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                <title>vichardhara - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>कैम्पस की आज़ादी बनाम UGC का नया कानून – असली सच क्या है?</title>
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                        <![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;" align="center">  </p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ.दीपकुमार शुक्ल (स्वतन्त्र टिप्पणीकार)</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वर्तमान समय में भारत के न केवल उच्च शिक्षण संस्थानों बल्कि अन्य संस्थानों में भी शायद ही इस तरह के मामले कहीं देखने या सुनने में आते हों, जहाँ किसी के साथ जाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लिंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जन्म-स्थान और दिव्यांगता के आधार पर भेदभाव किया जाता हो| इसके बावजूद यदि यूजीसी का नया कानून लाना पड़ा तो निश्चित ही</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सरकार</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के पास इस तरह के आंकड़ें होंगे जिनसे यह पता चलता हो कि विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में जाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लिंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जन्म-स्थान और दिव्यांगता के आधार पर भेदभाव की घटनाएँ हो रही हैं।</span></p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/168283/campus-freedom-vs-new-ugc-law-%E2%80%93-what-is-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/deep-shukla-(3).jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;" align="center"> </p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ.दीपकुमार शुक्ल (स्वतन्त्र टिप्पणीकार)</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वर्तमान समय में भारत के न केवल उच्च शिक्षण संस्थानों बल्कि अन्य संस्थानों में भी शायद ही इस तरह के मामले कहीं देखने या सुनने में आते हों, जहाँ किसी के साथ जाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लिंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जन्म-स्थान और दिव्यांगता के आधार पर भेदभाव किया जाता हो| इसके बावजूद यदि यूजीसी का नया कानून लाना पड़ा तो निश्चित ही</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सरकार</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के पास इस तरह के आंकड़ें होंगे जिनसे यह पता चलता हो कि विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में जाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लिंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जन्म-स्थान और दिव्यांगता के आधार पर भेदभाव की घटनाएँ हो रही हैं। यह बिल </span>2012<span lang="hi" xml:lang="hi"> के पुराने दिशा-निर्देशों को प्रतिस्थापित करता है और अब कानूनी रूप से बाध्यकारी है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे </span>UGC Bill 2026<span lang="hi" xml:lang="hi"> कहा जा रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस बिल का मूल उद्देश्य यह बताया जा रहा है कि हर छात्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षक और कर्मचारी को समान अवसर मिले और किसी भी प्रकार का भेदभाव समाप्त हो। इसके लिए कई नयी व्यवस्थाएँ अनिवार्य की गयी हैं। प्रत्येक उच्च शिक्षा संस्थान को समान अवसर केन्द्र स्थापित करना होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो वंचित समूहों के लिए नीतियों और कार्यक्रमों की निगरानी करेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कानूनी सहायता प्रदान करेगा और सामाजिक विविधता को बढ़ावा देगा। इसके साथ ही </span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">इक्विटी </span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कमेटी और </span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">इक्विटी स्क्वॉड</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> का गठन किया जाएगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो परिसर में निरीक्षण करेंगे और भेदभाव की घटनाओं को रोकने के लिए रिपोर्ट देंगे। हर विभाग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुस्तकालय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हॉस्टल और अन्य इकाइयों में </span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">इक्विटी </span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अम्बेसडर</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नियुक्त किये जाएंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो समता के प्रतीक होंगे और शिकायत दर्ज कराने में मदद करेंगे। इसके अलावा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर संस्थान को समता हेल्पलाइन और ऑनलाइन पोर्टल बनाना होगा ताकि छात्र आसानी से अपनी शिकायत दर्ज कर सकें।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस बिल की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह केवल दिशा-निर्देश नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि कानूनन लागू है। इसके उल्लंघन पर कठोर दण्डात्मक कार्रवाई का प्रावधान किया गया है। यदि कोई संस्थान इन नियमों का पालन नहीं करता है तो </span><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वविद्यालय अनुदान आयोग</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">उसकी मान्यता रद्द कर सकता है</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi"> फण्डिंग </span><span lang="hi" xml:lang="hi">रोक सकता है और सार्वजनिक रूप से चेतावनी जारी कर सकता है। दोषी शिक्षक या कर्मचारी पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें नौकरी से निलम्बन या बर्खास्तगी शामिल हो सकती है। गम्भीर मामलों में कानूनी मुकदमा चलाया जाएगा और जेल तक की सज़ा भी दी जा सकती है। छात्रों की सुरक्षा के लिए विशेष प्रावधान किये गये हैं| ताकि शिकायत दर्ज करने वाले छात्र को प्रतिशोध से बचाया जा सके।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दण्डात्मक प्रक्रिया का विस्तृत उल्लेख इस बिल की सबसे बड़ी ताक़त है। पहले के दिशा-निर्देश केवल सलाह मात्र थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनका पालन करना संस्थानों की इच्छा पर निर्भर था। लेकिन अब यह कानूनन लागू है और इसके उल्लंघन पर कठोर कार्रवाई होगी। उदाहरण के लिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि किसी कॉलेज में जाति या धर्म के आधार पर प्रवेश से इनकार किया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह सीधे तौर पर बिल का उल्लंघन होगा और संस्थान पर कार्रवाई होगी। इसी तरह यदि किसी छात्र को दिव्यांगता के कारण सुविधाओं से वंचित किया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो दोषी कर्मचारी या अधिकारी पर अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हालाँकि इस बिल के क्रियान्वयन में कई चुनौतियाँ भी सामने आएंगी। छोटे कॉलेजों के लिए नये केन्द्र और समितियाँ बनाना कठिन होगा, क्योंकि उनके पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। कुछ छात्रों का मानना है कि इससे कैम्पस में और अधिक विभाजन हो सकता है। आलोचकों का कहना है कि बिना व्यापक परामर्श के इतना बड़ा बदलाव लागू करना जल्दबाज़ी है। इन चुनौतियों का समाधान सरकार को वित्तीय और तकनीकी सहायता देकर करना होगा। छात्रों और शिक्षकों को जागरूक करने के लिए कार्यशालाएँ और प्रशिक्षण आयोजित किये जाने चाहिए। </span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">इक्विटी स्क्वॉड</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> को स्वतन्त्र और पारदर्शी तरीके से काम करने देना होगा| ताकि यह केवल औपचारिकता न रह जाए बल्कि वास्तविक सुधार का साधन बने।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जैसी कि अपेक्षा की जा रही है कि इस बिल से उच्च शिक्षा संस्थानों में विविधता और समावेशन को बढ़ावा मिलेगा। विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों के बीच शैक्षणिक संवाद और स्वस्थ अन्तरवैयक्तिक सम्बन्धों का विकास होगा। इससे न केवल शिक्षा का स्तर ऊँचा होगा बल्कि समाज में भी समानता और न्याय की भावना मजबूत होगी। