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                <title>  Swantantra prabhat sampadkiya - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>  Swantantra prabhat sampadkiya RSS Feed</description>
                
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                <title>त्याग, प्रेम और सामाजिक बदलाव की अनोखी मिसाल</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">बिहार के वैशाली जिले से सामने आई यह घटना न केवल चौंकाने वाली है, बल्कि समाज, रिश्तों और मानवीय संवेदनाओं को नए सिरे से सोचने पर मजबूर भी करती है। एक ऐसा समाज, जहां विवाह को जन्म-जन्मांतर का बंधन माना जाता है, वहां एक पति द्वारा अपनी ही पत्नी की शादी उसके प्रेमी से करवा देना असाधारण ही नहीं, बल्कि कई मायनों में एक साहसिक और जटिल निर्णय भी है। यह घटना परंपराओं, भावनाओं और सामाजिक मान्यताओं के बीच चल रहे संघर्ष को उजागर करती है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">वैशाली के जंदाहा प्रखंड की खोपी पंचायत में हुई इस घटना ने पूरे क्षेत्र</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177044/a-unique-example-of-sacrifice-love-and-social-change"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/uskg8468_viral-video_625x300_25_march_25.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">बिहार के वैशाली जिले से सामने आई यह घटना न केवल चौंकाने वाली है, बल्कि समाज, रिश्तों और मानवीय संवेदनाओं को नए सिरे से सोचने पर मजबूर भी करती है। एक ऐसा समाज, जहां विवाह को जन्म-जन्मांतर का बंधन माना जाता है, वहां एक पति द्वारा अपनी ही पत्नी की शादी उसके प्रेमी से करवा देना असाधारण ही नहीं, बल्कि कई मायनों में एक साहसिक और जटिल निर्णय भी है। यह घटना परंपराओं, भावनाओं और सामाजिक मान्यताओं के बीच चल रहे संघर्ष को उजागर करती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वैशाली के जंदाहा प्रखंड की खोपी पंचायत में हुई इस घटना ने पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बना दिया है। संजू कुमारी, जिनकी शादी चार साल पहले मुकेश कुमार मांझी से हुई थी, अपने पति के महाराष्ट्र में रहने के दौरान सोशल मीडिया के जरिए वरुण कुमार मांझी के संपर्क में आईं। धीरे-धीरे यह संपर्क प्रेम में बदल गया। यह कहानी आज के डिजिटल युग की उस सच्चाई को भी दर्शाती है, जहां फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म रिश्तों को जोड़ने के साथ-साथ उन्हें तोड़ने की भी क्षमता रखते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जब इस संबंध की जानकारी परिवार और पति को हुई, तब आमतौर पर जैसे विवाद, तनाव या हिंसा की स्थिति बनती है, वैसा कुछ नहीं हुआ। इसके विपरीत, पति मुकेश ने एक ऐसा निर्णय लिया, जिसने सबको हैरान कर दिया। उन्होंने अपनी पत्नी की इच्छा को प्राथमिकता दी और उसे उसके प्रेमी के साथ जीवन बिताने की अनुमति दे दी। इतना ही नहीं, उन्होंने खुद इस शादी की पूरी व्यवस्था की और मंदिर में उपस्थित रहकर ‘बाराती’ की भूमिका निभाई।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह घटना केवल एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि त्याग और आत्मबल का उदाहरण भी है। मुकेश का यह कदम यह दर्शाता है कि उन्होंने अपने अहंकार और सामाजिक दबाव से ऊपर उठकर अपनी पत्नी की खुशी को प्राथमिकता दी। यह निर्णय आसान नहीं रहा होगा। एक पति के रूप में, समाज के एक सदस्य के रूप में, और एक व्यक्ति के रूप में उन्हें कई भावनात्मक संघर्षों से गुजरना पड़ा होगा। फिर भी उन्होंने जिस शांति और समझदारी के साथ इस स्थिति को संभाला, वह प्रशंसनीय है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हालांकि, इस घटना को केवल त्याग की कहानी के रूप में देखना भी अधूरा होगा। यह समाज में बदलते रिश्तों और मूल्यों की ओर भी इशारा करती है। आज के समय में, जहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अपनी पसंद को महत्व दिया जा रहा है, वहां पारंपरिक विवाह संस्था भी चुनौतियों का सामना कर रही है। सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने लोगों को नए संबंध बनाने के अवसर दिए हैं, लेकिन इसके साथ ही जटिलताएं भी बढ़ी हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस घटना ने यह सवाल भी खड़ा किया है कि क्या विवाह केवल एक सामाजिक अनुबंध है या दो व्यक्तियों की सहमति और खुशी पर आधारित संबंध? अगर किसी संबंध में प्रेम और विश्वास नहीं बचा, तो क्या उसे जबरदस्ती बनाए रखना सही है? मुकेश का निर्णय इस बात की ओर संकेत करता है कि उन्होंने विवाह को केवल एक सामाजिक बंधन के रूप में नहीं देखा, बल्कि अपनी पत्नी की स्वतंत्रता और खुशी को अधिक महत्व दिया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दूसरी ओर, इस तरह की घटनाएं समाज में कई तरह की प्रतिक्रियाएं भी उत्पन्न करती हैं। कुछ लोग इसे त्याग और महानता का उदाहरण मानते हैं, तो कुछ इसे पारंपरिक मूल्यों के टूटने के रूप में देखते हैं। कई लोगों के लिए यह स्वीकार करना कठिन है कि एक पति अपनी पत्नी की शादी किसी और से करवा सकता है। यह सोच हमारे समाज में गहराई से जमी हुई मान्यताओं को चुनौती देती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सोशल मीडिया की भूमिका भी इस घटना में महत्वपूर्ण है। फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म ने जहां दूरियों को कम किया है, वहीं यह रिश्तों में नई जटिलताएं भी लेकर आया है। कई बार लोग आभासी दुनिया में ऐसे संबंध बना लेते हैं, जिनका वास्तविक जीवन पर गहरा असर पड़ता है। यह घटना इस बात का उदाहरण है कि कैसे डिजिटल माध्यमों से बने संबंध वास्तविक जीवन के निर्णयों को प्रभावित कर सकते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे घटनाक्रम में एक और महत्वपूर्ण पहलू है—संवाद और सहमति। अगर मुकेश चाहते, तो इस स्थिति को विवाद या संघर्ष में बदल सकते थे। लेकिन उन्होंने संवाद का रास्ता चुना और अपनी पत्नी की इच्छा को समझने की कोशिश की। यह दर्शाता है कि किसी भी रिश्ते में संवाद कितना महत्वपूर्ण होता है।अंततः, यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि रिश्तों का असली आधार क्या होना चाहिए—सामाजिक दबाव या व्यक्तिगत खुशी? क्या त्याग का मतलब हमेशा खुद को मिटा देना होता है, या फिर यह भी हो सकता है कि हम किसी और की खुशी के लिए अपने अहंकार को त्याग दें?</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वैशाली की यह घटना कोई सामान्य घटना नहीं है। यह एक ऐसी कहानी है, जिसमें प्रेम, त्याग, साहस, और सामाजिक बदलाव के कई रंग एक साथ दिखाई देते हैं। यह हमें यह सिखाती है कि हर रिश्ता अलग होता है और हर स्थिति का समाधान भी अलग हो सकता है। जरूरी यह है कि हम किसी भी निर्णय को समझदारी, संवेदनशीलता और आपसी सम्मान के साथ लें। इस घटना ने भले ही समाज को चौंकाया हो, लेकिन यह एक नई सोच की शुरुआत भी हो सकती है।जहां रिश्तों को बंधन नहीं, बल्कि समझ और सहमति के आधार पर देखा जाए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 18:22:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>भारत की दहलीज पर विश्व विजय का सपना,जीत के जश्न की अभिलाषा</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">टी20 विश्व कप का फाइनल किसी भी क्रिकेट प्रेमी के लिए रोमांच का चरम क्षण होता है। जब मैदान पर दो मजबूत टीमें उतरती हैं तो सिर्फ खिलाड़ियों की क्षमता ही नहीं, बल्कि उनका धैर्य, रणनीति और आत्मविश्वास भी परीक्षा में होता है। आज अहमदाबाद के विशाल नरेंद्र मोदी स्टेडियम में भारत और न्यूजीलैंड आमने-सामने हैं। एक ओर भारतीय टीम लगातार दूसरी बार विश्व चैंपियन बनने का सपना लेकर मैदान में उतरेगी, तो दूसरी ओर न्यूजीलैंड पहली बार टी20 विश्व कप का ताज पहनने की उम्मीद के साथ पूरी ताकत लगाएगी।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">भारत इस टूर्नामेंट में बेहद मजबूत और संतुलित टीम</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172884/the-dream-of-world-victory-at-indias-doorstep-the-desire"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/images-(1)2.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">टी20 विश्व कप का फाइनल किसी भी क्रिकेट प्रेमी के लिए रोमांच का चरम क्षण होता है। जब मैदान पर दो मजबूत टीमें उतरती हैं तो सिर्फ खिलाड़ियों की क्षमता ही नहीं, बल्कि उनका धैर्य, रणनीति और आत्मविश्वास भी परीक्षा में होता है। आज अहमदाबाद के विशाल नरेंद्र मोदी स्टेडियम में भारत और न्यूजीलैंड आमने-सामने हैं। एक ओर भारतीय टीम लगातार दूसरी बार विश्व चैंपियन बनने का सपना लेकर मैदान में उतरेगी, तो दूसरी ओर न्यूजीलैंड पहली बार टी20 विश्व कप का ताज पहनने की उम्मीद के साथ पूरी ताकत लगाएगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत इस टूर्नामेंट में बेहद मजबूत और संतुलित टीम के रूप में सामने आया है। बल्लेबाजी से लेकर गेंदबाजी और फील्डिंग तक टीम का प्रदर्शन प्रभावशाली रहा है। भारतीय ओपनर्स ने कई मैचों में शानदार शुरुआत देकर टीम को मजबूत आधार दिया है। आक्रामक बल्लेबाजी ने विरोधी टीमों के गेंदबाजों पर लगातार दबाव बनाया है। यही वजह है कि भारत ने पूरे टूर्नामेंट में आत्मविश्वास के साथ मुकाबले जीते और फाइनल तक का सफर तय किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हालांकि फाइनल का मुकाबला हमेशा अलग होता है। यहां एक छोटी सी गलती भी मैच का रुख बदल सकती है। अहमदाबाद की पिच और परिस्थितियां भी मैच में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। यहां हुए टी20 मैचों के आंकड़े बताते हैं कि 180 से ज्यादा का स्कोर चेज करना आसान नहीं रहा है। इसलिए टॉस का परिणाम भी काफी अहम साबित हो सकता है। टॉस जीतने वाली टीम पहले बल्लेबाजी करके बड़ा स्कोर खड़ा करना चाहेगी ताकि दबाव विरोधी टीम पर आ सके।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारतीय टीम की सबसे बड़ी ताकत उसका संतुलन है। बल्लेबाजी में आक्रामकता और गेंदबाजी में विविधता दोनों मौजूद हैं। टीम के युवा और अनुभवी खिलाड़ियों का मिश्रण इसे और मजबूत बनाता है। ओपनिंग में अभिषेक जैसे खिलाड़ी तेजी से रन बनाकर विपक्षी टीम की रणनीति को बिगाड़ सकते हैं। वहीं मध्यक्रम भी किसी भी परिस्थिति में टीम को संभालने की क्षमता रखता है। गेंदबाजी में भारतीय टीम के पास तेज और स्पिन दोनों प्रकार के विकल्प हैं, जो न्यूजीलैंड के बल्लेबाजों के लिए चुनौती बन सकते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">फिर भी न्यूजीलैंड को कभी हल्के में नहीं लिया जा सकता। क्रिकेट जगत में यह टीम अपनी अनुशासन और शांत स्वभाव के कारण जानी जाती है। उसे अक्सर “साइलेंट किलर” कहा जाता है क्योंकि वह बिना ज्यादा शोर किए बड़े-बड़े टूर्नामेंट में शानदार प्रदर्शन कर देती है। कई बार ऐसा हुआ है कि न्यूजीलैंड ने मजबूत टीमों को चौंका दिया है। यही कारण है कि भारतीय टीम को फाइनल में पूरी सावधानी और एकाग्रता के साथ खेलना होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">न्यूजीलैंड के ओपनर फिन एलन इस टूर्नामेंट में सबसे खतरनाक बल्लेबाजों में से एक बनकर उभरे हैं। उन्होंने तेज स्ट्राइक रेट के साथ कई शानदार पारियां खेली हैं। सेमीफाइनल में उनका शतक पूरे टूर्नामेंट की सबसे यादगार पारियों में से एक माना जा रहा है। एलन की बल्लेबाजी की खासियत यह है कि वे शुरुआत से ही आक्रामक खेलते हैं और गेंदबाजों को संभलने का मौका नहीं देते। यदि उन्हें शुरुआत में आउट नहीं किया गया तो वे मैच का रुख पलट सकते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">न्यूजीलैंड के ऑलराउंडर रचिन रवींद्र भी टीम के लिए बेहद अहम खिलाड़ी साबित हुए हैं। उन्होंने बल्ले और गेंद दोनों से शानदार प्रदर्शन किया है। मध्य ओवरों में उनकी स्पिन गेंदबाजी भारतीय बल्लेबाजों को परेशान कर सकती है। इसके अलावा उनका बल्लेबाजी में योगदान भी टीम को मजबूती देता है। रचिन का शांत स्वभाव और समझदारी भरा खेल न्यूजीलैंड के लिए बड़ी ताकत है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कप्तान मिचेल सैंटनर भी टीम के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे एक अनुभवी खिलाड़ी हैं और परिस्थितियों के अनुसार खेल को पढ़ने की क्षमता रखते हैं। उनकी किफायती गेंदबाजी विरोधी टीम को खुलकर खेलने नहीं देती। इसके साथ ही जरूरत पड़ने पर वे बल्लेबाजी में भी उपयोगी योगदान दे सकते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तेज गेंदबाज मैट हेनरी न्यूजीलैंड के गेंदबाजी आक्रमण की रीढ़ माने जाते हैं। उनकी स्विंग और सटीक लाइन-लेंथ बल्लेबाजों के लिए मुश्किलें पैदा कर सकती है। खासकर नई गेंद से वे शुरुआती विकेट लेकर मैच का रुख बदलने की क्षमता रखते हैं। भारतीय शीर्ष क्रम को उनके खिलाफ सावधानी से खेलना होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके अलावा टिम साइफर्ट भी शानदार फॉर्म में हैं। उन्होंने इस टूर्नामेंट में कई उपयोगी पारियां खेलकर न्यूजीलैंड को मजबूत शुरुआत दिलाई है। उनका आक्रामक अंदाज और तेजी से रन बनाने की क्षमता भारतीय गेंदबाजों के