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                <title>actor - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>18 मार्च तक दिल्ली हाईकोर्ट ने दी अंतरिम जमानत, राजपाल यादव का 'संकट' टला</title>
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                        <![CDATA[<p>बॉलीवुड अभिनेता राजपाल यादव के लिए सोमवार का दिन कानूनी दांव-पेंचों और भारी तनाव के बीच आखिरकार राहत भरी खबर लेकर आया. चेक बाउंस मामले में फंसे अभिनेता को दिल्ली हाईकोर्ट ने 18 मार्च, 2026 तक के लिए अंतरिम जमानत दे दी है. सोमवार सुबह सुनवाई के दौरान कोर्ट का रुख काफी सख्त था. न्यायमूर्ति ने स्पष्ट कर दिया था कि यदि राजपाल यादव को अंतरिम जमानत चाहिए, तो उन्हें दोपहर 3 बजे तक प्रतिवादी के नाम पर 1.5 करोड़ रुपये का डिमांड ड्राफ्ट (DD) जमा करना होगा. कोर्ट ने कहा था, ‘अगर आप DD जमा करते हैं, तो हम</p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/169918/delhi-high-court-grants-interim-bail-to-rajpal-yadav-till"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-02/download-(6).jpg" alt=""></a><br /><p>बॉलीवुड अभिनेता राजपाल यादव के लिए सोमवार का दिन कानूनी दांव-पेंचों और भारी तनाव के बीच आखिरकार राहत भरी खबर लेकर आया. चेक बाउंस मामले में फंसे अभिनेता को दिल्ली हाईकोर्ट ने 18 मार्च, 2026 तक के लिए अंतरिम जमानत दे दी है. सोमवार सुबह सुनवाई के दौरान कोर्ट का रुख काफी सख्त था. न्यायमूर्ति ने स्पष्ट कर दिया था कि यदि राजपाल यादव को अंतरिम जमानत चाहिए, तो उन्हें दोपहर 3 बजे तक प्रतिवादी के नाम पर 1.5 करोड़ रुपये का डिमांड ड्राफ्ट (DD) जमा करना होगा. कोर्ट ने कहा था, ‘अगर आप DD जमा करते हैं, तो हम रिहा कर देंगे, वरना कल सुनवाई होगी.’ हालांकि अभी तक यह जानकारी नहीं आई कि राजपाल यादव की टीम द्वारा 1.5 करोड़ का डिमांड ड्राफ्ट कोर्ट में जमा किया गया है या नहीं.</p>
<p>राजपाल यादव ने अपनी अद्भुत कॉमेडी और अभिनय क्षमता से बॉलीवुड में एक मजबूत साख बनाई है, लेकिन बार-बार कोर्ट-कचहरी के चक्करों ने उनकी ब्रांड वैल्यू पर सवालिया निशान लगा दिए हैं. मनोरंजन उद्योग में ‘क्रेडिबिलिटी’ यानी विश्वसनीयता सबसे बड़ी पूंजी होती है, और चेक बाउंस जैसे गंभीर मामलों में संलिप्तता किसी भी कलाकार के पेशेवर भविष्य को प्रभावित कर सकती है. वर्तमान समय में सख्त होते कानून के बीच, यह मामला यह संदेश देता है कि वित्तीय अनुशासन में चूक की कीमत न केवल भारी जुर्माने, बल्कि निजी स्वतंत्रता खोकर भी चुकानी पड़ सकती है.</p>
<p><strong>राजपाल यादव का कानूनी चक्रव्यूह</strong><br />राजपाल यादव के मौजूदा कानूनी संकट की जड़ें साल 2010 में गहराई से जुड़ी हैं. यह वह दौर था जब उन्होंने अभिनय के साथ-साथ निर्देशन के क्षेत्र में कदम रखा और अपनी पहली फिल्म ‘अता पता लापता’ बनाने का निर्णय लिया. इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए उन्होंने दिल्ली स्थित एक कंपनी से लगभग 5 करोड़ रुपये का कर्ज लिया था. हालांकि, फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं रही और कर्ज अदायगी का संकट खड़ा हो गया. आरोप है कि अभिनेता ने भुगतान के लिए जो चेक दिए थे, वे बैंक में बाउंस हो गए, जिसके बाद यह मामला निचली अदालत की दहलीज से होता हुआ दिल्ली हाईकोर्ट तक जा पहुंचा. गौरतलब है कि राजपाल यादव को इस विवाद के चलते पहले भी जेल की हवा खानी पड़ी है,</p>]]>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 16 Feb 2026 16:50:03 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]>
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                <title>नायक वो नहीं जो दिखता है, बल्कि वो जो करता है</title>
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                        <![CDATA[नायकत्व अब अभिनय नहीं, आचरण से जन्म लेता है]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/160354/a-hero-is-not-what-he-looks-like-but-what"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-11/hindi-divas18.