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                <title>मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना : सामाजिक समरसता और आर्थिक सहयोग की एक सशक्त पहल</title>
                                    <description><![CDATA[<blockquote class="format1">
<p><strong>(आदर अदीब पावेल बन्धु) </strong></p>
<p><strong>जिला सूचना अधिकारी मण्डलीय जिला सूचना कार्यालय लखनऊ।</strong></p>
</blockquote>
<p><br />भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं बल्कि दो परिवारों, संस्कृतियों और परंपराओं का संगम होता है। किन्तु समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए विवाह एक बड़ी चुनौती बन जाता है। बढ़ते खर्च, सामाजिक दबाव और परंपरागत रीति-रिवाजों के कारण गरीब परिवारों को अपनी बेटियों के विवाह में भारी आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है। इसी समस्या के समाधान के लिए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा अक्टूबर 2017 को "मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना" का शुभारंभ किया गया है। यह योजना न केवल</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184375/chief-ministers-mass-marriage-scheme-a-powerful-initiative-for-social"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/whatsapp-image-2026-07-31-at-19.15.33.jpeg" alt=""></a><br /><blockquote class="format1">
<p><strong>(आदर अदीब पावेल बन्धु) </strong></p>
<p><strong>जिला सूचना अधिकारी मण्डलीय जिला सूचना कार्यालय लखनऊ।</strong></p>
</blockquote>
<p><br />भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं बल्कि दो परिवारों, संस्कृतियों और परंपराओं का संगम होता है। किन्तु समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए विवाह एक बड़ी चुनौती बन जाता है। बढ़ते खर्च, सामाजिक दबाव और परंपरागत रीति-रिवाजों के कारण गरीब परिवारों को अपनी बेटियों के विवाह में भारी आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है। इसी समस्या के समाधान के लिए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा अक्टूबर 2017 को "मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना" का शुभारंभ किया गया है। यह योजना न केवल आर्थिक सहायता प्रदान करती है, बल्कि समाज में समानता, सादगी और सामूहिकता की भावना को भी बढ़ावा देती है।</p>
<p><br />मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना का मुख्य उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की बेटियों का विवाह सम्मानपूर्वक संपन्न कराना है। इसके अंतर्गत सरकार एक ही स्थान पर कई जोड़ों का सामूहिक विवाह कराती है, जिससे विवाह में होने वाला अनावश्यक खर्च कम होता है। इसके साथ ही यह योजना दहेज प्रथा जैसी कुरीतियों को समाप्त करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।</p>
<p><br />वहीं, गरीब परिवारों को आर्थिक सहायता प्रदान करना, विवाह में सादगी को बढ़ावा देना, दहेज प्रथा पर रोक लगाना, सामाजिक समरसता और समानता को बढ़ावा देना, महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा को सुनिश्चित करना इस योजना के मुख्य उद्देश्य हैं। मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना की कई महत्वपूर्ण विशेषताएँ हैं, जो इसे समाज के लिए अत्यंत उपयोगी बनाती हैं। इसमें पात्र को अब रू0 1 लाख तक (जिसमें रू० 35,000-रू0 60,000 नकद, रू0 10,000 रू0 25,000 का सामान, और शेष आयोजन खर्च के लिए) आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है।</p>
<p><br />यह राशि सीधे बैंक खाते में भेजी जाती है, जिससे पारदर्शिता बनी रहती है। सामूहिक आयोजन में विवाह समारोह एक ही स्थान पर कई जोड़ों के साथ आयोजित किया जाता है। इसमें सभी धार्मिक रीति-रिवाजों का ध्यान रखा जाता है। राज्य सरकार द्वारा दुल्हन को विवाह के लिए आवश्यक सामग्री जैसे कपड़े, आभूषण, घरेलू उपयोग की वस्तुएँ आदि भी उपलब्ध कराई जाती हैं।</p>
<p><br />यह योजना सभी धर्मों और वर्गों के लोगों के लिए खुली है, जिससे सामाजिक एकता को बढ़ावा मिलता है। पात्र लाभार्थी ऑनलाइन या ऑफलाइन माध्यम से आसानी से आवेदन कर सकते हैं। पात्रता मानदंड के अंतर्गत आवेदक राज्य का स्थायी निवासी होना चाहिए, परिवार की आय निर्धारित सीमा से कम होनी चाहिए, विवाह योग्य आयु (लड़की 18 वर्ष और लड़का 21वर्ष) पूरी होनी चाहिए, परिवार आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (BPL या अन्य श्रेणी) में आता हो इस योजना का लाभ उठाने के लिए कुछ आवश्यक पात्रता शर्ते निर्धारित की गई हैं।</p>
<p><br />मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना के अनेक सामाजिक और आर्थिक लाभ हैं जैसे-गरीब परिवारों को विवाह के लिए कर्ज लेने की आवश्यकता नहीं पड़ती, जिससे वे आर्थिक संकट से बच जाते हैं। सामूहिक विवाह के कारण दहेज की मांग स्वतः कम हो जाती है, जिससे समाज में सकारात्मक परिवर्तन आता है। इस योजना के तहत सभी वर्गों के लोग एक साथ विवाह करते हैं, जिससे भेदभाव कम होता है। सरकार द्वारा दी जाने वाली सहायता महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने में मदद करती है। यह योजना भव्यता के बजाय सादगीपूर्ण विवाह को प्रोत्साहित करती है।</p>
<p><br />इसके अतिरिक्त मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना ने समाज पर गहरा सकारात्मक प्रभाव डाला है। पहले जहां गरीब परिवार अपनी बेटियों के विवाह के लिए चिंतित रहते थे, अब उन्हें एक सुरक्षित और सम्मानजनक विकल्प मिल गया है। यह योजना सामाजिक कुरीतियों को खत्म करने में भी सहायक सिद्ध हो रही है। सामूहिक विवाह में दहेज की परंपरा कम हो जाती है। विभिन्न जाति और धर्म के लोग एक मंच पर आते हैं। आर्थिक सहायता से गरीब परिवारों की स्थिति बेहतर होती है।</p>
