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                <title>Justice Surya Kant - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Justice Surya Kant RSS Feed</description>
                
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                <title>नया न्यायिक सवेरा – जब न्याय समय पर मिले, तो हर घाव भर जाता है</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय न्याय व्यवस्था में कुछ फैसले केवल कानूनी आदेश नहीं होते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि बदलाव की नई दिशा तय करते हैं। </span>29 <span lang="hi" xml:lang="hi">मई </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">को सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी निर्देश ऐसा ही एक ऐतिहासिक हस्तक्षेप है। न्यायमूर्ति सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सभी हाईकोर्टों को स्पष्ट किया कि सुनवाई पूरी होने के बाद सुरक्षित (रिजर्व) रखा गया कोई भी फैसला सामान्यतः तीन महीने से अधिक लंबित नहीं रहना चाहिए। संविधान के अनुच्छेद </span>142 <span lang="hi" xml:lang="hi">के तहत जारी यह निर्देश महज प्रशासनिक व्यवस्था नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि न्याय की मूल भावना को सशक्त करने का प्रयास है। वर्षों</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180348/new-judicial-dawn-%E2%80%93-when-justice-is-delivered-on-time"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/images11.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय न्याय व्यवस्था में कुछ फैसले केवल कानूनी आदेश नहीं होते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि बदलाव की नई दिशा तय करते हैं। </span>29 <span lang="hi" xml:lang="hi">मई </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">को सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी निर्देश ऐसा ही एक ऐतिहासिक हस्तक्षेप है। न्यायमूर्ति सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सभी हाईकोर्टों को स्पष्ट किया कि सुनवाई पूरी होने के बाद सुरक्षित (रिजर्व) रखा गया कोई भी फैसला सामान्यतः तीन महीने से अधिक लंबित नहीं रहना चाहिए। संविधान के अनुच्छेद </span>142 <span lang="hi" xml:lang="hi">के तहत जारी यह निर्देश महज प्रशासनिक व्यवस्था नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि न्याय की मूल भावना को सशक्त करने का प्रयास है। वर्षों से न्यायालयों में गूंज रही “तारीख पर तारीख” की संस्कृति पर इसे एक निर्णायक और दूरगामी प्रहार माना जा रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">न्याय की सबसे बड़ी कसौटी केवल निर्णय नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उसका समय पर मिलना है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह न्यायिक प्रक्रिया की उस गंभीर खामी पर प्रहार करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे लाखों मुकदमेबाज वर्षों से प्रभावित होते रहे हैं। अनेक मामलों में बहस पूरी होने के बाद फैसले सुरक्षित रख लिए जाते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उन्हें महीनों या वर्षों तक सुनाया नहीं जाता था।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">परिणामस्वरूप पक्षकार कानूनी अनिश्चितता में जीने को विवश हो जाते थे और उनका रोजगार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवसाय तथा भविष्य अदालत के निर्णय की प्रतीक्षा में अटक जाता था। इसी वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि न्यायिक फैसलों का अनिश्चितकाल तक लंबित रहना स्वीकार्य नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि न्याय का अर्थ केवल सुनवाई नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समय पर निर्णय भी है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस आदेश की शक्ति उसके संवैधानिक आधार में निहित है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद </span>21 <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि समय पर न्याय की अपेक्षा का भी संरक्षक है। जब किसी व्यक्ति का सम्मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोजगार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भविष्य या स्वतंत्रता किसी फैसले पर निर्भर हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब निर्णय में अनावश्यक देरी उसके मौलिक अधिकारों को प्रभावित करती है। इसलिए न्यायालय ने समयबद्ध न्याय को महज प्रशासनिक आवश्यकता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि संवैधानिक दायित्व माना है। न्यायमूर्ति सूर्य कांत का यह कथन कि उन्होंने अपने लगभग पंद्रह वर्षों के हाईकोर्ट कार्यकाल में कभी किसी रिजर्व फैसले को तीन महीने से अधिक लंबित