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सिनेमाघरों की चमकती स्क्रीन पर हर हफ़्ते कोई नया नायक जन्म लेता है — कोई तानाशाहों से लड़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई दुनिया बचाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई अन्याय को मिटा देता है। पर जब परदा गिरता है और रोशनी बुझ जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो ये नायक वहीं ठहर जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं मर जाते हैं — फिल्म की कहानी के साथ। असली ज़िंदगी की गलियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चौकों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और गलियारों में जब भूख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिंसा और बेबसी नाचती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वहाँ कोई नहीं उतरता। जहाँ इंसानियत की ज़रूरत होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ बस भीड़ होती है — जो देखती सब है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर करती कुछ नहीं। यही हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी है — नायक अब पर्दे पर हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि उनकी ज़रूरत सड़कों पर है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमने नायकत्व को अभिनय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवाद और ताली की आवाज़ों में बाँध दिया है। साहस अब बॉक्स ऑफिस की कमाई से मापा जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और करुणा अब पॉपकॉर्न के साथ बिकती है। हमने </span><span lang="hi" xml:lang="hi">“</span><span lang="hi" xml:lang="hi">साहस</span><span lang="hi" xml:lang="hi">”</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">को</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मनोरंजन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बना</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">दिया</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पर</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">समाज</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">फिल्मों</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">से</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नहीं</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बदलता</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वह</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">उन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लोगों</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">से</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बदलता</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">है</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जो</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ज़मीन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पर</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">उतरकर</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">करते</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">किसी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">गिरे</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हुए</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">को</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">उठाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी के हक़ में बोलना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी की भूख मिटाने की कोशिश करना — यही असली नायकत्व है। और आज के युग में यह सबसे दुर्लभ गुण है — </span><span lang="hi" xml:lang="hi">“</span><span lang="hi" xml:lang="hi">करुणा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">साथ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">”</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हर दिन कोई हादसा होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई बच्चा बिना रोटी के सो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई बुज़ुर्ग अकेलेपन में डूब जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई महिला चुपचाप अपमान सहती है —</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और हम</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">हम अगले शो के टिकट बुक करते हैं। हमने संवेदना को आउटसोर्स कर दिया है</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi"> उन काल्पनिक नायकों को जो सिर्फ परदे पर जीते हैं। हमें लगता है कि कोई आएगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे फिल्मों में होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और सब ठीक कर देगा। पर ज़िन्दगी कोई फिल्म नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यहाँ कोई </span><span lang="hi" xml:lang="hi">“</span><span lang="hi" xml:lang="hi">हैप्पी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एंडिंग</span><span lang="hi" xml:lang="hi">”</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नहीं</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">होती।