महिमा, कथावाचक की योग्यता, पूजन विधि, मुहूर्त विचार आदि के बारे में विस्तार से बताया गया है| ‘मुहूर्त विचार’ शीर्षक में स्पष्ट रूप से लिखा है कि गुरु और शुक्र ग्रह के अस्त होने पर श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन नहीं होना चाहिए| लेकिन विडम्बना देखिये कि 12 जून 2025 से 9 जुलाई 2025 तक गुरु अस्त है| फिर भी श्रीमद्भागवत कथाओं के अनगिनत आयोजन हो रहे हैं| इटावा काण्ड से सम्बन्धित श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह का आयोजन 21 जून से अर्थात गुरु अस्त में प्रारम्भ हुआ था| यहाँ यह भी नहीं कह सकते कि इन तथाकथित कथावाचकों को इसका ज्ञान नहीं है| क्योंकि जो पुराण वे सुना रहे हैं, उसी में स्पष्ट रूप से सब लिखा हुआ है l</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> तब फिर इसका दूसरा पक्ष यही हो सकता है कि धन के लोभ में मर्यादा और विधान को जान बूझ कर नजर अन्दाज किया जाता है| क्योंकि इस बारे में कोई किसी से सवाल करने वाला नहीं है| कमाई का बढ़िया जरिया देख अनेक युवक युवतियां बिना कोई विशेष शिक्षा प्राप्त किये कथावाचक बन रहे हैं| साथ ही समाज को भ्रमित करने के लिए अपने नाम के साथ शास्त्री जोड़ लेते हैं| जबकि संस्कृत महाविद्यालय से स्नातक स्तर तक शिक्षा प्राप्त करने वाले को ही शास्त्री तथा परास्नातक स्तर तक शिक्षा प्राप्त करने वाले को आचार्य की उपाधि सम्बन्धित विश्वविद्यालय द्वारा प्रदान की जाती है| कथावाचकों के रूप में अल्प शिक्षितों की बढ़ती फ़ौज संस्कृति और संस्कारों का सत्यानाश करके अन्धविश्वास की प्रतिष्ठा करने में लगी हुई है| इस पर नियन्त्रण लगना ही चाहिए| इसके लिए आवश्यक है कि कथावाचकों के लिए एक मानक बने| जो लोग इस क्षेत्र में आना चाहते हैं उनके लिए प्रशिक्षण की अनिवार्यता हो| प्रशिक्षण के बाद उनकी परीक्षा हो| परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले को ही प्रमाण पत्र प्रदान करके कथावाचक की उपाधि देने की व्यवस्था बने| इस हेतु चारो शंकराचार्यों को सरकार के साथ बैठकर विचार करना चाहिए| संविधान के अनुच्छेद 26 में सभी धार्मिक सम्प्रदायों को अपने धार्मिक मामलों का प्रबन्धन करने, धार्मिक संस्थानों की स्थापना करने, रखरखाव तथा प्रशासन का अधिकार दिया गया है| भारतीय संस्कृति को संविधान ने हिन्दू नामक धार्मिक सम्प्रदाय माना है| जिसके सर्वोच्च गुरु चारो शंकराचार्य हैं| अतः चारो शंकराचार्यों को इस दिशा में गम्भीरतापूर्वक विचार करते हुए अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग करके कथावाचकों के लिए एक मानक निश्चित करने का निर्णय लेना चाहिए|   </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"> </p>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/152923/a-standard-made-for-storytellers-also</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/152923/a-standard-made-for-storytellers-also</guid>
                <pubDate>Thu, 03 Jul 2025 17:53:16 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2025-07/deep-shukla.jpg"                         length="429662"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator>
                        <![CDATA[Swatantra Prabhat Media]]>
                    </dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>रेखा सरकार के 100 दिन: उम्मीदों और चुनौतियों का सम्मिश्रण</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[<p style="text-align:justify;">हर्षवर्धन पान्डे<br />  <br />20 फरवरी 2025 को रेखा गुप्ता ने दिल्ली की चौथी महिला मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की। भारतीय जनता पार्टी की जीत के बाद 27 साल बाद दिल्ली में सत्ता परिवर्तन हुआ और रेखा गुप्ता को इस ऐतिहासिक जिम्मेदारी का नेतृत्व करने का मौका मिला।रेखा गुप्ता शालीमार बाग से पहली बार विधायक चुनी गई। हरियाणा के जींद में जन्मी और दिल्ली में पली-बढ़ीं रेखा गुप्ता का राजनीतिक सफर दिल्लीविश्वविद्यालय के छात्रसंघ की अध्यक्ष से शुरू हुआ।</p>
<p style="text-align:justify;">वह तीन बार दिल्ली नगर निगम की पार्षद और बीजेपी महिला मोर्चा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रह चुकी हैं। उनकी नियुक्ति को</p>...]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/152334/commonage-of-rekha-sarkars-100-days-of-expectations-and-challenges"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-06/harshvardhan_pande.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हर्षवर्धन पान्डे<br /> <br />20 फरवरी 2025 को रेखा गुप्ता ने दिल्ली की चौथी महिला मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की। भारतीय जनता पार्टी की जीत के बाद 27 साल बाद दिल्ली में सत्ता परिवर्तन हुआ और रेखा गुप्ता को इस ऐतिहासिक जिम्मेदारी का नेतृत्व करने का मौका मिला।रेखा गुप्ता शालीमार बाग से पहली बार विधायक चुनी गई। हरियाणा के जींद में जन्मी और दिल्ली में पली-बढ़ीं रेखा गुप्ता का राजनीतिक सफर दिल्लीविश्वविद्यालय के छात्रसंघ की अध्यक्ष से शुरू हुआ।</p>
<p style="text-align:justify;">वह तीन बार दिल्ली नगर निगम की पार्षद और बीजेपी महिला मोर्चा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रह चुकी हैं। उनकी नियुक्ति को भाजपा की महिला सशक्तिकरण की परिकल्पना को साधने की रणनीति के रूप में देखा गया। उन्होनें 100 दिन के कार्यकाल में  अपनी सधी हुई शुरुआत से इसे साबित करके दिखाया है। न केवल दिल्ली की राजनीती में उन्होनें खुद को बेहतर ढंग से स्थापित करने की कोशिश की है बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी अपने कार्यों से  खुद को अग्रिम पंक्ति में खड़ी सीएम  के तौर पर प्रस्तुत  किया है।<br /> <br />20 फरवरी 2025 को रेखा गुप्ता ने दिल्ली की मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली जिसके बाद उनकी सरकार ने 30 मई 2025 को अपने 100 दिन पूरे किए। इस अवधि में भाजपा की नेतृत्व वाली सरकार ने दिल्ली को "विकसित, स्वच्छ और सुरक्षित" बनाने के वादे के साथ कई पहल शुरू की। सरकार ने अपनी पहली कैबिनेट बैठक में दिल्ली में आयुष्मान भारत योजना को लागू करने की मंजूरी दी। यह योजना दिल्लीवासियों को मुफ्त इलाज की सुविधा प्रदान करती है जिससे स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बढ़ी है। रेखा गुप्ता सरकार ने केंद्र की महत्वाकांक्षी आयुष्मान भारत योजना को दिल्ली में लागू किया जिसे पिछली आम आदमी पार्टी सरकार ने रोके रखा था।</p>
<p style="text-align:justify;">इस योजना के तहत 5 लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा प्रदान किया जा रहा है, साथ ही राज्य सरकार द्वारा अतिरिक्त 5 लाख रुपये का टॉप-अप दिया जा रहा है। इसी प्रकार 'वयोवंदना योजना' के अंतर्गत 70 वर्ष से अधिक आयु के 6 लाख बुजुर्गों को 10 लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा सुनिश्चित किया गया। यह कदम बुजुर्गों के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं को सुलभ बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। 100 दिन में दिल्ली की सेहत सुधारने के लिए 100 दिन की सेवा में 12826 करोड रुपए का बजट दिया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">1139 आयुष्मान आरोग्य मंदिरों के निर्माण की योजना शुरू की गई। सभी सरकारी अस्पतालों में जन औषधि केंद्र बनाने का फैसला लिया गया। दिल्ली के सरकारी स्कूलों में बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने, शिक्षकों की प्रशिक्षण प्रणाली को अपडेट करने और विद्यार्थियों के लिए अधिक संसाधन उपलब्ध कराने का वादा किया गया है। इसके साथ ही दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं का सुधार और दवाइयों की उपलब्धता सुनिश्चित करने पर भी ज़ोर दिया गया है।<br /><br />रेखा गुप्ता ने सरकार की कमान संभालते  ही यमुना नदी की सफाई को प्राथमिकता दी। रेखा गुप्ता ने भलस्वा लैंडफिल साइट का दौरा कर वहाँ वृक्षारोपण और सफाई की शुरुआत की। यमुना के वसुदेव घाट पर उन्होंने कैबिनेट के साथ आरती की और नदी की सफाई को अपनी सरकार की प्रमुख प्राथमिकता घोषित किया। यह कदम पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित करता है।सरकार ने यमुना नदी को पुनर्जनन और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार के साथ एक एमओयू भी साइन किया जिसमें  वजीराबाद बैराज से जगतपुर तक फेरी और क्रूज सेवाएं शुरू करने की योजना बनाई गई।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी के साथ 27 नए विकेंद्रीकृत सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स को मंजूरी दी गई और एक समग्र 'अर्बन रिवर मैनेजमेंट प्लान' तैयार किया गया। यह दीर्घकालिक परियोजना है जिसके ठोस परिणाम अभी सामने नहीं आ पाए हैं। यमुना नदी की सफाई और सिंगल-यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध जैसे कदम भी उनकी प्राथमिकताओं में हैं। हालांकि इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए दीर्घकालिक योजना और संसाधनों की आवश्यकता होगी। </p>