लिए चुनौती बन सकती है। यदि साइफर्ट और एलन की जोड़ी चल गई तो मैच रोमांचक हो सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हालांकि इन सबके बावजूद भारतीय टीम कई मायनों में न्यूजीलैंड से मजबूत नजर आती है। भारत के बल्लेबाज बड़े मैचों में दबाव को संभालने की क्षमता रखते हैं। इसके साथ ही घरेलू परिस्थितियों का फायदा भी टीम को मिल सकता है। दर्शकों का समर्थन भी भारतीय खिलाड़ियों के आत्मविश्वास को बढ़ाएगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत के खिलाड़ियों ने पूरे टूर्नामेंट में जिस तरह का आत्मविश्वास और आक्रामकता दिखाई है, वह इस फाइनल में भी निर्णायक साबित हो सकती है। टीम इंडिया के खिलाड़ी जानते हैं कि यह सिर्फ एक मैच नहीं बल्कि इतिहास रचने का मौका है। लगातार दूसरी बार टी20 विश्व कप जीतना किसी भी टीम के लिए बड़ी उपलब्धि होगी और भारतीय टीम इस गौरव को हासिल करने के लिए पूरी ताकत झोंक देगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">फाइनल मुकाबले का रोमांच इसलिए भी खास है क्योंकि दोनों टीमें अलग-अलग शैली की क्रिकेट खेलती हैं। भारत जहां आक्रामक और आत्मविश्वास से भरी क्रिकेट खेलता है, वहीं न्यूजीलैंड शांत और रणनीतिक खेल के लिए जाना जाता है। यही विरोधाभास इस मैच को और भी रोचक बना देता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज शाम जब अहमदाबाद के मैदान पर दोनों टीमें उतरेंगी तो करोड़ों क्रिकेट प्रेमियों की नजरें इस मुकाबले पर टिकी होंगी। हर भारतीय प्रशंसक यही चाहता है कि एक बार फिर जीत का जश्न मनाने का मौका मिले और टीम इंडिया विश्व क्रिकेट के शिखर पर अपनी बादशाहत कायम रखे। अगर खिलाड़ी अपनी क्षमता के अनुसार प्रदर्शन करते हैं तो भारत के लिए इतिहास रचना बिल्कुल संभव है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अब इंतजार सिर्फ उस पल का है जब मैच की पहली गेंद डाली जाएगी और विश्व क्रिकेट को उसका नया चैंपियन मिलेगा। भारत के पास मौका है कि वह अपनी श्रेष्ठता साबित करे और एक बार फिर दुनिया को दिखा दे कि क्रिकेट के इस सबसे छोटे लेकिन रोमांचक प्रारूप में भी उसकी बादशाहत कायम है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>
<div class="yj6qo" style="text-align:justify;"> </div>
<div class="adL" style="text-align:justify;"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 08 Mar 2026 18:56:39 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>शिक्षित,आत्मनिर्भर नारी भारत का  गौरवशाली, उज्जवल भविष्य </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">आज स्त्री के संदर्भ में सारी पुरातन अवधारणाओं को बदलने का समय आ गया है ।नारी अब घर में पूज्या तो है ही साथ ही वह समाज में अपनी अहमियत की दस्तक देकर देश की सीमा सुरक्षा में भी अपना योगदान दे रही है। राष्ट्र निर्माण में नारी की शिक्षा एवं उनकी सहभागिता भारत का शक्तिशाली भविष्य है, अतः नारी की शिक्षा देश के लिए अति महत्वपूर्ण मुद्दा बन गई हैl वह समय चला गया जब किसी घर में कन्या के पैदा होने से पूरे परिवार में मातम छा जाता था अब भारत में धीरे-धीरे सामाजिक परिवेश में लिंग भेद</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172877/international-seminar-on-women-empowerment-and-health-organized-at-north"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/images5.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">आज स्त्री के संदर्भ में सारी पुरातन अवधारणाओं को बदलने का समय आ गया है ।नारी अब घर में पूज्या तो है ही साथ ही वह समाज में अपनी अहमियत की दस्तक देकर देश की सीमा सुरक्षा में भी अपना योगदान दे रही है। राष्ट्र निर्माण में नारी की शिक्षा एवं उनकी सहभागिता भारत का शक्तिशाली भविष्य है, अतः नारी की शिक्षा देश के लिए अति महत्वपूर्ण मुद्दा बन गई हैl वह समय चला गया जब किसी घर में कन्या के पैदा होने से पूरे परिवार में मातम छा जाता था अब भारत में धीरे-धीरे सामाजिक परिवेश में लिंग भेद बदलने लगा है स्थिति यह है कि शिक्षित परिवार केवल एक संतान ही पैदा करना चाहती है चाहे वह कन्या हो या बेटा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अब परिवार में कन्या पैदा होने से खुशियां मनाई जाती है और पुरातन सोच अब धीरे-धीरे सामाजिक परिवेश को मस्तिष्क के मूल्यांकन के साथ बदलते जा रही है। पुरुष प्रधान समाज में नारी को पूज्या कह कर बहला दिया जाता था और उसे घर की चहारदीवारी में सीमित कर दिया गया था। यही कारण था कि वे पुरुषों की बराबरी मैं ना आकर बहुत पिछड़ गई और देश की समग्र विकास की स्थिति एकांगी हो गई थी। समाज यह भूल गया था कि जिन हाथों में कोमल चूड़ियां पहनी जाती हैं वही हाथ तलवार भी उठा कर युद्ध में एक वीरांगना की भूमिका निभाती है, इसकी सर्वश्रेष्ठ उदाहरण रजिया बेगम और रानी लक्ष्मीबाई रही हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मनुस्मृति पर यदि आप नजर डालेंगे तो पाएंगे कि उसमें स्पष्ट कहा गया है कि जहां नारियों की पूजा होती है वहां देवताओं का वास होता है। प्राचीन भारत में नारी शिक्षा का काफी प्रचार प्रसार किया गया था इसके कई प्रमाण भी हैं कि वेद की रिचाओं का ज्ञान नारियों को था इसमें कुछ महत्वपूर्ण नारियां समाज के लिए एक उदाहरण बन गई थी उनमें मैत्री, गार्गी, अनुसूया, सावित्री, आदि उल्लेखनीय हैं। वैदिक काल के विद्वान मुंडन मिश्र की पत्नी उदय भारती ने प्रकांड पंडित विश्व विजयी आदि शंकराचार्य को भी शास्त्रार्थ में भरी सभा में पराजित किया था ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसीलिए वेदों और पुराणों में भी उल्लेखित है की बालिका शिक्षा समाज के निर्माण में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला होता है। नारी के उत्थान में कई कुप्रथा कुठाराघात करती रही हैं, जो नारी के विकास में बाधा बनकर सामने आई थी इनमें बाल विवाह सबसे बड़ा अवरोध बना था और इसी का प्रतिफल है कि नारी पुरुष के समाज में काफी पिछड़ गई थी। महादेवी वर्मा ने नारी शिक्षा को पुरुष शिक्षा से ज्यादा महत्वपूर्ण बताया था उन्होंने कहा था स्त्री को शिक्षित बनाना एक पुरुष को शिक्षित बनाने से ज्यादा आवश्यक और महत्वपूर्ण है यदि एक पुरुष शिक्षित -प्रशिक्षित होता है तो उससे एक ही व्यक्ति को लाभ होता है किंतु यदि स्त्री शिक्षित होती है तो उससे संपूर्ण परिवार शिक्षित हो जाता है. उन्होंने बहुत महत्वपूर्ण बात कही नारी को अशिक्षित रखना समाज के लिए अपराध के समान है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">समय के परिवर्तन के साथ साथ नारी का महत्व अब पूरे तौर पर समझा जा रहा है आज समाज तथा देश में नारियां सर्वोत्कृष्ट कार्य कर रही है। समाज हो या विज्ञान या राजनीति अथवा समाज सेवा संपूर्ण क्षेत्र में आज नारियां पुरुषों से कंधे से कंधा मिलाकर सर्वश्रेष्ठ कार्य कर रही है। मैडम क्यूरी, कल्पना चावला, इंदिरा गांधी, श्रीमति भंडार नायके, सरोजनी नायडू, कस्तूरबा गांधी जैसी महिलाएं राष्ट्र का मार्गदर्शन करने का काम करती रही है। महात्मा गांधी ने स्वयं कहा है कि जब तक भारत की महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर हर क्षेत्र में काम नहीं करेगी तब तक भारत का सर्वांगीण विकास संभव नहीं है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज का सबसे ताजा उदाहरण कॉमनवेल्थ गेम में महिला क्रिकेट टीम ने फाइनल में प्रवेश किया है और गोल्ड मेडल की तालिका में साक्षी मलिक बहनो, फोगाट बहनों ने विश्व में भारत का नाम ऊंचा किया है। पी वी संधू, वित्त मंत्री सीतारमण स्मृति ईरानी और मंत्रिमंडल में शामिल महिलाएं किसी से पीछे नहीं हैं। और सबसे ताजा उदाहरण भारत की महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने महिला होकर महिलाओं का नाम राष्ट्र की प्रथम पंक्ति में दर्ज कर देश के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति पद को सुशोभित किया है। उन्होंने भारत के लिए एक स्वर्णिम इतिहास भी बनाया है।अब भारत में नारियों की स्थिति प्रथम पंक्ति में मानी जाती है। ऐसे में भारत में नारी शिक्षा, उनकी सहभागिता तथा उनकी आत्म निर्भरता भारत के भविष्य की शक्तिशाली ऊर्जा एवं संपत्ति ही होगी। भारत की नारियों को नमन, प्रणाम एवं अभिनंदन।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>संजीव ठाकुर</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 08 Mar 2026 18:35:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
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                <title>टायसन की बहादुरी को सलाम! </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">पिछले दिनों भारत के सैन्य बल को जम्मू डिवीजन के कठुआ, ऊधमपुर, डोडा और किश्तवाड़ जिलों में आतंकियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई में सेना के डाॅग टायसन ने जान पर खेल कर बहतरीन काम किया है यहां तक की आतंकियों की गोलीबारी में सेना का टायसन नामक डाॅग जख्मी भी हुआ लेकिन गोली लगने के बावजूद उसने आतंकियों के ठिकाने तक कूच कर अद्वितीय पराक्रम का परिचय दिया । </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">आपको बता दें कि सेना के कुत्ते, जिन्हें  'साइलेंट वॉरियर्स' कहा जाता है, सुरक्षा, जासूसी, बारूदी सुरंगों का पता लगाने, तलाशी और बचाव अभियानों  में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/171696/salute-to-tysons-bravery"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/images-(1)36.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पिछले दिनों भारत के सैन्य बल को जम्मू डिवीजन के कठुआ, ऊधमपुर, डोडा और किश्तवाड़ जिलों में आतंकियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई में सेना के डाॅग टायसन ने जान पर खेल कर बहतरीन काम किया है यहां तक की आतंकियों की गोलीबारी में सेना का टायसन नामक डाॅग जख्मी भी हुआ लेकिन गोली लगने के बावजूद उसने आतंकियों के ठिकाने तक कूच कर अद्वितीय पराक्रम का परिचय दिया । </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको बता दें कि सेना के कुत्ते, जिन्हें  'साइलेंट वॉरियर्स' कहा जाता है, सुरक्षा, जासूसी, बारूदी सुरंगों का पता लगाने, तलाशी और बचाव अभियानों  में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मेरठ के रीमाउंट और वेटरनरी कॉर्प्स  सेंटर में प्रशिक्षित ये कुत्ते जर्मन शेफर्ड, लैब्राडोर, बेल्जियन मैलिनोइस जैसी नस्लों के होते हैं, जो आतंकवाद विरोधी अभियानों में सैनिकों की जान बचाते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दूसरी ओर गौर कीजिए देश में काश्मीर से लेकर कोलकाता तमिलनाडु केरल तक ऐसे सक्रिय और स्लीपर सैल से जुड़े आतंकी और आतंकियों के मददगार पकड़े जा रहे हैं जो इस देश का अन्न जल खाकर भी मजहबी उन्माद और नफरती विषवमन से ग्रसित होकर देश के खिलाफ गद्दारी कर रहे हैं। ये गद्दार देशद्रोही इंसान का जन्म लेकर भी नमक का फर्ज  अदा करना तो दूर देश के दुश्मनों के मंसूबों को पूरा करने में मददगार बन रहे हैं ये इन जानवरों में जन्म लेने के बावजूद प्रशिक्षण लेकर देश के लिए काम करने वाले डॉग्स से भी सबक ले सकते हैं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको बता दें हाल ही में सुरक्षा बलों को जम्मू डिवीजन में सक्रिय इन आतंकवादियों का सफाया करने के लिए चलाए जा रहे ऑप्रेशन 'त्राशि-1' के दौरान आखिरकार 22 फरवरी, 2026 को बड़ी सफलता मिली।जम्मू के किश्तवाड़ के घने जंगल में हुई भीषण मुठभेड़ में भरतीय सेना के जवानों ने एक 'ढोक' भेड़-बकरियां आदि चराने वालों अर्थात गड़रियों द्वारा मौसम बदलने पर रहने के लिए बनाए गए अस्थायी आवास में छिपे हुए आतंकवादियों पर रॉकेट दागकर जैश-ए-मोहम्मद के शीर्ष पाकिस्तानी कमांडर और सात साल से सुरक्षा बलों को चकमा दे रहे 10 लाख के ईनामी सैफुल्लाह सहित तीन आतंकवादियों को मार गिराया।एक रिपोर्ट के अनुसार राकेट दागने से हुआ धमाका इतना जबरदस्त था कि इसके परिणामस्वरूप एक आतंकवादी की खोपड़ी ही पूरी तरह छलनी हो गई तथा तीनों आतंकवादियों के शव पूरी तरह जल गए। मुठभेड़ स्थल से 2 ए. के. 47 राइफलें और भारी मात्रा में युद्धक सामग्री बरामद हुई।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">गत कुछ वर्षों से ये आतंकवादी लगातार अपनी छिपने के ठिकाने बदलते आ रहे थे और पहाड़ी इलाकों व घने जंगलों का लाभ उठाकर अपना नैटवर्क बनाने में जुटे हुए थे। इस आप्रेशन को सफल बनाने में भारतीय सेना के मददगार डाॅग स्कवायड के 'टायसन' नामक 'खोजी श्वान' का बड़ा योगदान रहा। आतंकवादियों के ठिकानों की ओर वही सबसे पहले बढ़ा था।जानकारी के अनुसार सेना की के नाइन यूनिट का वो बहादुर डॉग जो आतंकवाद के खिलाफ कई ऑपरेशन में हिस्सा रहा लेकिन रविवार को किश्तवाड़ में वो जिस तरह आतंकियों का काल साबित हुआ उसे सुनकर आपको न सिर्फ गर्व होगा वरना आप देश में छिपे गद्दारों पर भी लानत देंगे .