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों के दृष्टिगत इसके विपरीत  परिणाम मिलने की सम्भावना अधिक दिखाई दे रही है|</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">UGC Bill 2026<span lang="hi" xml:lang="hi"> के लागू होने के बाद सोशल मीडिया पर व्यापक बहस शुरू हो गयी है। कुछ लोग इसे शिक्षा संस्थानों पर अतिरिक्त बोझ मानते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि समर्थकों का कहना है कि यह छात्रों और शिक्षकों को सुरक्षित वातावरण देने के लिए आवश्यक है। इस खींचतान में कई भ्रान्तियाँ भी पैदा हो रही हैं। उदाहरण के लिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ लोग मानते हैं कि यह बिल केवल आरक्षण से जुड़ा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि वास्तविकता यह है कि इसका उद्देश्य सभी प्रकार के भेदभाव को समाप्त करना है</span><span lang="hi" xml:lang="hi">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">चाहे वह जाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लिंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जन्म-स्थान या दिव्यांगता के आधार पर हो। समाज का एक वर्ग इस बिल को उच्च वर्ग के साथ भेदभाव करने वाला बता रहा है| जिसके कारण समाज में जातीय वैमनस्य की खाई बढ़नी प्रारम्भ हो गयी है| जो किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है|</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बिल के अनुसार समता समिति का गठन प्रत्येक उच्च शिक्षा संस्थान में अनिवार्य रूप से किया जाएगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका उद्देश्य भेदभाव की शिकायतों की जाँच और समता केन्द्र के कार्यों का प्रबन्धन करना है। इस समिति के अध्यक्ष संस्थान प्रमुख</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span>(<span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे कुलपति या प्राचार्य) होंगे</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और इसमें तीन वरिष्ठ संकाय सदस्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक गैर</span><span dir="rtl" lang="ar-sa" xml:lang="ar-sa">-</span><span dir="rtl" lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षण कर्मचारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दो नागरिक समाज के प्रतिनिधि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दो विशेष आमन्त्रित छात्र प्रतिनिधि तथा समता केन्द्र का समन्वयक सदस्य </span><span dir="rtl" lang="ar-sa" xml:lang="ar-sa">-</span><span dir="rtl" lang="hi" xml:lang="hi">सचिव के रूप में शामिल होगा। समिति में अनुसूचित जाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जनजाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अन्य पिछड़ा वर्ग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्यांगजन और महिलाओं का प्रतिनिधित्व भी होना चाहिए। इसका कार्यकाल दो वर्ष का होगा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और यह वर्ष में कम से कम दो बार बैठक कर भेदभाव से सम्बन्धित मामलों की समीक्षा करेगी| इस समिति को लेकर भी कई तरह के भ्रम फैलाये जा रहे हैं|</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"> <span lang="hi" xml:lang="hi">सभी प्रकार के भ्रम दूर करने के लिए आवश्यक है कि संस्थान और सरकार स्पष्ट रूप से संचार करें। विश्वविद्यालयों को अपने छात्रों और कर्मचारियों को बिल की प्रति के साथ उसकी स्पष्ट व्याख्या करनी चाहिए| ताकि उन्हें पता चल सके कि यह बिल उनके अधिकारों की रक्षा करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि उन्हें सीमित करता है। सोशल मीडिया पर फैली गलत सूचनाओं का मुकाबला करने के लिए आधिकारिक पोर्टल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हेल्पलाइन और जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए। </span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">इक्विटी एम्बेसडर</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> और </span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">इक्विटी स्क्वॉड</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> को भी यह जिम्मेदारी दी जा सकती है कि वे छात्रों को सही जानकारी दें और अफवाहों का खण्डन करें।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके अलावा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मीडिया और प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि दण्डात्मक प्रावधानों को "सज़ा देने का हथियार" नहीं बल्कि "न्याय सुनिश्चित करने का साधन" के रूप में प्रस्तुत किया जाए। जब छात्रों और शिक्षकों को यह समझ आएगा कि यह बिल उनके हितों की रक्षा करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो भ्रम स्वतः दूर होगा। सोशल मीडिया पर चल रही बहस को सकारात्मक दिशा देने के लिए संवाद और पारदर्शिता सबसे बड़ा उपाय है। यदि विश्वविद्यालय नियमित रूप से अपने कदमों की जानकारी साझा करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इक्विटी सेंटर्स</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> छात्रों के साथ खुली चर्चा करें और शिकायत निवारण तन्त्र को पारदर्शी बनाया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो धीरे-धीरे यह खींचतान कम होगी और बिल को लेकर विश्वास बढ़ेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अन्ततः कहा जा सकता है कि </span>UGC Bill 2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">उच्च शिक्षा में समानता और समावेशन सुनिश्चित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। यह न केवल भेदभाव को रोकता है बल्कि इसके उल्लंघन पर कठोर दण्डात्मक कार्रवाई का प्रावधान करता है। इससे छात्रों और शिक्षकों को सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण मिलेगा। हालांकि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके सफल क्रियान्वयन के लिए प्रशासनिक सहयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वित्तीय संसाधन और सामाजिक जागरूकता बेहद ज़रूरी है। साथ ही सोशल मीडिया पर फैली भ्रान्तियों को दूर करने के लिए पारदर्शी संवाद और सही जानकारी का प्रसार आवश्यक है।</span></p>]]>
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                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 05 Feb 2026 16:48:06 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Swatantra Prabhat]]>
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                <title>प्रोफेशनल कोर्स महिलाओं को उनके करियर में नई ऊंचाई दे सकते हैं </title>
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                        <![CDATA[<div><strong>विजय गर्ग </strong></div>
<div>  </div>
<div>20वीं सदी अपने साथ औद्योगीकरण लेकर आई और शिक्षा भी लेकर आई जिसने काफी हद तक महिलाओं की दुर्दशा के प्रति समाज की आंखें खोल दीं। शिक्षा ने उनमें अपनी स्थिति को पुनः प्राप्त करने और सामान्य रूप से अपने लिंग और विशेष रूप से समाज की बेहतरी की दिशा में काम करने की आवश्यकता भी पैदा की। आधुनिक समय के आगमन ने समाज को काफी हद तक बदल दिया। यह परिवर्तन एकल परिवारों के उदय के साथ स्पष्ट हुआ जिसमें बेटे और बेटियों को समान अवसर दिए गए। बेटियों को अब अशिक्षित नहीं रखा गया और उन्हें</div>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/140285/professional-courses-can-give-women-new-heights-in-their-career"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-04/fb_img_1709944915787.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>विजय गर्ग </strong></div>
<div> </div>
<div>20वीं सदी अपने साथ औद्योगीकरण लेकर आई और शिक्षा भी लेकर आई जिसने काफी हद तक महिलाओं की दुर्दशा के प्रति समाज की आंखें खोल दीं। शिक्षा ने उनमें अपनी स्थिति को पुनः प्राप्त करने और सामान्य रूप से अपने लिंग और विशेष रूप से समाज की बेहतरी की दिशा में काम करने की आवश्यकता भी पैदा की। आधुनिक समय के आगमन ने समाज को काफी हद तक बदल दिया। यह परिवर्तन एकल परिवारों के उदय के साथ स्पष्ट हुआ जिसमें बेटे और बेटियों को समान अवसर दिए गए। बेटियों को अब अशिक्षित नहीं रखा गया और उन्हें आगे पढ़ने की इजाजत दी गई। शिक्षा से महिलाओं में उन अधिकारों और विशेषाधिकारों के बारे में जागरूकता आई जो पहले उन्हें नहीं दिए जाते थे। कानून ने भी उनका समर्थन किया और कन्या भ्रूण हत्या को समाप्त कर दिया गया, साथ ही दहेज प्रथा में शामिल लोगों को कड़ी सजा दी गई। घरेलू और विदेशी मीडिया के प्रभाव ने उन्हें उदारवादी विचार प्राप्त करने में मदद की। उन्हें उन्नत देशों में महिलाओं द्वारा की गई प्रगति का एहसास हुआ। पश्चिम की महिला उद्यमियों की सफलता ने भारतीय महिलाओं को भी प्रभावित किया और उन्हें पराधीनता पर सवाल उठाने की जरूरत महसूस हुई। उदार विचारों और माता-पिता के समर्थन के साथ शिक्षा ने महिलाओं को पुरुष-प्रधान समाज में एक नई पहचान हासिल करने में मदद की।</div>
<div> </div>