<p style="text-align:justify;">रेखा गुप्ता ने मॉनसून से पहले दिल्ली के प्रमुख नालों का निरीक्षण किया और अधिकारियों को सफाई के स्पष्ट निर्देश दिए। उन्होंने बाहरी रिंग रोड को गड्ढा-मुक्त करने का लक्ष्य भी रखा जो दिल्ली की बुनियादी ढांचे की समस्याओं को हल करने की दिशा में एक प्रयास है। यमुना की सफाई और प्रदूषण नियंत्रण में प्रगति धीमी  है और दिल्ली अभी भी सबसे प्रदूषित राजधानियों में अग्रणी है।  सड़कों की स्थिति सुधारने, ट्रैफिक जाम को कम करने और सार्वजनिक परिवहन की सुविधा बढ़ाने के लिए नए प्रयास किए जा रहे हैं।<br /><br />दिल्ली में जलभराव की समस्या से निपटने के लिए सरकार ने मुंबई से अत्याधुनिक मशीनें मंगवाकर सीवर और नालों की सफाई शुरू की जिससे मिंटो ब्रिज जैसे क्षेत्रों में सुधार हुआ और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की गई। शालीमार बाग में आयुर्वेदिक झुग्गी में सीवेज प्लांट की समस्या हल हुई वहीँ हैदरपुर गांव में नई नाली बनाई गई और मैक्स अस्पताल के पास खुले नाले को 34 लाख रुपये की लागत से ढका गया। ये कदम जल निकासी और स्वच्छता में सुधार ला रहे हैं लेकिन पूरी दिल्ली की तस्वीर बदलने में अभी लम्बा समय लगेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">मई 2025 में दिल्ली में  एयर क्वालिटी इंडेक्स 500 तक पहुंच गया, जो मई के महीने में अभूतपूर्व था। प्रदूषण  के निवारण के लिए अभी दिल्ली को किसी दीर्घकालिक योजना की दरकार है। 100 दिवस के कार्यकाल में 16 लाख मीट्रिक टन गाद यमुना से हटाई गई और 804 करोड़ की लागत से आठ अमृत परियोजनाओं को मंजूरी सरकार के द्वारा दी गई। यमुना की सफाई के लिए 40 एसटीपी मंजूर किये गए। 1167 जीपीएस टैंकर चलकर दिल्ली के टैंकर माफिया के खिलाफ बड़ा प्रहार किया गया। दिल्ली में आम जान से सुझाव मांगे  और 1 लाख  करोड़ का ऐतिहासिक बजट सरकार द्वारा पेश किया गया।<br /> <br />मुफ्त बिजली योजना के तहत सरकार ने 30  हजार तक अतिरिक्त सब्सिडी देने का फैसला किया है। आगामी तीन वर्षों में 2. 3 लाख घरों को  सोलर ऊर्जा से रोशन करने  का संकल्प लिया है। शिक्षा के क्षेत्र में सुधार की दिशा में सरकार ने 75 सीएम श्री स्कूल शुरू करने का फैसला लिया है। इसके साथ ही 1 लाख 63 हजार बच्चों को फ्री नीट और जेईई की कोचिंग की सुविधा सरकार  द्वार दी गई। सरकार का वर्तमान में फोकस स्कूलों और नगर निगम के पुस्तकालयों को डिजिटल करने का है।</p>
<p style="text-align:justify;">सार्वजनिक परिवहन को दुरुस्त करने के लिए सरकार ने 460 इलेक्ट्रानिक बसें चलाई। इस साल के अंत तक शहर में 4,000 से अधिक इलेक्ट्रिक बसें चलाई जाएंगी। मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि झुग्गियों को तोड़ा नहीं जाएगा, बल्कि वहां पेयजल, सीवर पाइपलाइन और शौचालय जैसी सुविधाएं दी जाएंगी।यह नीति झुग्गीवासियों के लिए राहत लेकर आई जो पहले वोट बैंक के रूप में देखे जाते थे और तोड़े जाने के डर से जूझते थे।  एक समावेशी कदम है, जो गरीबों के जीवन स्तर को बेहतर कर सकता है लेकिन संसाधन आवंटन और कार्यान्वयन की चुनौती बनी हुई है। अभी भी दिल्ली गैस चैंबर बानी हुई है और जाम की समस्या से हर घंटे  जूझ रही है।<br />  <br />ओखला लैंडफिल साइट पर 60 मीटर ऊंचे कचरे के पहाड़ को बायो-माइनिंग तकनीक से 20 मीटर तक कम किया गया। 62 एकड़ में फैले इस लैंडफिल के 30 एकड़ को उपयोगी बनाया गया और 56 लाख मीट्रिक टन कचरे का निस्तारण हुआ। दिसंबर 2025 तक 30 लाख मीट्रिक टन अतिरिक्त कचरे को हटाने का लक्ष्य है, जिसे अक्टूबर तक पूरा करने की कोशिश है। पर्यावरण संरक्षण की दिशा में यह एक ठोस कदम है लेकिन तय समय सीमा में लक्ष्यों को पूरा करना सरकार की दक्षता पर निर्भर करेगा। रेखा गुप्ता ने निजी स्कूलों की फीस को नियंत्रित करने के लिए अध्यादेश लाने की योजना का खुलासा किया ताकि माता-पिता पर अनुचित बोझ न पड़े। यह शिक्षा को सुलभ बनाने की दिशा में सकारात्मक कदम है लेकिन निजी संस्थानों के साथ समन्वय और कानूनी प्रक्रिया इसे जटिल बना सकती है।<br /> <br />रेखा गुप्ता ने विश्वास, विकास और व्यवस्था पर शुरूआती 100 दिनों में सधी हुई शुरुआत की है। जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में '100 दिन सेवा के' कार्यक्रम में अभिनेता अनुपम खेर के साथ संवाद ने जनता को उत्साहित किया। रेखा गुप्ता की सक्रियता और जमीनी स्तर पर काम करने की शैली को जनता ने भी सराहा है। उनके द्वारा सड़कों पर उतरकर नालों का निरीक्षण और यमुना आरती जैसे कदमों को जनता से जोड़ने की कोशिश के रूप में देखा गया।डबल और ट्रिपल इंजन सरकार के नारे के साथ भाजपा पर दिल्ली को विश्वस्तरीय बनाने की जिम्मेदारी है जो आसान नहीं है। शुरूआती 100 दिनों में रेखा गुप्ता ने  प्रशासनिक ढांचे को सुधारने, सरकारी कर्मचारियों की कार्यप्रणाली को पारदर्शी बनाने और भ्रष्टाचार पर कड़ी नज़र रखने का वादा किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">उनकी सरकार ने कई कदम उठाए हैं, जिनमें सरकारी दफ्तरों में डिजिटलाइजेशन को बढ़ावा देना और नागरिकों की शिकायतों का त्वरित समाधान सुनिश्चित करना शामिल है। इन कदमों से उम्मीद की जा रही है कि प्रशासन में पारदर्शिता और दक्षता में सुधार होगा। दिल्ली के सरकारी स्कूलों में बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने, शिक्षकों की प्रशिक्षण प्रणाली को अपडेट करने और विद्यार्थियों के लिए अधिक संसाधन उपलब्ध कराने का वादा किया गया है। इसके साथ ही, दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं का सुधार और दवाइयों की उपलब्धता सुनिश्चित करने पर भी ज़ोर दिया गया है।<br /> <br />रेखा गुप्ता के 100 दिनों में आयुष्मान भारत, यमुना सफाई, जलभराव समाधान, झुग्गी सुधार और कचरा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय कदम उठाए गए हैं। हालांकि, 100 दिन किसी सरकार के प्रदर्शन का पूर्ण मूल्यांकन करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। प्रदूषण, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और बुनियादी ढांचे की पुरानी समस्याएं अभी भी चुनौती बनी हुई हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">दिल्ली चुनावों के दौरान भाजपा ने बड़े जोर शोर से महिलाओं के लिए महिला समृद्धि योजना लागू करने के वादे बड़े जोर शोर से किये थे जिसमें  2500 रु देने की बात कही थी लेकिन भाजपा सरकार के 100 दिन पूरे होने के बाद भी यह योजना अभी तक अधर में लटकी है और विपक्ष के निशाने पर भाजपा है। प्रधानमंत्री मोदी के 'विकसित भारत' के साथ 'विकसित दिल्ली'  अभी दूर की गोटी है। आने वाला समय इस दिशा में उनकी काबिलियत को परखेगा।<br /> <br />रेखा गुप्ता के पहले 100 दिन दिल्ली में बीजेपी की नई सरकार के लिए एक मजबूत शुरुआत का प्रतीक रहे। महिला सशक्तिकरण, स्वास्थ्य, पर्यावरण और बुनियादी ढांचे पर उनके कदम जनता के बीच विश्वास जगाने की कोशिश करते हैं। हालांकि प्रदूषण, जाम ,जलभराव और चुनावी वादों को समयबद्ध तरीके से लागू करने की पहाड़ सरीखी चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के शुरूआती 100 दिनों में कई महत्वपूर्ण बदलाव और फैसले हुए हैं। कहा जा सकता है कि उनके पहले 100 दिन आम नागरिकों के लिए काफी महत्वपूर्ण रहे हैं।<br /> <br />(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं)</p>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>विचारधारा</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/152334/commonage-of-rekha-sarkars-100-days-of-expectations-and-challenges</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/152334/commonage-of-rekha-sarkars-100-days-of-expectations-and-challenges</guid>
                <pubDate>Tue, 03 Jun 2025 16:20:12 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2025-06/harshvardhan_pande.jpg"                         length="29651"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator>
                        <![CDATA[Swatantra Prabhat Media]]>
                    </dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हिंदी पत्रकारिता दिवस 30 मई पर विशेष</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक मधुप </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वरिष्ठ पत्रकार</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत में पत्रकारिता एक समय पर लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मानी जाती थी। समाज की आवाज़ उठाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्ता से सवाल पूछने और जनभावनाओं को मंच देने में इसकी भूमिका अविस्मरणीय रही है। लेकिन बीते कुछ वर्षों में पत्रकारिता का स्तर चिंताजनक रूप से गिरा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि पत्रकारों की प्रसिद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभाव और पहुंच पहले से कहीं अधिक बढ़ी है। यह विरोधाभास क्यों</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">पत्रकार बड़े होते जा रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर पत्रकारिता क्यों सिकुड़ रही है</span>?<span lang="hi" xml:lang="hi">आज फेसबुक पत्रकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यूज पोर्टल चलाने वाले पत्रकार </span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">यूटयूब चैनल चलाने  वाले पत्रकारों की देश</span></p>...]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/152204/special-hindi-journalism-day-on-30-may"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-05/ashok-madhup.