<p><br />व्यापक प्रचार-प्रसार, पारदर्शी व्यवस्था और डिजिटल भुगतान, समाज में जागरूकता अभियान चलाना इस योजना की महत्वपूर्ण चुनौतियां एवं सुझाव हैं। निसंदेह, मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना एक ऐसी पहल है, जो समाज के कमजोर वर्गों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला रही है। यह न केवल आर्थिक सहायता प्रदान करती है, बल्कि सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने और समानता स्थापित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यदि इस योजना का प्रभावी ढंग से क्रियान्वयन किया जाए और अधिक से अधिक लोगों तक इसकी जानकारी पहुँचाई जाए, तो यह समाज में एक नई दिशा प्रदान कर सकती है।</p>
<p><br />अंततः यह योजना "सादगी, समानता और सम्मान के सिद्धांतों पर आधारित एक प्रेरणादायक कदम है, जो न केवल गरीब परिवारों के लिए सहारा है बल्कि पूरे समाज के लिए एक आदर्श भी प्रस्तुत करती है।<br /><br /></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 20:15:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>परमाणु शक्ति संपन्न भारत में कब होगी बालिका शिक्षा शत-प्रतिशत।</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div dir="ltr" style="text-align:justify;">भारत विश्व की सबसे प्राचीन ज्ञान परंपराओं वाला देश रहा है। तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला और वल्लभी जैसे विश्वविद्यालयों ने विश्व को शिक्षा का प्रकाश दिया। वैदिक काल में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यक्ति के बौद्धिक, नैतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक विकास को सुनिश्चित करना था।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br /></div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"> गार्गी, मैत्रेयी और लोपामुद्रा जैसी विदुषी महिलाओं ने सिद्ध किया था कि भारतीय संस्कृति में नारी शिक्षा का गौरवशाली इतिहास रहा है। किंतु मध्यकालीन सामाजिक रूढ़ियों और औपनिवेशिक शासन के प्रभाव से बालिका शिक्षा पिछड़ती चली गई। 1835 में लॉर्ड मैकाले ने अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली लागू की। इसका उद्देश्य भारतीय समाज</div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181062/when-will-girls-education-be-100-in-nuclear-power-india"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/4.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div dir="ltr" style="text-align:justify;">भारत विश्व की सबसे प्राचीन ज्ञान परंपराओं वाला देश रहा है। तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला और वल्लभी जैसे विश्वविद्यालयों ने विश्व को शिक्षा का प्रकाश दिया। वैदिक काल में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यक्ति के बौद्धिक, नैतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक विकास को सुनिश्चित करना था।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br /></div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"> गार्गी, मैत्रेयी और लोपामुद्रा जैसी विदुषी महिलाओं ने सिद्ध किया था कि भारतीय संस्कृति में नारी शिक्षा का गौरवशाली इतिहास रहा है। किंतु मध्यकालीन सामाजिक रूढ़ियों और औपनिवेशिक शासन के प्रभाव से बालिका शिक्षा पिछड़ती चली गई। 1835 में लॉर्ड मैकाले ने अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली लागू की। इसका उद्देश्य भारतीय समाज में ऐसे कर्मचारियों का वर्ग तैयार करना था जो अंग्रेजी शासन के प्रशासनिक कार्यों को संचालित कर सके। आधुनिक विज्ञान और अंग्रेजी भाषा के प्रसार में इस शिक्षा प्रणाली का योगदान रहा, किंतु इसने भारतीय ज्ञान परंपरा, नैतिक शिक्षा और कौशल आधारित शिक्षण को काफी हद तक हाशिए पर पहुंचा दिया। उस समय महिलाओं की शिक्षा लगभग नगण्य थी। समाज में बाल विवाह, पर्दा प्रथा और लैंगिक असमानता जैसी कुरीतियां लड़कियों की शिक्षा में बड़ी बाधा थीं।<br />समाज सुधारकों का योगदान</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;">+<br />ऐसे कठिन समय में सावित्रीबाई फुले और महात्मा ज्योतिराव फुले ने बालिका शिक्षा की अलख जगाई। 1848 में उन्होंने लड़कियों के लिए पहला आधुनिक विद्यालय प्रारंभ किया।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने महिला शिक्षा और सामाजिक सुधारों को नई दिशा दी। बाद में महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव अंबेडकर तथा स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम माना।<br />डॉ. अंबेडकर का प्रसिद्ध संदेश</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />"शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो।"<br />स्वतंत्र भारत में शिक्षा का विकास</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत की साक्षरता दर लगभग 18 प्रतिशत थी। महिलाओं की साक्षरता तो 10 प्रतिशत से भी कम थी। संविधान निर्माताओं ने शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का मूल आधार माना।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />समय-समय पर कोठारी आयोग, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968, 1986, सर्व शिक्षा अभियान, शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 तथा नई शिक्षा नीति 2020 जैसे प्रयास किए गए। इन प्रयासों से शिक्षा का दायरा बढ़ा और लड़कियों की विद्यालयों तक पहुंच बेहतर हुई।.आज भारत की साक्षरता दर 77 प्रतिशत के आसपास पहुंच चुकी है, जबकि महिला साक्षरता दर 70 प्रतिशत से अधिक है। यह प्रगति उत्साहजनक है, किंतु अभी भी पुरुषों और महिलाओं की साक्षरता में अंतर बना हुआ है।