<div>कुल मिलाकर महिलाओं की स्थिति में प्रत्यक्ष परिवर्तन आने लगा। महिलाओं ने श्रम बाज़ार में प्रवेश करना शुरू कर दिया और उनकी संख्या बढ़ने लगी। उन्होंने वाणिज्य में भी कदम रखा और आज के व्यवसायों का शाब्दिक और आलंकारिक रूप से स्वामित्व लेना और उनका चेहरा बदलना शुरू कर दिया। पिछले दशक में महिलाओं के स्वामित्व वाले व्यवसायों में गतिशील वृद्धि और विस्तार देखा गया है। राजस्व और रोजगार में विस्तार भी संख्या में वृद्धि से कहीं अधिक है। खेल की पुरुष-उन्मुख अवधारणा में भी बदलाव आया। महिलाओं को अब पुरुषों, महिलाओं की मैराथन के साथ लंबी दूरी की स्पर्धाओं में प्रतिस्पर्धा करने की अनुमति दी गई। महिलाओं ने उन क्षेत्रों में भी प्रवेश किया है जो पुरुषों के लिए ही माने जाते थे, जैसे ड्राइविंग, अंतरिक्ष, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग, वास्तुकला आदि। कल्पना चावला, पी.टी. जैसी महिलाएं। उषा, सानिया मिर्जा, प्रतिभा पाटिल और कई अन्य लोग पारंपरिक रास्ते तोड़ रहे हैं और दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। आज उनमें भेदभाव से लड़ने के प्रति जागरूकता बढ़ी है। पारंपरिक लैंगिक रूढ़ियाँ जो बताती थीं कि महिलाओं की प्राथमिक सामाजिक भूमिकाएँ पत्नी और माँ थीं, जबकि पुरुषों की भूमिका कमाने वाले की थी, लंबे समय से बदलाव आ रहा है। आज की महिलाएं वैश्विक अर्थव्यवस्था और अपने आसपास के समुदायों में योगदान दे रही हैं। कार्यस्थल पर महिलाओं की उपस्थिति उनके रोजगार और व्यावसायिक वातावरण पर भी जबरदस्त प्रभाव डाल रही है। पारिवारिक जीवन में महिलाओं की भूमिका में भी काफी बदलाव आया है। एक शिक्षित गृहिणी के रूप में, या एक कामकाजी महिला के रूप में उन्होंने समाज में सम्मानजनक स्थान प्राप्त किया है। आज की महिलाएँ, विशेष रूप से युवा महिलाएँ, उच्च शैक्षिक आकांक्षाओं और एक ही समय में अधिक महत्वाकांक्षाओं के साथ, अधिक कैरियर-उन्मुख हो रही हैं।</div>
<div> </div>
<div>अपने करियर के बावजूद, वे अभी भी पारंपरिक रूप से उन पर रखे गए मूल्य, परिवार और पालन-पोषण को बरकरार रखे हुए हैं। कैरियर उन्मुख महिलाओं के उद्भव के प्रभाव कैरियर उन्मुख महिलाओं के उद्भव के सकारात्मक प्रभाव प्रासंगिक शिक्षा, कार्य अनुभव, आर्थिक स्थिति में सुधार और वित्तीय अवसरों के साथ, महिलाएं सफल व्यावसायिक उद्यम बना रही हैं और उन्हें कायम रख रही हैं। इसका न केवल प्रभाव पड़ता हैइससे देश की अर्थव्यवस्था ही नहीं बल्कि समाज में महिलाओं की स्थिति भी बदल रही है। प्रगतिशील महिलाओं का उन महिलाओं पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है जो उन देशों में रहती हैं जहां महिलाएं अभी भी उत्पीड़ित हैं। वे उनसे प्रेरित होते हैं और यह उन्हें उत्पीड़न से लड़ने के लिए प्रेरित करता है। विकसित देशों में महिलाओं की स्थिति को देखकर अविकसित और विकासशील देश दबाव महसूस करते हैं। महिलाओं की स्थिति किसी देश की प्रतिष्ठा और अर्थव्यवस्था को विकसित या अविकसित होने से प्रभावित करती है। कामकाजी महिलाएं घरेलू आय में मदद करती हैं, जिससे पूरे परिवार का कल्याण होता है। करियर ओरिएंटेड महिलाएं शिक्षित होती हैं। और शिक्षित जनसंख्या उच्च साक्षरता दर में परिवर्तित होती है और यह भी सुनिश्चित करती है कि परिवार और समाज में भी साक्षरता की निरंतरता बनी रहे। इससे देश की पूंजी और मेहनत की काफी बचत होती है। धन की पर्याप्त उपलब्धता का अर्थ चिकित्सा सेवाओं तक पहुंच भी है जो अच्छे स्वास्थ्य वाली उच्च जनसंख्या का संकेतक है। क्योंकि महिलाएं पुरुषों की तुलना में अलग तरह से सोचती हैं, वे विभिन्न प्रकार के दृष्टिकोण, विचार, योजनाएं आदि प्रदान करती हैं जो किसी भी संगठन का एक आवश्यक हिस्सा हैं। कैरियर उन्मुख महिलाओं के उद्भव के नकारात्मक प्रभाव इस उद्भव का दूसरा पहलू बदली हुई जीवनशैली है जिसमें देरी से शादी और उसके बाद पहले बच्चे के जन्म में देरी शामिल है।</div>
<div> </div>
<div>जैसे-जैसे अधिक महिलाएं कामकाजी पेशेवर बनती जा रही हैं, उन्हें मूत्र संबंधी अनेक विकारों का सामना करना पड़ रहा है। इनमें कलंक से घिरे मूत्र और आंत्र असंयम से लेकर स्तन कैंसर जैसी जीवन-घातक स्थिति तक यूरोगायनेकोलॉजिकल रोग शामिल हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि मूत्र संबंधी विकार एक महिला के जीवन में शारीरिक परिवर्तनों से उत्पन्न होते हैं जो पेल्विक फ्लोर को नुकसान पहुंचाते हैं। चिकित्सा चिकित्सक निवारक तरीकों के रूप में सरल जीवनशैली में बदलाव, संतुलित आहार और पेल्विक फ्लोर व्यायाम की सलाह देते हैं। हमारे समाज में रूढ़िवादी तत्व अभी भी मां/गृहिणी के विचार को त्यागने के लिए महिलाओं की आलोचना करते हैं और युवाओं में नशीली दवाओं के उपयोग के बढ़ते स्तर और अन्य समस्याओं के लिए कैरियर-उन्मुख महिलाओं के उद्भव को दोषी मानते हैं। आज की अधिकाधिक महिलाएँ कॉरपोरेट की सीढ़ियाँ चढ़ रही हैं और सत्ता के पदों पर आसीन हो रही हैं। और उनके पति घरेलू मोर्चे पर कामकाज में भाग लेते हैं। लेकिन लिंग भूमिकाओं में बदलाव से जोड़ों के रिश्ते पर असर पड़ता है, क्योंकि कई बार इसका परिणाम तलाक और टूटे रिश्ते के रूप में सामने आता है। महिलाओं की बदलती भूमिका उनकी बांझपन में भी बदलाव ला रही है। जंक फूड के बढ़ते सेवन के साथ-साथ, जिसमें ज्यादातर एडिटिव्स और हार्मोन से युक्त मांस शामिल होते हैं, महिलाएं कई साझेदारों और कैज़ुअल लवमेकिंग को भी प्रोत्साहित करती हैं। इसके परिणामस्वरूप यौन संचारित रोग और बाद में बांझपन होता है। गोनोरिया और सिफलिस जैसे यौन रोग, पिछले गर्भपात और धूम्रपान के साथ मिलकर, जो धीरे-धीरे महिलाओं में आम हो गया है, गर्भधारण को रोक सकता है और कभी-कभी गर्भपात का कारण बन सकता है। वेतनभोगी कार्यबल में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी ने बच्चों की देखभाल के लिए उपलब्ध रिश्तेदारों की संख्या में काफी कमी ला दी है।</div>
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<div>इसके परिणामस्वरूप, महिलाएं या तो संगठित बाल-देखभाल सुविधाओं पर भरोसा करके या अपनी व्यक्तिगत रोजगार शैली में बदलाव करके, जैसे घर से काम करना या अंशकालिक काम करके, बाल देखभाल की मांगों से निपटने का प्रयास कर रही हैं। अपने बच्चों को पर्याप्त बाल देखभाल प्रदान करने की ज़िम्मेदारी उठाने के अलावा, महिलाएं अपराध की भावना का अनुभव भी कर सकती हैं यदि वे कम से कम अपने खाली समय में से कुछ इस कार्य के लिए समर्पित नहीं करती हैं। इसलिए, कुछ महिलाएं अपनी नींद या खाली समय की मात्रा कम कर सकती हैं जिसके परिणामस्वरूप ओ का संचय होता हैएफ तनाव और तनाव. कई पुरुषों और महिलाओं का मानना ​​है कि कामकाजी जोड़ों को घरेलू जिम्मेदारियां साझा करनी चाहिए। फिर भी कामकाजी महिलाएँ आज भी घरेलू माँगों की ज़िम्मेदारी निभा रही हैं क्योंकि घर का काम महिलाओं के काम से जुड़ा हुआ है। यह बढ़ा हुआ काम का बोझ महिलाओं के लिए ठीक से आराम करना मुश्किल बना देता है, जिसके परिणामस्वरूप उनकी शारीरिक और मानसिक सेहत को खतरा होता है वे भूमिका की अधिकता के भी शिकार होते हैं। महिलाओं की अन्य जीवन भूमिकाएँ भी होती हैं जिन पर वे एक साथ काम कर सकती हैं। अनेक भूमिकाओं वाली एक महिला एक बेटी, बहन और समुदाय सदस्य की भूमिका निभा सकती है।</div>
<div> </div>
<div>इस प्रकार, इन व्यक्तिगत, व्यावसायिक, मनोरंजक और नागरिक भूमिकाओं को एक साथ निभाया जाना चाहिए। इनमें से एक या अधिक भूमिकाओं को पूरा करने के दूरगामी परिणाम होते हैं एक करियर महिला की राह कभी भी आसान या आसान नहीं रही है। हालाँकि महिलाओं की स्थिति को समतल करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है, फिर भी उन्हें अपनी व्यावसायिक स्वीकृति और उन्नति में बाधाओं का सामना करना पड़ता है। कई क्षेत्रों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अभी भी काफी कम है। लेकिन, कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी की अधिकांश स्पष्ट बाधाएँ समाप्त हो गई हैं। भारतीय पुरूषों की मानसिकता भी कुछ हद तक बदल रही है। वे अब इस विचार को स्वीकार कर रहे हैं कि बहुत सारे व्यावसायिक पाठ्यक्रम महिलाओं को शादी के बाद भी उनके करियर में नई ऊंचाइयां दे सकते हैं और कुछ अपनी पत्नियों को शादी के बाद भी अपनी नौकरी जारी रखने के लिए समर्थन देते हैं। वास्तव में महिलाएं समान अवसर और अपने करियर पर नियंत्रण की तलाश में बहुत आगे आ गई हैं। इन रुझानों का नतीजा यह है कि महिलाएं सफलता हासिल कर रही हैं और उनकी सफलता का पैमाना राजस्व, रोजगार और जीवन की लंबी उम्र हो सकता है। यह महिला उद्यमिता को मजबूत करने के सरकारी कार्यक्रमों और नीतियों को मजबूत करता है। </div>
<div>विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य शैक्षिक स्तंभकार मलोट </div>]]>
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                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 13 Apr 2024 19:44:55 +0530</pubDate>
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                <title>जैसा प्रदेश वैसे ही मुद्दे</title>