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक मधुप </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वरिष्ठ पत्रकार</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत में पत्रकारिता एक समय पर लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मानी जाती थी। समाज की आवाज़ उठाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्ता से सवाल पूछने और जनभावनाओं को मंच देने में इसकी भूमिका अविस्मरणीय रही है। लेकिन बीते कुछ वर्षों में पत्रकारिता का स्तर चिंताजनक रूप से गिरा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि पत्रकारों की प्रसिद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभाव और पहुंच पहले से कहीं अधिक बढ़ी है। यह विरोधाभास क्यों</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">पत्रकार बड़े होते जा रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर पत्रकारिता क्यों सिकुड़ रही है</span>?<span lang="hi" xml:lang="hi">आज फेसबुक पत्रकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यूज पोर्टल चलाने वाले पत्रकार </span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">यूटयूब चैनल चलाने  वाले पत्रकारों की देश में बाढ़ सी आ गई है।दैनिक अखबार भी तेजी से बढ़ रहे हैं। आन लाइन समाचार  पत्रों की रोज गिनती बढ़ती जा रही है। जिसे देखो पत्रकारिता कर रहा है।इतना सब होने के बावजूद पिछले कुछ साल में खबर की विश्वसनीय घटी है। पत्रकारिता का स्तर गिरा है।पत्रकार का सम्मान घटा है।पहले माना जाता कि अखबार में छपा है तो सही होगा ,किंतु मीडिया में आई खबर की आज कोई गारंटी देने को तैयार नहीं। आज का  पत्रकार खबर लिख रहा है किंतु खबर की गांरटी से भाग रहा है। वह  यह दावा करने को कोई तैयार नही कि जो खबर उसने लिखी है</span>,  <span lang="hi" xml:lang="hi">वह सही है। विश्वनीय है। जब तक खबरों को चेहरों से बड़ा नहीं समझा जाएगा और पत्रकारिता को फिर से जनसेवा के रूप में नहीं देखा जाएगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तक यह गिरावट जारी रह सकती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पत्रकारिता के नए हाल पर न्यूज पोर्टल और यूटयूब चैनल पर  चलती फर्जी खबरों का लेकर  देश के लगभग  </span>20<span lang="hi" xml:lang="hi"> अखबारों ने एक अभियान शुरू किया है। इसके तहत वे प्रचार कर रहे हैं कि  न्यूज पक्की और सच्ची खबर−प्रिंट मतलब पक्का सबूत ।  इन्होंने ये अभियान तो शुरू किया किंतु अभियान चलाते समय वे  ये  भूल गए कि वे  भी फेसबुक  और यूटयूब चैनल चला रहे हैं</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">इतना जरूर है कि इनके पास प्रोफेशनल की टीम है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए  इनकी खबरें ज्यादा प्रभाणित है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्यादा विश्वसनीय हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पत्रकारिता  कभी मिशन था। आजादी के आंदेलन तक मिशन रहा। धीरे− धीरे इसमें व्यापारी आने लगे।औद्योगिक घराने उतर  गए।इनका उद्देश्य समाज सेवा नही रहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यापार  हो गया। ये व्यापार करने लगे।वह छापने लगे जिस्से इन्हें लाभ हो।इन्होंने पत्रकारिता और अखबारों के नाम पर  दुकाने खोल लीं। लेकिन इन्होंने  समाज की जरूरतों का ध्यान रखा। करोड़ों रूपये लगाकर ये सर्वे कराते कि किस  उम्र का पाठक क्या पढ़ना चाहता है</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">उस रिपोर्ट के आधार पर ये खबरे कराते। लेख लिखाते।बस अपने हितों का ध्यान रखते।इन प्रतिष्ठानों को पैसा मिलने लगा तो इनसे जुड़े पत्रकारों और कर्मचारियों को आकर्षक वेतन और कमीशन मिलने लगे। मिशन की भावना पत्रकारिता से गायब हो गई।मीडिया संस्थान अब स्वतंत्र नहीं रहे। बड़े मीडिया हाउस कॉरपोरेट पूंजी से संचालित हो रहे हैं और कई बार सरकार के नजदीक दिखते हैं। इससे खबरों की निष्पक्षता और निर्भीकता पर प्रश्नचिह्न लगते हैं।नतीजा</span>—<span lang="hi" xml:lang="hi">जांच रिपोर्टिंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जमीनी सच्चाई और सत्ता से सवाल पूछने की परंपरा लगभग गायब होती जा रही है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गांव देहात से छोटे </span>– <span lang="hi" xml:lang="hi">मोटे पत्रकार अब भी मिशन के तहत लगे थे। डेरा सच्चा सौदा के राम रहीम के किस्से भी स्थानीय ऐसे ही एक सांध्य दैनिक समाचार पत्र से प्रकाश में आए। सिरसा के सांध्य दैनिक </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पूरा सच</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">के संपादक रामचंद्र छत्रपति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राम रहीम और  डेरा सच्चा सौदा पर आश्रम में होरही ख़बरें लिख रहे थे । वहां हो रहे कारनामों का भांडाफोड़ कर रहे थे। उन  रामचंद्र छत्रपति को गोलियां मारी गईं। हत्या करा दी गई। आरोप राम रहीम पर आया।सीबीआई जांच हुई और अपराध  साबित हुआ।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">समय तेजी से बदल रहा है। आज पत्रकार अपना न्यूज पोर्टल ही नही चला रहे। यूटयूब् चैनल चला रहे है।  फेसबुक लाइव पर लगे है।रोज नए ब्लागर पैदा हो रहे है।आज का पत्रकार खुद एक </span>‘<span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रांड</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">बन चुका है। सोशल मीडिया ने रिपोर्टिंग को व्यक्ति-केंद्रित बना दिया है। पहले खबरें केंद्र में होती थीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब पत्रकार। टीवी डिबेट्स और यूट्यूब चैनलों पर पत्रकार अपनी पहचान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचारधारा और नाटकीयता को प्राथमिकता देते हैं। खबर से ज़्यादा चर्चित चेहरा बनना आज का लक्ष्य बन गया है। पहले विज्ञापन के लिए उद्योगपतियों की ओर देखना पड़ता था, अब  ऐसा नही है। अब आपकी साम्रग्री के हिसाब से गूगल   भुगतान कर रहा है।  जिनकी सामग्री अलग और नई है, वे मौज ले रहे हैं। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इससे  सबसे ज्यादा नुकसान ये हुआ कि कुछ अपने  लाइक लेने , व्यूज और टीआरपी की दौड़ में मीडिया अतिंरजित खबरे चला रहा है। उसे खबरों के पुष्ट करने का समय नही।फर्जी खबरे चल रही हैं। अभी आपरेशन सिंदूर के दौरान किसी ने खबर चला दी कि भारतीय सैना पाकिस्तान में प्रवेश कर गई तो एक ने चला दिया कि भारत का लाहौर पर कब्जा हो  गया।जबकि ऐसा कुछ नही था।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल युग में टीआरपी और व्यूज़ ही सफलता का पैमाना बन गए हैं। गंभीर पत्रकारिता की जगह सनसनीखेज खबरें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गॉसिप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>‘<span lang="hi" xml:lang="hi">डिबेट तमाशा</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">ने ले ली है। तथ्य की जगह धारणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्लेषण की जगह उत्तेजना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और संवाद की जगह शोर ने कब्जा कर लिया है। एंकर शोर मचाकर चीखकर पाठकों को आकृषित करन में लगे हैं। खबरों के हैंडिग गलत लगाकर पाठक को खबर पढ़ने के लिए मजबूर किया जा रहा है, जबकि खबरों में हैंडिंग के अनुरूप कुछ नही होता।इससे पत्रकारिता का स्तर और विश्वसनीयता तेजी से गिर रही है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">अखबारों में झूठी खबरों को रोका जाता था।कोशिश  रहती  कि खबरों की विश्वसनीयता बनी रहे। व्यक्तिवादी तंत्र में  अब ऐसा नही हो रहा। जल्दी  दिखाने की होड़ में और टीआरपी बटोरने के लिए आधी− अधूरी खबरे चलने लगी है।मुंबई पर आतंकवादी हमले और कंधार विमान अपहरण कांड के दौरान मीडिया ने कुछ ऐसी खबरे चलाईं  जिससे  दुश्मन और आंतकवादियों को ज्यादा लाभ  हुआ। इन्होंने देश हित नही देखा।मुंबई हमले को चैनल द्वारा लाइव दिखाने के कारण पाकिस्तान में बैठे हमलावरों के आका चैनल देखकर  आंतकवादियों को  दिशा निर्देश  दे रहे थे। इसकी आलोचना भी हुई। मीडिया के लिए  दिशा −निर्देश  बनाने की मांग भी हुई।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">धीरे− धीरे</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">गांव-कस्बों की खबरें गायब हो चुकी हैं। रिपोर्टर अब स्टूडियो में बैठकर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">नेरेटिव</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">बनाते हैं</span><span lang="hi" xml:lang="hi">।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ग्राउंड पर जाने की ज़हमत नहीं उठाते। इससे पत्रकारिता का मूल उद्देश्य</span>—<span lang="hi" xml:lang="hi">जनता की आवाज़ को मंच देना</span>—<span lang="hi" xml:lang="hi">कमज़ोर हो गया है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अब ये जरूरी होता  जा रहा है कि मीडिया में  आने वाले पत्रकारिया या वीडियो  पत्रकारिता का प्रशिक्षण लेकर आए। नए शासनादेश , देश हित और कानून की उन्हें जानकारी हो। सरकार द्वारा प्रत्येक पत्रकार के लिए ये प्रशिक्षण  अनिवार्य किया जाना चाहिए।बार कौंसिल की तरह पत्रकार कौंसिल जैसी संस्था बने जो पत्रकारों पर नजर रखे।उनके लिए दिशा −निर्देश तैयार करे।ऐसा  होता है तो सरकार को मीडिया पर नियंत्रण  की जरूरत नही पड़ेगी।वरन सरकार  को इस पर नियंत्रण के लिए कभी  न कभी दिशा निर्देश जारी ही करने होंगे।जैसे की अभी आपरेशन सिंदुर के समय जारी किये गए।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नवोदित पत्रकारों के लिए पत्रकारिता अब </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मिशन</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">नहीं बल्कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कैरियर</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">बनती जा रही है। कई संस्थानों में उन्हें बहुत कम वेतन पर काम कराया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे उनमें पेशे के प्रति समर्पण घटता है। वहीं वरिष्ठ पत्रकारों का आभा मंडल इतना विशाल हो गया है कि नए लोगों को उभरने का मौका कम मिलता है। इसलिए जरूरत है कि स्वतंत्र पत्रकारिता को बढ़ावा मिले।पब्लिक फंडिंग या सब्सक्रिप्शन आधारित मॉडल को प्रोत्साहित किया जाए।नए पत्रकारों को प्रशिक्षण और संरक्षण मिले।ग्राउंड रिपोर्टिंग को बढ़ावा दिया जाए।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"> </p>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/152204/special-hindi-journalism-day-on-30-may</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/152204/special-hindi-journalism-day-on-30-may</guid>