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />विश्व के सर्वाधिक शिक्षित देशों से सीख<br />विश्व में फिनलैंड, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, जापान और नॉर्वे जैसे देशों की शिक्षा व्यवस्था विश्व में आदर्श मानी जाती है। फिनलैंड की शिक्षा व्यवस्था</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />फिनलैंड में शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में अंक प्राप्त करना नहीं, बल्कि जीवन कौशल विकसित करना है। वहां बच्चों पर अनावश्यक परीक्षा का दबाव नहीं होता। शिक्षकों को अत्यंत सम्मान और स्वायत्तता प्राप्त है।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br /></div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"> बालिका और बालक के बीच किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाता। सिंगापुर ने शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का सबसे बड़ा साधन बनाया। वहां विज्ञान, गणित, तकनीक और कौशल आधारित शिक्षा पर विशेष बल दिया जाता है। शिक्षा को उद्योगों और रोजगार से जोड़ा गया है।<br />जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में अनुशासन, नैतिकता, समयबद्धता और तकनीकी दक्षता पर विशेष ध्यान दिया जाता है। परिणामस्वरूप ये देश सीमित प्राकृतिक संसाधनों के बावजूद आर्थिक महाशक्ति बन गए।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;">भारत में प्रतिभा की कोई कमी कभी भी नहीं रही है, किंतु शिक्षा व्यवस्था अभी भी परीक्षा-केंद्रित बनी हुई है। रटंत प्रणाली, विद्यालयों की असमान गुणवत्ता, शिक्षकों की कमी और ग्रामीण क्षेत्रों में संसाधनों का अभाव आज भी चुनौतियां हैं।नई शिक्षा नीति 2020 ने इन समस्याओं के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। इसमें मातृभाषा आधारित शिक्षा, कौशल विकास, डिजिटल शिक्षण और बहुविषयक अध्ययन पर बल दिया गया है। किंतु इसके वास्तविक लाभ तभी मिलेंगे जब इसका प्रभावी क्रियान्वयन हो। बालिका शिक्षा का सत प्रतिशत होना इसलिए भी आवश्यक है कि शिक्षित बेटी, समृद्ध परिवार</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />एक शिक्षित महिला अपने परिवार को बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा और संस्कार प्रदान करती है। वह अगली पीढ़ी की प्रथम शिक्षिका होती है।सामाजिक कुरीतियों का अंत भी।बाल विवाह, दहेज प्रथा, लैंगिक भेदभाव और घरेलू हिंसा जैसी समस्याओं को समाप्त करने में शिक्षा सबसे प्रभावी साधन है</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />विश्व बैंक सहित अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का मानना है कि महिलाओं की शिक्षा में निवेश किसी भी देश के आर्थिक विकास को तीव्र गति देता है। यदि भारत की प्रत्येक बेटी शिक्षित होगी तो देश की उत्पादकता और आर्थिक क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />शिक्षित महिलाएं स्वास्थ्य, पोषण और परिवार नियोजन के प्रति अधिक जागरूक होती हैं। इससे मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में कमी आती है।<br />आज महिलाएं विज्ञान, अंतरिक्ष, प्रशासन, राजनीति, सेना और उद्यमिता के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित कर रही हैं। शिक्षा उन्हें नेतृत्व और नवाचार की शक्ति प्रदान करती है।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />महापुरुषों की दृष्टि में नारी शिक्षा<br />स्वामी विवेकानंद ने कहा</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />"राष्ट्र की प्रगति का सबसे अच्छा मापदंड वहां की महिलाओं की स्थिति है।"डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का मत था कि<br />"महिलाओं का सशक्तिकरण और शिक्षा किसी राष्ट्र के विकास का सबसे प्रभावी माध्यम है।"पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था<br />"एक महिला को शिक्षित करना एक पीढ़ी को शिक्षित करना है।"</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />इक्कीसवीं सदी ज्ञान, विज्ञान और नवाचार की सदी है। विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा जब देश की प्रत्येक बेटी शिक्षित, आत्मनिर्भर और सशक्त बनेगी। शिक्षा केवल विद्यालय की चारदीवारी तक सीमित नहीं है; यह सामाजिक चेतना, आर्थिक समृद्धि और राष्ट्रीय विकास का आधार है। मैकाले की शिक्षा प्रणाली से लेकर नई शिक्षा नीति तक भारत ने लंबी यात्रा तय की है, किंतु अभी मंजिल दूर है। यदि सरकार, समाज, परिवार और शैक्षणिक संस्थान मिलकर बालिका शिक्षा को शत-प्रतिशत अनिवार्य बनाने का संकल्प लें, तो भारत न केवल विश्व की सबसे बड़ी युवा शक्ति बनेगा, बल्कि सबसे विकसित और ज्ञानवान राष्ट्रों की अग्रिम पंक्ति में भी खड़ा होगा।<br />क्योंकि किसी राष्ट्र का भविष्य उसके विद्यालयों में नहीं, बल्कि उसकी शिक्षित बेटियों की आंखों में स्वप्न बनकर पलता है।<br /><br />संजीव ठाकुर, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिंतक, स्तंभकार, रायपुर छत्तीसगढ़, 9009 415 415,<div>कविता,</div><div>संजीव-नी।<br />शिक्षा का कवच।<br /><br />शिक्षा का कवच।<br />कुछ देना ही तो आइये,<br />नन्हीं बालिकाओं को<br />स्वर्ण के गहने नहीं,<br />शिक्षा का कवच दें।<br />उनकी हथेलियों में<br />रोटी के साथ-साथ<br />कुछ अक्षर भी रख दें,<br />जो भूख से जुझतीं<br />उन्हें ज्ञान की कुंजी दें<br />अँधेरे बंद कमरों में<br />रोशन-दान बनती,<br />ज्ञान की रोशनी के लिए<br />बंद रास्तों पर<br />एक नया आकाश फैला देती,<br />उनकी आँखों में<br />सिर्फ़ स्वप्न ना रखें ,<br />उन तक पहुँचने के पंख भी दें।<br />उन्हें ज्ञान दें कि<br />अपने हिस्से की धूप<br />खुद चुन सकें।<br />किताबें जब उनके हांथों में होंगी,<br />तो सदियों के कई बोझ<br />आप उतर जाएँगे।<br />कलम उँगलियों से चलेंगीं<br />तक़दीर की कविता भी<br />लिखी जाएगी।<br />शिक्षित बालिका<br />अपना जीवन ही नहीं संवारती,<br />आने वाली पीढ़ियों के लिए<br />उजला दीप बन जाती।<br />आइये,<br />बेटी को शिक्षा का रक्षा-कवच दें,<br />ताकि वह<br />अपने सपनों, अपने अधिकारों<br />अपने अस्तित्व की रक्षा<br />स्वयं कर सके।<br /><br />संजीव ठाकुर, रायपुर छत्तीसगढ़, 9009 415 415,</div></div><div class="yj6qo" style="text-align:justify;"><br /></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div></div></div></div><div class="hq gt" style="text-align:justify;"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 12:57:59 +0530</pubDate>