</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जिस वक्त आतंकी सेना पर गोली चला रहे थे. उस वक्त भी टायसन रुका नहीं. बल्कि आतंकियों की ओर बढ़ता चला गया. इस फायरिंग में टायसन को एक गोली भी लग गई. फिर भी वो चट्टान की तरह उनके सामने डटा रहा और गंभीर रूप से घायल होने के बाद भी टायसन ने जवानों को आतंकियों के ठिकाने तक पहुंचाया, जिसके बाद सेना ने जैश के तीन आतंकियों को मार गिराया. इस ऑपरेशन के बाद गंभीर हालत में ‘टायसन’ एयरलिफ्ट कर अस्पताल पहुंचाया गया वहां आपरेशन के बाद  उसकी हालत में सुधार हो रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">घायल हो जाने के बावजूद 'टायसन' ने आतंकवादियों का डटकर मुकाबला किया और अंततः उसने आतंकवादियों को सुरक्षा बलों की रेंज में ला दिया और भारतीय जवानों ने उनको ढेर कर दिया। सैन्य रिपोर्ट के अनुसार भारतीय सेना के जांबाज के नाइन डॉग 'टायसन' ने किश्तवाड़ में आतंकियों से लोहा लेते हुए अदम्य साहस का परिचय दिया. गोली लगने के बावजूद भी वो चट्टान की तरह उनके सामने डटा रहा. टायसन की मदद से जैश के तीन आतंकी मारे गए. 'टायसन' जैसे जर्मन शेफर्ड डॉग भारतीय सेना की शान हैं, जो कठिन प्रशिक्षण के बाद देश की सेवा करते हैं.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस सम्बन्ध में जारी एक बयान में कहा गया है कि टायसन की बहादुरी के दम पर 'व्हाइट नाइट कोर्स, जम्मू-कश्मीर पुलिस तथा सी.आर.पी. एफ. उक्त पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों पर सटीक निशाने साध कर उन्हें ठिकाने लगा सकीं। टायसन एक सच्चा योद्धा सिद्ध हुआ है।'टायसन' के अलावा आतंकवादियों के विरुद्ध भारतीय सुरक्षा बलों की विभिन्न सैन्य कार्रवाइयों में अनेक मददगार खोजी कुत्तों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एक अखबार की रिपोर्ट के अनुसार इनमें सेना के 'डोमीनो' नामक कुत्ते तथा उसके हैंडलर 'लक्की कुमार' को राजौरी में एक आतंकवादी का पता लगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए 2023 में सम्मानित भी किया गया था।2023 में ही जम्मू के राजौरी जिले में एक आप्रेशन के दौरान 2 आतंकवादियों तक सुरक्षा बलों को पहुंचा कर उन्हें मार गिराने में योगदान देने वाली 'कैंट' नामक एक मादा खोजी डाॅग अपने हैंडलर को आतंकवादियों से बचाने की कोशिश के दौरान उस पर चलाई गई गोली से मारी गई थी। 'कैंट' का राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ये तो चंद नजीर हैं वास्तव में मददगार वफादार डाॅग की सूची में 'जूम', 'फैंटम' और 'एक्सल' जैसे और भी कई नाम हैं जिन्होंने देश की माटी का ऋण अपने प्राण देकर चुकाया है। आतंकवादियों के विरुद्ध कार्रवाई में इन खोजी 'श्वानों' का योगदान किसी भी दृष्टि से कम कर नहीं आंका जा सकता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">समय समय पर देश की सीमाओं और प्रमुख एतिहासिक स्थलों व्यक्तियों नेताओं अधिकारियों की सुरक्षा को जब जब देश के दुश्मनों ने निशाना बनाने की कोशिश की है भारतीय सुरक्षा बलों के प्रशिक्षण प्राप्त कुत्तों ने जबरदस्त मदद कर दुश्मनों के मंसूबों को नाकाम करने में अपना योगदान दिया है  इन खोजी 'श्वानों' के प्रशिक्षण तथा देखभाल को और बेहतर बनाने के साथ-साथ उनके प्रशिक्षकों को भी समुचित पुरस्कार देकर प्रोत्साहित करने की जरूरत है ताकि वे और मुस्तैदी से देश के दुश्मनों का सफाया कर सकें।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कुत्ते बारूदी सुरंगों, विस्फोटकों और छिपे हुए हथियारों को सूंघकर ढूंढ निकालते हैं।सीमा पर घुसपैठियों को पकड़ने और चौकी की सुरक्षा में ये बहुत मददगार हैं।प्राकृतिक आपदाओं या युद्ध के दौरान लापता लोगों को खोजने में ये अहम हैं।वाहनों और इमारतों की जांच में ये महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये सीधे ऑपरेशन्स में भाग लेते हैं और दुश्मन के ठिकाने का पता लगाने में मदद करते हैं। इनकी ट्रेनिंग  प्रशिक्षण सैंटरो पर होती है, जहां इन्हें हाथों के इशारों और कमांड्स को समझना सिखाया जाता है।इनका सर्विस पीरियड 8 से 10 साल होता है।2015 से, सेवानिवृत्त सैन्य कुत्तों को गोद लेने  की अनुमति है। भारतीय सेना में इन कुत्तों को न केवल "सैनिक" माना जाता है, बल्कि वे वफादार दोस्त के रूप में भी सैनिकों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करते हैं। इन डाॅग्स की देशभक्ति को नमन। </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 27 Feb 2026 18:41:40 +0530</pubDate>
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                <title>एक नासमझ की नस्ली टिप्पणी से पूर्वोत्तर तक पीड़ा </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल</strong>  </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">नई दिल्ली के मालवीय नगर इलाके में अरुणाचल प्रदेश की तीन लड़कियों के साथ कथित नस्लीय टिप्पणी और अभद्र व्यवहार का मामला सामने आया है। एयर कंडीशनर  लगाने को लेकर शुरू हुआ एक मामूली पड़ोसी विवाद देखते ही देखते गंभीर आरोपों में बदल गया। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद पुलिस ने आरोपी महिला को गिरफ्तार कर लिया गया है यह कोई पहली बार नहीं है कि पूर्वोत्तर भारत के लोगों के साथ उनकी शारीरिक बनावट व संस्कृति को लेकर कहीं शेष देश में अभद्रता की गई हो। यहां तक कि एक बार</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/171694/an-idiots-racist-comment-brings-pain-to-the-northeast"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/hindi-divas48.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल</strong> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नई दिल्ली के मालवीय नगर इलाके में अरुणाचल प्रदेश की तीन लड़कियों के साथ कथित नस्लीय टिप्पणी और अभद्र व्यवहार का मामला सामने आया है। एयर कंडीशनर  लगाने को लेकर शुरू हुआ एक मामूली पड़ोसी विवाद देखते ही देखते गंभीर आरोपों में बदल गया। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद पुलिस ने आरोपी महिला को गिरफ्तार कर लिया गया है यह कोई पहली बार नहीं है कि पूर्वोत्तर भारत के लोगों के साथ उनकी शारीरिक बनावट व संस्कृति को लेकर कहीं शेष देश में अभद्रता की गई हो। यहां तक कि एक बार तो पूर्वोत्तर के एक मुख्यमंत्री प्रेस वार्ता में यह कहते रो पड़े थे कि उन्हें भारतीय तक नहीं समझा जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बीते साल मई में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्वोत्तर को 'हमारे विविधता के राष्ट्र में सबसे विशिष्ट क्षेत्र' बताया था। लेकिन दुखद तथ्य यह है कि कुछ ताकतें इन टिप्पणी को तूल देकर बात का बतंगड़ बना कर पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों के दिलों में विष वमन करने के लिए लगी रहती है । हालांकि कई बार  इन राज्यों के लोग अक्सर नस्लीय भेदभाव का शिकार होते  हैं लेकिन यह राज्य की कानून व्यवस्था से जुड़े मामले होते हैं जिन्हें नस्लीय भेदभाव से जोड़ कर अलगाव की फसल पैदा करने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है। कुछ समय पूर्व देहरादून में त्रिपुरा के छात्र अंजेल चकमा की हत्या कर दी गई थी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस घटना के दो महीने से भी कम समय बाद, अब दिल्ली में अरुणाचल प्रदेश की तीन महिलाओं को उनके पड़ोसियों ने कुत्सित शब्द ' धंधेवाली' से संबोधित किया और मोमो बेचने को कहा। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि उन्हें अपने ही देश में, और वह भी देश की राष्ट्रीय राजधानी में बेगाना करार दे दिया गया। विडंबना यह है कि यह अभद्रता किसी झगड़े या आवेश की प्रतिक्रिया नहीं थी बल्कि यह पहचान और जातीयता पर लक्षित हमला था। इस घटनाक्रम के बाद एक व्यक्ति और उसकी पत्नी पर धर्म, जाति व जन्मस्थान आदि के आधार पर कटुता फैलाने के आरोप में मामला दर्ज किया गया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके अलावा अन्य आरोप भी लगाए गए हैं। निस्संदेह, इस दंपति के आपत्तिजनक व्यवहार ने एक गहरे जख्म को ही उजागर किया है, जो 'सबका साथ, सबका विकास' की अवधारणा को सिरे से खारिज करने वाली सोच है। साल 2014 में नीदो तानिया की हत्या से लेकर 2025 में अंजेल चकमा की हत्या तक, यह दुराग्रहों का सिलसिला साफ नजर आता है। अक्सर आरोप लगाये जाते रहे हैं कि पूर्वोत्तर के छात्रों व श्रमिकों को उनकी शारीरिक बनावट, खान-पान और भाषा के आधार पर निशाना बनाया जाता है। यह विडंबना ही है कि कुछ संकीर्ण लोग भारत की समृद्ध विविधता की विरासत का मर्म नहीं पहचानते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">किसी राज्य की भौगोलिक स्थिति, जलवायु व सदियों से चली आ रही संस्कृति हमारे रूप-रंग-भाषा व व्यवहार का निर्धारण करती है। कोस-कोस पर भाषा-पानी बदलने वाले देश की यह विविधता इसकी खूबसूरती भी है। इसके मर्म का सम्मान करना व अंगीकार करना हर भारतीय का दायित्व भी है। पर्वतीय इलाकों का परिवेश व जलवायु व्यक्ति के सरल, सहज, सौम्य व्यवहार व कद-काठी का भी निर्धारण करती है। पूर्वोत्तर समाज में स्त्री प्रधान पारिवारिक व्यवस्था तथा सार्वजनिक जीवन में उसकी महती भूमिका को शेष देश के लोगों द्वारा संशय से देखा जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">फलत परस्पर विश्वास की इस सामाजिक व्यवस्था में स्त्री की भूमिका को लेकर नकारात्मक धारणाएं गढ़ ली जाती हैं। यही वजह है कि पूर्वोत्तर के लोगों द्वारा आरोप लगाया जाता कि उनकी महिलाओं को शक की नजर से देखा जाता है और उन पर बिना किसी आधार के अनैतिक गतिविधियों में शामिल होने के आरोप तक लगाए जाते हैं। देश के सर्वोच्च न्यायालय ने भी क्षेत्रीय पहचान को लेकर किए जाने वाले किसी भेदभाव के प्रति अक्सर चेताया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मौजूदा घटना क्रम में अरुणाचल प्रदेश की रहने वाली तीन युवतियां अपने किराए के फ्लैट में एसी लगवा रही थीं। इंस्टॉलेशन के दौरान ड्रिलिंग से उठी धूल-मिट्टी नीचे वाले फ्लैट की ओर गिर गई। नीचे रहने वाली पड़ोसी महिला ने इस पर आपत्ति जताई। शुरुआत में यह सामान्य पड़ोसी विवाद जैसा प्रतीत हो रहा था, लेकिन कुछ ही देर में स्थिति तनावपूर्ण हो गई। आरोप है कि महिला ने गुस्से में युवतियों के खिलाफ नस्लीय और आपत्तिजनक टिप्पणियां कीं। इसी दौरान किसी ने पूरी घटना का वीडियो रिकॉर्ड कर लिया, जो बाद में सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया।वायरल वीडियो में आरोपी महिला को कथित तौर पर अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हुए सुना और देखा जा सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कई यूजर्स ने इसे नस्लीय भेदभाव का मामला बताते हुए सख्त कानूनी कार्रवाई की मांग की। पूर्वोत्तर भारत के नागरिकों के साथ भेदभाव को लेकर पहले भी बहस होती रही है, और इस घटना ने इस संवेदनशील मुद्दे को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है।घटना के बाद पीड़ित युवतियों ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के आधार पर मामला दर्ज कर जांच शुरू की गई। शुरुआती जांच में वायरल वीडियो और अन्य साक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए संबंधित धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया। जांच के दौरान पुलिस ने पाया कि मामले में अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धाराएं भी लागू हो सकती हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके बाद केस में इन प्रावधानों को जोड़ा गयाजांच आगे बढ़ने के साथ पुलिस ने आरोपी महिला, जिसकी पहचान रूबी जैन के रूप में हुई है, को गिरफ्तार कर लिया। दिल्ली पुलिस ने जांच के दौरान एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम की संबंधित धाराएं आरोपी के खिलाफ जोड़ी हैं.पुलिस के अनुसार, गिरफ्तारी के बाद पूछताछ जारी है और मामले की जांच एसीपी स्तर के अधिकारी की निगरानी में की जा रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अधिकारियों का कहना है कि वायरल वीडियो के अलावा अन्य साक्ष्यों की भी बारीकी से जांच की जा रही है, ताकि पूरे घटनाक्रम की सच्चाई सामने लाई जा सके।इस मामले में अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू समेत ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी मामले में प्रतिक्रिया व्यक्त कर दुख जताया है। सब समूचे सभ्य समाज की अवधारणा कुछ इने गिने नासमझ लोगों की टिप्पणी से नहीं आंकी जानी चाहिए हम उत्तर से पूर्वोत्तर दक्षिण से पश्चिम तक एक है एक रहेंगे और भविष्य में ऐसी कोई घटना नहीं होनी चाहिए। </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 27 Feb 2026 18:37:16 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>विश्व जनसंवाद के शिखर पुरुष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अद्वितीय डिजिटल वर्चस्व</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">आधुनिक युग में जननेतृत्व की शक्ति केवल जनसभाओं और चुनावी विजय तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि जनसंवाद के नए माध्यमों पर उसकी स्वीकार्यता से भी आंकी जाती है। इस संदर्भ में नरेंद्र मोदी ने एक ऐतिहासिक उपलब्धि प्राप्त करते हुए स्वयं को विश्व के सर्वाधिक प्रभावशाली नेताओं की अग्रिम पंक्ति में स्थापित कर दिया है। सामाजिक माध्यम इंस्टाग्राम पर10 करोड़ से अधिक अनुयायियों का आंकड़ा पार कर उन्होंने ऐसा कीर्तिमान बनाया है, जो अब तक किसी भी राजनेता के लिए संभव नहीं हो पाया था। यह उपलब्धि केवल लोकप्रियता का संकेत नहीं, बल्कि व्यापक जनविश्वास और वैश्विक आकर्षण</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/171692/the-unique-digital-supremacy-of-prime-minister-narendra-modi-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/images15.