                <pubDate>Thu, 29 May 2025 18:00:46 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2025-05/ashok-madhup.jpg"                         length="47569"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator>
                        <![CDATA[Swatantra Prabhat Media]]>
                    </dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सीजफायर पर इतना घमासान क्यों</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;" align="center">  </p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">      </span><span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ.दीपकुमार शुक्ल (स्वतन्त्र टिप्पणीकार)</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पाकिस्तान स्थित आतंकी अड्डो को निशाना बनाते हुए भारत द्वारा की गयी सैन्य कार्रवाई बन्द हो जाने के बाद पूरे देश में बहस छिड़ी हुई है| विपक्षी दल जहाँ सरकार पर हमलावर हैं वहीँ सत्ता पक्ष के नेता ऑपरेशन सिन्दूर को सफल तथा सीजफायर को अस्थाई बता रहे हैं| प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने देश के नाम अपने सम्बोधन में बताया कि भारत ने पहले तीन दिनों में ही पाकिस्तान को इतना तबाह कर दिया जिसका उसे अन्दाजा भी नहीं था| भारत की आक्रामक कार्रवाई के बाद पाकिस्तान बचने के रास्ते खोजने लगा था| प्रधानमन्त्री ने यह</span></p>...]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/151955/why-so-much-fuss-on-ceasefire"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-05/deep-shukla.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;" align="center"> </p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">   </span><span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ.दीपकुमार शुक्ल (स्वतन्त्र टिप्पणीकार)</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पाकिस्तान स्थित आतंकी अड्डो को निशाना बनाते हुए भारत द्वारा की गयी सैन्य कार्रवाई बन्द हो जाने के बाद पूरे देश में बहस छिड़ी हुई है| विपक्षी दल जहाँ सरकार पर हमलावर हैं वहीँ सत्ता पक्ष के नेता ऑपरेशन सिन्दूर को सफल तथा सीजफायर को अस्थाई बता रहे हैं| प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने देश के नाम अपने सम्बोधन में बताया कि भारत ने पहले तीन दिनों में ही पाकिस्तान को इतना तबाह कर दिया जिसका उसे अन्दाजा भी नहीं था| भारत की आक्रामक कार्रवाई के बाद पाकिस्तान बचने के रास्ते खोजने लगा था| प्रधानमन्त्री ने यह भी बताया कि पाकिस्तान दुनियां भर में तनाव कम करने के लिए गुहार लगा रहा था और बुरी तरह पिटने के बाद पाकिस्तानी सेना ने 10 मई की दोपहर हमारे डीजीएमओ को सम्पर्क किया| तब तक हम आतंकवाद के इन्फ्रास्ट्रक्चर को बड़े पैमाने पर तबाह कर चुके थे| </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पाकिस्तान की तरफ से जब यह कहा गया कि उसकी ओर से आगे कोई आतंकी गतिविधी और सैन्य दुस्साहस नहीं दिखाया जायेगा तो भारत ने भी उस पर विचार किया| प्रधानमन्त्री ने अपने वक्तव्य में स्पष्ट कहा कि हमने पाकिस्तान के आतंकी और सैन्य ठिकानों पर अपनी जवाबी कार्रवाई को सिर्फ स्थगित किया है| सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक के बाद ऑपरेशन सिन्दूर अब भारत की नीति बन चुकी है| पाकिस्तान को चेतवानी देते हुए उन्होंने कहा है कि हम आतंक की सरपरस्त सरकार और आतंक के आकाओं को अलग-अलग नहीं देखेंगे| रक्षामन्त्री राजनाथ सिंह ने भी प्रधानमन्त्री की बात दोहराते हुए पाकिस्तान को आगाह किया कि हिन्दुस्तान की धरती पर किया गया कोई भी आतंकी हमला एक्ट ऑफ़ वार माना जायेगा|</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पहलगाम आतंकी हमले के बाद ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ के तहत भारतीय वायु सेना ने 6-7 मई की रात पाकिस्तान तथा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में कुल 9 आतंकी ठिकानों पर एयर स्ट्राइक की थी| जिसका उद्देश्य आतंकियों के लांचपैड तथा हथियारों के भण्डार को नेस्तानाबूद करना था| जो पूरी तरह सफल रहा| विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी के अनुसार इस कार्रवाई में जैश-ए-मुहम्मद का सरगना अब्दुल रऊफ अजहर सहित 100 से अधिक आतंकी मारे गये| अब्दुल रऊफ दिसम्बर 1999 में इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट – 814 के अपहरण तथा अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल की हत्या में शामिल बताया जाता था| आतंकी अड्डों पर अचानक हुई इस बड़ी कार्रवाई से बौखलाए पाकिस्तान ने भारत के कई सैन्य ठिकानों तथा रिहायशी इलाकों को निशाना बनाने की कोशिश की| </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु भारत के एयर डिफेंस सिस्टम ने माकूल जवाब देते हुए सभी हमलों को चुटकियों में विफल कर दिया| पाकिस्तान द्वारा छोड़े गये सभी ड्रोन जहाँ हवा में ही नष्ट कर दिये गये वहीं उसका एयर बेस सिस्टम भी ध्वस्त कर दिया गया| इस ऑपरेशन में जिन नौ आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया गया, उनमें चार पाकिस्तान में तथा पांच पाक अधिकृत कश्मीर में स्थित थे| इन्हें लश्कर, जैश-ए-मुहम्मद तथा हिजबुल मुजाहिदीन जैसे भारत विरोधी आतंकी संगठनों के ठिकानों के रूप में चिन्हित किया गया था| अन्तर्राष्ट्रीय सीमा से लगभग 25 किलोमीटर दूर मुरीदके में स्थित लश्कर मुख्यालय का नाम ‘मरकज तैयबा’ था| 26/11 के आतंकी अजमल कसाब तथा डेविड हेडली आदि ने यहीं प्रशिक्षण लिया था| </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अन्तर्राष्ट्रीय सीमा से लगभग 100 किमी दूर बहावलपुर में स्थित जैश-ए-मुहम्मद के मुख्यालय का नाम ‘मस्जिद/मरकज सुभान अल्लाह’ था| यह आतंकियों की भर्ती, प्रशिक्षण तथा उन्हें कट्टर बनाने का केन्द्र था| अन्तर्राष्ट्रीय सीमा से लगभग 12 किमी दूर सियालकोट में स्थित ‘मेहमूना जोया’ नाम का आतंकी अड्डा हिजबुल मुजाहिदीन का बड़ा शिविर तथा कठुआ जम्मू क्षेत्र का नियंत्रण केन्द्र बताया गया| </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जनवरी 2016 में पठानकोट एयरबेस पर हमले की योजना बनाने तथा उस पर निगरानी रखने का काम यहीं से हुआ था| सियालकोट में ही अन्तर्राष्ट्रीय सीमा से लगभग 6 किमी दूर जैश-ए-मुहम्मद का सरजाल नामक केन्द्र था| मार्च 2025 में जम्मू कश्मीर के चार पुलिस कर्मियों की हत्या करने वाले आतंकवादियों ने यहीं प्रशिक्षण लिया था| पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के पांच आतंकी अड्डों में ‘सवाई/शवाई नाला’ नामक लश्कर का प्रशिक्षण केन्द्र नियंत्रण रेखा से लगभग 30 किमी दूर मुजफ्फराबाद में स्थित था| मुजफ्फराबाद में ही ‘सैयदना बिलाल’ नाम से जैश-ए-मुहम्मद का प्रशिक्षण केन्द्र संचालित था| जहाँ हथियार, विस्फोटक तथा जंगल में जीवित रहने का प्रशिक्षण दिया जाता था| </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वहीँ नियंत्रण रेखा से लगभग 30 किमी दूर कोटली में राजौरी-पूंछ क्षेत्र में सक्रिय लश्कर आतंकियों का प्रशिक्षण केन्द्र था| जिसका नाम गुलपुर था| अप्रैल 2023 में पूंछ में तथा जून 2024 में हिन्दू तीर्थयात्रियों की बस पर हमला करने वाले आतंकियों ने यहीं प्रशिक्षण लिया था| कोटली में ही नियंत्रण रेखा से लगभग 13 किमी दूर लश्कर के अब्बास नामक अड्डे में फिदायीन अर्थात आत्मघाती हमले का प्रशिक्षण दिया जाता था| नियंत्रण रेखा से लगभग 9 किमी दूर भीम्बेर में बरनाला नाम से लश्कर का आतंकी अड्डा था| जिसमें हथियार, आईईडी (इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) तथा जंगल में जीवित रहने की ट्रेनिग दी जाती थी| इन सभी आतंकी अड्डों की तबाही ने निश्चित ही भारत विरोधी आतंकियों की कमर तोड़ने का काम किया है| इसे आतंक के खिलाफ भारत की लड़ाई को बहुत बड़ी सफलता के रूप में देखा जाना चाहिए| लेकिन भारत की एक बड़ी आबादी ऑपरेशन सिन्दूर के तहत पाकिस्तान के टुकड़े होते हुए देखना चाहती थी| लोगों का यह विचार था कि अब यह कार्रवाई पाक अधिकृत कश्मीर की भारत में वापसी तथा बलूचिस्तान की आजादी के बाद ही रुकनी चाहिए| परन्तु अचानक घोषित हुए सीजफायर ने सबकी आशाओं पर पानी फेर दिया| उसमें भी सीजफायर का ऐलान भारत और पाकिस्तान से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा किये जाने से आम जन का आश्चर्यचकित होना स्वाभाविक है|  </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब प्रश्न यह उठता है कि आतंकी अड्डों पर कार्रवाई शुरू करते ही जब भारत सरकार ने बड़ी प्रतिबद्धता पूर्वक स्पष्ट कर दिया था कि हम सिर्फ और सिर्फ आंतकवादियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई कर रहे हैं| इसमें न तो पाकिस्तान के सैन्य ठिकानों पर हमला किया जायेगा और न ही वहां के रिहायशी इलाकों को निशाना बनाया जायेगा| तब फिर भारत की एक बड़ी आबादी के मन में बलूचिस्तान की आजादी तथा पाक अधिकृत कश्मीर पर कब्जे की भ्रान्ति ने कैसे और क्यों जन्म लिया? इसके राजनीतिक निहितार्थ भले ही तलाशे जा रहे हों| परन्तु कारण यह हो सकता है कि 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद आलोचना झेल रही सरकार ने 6 मई तक सेना को पर्याप्त होमवर्क करने के बाद सैन्य कार्रवाई की इजाजत दी थी| जिसका परिणाम पूरी तरह सकारात्मक रहा और पाकिस्तान तथा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में स्थित आतंकी अड्डों को पूरी तरह ध्वस्त किया जा सका| तदोपरान्त पाकिस्तान की ओर से की गयी जवाबी कार्यवाही को भी भारतीय जवानो ने विफल कर दिया l</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> ऐसे में भारत की एक बड़ी आबादी को यह आभास होना स्वाभाविक था कि हम पाकिस्तान पर भारी हैं| अतः लगे हाँथ पाक अधिकृत कश्मीर को मुक्त तथा बलूचिस्तान को आजाद करवाकार समस्या को हमेशा-हमेशा के लिए समाप्त कर देना चाहिए| जबकि सरकार तथा सेना का उद्देश्य 7 मई को ही पूरा हो गया था| अतः कार्रवाई को रोकना मुनासिब लगा और हुआ भी यही| ऐसे में आम जन में असन्तोष फ़ैल गया| बड़े पैमाने पर लोगों की प्रतिक्रियाएं आयीं और अभी तक आ रही हैं| इसी अवसर का लाभ उठाते हुए विपक्षी दल भी हमलावर हो रहे हैं| कोई इन्दिरा गाँधी को याद कर रहा है तो कोई अटल विहारी वाजपेई की दुहाई दे रहा है| प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी को अन्ततोगत्वा कहना ही पड़ा कि हमने पाकिस्तान के आतंकी और सैन्य ठिकानों पर अपनी जवाबी कार्रवाई को सिर्फ स्थगित किया है|</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">निश्चित ही भारत सैन्य स्तर पर पाकिस्तान से कई गुना अधिक शक्तिशाली है| परन्तु उत्साह के अतिरेक में सीजफायर के विरोध में प्रतिक्रिया देने से पूर्व हमें इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि आज की परिस्थितियां 1971 से कहीं अधिक भिन्न हैं| बलूचिस्तान की आजादी और पाक अधिकृत कश्मीर की मुक्ति के लिए सैन्य कार्रवाई की बजाय कूटनीतिक तरीका अधिक उपयुक्त है| इस हेतु प्रयास भी जारी है| इसके अलावा पाक अधिकृत कश्मीर की मुक्ति से कहीं अधिक आवश्यक जम्मू कश्मीर को आतंकवाद से मुक्त करवाना है| साढ़े तीन दशक से अपने ही देश में निर्वासित जीवन जी रहे कश्मीर के मूल निवासियों की घर वापसी भारत सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती है| ऑपरेशन सिन्दूर को इस चुनौती से निपटने की दिशा में एक बड़े एवं प्रभावशाली प्रयास के रूप में देखा जाना चाहिए|    </span></p>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/151955/why-so-much-fuss-on-ceasefire</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/151955/why-so-much-fuss-on-ceasefire</guid>
                <pubDate>Sat, 17 May 2025 18:06:57 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2025-05/deep-shukla.jpg"                         length="429662"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator>
                        <![CDATA[Swatantra Prabhat Media]]>
                    </dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पाकिस्तान पोषित आतंकवाद विरुद्ध चाणक्य का युद्ध नीति दर्शन</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">भारत पिछले कई दशकों से पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद का दंश झेल रहा है। सीमापार से होने वाली आतंकी घुसपैठ, आत्मघाती हमले और आतंकवादी संगठनों को मिलने वाला प्रत्यक्ष-परोक्ष समर्थन भारत की सुरक्षा और संप्रभुता के सामने एक सतत चुनौती बना हुआ है। ऐसी स्थिति में भारतीयों के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या इस समस्या का कोई ईलाज संभव नहीं?क्या केवल सैन्य कार्रवाई से ही इस समस्या का स्थायी समाधान संभव है? अथवा चाणक्य जैसे रणनीतिक आचार्य की युद्ध नीति का सहारा लेकर कर व्यापक, समाधान  प्राप्त किया जा है?</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">भारत में चाणक्य को कौटिल्य और</div>...]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/151440/chanakyas-battle-policy-philosophy-against-pakistan-funded-terrorism"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-04/img-20241207-wa0003.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत पिछले कई दशकों से पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद का दंश झेल रहा है। सीमापार से होने वाली आतंकी घुसपैठ, आत्मघाती हमले और आतंकवादी संगठनों को मिलने वाला प्रत्यक्ष-परोक्ष समर्थन भारत की सुरक्षा और संप्रभुता के सामने एक सतत चुनौती बना हुआ है। ऐसी स्थिति में भारतीयों के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या इस समस्या का कोई ईलाज संभव नहीं?क्या केवल सैन्य कार्रवाई से ही इस समस्या का स्थायी समाधान संभव है? अथवा चाणक्य जैसे रणनीतिक आचार्य की युद्ध नीति का सहारा लेकर कर व्यापक, समाधान  प्राप्त किया जा है?</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत में चाणक्य को कौटिल्य और विष्णुगुप्त के नाम से भी जाना जाता है। भारतीय इतिहास उन्हें राजनीति, कूटनीति और युद्धनीति का अद्वितीय मनीषी मानता है। उनके द्वारा रचित 'अर्थशास्त्र' में शत्रु को पराजित करने के लिए कूटनीति, आंतरिक विघटन, गुप्तचरी (जासूसी), आर्थिक नियंत्रण और सीमित युद्ध जैसे बहुआयामी उपायों का उल्लेख मिलता है।</div>
<div style="text-align:justify;">कौटिल्य का सिद्धांत कहता है कि "शत्रु को परास्त करने के लिए सभी साधनों का चतुराई से और समयानुकूल प्रयोग करना चाहिए।"</div>
<div style="text-align:justify;"> विजय प्राप्त करने के लिए चाणक्य नीति शत्रु को  अलग-थलग करने का सुझाव देती है। भारत इस दिशा में निरंतर प्रयास कर रहा है। हालिया पहलगाम आतंकी हमले के बाद वैश्विक समुदाय द्वारा एक स्वर में आतंकवाद की निंदा इसका प्रमाण है।किन्तु अभी भी पाकिस्तान पर व्यापक और प्रभावी अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाना शेष है। भारत को चाहिए कि वह कूटनीतिक प्रयासों को और तेज करे, ताकि विश्व के अधिक से अधिक देश न सिर्फ पाकिस्तान की आलोचना करें, आतंकवादी राष्ट्र घोषित करें, अपितु कड़े से कड़े प्रतिबंध लगाएं तथा भारत का काउंटर अटैक का समर्थन करें।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हम सब जानते हैं कि पाकिस्तान इस समय भीतरी विद्रोहों से जूझ रहा है। बलूच, सिंधी और पश्तून समुदायों के बीच स्वतंत्रता की आकांक्षाएं लगातार बढ़ रही हैं। चाणक्य नीति के अनुसार भारत को इन आंदोलनों को वैचारिक, राजनीतिक और कूटनीतिक समर्थन प्रदान करना चाहिए, जिससे पाकिस्तान की सैन्य और आर्थिक ऊर्जा आंतरिक समस्याओं में ही खपती रहे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">चाणक्य की युद्ध नीति आर्थिक युद्ध को भी उतना ही महत्वपूर्ण मानती जितना शस्त्रयुद्ध को। आज पाकिस्तान की चरमराई अर्थव्यवस्था उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है। फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) जैसी वैश्विक संस्थाओं के माध्यम से उस पर आर्थिक प्रतिबंध बनाए रखना और नए आर्थिक प्रतिबंध लगवाने के प्रयास जारी रहना चाहिए।आर्थिक संकट आतंकवाद के वित्तपोषण को बाधित कर सकता है और पाकिस्तान को आंतरिक अस्थिरता की ओर धकेल सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">चाणक्य नीति के अनुसार गुप्तचर व्यवस्था किसी भी राष्ट्र की सुरक्षा का आधार है। भारत को अपने खुफिया तंत्र को और अधिक सुदृढ़ करना होगा।पुलवामा और पहलगाम जैसे हमले खुफिया तंत्र की विफलता का संकेत करते हैं। आतंकवादी नेटवर्क,लांचिंग पैड, घुस पैठ की समय रहते जानकारी, मित्र राष्ट्रों के मध्य खुफिया जानकारियों का आदान-प्रदान आदि भारत के गुप्त अभियानों की प्रभावशीलता में वृद्धि कर सकते हैं, घटना पूर्व आतंकियों को समाप्त कर सकते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">चाणक्य  शत्रु के मनोबल को तोड़ने को एक अत्यंत प्रभावी हथियार मानते थे। पाकिस्तान की जनता के बीच आतंकवाद के दुष्परिणामों का प्रचार, लोकतंत्र और मानवाधिकारों के लिए जागरूकता उत्पन्न करना, तथा कट्टरपंथी ताकतों के बीच आंतरिक विभाजन उत्पन्न करना भारत की रणनीति का अनिवार्य अंग होना चाहिए।जहां आवश्यक हो, वहां सटीक, सीमित और घातक सैन्य कार्रवाई चाणक्य नीति का अभिन्न तत्व रहा है। बड़े पैमाने के युद्ध से बचते हुए छोटे किंतु अत्यधिक प्रभावशाली अभियानों द्वारा आतंकवादी ढांचे को निरंतर क्षीण करना भारत के लिए श्रेयस्कर होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अतः मेरा ऐसा मानना है कि पाकिस्तान पोषित आतंकवाद के समूल उन्मूलन हेतु चाणक्य नीति के अनुसार बहुआयामी रणनीति यथा कूटनीति, आर्थिक दबाव, आंतरिक अस्थिरता को प्रोत्साहन, गुप्तचरी और सीमित सैन्य अभियानों का संयोजन तब तक जारी रखना चाहिए जब तक कि आतंकवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाता है। अतः हम कह सकते हैं कि भारतीय ज्ञान परंपरा में चाणक्य जैसे विद्वानों द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उनके समय में थे। यदि भारत धैर्यपूर्वक, चतुराई  और दूरदर्शिता से अपनी शक्ति और सामर्थ्य का अपने मित्र देशों का सहयोग लेते हुए  पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के स्थायी समाधान के लिए आगे बढ़ता है तो विजय प्राप्त करना निस्संदेह संभव है।</div>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/151440/chanakyas-battle-policy-philosophy-against-pakistan-funded-terrorism</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/151440/chanakyas-battle-policy-philosophy-against-pakistan-funded-terrorism</guid>