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                        <![CDATA[<p><strong>स्वतंत्र प्रभात: जितेन्द्र सिंह पत्रकार</strong></p><p>चुनाव की घंटी बज चुकी है, पांच राज्यों में स्थितियां अलग अलग हैं इसलिए एक ही मुद्दे पर चुनाव लड़ पान प्रत्येक पार्टी के लिए मुश्किल है। पार्टियों ने प्रदेश की स्थिति के अनुसार ही मुद्दे उछालने शुरू कर दिए हैं। हर राज्य में न तो हिंदुत्व के सहारे चुनाव जीता जा सकता है और न ही जातिगत तरीके से। कहीं आदिवासियों के विकास का मुद्दा है तो कहीं जाति विशेष का मुद्दा उठा है। हिंदुत्व को वहीं उठाया जा रहा है जहां अन्य मुद्दों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता दिखाई दे रहा है। मध्यप्रदेश,</p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/135746/same-issue-as-the-state"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-10/untitled_design__20_.png" alt=""></a><br /><p><strong>स्वतंत्र प्रभात: जितेन्द्र सिंह पत्रकार</strong></p><p>चुनाव की घंटी बज चुकी है, पांच राज्यों में स्थितियां अलग अलग हैं इसलिए एक ही मुद्दे पर चुनाव लड़ पान प्रत्येक पार्टी के लिए मुश्किल है। पार्टियों ने प्रदेश की स्थिति के अनुसार ही मुद्दे उछालने शुरू कर दिए हैं। हर राज्य में न तो हिंदुत्व के सहारे चुनाव जीता जा सकता है और न ही जातिगत तरीके से। कहीं आदिवासियों के विकास का मुद्दा है तो कहीं जाति विशेष का मुद्दा उठा है। हिंदुत्व को वहीं उठाया जा रहा है जहां अन्य मुद्दों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता दिखाई दे रहा है। मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, और मिजोरम सभी राज्यों के मुद्दे अलग अलग हैं। </p><p>जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आदिवासी बहुल इलाकों में रैली करते हैं तो कहते हैं कि उन्होंने अपने जीवन का काफी समय आदिवासियों के बीच गुज़ारा है तो हम आदिवासियों की समस्याओं को अच्छी तरह से समझते हैं। वहीं कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी जब मध्यप्रदेश में रैली करते हैं तो जातीय गणना का मुद्दा उठाने की पूरी कोशिश करते हैं। वैसे अगर मध्यप्रदेश और राजस्थान के विधानसभा चुनावों की बात की जाये तो यहां हिंदुत्व और जाति कार्ड का खेल होना तय है। क्यों कि यहां कि स्थिति उत्तर प्रदेश से काफी मेल खाती हुई दिखाई देती है। </p><p>राजस्थान और मध्यप्रदेश के काफी हिस्से में गुर्जरों की समस्याओं का चुनाव में काफी अहम रोल रहता है। इसलिए गुर्जर प्रभावी क्षेत्रों में कांग्रेस और भाजपा ने अपने वरिष्ठ नेताओं को इन इलाकों में उनको साधने के लिए। उनके रोल तय कर दिए हैं। छत्तीसगढ़ तेलंगाना और मिजोरम के आदिवासी क्षेत्रों में आदिवासी नेताओं को तैनात कर दिया गया है। और उनकी मांगों या जरुरतों के हिसाब से मुद्दे तय किए गए हैं। कुल मिलाकर स्थिति यही है कि जैसा क्षेत्र और वैसे ही मुद्दों को उठाया जा रहा है।</p><div>बिहार की जाति गणना के सार्वजनिक होने के बाद से राहुल गांधी ने पूरे देश में जाति गणना कराने की मांग को मुद्दा बना दिया है और वह अपने हर मंच से केन्द्र सरकार द्वारा जातीय गणना कराने की मांग कर रहे हैं। राहुल गांधी का कहना है कि यदि उनके गठबंधन की सरकार बनती है तो वह देश में जातीय गणना अवश्य कराएंगे जिससे हर जाति को उसकी संख्या बल के हिसाब से समाज में हिस्सेदारी मिल सके। </div><div><br /></div><div>लेकिन भारतीय जनता पार्टी जातीय गणना के मुद्दे पर बात करने से बच रही है। उसका मानना यह है कि जातियों से बांटने में हिंदुत्व का मुद्दा दब जायेगा और इसीलिए वह विपक्ष पर आरोप लगा रही है कि वह हिंदुओं के जातियों में बाटने की राजनीति कर रहा है। लेकिन वहीं उत्तर प्रदेश में देखा जाए तो उसके घटक दल भी जातीय गणना का समर्थन कर रहे हैं और सारे देश में जातीय गणना की मांग कर रहे हैं। </div><div><br /></div><div>और जातीय समीकरण साधने के लिए भाजपा समर्थित गठबंधन एनडीए इन जातिवादी दलों को अपने साथ जोड़े हुए है। कुल मिलाकर भाजपा सामने न आकर अपने घटक दलों के द्वारा जाति समीकरण साधे हुए है। प्रत्याशियों का चयन भी जातीय समीकरण को साधते हुए किया जाता है। कोई भी दल कितना भी जाति गणना से अलग दिखे लेकिन जब प्रत्याशियों की लिस्ट तैयार की जाती है तो उसमें जातिगत समीकरण को सीधे तौर पर देखा जा सकता है।</div><div><br /></div><div>म.प्र. का ग्वालियर चंबल संभाग में बिना क्षत्रिय वोटों को साधे समीकरण तैयार नहीं किया जा सकता। क्यों कि इन क्षेत्रों में अच्छी खासी संख्या क्षत्रियों की है और इसके बाद गुर्जरों की संख्या भी यहां काफी मायने रखती है। इस क्षेत्र में पहले कभी माधव राव सिंधिया का अच्छा खासा प्रभाव था जो कि उनके बाद उनके पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया ने संभाला है। लेकिन इस बार इस क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी को कांग्रेस से काफी कांटे की टक्कर मिलती दिखाई दे रही है। भारतीय जनता पार्टी ने सनातन का मुद्दा उत्तर प्रदेश से उठाना शुरू किया था। </div><div><br /></div><div>लेकिन अब वह देश भर में इस मुद्दे को उठाने की कोशिश कर रही है। क्यों कि हिंदुत्व से भी अधिक सनातन धर्म को समर्थन मिल रहा है। देश में अधिकांश संख्या तो हिन्दू धर्म की है ही लेकिन उसमें तमाम जातियां समाहित हैं । और वहां अन्य जातिगत पार्टियां अपने अपने हिस्से के वोट का विभाजन करा लेती हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए भारतीय जनता पार्टी ने सनातनी हिंदुओं का मुद्दा उछाल दिया है। </div><div><br /></div><div>अब वह हिंदुत्व कम और सनातनी हिन्दू ज्यादा प्रयोग कर रहे हैं। और इसका अच्छा खासा प्रभाव युवाओं पर पड़ा भी है। सनातन के नाम से ही एक खास हिंदू की पहचान होती है। विपक्ष अपने को हिन्दू तो आसानी से बतायेगा लेकिन सनातनी बताने में उसको भी असहजता का एहसास होगा। क्यों कि सनातन धर्म के मायने और उसके संस्कार अलग हैं ।</div><div><br /></div><div>देश के पांचों राज्यों में जहां नवंबर दिसंबर में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। सभी में अपने अपने मुद्दे व समस्याएं हैं। और उन्हीं को देखते हुए रणनीति तैयार कर एक दूसरे को घेरने की कोशिश की जा रही है अब देखना यह है कि कौन किसको कितना घेर सकता है और किन मुद्दों पर जनता को प्रभावित कर सकता है। तेलंगाना और मिजोरम की स्थिति वाकी के इन राज्यों से अलग है। यहां क्षेत्रीय पार्टियों का दबदबा कायम है। </div><div><br /></div><div>कांग्रेस और भाजपा तो केवल उनका समर्थन कर सकती हैं। वाकी के तीन राज्यों में भाजपा और कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर की संभावना दिखाई दे रही है। छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल सरकार को मजबूत स्थिति में देखा जा रहा है और मध्य प्रदेश और राजस्थान में दोनों दलों कांग्रेस और भाजपा के बीच कांटे का मुकाबला होने की उम्मीद है। प्रत्याशियों के चयन में भारतीय जनता पार्टी ने तेजी दिखाई है वहीं कांग्रेस अभी भी तमाम जगहों पर प्रत्याशियों के चयन पर उलझी हुई है। </div><div><br /></div><div>अभी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के एवीपी और सी-वोटर के सर्वे में मुकाबला एक दम कांटे का बताया गया है जिसमें कांग्रेस को भारतीय जनता पार्टी से कुछ बढ़त मिलती दिखाई दे रही है। चुनाव को अब ज्यादा समय नहीं बचा है तो सभी पार्टियों में हलचल तेज हो गई है। देखना यह है कि कौन सी पार्टी किस मुद्दे से मतदाताओं को प्रभावित कर सकती है। हिंदुत्व का मुद्दा कितना असर करेगा और जातीय गणना से कितना असर डाल पायेगा विपक्ष।</div>]]>
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                                                            <category>संपादकीय</category>
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                <pubDate>Wed, 11 Oct 2023 11:54:44 +0530</pubDate>
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                <title>370 हटा कर नमो सरकार ने पूरा किया मुखर्जी का मिशन : डॉ. चौहान</title>
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                        <![CDATA[पटना में जुटे विपक्षियों को भाजपा की खुली चुनौती]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/131191/namo-government-fulfilled-mukherjees-mission-dr-chauhan-by-removing-370"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-06/पटना-में-जुटे-विपक्षियों-को-भाजपा-की-खुली-चुनौती.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong>करनाल: </strong></p>
<p>भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता और ग्रामोदय न्यास के अध्यक्ष डॉ वीरेंद्र सिंह चौहान ने कहा है कि भारत में जम्मू कश्मीर के संपूर्ण संवैधानिक अधिमिलन के लिए संघर्ष प्रारंभ कर जम्मू कश्मीर की धरती पर अपने प्राण न्योछावर करने वाले डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारतीय जनसंघ के संस्थापक थे।</p>
<p>यही जनसंघ आगे चलकर 1980 में भारतीय जनता पार्टी बना। भारतीय जनता पार्टी के प्रत्येक कार्यकर्ता को गर्व है  कि केंद्र की भाजपा नीत मोदी सरकार ने अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35-ए को समाप्त कर स्वर्गीय डॉ. मुखर्जी के अधूरे मिशन को पूरा कर दिया है। आज भारत का संविधान अपनी संपूर्णता में जम्मू कश्मीर और लद्दाख पर लागू होता है। डॉ. चौहान स्वर्गीय डॉक्टर श्यामा मुखर्जी के बलिदान दिवस के उपलक्ष में पार्टी कार्यकर्ताओं से संवाद कर रहे थे।</p>
<p>डॉ.वीरेंद्र सिंह चौहान ने कहा कि आजादी के समय जम्मू कश्मीर के तत्कालीन महाराजा हरि सिंह ने अपनी पूरी रियासत का भारतवर्ष में अधिमिलन ( एक्सेशन ) ठीक उसी तरह किया था जैसे साड़ी 500 से अधिक अन्य रजवाड़ों ने। मगर तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू और वहां के मुस्लिम परस्त राजनेता शेख अब्दुल्ला की दोस्ती ने देश के संविधान में अनुच्छेद 370 नामक काला उपबंध जुड़वा दिया।</p>