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                <title>अब यह तस्वीर बदलनी चाहिए</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">नसमय बदला, तकनीक बदली, जीवन-शैली बदली, बाजार बदला और फैशन भी बदल गया। महिलाओं को उपभोक्तावादी संस्कृति ने विज्ञापनों और प्रदर्शन की वस्तु के रूप में प्रस्तुत करने के नए-नए तरीके खोज लिए। किंतु दुखद प्रश्न यह है कि क्या समाज की मूलभूत सोच बदली? क्या बालिका शिक्षा शत-प्रतिशत हो गई? क्या दहेज प्रथा समाप्त हो गई? क्या स्त्री उत्पीड़न इतिहास बन गया?</p>
<p style="text-align:justify;">दुर्भाग्य से इन प्रश्नों का उत्तर आज भी नकारात्मक है। अनेक समस्याएँ आज भी यथावत बनी हुई हैं, बल्कि कई मामलों में उन्होंने और अधिक विकराल रूप धारण कर लिया है। विशेष रूप से ग्रामीण भारत में</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180674/now-this-picture-should-be-changed"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/images.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">नसमय बदला, तकनीक बदली, जीवन-शैली बदली, बाजार बदला और फैशन भी बदल गया। महिलाओं को उपभोक्तावादी संस्कृति ने विज्ञापनों और प्रदर्शन की वस्तु के रूप में प्रस्तुत करने के नए-नए तरीके खोज लिए। किंतु दुखद प्रश्न यह है कि क्या समाज की मूलभूत सोच बदली? क्या बालिका शिक्षा शत-प्रतिशत हो गई? क्या दहेज प्रथा समाप्त हो गई? क्या स्त्री उत्पीड़न इतिहास बन गया?</p>
<p style="text-align:justify;">दुर्भाग्य से इन प्रश्नों का उत्तर आज भी नकारात्मक है। अनेक समस्याएँ आज भी यथावत बनी हुई हैं, बल्कि कई मामलों में उन्होंने और अधिक विकराल रूप धारण कर लिया है। विशेष रूप से ग्रामीण भारत में महिलाओं की स्थिति अभी भी अपेक्षित सम्मान और अवसरों से काफी दूर दिखाई देती है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता जैसे क्षेत्रों में सुधार तो हुआ है, किंतु वह इतना व्यापक नहीं है कि समाज को संतोष हो सके।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारे बुजुर्ग कहा करते थे कि शिक्षा का प्रसार होगा तो समाज की कुरीतियाँ स्वतः समाप्त हो जाएँगी। स्त्रियाँ पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ेंगी और बेटी को बोझ नहीं, अवसर माना जाएगा। कुछ क्षेत्रों में प्रगति अवश्य हुई है, किंतु धरातल पर तस्वीर अभी भी अधूरी है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण  के अनुसार देश में 10 वर्ष या उससे अधिक शिक्षा प्राप्त महिलाओं का प्रतिशत बढ़कर लगभग 46.4 प्रतिशत तक पहुँचा है, जो पहले 41 प्रतिशत था।</p>
<p style="text-align:justify;">यह सुधार उत्साहजनक है, किंतु इसका अर्थ यह भी है कि आधी से अधिक महिलाएँ अभी भी दस वर्ष की बुनियादी शिक्षा से वंचित हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में विद्यालय छोड़ने वाली बालिकाओं की संख्या आज भी चिंता का विषय बनी हुई है।  शिक्षा के क्षेत्र में असमानता का एक कारण बाल विवाह, गरीबी, सामाजिक रूढ़ियाँ तथा सुरक्षा संबंधी चिंताएँ भी हैं। अनेक परिवार आज भी पुत्र की शिक्षा को निवेश और पुत्री की शिक्षा को व्यय मानते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यही सोच आगे चलकर दहेज जैसी कुप्रथा को जन्म देती और इससे भी अधिक चिंताजनक तथ्य यह है कि शिक्षा और आधुनिकता के दावों के बीच दहेज का दानव आज भी जीवित है। राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2023 में दहेज निषेध अधिनियम के अंतर्गत 15,489 मामले दर्ज किए गए तथा दहेज से संबंधित घटनाओं में 6,156 महिलाओं की मृत्यु हुई। अर्थात प्रतिदिन लगभग 17 महिलाओं ने दहेज की कीमत अपने जीवन से चुकाई। महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की व्यापक तस्वीर भी चिंता उत्पन्न करती है।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्ष 2023 में देशभर में महिलाओं के विरुद्ध लगभग 4.48 लाख अपराध दर्ज किए गए। इनमें सबसे बड़ी संख्या पति अथवा रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता के मामलों की रही, जो कुल अपराधों का लगभग 30 प्रतिशत है। यह स्थिति केवल आँकड़ों की कहानी नहीं है; यह उन लाखों बेटियों, बहनों और माताओं की पीड़ा का दस्तावेज है जो आज भी भेदभाव, हिंसा और असमानता का सामना कर रही हैं। समाज सुधारिका सावित्रीबाई फुले ने कहा था यदि तुम शिक्षित हो जाओगे तो तुम्हें अपने अधिकारों का ज्ञान होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">वहीं डॉ. भीमराव आंबेडकर का प्रसिद्ध कथन है कि किसी समाज की प्रगति का आकलन उसकी महिलाओं की प्रगति से किया जाना चाहिए। महात्मा गांधी ने भी कहा था यदि आप एक पुरुष को शिक्षित करते हैं तो केवल एक व्यक्ति शिक्षित होता है, किंतु यदि आप एक स्त्री को शिक्षित करते हैं तो पूरा परिवार शिक्षित होता है। इसी प्रकार स्वामी विवेकानंद का मानना था कि जिस राष्ट्र ने अपनी स्त्रियों का सम्मान करना नहीं सीखा, वह कभी महान नहीं बन सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">क्योंकि केवल विद्यालयों की संख्या बढ़ा देना पर्याप्त नहीं है; आवश्यक यह है कि बालिका शिक्षा को सामाजिक सम्मान, आर्थिक सुरक्षा और समान अवसरों से जोड़ा जाए। जब तक बेटी को परिवार की उत्तराधिकारी नहीं माना जाएगा, जब तक विवाह को आर्थिक लेन-देन का माध्यम समझा जाएगा, तब तक दहेज की मानसिकता समाप्त नहीं होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">विडंबना यह है कि एक ओर हम महिला सशक्तिकरण