                <pubDate>Sun, 27 Apr 2025 16:54:39 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2025-04/img-20241207-wa0003.jpg"                         length="74921"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator>
                        <![CDATA[Swatantra Prabhat Media]]>
                    </dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अब व्यापार के लिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण : शर्बत भी बंटा हिन्दू और मुस्लिम में!</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[<div class="gmail_default" style="text-align:justify;"><strong>(आलेख : संजय पराते)</strong></div>
<div class="gmail_quote">
<div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">रामदेव के संघी झुकाव के बारे में सब जानते हैं। सब जानते है कि उसके भगवा चोले के अंदर एक कॉर्पोरेट बैठा हुआ है। रामदेव संघ-भाजपा की हिंदुत्व और कॉर्पोरेट गठजोड़ की राजनीति का नमूना भी है और उसका उत्पाद भी। इस रामदेव को लोगों ने सलवार-कुर्ता में डरकर भागते भी देखा है। इस पहनावे को आम तौर पर मुस्लिमों का पहनावा माना जाता है। कहा जा सकता है कि रामदेव के कायर हिंदुत्व को बचाया मुस्लिम पहनावे ने ही था। लेकिन यही रामदेव आज इस्लाम और मुस्लिमों के बारे में नफरत और डर फैलाने के</div></div></div>...]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/150993/now-communal-polarization-sorbet-for-business-is-also-divided-into"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-04/screenshot_2025-04-13-02-50-19-08_a23b203fd3aafc6dcb84e438dda678b6.jpg" alt=""></a><br /><div class="gmail_default" style="text-align:justify;"><strong>(आलेख : संजय पराते)</strong></div>
<div class="gmail_quote">
<div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">रामदेव के संघी झुकाव के बारे में सब जानते हैं। सब जानते है कि उसके भगवा चोले के अंदर एक कॉर्पोरेट बैठा हुआ है। रामदेव संघ-भाजपा की हिंदुत्व और कॉर्पोरेट गठजोड़ की राजनीति का नमूना भी है और उसका उत्पाद भी। इस रामदेव को लोगों ने सलवार-कुर्ता में डरकर भागते भी देखा है। इस पहनावे को आम तौर पर मुस्लिमों का पहनावा माना जाता है। कहा जा सकता है कि रामदेव के कायर हिंदुत्व को बचाया मुस्लिम पहनावे ने ही था। लेकिन यही रामदेव आज इस्लाम और मुस्लिमों के बारे में नफरत और डर फैलाने के उस्ताद बन गए हैं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उनका ताजा बयान है : ''शरबत के नाम पर एक कंपनी है, जो शरबत तो देती है, लेकिन शरबत से जो पैसा मिलता है, उससे मदरसे और मस्जिदें बनवाती है। अगर आप वो शरबत पिएंगे, तो मस्जिद और मदरसे बनेंगे और पतंजलि का शरबत पिएंगे, तो गुरुकुल बनेंगे, आचार्य कुलम बनेगा, पतंजलि विश्वविद्यालय और भारतीय शिक्षा बोर्ड आगे बढ़ेगा। इसलिए मैं कहता हूं ये शरबत जिहाद है. जैसे लव जिहाद, वोट जिहाद चल रहा है, वैसे ही शरबत जिहाद भी चल रहा है।" </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2025-04/screenshot_2025-03-16-17-17-12-03_965bbf4d18d205f782c6b8409c5773a4.jpg" alt="अब व्यापार के लिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण : शर्बत भी बंटा हिन्दू और मुस्लिम में!" width="351" height="373"></img></div>
<div style="text-align:justify;">रामदेव का यह बयान सोशल मीडिया में एक वीडियो के रूप में तैर रहा है। इस बयान में उनका इशारा रूह आफ़ज़ा की ओर है, लेकिन इसकी गुणवत्ता को वे कोई चुनौती नहीं दे रहे हैं। यह एक गैर-एल्कोहोलिक पेय है, जिसे ब्रिटिश भारत के अंतर्गत 1906 में गाजियाबाद में हकीम हाफिज अब्दुल मजीद द्वारा तैयार किया गया था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वे यूनानी दवाओं के विशेषज्ञ थे और उन्होंने कुछ यूनानी जड़ी-बूटियों और सिरप की मदद से एक घोल (शरबत) तैयार किया, जो लोगों को गर्मियों में लू से काफी राहत देता था। लेकिन इस शरबत का मुख्य अवयव गुलाब था। अब इसका निर्माण हमदर्द फार्मास्युटिकल द्वारा किया जा रहा है, जो आज एक नामी-गिरामी कंपनी है। इसके बोतल से जानकारी मिलती है कि आज इसे 8 प्रकार की जड़ी-बूटियों और 8 प्रकार के फलों और सब्जियों के अर्क से बनाया जा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अपने 115 वर्षों की यात्रा के दौरान इसकी गुणवत्ता पर अभी तक कोई आंच नहीं आई है। रूह आफ़ज़ा के समानांतर दिल आफ़्ज़ा नाम का एक भ्रामक उत्पाद भी बाजार में उतारा गया था, जिसकी बिक्री पर दिल्ली हाई कोर्ट ने रोक लगा दी थी, जिसकी पुष्टि बाद ने सुप्रीम कोर्ट ने भी की।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दूसरी बात, रूह आफ़ज़ा के बारे में अभी तक ऐसी कोई अधिकृत रिपोर्ट नहीं है कि इसकी बिक्री से होने वाली आय से इसके निर्माताओं ने मस्जिद या मदरसे का निर्माण किया है, जिसका आरोप रामदेव लगा रहे हैं। उन्हें अपने आरोप का सबूत भी पेश करना चाहिए था। सार्वजनिक रूप से जो जानकारी उपलब्ध है, उसके अनुसार, इस पेय की निर्माता कंपनी हमदर्द एक गैर लाभकारी ट्रस्ट द्वारा संचालित है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह धर्मनिरपेक्ष रुख अपनाती है, क्योंकि यह होली और ईद दोनों पर उत्सव का आयोजन करती है। वर्ष 2008 में इस कम्पनी ने जूही चावला को अपना ब्रांड एम्बेस्डर बनाया था। यदि इसका रुख इस्लाम-आधारित होता, तो वह जूही चावला को कभी भी अपना ब्रांड एंबेसडर नहीं बनाती।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तीसरी बात, रामदेव यह स्पष्ट रूप से कह रहे हैं कि उनके शर्बत से होने वाली आय का उपयोग उस शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए होगा, जिसे संघी गिरोह प्रमोट करना चाहता है, और निश्चित ही, यह शिक्षा वैज्ञानिक मानसिकता पैदा करने से कोसों दूर होगी और वर्णाश्रम आधारित होगी। ऐसी शिक्षा संविधान के बुनियादी मूल्यों के खिलाफ जाती है और रामदेव अपने मुनाफे का उपयोग इस देश की धर्मनिरपेक्षता और संवैधानिक मूल्यों की जड़ों को खोदने के लिए करने के लिए जा रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अब आईए, कुछ बातें रामदेव के पतंजलि के बारे में कर लें। यह कंपनी वर्ष 2006 में रामदेव और उनके चेले बालकृष्ण ने शुरू की थी और आज यह कंपनी टूथपेस्ट से लेकर स्किन केयर तक और बुखार से लेकर टायफाइड तक लगभग सारे उत्पाद बनाती-बेचती है और आज यह कंपनी 10,000 करोड़ रुपये से अधिक की हो गयी है। पतंजलि की विकास गाथा टीवी पर योग के प्रचार से एक कॉर्पोरेट में रामदेव के बदलने की कहानी है। इस बदलाव में लुटेरे और परजीवी पूंजीवाद के छल-कपट-धोखाधड़ी के सारे तत्व मौजूद है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अपने उत्पादों, जिसकी गुणवत्ता हमेशा संदेह के घेरे में और विवादित रही है, को प्रोजेक्ट करने के लिए रामदेव आधुनिक चिकित्सा पद्धति और एलोपैथी को हमेशा गरियाते रहे हैं। कोरोना संकट के समय उनका दावा था कि लाखों मरीजों की मौत एलोपैथी से ट्रीटमेंट के कारण हुई और इसकी जगह उन्होंने वर्ष 2020 में अपनी कोरोनिल को प्रोजेक्ट किया, जो निष्प्रभावी पाई गई और मोदी सरकार के आयुष मंत्रालय को भी इस दवा के 'घटिया होने' के तथ्य को स्वीकार करते हुए इसे प्रतिबंधित करना पड़ा है। इसके पहले, वर्ष 2016 में उनकी पतंजलि कंपनी का आंवला रस जांच में गुणवत्ताहीन पाया गया था और सेना की कैंटीनों से उसे वापस किया गया था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उनके गाय के घी की गुणवत्ता पर भी सवालिया निशान लगा है और वर्ष 2006 में तो माकपा नेता वृंदा करात ने रामदेव पर अपनी दवाओं में इंसानों और जानवरों की हड्डियों को मिलाने का आरोप ही लगा दिया था। यह जानकारी रामदेव के कारखाने में काम करने वाले मजदूरों ने ही उन्हें दी थी। इन मजदूरों का आरोप था कि न तो उन्हें न्यूनतम मजदूरी दी जाती है और न ही श्रम कानूनों का पालन ही किया जाता है। श्रम विभाग की जांच के बाद मजदूरों के ये आरोप सही पाए गए थे। इस प्रकार, रामदेव की संपत्ति मजदूरों की आह और उनके खून-पसीने में लिथड़ी संपत्ति है और पतंजलि का मुनाफा नकली और भ्रामक उत्पादों को बेचकर अर्जित किया गया अनैतिक मुनाफा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">रूह आफ़ज़ा के बरक्स रामदेव जिस गुलाब शर्बत को पेश कर रहे हैं, उसमें भी पतंजलि की कोई खोज या अनुसंधान नहीं है, क्योंकि इसका असली तत्व गुलाब ही है, जिसकी खोज हकीम हाफिज अब्दुल मजीद ने 115 साल पहले ही कर ली थी। इसलिए यह रूह आफ़ज़ा की नकल