<p>भाजपा प्रवक्ता डॉ वीरेंद्र सिंह चौहान ने कहा कि कई मायनों में 370 से ज्यादा घातक अनुच्छेद 35-ए था जिसे संविधान का हिस्सा बनाने के लिए देसी भारत की संसद की अनुमति भी नहीं ली गई थी। इन दोनों प्रावधानों के कारण जम्मू कश्मीर राज्य मैं भारत का पूरा संविधान लागू नहीं हो सकता था। वहां के लाखों की संख्या में अनुसूचित जाति के लोग सफाई कर्मचारी के अलावा दूसरा काम करने के लिए स्वतंत्र नहीं थे। देश के अन्य हिस्सों के लोग इस राज्य में संपत्ति खरीदने से भी वंचित थेऔर तो और जम्मू कश्मीर का अपना अलग संविधान ,निशान ( झंडा) व प्रधान कायम रहा।</p>
<p> </p>
<p>उन्होंने कहा डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की अगुवाई में 'एक देश में एक विधान, एक निशान और एक प्रधान' के नारे के साथ जो आंदोलन शुरू हुआ, उसके तहत स्वर्गीय डॉ. मुखर्जी परमिट व्यवस्था का उल्लंघन कर तत्कालीन जम्मू कश्मीर में दाखिल हुए थे। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और हिरासत में रहस्यमई परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गई। चौहान ने कहा जम्मू कश्मीर के लिए प्राण गंवाने वाले डॉ. मुखर्जी का सपना नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी की संपूर्ण बहुमत वाली सरकार ने एक झटके में पूरा कर डाला।</p>
<h5><strong>विपक्ष का हाथ अलगाव के साथ</strong></h5>
<blockquote class="format2">
<blockquote class="format1">
<h5>भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता डॉ वीरेंद्र सिंह चौहान ने कहा कि बिहार के पटना में गत दिवस हुई मोदी विरोधी राजनीतिक दलों की बैठक भारत विरोधी तत्वों का जमावड़ा साबित हुई है। इस बैठक में जम्मू कश्मीर के अलगाववादी राजनीतिक दल एक बार फिर धारा 370 दोबारा लागू करने की मांग करते सुनाई दिए।</h5>
<h5>पीडीपी की महबूबा मुफ्ती और नेशनल कांफ्रेंस के फारूक अब्दुल्ला द्वारा प्रस्तावित 'ठग-बंधन' में शामिल होने की यही शर्त लगाई गई है। कांग्रेस पार्टी दिखाई नेता 370 नाम के काले प्रावधान को फिर बहाल करने की बात कर चुके हैं। चौहान ने कहा कि भारत की जनता पार्टी कि सरकार द्वारा हटाया गया 370 अनुच्छेद बहाल करने की बात करने वालों को भारत की जनता कभी सत्ता के आसपास भी नहीं फटकने देगी। कांग्रेस और उसके साथी अगर मुफ्ती और अब्दुल्ला की देश विरोधी मांग को मानेंगे तो वे अपने हाथों अपनी राजनीतिक कब्र खोदने का काम करेंगे।</h5>
</blockquote>
</blockquote>]]>
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                                                            <category>विचारधारा</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 24 Jun 2023 16:58:06 +0530</pubDate>
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                <title>हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ कब तक?</title>
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<p>फिल्म आदिपुरुष भगवान राम पर बनी इस फिल्म का देशव्यापी विरोध हो रहा है। कई लोगों को फिल्म के डायलॉग पसंद नहीं आ रहे हैं तो कुछ लोगों को राम बने प्रभास का लुक पसंद नहीं आ रही है। घनी मूंछे, योद्धाओं जैसे शरीर वाले प्रभास में लोगों को भगवान राम की शालीनता खल रही है। आदिपुरुष का विरोध केवल भारत तक सीमित नहीं है। नेपाल में थिएटर मालिकों का कहना है कि जब तक फिल्म के कुछ डायलॉग हटाए नहीं जाते हैं, फिल्म को नेपाल में रिलीज नहीं होने दिया जाएगा। सोशल मीडिया पर लोग कह रहे हैं कि</p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/130906/how-long-will-you-play-with-the-religious-sentiments-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-06/हिन्दुओं-की-धार्मिक-भावनाओं-से-खिलवाड़-कब-तक.jpg" alt=""></a><br /><p> </p>
<p>फिल्म आदिपुरुष भगवान राम पर बनी इस फिल्म का देशव्यापी विरोध हो रहा है। कई लोगों को फिल्म के डायलॉग पसंद नहीं आ रहे हैं तो कुछ लोगों को राम बने प्रभास का लुक पसंद नहीं आ रही है। घनी मूंछे, योद्धाओं जैसे शरीर वाले प्रभास में लोगों को भगवान राम की शालीनता खल रही है। आदिपुरुष का विरोध केवल भारत तक सीमित नहीं है। नेपाल में थिएटर मालिकों का कहना है कि जब तक फिल्म के कुछ डायलॉग हटाए नहीं जाते हैं, फिल्म को नेपाल में रिलीज नहीं होने दिया जाएगा। सोशल मीडिया पर लोग कह रहे हैं कि यह फिल्म मूल रामायण का अपमान है, इसमें धार्मिक कथाओं को अलग तरीके से पेश किया गया है। इसे हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ बताया जा रहा है ।</p>
<p>दरअसल यह फिल्म अपने टीजर के लॉन्च के दिनों से ही विवादों के केंद्र में है। लोग इस फिल्म की कॉस्ट्यूम डिजाइन से लेकर संवाद आदायगी तक पर सवाल खड़े कर रहे हैं। कई हिंदू संगठनों ने इस फिल्म पर बैन लगाने की मांग की है।  फिल्म पर बैन लगाने को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट में एक अर्जी दाखिल की गई है। याचिका में कहा गया है कि सेंसर बोर्ड की ओर से जारी होने वाले सर्टिफिकेट पर रोक लगा दी जाए।</p>
<p>नेपाल में थिएटर मालिक इस बात से नाराज हैं कि आदिपुरुष में सीता मां को भारत की बेटी बताया गया है। काठमांडू मेट्रोपॉलिटन सिटी के मेयर ने मांग की है कि अगर यह लाइन हटाई नहीं जाती है तो फिल्म को रिलीज नहीं होने दिया जाए। फिल्म में एक डायलॉग है 'जानकी भारत की बेटी है।' सीता मां का मायका, माना जाता है कि जनकपुर में है, जो नेपाल में है। इस डायलॉग को लेकर अब सवाल खड़े किए जा रहे हैं।</p>
<p>प्रभास इस फिल्म में राम बने हैं। सीता की भूमिका में हैं कृति सैनन और रावण बने हैं सैफ अली खान। सैफ अपने लुक को लेकर ट्रोल हो रहे हैं। लोगों को सबसे ज्यादा ऐतराज फिल्म में किरदारों के लुक पर है। ज्यादातर लोगों को फिल्म के किरदारों का कास्ट्यूम पंसद नहीं आ रहा है। कुछ लोगों का कहना है कि राम, न तो राम लग रहे हैं, लक्ष्मण का लुक भी मैच नहीं कर रहा है। हनुमान का लुक, रामानंद सागर वाले रामायण से बिलकुल अलग है। लोग, अरुण गोविल के लुक से प्रभास की तुलना कर रहे हैं, जो उनके लुक से बेहद उलट है। यह लोगों को रास नहीं आ रहा है।</p>
<p>लोगों का मानना  हैं कि सैफ अली खान का रावण वाला लुक भी बेहद बुरा है। फिल्म के टीजर से लेकर ट्रेलर तक पर बवाल हो रहा है। 2022 से ही इस फिल्म पर विवाद जारी है। आदिपुरुष फिल्म के निर्माता ओम राउत, प्रभास, सैफ अली खान समेत 5 लोगों के खिलाफ पहली बार 2022 में यूपी के जौनपुर में केस दर्ज हुआ। फिल्म पर भगवान राम, हनुमान, सीता और रावण के किरदारों का अभद्र चित्रण करने का आरोप लगा। शिकायतकर्ता ने कहा कि फिल्म धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचा रही है।</p>
<p>आदिपुरुष के खिलाफ यहाँ मुंबई में भी शिकायत दर्ज हुई है। आरोप है कि यह फिल्म रामचरित मानस के पात्र राम के किरदार को गलत तरीके से दर्शा रही है। हिंदू धर्म समाज ने भी धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने का आरोप लगाया है। कुछ लोगों को किरदारों के जनेऊ न पहनने पर भी ऐतराज है। यह फिल्म रिलीज होने से पहले ही विवादों में घिरी है।</p>
<p><br />कृष्ण देव, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े हैं। उन्होंने फिल्म का ट्रेलर देखने के बाद कहा कि इस फिल्म के सभी पात्रों को बेमन से चुना गया है। सुपरस्टार के भरोसे फिल्म हिट कराने की कोशिश की गई है। रावण से लेकर हनुमान तक के किरदार ऐसे हैं जो देखने में विदूषक लग रहे हैं। सबके कपड़े, रामायण में वर्णित किरदारों के स्वरूप से बिलकुल भी नहीं मिलते हैं।</p>
<p>दर्शकों का मानना है कि धार्मिक फिल्म को भी बंबइया फिल्म बना दिया है। ऐसा लग रहा है कि सलमान खान की फिल्मों के डायलॉग चल रहे हैं। एक सीन में भगवान हनुमान का डायलॉग है- कपड़ा तेरे बाप का, तेल तेरे बाप का, जलेगी भी तेरे बाप की।' दूसरे सीन में अशोक वाटिका के रखवाले हनुमान से कहते हैं- तेरी बुआ का बगीचा है क्या जो हवा खाने चला आया। फिल्म में 'जो हमारी बहनों को हाथ लगाएंगे उकी लंगा देंगे, आप अपने काल के लिए कालीन बिछा रहे हैं और मेरे एक सपोले ने तु्म्हारे शेषनाग को लंबा कर दिया, अभी तो पूरा पिटारा भरा पड़ा है' जैसे डालॉग हैं। लोगों का कहना है कि ये डायलॉग किसी टिपिकल बॉलीवुड फिल्म वाले हैं, इन्हें फिल्म में नहीं लेना चाहिए था।</p>
<p> </p>
<p>इस फिल्म में कई आपत्तिजनक शब्द हिंदू धर्म के बारे में कहा गया है।मर्यादापुरुषोत्तम राम के साथ और रामायण की मूल भावना के साथ मजाक किया गया है। सवाल है कि क्यों बार-बार हिंदू धर्म से जुड़ी फिल्मों में ही आस्था और भावनाओं से खिलवाड़ किया जाता है। यह फिल्म सेंसर बोर्ड से पास होकर आई है ।</p>
<p>लोगों का घुस्सा सेन्सर बोर्ड पर भी है । लोगों का कहना है वर्तमान में सेंसर बोर्ड या अन्य नियामक संस्थाओं की कानूनी औपचारिक बाध्यताओं से स्वतंत्र- ओटीटी प्लेटफार्म एक ऐसे अड्डे एवं हथियार के रुप में उभरा है जिसमें फिल्मों व वेबसीरीज के माध्यम से हिन्दू विरोध, देवी देवताओं एवं धर्म को अपमानित करने की खेप पर खेप इन्टरनेट के माध्यम से लगातार पहुंचाई जा रही है।हिन्दू धर्म से नफरत करने वाले फिल्म निर्माता- निर्देशक-पटकथा लेखक इस बेलगाम अनियंत्रित प्लेटफार्म के द्वारा लगातार ऐसी फ़िल्में / वेबसीरीज बनाकर परोस रहे हैं जिनके निशाने पर सिर्फ़ और सिर्फ़ हिन्दू धर्म एवं उसकी आस्था,धार्मिक स्थल व प्रतीक हैं।</p>