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जब</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">कोई</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">असली</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इंसान</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आगे</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नहीं</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बढ़ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तक हर अंत अधूरा ही रहता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नायक बनना कठिन है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि इसमें चमक नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संघर्ष है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें शोहरत नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिम्मेदारी है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें तालियाँ नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बस थकान है। असली नायक वो नहीं जो खलनायक को हराए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि वो है जो अपने भीतर के डर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संदेह और उदासीनता से जीत जाए। जो सच बोलने की हिम्मत रखे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भले अकेला ही क्यों न हो। जो भीड़ में खड़ा होकर भी सच्चाई की ओर झुके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही समाज का सच्चा नायक है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">समाज को आज पर्दे के पीछे नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज़मीन पर काम करने वाले नायकों की ज़रूरत है। वो शिक्षक जो गांव के बच्चों में सपनों की लौ जलाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वो सफाईकर्मी जो बदबू में भी इज़्ज़त से काम करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वो डॉक्टर जो छुट्टी के दिन भी मरीज देखता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वो लड़की जो डर के बावजूद अपनी आवाज़ उठाती है — यही वो लोग हैं जिनसे समाज सांस लेता है। लेकिन अफ़सोस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इनकी कहानी पर कैमरे नहीं घूमते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इनकी मेहनत पर ताली नहीं बजती। ये वो नायक हैं जो बिना दर्शकों के</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिना इनाम के</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बस अपने कर्तव्य से प्रेरित होकर आगे बढ़ते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज हमें फिल्मों में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने जीवन में </span><span lang="hi" xml:lang="hi">“</span><span lang="hi" xml:lang="hi">एक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नायक</span><span lang="hi" xml:lang="hi">”</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">चाहिए</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">—</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जो</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">कह</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सके</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">“</span><span lang="hi" xml:lang="hi">मैं</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">करूंगा</span>,” <span lang="hi" xml:lang="hi">चाहे कोई साथ दे या नहीं। हमें ऐसे युवाओं की ज़रूरत है जो सेल्फ़ी में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सच्चाई में दिलचस्पी रखें</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">जो फॉलोअर्स नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि मिसाल बनने का साहस रखें। समाज तब बदलता है जब कोई व्यक्ति भीड़ से अलग होकर खड़ा होता है और कहता है — </span><span lang="hi" xml:lang="hi">“</span><span lang="hi" xml:lang="hi">अब</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बहुत</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हुआ।