भर है और पुरानी शर्बत से यह उन्नीस ही बैठेगी, बीस नहीं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लेकिन विवाद नकली और असली या उन्नीस और बीस पेय का नहीं है। विवाद है, पतंजलि के गुलाब शर्बत को प्रोजेक्ट करने के तरीके पर। हमारे संविधान का कोई भी प्रावधान और कानून इसकी इजाजत किसी को नहीं देता कि आप अपने उत्पाद को प्रोजेक्ट करते हुए और अपने व्यवसाय के मुनाफे को बढ़ाने के लिए धर्म के आधार पर नफरत फैलाने, गलतबयानी करने की बात करें और किसी भी पेय को हिंदू पेय और मुस्लिम पेय में बांटने की हिमाकत करें और अपने शर्बत को बेचने के लिए मुस्लिमों पर शर्बत जेहाद फैलाने का आरोप लगाएं। यह वह चालबाजी है, जिसे अंग्रेजों ने अपनाया था और आज रामदेव अपना रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एक स्वतंत्र पत्रकार संजीव शुक्ल ने अपने एक आलेख 'हिंदू शर्बत और मुस्लिम शर्बत' में एक अद्भुत घटना का जिक्र किया है। उनके शब्दों में :</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">"बात तब की है, जब लाल किले पर आजाद हिंद फौज के सैनिकों पर मुकदमा चल रहा था। सभी सैनिकों को यहीं कैद किया गया था। कर्नल सहगल, ढिल्लन और शाहनवाज पर मुकदमा चलाया गया। ये सैनिक भारत के स्वाभिमान के प्रतीक बन चुके थे। पूरा देश इनके साथ खड़ा था। कांग्रेस आजाद हिंद फौज डिफेंस कमेटी बनाकर इन सैनिकों के बचाव में खड़ी हो गई। भिन्न राह होने के बावजूद पूरी कांग्रेस सुभाष बाबू के फौज के सेनानायकों के साथ थी। नेताजी की अनुपस्थिति में नेहरू अपनी जिम्मेदारी से वाकिफ थे। अरसे बाद उन्होंने वकील का चोगा पहना। इन सैनिकों की गिरफ्तारी और उन पर मुकदमा चलाए जाने से पूरा देश आंदोलित था। धर्म और जाति की दीवारें टूट चुकी थीं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पर सरकार इस एकता को तोड़ना चाहती थी। सरकार हमेशा की तरह “बांटो और राज करो” की नीति के तहत राष्ट्रीय एकता को सांप्रदायिक रंग देकर खंडित करना चाहती थी। सैनिकों के लिए सुबह जो चाय आती, उसे हिंदू चाय और मुस्लिम चाय का नाम दिया गया, जबकि सभी सैनिक इस तरह के बंटवारे के सख्त खिलाफ थे। पर सरकार का हुक्म था कि हर हाल में हिंदू चाय अलग बनेगी, मुस्लिम चाय अलग बनेगी और इसी नाम से बांटी जाएगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सुबह-सुबह हांक लगती थी – “हिंदू चाय… मुस्लिम चाय...!” क्रांतिकारी भी इस नफरती व्यवहार को न मानने के लिए कटिबद्ध थे। सो, सुबह चाय आती और क्रांतिकारी उसे एक बड़े बर्तन में मिला देते। फिर बांटकर पी लेते। यह एकता की अद्भुत मिसाल थी।"</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हमारे देश के स्वाधीनता आंदोलन ने धर्म और जाति की जिन दीवारों को तोड़ दिया था, संघ-भाजपा और उसका समर्थक कॉर्पोरेट आज उन्हीं दीवारों को फिर से खड़ा करने में जुटा है, ताकि अपने मुनाफे को अधिकतम और सुरक्षित कर सकें। आज की राजनैतिक चुनौती यही है कि हिंदुत्व की राजनीति के साथ कॉरपोरेटों के इस अपवित्र गठबंधन को मात दी जाएं और इसके लिए जन पक्षधर नीतियों के आधार पर शोषित-उत्पीड़ितों का, आदिवासी-दलितों का, मजदूर-किसानों का एक व्यापक संयुक्त गठबंधन खड़ा किया जाएं। इसमें जितना देर लगेगा, देश की एकता और अखंडता का, शांति और सांप्रदायिक सौहार्द्र का, सामाजिक न्याय, समानता और भाईचारे का उतना ही नुकसान होगा, क्योंकि संघी गिरोह और उनका रामदेव ठीक इन्हीं मूल्यों के खिलाफ खड़ा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
</div>
</div>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/150993/now-communal-polarization-sorbet-for-business-is-also-divided-into</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/150993/now-communal-polarization-sorbet-for-business-is-also-divided-into</guid>
                <pubDate>Mon, 14 Apr 2025 16:21:13 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2025-04/screenshot_2025-04-13-02-50-19-08_a23b203fd3aafc6dcb84e438dda678b6.jpg"                         length="265774"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator>
                        <![CDATA[Swatantra Prabhat Reporters]]>
                    </dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सशक्त नारी, सशक्त समाज</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>अंतराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष:</strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>लेखक सचिन बाजपेई</strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">वर्तमान में हम अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मना रहे है जिसके अन्तर्गत महिलाओं को सशक्त करने हेतु और उनको समाज में बराबर का हक दिलाने के लिए प्रयत्न जारी है पंडित जवाहर लाल नेहरु द्वारा कहा गया मशहूर वाक्य “लोगों को जगाने के लिये”, महिलाओं का जागृत होना जरुरी है। क्योंकि उन्ही से परिवार आगे बढ़ता है, गाँव आगे बढ़ता है और राष्ट्र विकास की ओर उन्मुख होता है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">भारत में, महिलाओं को सशक्त बनाने के लिये सबसे पहले समाज में उनके अधिकारों और मूल्यों को मारने वाले उन सभी राक्षसी सोच को मारना</div>...]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149554/strong-women-strong-society"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/8d0828dc36693e1ffe983169c26bc71b1.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>अंतराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष:</strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>लेखक सचिन बाजपेई</strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वर्तमान में हम अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मना रहे है जिसके अन्तर्गत महिलाओं को सशक्त करने हेतु और उनको समाज में बराबर का हक दिलाने के लिए प्रयत्न जारी है पंडित जवाहर लाल नेहरु द्वारा कहा गया मशहूर वाक्य “लोगों को जगाने के लिये”, महिलाओं का जागृत होना जरुरी है। क्योंकि उन्ही से परिवार आगे बढ़ता है, गाँव आगे बढ़ता है और राष्ट्र विकास की ओर उन्मुख होता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत में, महिलाओं को सशक्त बनाने के लिये सबसे पहले समाज में उनके अधिकारों और मूल्यों को मारने वाले उन सभी राक्षसी सोच को मारना जरुरी है जैसे दहेज प्रथा, अशिक्षा, यौन हिंसा, असमानता, भ्रूण हत्या, महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा, बलात्कार, वैश्यावृति, मानव तस्करी और ऐसे ही दूसरे विषय।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">चिंता का विषय यह भी है कि जिस भारत में कहा जाता था यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता वहां नारियों की ऐसी स्थिति हुई कैसे मेरी समझ से इसका एकमात्र कारण पश्चिमी सभ्यता के प्रति लोगों का लगाव और अपनी सभ्यता से दूर होना है पुरातन समय की स्त्रियां शिक्षित कुशल श्रेष्ठ वह सर्वगुण संपन्न थी लेकिन मुगलों के शासन में स्त्रियों की बहुत दुर्दशा हुई स्त्रियों को सिर्फ भोग विलास की वस्तु बना दिया गया परंतु वर्तमान युग में संविधान में उल्लिखित समानता के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए महिलाओं को सशक्त बनाना सबसे प्रभावशाली उपाय है इस तरह की बुराईयों को मिटाने के लिये। लैंगिक समानता को प्राथमिकता देने से पूरे भारत में महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा मिला है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महिला सशक्तिकरण के उच्च लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये इसे हर एक परिवार में बचपन से प्रचारित व प्रसारितकरना चाहिये। ये जरुरी है कि महिलाएँ शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रुप से मजबूत हो। महिलाओं के उत्थान के लिये एक स्वस्थ परिवार की जरुरत है जो राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लिये आवश्यक है। आज भी कई पिछड़े क्षेत्रों में माता-पिता की अशिक्षा, असुरक्षा और गरीबी की वजह से कम उम्र में विवाह और बच्चे पैदा करने का चलन है। महिलाओं को मजबूत बनाने के लिये महिलाओं के खिलाफ होने वाले दुर्व्यवहार, लैंगिक भेदभाव, सामाजिक अलगाव तथा हिंसा आदि को रोकने के लिये सरकार कई सारे कदम उठा रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">परंतु सिर्फ सरकार के कदम उठाने से कोई बड़े बदलाव नहीं होंगे हम सबको आगे बढ़ कर आना होगा और अपनी आस-पड़ोस जागरूकता फैलाने होगी और लैंगिक असमानता को मिटाने के लिए प्रयत्न करना होगा तभी हम महिला सशक्तिकरण को धरातल पर देख सकेंगे और हमारा अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाना सफल हो सकेगा और वर्तमान नारी गार्गी अपाला मैत्री लक्ष्मीबाई की तरह बनेगी जिससे पूरे विश्व में महिलाएं सशक्त होगी और समाज भी सशक्त होगा</div>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/149554/strong-women-strong-society</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/149554/strong-women-strong-society</guid>
                <pubDate>Fri, 07 Mar 2025 21:18:12 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2025-03/8d0828dc36693e1ffe983169c26bc71b1.jpg"                         length="123556"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator>