<p>इन सभी का तंत्र बेहद शातिर है, जो जानबूझकर हिन्दू धर्म की आस्था एवं भावनाओं से खिलवाड़, अपमानित करता है। इनमें बौध्दिक व अर्बन नक्सली, अकादमिक लफ्फाज,छद्म पत्रकार, राजनैतिक तोपची,देशद्रोही वामपंथियों का गिरोह व विभिन्न माफियाओं समेत भारत विरोधी अराजक तत्वों की गैंग शामिल है जो विविध तरीके से एक-दूसरे के लिए माहौल निर्मित करती है। हिन्दू धर्म विरोध, अपमान के पीछे इनकी वही नफरत है जो इनके विभिन्न कार्यकलापों, बयानों से प्रायः सामने आती रहती है। हिन्दू धर्म व उसकी व्यवस्था तथा आस्था इनके लिए आसान सा लक्ष्य है,क्योंकि इन्हें यह बखूबी पता होता है कि हिन्दू अपने धर्म, आस्था के प्रति उतना दृढ़ नहीं है और मुंहतोड़ जवाब नहीं देता है। साथ ही जो इनके कुकृत्यों के विरोध में आता है उसे ये अपने 'अभिव्यक्ति' शब्द के जुमले से ढंकने का प्रयास करते हैं।</p>
<p>इन फिल्म निर्माताओं, पटकथा लेखकों, फिल्म निर्देशकों, प्रसारणकर्ताओं का जो तंत्र होता है वह एक वैचारिकी के घेरे से बंधा हुआ व इन्हीं लक्ष्यों को प्रसारित करने के उद्देश्य के लिए ही सिनेमा में आया हुआ है कि- उन्हें हर हाल में 'हिन्दू-हिन्दुत्व' के विरोध,धार्मिक आस्था को चोट पहुंचाने के लिए काम करना है, जिसे वे सिनेमा के माध्यम से आसानी के साथ साध लेते हैं।<br />चाहे फिल्मों के नाम हों याकि उसके दृश्य, धारावाहिक, कॉमेडी, वेबसीरीज या अन्य दृश्य सामग्री जिन्हें विवादित कहा गया हो तथा जिन पर समाज ने आपत्ति दर्ज करवाकर विरोध किया हो। उन सभी का गहराई से विश्लेषण करने पर सबके मूल में एक बात ही सामने आती है कि फिल्म निर्माता,निर्देशकों ने इसके पीछे खास रणनीति के तहत काम किया है।</p>
<p>वे जानबूझकर ऐसे नाम, दृश्य, डॉयलॉग इत्यादि उसमें सम्मिलित करते हैं जिससे 'विवाद' की स्थिति निर्मित हो। अब ऐसा करने के पीछे यही है कि प्रथमतः वह विवाद के द्वारा अपनी फिल्म, सीरीज का बिना पैसे के प्रचार प्रसार कर लेते हैं। दूसरा यह कि जिस विशेष उद्देश्य के अन्तर्गत उन्होने फिल्म,धारावाहिक, वेबसीरीज में जानबूझकर 'विवादित' चीजें जोड़ी हैं। उन सबको व्यापक स्तर पर फैलाने में भी सफल हो जाते हैं। क्योंकि जब कोई चीज चर्चा में होती है तब लोग जिज्ञासावश उसे देखते हैं कि-आखिर! इस फिल्म या धारावाहिक में ऐसा क्या है कि जिससे इतना बवाल मचा हुआ है। बस यहीं से वे अपने उद्देश्य में सफल हो जाते हैं। मुफ्त में उनकी फिल्म, धारावाहिक, वेबसीरीज का प्रचार और उनका कुत्सित मंसूबा दोंनों एक साथ सध जाते हैं।</p>
<p>इसके साथ जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य है वह यह कि इन फिल्म या धारावाहिक, वेबसीरीज निर्माताओं द्वारा विवाद उत्पन्न करने के उपरांत शाब्दिक भ्रमजाल के सहारे 'माफीनामा' व फिल्म, वेबसीरीज के टाईटल, दृश्य, डॉयलॉग में मामूली फेरबदल कर बड़ी ही चतुराई के साथ अपना दामन बचा लेने में सफल हो जाते हैं। उनकी हिन्दू विरोधी मानसिकता से भरी 'फिल्म और नैरेटिव' दोनों हिट हो जाते हैं और वे आर्थिक वारा-न्यारा करने के साथ-साथ हिन्दू भावनाओं को आहत कर मदमस्त रहते हैं।</p>
<p>हालांकि पिछले कई वर्षों से हिन्दू समाज इस पर जाग उठा है और उसने अकादमिक, सिनेमाई षड्यंत्र को समझकर प्रतिकार करने का साहस जुटाया है,लेकिन इस साहस में स्थायी उबाल व दृढ़ता नहीं दिखती।यदि धर्म की रक्षा करनी है तो इन सबकी जड़ों में प्रहार करना होगा अन्यथा ये सिनेमाई विधर्मी इसी तरह से अपमानित एवं आस्था से खिलवाड़ करते रहेंगे। यदि धार्मिक भावनाओं को आहत करने एवं हिन्दू धर्म के विरोध में बनाई गई फिल्मों, धारावाहिकों, वेबसीरीज के निर्माता, निर्देशक,लेखक, अभिनय टीम के विरूद्ध हिन्दू समाज समूचे देश में मुकदमे दर्ज करवा कर कानूनी कार्रवाई करवाने का अभूतपूर्व साहस दिखलाने के साथ ही राजनैतिक हुक्मरानों की कॉलर पकड़कर उनकी जवाबदेही तय करवाने का काम करते तो किसी की इतनी मजाल ही न होती कि वह हिन्दू धर्म को अपमानित कर सके। शासन ,सत्ता तो अपनी जिम्मेदारी समझने से रहे लेकिन यदि हिन्दू समाज नहीं जागता व शासन, सत्ता से यह निर्णय नहीं करवा पाता कि जो भी तत्व उसकी धार्मिक भावनाओं, आस्था से खिलवाड़ करेंगे। उन पर विधिवत दण्डात्मक कार्रवाई होगी। तब तक हिन्दू धर्म को सिनेमाई विधर्मी अपमानित करने व घ्रणा फैलाने में सफल होते रहेंगे।</p>
<p><strong>अशोक भाटिया,</strong></p>
<p><strong>वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार .लेखक एवं टिप्पणीकार</strong></p>]]>
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                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 20 Jun 2023 15:06:47 +0530</pubDate>
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                <title>गुजरात का नाम बदनाम न करो  </title>
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<div>महात्मा गांधी की जन्म और कर्म भूमि लगातार सुर्ख़ियों में हैं और ये तमाम सुर्खियां हैं बदनामी की। आज जब देश का नेतृत्व एक महान गुजराती कर रहा हो तब गुजरात को लगातार बदनाम करने की कोशिशें मुझे नागवार लगतीं हैं ।हाल ही में उज्जयनी में नव नृमित महाकाल लोक की मूर्तियों के आंधी में उड़ जाने से एक बार फिर गुजरात की बहुत बदनामी हुई ।</div>
<div>मै जितना प्रेम भारत से करता हूँ,उतना ही स्नेह मुझे गुजरात से है । गुजरात से प्रेम की एक वजह हो तो बताऊँ ।फिर भी यहां महात्मा गांधी का पैदा होना. सरदार बल्ल्भ</div>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/129785/dont-defame-the-name-of-gujarat"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-05/rajneeti9.jpg" alt=""></a><br /><div> </div>
<div>महात्मा गांधी की जन्म और कर्म भूमि लगातार सुर्ख़ियों में हैं और ये तमाम सुर्खियां हैं बदनामी की। आज जब देश का नेतृत्व एक महान गुजराती कर रहा हो तब गुजरात को लगातार बदनाम करने की कोशिशें मुझे नागवार लगतीं हैं ।हाल ही में उज्जयनी में नव नृमित महाकाल लोक की मूर्तियों के आंधी में उड़ जाने से एक बार फिर गुजरात की बहुत बदनामी हुई ।</div>
<div>मै जितना प्रेम भारत से करता हूँ,उतना ही स्नेह मुझे गुजरात से है । गुजरात से प्रेम की एक वजह हो तो बताऊँ ।फिर भी यहां महात्मा गांधी का पैदा होना. सरदार बल्ल्भ भाई पटेल का यहीं से होना ही गुजरात प्रेम की असली वजह है । गुजरात से प्रेम की वजह द्वारिका भी है और सोमनाथ भी ।अमूल के उत्पाद भी हैं और गुजराती व्यंजन भी । गुजरात के उद्यमी भी हैं और गिर के शेर भी ।कच्छ का रण भी । </div>
<div> </div>
<div>गुजरात से प्रेम करने के तमाम कारण हैं इसीलिए मुझे सोते-जागते गुजरात की फ़िक्र रहती है । पिछले कुछ वर्षों से गुजरात को लगातार बदनाम करने की कोशिश की जा रही है । कभी दंगों के नाम पर, कभी भ्र्ष्टाचार के नाम पर । कभी भगोड़ों के नाम पर, तो कभी घटिया निर्माण के नाम पर । कोई नहीं है जो गुजरात की तारीफ़ करे ,जबकि गुजरात में तमाम बुराइयों के बावजूद प्रेम करने के लिए सबको साथ लेकर सबका विकास करने वाली सरकार के मुखिया यानि देश के प्रधानमंत्री जी भी हैं ।</div>
<div> </div>
<div>गुजरात से प्रधानमंत्री तो मोरार जी देसाई भी बने लेकिन वे गुजराती कम मुंबईकर ज्यादा थे । वे मोदी जी की तरह सबका विकास करने के लिए सबको साथ लेकर नहीं चल पाए और दो-ढाई साल में ही अपनी सरकार गिरा बैठे । मोदी जी ने मोरारजी भाई देसाई से सबक सीखा और न केवल अपनी सरकार को पूरे पांच साल चलाया बल्कि अगले पांच साल के लिए भी मौक़ा दिलवाया । अब वे तीसरी बार गुजरात का झंडा बुलंद करने वाले हैं । लेकिन एक मोदी इतने बड़े गुजरात की नाक जितनी ऊंची करते हैं ,दूसरे मोदी उससे ज्यादा कटवा देते हैं । कभी बैंकों का पैसा लेकर भाग जाते हैं तो कभी कुछ और खेल कर जाते हैं । यानी मोदी के दुश्मन हम और आप नहीं बल्कि दूसरे मोदी हैं । गुजरात को बदनाम करने वाले मोदियों की फेहरिस्त बहुत लंबी है।</div>
<div> </div>
<div>मै बात कर रहा था गुजरात की । मोदी जी जबसे देश के प्रधानमंत्री बने हैं तभी से दिल्ली से लेकर जहाँ-जहां भाजपा की सिंगल या डबल इंजन की सरकारें हैं वहां-वहां गुजरातियों का मान रखा जाता है।  नौकरशाही से लेकर ठेकेदारी तक में गुजरातियों को प्राथमिकता दी जाती है । ऐसी ही प्राथमिकता गुजरात के अलावा तमिलनाडु को भी मिली और दूसरे दक्षिणी राज्यों को । क्योंकि वहां मोदी सरकार के मंत्री-संत्री और उप राष्ट्रपति तक हुआ करते थे ।लेकिन देश को शिकायत है कि गुजराती नौकरशाह हों या ठेकेदार सब मिलकर गुजरात का नाम बदनाम कर रहे हैं ।</div>
<div> </div>
<div>हमारे मध्यप्रदेश में जब महाकाल लोक बनाने की बात आयी तो राजस्थान के शिल्पियों के बजाय मामा मुख्यमंत्री ने गुजरात के शिल्पियों को प्राथमिकता दी । लेकिन गुजराती भाइयों ने जो मूर्तियां बनाएं वे एक ही आंधी में चित हो गयीं।  नाक कटी मामा की और गुजरात की । दोनों को शायद नहीं पता कि लोक-परलोक बनाना इंसानों का नहीं ऊपर वाले का काम है । इसलिए जब नीचे वाले कोई लोक बनाएं तो कम से कम ईमानदारी से काम करें । लेकिन लोभ-लालच ,मुनाफाखोरी,कमीशनबाजी ने गुजरात के साथ-साथ मध्यप्रदेश की नाक कटा दी । अब इस कटी  नाक को जोड़ने का काम किया जा रहा है ।</div>