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">”</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यही</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वो</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">क्षण</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">होता</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">है</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">परिवर्तन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">शुरुआत</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">होती</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इतिहास ने हमेशा उन्हीं नायकों को याद रखा है जिन्होंने पसीने से बदलाव लिखा — भगत सिंह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रामप्रसाद बिस्मिल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुभाष चंद्र बोस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सी.वी. रमन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कल्पना चावला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाबा आमटे</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi"> सुधा मूर्ति आदि। इनकी कहानियों में कोई फ़िल्मी सीन नहीं था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई ताली नहीं बजी थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इनका असर पीढ़ियों तक रहेगा। ये नायक प्रसिद्धि से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीयत से पैदा हुए थे। इन्होंने दिखाया कि नायकत्व पद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रसिद्धि या परिधान में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि दृष्टि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीयत और कर्म में बसता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज वक्त है खुद से एक सख्त सवाल पूछने का — क्या हम सिर्फ दर्शक बनकर रह जाएंगे</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्या हम सिर्फ परदे पर ताली बजाने तक सीमित रहेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या फिर उन गलियों में उतरेंगे जहाँ किसी की उम्मीद टूटी है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">दुनिया को फिल्मों के सुपरहीरो की नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इंसानों के साहस की ज़रूरत है। हमें हर दिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर मोड़ पर थोड़ा-थोड़ा नायक बनना होगा — किसी के हक़ में बोलकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी की मदद कर के</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी का मनोबल बढ़ाकर।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब हममें से हर कोई अपनी सीमाओं से ऊपर उठकर इंसानियत का हाथ थामेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब समाज का चेहरा सच में बदलेगा। तब कोई हादसा अनदेखा नहीं रहेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई बेबसी अनसुनी नहीं रहेगी। तब हमें यह कहने में संकोच नहीं होगा — नायक अब पर्दे पर नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सड़कों पर हैं। और वही दिन होगा जब इंसानियत अपनी सबसे बड़ी भूमिका निभाएगी — बिना स्क्रिप्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिना स्पॉटलाइट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर सच्चाई और साहस के साथ।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"> </p>]]>
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                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 15 Nov 2025 18:22:01 +0530</pubDate>
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                <title>इमरजेंसी में इंदिरा सरकार के खिलाफ अड़ गए थे मनोज कुमार! </title>
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                        <![CDATA[<div>वह आपात काल का दौर था जब बड़े से बड़े एक्टर प्रोड्यूसर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार के खिलाफ एक शब्द बोलने या फिल्म बनाने की हिम्मत नहीं रखते थे सैंसरशिप इतना कि फिल्म में आम आदमी की दशा महंगाई भ्रष्टाचार रिश्वतखोरी को केंद्र में रखकर फिल्माना भी जुर्म बन गया था लेकिन अभिनेता मनोज कुमार तो मनोज कुमार ठहरे उन्होंने न सिर्फ आम आदमी को केंद्र में रखकर फिल्म बनाई बल्कि सरकार की रोक के खिलाफ अदालत में लडाई भी लड़ी और सरकार को पटखनी दी। </div>
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<div>बॉलीवुड के  एक्टर-डायरेक्टर मनोज कुमार अब हमारे बीच नहीं रहे हैं. उन्होंने</div>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/150802/manoj-kumar-was-adamant-against-indira-government-in-emergency"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-04/download-(5)1.jpg" alt=""></a><br /><div>वह आपात काल का दौर था जब बड़े से बड़े एक्टर प्रोड्यूसर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार के खिलाफ एक शब्द बोलने या फिल्म बनाने की हिम्मत नहीं रखते थे सैंसरशिप इतना कि फिल्म में आम आदमी की दशा महंगाई भ्रष्टाचार रिश्वतखोरी को केंद्र में रखकर फिल्माना भी जुर्म बन गया था लेकिन अभिनेता मनोज कुमार तो मनोज कुमार ठहरे उन्होंने न सिर्फ आम आदमी को केंद्र में रखकर फिल्म बनाई बल्कि सरकार की रोक के खिलाफ अदालत में लडाई भी लड़ी और सरकार को पटखनी दी। </div>