के नारे लगाते हैं, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान चलाते हैं, महिलाओं की उपलब्धियों पर गर्व करते हैं, दूसरी ओर कन्या के जन्म पर चिंता और विवाह के समय दहेज की चर्चा अभी भी अनेक घरों में सामान्य बात मानी जाती है। यह दोहरा सामाजिक चरित्र हमारी सबसे बड़ी चुनौती है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज आवश्यकता केवल कानूनों की नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना की है। विद्यालयों में लैंगिक समानता के संस्कार, परिवारों में बेटियों के प्रति समान व्यवहार, महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता, दहेज लेने-देने वालों का सामाजिक बहिष्कार तथा पंचायत स्तर तक जनजागरण अभियान ही वास्तविक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। यदि हम सचमुच विकसित भारत का स्वप्न देखते हैं तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि बालिका शिक्षा, स्त्री सम्मान और दहेज उन्मूलन केवल महिला मुद्दे नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण के प्रश्न हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">जिस दिन हर बेटी निर्भय होकर शिक्षा प्राप्त करेगी, अपने जीवन के निर्णय स्वयं ले सकेगी और विवाह दहेज नहीं बल्कि समानता, सम्मान और प्रेम पर आधारित होगा, उसी दिन हम सच्चे अर्थों में आधुनिक, प्रगतिशील और सभ्य समाज कहलाने के अधिकारी होंगे। अब समय की आवश्यकता यह है  कि हम केवल परिवर्तन की प्रतीक्षा न करें, बल्कि स्वयं परिवर्तन बनें। क्योंकि बेटी का सम्मान ही समाज का सम्मान है, और स्त्री की प्रगति ही राष्ट्र की वास्तविक प्रगति है।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 18:49:27 +0530</pubDate>
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                <title>सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी से कहा कमाकर खाओ।</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो चीफ प्रयागराज।</strong></div>
<div style="text-align:justify;">मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में  वैवाहिक विवाद के दो मामलों में जहाँ अप्रत्याशित देखने सुनने को मिला वहीं दहेज प्रताड़ना को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने उठाया बड़ा कदम, देशभर में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा पारित  गाइडलाइन लागू करने का आदेश दिया।एनडीटीवी के अनुसार पहले मामले में मुंबई में घर, बीएमडब्ल्यू और 12 करोड़ ऐलेमनी की मांग पर सीजेआई  ने महिला को जमकर सुनाया और कमाकर खाने की सलाह दी वहीं दुसरे मामले में आईपीएस पत्नी को बिना शर्त सार्वजनिक माफी मांगने का आदेश दिया । तीसरे मामले में  दहेज प्रताड़ना को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/153413/the-supreme-court-told-the-wife-to-earn-and-eat"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-07/divorce-.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो चीफ प्रयागराज।</strong></div>
<div style="text-align:justify;">मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में  वैवाहिक विवाद के दो मामलों में जहाँ अप्रत्याशित देखने सुनने को मिला वहीं दहेज प्रताड़ना को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने उठाया बड़ा कदम, देशभर में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा पारित  गाइडलाइन लागू करने का आदेश दिया।एनडीटीवी के अनुसार पहले मामले में मुंबई में घर, बीएमडब्ल्यू और 12 करोड़ ऐलेमनी की मांग पर सीजेआई  ने महिला को जमकर सुनाया और कमाकर खाने की सलाह दी वहीं दुसरे मामले में आईपीएस पत्नी को बिना शर्त सार्वजनिक माफी मांगने का आदेश दिया । तीसरे मामले में  दहेज प्रताड़ना को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2022 के दिशानिर्देशों को पूरे देश में लागू करने के आदेश दिए गए हैं । </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>पहला मामला-कमाकर खाओ।</strong></div>
<div style="text-align:justify;">18 महीने की शादी, 12 करोड़ रुपये गुजारा भत्‍ता, मुंबई का घर और एक बीएमडब्‍लू गाड़ी, यह हकीकत है उस शादी की जो अग्नि को साक्षी मानकर और सात फेरों के साथ पूरी हुई थी । मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले पर सुनवाई हुई । मुख्‍य न्‍यायधीश (सीजेआई) बीआर गवई ने स्‍पष्‍ट शब्‍दों में महिला से कहा, 'आपको कमाकर खाना चाहिए न कि मांगना चाहिए' और अब उनकी यह टिप्‍पणी उन तमाम लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गई है जो इसी तरह के मसलों से उलझ रहे हैं । मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है. ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सीजेआई के सामने यह एक हाई-प्रोफाइल मामला था और इस पर जो भी बहस हुई, वह भी काफी दिलचस्‍प थी । सीजेआई गवई ने महिला को समझाने वाले लहजे में कहा कि उसे गुजारा भत्‍ता के भरोसे नहीं रहना चाहिए बल्कि जब वह पढ़ी-लिखी है तो खुद कमाकर अपना गुजारा कर सकती है । अपने केस की पैरवी महिला खुद कर रही थी. सीजेआई और उस महिला के बीच बहस कुछ इस तरह से थी-।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>सीजेआई गवई: 'आपकी मांग क्‍या है?</strong>'</div>
<div style="text-align:justify;">महिला: 'बस मुंबई वाला घर और 12 करोड़ रुपये का गुजारा भत्ता। ' </div>
<div style="text-align:justify;">सीजेआई गवई: 'लेकिन वह घर तो कल्पतरु में है और यह अच्छे बिल्डर्स में से एक हैं । आप आईटी एक्सपर्ट हैं और एमबीए  भी किया है और यह आपकी डिमांड है!' बेंगलुरु, हैदराबाद में कहीं भी,  आप नौकरी क्यों नहीं करती? आपकी शादी सिर्फ 18 महीने चली और अब आपको एक बीएमडब्ल्यू भी चाहिए? 18 महीने की शादी और आप हर महीने एक करोड़ चाहती हैं। ' </div>