नहीं रखा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूरी न्यायपालिका के लिए एक प्रेरक मानक प्रस्तुत करता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट ने सबसे स्पष्ट और कड़ा संदेश दिया है। अदालत ने निर्देश दिया कि जमानत याचिकाओं पर आदेश आदर्श रूप से उसी दिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अथवा अधिकतम अगले दिन जारी हो तथा इसकी सूचना तत्काल जेल प्रशासन तक पहुंचे। यह उन हजारों विचाराधीन कैदियों के लिए बड़ी राहत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो दोषसिद्धि के बिना लंबे समय से कारावास में हैं। न्यायालय का स्पष्ट मत है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रक्रियागत देरी की भेंट नहीं चढ़ाया जा सकता। जमानत मंजूर होने के बाद उसका त्वरित लाभ मिलना ही वास्तविक न्याय है। इससे न केवल जेलों का बोझ घटेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि न्यायपालिका में जनविश्वास भी और मजबूत होगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस ऐतिहासिक निर्देश की सबसे बड़ी ताकत उसका जवाबदेह निगरानी तंत्र है। सुप्रीम कोर्ट ने केवल समय-सीमा तय नहीं की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उसके पालन की ठोस व्यवस्था भी सुनिश्चित की है। तीन महीने के भीतर फैसला न आने पर मामला मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जाएगा और आवश्यकता पड़ने पर दूसरी पीठ को सौंपा जा सकेगा। साथ ही लंबित रिजर्व मामलों की निगरानी के लिए डिजिटल ट्रैकिंग प्रणाली विकसित करने के निर्देश दिए गए हैं। यह व्यवस्था पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करेगी। वहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जटिल मामलों के लिए सीमित छूट का प्रावधान रखकर न्यायालय ने व्यावहारिक संतुलन भी बनाए रखा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह पहल केवल लंबित फैसलों के निस्तारण का उपाय नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि न्याय व्यवस्था की कार्यसंस्कृति में बदलाव का स्पष्ट संकेत है। देश में करोड़ों मुकदमे लंबित हैं और लगातार स्थगन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लंबी सुनवाई तथा निर्णयों में देरी ने आम नागरिक के मन में न्याय को एक थकाऊ और अंतहीन प्रक्रिया बना दिया था। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम बताता है कि शीर्ष अदालत अब केवल अंतिम फैसले सुनाने तक सीमित नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पूरे न्यायिक तंत्र को अधिक उत्तरदायी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभावी और परिणामोन्मुख बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। समयबद्ध निर्णयों की संस्कृति विकसित होने से न्यायालयों की कार्यक्षमता बढ़ेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा और मुकदमों के निस्तारण की गति को नई ऊर्जा मिलेगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बेशक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस सुधार की राह पूरी तरह आसान नहीं है। कई हाईकोर्ट न्यायाधीशों की कमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बढ़ते मुकदमों के बोझ और जटिल मामलों की चुनौती से जूझ रहे हैं। कुछ मामलों में गहन अध्ययन के कारण निर्णय में अतिरिक्त समय भी स्वाभाविक है। फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने व्यावहारिक संतुलन बनाए रखा है। अतिरिक्त पीठों का गठन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल तकनीक का विस्तार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक केस मैनेजमेंट और प्रशासनिक दक्षता में सुधार इस बदलाव को गति दे सकते हैं। इन उपायों के प्रभावी क्रियान्वयन से न्यायिक प्रक्रिया की रफ्तार और गुणवत्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों में उल्लेखनीय सुधार संभव है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">किसी भी न्यायिक सुधार की असली कसौटी उसका प्रभाव आम नागरिक के जीवन पर होता है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश मुकदमेबाजों को भरोसा देता है कि सुनवाई पूरी होने के बाद उनका मामला अनिश्चित प्रतीक्षा में नहीं रहेगा। किसान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मध्यमवर्ग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्योग जगत और समाज के कमजोर वर्गों के लिए समयबद्ध न्याय नई उम्मीद लेकर आएगा। समय पर मिला न्याय कानून की प्रतिष्ठा और लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनविश्वास को मजबूत करता है। यदि इस निर्देश का प्रभावी पालन हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो “तारीख पर तारीख” की संस्कृति अतीत बन सकती है और “समय पर न्याय” भारतीय न्याय व्यवस्था की नई पहचान।