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<div>गुजराती विदेशों में क्या झक्काट काम करते हैं। मैंने तो अमरीका में उनके द्वारा बनवाये गए तमाम मंदिर देखे हैं ।गर्व होता है उन्हें देखकर । लेकिन अपने देश में पता नहीं गुजरातियों को क्या हो जाता है ? गुजरात का अमूल भी अब अपनी मान-प्रतिष्ठा नहीं बचा पा रहा है । गुजरात में दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा अगर खुद गुजरातियों ने बनाई होती तो उसका भी शायद उज्जैन के महाकाल लोक की प्रतिमानों जैसा हाल होता .। गनीमत है कि सरदार बल्ल्भ भाई की प्रतिमा चीनियों ने बनाई है , गुजरातियों ने नहीं ।</div>
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<div>गुजरातियों को लांच्छित करने का मेरा कोई इरादा नहीं । मै हमेशा से गुजरातियों का सम्मान करता हूँ।  अनेक गुजराती मेरे जान से ज्यादा प्यारे मित्र हैं । गुजरात की हर चीज मुझे प्रिय हैं। फिर चाहे  वे नेता हों या खिलाड़ी अजय जडेजा । हमारे शहर की महारानी तक गुजराती हैं ।हम उनका भी दिल से सम्मान करते हैं । वे बड़ोदरा के राजपरिवार से हैं।गुजरात का सम्मान करना इस दौर में राष्ट्रधर्म है । जिसने गुजरात से प्रेम नहीं किया उसने भारत से प्रेम नहीं किया । असली भारतवासी वो ही है जो गुजरात का मुरीद है । गुजराती हर मामले में अव्वल होते हैं । मेहनत में ,ईमानदारी में ,बेईमानी में ,नेतृत्व में ,कलाकारी में ।  गुजराती असल जौहरी हैं । वे जानते हैं कि असली और नकली हीरे में कितना फर्क होता है ।</div>
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<div>देश के नए संसद भवन से गुजरात का कितना कनेक्शन है, मुझे नहीं मालूम । लेकिन यदि कुछ है तो हमें नए संसद भवन पर भी नजर रखना चाहिए.।  नया भवन कम से कम 2024  तक तो अपना रंग-रूप न बदले । नए संसद भवन में ईंट-गारे से ज्यादा गुजरात की इच्छाशक्ति शामिल है ।वरना किसी और ने क्यों नहीं बनाया नया संसद भवन ? डॉ मन मोहन सिंह बनवा सकते थे । अटल जी बनवा सकते थे । .चंद्रशेखर को क्यों नहीं सूझा इस बारे में?  इंद्रकुमार गुजराल को किसने रोका था  नया संसद भवन बनवाने से ?  देवगौड़ा जी को भी इस बारे में कभी कोई ख्याल क्यों नहीं आया ? आखिर मोदी जी ने नया संसद भवन बनवाया ।नया इतिहास गढ़ना केवल गुजरातियों के बूते की बात है ।गुजराती किसी भी सीमा तक जाकर काम करते हैं,फील्ड भले ही कोई भी हो ।</div>
<div> </div>
<div>आप सोचेंगे की आज बन्दा देश के तमाम ज्वलंत मुद्दे छोड़कर कहाँ आकर गुजरात में अटक गया ! गुजरात है ही ऐसा जहां हर कोई आकर अटक जाता है । कांग्रेस क्या ,आप क्या ,सब यहां आकर अटके हुए हैं । सबकी लालसा एक बार गुजरात जीतने की है । लेकिन कोई भी अब तक कामयाब नहीं हुआ है । पहले की बात छोड़ दीजिये । पहले गुजरात आज के गुजरात से भिन्न था । आज का गुजरात आज का गुजरात है.। गुजरात में एक रात बिताकर तो देखिये । गुजरात की बदनामी के तमाम कारणों पर धूल डालकर गुजरात को देखिये । बड़ा ही खूबसूरत नजर आएगा । आज गुजरात के पास राजधर्म के साथ ही राजदंड भी है । गुजरात में लोकतंत्र है ।गुजरात में न्यायतंत्र है।  गुजरात की ही ताकत थी जो उसने राहुल गांधी से उनकी लोकभा की सदस्यता  छिनवा दी ।</div>
<div> </div>
<div>ऐसे गुजरात को नमन कीजिये । उज्जैन की मूर्तियों को भूल जाइये । उज्जैन में एक ही कालजयी मूर्ती महाकाल की है । बाक़ी को तो आज नहीं तो कल धराशायी होना ही है । फिर चाहे वे फाईवर  से बनाई जाएँ या पत्थर से । ध्वस्त हुई मूर्तियों को घटिया बताकर हम गुजरात का अपमान नहीं कर सकते । हम तो तब भी मौन थे जब गुजरात में खुद का बनाया पुल गिरा और सैकड़ों लोग मारे गए । इस सबके लिए गुजराती नहीं बल्कि काल जिम्मेदार है । गुजरात अजर है,गुजरात अमर है ।जय गुजरात,जय भारत ।</div>
<div>@ राकेश अचल </div>
<div> </div>]]>
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                                                            <category>विचारधारा</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 May 2023 17:48:46 +0530</pubDate>
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                <title>आमंत्रित विषय रचना -सुखी परिवार </title>
                                    <description>
                        <![CDATA[<p><strong>स्वतंत्र प्रभात     </strong></p>
<blockquote>
<div dir="ltr">
<div dir="ltr">
<p>संसार  है एक नादिया इसमें दुःख  सुख दो किनारे हैं । न जाने कहाँ जाएँ हम यह बहते धारें हैं । संसार में ये दो ही तत्व हैं ।किए  कर्मों कामिलता यहाँ फ़ल है ।पुण्यायी से मिलता है हमे सुख का भोग व पाप कर्म से मिलता दुःख का संजोग । चुप रहना चाहिए । सहना चाहिए। समय पर कहना भी चाहिए  । और सही से प्रेम से रहना चाहिए । यह सुखी परिवार का अमोघ मन्त्र है । </p>
<p>सुखी परिवार वह है जोपरिस्थितियों के बहाव में कभी भी बहता है । अनुकूल</p></div></div></blockquote>...]]>
                    </description>
                
                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/128726/invited-theme-happy-family"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-04/hindi-divas27.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>स्वतंत्र प्रभात     </strong></p>
<blockquote>
<div dir="ltr">
<div dir="ltr">
<p>संसार  है एक नादिया इसमें दुःख सुख दो किनारे हैं । न जाने कहाँ जाएँ हम यह बहते धारें हैं । संसार में ये दो ही तत्व हैं ।किए कर्मों कामिलता यहाँ फ़ल है ।पुण्यायी से मिलता है हमे सुख का भोग व पाप कर्म से मिलता दुःख का संजोग । चुप रहना चाहिए । सहना चाहिए। समय पर कहना भी चाहिए । और सही से प्रेम से रहना चाहिए । यह सुखी परिवार का अमोघ मन्त्र है । </p>
<p>सुखी परिवार वह है जोपरिस्थितियों के बहाव में कभी भी बहता है । अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होता । दुःख और सुख सभीपरिस्थितियों से जिसने स्वयं को परे कर लिया वह परिवार कभी भी समस्याग्रस्त और विषादग्रस्त नहीं होता है । इस दुनिया में सारा दुःखऔर सुख अहंकार और ममकार के धरातल पर होता है । परिवार क्या हुआ ? परिवार व्यक्तियों का वह समूह है जो विवाह और रक्तसंबंधो से परस्पर जुड़ा हुआ होता है। जहाँ प्राकृतिक  प्रेम, सहानुभूति, परानुभूति, सही से आदर सम्मान आदि भावनाएं होती हैं परस्परस्वभावतः परिलक्षित।जहाँ पीढ़ी दर पीढ़ी संस्कार संक्रमित और विकसित होते जाते हैं।जहाँ  सहजीवन,सह रहन-सहन आदि नैसर्गिकहोता है।</p>
<p> हम यह कह सकते हैं की परिवार-व्यवस्था आदिम युग की अनुपम देन है ।जहाँ पारिवारिक सहयोग भावना स्वतः सर्वोपरि मेनहोती है। इसीलिए सुख-दुःख सब बंट जाता है । तभी तो वह सुखी व समृद्ध परिवार कहलाता है । निस्वार्थ भावना परिवार की रीढ़ है ।सब पारिवारिकजन अपेक्षित है रखें आपस में सब परस्पर सहयोग वृत्ति। प्रथम ईकाई समाज व्यवस्था की परिवार है ।और आदर्शईकाई को ही समृद्ध व सुखी परिवार हम कह सकते हैं । आदर्श व सुखी परिवार समाज में वरदान है । विपरीत इसके छिन्न-विछिन्नपरिवार अभिशाप है आज में। मुखिया का बहुमान सुखी,समृद्ध परिवार का एक लक्षण है ।परस्पर आदर  सम्मान वैसे तो सब सदस्यों काभी हो ।कम से कम एक वक्त का तो करे सकल परिवार में संग बैठ कर सह खान-पान। इस तरह संगठन भाव जहाँ  होगा वहाँ स्वतः सुखसमृद्धि होगी । समर्पण भाव बहुत मुख्य सात्विक लक्षण है । पूर्ण सद्भाव सब सदस्यों का परस्पर होता है।</p>
<p> परिवार संचालन में सबकीयोग्यतानुसार सहर्ष सहभागिता हो । अपनी क्षमतानुसार सब सहयोग को तैयार हों । संसकारों का दृढता से पालन हो बहुत अहम बात है। इस आधुनिकता की अंधी आंधी में भटकान न हो । आधुनिक वातावरण में यह  सर्वोच्च प्राथमिकता है । सब सदस्यों को इसकीसमुचित चिंता और व्यवस्था रखनी चाहिये । छोटों के प्रति पूर्ण स्नेह भाव बड़ों को रखना चाहिए ।और छोटों का भी कर्तव्य है बड़ो केप्रति सही से समुचित आदरभाव रखें । सास बहू को बेटी समझे और बहू सास को माँ समझे ।परस्पर ऐसा स्नेह-आदर और अपनत्व जहॉंउस परिवार में होगा सुख-समृद्धि वहाँ कभी कमी नहीं होती है । या ऐसी चर्या होगी जिस परिवार में उससे सुखी परिवार इस संसार मेंकोई हो भी नहीं सकता है । </p>
<p>प्रदीप छाजेड़</p>
<p>( बोरावड़ )</p>
<p> </p>
</div>
</div>
</blockquote>]]>
                    </content:encoded>
                
                                                            <category>विचारधारा</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 11 Apr 2023 09:54:38 +0530</pubDate>
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                <title>' अ ' से अदालत,'स ' से सारस </title>
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                        <![CDATA[<div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div dir="ltr">
<div dir="ltr">
<div>  </div>