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">आधुनिक युग में जननेतृत्व की शक्ति केवल जनसभाओं और चुनावी विजय तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि जनसंवाद के नए माध्यमों पर उसकी स्वीकार्यता से भी आंकी जाती है। इस संदर्भ में नरेंद्र मोदी ने एक ऐतिहासिक उपलब्धि प्राप्त करते हुए स्वयं को विश्व के सर्वाधिक प्रभावशाली नेताओं की अग्रिम पंक्ति में स्थापित कर दिया है। सामाजिक माध्यम इंस्टाग्राम पर10 करोड़ से अधिक अनुयायियों का आंकड़ा पार कर उन्होंने ऐसा कीर्तिमान बनाया है, जो अब तक किसी भी राजनेता के लिए संभव नहीं हो पाया था। यह उपलब्धि केवल लोकप्रियता का संकेत नहीं, बल्कि व्यापक जनविश्वास और वैश्विक आकर्षण का प्रमाण है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री मोदी ने वर्ष 2014 में इस मंच पर अपनी सक्रिय उपस्थिति आरंभ की थी। उस समय भारत में सामाजिक माध्यमों का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा था, किंतु राजनीतिक नेतृत्व का उस पर इतना सशक्त प्रभाव नहीं था। उन्होंने इस माध्यम को केवल प्रचार का साधन नहीं बनाया, बल्कि इसे राष्ट्र और नागरिकों के बीच सीधा संवाद स्थापित करने का सेतु बनाया। वे अपने संदेशों के माध्यम से देश की उपलब्धियों, सांस्कृतिक परंपराओं, युवा शक्ति, वैज्ञानिक प्रगति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को सरल और प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करते हैं। यही कारण है कि उनके संदेशों को देश ही नहीं, विदेशों में भी व्यापक सराहना मिलती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यदि अन्य देशों के नेताओं से तुलना की जाए तो यह अंतर और अधिक स्पष्ट हो जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के लगभग 4.32 करोड़ अनुयायी हैं, जो प्रधानमंत्री मोदी की संख्या से काफी कम हैं। इसी प्रकार इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्राबोवो सुबियन्तो के लगभग डेढ़ करोड़ अनुयायी हैं। ब्राजील के राष्ट्रपति  लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा के लगभग 1.44 करोड़, तुर्किये के राष्ट्रपति   रेकेप तईप एरदोगान बके लगभग 1.16 करोड़ तथा अर्जेंटीना के राष्ट्रपति जेवियर मिलई के लगभग 64 लाख अनुयायी हैं। इन सभी नेताओं की लोकप्रियता अपने-अपने देशों में महत्वपूर्ण मानी जाती है, किंतु वैश्विक सामाजिक मंच पर उनकी स्वीकार्यता प्रधानमंत्री मोदी की तुलना में कहीं पीछे दिखाई देती है। यह अंतर दर्शाता है कि मोदी का प्रभाव सीमाओं से परे जाकर विश्वव्यापी हो चुका है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत के भीतर भी उनका वर्चस्व अत्यंत स्पष्ट है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लगभग 2.61 करोड़ अनुयायियों के साथ दूसरे स्थान पर हैं, जबकि कांग्रेस नेता राहुल गांधी लगभग 1.26 करोड़ अनुयायियों के साथ तीसरे स्थान पर आते हैं। यह अंतर केवल संख्या का नहीं, बल्कि प्रभाव की व्यापकता का भी संकेत है। प्रधानमंत्री मोदी का मंच एकतरफा जनसमर्थन का प्रतीक बन गया है, क्योंकि वे स्वयं किसी को अनुकरण नहीं करते, फिर भी करोड़ों लोग उन्हें स्वेच्छा से अनुकरण करते हैं। यह स्थिति उनके नेतृत्व के प्रति गहरे विश्वास को दर्शाती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता का आधार केवल उनकी डिजिटल उपस्थिति नहीं है, बल्कि उनके कार्यों और दृष्टिकोण से जुड़ा हुआ है। उनके नेतृत्व में देश ने तकनीकी विस्तार और डिजिटल सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए। करोड़ों नए नागरिक इंटरनेट से जुड़े और शासन की योजनाओं की जानकारी सीधे प्राप्त करने लगे। सामाजिक माध्यमों पर उनकी सक्रियता ने शासन और जनता के बीच दूरी को कम किया है। वे नियमित रूप से राष्ट्रीय पर्वों, सांस्कृतिक उत्सवों, खिलाड़ियों की उपलब्धियों और वैश्विक मंचों पर भारत की भूमिका को साझा करते हैं। इससे उनकी छवि एक ऐसे नेता की बनती है जो राष्ट्र के हर क्षेत्र से जुड़ा हुआ है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विश्व राजनीति में अनेक नेता सामाजिक माध्यमों का उपयोग करते हैं, किंतु प्रधानमंत्री मोदी ने इसे जनभागीदारी और राष्ट्रीय गौरव का माध्यम बनाया है। वे विदेश यात्राओं के दौरान प्रवासी भारतीयों से संवाद के दृश्य साझा करते हैं, अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भारत की भूमिका को रेखांकित करते हैं और वैश्विक मंच पर देश की प्रतिष्ठा को सुदृढ़ करते हैं। इस कारण उनकी पहचान केवल एक राष्ट्रीय नेता के रूप में नहीं, बल्कि एक वैश्विक व्यक्तित्व के रूप में स्थापित हुई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अनुमोदन के स्तर पर भी वे अनेक नेताओं से आगे बताए जाते हैं। यह स्पष्ट करता है कि उनकी लोकप्रियता केवल आभासी नहीं, बल्कि वास्तविक समर्थन पर आधारित है। जनता के साथ निरंतर संवाद, योजनाओं की पारदर्शिता और व्यक्तिगत सादगी ने उन्हें विशेष स्थान दिलाया है। जहां अन्य देशों में कई नेता सामाजिक माध्यमों पर सीमित प्रभाव रखते हैं, वहीं प्रधानमंत्री मोदी ने इसे व्यापक जनआंदोलन का रूप दे दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह उपलब्धि भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा का भी प्रतीक है। जब किसी राष्ट्र का नेता विश्व के सामाजिक मंच पर सर्वोच्च स्थान प्राप्त करता है, तो वह उस देश की सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक शक्ति का संकेत देता है। प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता भारत की युवा ऊर्जा, तकनीकी प्रगति और आत्मविश्वास का परिचायक बन गई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">निष्कर्ष यह है कि  इंस्टाग्राम पर 10 करोड़ से अधिक अनुयायियों का आंकड़ा पार कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह सिद्ध कर दिया है कि वे डिजिटल युग के सर्वश्रेष्ठ और सर्वाधिक प्रभावशाली नेता हैं। अन्य देशों के नेताओं की तुलना में उनका प्रभाव, संवाद कौशल और जनस्वीकृति कहीं अधिक व्यापक और सशक्त है। विश्व जनसंवाद के इस युग में वे निस्संदेह शिखर पुरुष के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>
<div class="yj6qo" style="text-align:justify;"> </div>
<div class="adL" style="text-align:justify;"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 27 Feb 2026 18:32:45 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>प्रजातंत्र, नागरिक और समाज की स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति पर अवलंबित</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">हर देश में राष्ट्र के प्रति और राष्ट्रहित के प्रति चिंतन करने वालों का समूह होना चाहिए,जो प्रजातांत्रिक लोकतांत्रिक तथा राष्ट्रहित के विचारों और विकास के मूल मंत्र को नई ऊर्जा ताजा हवा और आगे बढ़ने की सच्चाई को इंगित कर सकेंl बिना संस्कृति ,संस्कार और वैचारिक क्षमता के कोई भी राष्ट्र वैश्विक स्तर पर अंतरराष्ट्रीय प्रगति करने की सोच भी नहीं सकताl वैचारिक और सैद्धांतिक अंतरधारा, सिद्धांतों को कुचला या नष्ट नहीं किया जा सकता। व्यक्तिगत वैचारिक अभिव्यक्ति भारत के संदर्भ में गणतंत्र की मूल आत्मा है।</p>
<p style="text-align:justify;">विचार और सिद्धांत व्यक्ति की अंतःप्रज्ञा होती है। यह सिद्धांत तथा अंतः</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/171690/democracy-depends-on-the-freedom-of-expression-of-citizen-and"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/hindi-divas48.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हर देश में राष्ट्र के प्रति और राष्ट्रहित के प्रति चिंतन करने वालों का समूह होना चाहिए,जो प्रजातांत्रिक लोकतांत्रिक तथा राष्ट्रहित के विचारों और विकास के मूल मंत्र को नई ऊर्जा ताजा हवा और आगे बढ़ने की सच्चाई को इंगित कर सकेंl बिना संस्कृति ,संस्कार और वैचारिक क्षमता के कोई भी राष्ट्र वैश्विक स्तर पर अंतरराष्ट्रीय प्रगति करने की सोच भी नहीं सकताl वैचारिक और सैद्धांतिक अंतरधारा, सिद्धांतों को कुचला या नष्ट नहीं किया जा सकता। व्यक्तिगत वैचारिक अभिव्यक्ति भारत के संदर्भ में गणतंत्र की मूल आत्मा है।</p>
<p style="text-align:justify;">विचार और सिद्धांत व्यक्ति की अंतःप्रज्ञा होती है। यह सिद्धांत तथा अंतः विचारधारा जनमानस तक पहुंचने से बाधित किया जाए तो अंतरात्मा को प्रभावित करती है। इसके गहरे प्रभाव से व्यक्ति वह सब कर सकता है, जो बिना मार्गदर्शन के व्यक्ति नहीं कर सकता। प्राचीन काल से अब तक मनीषियों के वैचारिक सिद्धांत और विचारधारा सदैव समाज के दिग्दर्शक मार्गदर्शक रहे हैं। इनकी भूमिका सदैव महत्वपूर्ण रही है।यदि यही सिद्धांत और अंतः प्रज्ञा जनमानस आत्मसात कर लेता है, तो इसका प्रभाव एक जन आंदोलन का रूप ले लेता है और यहीं से युग परिवर्तन की लहर उत्पादित होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्राचीन यूनान में एक बहुत ही कुरूप किंतु विद्वान व्यक्ति रहते थे,उनके विचारों में मौलिकता,नयापन जनजागृति की अद्भुत क्षमता थी। उनकी विद्वता के कारण आम जनमानस होने राजा से ज्यादा महत्व और बुद्धिमान मानते थे। राजकीय तानाशाही के चलते उनके विचारों के कारण उनको मृत्युदंड दे दिया गया। जहर का प्याला पीने के बाद भी विद्वान, चिंतक, सुकरात अमर हो गए, उनकी विचारधारा आज भी जीवित है, एवं लोग उसे अपनाकर अपना जीवन सुधारने में इसका उपयोग करते हैं। अब्राहम लिंकन ने अमेरिकी स्वतंत्रता के बाद दास प्रथा के बारे में कहा था कि दास भी मनुष्य हैं, उन्हें भी उतना ही जीने का अधिकार है जितना स्वामी को है।</p>
<p style="text-align:justify;">अब्राहम लिंकन के आंदोलनकारी विचार से तत्कालीन समय में अमेरिका के लोग घबरा गए थे,और उनकी हत्या कर दी गई थी। पर अब्राहम लिंकन के विचारों ने दास प्रथा के उन्मूलन की अंतर आत्मा को जागृत कर दिया था, और जनमानस ने अपने अधिकारों के लिए लड़ते हुए दास प्रथा से मुक्ति पाई थी।स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था कि हम जो सोचते हैं वही बन जाते हैं। विचार एवं सिद्धांत ही व्यक्ति का निर्माण करता है। वही दुष्ट होने या महान होने का निर्णायक है। और बिना विचारों सिद्धांतों के व्यक्त व्यक्ति का अस्तित्व ही नहीं । विवेकानंद जी के विचार सर्व कालीन प्रासंगिक है। उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने उनके जीवित रहते हुए थे।</p>
<p style="text-align:justify;">आज हमारे बीच विवेकानंद जी स शरीर मौजूद नहीं है, पर उनके विचारों की महत्ता कायम है।भौतिक शरीर के नष्ट हो जाने से और भौतिक विचार तथा सिद्धांत उतनी ही तीव्रता रखते हैं, वेग रखते हैं, जो एक समाज में परिवर्तन ला सकती है ।विचारों की यह अमरता तथा तीव्रता किसी भी तानाशाह के लिए इतनी खतरनाक है, जितनी की सुप्त शेर की गुफा में रहना। जनता के मध्य शुद्ध विचारधारा के जागृत होने पर क्रांति लाई जा सकती है। फिर चाहे वह फ्रांस के वर्साय के महल का विध्वंस हो अथवा भारत की स्वतंत्रता हेतु वृहद आंदोलन हो।</p>
<p style="text-align:justify;">व्यक्ति या व्यक्तियों के दबाव को दबाने के बाद विचारों की पीड़िता ने जनसामान्य को एक गरजते हुए सिंह में तब्दील कर दिया था। यह शाश्वत सत्य है कि व्यक्ति को जरूर आप दबा सकते हैं,पर विचारधारा सिद्धांत अजर अमर होते हैं,और वही युग निर्माण में अपनी महती भूमिका निभाते हैं।विचारों के संदर्भ में कहा जाता है कि एक व्यक्ति का विचार तब तक उस व्यक्ति के पास है, जब तक वह अकेला है किंतु जैसे ही विचारधारा एवं सिद्धांत का प्रचार प्रसार होता है, तो वह व्यक्ति अकेला ना रह कर उस जैसे हजारों लाखों लोग उसके साथ हो जाते हैं। तब वह अकेला नहीं रह जाता।</p>
<p style="text-align:justify;">वह अपने विचारों के माध्यम से जन सामान्य को प्रभावित कर लोगों को उस लड़ाई में शामिल कर लेता है, जिस लड़ाई के वह कभी अकेले नहीं लड़ सकता था। विचारों सिद्धांतों की तीव्रता आवेश तथा सघनता किसी भी क्रांतिकारी लक्ष्य की प्राप्ति में एक बड़ा साधक हो सकता है। विचार व सिद्धांत एक से दूसरे व्यक्ति तक स्थानांतरित होते रहते हैं। जिसमें विचारों को सघनता प्राप्त होती है। ताकि सत्ता के दमन के समय वैचारिक अमरता स्थाई बनी रहे। चीन उत्तर कोरिया जैसे राष्ट्रों में विचारों के इस स्वतंत्र का प्रवाह को बाधित नियंत्रित कर दिया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">अभिव्यक्ति के तमाम माध्यमों को प्रतिबंधित कर दमन चक्र चलाया गया। वहां विचार और सिद्धांत विद्वान व्यक्ति तक ही सीमित रहे उसका फैलाव या विस्तार नहीं हो पाया। जो मानव समाज तथा मानव अधिकारों की संवेदना तथा धाराओं का उल्लंघन भी है।किसी स्वस्थ स्वतंत्र राष्ट्र के लिए व्यक्ति समाज और राष्ट्र के विचारों की स्वतंत्रता नवीनता तथा उत्कृष्टता अत्यंत आवश्यक है। क्योंकि विचारधारा और सिद्धांतों को रोक पाना किसी भी सत्ता या निरंकुश राजा के नियंत्रण में नहीं होता। विचारों और सिद्धांत अनादि काल से गतिशील है तथा अनंत तक जगत तक गतिशील रहेंगे,और उसका प्रतिपादक एवं अनुशीलन कर्ता विचारों के साथ अमर हो जाते हैं।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 27 Feb 2026 18:27:20 +0530</pubDate>