<div style="text-align:justify;">महिला- 'लेकिन वो बहुत अमीर हैं।उसने मुझे सिजोफ्रेनिया का शिकार बताकर शादी रद्द करने की मांग की।</div>
<div style="text-align:justify;">इसके बाद इस बहस में पति की पैरवी कर रही सीनियर लॉयर माधवी दीवान की एंट्री होती है । माधवी ने कोर्ट के सामने कहा, 'उसे भी काम करना पड़ता है। हर चीज की मांग ऐसे नहीं की जा सकती। '  इस पर महिला ने पलट कर सवाल किया, 'क्या मैं आपको सिजोफ्रेनिया से पीड़ित दिखती हूं ?' इसके बाद सीजेआई ने पति की वकील से कहा, 'आयकर रिटर्न दाखिल करें । लेकिन समझ लीजिए कि आप उसके पिता की संपत्ति पर भी दावा नहीं कर सकते। ' </div>
<div style="text-align:justify;">लंच के बाद इस मामले की सुनवाई फिर शुरू हुई । सिजेआई गवई की बेंच ने पति का आयकर रिटर्न देखा। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वरिष्ठ वकील दीवान ने कहा, 'कृपया पूरी कॉपी दें। 2015-16 में आय ज्‍यादा है क्योंकि उस समय वो नौकरी करते थे । 2 करोड़ 50 लाख और 1 करोड़ का बोनस, प्रॉक्सी बिजनेस के भी आरोप हैं। चलिए इसे भी उदाहरण के तौर पर लेते हैं । वो बैलेंस शीट भी है । जिस फ्लैट में वह रह रही हैं, उसके अलावा. दो कार पार्किंग भी हैं और वह उससे कमाई कर सकती है। ' उनकी इस बात से सीजेआई भी सहमत नजर आए. उन्‍होंने तुरंत कहा, 'हां मुंबई में सभी जगहों से पैसा कमाया  जा सकता है।' दीवान ने आगे कहा, 'जिस बीएमडब्ल्यूका वह सपना देख रही हैं, वह 10 साल पुरानी है और बहुत पहले ही खटारा हो चुकी है। </div>
<div style="text-align:justify;">यहां से बहस और भी ज्‍यादा दिलचस्‍प हो गई और महिला की मांग पर सीजेआई का रुख काफी कड़ा था । उनके और महिला के बीच फिर से बहस शुरू हुई जो इस तरह से थी। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सीजेआई गवई: ' या तो आपको बिना किसी बोझ के फ्लैट मिलेगा या कुछ भी नहीं, जब आप उच्च शिक्षित हों और जब अपनी इच्छा से काम न करने का फैसला किया हो । या तो आप वो 4 करोड़ रुपये ले लें और फिर पुणे/हैदराबाद/बेंगलुरु में कोई अच्छी नौकरी ढूंढ लें । आईटी केंद्रों में मांग है । '</div>
<div style="text-align:justify;">महिल (शिकायत के लहजे में)- 'मेरी नौकरी भी इन्हीं ने छुड़वा दी । मुझ पर एफआईआर  भी दर्ज करा दी । ' </div>
<div style="text-align:justify;">सीजेआई गवई: 'आप एफआईआर दे दीजिए हम वो भी रद्द कर देंगे । हम निर्देश देंगे कि कोई भी पक्ष एक-दूसरे के खिलाफ कोई आपराधिक कार्यवाही शुरू नहीं करेगा । ' </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पति की वकील: 'यह तो समझौते में पहले से ही है । '  </div>
<div style="text-align:justify;">सिजेआई गवई: 'आपको खुद मांगना नहीं चाहिए बल्कि  खुद कमाकर खाना चाहिए । '</div>
<div style="text-align:justify;">दूसरा मामला- आईपीएस पत्नी माफ़ी मांगो </div>
<div style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट  ने असाधारण कदम उठाते हुए  आईपीएस  पत्नी को बिना शर्त सार्वजनिक माफी मांगने का आदेश दिया ।कोर्ट ने कहा कि महिला और उसके माता-पिता अपने पति और उसके परिवार के सदस्यों से बिना शर्त माफी मांगेंगे, जिसे एक प्रसिद्ध अंग्रेजी और एक हिन्दी समाचार पत्र के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित किया जाएगा । यह माफीनामा फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और इसी तरह के अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी प्रकाशित और प्रसारित किया जाएगा ।</div>
<div style="text-align:justify;">वैवाहिक विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट ने असाधारण कदम उठाया है । आईपीएस पत्नी को वैवाहिक विवाद के दौरान पूर्व पति और ससुरालवालों के खिलाफ दर्ज कई आपराधिक मामलों से हुई 'शारीरिक और मानसिक पीड़ा' के लिए बिना शर्त सार्वजनिक रूप से माफी मांगने के आदेश दिया है । सुप्रीम कोर्ट ने पति-पत्नी के बीच चल रहे सारे मामलों को रद्द कर दिया । साथ ही संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए अक्टूबर 2018 से पति-पत्नी के अलग रहने के कारण शादी को भंग भी कर दिया ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सीजेआई बीआर गवई और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने ये फैसला सुनाया है । फैसले में कोर्ट ने कहा कि पत्नी द्वारा IPc की धारा 498A, 307 और 376 के तहत गंभीर आरोपों सहित दर्ज आपराधिक मामलों के चलते पति को 109 दिन और उसके पिता को 103 दिन जेल में बिताने पड़े । पीठ ने कहा कि उन्होंने जो कुछ सहा है, उसकी भरपाई  किसी भी तरह से नहीं की जा सकती । अदालत ने सार्वजनिक माफी को नैतिक क्षतिपूर्ति के रूप में उचित ठहराया । पत्नी ने पति और उसके परिवार के खिलाफ अलग-अलग आपराधिक मामले दर्ज कराए थे। पत्नी ने तलाक, भरण-पोषण आदि के लिए फैमिली कोर्ट में भी मामला दायर किया । पति ने भी पत्नी और परिवारवालों के खिलाफ मुकदमे दर्ज कराए थे । इसके अलावा तीसरे पक्ष ने भी मामले दर्ज कराए थे ।</div>
<div style="text-align:justify;">पति ने तलाक के लिए अर्जी दी थी. पति और पत्नी दोनों ने एक-दूसरे के खिलाफ दायर मामलों को अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में ट्रांसफर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की थी । मामले का फैसला सुनाते हुए, भारत के मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और जस्टिस एजी मसीह की पीठ ने कहा कि महिला और उसके माता-पिता अपने पति और उसके परिवार के सदस्यों से बिना शर्त माफी मांगेंगे, जिसे एक प्रसिद्ध अंग्रेजी और एक हिन्दी समाचार पत्र के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित किया जाएगा. यह माफीनामा फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और इसी तरह के अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी प्रकाशित और प्रसारित किया जाएगा । यहां माफी मांगने को दायित्व स्वीकार करने के रूप में नहीं समझा जाएगा और इसका कानूनी अधिकारों, दायित्वों या कानून के तहत उत्पन्न होने वाले परिणामों पर कोई असर नहीं पड़ेगा. यह माफीनामा इस आदेश की तारीख से 3 दिनों के भीतर प्रकाशित किया जाएगा । </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>इतना ही नहीं, पीठ ने पत्नी से बिना किसी बदलाव के एक प्रारूप में ही माफ़ी मांगने को भी कहा-</strong></div>