                        <![CDATA[Swatantra Prabhat]]>
                    </dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हिंदी विरोध को बनाना चाहते हैं सत्ता बचाने का हथियार </title>
                                    <description>
                        <![CDATA[<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">देश में नई शिक्षा नीति  और त्रिभाषा फॉर्मूले को लेकर तमिलनाडु के नेता जिस प्रकार का बयान दे रहे हैं, वह सिर्फ भड़‌काऊ होने के साथ ही राजनीतिक स्वार्थ से ओत-प्रोत है। भाषा को लेकर संकीर्ण सोच से ऊपर उठने के बजाय राज्य के नेता इस मुद्दे पर राजनीति चमकाने में जुटे हैं, इसके पीछे उनका सिर्फ एक ही मकसद है वोट बैंक की राजनीति। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने इस विवाद को बड़ा फलक देते हुए यहां तक कह दिया है कि तमिलनाडु 'एक और भाषा युद्ध' के लिए तैयार है। उनके अनुसार केंद्र</div>...]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149269/want-to-make-hindi-opposition-to-the-weapon-to-save"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/hindi.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">देश में नई शिक्षा नीति  और त्रिभाषा फॉर्मूले को लेकर तमिलनाडु के नेता जिस प्रकार का बयान दे रहे हैं, वह सिर्फ भड़‌काऊ होने के साथ ही राजनीतिक स्वार्थ से ओत-प्रोत है। भाषा को लेकर संकीर्ण सोच से ऊपर उठने के बजाय राज्य के नेता इस मुद्दे पर राजनीति चमकाने में जुटे हैं, इसके पीछे उनका सिर्फ एक ही मकसद है वोट बैंक की राजनीति। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने इस विवाद को बड़ा फलक देते हुए यहां तक कह दिया है कि तमिलनाडु 'एक और भाषा युद्ध' के लिए तैयार है। उनके अनुसार केंद्र अगर तमिलनाडु में नई शिक्षा नीति लागू करता है, तो उसे 2000 करोड़ रुपये मिलेंगे। लेकिन 2000 करोड़ क्या अगर केंद्र 10000 करोड़ रुपये भी देती है, तो हम नई शिक्षा नीति नहीं लागू करेंगे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राज्य सरकार हिंदी को लागू करने की अनुमति नहीं देगी और तमिल भाषा और संस्कृति की रक्षा करेगी। डीएमके सरकार का दावा है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत तीन-भाषा फॉर्मूले के जरिए हिंदी थोपने की कोशिश की जा रही है। साथ ही स्टालिन ने आरोप लगाया कि 25 से अधिक उत्तर भारतीय भाषाओं को हिंदी और संस्कृत के प्रभुत्व के कारण नुकसान हुआ है। उनका दावा है कि यदि तमिलनाडु तीन-भाषा नीति को स्वीकार कर लेता है, तो तमिल को नजरअंदाज कर दिया जाएगा और भविष्य में संस्कृत का दबदबा रहेगा। हालांकि, केंद्र सरकार ने इन आरोपों को खारिज किया है। सीएम स्टालिन ने अपने पत्र में कहा कि बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में मैथिली, ब्रजभाषा, बुंदेलखंडी और अवधी जैसी भाषाओं को हिंदी के प्रभुत्व ने खत्म कर दिया है। केंद्र का कहना है कि एनईपी के जरिये किसी राज्य पर कोई भाषा नहीं थोपी जा रही है। किसी भी राज्य या समुदाय पर कोई भी भाषा थोपने का सवाल ही नहीं उठता।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एनईपी 2020 भाषायी स्वतंत्रता के सिद्धांत को कायम रखता है और यह सुनिशित करता है कि छात्र अपनी पसंद की भाषा में सीखना जारी रखें। भाषा को लेकर संकीर्ण सोच से ऊपर उठने के बजाय राज्य के नेता इस मुद्दे पर राजनीति चमकाने में जुटे हैं। तमिलनाडु में हिंदी विरोध का लंबा इतिहास है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी ने दक्षिण भारत में वर्ष 1918 में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना की थी। वे हिंदी को भारतीयों को एकजुट करने वाली भाषा मानते थे। तब ही तमिलनाडु में हिंदी विरोध शुरू हो गया था। ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में तमिलनाडु को मद्रास प्रेसिडेंसी कहा जाता था। तब 1937 में सी. राजगोपालाचारी की सरकार ने स्कूलों में हिंदी को अनिवार्य किया, तो तमिलनाडु में इसके खिलाफ तीन साल तक आंदोलन चला।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">फैसला वापस लेने पर आंदोलन तो खत्म हो गया, पर इसने राज्य में हिंदी विरोध के जो बीज बोए थे, वे जब-तब अंकुरित होने लगते हैं। क्षेत्रीय पार्टियां राजनीतिक फायदे के लिए इन्हें खाद-पानी मुहैया कराती रहती हैं। तमिलनाडु के स्कूलों में 1967 से दो-भाषा फॉर्मूले (तमिल और अंग्रेजी) का पालन किया जा रहा है। त्रिभाषा फॉर्मूले के तहत हिंदी वहां क्षेत्रीय पार्टियों के लिए आंख की किरकिरी बनी हुई है। शिक्षा प्रणाली को आधुनिक बनाने के इस नीति के मकसद के बावजूद ये पार्टियां पुराना राग नहीं छोड़ना चाहतीं। द्रमुक की मौजूदा सरकार पर केंद्र की यह चेतावनी भी बेअसर रही कि जब तक तमिलनाडु एनईपी को पूरी तरह लागू नहीं करेगा, उसे समग्र शिक्षा निधि की 2952 करोड़ रुपए की राशि जारी नहीं की जाएगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तमिलनाडु सरकार हिंदी के पठन-पाठन के दरवाजे इसलिए बंद रखना चाहती है, क्योंकि उसे लगता है कि एक बार दरवाजे खुले तो राजनीति का रंग-रोगन बदल जाएगा। नई शिक्षा नीति हिंदी थोपने के बजाय विद्यार्थियों को एक अतिरिक्त भाषा सीखने का अवसर दे रही है। हकिकत यह है कि नई शिक्षा नीति में हमने क्षेत्रीय भाषाओं को महत्व दिया है। यह हर क्षेत्रीय भाषा के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। नई शिक्षा के माध्यम के रूप में मातृभाषा के उपयोग की सिफारिश को लागू किया गया है। इसमें मातृभाषा, स्थानीय भाषा या क्षेत्रीय भाषा का विकल्प भी दिया गया है। भाषा नीति का मूल आधार त्रिभाषा फार्मूला है, जिसके अनुसार स्कूली विद्यार्थियों को तीन भाषाओं का ज्ञान अनिवार्य रूप से होना चाहिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके साथ ही तमिल, तेलगू, कनड़, फारसी, संस्कृत और शास्त्रीय भाषाओं के अध्ययन पर जोर दिया गया है। शिक्षा के माध्यम के रूप में अंग्रेजी की वकालत करने वाला तबका जिसमें देश भर में कुकुरमुत्तों की तरह फैले अंग्रेजी माध्यम के स्कूल भी हैं, शिक्षा नीति के उस प्रावधान का विरोध करता नजर आया, जिसमें प्राथमिक शिक्षा के लिए पढ़ाई का माध्यम मातृभाषा या स्थानीय भाषा में कराने की बात कही गई है। दुनिया भर के शिक्षाविद यह मानते हैं कि बच्चे का सर्वाधिक प्रारंभिक विकास और सौखने की प्रवृत्ति उसी भाषा में बढ़ती है, जो उसके घर में बोली जाने वाली भाषा होती है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का भी मानना था कि मातृभाषा का स्थान कोई दूसरी भाषा नहीं ले सकती, उनके अनुसार 'गाय का दूध भी मां का दूध नहीं हो सकता।'</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">केंद्र सरकार भी मातृ भाषा को ज्यादा महत्व दे रही है, मगर जिस प्रकार से हिंदी का विरोध किया जा रहा है, वह अनावश्यक है। ये हकीकत है कि तमिलनाडु की राजनीति हिंदी विरोध के आसपास घूमती रहती थी है। ये बहुत ही सस्ता और इंस्टैंट रिफ्रेशिंग पॉलिटिक्स है। मगर, दूसरे समाज की तरह तमिलनाडु के नौजवानों के लिए भाषा से ज्यादा जरूरत रोजी-रोजगार की है। शायद सत्ताधारी पार्टी के पास उसे लेकर कोई मजबूत ब्लूप्रिंट नहीं है। लिहाजा, भावनात्मक मुद्दों के सहारे 2026 का चुनाव साधने की कोशिशों में जुटी है। सभी भाषाओं को बराबरी का दर्जा देकर ही हम देश की सांस्कृतिक एकता मजबूत कर सकते हैं। हिंदी बोलने वाले लोग देश के हर कोने में मिल जाते हैं। कोई राज्य अगर अपनी मातृभाषा को महत्व देता है, तो उसकी भावना का सम्मान किया जाना चाहिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मगर किसी राज्य विशेष का नागरिक दूसरे राज्यों में जाता है, तो हिंदी के बिना उसका काम नहीं चलता। भाषाएं तो एक दूसरे से जुड़ कर ही आगे बढ़ती हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में त्रिभाषा फार्मूले को लेकर चल रही सियासी बयानबाजी के बीच स्टालिन का विरोध नाहक ही है कि हिंदी से उनकी मातृभाषा नष्ट हो सकती है। दरअसल, उन्होंने अपने स्वर तीखे करते हुए साफ कर दिया है कि वे उन्हीं पुराने आंदोलनों के वशंज है, जिसमें हिंदी को लेकर उपेक्षा का गहरा भाव है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">स्टालिन यह भूल गए हैं कि हिंदी दिलों को जोड़ने की भाषा है। यह आज भारत ही नहीं, दुनिया के कई देशों में समझी और बोली जाती है। इसलिए इस मुद्दे पर राजनीति की बजाय गंभीरता से विचार होना जरूरी है। क्योंकि यह मसला राजनीति से बहुत बड़ा है। आखिरकार यहां सवाल हमारे भविष्य का है, हमारी अगली पीढ़ी का है। और सवाल व्यक्तिगत पसंद नापसंद का भी है। बच्चों को भाषा चुनने की आजादी मिलनी चाहिए। लेकिन हमारे राजनीतिक लोगों को रोटी सेकने के लिए मुद्दे की तलाश रहती है फिर चाहे राष्ट्रभाषा हिंदी का विरोध करना ही क्यों न हो।</div>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/149269/want-to-make-hindi-opposition-to-the-weapon-to-save</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/149269/want-to-make-hindi-opposition-to-the-weapon-to-save</guid>
                <pubDate>Mon, 03 Mar 2025 17:45:59 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2025-03/hindi.jpg"                         length="35583"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator>
                        <![CDATA[Swatantra Prabhat]]>
                    </dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        