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                <title>रंगों से नहीं, परिवर्तन से खिलता है मन का वसंत</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कृति आरके जैन</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अँधेरा जितना भी गहरा हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब आग की लपटें उठती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह हर छिपी कड़वाहट और पुरानी पीड़ा को राख बना देती हैं। होलिका दहन केवल एक धार्मिक रस्म नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह जीवन का सबसे बड़ा संदेश है कि बुराई कितनी भी प्रबल क्यों न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह अंततः समाप्त हो जाती है। राख से उठता है नया वसंत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें हर पत्ता हरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर फूल खिलता और हर सांस नई ऊर्जा से भर जाती है। होली हमें यह सिखाती है कि परिवर्तन कोई असंभव चमत्कार नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि हर क्षण हमारी अपनी</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/171688/the-spring-of-the-mind-blooms-not-by-colors-but"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/download1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कृति आरके जैन</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अँधेरा जितना भी गहरा हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब आग की लपटें उठती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह हर छिपी कड़वाहट और पुरानी पीड़ा को राख बना देती हैं। होलिका दहन केवल एक धार्मिक रस्म नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह जीवन का सबसे बड़ा संदेश है कि बुराई कितनी भी प्रबल क्यों न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह अंततः समाप्त हो जाती है। राख से उठता है नया वसंत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें हर पत्ता हरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर फूल खिलता और हर सांस नई ऊर्जा से भर जाती है। होली हमें यह सिखाती है कि परिवर्तन कोई असंभव चमत्कार नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि हर क्षण हमारी अपनी समझ और प्रयास से संभव है। जो आज दुख में डूबा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही कल प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आनंद और उमंग के रंग में सराबोर हो सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">होलिका की कथा केवल पुरानी कहानी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि मानव मन के भीतर छिपे द्वंद्व का प्रतीक है। हिरण्यकश्यप का अहंकार और प्रह्लाद की निश्छल भक्ति हमें बताते हैं कि अच्छाई और बुराई दोनों हमारे भीतर मौजूद हैं। जब अहंकार की आग अपने आप को भस्म कर देती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब प्रेम और सत्य की शक्ति और प्रबल हो जाती है। हमारी जिंदगी में भी कई “हिरण्यकश्यप” हैं — ईर्ष्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रोध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लालच — जो हमें मानसिक और भावनात्मक रूप से जलाने का प्रयास करते हैं। लेकिन जब हम प्रह्लाद की तरह सत्य और प्रेम पर अडिग रहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वही आग नकारात्मकता को समाप्त कर देती है। यही होली का सबसे बड़ा संदेश है — परिवर्तन हमेशा हमारे भीतर से शुरू होता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रंग बरसाना केवल चेहरों तक सीमित नहीं होता</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">यह दिलों की दीवारों तक पहुँचता है। पुराने मतभेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्षों की शिकायतें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टूटे रिश्ते और कड़वाहटें सब रंगों में घुलकर मिट जाती हैं। होली का वसंत तभी आता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब हम पहले अपने भीतर की होलिका जला चुके होते हैं। जैसे सर्दियों के बाद बसंत की ताजगी आती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसे ही मन के अँधेरों और पुराने गिले-शिकवे समाप्त होने पर प्रेम और भाईचारा खिलता है। परिवर्तन का अर्थ है पुरानी आदतों और नकारात्मक सोच को जलाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और नए विचार और सकारात्मक ऊर्जा अंकुरित करने देना। होली यही सिखाती है कि जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं — न दुख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न क्रोध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न असफलता</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">सब बदल सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि हम खुद को बदलने की हिम्मत करें।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">होली का उत्सव कठिनाइयों को सरल बना देता है। रंग खेलते समय लोग जाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संपत्ति या पद की सीमाओं को भूल जाते हैं। सभी एक हो जाते हैं। यही एकता परिवर्तन की पहली सीढ़ी है। जब हम दूसरों को रंग लगाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो अनजाने में अपनी कड़वाहट भी धुल जाती है। क्षमा और समझौते की भावना जन्म लेती है। परिवर्तन अकेले नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह सामूहिक प्रयास से संभव होता है। एक व्यक्ति जब बदलता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसके आसपास का समाज भी बदलने लगता है। बुराई की होलिका अकेले नहीं जलती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छाई का वसंत भी अकेले नहीं आता। सामूहिक प्रयास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम और समझदारी से ही यह संभव होता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">होली का पर्व हमें यह भी सिखाता है कि परिवर्तन केवल बाहरी बदलाव नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि अंदर से उठने वाली क्रांति है। यह बदलाव धीरे-धीरे आता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब हम पुराने भ्रम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डर और संदेह को जलाते हैं। यह बदलाव व्यक्ति के दृष्टिकोण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोच और व्यवहार में दिखाई देता है। जब हम दूसरों के लिए समझ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दया और सहयोग का रंग भरते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वही रंग हमारे भीतर की बुराई और नकारात्मकता को भी मिटा देता है। होली केवल खुशियों का पर्व नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि आत्म-शुद्धि और सामाजिक एकता का प्रतीक भी है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकृति भी इस संदेश का प्रतीक है। जैसे सर्दियों के बाद बसंत में हर पेड़ और हर फूल नया जीवन लेकर आता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसे ही हमारे जीवन में भी पुराने दुख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुराने भय और पुराने गिले-शिकवे खत्म होने पर नई ऊर्जा और नई संभावनाएँ जन्म लेती हैं। होली हमें याद दिलाती है कि परिवर्तन सतत प्रक्रिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कभी रुकती नहीं। हर अंत में नया आरंभ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और हर कठिनाई में सीख और अवसर छिपे होते हैं। जीवन के रंग तभी खिलते हैं जब हम पुराने अंधेरों को स्वीकार कर उनके ऊपर से विजय की आग लगाते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बुराई जल रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मतलब पुरानी कमजोरियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोष और भय समाप्त हो रहे हैं। अच्छाई का वसंत आ रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मतलब नई संभावनाएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नया प्रेम और नयी ऊर्जा जन्म ले रही हैं। यह त्योहार हमें यह भी सिखाता है कि केवल खुद को बदलना ही पर्याप्त नहीं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरों के लिए मार्ग खोलना और उन्हें प्रेरित करना भी जरूरी है। जब हम अपनी छोटी-छोटी सकारात्मक क्रियाओं के माध्यम से दूसरों के जीवन में रंग भरते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो समाज सामूहिक परिवर्तन की ओर अग्रसर होता है। यही होली का असली अर्थ है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">होली हमें याद दिलाती है कि परिवर्तन हमेशा संभव है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुराई चाहे कितनी भी प्रबल क्यों न हो। जीवन का प्रत्येक क्षण नया अवसर देता है। पुरानी आदतों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और नकारात्मकताओं को जलाकर ही हम सच्चे वसंत का अनुभव कर सकते हैं। बस हमें अपने भीतर की आग को पहचानना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी कमजोरी स्वीकार करनी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षमा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समझ और सकारात्मकता के रंग भरने हैं। होली नहीं मनानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">होली जीनी है — हर दिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर पल। क्योंकि जब हम बदलाव को अपनाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो जीवन न केवल रंगीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">चमत्कारिक और प्रेरक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बन जाता है। यही होली का असली संदेश है — बुराई जल रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छाई का वसंत आ रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और जीवन हमेशा नई शुरुआत का अवसर देता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कृति आरके जैन</span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 27 Feb 2026 18:18:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>पकिस्तान में सेना पर अंकुश लगाने की कोशिश</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="margin-bottom:0.0001pt;line-height:normal;background:rgb(246,246,246);text-align:justify;" align="right"><strong><span style="font-size:12pt;font-family:Mangal, serif;color:#2d2d2d;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></span></strong></p>
<p style="text-align:justify;">  </p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">पाकिस्तान की सियासत के सात दशकों का इतिहास यदि एक वाक्य में पिरोना हो</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तो वह </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">लोकतंत्र और वर्दी के बीच का कभी न खत्म होने वाला द्वंद्व</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">है। </span>14 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">अगस्त </span>1947 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">को वजूद में आने के बाद से ही इस मुल्क ने एक ऐसी विडंबना को जिया है जहाँ संविधान की किताब तो नागरिक शासन की बात करती है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">लेकिन सत्ता की असली चाबी रावलपिंडी के जनरल हेडक्वार्टर्स में महफूज रहती है। पाकिस्तान में सेना पर अंकुश लगाने की कोशिशें केवल राजनीतिक सुधारों का हिस्सा नहीं रही हैं</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि ये अस्तित्व की</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/171684/efforts-to-curb-the-army-in-pakistan"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/hindi-divas47.