<div style="text-align:justify;">“मैं .., पुत्री ___, निवासी ....., अपनी और अपने माता-पिता की ओर से अपने किसी भी शब्द, कार्य या कहानी के लिए ईमानदारी से माफ़ी मांगती हूं जिससे ___ परिवार के सदस्यों, अर्थात् ____ की भावनाओं को ठेस पहुंची हो या उन्हें परेशानी हुई हो । मैं समझती हूं कि विभिन्न आरोपों और कानूनी लड़ाइयों ने दुश्मनी का माहौल पैदा कर दिया है और आपकी भलाई पर गहरा असर डाला है, हालांकि कानूनी कार्यवाही अब हमारे विवाह के भंग होने और पक्षों के बीच लंबित मुकदमों के रद्द करने के साथ समाप्त हो गई है ।. मैं समझती हूं कि भावनात्मक जख्मों को भरने में समय लग सकता है । मुझे पूरी उम्मीद है कि यह माफी हम सभी के लिए शांति और समाधान पाने की दिशा में एक कदम साबित होगी. मुझे खेद है और मैं दोनों परिवारों के लिए शांति और सौहार्दपूर्ण भविष्य की कामना करती हूं । दोनों परिवारों की शांति, अच्छे स्वास्थ्य, समृद्धि और खुशहाली के लिए, मुझे पूरी उम्मीद है कि ___ परिवार मेरी इस बिना शर्त माफ़ी को स्वीकार करेगा. अतीत चाहे कितना भी अंधकारमय क्यों न हो, वह भविष्य को बंदी नहीं बना सकता ।. मैं इस अवसर पर___परिवार के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करना चाहती हूं कि उनके साथ अपने जीवन के अनुभवों से मैं एक अधिक आध्यात्मिक व्यक्ति बन गई हूं । एक बौद्ध धर्मावलंबी होने के नाते, मैं सच्चे मन से ___परिवार के प्रत्येक सदस्य की शांति, सुरक्षा और खुशी की कामना करती हूं ।. यहां, मैं दोहराती हूं कि ___परिवार का विवाह से जन्मी उस बालिका से मिलने और उसके बारे जानने के लिए हार्दिक स्वागत है, जिसका कोई दोष नहीं है । आदर और सम्मान सहित । ”</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पीठ  ने पत्नी को यह भी निर्देश दिया कि वह एक IPS अधिकारी के रूप में अपने पद और शक्ति का, या भविष्य में अपने किसी अन्य पद का, देश में कहीं भी अपने सहकर्मियों/वरिष्ठों या अन्य परिचितों के पद और शक्ति का, पति, उसके परिवार के सदस्यों और रिश्तेदारों के विरुद्ध किसी भी प्राधिकरण या मंच के समक्ष किसी तीसरे पक्ष/अधिकारी के माध्यम से कोई कार्यवाही शुरू करने या पति और उसके परिवार को किसी भी तरह से शारीरिक या मानसिक क्षति पहुंचाने के लिए उपयोग न करें । हालांकि, पीठ  ने पति और उसके परिवार को आगाह किया कि वे याचिकाकर्ता-पत्नी और उसके परिवार द्वारा किसी भी अदालत, प्रशासनिक/नियामक/अर्ध-न्यायिक निकाय/ट्रिब्यूनल के समक्ष प्रस्तुत क्षमा याचना का उपयोग वर्तमान या भविष्य में उसके हितों के विरुद्ध न करें, अन्यथा इसे अदालत की अवमानना माना जाएगा जिसके लिए पति और उसके परिवार को उत्तरदायी ठहराया जाएगा । पक्षों के बीच सभी लंबित आपराधिक और दीवानी मुकदमों को रद्द/वापस लेने का आदेश दिया गया । अदालत ने ये भी आदेश दिया कि उनकी बेटी मां के साथ ही रहेगी और पति व परिजनों को मिलने का समय दिया जाएगा । साथ ही साफ किया कि पत्नी तय समझौते के मुताबिक पति से कोई गुजारा भत्ता नहीं लेगी ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>तीसरा मामला- दहेज प्रताड़ना पर दिशा निर्देश </strong></div>
<div style="text-align:justify;">वैवाहिक विवादों में IPC की धारा 498 A यानी दहेज प्रताड़ना को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा कदम उठाया है.  दहेज प्रताड़ना के दुरुपयोग को रोकने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2022 के दिशानिर्देशों को पूरे देश में लागू करने के आदेश दिए गए हैं । 498A मामलो में  दो महीने तक गिरफ्तारी ना करने और परिवार कल्याण समितियों के गठन के हाईकोर्ट दिशानिर्देशों का समर्थन किया है । सीजेआई बीआर गवई और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने फैसले में कहा कि हाईकोर्ट द्वारा तैयार किए गए दिशानिर्देश प्रभावी रहेंगे और प्राधिकारियों द्वारा उनका क्रियान्वयन किया जाना चाहिए ।</div>
<div style="text-align:justify;">पीठ ने कहा  कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा 13जून 2022 के फैसले में पैरा 32 से 38 के अनुसार, 'भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के दुरुपयोग से संबंधित सुरक्षा उपायों के लिए परिवार कल्याण समितियों के गठन' के संबंध में तैयार किए गए दिशानिर्देश प्रभावी रहेंगे और उपयुक्त प्राधिकारियों द्वारा उनका क्रियान्वयन किया जाएगा । दरअसल इस फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि 2018 में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मार्गदर्शन प्राप्त करते हुए दिशानिर्देश जारी कर रहा है । इसका उद्देश्य वादियों में पति और उसके पूरे परिवार को व्यापक आरोपों के माध्यम से फंसाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना है ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>हाईकोर्ट के दिशानिर्देश थे </strong></div>
<div style="text-align:justify;">(1) FIR या शिकायत दर्ज होने के बाद, "कूलिंग पीरियड" (जो FIR या शिकायत दर्ज होने के दो महीने बाद है) समाप्त हुए बिना, नामित अभियुक्तों की गिरफ्तारी या उन्हें पकड़ने के लिए पुलिस कार्रवाई नहीं की जाएगी ।.इस "कूलिंग पीरियड" के दौरान, मामला प्रत्येक जिले में तुरंत परिवार कल्याण समिति को भेजा जाएगा।</div>
<div style="text-align:justify;">(2) केवल वे मामले परिवार कल्याण समिति को भेजे जाएंगे जिनमें धारा 498-ए, अन्य धाराओं के साथ-साथ कारावास की सजा 10 साल से कम हो ।</div>