<div>अब समय आ गया है जब हमें अपना ककहरा बदल देना चाहिए । अब 'अ ' से अदालत  और 'स' से सारस पढ़ाने का वक्त आ गया है ।  क्योंकि अब हमारी अदालतें नए जूनून के साथ फैसले सुना रहें हैं। उनके लिए कांग्रेस का नेता राहुल गांधी और पूर्व सांसद  अतीक अहमद एक समान है । अदालतों के फैसलों पर उंगली उठाना भी  प्रधानमंत्री के मुताबिक़ अब ठीक नहीं। वे इसे संवैधानिक संस्थाओं पर हमला मानते हैं। </div>
<div>  </div>
<div>मार्च का महीना इस साल बड़ा महत्वपूर्ण है ,क्योंकि इस महीने में मानहानि के एक मामले में कांग्रेस सांसद राहुल गांधी को</div></div></div></div></div>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/128417/-draft--add-your-title"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-04/4jdc0ct_sarus-crane-up_625x300_28_march_23.webp" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div dir="ltr">
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<div> </div>
<div>अब समय आ गया है जब हमें अपना ककहरा बदल देना चाहिए । अब 'अ ' से अदालत  और 'स' से सारस पढ़ाने का वक्त आ गया है ।  क्योंकि अब हमारी अदालतें नए जूनून के साथ फैसले सुना रहें हैं। उनके लिए कांग्रेस का नेता राहुल गांधी और पूर्व सांसद  अतीक अहमद एक समान है । अदालतों के फैसलों पर उंगली उठाना भी  प्रधानमंत्री के मुताबिक़ अब ठीक नहीं। वे इसे संवैधानिक संस्थाओं पर हमला मानते हैं। </div>
<div> </div>
<div>मार्च का महीना इस साल बड़ा महत्वपूर्ण है ,क्योंकि इस महीने में मानहानि के एक मामले में कांग्रेस सांसद राहुल गांधी को दो साल की सजा सुनाई गयी और इसी के चलते दो मिनिट में उनकी सांसदी चली गय। सांसदी ही नहीं गयी बल्कि उनसे सांसद के नाते मिला सरकारी बँगला खाली करने के लिए भी कह दिया गया। भला एक सजायाफ्ता आदमी सरकारी बंगले में कैसे रह सकता है ,ये बात और है कि ये सजा अभी भी चुनौती के दायरे में है और शायद इसे चुनौती दी भी जा रही है। </div>
<div> </div>
<div> </div>
<div>दूसरा मामला अतीक अहमद का है। अतीक बाहुबली होने का प्रतीक बन चुका था। उसने बाहुबल के बूते ही विधानसभा से लेकर संसद तक का सफर तय किया और अब एक गवाह के अपहरण के मामलमें सजा पा चुका है । अदालत ने उसकी दलीलें खारिज कर दीं।  अब अतीक  भी राहुल की तरह चुनाव नहीं लड़ सकता,हाँ कानूनी लड़ाई लड़ने का विकल्प उसके पास भी बाक़ी है। अतीक के बाजुओं का जोर पिछले 19  मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल में भी कम नहीं हुआ किन्तु योगी आदित्यनाथ ने अतीक को नाथने में कामयाबी हासिल कर ली। </div>
<div> </div>
<div>दरअसल मै राहुल गांधी और अतीक की तुलना नहीं कर रहा ।  एक बाहुबली है और दूसरा भारत जोड़ो यात्रा का यात्री ।  दोनों में तुलना हो भी नहीं सकती । हाँ तुलना का एक बिंदु नसीब है ।  दोनों का नसीब इनदिनों खराब चल रहा है। दोनों अब चुनाव नहीं  लड़ सकते। अब बड़ी अदालतें और नसीब दोनों साथ दें तो अलग बात है ,अलबत्ता जो ओना था सो हो चुका। भारत में माननीय प्रधानमंत्री जी को छोड़कर कोई दूसरा अतुलनीय है भी नही।  होना भी नहीं चाहिए। </div>
<div> </div>
<div>तीसरा मामला है अमेठी के आरिफ  का । आरिफ और एक घायल सारस की दोस्ती हमारे क़ानून को समझ में नहीं आई ।  क़ानून ने आरिफ और सारस को अलग -अलग कर दिय। अब सारस खाना-पीना छोड़कर बैठा है लेकिन क़ानून को सारस की भूख हड़ताल से कोई लेना देना नहीं है ।  घायल सारस की तीमारदारी करना और फिर इस रिश्ते को दोस्ती में बदलना हमारा क़ानून बर्दाश्त नहीं कर सकता। कायदे से आरिफ को सारस की तीमारदारी करने के बजाय उसका कीमा बना लेना चाहिए था । लेकिन आरिफ ने ऐसा नहीं किया। आरिफ गौतम बुद्ध बनने चला था ।  अब सारस और आरिफ दोनों तड़फ रहे हैं ,किन्तु क़ानून को दोनों पर दया नहीं आ रही। जंगलात के अफसर क़ानून से बंधे हैं। देश में क़ानून का राज है। </div>
<div>देश में बहुत दिनों बाद [ शायद आजादी के 67  साल बाद ] क़ानून का राज कायम हुआ है ।</div>
<div> </div>
<div>इस राज में हमारे क़ानून मंत्री देश के प्रधान न्यायाधीश को भी आँखें दिखा सकते हैं ,क़ानून के इस राज में ईडी जैसी संस्थाएं सत्तारूढ़ दल के किसी भी नेता या व्यवसायी की और आँख उठाकर भी नहीं देख सकती। किसी की हिम्मत नहीं कि वो हमारे  राष्ट्रभूषण गौतम अडानी साहब से एक मिनिट की भी पूछताछ कर दिखाए। क़ानून के राज में बीमार,लाचार नेता जरूर घंटों पूछताछ के लिए विवश हैं। बहरहाल अगर क़ानून के राज पर उंगली उठाई गयी तो मुमकिन है कि माननीय को अपने अगले भाषण में इस विषय पर भी बोलना पड़े। </div>
<div> </div>
<div>लोकतंत्र की मजबूती के लिए क़ानून का राज बहुत जरूरी है ।  विपक्ष लाख शोर मचाये कि लोकतंत्र खतरे में है किन्तु मै ऐसा नहीं मानत।  मेरी मान्यता है कि देश में विपक्ष नहीं विपक्षी नेता खतरे में हैं। उनके वजूद को खतरा है। विपक्ष के वजूद का खतरा राष्ट्रीय संकट नहीं है ।  हमारा लोकतंत्र बिना विपक्ष के भी तो ज़िंदा रह सकता है ! हमारी संसद को विपक्ष की जरूरत ही कब-कब महसूस होती है ? हमारी संसद हो या विधानसभाएं सब ध्वनिमत से चलती है।  बड़े से बड़े विधेयक और यहां तक की बजट तक ध्वनिमत से पारित हो जाते हैं। </div>
<div> </div>
<div>कुल जमा किस्सा कोताह ये है कि देश को माननीय की बात मानना चाहिए।  अदालतों के फैसलों पर उंगली नहीं उठाना चाहिए ।  मान लेना चाहिए कि अब छोटी अदालतों के फैसले ही अंतिम है।  उनके खिलाफ बोलना या अपील करना राष्ट्रद्रोह है। हम भारतीयों को इससे बचना चाहिए। हमारे लिए क़ानून की रक्षा बड़ी बात है ।  हम सारस और आरिफ की दोस्ती के लिए काम नहीं कर सकते। ऐसे काम क़ानून के राज में बाधा डालते हैं।हमारे कानून दोस्ती को नहीं सारस को बचाना चाहते हैं। हमारे क़ानून अपराधियों को चुनावी राजनीति से अलग करना चाहते हैं,फिर अपराध चाहे जुबान से किया गया हो या पिस्तौल से। अपराध तो अपराध है। </div>
<div> </div>
<div>@ राकेश अचल  </div>
</div>
</div>
<div class="yj6qo"> </div>
<div class="adL"> </div>
</div>
</div>
<div class="hq gt"></div>]]>
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                                                            <category>विचारधारा</category>
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                <pubDate>Sun, 02 Apr 2023 12:45:31 +0530</pubDate>
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                <title>किसने लगाया सुख के ताला </title>
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                        <![CDATA[<p>हमने स्वयं ने अपने कर्मों के आवरण से भौतिक चकाचौंध में रत रहकर आत्मा का जो सुख होता है उसको ताला लगाया हैं ।हम हमेशान पाए को पाने की लालसा में भटकते रहते हैं । उसका नतीजा यह होता है कि हमें जो मिला है उसमें हम कभी आनंदित नहीं हो पाते औरपाए हुए का सही उपयोग न करके कीमती समय और वस्तुओं के उपभोग से वंचित  रहते है।हम ये नहीं सोचते कि कभी भी बिना बुलायेअतिथि की तरह मौत हमारे दरवाजे परकभी भी आ जायेगी । और हमारी न एक</p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/127969/who-put-the-lock-of-happiness"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-03/hindi-divas15.jpg" alt=""></a><br /><p>हमने स्वयं ने अपने कर्मों के आवरण से भौतिक चकाचौंध में रत रहकर आत्मा का जो सुख होता है उसको ताला लगाया हैं ।हम हमेशान पाए को पाने की लालसा में भटकते रहते हैं । उसका नतीजा यह होता है कि हमें जो मिला है उसमें हम कभी आनंदित नहीं हो पाते औरपाए हुए का सही उपयोग न करके कीमती समय और वस्तुओं के उपभोग से वंचित रहते है।हम ये नहीं सोचते कि कभी भी बिना बुलायेअतिथि की तरह मौत हमारे दरवाजे परकभी भी आ जायेगी । और हमारी न एक भी सुनेगी और न जो हमारे पास भौतिक वस्तुएं है जोहमारे पास थी। </p>
<p>हम भोग ही नहीं पाएं वो वैसे ही छोड़कर हमें ले जाएगी। सिर्फ हमारे कर्मबन्ध चाहे वो बहुत अच्छे हो सम्यकरत्न याफिर मिथ्यात्व रूपी पापरूप कंकड़,वो हमें अपने साथ लेकर जाने के लिए हम विवश होंगे।सात पीढ़ी तक के सुख के लिए आशा केपाश में बंधे हुए हम अपने आत्मकल्याण की कभी नहीं सोचते ।क्योंकि हमें अपने इस जीवन मे मृत्यु नहीं आएगी पर जरूरत से ज्यादाविश्वास होता है । और वही हम सबसे बड़ी भूल करते है और अंत में नतीजा ये होता है।</p>
<p>कि हम आये तब तो पता नहीं कर्मों से कितनेभारी थे ।जाने के समय ज्यादा भारी जरूर हो जाएंगे।हमें हमेशा प्रेरणा मिलती रहती है कि लालसाओं का कोई ओर-छोर नहीं ।आवश्यकता की पूर्ति हो सकती है लेकिन आकाश की तरह अनन्त आकांक्षाओं की कभी नहीं।</p>
<p>तो हम सदैव स्मृति में मृत्यु कीअवश्यम्भाविता को ध्यान में रखते हुए हम सब कुछ कर्तव्य समझकर चेते। सुख शांति का उद्गमस्थल है आत्मभाव ।जब हम होते आत्मामें अवस्थित। बाहरी आकर्षणों से हो जाते निवृत। हमारे ज्ञाता द्रष्टा भाव हो जाता विकसित। तब सुख शांति का साम्राज्य हो जाताशासित।</p>]]>
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                                                            <category>विचारधारा</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 16 Mar 2023 09:30:12 +0530</pubDate>
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