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="margin-bottom:0.0001pt;line-height:normal;background:rgb(246,246,246);text-align:justify;" align="right"><strong><span style="font-size:12pt;font-family:Mangal, serif;color:#2d2d2d;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></span></strong></p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">पाकिस्तान की सियासत के सात दशकों का इतिहास यदि एक वाक्य में पिरोना हो</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तो वह </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">लोकतंत्र और वर्दी के बीच का कभी न खत्म होने वाला द्वंद्व</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">है। </span>14 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">अगस्त </span>1947 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">को वजूद में आने के बाद से ही इस मुल्क ने एक ऐसी विडंबना को जिया है जहाँ संविधान की किताब तो नागरिक शासन की बात करती है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">लेकिन सत्ता की असली चाबी रावलपिंडी के जनरल हेडक्वार्टर्स में महफूज रहती है। पाकिस्तान में सेना पर अंकुश लगाने की कोशिशें केवल राजनीतिक सुधारों का हिस्सा नहीं रही हैं</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि ये अस्तित्व की वो लड़ाइयां रही हैं जिनमें कई प्रधानमंत्रियों ने अपनी कुर्सी गवाई</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जेल की सजा काटी और कुछ ने तो अपनी जान से भी हाथ धोया। इस संघर्ष की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी साल </span>2006 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">का </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">लोकतंत्र का चार्टर</span>'<span>  </span><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जिसे नवाज शरीफ और बेनजीर भुट्टो ने लंदन की निर्वासित गलियों में तैयार किया था। यह दस्तावेज केवल एक समझौता नहीं था</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि पाकिस्तानी सेना के उस </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">हाइब्रिड मॉडल</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">के खिलाफ एक सीधा युद्धघोष था</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जिसने देश को विकास के बजाय बारूद और कर्ज के ढेर पर ला खड़ा किया।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">पाकिस्तान में सेना का वर्चस्व अचानक पैदा नहीं हुआ। </span>1958 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">में अयूब खान</span>, 1977 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">में जिया-उल-हक और </span>1999 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">में परवेज मुशर्रफ द्वारा किए गए सैन्य तख्तापलट ने मुल्क की राजनीतिक जड़ों को इतना खोखला कर दिया कि वहां की अवाम और सियासतदानों के मन में यह बात बैठ गई कि </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तख्त</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">का रास्ता सेना की मंजूरी से होकर ही गुजरता है। सेना ने खुद को न केवल सरहदों का रखवाला</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">वैचारिक सीमाओं</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">का रक्षक और राष्ट्रीय सुरक्षा का एकमात्र ठेकेदार घोषित कर दिया। इसी पृष्ठभूमि में जब </span>2006 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">में चार्टर ऑफ डेमोक्रेसी पर हस्ताक्षर हुए</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तो उम्मीद की एक किरण जगी थी। इस चार्टर में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि सेना को राजनीति से पूरी तरह बेदखल किया जाएगा</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">खुफिया एजेंसियां (</span>ISI <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">और </span>MI) <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">केवल प्रधानमंत्री के प्रति जवाबदेह होंगी</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">और किसी भी सैन्य अधिकारी को संवैधानिक पद पर बैठने की अनुमति नहीं दी जाएगी। यह पाकिस्तान के इतिहास में पहली बार था जब दो कट्टर प्रतिद्वंद्वी दल</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">पीपीपी और पीएमएल-एन</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">अपनी आपसी रंजिश भुलाकर एक साझा दुश्मन यानी </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">सैन्य प्रतिष्ठान</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">के खिलाफ एकजुट हुए थे।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">हालांकि</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">इतिहास गवाह है कि पाकिस्तान में सेना पर लगाम कसने की हर कोशिश को खुद सेना ने बहुत ही शातिर तरीके से नाकाम किया। </span>2007 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">में बेनजीर भुट्टो की शहादत और उसके बाद </span>2008 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">के चुनावों के बाद बनी लोकतांत्रिक सरकार ने जब भी सेना के अधिकारों को चुनौती देने की कोशिश की</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">उसे </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">मेमोगेट स्कैंडल</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">या </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">डॉन लीक्स</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जैसे विवादों में उलझा दिया गया। सेना ने अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए एक नया तरीका ईजाद किया जिसे </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">हाइब्रिड शासन</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">कहा जाता है। इसमें सीधे तौर पर मार्शल लॉ नहीं लगाया जाता</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि एक ऐसी राजनीतिक कठपुतली को सत्ता में बिठाया जाता है जो सेना के हितों की रक्षा कर सके। इमरान खान का </span>2018 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">में सत्ता में आना इसी प्रयोग का हिस्सा माना गया था</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">लेकिन विडंबना देखिए कि जिस इमरान खान को सेना ने </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">प्रोजेक्ट</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">के तौर पर लॉन्च किया था</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">वही </span>2022 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">में सत्ता से बेदखल होने के बाद सेना के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गए। आज </span>2026 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">के दौर में भी पाकिस्तान उसी दोराहे पर खड़ा है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">सेना पर अंकुश लगाने की राह में सबसे बड़ी बाधा पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर सेना का कब्जा है। </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">मिलिट्री इंक</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">के नाम से मशहूर यह व्यवस्था बैंकिंग</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">खाद</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">सीमेंट</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">अनाज और रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों में सेना का एकाधिकार सुनिश्चित करती है। जब किसी संस्था के पास देश की अर्थव्यवस्था का इतना बड़ा हिस्सा और अत्याधुनिक हथियार दोनों हों</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तो निहत्थे राजनेता उसके सामने बौने नजर आते हैं। इसके अलावा</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">पाकिस्तान की न्यायपालिका ने भी अक्सर सेना के कदमों को </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जरूरत का सिद्धांत</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बताकर जायज ठहराया है। जब तक जजों की नियुक्तियों और उनके फैसलों पर सेना का परोक्ष दबाव रहेगा</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तब तक लोकतांत्रिक अंकुश की बात केवल एक किताबी कल्पना बनी रहेगी। वर्तमान में आसिम मुनीर के कार्यकाल में सेना की शक्ति और भी केंद्रित हो गई है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जहाँ विशेष सैन्य अदालतों के माध्यम से नागरिकों और राजनेताओं को नियंत्रित किया जा रहा है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">फरवरी </span>2026 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">की हालिया राजनीतिक हलचल</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">जिसमें शहबाज शरीफ सरकार ने इमरान खान की पार्टी (</span>PTI) <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">को फिर से </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">लोकतंत्र के चार्टर</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">पर साइन करने का न्यौता दिया है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">इस दिशा में एक हताश लेकिन महत्वपूर्ण प्रयास दिखती है। यह प्रस्ताव इस अहसास से उपजा है कि जब तक राजनीतिक दल आपस में लड़ते रहेंगे</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">सेना </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">फूट डालो और राज करो</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">की नीति से अपना उल्लू सीधा करती रहेगी। यदि इमरान खान और वर्तमान सत्ताधारी गठबंधन सेना के खिलाफ एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर सहमत हो जाते हैं</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तो यह पाकिस्तान की सेना के लिए दशकों बाद सबसे बड़ी चुनौती होगी। लेकिन यहाँ भी संदेह के बादल गहरे हैं</span>; <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">क्या इमरान खान वास्तव में लोकतंत्र को मजबूत करना चाहते हैं या वे केवल सेना के साथ अपनी व्यक्तिगत </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">डील</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">की तलाश में हैं</span>? <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">पाकिस्तान की राजनीति में </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">डील</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">और </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">ढीली</span>' (<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">रियायत) दो ऐसे शब्द हैं जिन्होंने वहां के लोकतंत्र को कभी परिपक्व नहीं होने दिया।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">भारत और शेष विश्व के लिए पाकिस्तान में सेना पर अंकुश लगाने की कोशिशें बेहद संवेदनशील मामला हैं। एक ऐसी सेना जिसके हाथ में परमाणु हथियारों का बटन हो और जिसका राजनीतिक अस्तित्व भारत-विरोध पर टिका हो</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">वह कभी भी शांति की समर्थक नहीं हो सकती। यदि वहां की नागरिक सरकारें वास्तव में सेना को बैरकों तक सीमित करने में सफल होती हैं</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तो इससे न केवल कश्मीर मुद्दे पर बातचीत का एक ठोस धरातल तैयार होगा</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में स्थिरता आएगी। लेकिन यह रास्ता कांटों भरा है। सेना ने दशकों से यह नैरेटिव गढ़ा है कि बिना उनके पाकिस्तान का वजूद खत्म हो जाएगा। इस नैरेटिव को तोड़ने के लिए पाकिस्तान के राजनेताओं को न केवल एकजुट होना होगा</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बल्कि उन्हें सुशासन के माध्यम से जनता का विश्वास भी जीतना होगा।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">अंततः</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">पाकिस्तान में सेना पर अंकुश लगाने की कोशिशें तब तक सफल नहीं हो सकतीं जब तक कि वहां का मध्यम वर्ग और युवा पीढ़ी इस बदलाव के लिए सड़कों पर खड़ी न हो। </span>9 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">मई </span>2023 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">की घटनाओं ने दिखाया था कि जनता के एक हिस्से में सेना के खिलाफ गुस्सा तो है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">लेकिन बिना संगठित नेतृत्व और संस्थागत सुधारों के</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">यह गुस्सा केवल अराजकता पैदा करता है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">बदलाव नहीं। </span>2006 <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">का चार्टर आज भी एक मार्गदर्शक दस्तावेज की तरह मौजूद है</span>, <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">लेकिन इसकी सार्थकता तभी है जब इसे सत्ता हथियाने का हथियार बनाने के बजाय देश के भविष्य को सुरक्षित करने का संकल्प बनाया जाए। पाकिस्तान को आज एक ऐसे </span>'<span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">सत्य और सुलह आयोग</span>' <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">की जरूरत है जो सेना के राजनीतिक दखल के घावों को भरे और एक ऐसा नया सामाजिक अनुबंध</span> <span lang="hi" style="font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';" xml:lang="hi">तैयार करे जहाँ बंदूक की ताकत वोट की ताकत के सामने नतमस्तक हो।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 27 Feb 2026 18:07:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>ज्ञान आधारित महाशक्ति बनने के लिए भारतीय महिलाओं का वैज्ञानिक क्रांति का सारथी बनना आवश्यक</title>