<div style="text-align:justify;">(3) शिकायत या FIR दर्ज होने के बाद दो महीने का "कूलिंग पीरियड" समाप्त हुए बिना कोई कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए. इस "कूलिंग पीरियड" के दौरान, मामले को प्रत्येक जिले में परिवार कल्याण समिति को भेजा जा सकता है ।</div>
<div style="text-align:justify;">(4) प्रत्येक जिले में कम से कम एक या एक से अधिक परिवार कल्याण समिति (जिला विधिक सहायता सेवा प्राधिकरण के अंतर्गत गठित उस जिले के भौगोलिक आकार और जनसंख्या के आधार पर) होगी, जिसमें कम से कम तीन सदस्य होंगे ।  इसके गठन और कार्यों की समीक्षा  उस जिले के जिला एवं सत्र न्यायाधीश/प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट द्वारा समय-समय पर की जाएगी, जो विधिक सेवा प्राधिकरण में उस जिले के अध्यक्ष या सह-अध्यक्ष होंगे ।</div>
<div style="text-align:justify;">(5) उक्त परिवार कल्याण समिति में निम्नलिखित सदस्य शामिल होंगे:-</div>
<div style="text-align:justify;">(ए ) जिले के मध्यस्थता केंद्र से एक युवा मध्यस्थ या पांच वर्ष तक का अनुभव रखने वाला युवा वकील या राजकीय विधि महाविद्यालय या राज्य विश्वविद्यालय या राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय का पाँचवें वर्ष का वरिष्ठतम छात्र.. अच्छा शैक्षणिक रिकॉर्ड रखने वाला और लोक-हितैषी युवक, या</div>
<div style="text-align:justify;">(बी) उस जिले का सुप्रसिद्ध और मान्यता प्राप्त सामाजिक कार्यकर्ता, जिसका पूर्व-पारिवारिक इतिहास साफ़-सुथरा हो, या;</div>
<div style="text-align:justify;">(सी)  जिले में या उसके आस-पास रहने वाले सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी, जो कार्यवाही के उद्देश्य के लिए समय दे सकें, या;</div>
<div style="text-align:justify;"> (डी) जिले के वरिष्ठ न्यायिक या प्रशासनिक अधिकारियों की शिक्षित पत्नियां ।</div>
<div style="text-align:justify;">(6) परिवार कल्याण समिति के सदस्य को कभी भी गवाह के रूप में नहीं बुलाया जाएगा ।</div>
<div style="text-align:justify;">(7) भारतीय दंड संहिता की धारा 498A और ऊपर उल्लिखित अन्य संबद्ध धाराओं के अंतर्गत प्रत्येक शिकायत या आवेदन, संबंधित मजिस्ट्रेट द्वारा तुरंत परिवार कल्याण समिति को भेजा जाएगा..  उक्त शिकायत या FIR प्राप्त होने के बाद, समिति प्रतिवादी पक्षों को उनके चार वरिष्ठ व्यक्तियों के साथ व्यक्तिगत बातचीत के लिए बुलाएगी और दर्ज होने के दो महीने के भीतर उनके बीच के विवाद/शंकाओं को सुलझाने का प्रयास करेगी.  प्रतिवादी पक्षों को समिति के सदस्यों की सहायता से अपने बीच गंभीर विचार-विमर्श के लिए अपने चार वरिष्ठ व्यक्तियों (अधिकतम) के साथ समिति के समक्ष उपस्थित होना अनिवार्य है ।</div>
<div style="text-align:justify;">(8) समिति उचित विचार-विमर्श के बाद, एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करेगी और मामले से संबंधित सभी तथ्यात्मक पहलुओं और अपनी राय को शामिल करते हुए, दो महीने की अवधि समाप्त होने के बाद, संबंधित मजिस्ट्रेट/पुलिस अधिकारियों को, जिनके समक्ष ऐसी शिकायतें दर्ज की जा रही हैं, भेजेगी ।</div>
<div style="text-align:justify;">(9) पुलिस अधिकारी, नामित अभियुक्तों के विरुद्ध आवेदनों या शिकायतों के आधार पर किसी भी गिरफ्तारी या किसी भी दंडात्मक कार्रवाई से बचने के लिए, समिति के समक्ष विचार-विमर्श जारी रखेंगे.  हालांकि, जांच अधिकारी मामले की परिधीय जाँच जारी रखेंगे, जैसे कि मेडिकल रिपोर्ट, चोट रिपोर्ट और गवाहों के बयान तैयार करना ।</div>
<div style="text-align:justify;">(10) समिति द्वारा दी गई उक्त रिपोर्ट, गुण-दोष के आधार पर, जांच अधिकारी या मजिस्ट्रेट के विचाराधीन होगी और उसके बाद दो महीने की " कूलिंग अवधि" समाप्त होने के बाद, दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों के अनुसार उनके द्वारा उचित कार्रवाई की जाएगी । </div>
<div style="text-align:justify;">(11) विधिक सेवा सहायता समिति, परिवार कल्याण समिति के सदस्यों को समय-समय पर आवश्यक समझे जाने वाले बुनियादी प्रशिक्षण प्रदान करेगी । </div>
<div style="text-align:justify;">(12) चूंकि,यह समाज में व्याप्त उन कटुताओं को दूर करने का एक नेक कार्य है जहां प्रतिवादी पक्षों की भावनाएं बहुत तीव्र होती हैं ताकि वे अपने बीच की गर्माहट को कम कर सकें और उनके बीच की गलतफहमियों  को दूर करने का प्रयास कर सकें चूंकि यह कार्य व्यापक रूप से जनता के लिए है, सामाजिक कार्य है, इसलिए वे प्रत्येक जिले के जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वारा निर्धारित न्यूनतम मानदेय या निशुल्क आधार पर कार्य कर रहे हैं ।</div>
<div style="text-align:justify;">(13) भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए और अन्य संबद्ध धाराओं से संबंधित ऐसी FIR या शिकायतों की जांच, गतिशील जांच अधिकारियों द्वारा की जाएगी, जिनकी निष्ठा, ऐसे वैवाहिक मामलों को पूरी ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ संभालने और जांच करने के लिए कम से कम एक सप्ताह के विशेष प्रशिक्षण के बाद प्रमाणित हो ।</div>
<div style="text-align:justify;">(14) जब पक्षों के बीच समझौता हो जाता है तो जिला एवं सत्र न्यायाधीश और उनके द्वारा जिले में नामित अन्य वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी आपराधिक मामले को बंद करने सहित कार्यवाही का निपटारा करने के लिए स्वतंत्र होंगे । दरअसल मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और जस्टिस एजी मसीह की पीठ ने उस वैवाहिक मामले में फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट  के सुरक्षा उपायों का समर्थन किया है, जिसमें पत्नी और उसके परिवार ने पति और उसके परिवार के खिलाफ झूठे मामले दर्ज कराए थे, जिसके कारण पति और उसके पिता को जेल की सजा हुई थी ।</div>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Thu, 24 Jul 2025 18:27:15 +0530</pubDate>
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