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 30 May 2026 22:40:55 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>विधेयकों की मंजूरी में देरी के उदाहरण राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए निश्चित</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>प्रयागराज - </strong>  समयसीमा लागू करने को उचित नहीं ठहरा सकते: सुनवाई के विदौरान सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रपति के संदर्भ की सुनवाई के 6 वें दिन, सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि विधेयकों को सहमति देने में देरी के कुछ उदाहरण राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए क्रमशः संविधान के अनुच्छेद 200 और 201 के अनुसार कार्य करने के लिए एक व्यापक समयरेखा निर्धारित करने को सही नहीं ठहरा सकते हैं। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">यदि देरी के व्यक्तिगत मामले हैं, तो पीड़ित पक्ष राहत पाने के लिए न्यायालय से संपर्क कर सकते हैं, और न्यायालय निर्देश दे सकता है कि निर्णय एक समय सीमा</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/154441/examples-of-delay-in-approval-of-bills-fixed-for-governors"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-09/sc1.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>प्रयागराज - </strong> समयसीमा लागू करने को उचित नहीं ठहरा सकते: सुनवाई के विदौरान सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रपति के संदर्भ की सुनवाई के 6 वें दिन, सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि विधेयकों को सहमति देने में देरी के कुछ उदाहरण राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए क्रमशः संविधान के अनुच्छेद 200 और 201 के अनुसार कार्य करने के लिए एक व्यापक समयरेखा निर्धारित करने को सही नहीं ठहरा सकते हैं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यदि देरी के व्यक्तिगत मामले हैं, तो पीड़ित पक्ष राहत पाने के लिए न्यायालय से संपर्क कर सकते हैं, और न्यायालय निर्देश दे सकता है कि निर्णय एक समय सीमा के भीतर लिया जाना चाहिए; हालांकि, इसका मतलब यह नहीं हो सकता है कि न्यायालय को राज्यपाल और राष्ट्रपति के कार्यों के लिए एक सामान्य समयरेखा निर्धारित करनी चाहिए, न्यायालय ने मौखिक रूप से कहा। न्यायालय ने बताया कि संविधान ने विशेष रूप से यह कहकर "लचीलापन" प्रदान किया है कि बिलों को किसी भी समय सीमा को निर्दिष्ट किए बिना "जल्द से जल्द" लौटाया जाए। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">चीफ़ जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदुरकर की खंडपीठ ने तमिलनाडु राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले सीनियर एडवोकेट डॉ अभिषेक मनु सिंघवी की दलीलें सुन रही थी, जिन्होंने तमिलनाडु के राज्यपाल मामले में दो-न्यायाधीशों की पीठ द्वारा निर्धारित 3 महीने की समय सीमा का समर्थन किया था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सिंघवी ने कहा कि राज्यपालों द्वारा विधेयकों को अनिश्चितकाल के लिए रोके जाने के मद्देनजर समयसीमा जरूरी है। CJI ने पूछा, "क्या हम राष्ट्रपति और राज्यपाल की शक्तियों के प्रयोग के लिए अनुच्छेद 142 के तहत एक सीधा फॉर्मूला बना सकते हैं?" सिंघवी ने न्यायालय से "हाथीदांत-टॉवर" दृष्टिकोण नहीं लेने और "भारी देरी की समकालीन वास्तविकताओं" से निपटने का आग्रह करते हुए कहा कि अनुच्छेद 200 और 201 के तहत शक्तियों के प्रयोग के लिए एक "सामान्य समयरेखा" आवश्यक है।</div>
<h4 style="text-align:justify;"> </h4>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>'समयसीमा तय करने के लिए हमें संविधान में संशोधन करना होगा। </strong></h4>
<div style="text-align:justify;">जस्टिस नाथ ने कहा कि एक सामान्य समयरेखा निर्धारित करना व्यावहारिक रूप से संविधान में संशोधन करने के समान होगा, क्योंकि अनुच्छेद 200 और 201 कोई समयरेखा निर्दिष्ट नहीं करते हैं। न्यायमूर्ति नाथ ने कहा, 'समयसीमा तय करने के लिए हमें संविधान में संशोधन करना होगा। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पीठ, विशेष रूप से जस्टिस नरसिम्हा और जस्टिस नाथ ने राज्यपाल/राष्ट्रपति द्वारा समयसीमा का पालन नहीं करने के परिणामों के बारे में पूछा। उन्होंने पूछा कि क्या राज्यपाल या राष्ट्रपति को अदालत की अवमानना के लिए फटकार लगाई जा सकती है। सिंघवी ने जवाब दिया कि विधेयकों को "सहमति माना गया" एक परिणाम हो सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान सिंघवी ने सीजेआई गवई द्वारा लिखे गए तीन जजों की खंडपीठ के हालिया फैसले का हवाला दिया, जिसमें तेलंगाना विधानसभा अध्यक्ष को तीन महीने के भीतर अयोग्यता याचिकाओं पर निर्णय लेने का निर्देश दिया गया था। सीजेआई ने बताया कि वहां, अदालत ने एक निर्देश जारी किया जो मामले के लिए विशिष्ट था। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पीठ ने कहा, ''हमने यह निर्देश नहीं दिया कि सभी विधानसभा अध्यक्षों को अयोग्य ठहराने की याचिकाओं पर तीन महीने के भीतर फैसला करना होगा। यह मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के लिए विशिष्ट था, "सीजेआई ने कहा। सिंघवी ने पेरारिवलन मामले पर भी भरोसा किया, जहां अदालत ने राजीव गांधी हत्या मामले में दोषियों को रिहा करने का निर्देश दिया था, यह घोषित करने के बाद कि उन्हें "सजा काट ली गई है", उनके माफी आवेदनों पर राज्यपाल की निष्क्रियता को देखते हुए। उन्होंने कहा, 'लेकिन ये व्यक्तिगत मामले हैं। अलग-अलग तथ्यात्मक विचार हो सकते हैं, "सीजेआई गवई ने कहा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सिंघवी ने कहा कि अगर राज्य को हर बार राज्यपाल द्वारा विधेयकों पर कार्रवाई करने से इनकार करने पर अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़े, तो इससे केवल देरी बढ़ेगी। "मामला-दर-मामला दृष्टिकोण समस्या का समाधान नहीं करेगा। अनुच्छेद 200 और 201 के लिए एक सामान्य समयरेखा की आवश्यकता होती है। यह लॉर्डशिप का इरादा नहीं हो सकता है कि मैं हर बार अदालत में वापस आता रहूं, "सिंघवी ने कहा। </div>
<div style="text-align:justify;">
<h4 style="text-align:justify;"> </h4>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>हम एक समय सीमा निर्धारित करेंगे, एक कठिन प्रस्ताव है। </strong></h4>
<div style="text-align:justify;">"अगर समयसीमा का पालन नहीं किया जाता है तो क्या होगा?" जस्टिस नाथ ने पूछा। सिंघवी ने जवाब दिया, "योर लॉर्डशिप के हाथ और कान लंबे और शक्तिशाली हैं जो यह सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त हैं कि इसका पालन किया जाए। जस्टिस नरसिम्हा ने तब कहा, "हम समयसीमा निर्धारित करते हैं, और फिर, मेरे भाई ने एक बहुत ही सही सवाल पूछा, फिर क्या? यदि यह एक प्रशासनिक आदेश है जो गैर-अनुपालन के लिए अमान्य हो जाता है, तो क्या किया जाना है? "जितनी जल्दी हो सके" प्रदान किया गया लचीलापन एक संवैधानिक मानदंड है। लेकिन जब मामले न्यायालय में जाते हैं और कोई कहता है कि काफी समय पहले ही लिया जा चुका है, तो यह व्यक्तिगत मामला बन जाता है। वहां, न्यायालय किसी भी प्रकार की शक्ति का प्रयोग कर सकता है। यहां तक कि 142 शक्ति भी। लेकिन यह कहना कि हम एक समय सीमा निर्धारित करेंगे, एक कठिन प्रस्ताव है। </div>
</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जस्टिस नरसिम्हा ने कहा कि अनुच्छेद 200 में केवल यह निर्दिष्ट किया गया है कि राज्यपाल को "जल्द से जल्द" फैसला करना चाहिए। न्यायाधीश ने पूछा, "क्या यह काफी नहीं है?" सिंघवी ने कहा कि मामले बताते हैं कि यह सामान्य जनादेश पर्याप्त नहीं था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सीजेआई गवई ने सामान्य समयरेखा के बारे में अपना संदेह दोहराया। पीठ ने कहा, व्यक्तिगत मामलों में पार्टियां अनुच्छेद 226 के तहत भी जा सकती हैं। लेकिन एक समयरेखा निर्धारित करना। अलग-अलग अत्यावश्यकताएं, विचार हो सकते हैं, जिनके लिए अलग-अलग अधिनियमों के लिए अलग-अलग समय-सीमा की आवश्यकता हो सकती है। लेकिन एक निश्चित समयरेखा प्रदान करना "। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>क्या हितों का टकराव होगा?</strong></h4>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सिंघवी ने अनूप बरनवाल मामले में संविधान पीठ के फैसले का भी हवाला दिया , जहां अदालत ने निर्देश दिया था कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और सीजेआई के पैनल द्वारा की जानी चाहिए, जब तक कि संसद कानून नहीं बना देती। सिंघवी ने कहा कि यह फैसला अदालत द्वारा संविधान में चुप्पी को भरने का एक उदाहरण है, जो वास्तविक दुनिया की बीमारी को दूर करने के लिए एक सामान्य निर्देश देता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सिंघवी ने कहा कि अनुच्छेद 200 के संदर्भ में, न्यायालय को "मामला-दर-मामला" दृष्टिकोण का पालन नहीं करना चाहिए। "समयरेखा वस्तु का पालन करने के लिए एक मार्गदर्शन होना है। यह मानते हुए कि समयरेखा का पालन नहीं किया जाता है, इसके साथ जुड़ा परिणाम माना जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जस्टिस नाथ ने तब पूछा कि क्या अदालत किसी विधेयक को सहमति देने की घोषणा करती है, और यदि विधेयक को बाद में अदालत के समक्ष चुनौती दी जाती है, तो क्या हितों का टकराव होगा? सिंघवी ने कहा कि सहमति की घोषणा करते हुए न्यायालय विधेयक के गुण-दोष में हस्तक्षेप नहीं कर रहा है। "सवाल यह है कि क्या अनुच्छेद 142 के तहत एक सामान्य समयसीमा दी जा सकती है," सीजेआई गवई ने सिंघवी की दलीलें समाप्त करने से पहले प्रश्न को दोहराया।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 03 Sep 2025 15:27:24 +0530</pubDate>
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