                                    <description><![CDATA[<div>
<div style="text-align:justify;"><strong>डा. मनमोहन प्रकाश </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">​प्रत्येक वर्ष 28 फरवरी को मनाया जाने वाला राष्ट्रीय विज्ञान दिवस केवल सर सी.वी. रमन द्वारा 1928 में खोजे गए 'रमन प्रभाव' की स्मृति मात्र नहीं है, बल्कि यह आधुनिक भारत के उस संकल्प का प्रतिबिंब है जहाँ विज्ञान ही राष्ट्र की नियति का आधार बनेगा। आज जब भारत 'विकसित भारत @2047' के महालक्ष्य की ओर अग्रसर है, तब यह स्पष्ट है कि हम केवल भौतिक संसाधनों के बल पर नहीं, बल्कि 'ज्ञान' की शक्ति से विश्व पटल पर अपनी पहचान बना सकते हैं, और बना भी रहे हैं। इस ज्ञान आधारित महाशक्ति की परिकल्पना तब तक</div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/171680/to-become-a-knowledge-based-superpower-it-is-necessary-for-indian"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/women-scintist-780x456.jpg" alt=""></a><br /><div>
<div style="text-align:justify;"><strong>डा. मनमोहन प्रकाश </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">​प्रत्येक वर्ष 28 फरवरी को मनाया जाने वाला राष्ट्रीय विज्ञान दिवस केवल सर सी.वी. रमन द्वारा 1928 में खोजे गए 'रमन प्रभाव' की स्मृति मात्र नहीं है, बल्कि यह आधुनिक भारत के उस संकल्प का प्रतिबिंब है जहाँ विज्ञान ही राष्ट्र की नियति का आधार बनेगा। आज जब भारत 'विकसित भारत @2047' के महालक्ष्य की ओर अग्रसर है, तब यह स्पष्ट है कि हम केवल भौतिक संसाधनों के बल पर नहीं, बल्कि 'ज्ञान' की शक्ति से विश्व पटल पर अपनी पहचान बना सकते हैं, और बना भी रहे हैं। इस ज्ञान आधारित महाशक्ति की परिकल्पना तब तक अधूरी है, जब तक देश की आधी आबादी, यानी हमारी महिला वैज्ञानिक, इस क्रांति की मुख्य सारथी नहीं बन जातीं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">​भारतीय महिलाओं ने गत वर्षों में यह सिद्ध किया है कि वे विज्ञान के क्षेत्र में केवल सहभागी नहीं, बल्कि निर्णायक नेतृत्वकर्ता का रोल अदा करने के लिए तैयार हैं। अंतरिक्ष विज्ञान के दुर्गम क्षेत्र में 'रॉकेट वुमन' रितु करिधाल और मुथैया वनिता जैसी वैज्ञानिकों ने चंद्रयान जैसे जटिल मिशनों का सफल प्रबंधन कर वैश्विक स्तर पर भारत की तकनीकी क्षमता का लोहा मनवाया है। वहीं रक्षा अनुसंधान के क्षेत्र में 'मिसाइल वुमन' डॉ. टेसी थॉमस का योगदान अग्नि मिसाइल कार्यक्रमों की सफलता के रूप में हमारे सामने है, जिसने भारत को रणनीतिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया है। स्वास्थ्य और जैव-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में डॉ. प्रिया अब्राहम और डॉ. गगनदीप कांग जैसे नामों ने महामारी के दौरान स्वदेशी शोध और वैक्सीन विकास के जरिए करोड़ों जीवन बचाकर भारत को 'विश्व की फार्मेसी' के रूप में स्थापित करने में केंद्रीय भूमिका निभाई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">​आंकड़ों की दृष्टि से देखें तो भारत में एक सुखद परिवर्तन दिखाई देता है। 'ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन' के अनुसार, भारत में विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित पाठ्यक्रमों में महिलाओं का नामांकन लगभग 43% है, जो अमेरिका और ब्रिटेन जैसे विकसित देशों की तुलना में कहीं बेहतर स्थिति को दर्शाता है। हालांकि, इस नामांकन को सक्रिय शोध और वरिष्ठ नेतृत्व के पदों में बदलना अभी भी एक चुनौती है, जिसे 'लीकी पाइपलाइन' कहा जाता है। अनुसंधान और विकास  के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी वर्तमान में 20% के आसपास है, जिसे बढ़ाने के लिए सरकार द्वारा 'किरण', 'विज्यान ज्योति' और 'गति' जैसी महत्वपूर्ण योजनाएं चलाई जा रही हैं। ये नीतियां न केवल छात्राओं को विज्ञान की ओर आकर्षित करती हैं, बल्कि शोध के क्षेत्र में उनके करियर को निरंतरता प्रदान करने में भी सहायक सिद्ध हो रही हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">​एक ज्ञान आधारित समाज का अर्थ है जहाँ समस्याओं का समाधान डेटा, तर्क और निरंतर नवाचार से निकले। वैज्ञानिक शोध में महिलाओं की भागीदारी से न केवल कार्यस्थल पर विविधता आती है, बल्कि समस्याओं को देखने का एक नया मानवीय और सामाजिक दृष्टिकोण भी मिलता है। विश्व बैंक के अनुमान बताते हैं कि यदि नवाचार और श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों के बराबर हो जाए, तो भारत की जीडीपी में 27% तक की अतिरिक्त वृद्धि संभव है। अतः, महिला वैज्ञानिकों का सशक्तिकरण केवल एक सामाजिक न्याय का विषय नहीं, बल्कि एक अनिवार्य आर्थिक और रणनीतिक आवश्यकता भी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">​निष्कर्षतः, विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा जब भारत की बेटियाँ प्रयोगशालाओं में केवल सहायक नहीं, बल्कि मुख्य अन्वेषक और आविष्कारक की भूमिका में होंगी। जब विज्ञान की मशाल महिला नेतृत्व के हाथों में होगी, तभी भारत की प्रगति की गति अजेय और सर्वसमावेशी बनेगी। सरकारी तथा गैर सरकारी वैज्ञानिक संस्थानों  को यह संकल्प लेना होगा कि वे ऐसा समावेशी पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करेंगे जहाँ हर महिला वैज्ञानिक प्रतिभा को फलने-फूलने का समान अवसर मिले, क्योंकि राष्ट्र की विकास यात्रा में नारी शक्ति का सारथी बनना ही भारत को पुनः विश्वगुरु के पद पर आसीन करा सकता है।</div>
</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 27 Feb 2026 18:04:01 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>बदलता मौसम बढ़ती गर्मी और अनिश्चित भविष्य</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">फरवरी का महीना कभी सर्द हवाओं, हल्की धूप और पहाड़ों पर जमी बर्फ के लिए जाना जाता था, लेकिन इस बार तस्वीर बिल्कुल अलग है। उत्तर भारत से लेकर मध्य भारत तक तापमान सामान्य से कई डिग्री ऊपर चल रहा है। कश्मीर घाटी, जिसे बर्फ और ठंड की धरती माना जाता है, वहां अधिकतम तापमान 21 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यह फरवरी के इतिहास में असामान्य माना जा रहा है। 24 फरवरी 2016 को 20.6 डिग्री तापमान दर्ज हुआ था, लेकिन इस वर्ष उससे भी अधिक गर्मी ने रिकॉर्ड तोड़ दिया। श्रीनगर के मौसम विज्ञान केंद्र के निदेशक डॉ.</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/171487/changing-weather-increasing-heat-and-uncertain-future"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/बदलता-मौसम-बढ़ती-गर्मी-और-अनिश्चित-भविष्य.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">फरवरी का महीना कभी सर्द हवाओं, हल्की धूप और पहाड़ों पर जमी बर्फ के लिए जाना जाता था, लेकिन इस बार तस्वीर बिल्कुल अलग है। उत्तर भारत से लेकर मध्य भारत तक तापमान सामान्य से कई डिग्री ऊपर चल रहा है। कश्मीर घाटी, जिसे बर्फ और ठंड की धरती माना जाता है, वहां अधिकतम तापमान 21 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यह फरवरी के इतिहास में असामान्य माना जा रहा है। 24 फरवरी 2016 को 20.6 डिग्री तापमान दर्ज हुआ था, लेकिन इस वर्ष उससे भी अधिक गर्मी ने रिकॉर्ड तोड़ दिया। श्रीनगर के मौसम विज्ञान केंद्र के निदेशक डॉ. मुख्तार अहमद के अनुसार इस बार कोई मजबूत पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय नहीं हुआ, जिससे सामान्य शीतकालीन वर्षा और बर्फबारी नहीं हो सकी। यह केवल एक मौसमी उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि वायुमंडलीय असंतुलन का संकेत है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">कश्मीर के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल गुलमर्ग और सोनमर्ग में हाल ही में हुई बर्फबारी लगभग पिघल चुकी है। बर्फ की कमी का असर पर्यटन और खेल गतिविधियों पर साफ दिखाई दे रहा है। खेलो इंडिया विंटर गेम्स में भाग लेने वाले खिलाड़ियों को पर्याप्त बर्फ नहीं मिल पा रही। जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कृत्रिम बर्फ बनाने की व्यवस्था पर जोर दिया है। यह स्थिति दर्शाती है कि जलवायु परिवर्तन अब केवल वैज्ञानिक रिपोर्टों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जमीनी हकीकत बन चुका है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">लद्दाख क्षेत्र की स्थिति भी चिंताजनक है। लेह और आसपास के क्षेत्रों में जनवरी और फरवरी में लगभग बर्फ नहीं गिरी। 17,582 फीट ऊंचे खारदुंग ला और चांग ला जैसे दर्रों पर सामान्य से 70 से 80 प्रतिशत कम बर्फबारी दर्ज की गई। हालांकि 14 हजार फीट पर स्थित पैंगोंग झील जमी हुई है और वहां न्यूनतम तापमान शून्य से नीचे दर्ज किया गया, फिर भी आसपास की पहाड़ियां बिना बर्फ के काली दिखाई दे रही हैं। यह दृश्य सामान्य सर्दियों के बिल्कुल विपरीत है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">पिछले पांच वर्षों में फरवरी का महीना लगातार अपेक्षा से अधिक गर्म और शुष्क रहा है। पहले इस महीने में चार से छह पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय होते थे, जिससे अच्छी वर्षा और हिमपात होता था। अब यह संख्या घटकर एक या दो रह गई है। उत्तराखंड और कश्मीर में सामान्य से 70 से 80 प्रतिशत तक कम वर्षा और बर्फबारी हो रही है। 2023 का फरवरी महीना पिछले 122 वर्षों में सबसे गर्म दर्ज किया गया। यह आंकड़े स्पष्ट संकेत देते हैं कि मौसम के पैटर्न में दीर्घकालिक बदलाव हो रहा है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">मध्य भारत के राज्यों जैसे मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी तापमान सामान्य से तीन से पांच डिग्री अधिक चल रहा है। श्रीगंगानगर में फरवरी के अंतिम सप्ताह में अधिकतम तापमान 31 से 32 डिग्री तक पहुंच गया, जबकि न्यूनतम तापमान भी 14 डिग्री के आसपास रहा। यह स्थिति मार्च में संभावित हीट वेव का संकेत देती है। मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि होली के बाद तेज गर्मी का दौर शुरू हो सकता है और तापमान 35 डिग्री या उससे अधिक तक जा सकता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इस असामान्य गर्मी का सीधा असर कृषि पर पड़ रहा है। गेहूं, सरसों और अन्य रबी फसलों के लिए ठंडा मौसम आवश्यक होता है। यदि तापमान समय से पहले बढ़ जाता है तो फसल जल्दी पक जाती है, जिससे दानों का आकार छोटा रह जाता है और उत्पादन घट सकता है। किसानों की चिंता बढ़ रही है, क्योंकि पानी की उपलब्धता भी कम हो सकती है। पहाड़ों पर बर्फ कम गिरने का मतलब है कि गर्मियों में नदियों का जलस्तर घट सकता है, जिससे सिंचाई और पेयजल संकट गहरा सकता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति जलवायु परिवर्तन के व्यापक प्रभावों का हिस्सा है। औद्योगिकीकरण, शहरीकरण, वनों की कटाई और कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि ने पृथ्वी के तापमान को लगातार बढ़ाया है। ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना, वर्षा के पैटर्न में बदलाव और चरम मौसम घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति इसी के परिणाम हैं। कभी बेमौसम बारिश तो कभी अचानक लू का प्रकोप आम हो गया है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से भी इसके गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं। पर्यटन उद्योग, जो कश्मीर और लद्दाख जैसे क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था का आधार है, बर्फ की कमी से प्रभावित होगा। यदि विंटर टूरिज्म कमजोर पड़ता है तो स्थानीय लोगों की आय पर सीधा असर पड़ेगा। वहीं मैदानी इलाकों में बढ़ती गर्मी से बिजली की मांग बढ़ेगी, जिससे ऊर्जा संकट और बढ़ सकता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">आने वाले दिनों में उत्तर पश्चिम भारत, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में तापमान में और वृद्धि की संभावना जताई जा रही है। यदि मार्च के पहले सप्ताह से ही तेज धूप और लू जैसे हालात बनने लगें, तो यह संकेत होगा कि इस वर्ष गर्मी सामान्य से अधिक प्रचंड रह सकती है। साथ ही, बेमौसम बारिश की आशंका भी बनी हुई है, जो फसलों को नुकसान पहुंचा सकती है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">स्पष्ट है कि मौसम का यह बदलता स्वरूप केवल एक मौसमी खबर नहीं, बल्कि भविष्य के लिए चेतावनी है। हमें पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देनी होगी। जल संरक्षण, वृक्षारोपण, स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग और कार्बन उत्सर्जन में कमी जैसे कदम अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुके हैं। यदि समय रहते ठोस प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाले वर्षों में फरवरी की ठंड केवल स्मृतियों में रह जाएगी और मौसम की अनिश्चितता हमारी नई वास्तविकता बन जाएगी।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 26 Feb 2026 17:51:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
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                <title>भारत की वीरता एवं बलिदान के प्रतीक हैं – शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश की आज़ादी के लिए अपने हाथों से अपने प्राणों की आहुति देने वाले अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद की आज </span>27 <span lang="hi" xml:lang="hi">फरवरी को </span>95<span lang="hi" xml:lang="hi">वीं पुण्यतिथि है। आज़ाद एक ऐसे दीवाने का नाम है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी अपने देश के प्रति दीवानगी के किस्से सुनकर ही हर मस्तक अपने आप नतमस्तक हो जाता है। आज के आधुनिक एआई के इस युग में जब पचास बरस के आदमी या नेता को युवा माना जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आप कल्पना करें जब एक दस</span>–<span lang="hi" xml:lang="hi">बारह साल का अबोध बालक देश की आज़ादी के लिए सुदूर आदिवासी अंचल अभिजात्य झाबुआ</span>–<span lang="hi" xml:lang="hi">अलीराजपुर जिले के</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/171481/martyr-chandrashekhar-azad-is-a-symbol-of-indias-bravery-and"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/भारत-की-वीरता-एवं-बलिदान-के-प्रतीक-हैं – शहीद-चन्द्रशेखर-आज़ाद.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश की आज़ादी के लिए अपने हाथों से अपने प्राणों की आहुति देने वाले अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद की आज </span>27 <span lang="hi" xml:lang="hi">फरवरी को </span>95<span lang="hi" xml:lang="hi">वीं पुण्यतिथि है। आज़ाद एक ऐसे दीवाने का नाम है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी अपने देश के प्रति दीवानगी के किस्से सुनकर ही हर मस्तक अपने आप नतमस्तक हो जाता है। आज के आधुनिक एआई के इस युग में जब पचास बरस के आदमी या नेता को युवा माना जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आप कल्पना करें जब एक दस</span>–<span lang="hi" xml:lang="hi">बारह साल का अबोध बालक देश की आज़ादी के लिए सुदूर आदिवासी अंचल अभिजात्य झाबुआ</span>–<span lang="hi" xml:lang="hi">अलीराजपुर जिले के अपने जन्मस्थली भाबरा गाँव की गलियों में बचपन की मौज</span>–<span lang="hi" xml:lang="hi">मस्ती को छोड़कर भूख</span>–<span lang="hi" xml:lang="hi">प्यास की परवाह किए बिना अपनी भारत माता की आज़ादी के लिए निकल पड़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसकी उम्र वर्तमान संदर्भ में क्या मानी जाएगी </span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश की आज़ादी का सर पर जुनून लिए निकले बालक आज़ाद ने </span>1921 <span lang="hi" xml:lang="hi">में महात्मा गांधी द्वारा चलाए जा रहे असहयोग आंदोलन में भाग लिया और अंग्रेज़ों के खिलाफ आजादी के दीवानों के साथ अपना सुर बुलंद करते हुए गिरफ्तार किए गए। जब अंग्रेज़ जज के सामने आज़ाद को पेश किया गया और जब जज ने नाम पूछा तो निडर होकर रौबदार आवाज में अपना नाम </span>“<span lang="hi" xml:lang="hi">आज़ाद</span>” <span lang="hi" xml:lang="hi">बताया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पिता का नाम </span>“<span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्र</span>” <span lang="hi" xml:lang="hi">बताया और अपना घर </span>“<span lang="hi" xml:lang="hi">जेल</span>” <span lang="hi" xml:lang="hi">बताया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो जज साहब झल्ला गए और उन्होंने बालक आजाद के देशभक्ति के अदम्य साहस से घबराकर पंद्रह बेंत मारने की सजा सुनाई। अपनी सजा पर बालक आजाद मुस्कुराए और हर बेंत की मार के साथ </span>“<span lang="hi" xml:lang="hi">भारत माता की जय</span>” <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>“<span lang="hi" xml:lang="hi">वंदे मातरम्</span>” <span lang="hi" xml:lang="hi">के जयघोष से पूरे वातावरण में ओज भर दिया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस घटना के बाद एक अदम्य साहसी क्रांतिकारी के रूप में आजाद का राष्ट्रीय पटल पर उदय हुआ और पंडित रामप्रसाद बिस्मिल के विश्वस्त साथी बनकर भारत की आज़ादी का अलख जगाने में खुद को झोंक दिया । यहीं पर देश के लिए मर</span><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="font-family:'Times New Roman', serif;"> </span></span><span lang="hi" xml:lang="hi">मिटने वाले आजादी के सारे दीवानों का मिलन हुआ । आजाद में स्वाभिमान के गुण बचपन से ही विद्यमान थे। अपने माता</span>–<span lang="hi" xml:lang="hi">पिता से विरासत में मिले इन्हीं गुणों की वजह से आजाद जो एक बार सोच लेते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे हर हाल में पूरा करते थे । बिस्मिल द्वारा बनाए गए आजादी के दीवानों के संगठन का नाम हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका उद्देश्य अंग्रेजों से भारत माता को आजादी दिलाना था। आज़ाद स्वयं कहते थे कि दासता जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप है और इसी प्रेरणा से वे जीवन भर इस अभिशाप से लड़ते रहे ।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सन </span>1920 <span lang="hi" xml:lang="hi">से </span>30 <span lang="hi" xml:lang="hi">का एक पूरा दशक ऐसा था जब देश में अंग्रेजी हुकूमत आजादी के इन जवानों के ख़ौफ़ से डरी</span>–<span lang="hi" xml:lang="hi">सहमी हुई थी । उस एक दशक में यदि भारत की आज़ादी के लिए सारे नेता एकमत हो जाते तो देश पच्चीस बरस पहले ही आज़ाद हो गया होता । अंग्रेज़ों से उन्हीं की भाषा में जवाब देने के लिए हथियारों और गोला</span>–<span lang="hi" xml:lang="hi">बारूद हेतु धन के लिए रामप्रसाद बिस्मिल की योजना के तहत सरकारी खजाना लूटने के लिए आजादी के दीवानों ने काकोरी कांड को अंजाम दिया। काकोरी कांड में सरकारी खजाना लूटने से अंग्रेज़ी हुकूमत बुरी तरह बौखला गई और देशभर में बिस्मिल और उनके साथियों की धरपकड़ तेज कर दी गई । इसे विडंबना कहें या फिर देश का दुर्भाग्य कि हज़ारों देशभक्त दीवानों को अंग्रेज़ी हुकूमत तो नहीं खोज पाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन अपने ही लोगों की दगाबाज़ी के चलते अंग्रेज उन्हें फांसी के फंदे पर लटकाने में कामयाब हो गए।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रामप्रसाद बिस्मिल की फांसी के बाद हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन बिखर चुका था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन आज़ाद ने हिम्मत नहीं हारी और कमान अपने हाथों में ली तथा अपने साथियों को पुनः एकजुट कर देश की आज़ादी की फिर से हुंकार भरी। आजादी के दीवानों ने भारत की जेलों में भी आज़ादी का अलख जगाए रखा। अंग्रेज़ों से छिपते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भेष बदलते आजाद ने भगत सिंह के साथ देशभर में फिर से अंग्रेज़ों के खिलाफ गुस्सा पैदा कर दिया था । अंग्रेज़ी हुकूमत हर हाल में आज़ाद और भगत सिंह को गिरफ्तार कर अपने प्रति बढ़ते विद्रोह को दबाना चाहती थी। भगत सिंह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजगुरु और सुखदेव की गिरफ्तारी के बाद भी आज़ाद अपने साथियों के बूते अंग्रेज़ों के खिलाफ देशभर के लोगों में आक्रोश जगाते रहे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज़ाद देश में जहाँ भी जाते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वसनीय साथियों की ऐसी टीम तैयार कर लेते थे जो देश की आज़ादी के लिए मरने</span>–<span lang="hi" xml:lang="hi">मारने का जज़्बा रखती थी। साधन संसाधन विहीन होकर भी आज़ाद उस अंग्रेज़ी हुकूमत से टकराए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका कभी सूरज अस्त नहीं होता था। आज़ाद की गतिविधियों से अंग्रेज़ हुकूमत को यह भय हो गया था कि एक अकेला आज़ाद भी उनकी हुकूमत के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है। इसलिए देशभर में आज़ाद की गिरफ्तारी के लिए जाल बिछा दिया गया और लोगों को सूचना देने पर प्रलोभन की घोषणा की गई। आज़ाद की खोज में उनकी जन्मस्थली भाबरा से लेकर आजादी के दीवानों के हर ठिकाने पर दबिश दी गई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन आज़ाद कहीं नहीं मिले। आज़ाद हमेशा यह पंक्ति गाया करते थे -</span>“<span lang="hi" xml:lang="hi">दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">आजाद ही रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज़ाद ही रहेंगे।</span>”</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज़ाद ने अंग्रेजी हुकूमत द्वारा जेलों में बंद भगत सिंह सहित सभी साथियों को छुड़वाने का बहुत प्रयास किया। आज़ाद चाहते थे कि देश के सारे बड़े नेता एक बार उनका साथ देकर आज़ादी की लड़ाई में शामिल हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन आजादी के इन नौजवान दीवानों की भला किसी ने नहीं सुनी। </span>27 <span lang="hi" xml:lang="hi">फरवरी </span>1931 <span lang="hi" xml:lang="hi">को इलाहाबाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात वर्तमान प्रयागराज के अल्फ्रेड पार्क में भी आज़ाद अपने साथियों की रिहाई की योजना को लेकर आए थे और एक पेड़ के नीचे खड़े होकर अपने कुछ साथियों का इंतज़ार कर रहे थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन अपने ही एक साथी की दगाबाज़ी के चलते आज़ाद अंग्रेज़ सिपाहियों से घिर चुके थे। चारों ओर से घिरने के बाद भी आजाद आखिरी गोली शेष बचने तक लड़ते रहे और अंतिम गोली कनपटी में स्वयं मारकर आत्मबलिदान कर लिया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज़ादी के इस दीवाने ने अपने रक्त से अपनी मातृभूमि की आज़ादी का अभिषेक कर दिया था। महज़ पच्चीस वर्ष की आयु में चन्द्रशेखर आज़ाद अमर शहीदों की कतार में शामिल हो गए। आजाद की शहादत के बाद देशभर में अंग्रेज़ों के प्रति विद्रोह की भावना पनपने लगी और अंग्रेजी दबदबे को बनाए रखने के लिए आजाद के बलिदान के कुछ ही दिनों बाद चुपचाप भगत सिंह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुखदेव और राजगुरु को भी फांसी दे दी गई। इस प्रकार आजादी के दीवानों ने देश के लिए मुस्कराते हुए मौत को चुन लिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन फिरंगियों और उनके लालच को नहीं चुना। देश की आज़ादी के बाद सरकार द्वारा हर बरस शहीदों की चिताओं पर मेले लगाने का दावा किया गया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन शनैः शनैः शहीदों के नाम पर लगने वाले मेले राजनीतिक दलों या नेताओं के शक्ति</span>–<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रदर्शन के मंच बन गए। अब शहीदों की चिताओं पर महज रस्म अदायगी भर का आयोजन होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शेष सब राजनीति का बखान होता है ।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दुःख इस बात का है कि देश का जनमानस भी आधुनिकता की इस चकाचौंध में आजाद जैसे अमर बलिदानियों को भूलता जा रहा है। अफ़सोस तो यह है कि देश की नई पीढ़ी के लिए आजादी के मायने वर्ष में दो दिन अपने स्टेटस सजाने से अधिक कुछ नहीं रह गए हैं। दुनिया घूमने का दावा करने वाली आधुनिक पीढ़ी ने आजादी के दीवानों की जन्मस्थली को देखने और प्रणाम करने की भी नहीं सोची</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो देशभक्ति उनके जेहन में कैसे जागेगी </span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज एआई के युग में देश के जनमानस को दुनिया</span>–<span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ का ज्ञान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उसकी नव पीढ़ी के अधिकांश लोगों को जिस आज़ादी को वे जी रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके लिए जीवन उत्सर्ग कर देने वाले आधा दर्जन अमर शूरवीरों के नाम तक स्मरण नहीं हैं। देश की आने वाली पीढ़ी को राष्ट्र के प्रति उसके कर्तव्यबोध का ज्ञान करवाना है तो आजादी और उसके दीवानों के बलिदान से अवगत करवाना अत्यंत आवश्यक है । सरकार को चाहिए कि देश की आधुनिक पीढ़ी में आजाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगत सिंह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुखदेव और राजगुरु की तरह राष्ट्र के प्रति जज्बा बनाए रखने हेतु अमर बलिदानियों के जीवन</span>–<span lang="hi" xml:lang="hi">चरित्र को शिक्षा का मूल भाग बनाया जाए और आजादी के अमर शहीदों की चिताओं पर ईमानदारी से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निस्वार्थ राष्ट्रभावना के साथ हर वर्ष मेले सजाए जाएँ। तभी हम आज़ाद की तरह राम सा शौर्य और शंकर सा लोक कल्याण का भाव देश की नई पीढ़ी में देख सकेंगे।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><strong>अरविंद रावल</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Thu, 26 Feb 2026 17:48:10 +0530</pubDate>
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