<div> </div>
<div>बॉलीवुड के  एक्टर-डायरेक्टर मनोज कुमार अब हमारे बीच नहीं रहे हैं. उन्होंने 87 साल की उम्र में मुंबई के कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में आखिरी सांस ली. वो लंबे समय से उम्र संबंधित बीमारियों से जूझ रहे थे. मनोज कुमार अपनी देशभक्ति फिल्मों की वजह से फेमस थे. मनोज कुमार को लोग भारत कुमार कहकर बुलाते थे. मनोज कुमार के साथ बॉलीवुड के एक युग का भी आज अंत हो गया है. उनकी फिल्में जितनी हिट रही हैं उतनी ही उनकी पर्सनल लाइफ मुश्किल में रही. उन्होंने  बंटवारे का दर्द भी झेला है.</div>
<div>मनोज कुमार का जन्म 24 जुलाई 1937 को ब्रिटिश भारत के एबटाबाद (अब पाकिस्तान) में हुआ था. बंटवारे के बाद उनका पूरा परिवार दिल्ली आकर बस गया था.</div>
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<div>एक दौर ऐसा आया कि पूरब पश्चिम की जबरदस्त कामयाबी के बाद मनोज कुमार देशभक्ति के नायक बन गए। उनपर फिल्माए गए गीत के बोल "जीते हो किसी ने देश तो क्या हमने तो दिलों को जीता है यहां राम अभी तक है नर में नारी में अभी तक सीता है" हर देशवासी के दिल में एक जज्बा पैदा करने में कामयाब रहे। </div>
<div>पाकिस्तान के एबटाबाद में जन्में मनोज कुमार को सिर्फ 10 साल की उम्र में बंटवारे का दर्द झेलना पड़ा था.  उन्हें जलियाला शेर खान से दिल्ली जाना पड़ गया था. जबकि मनोज कुमार का परिवार विजय नगर, किंग्सवे कैंप में शरणार्थियों के तौर पर रहा और वो भी कुछ समय के बाद दिल्ली के पुराने राजेंद्र नगर इलाके में चले गए। </div>
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<div>मनोज कुमार ने अपनी पढ़ाई दिल्ली यूनिवर्सिटी से की. उन्होंने ग्रेजुएशन करने के बाद ही फिल्म इंडस्ट्री में जाने का फैसला कर लिया था. उस समय किसी ने नहीं सोचा होगा मनोज कुमार इतने बड़े स्टार हैं। मनोज कुमार की 1957 में पहली फिल्म फैशन आई थी. इस फिल्म में उन्होंने 80 साल के बुजुर्ग का रोल निभाया था. इसके बाद वो हरियाली और रास्ता में नजर आए थे. इस फिल्म के बाद से मनोज कुमार ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. इस फिल्म ने उनकी किस्मत चमका दी थी. उसके बाद से मनोज कुमार की हिट फिल्मों की लाइन लग गई थी. जिसमें वो कौन थी, गुमनाम, हिमालय की गोद में जैसी कई फिल्में शामिल हैं. ये सारी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर हिट साबित हुई थीं।</div>
<div> </div>
<div>मनोज कुमार ने कई हिट फिल्में देने के बाद डायरेक्शन में कदम रखा. उन्होंने उपकार, जय हिंद. क्लर्क, क्रांति, रोटी कपड़ा और मकार, शोर, पूरब और पश्चिम जैसी कई फिल्मों का डायरेक्शन किया. मनोज कुमार देशभक्ति की फिल्मों के लिए पर्याय बन गए। फिर शुरू हुआ नया सफर जिसमें देशभक्ति वाली फिल्में ,मतलब मनोज कुमार. 15 अगस्त और 26 जनवरी पर बजने वाले देशभक्ति गीतों को याद करेंगे तो ज्यादातर में मनोज कुमार मिलेंगे. बॉलिवुड में वह 'भारत कुमार' के नाम से मशहूर हो गए. चेहरे पर हाथ फेरती उनकी अदा की दीवानी कई पीढ़ी रही. शुक्रवार सुबह मनोज कुमार हमेशा के लिए खामोश हो गए. बॉलिवुड सदमे हैं और उनके चाहने वाले उनके गीतों को गुनगुना रहे हैं।</div>
<div> </div>
<div>मनोज कुमार का असली नाम हरिकृष्ण गिरि गोस्वामी था, इनका जन्म 24 जुलाई, 1937 को एबटाबाद में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। विभाजन के कारण उनका परिवार दिल्ली आ गया था और इस दौरान उन्हें शरणार्थी शिविर में रहना पड़ा था. तब उनकी उम्र 10 साल थी. बाद में गोस्वामी परिवार राजधानी के पटेल नगर इलाके में बस गया।</div>
<div> </div>
<div>अभिनेता मनोज कुनार ने हिंदू कॉलेज से डिग्री हासिल की है.साल 1949 में उन्होंने अपना नाम मनोज कुमार रखा लिया था. दरअसल उनके पसंदीदा अभिनेता दिलीप कुमार ने फिल्म शबनम में इसी नाम का किरदार निभाया था.साल 1960 में आई कांच की गुड़िया उनकी पहली मुख्य भूमिका वाली फिल्म थी.मनोज कुमार और उनकी पत्नी शशि के दो बेटे हैं, विशाल और कुणाल।</div>
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<div>मनोज कुमार ने अपने करियर में कुल 35 फिल्मों में काम किया था. दरअसल दिलीप कुमार की फिल्म शबनम देखने के बाद उन्होंने अपना नाम बदला था. इसी के बाद उन्होंने फिल्मी दुनिया में आने का फैसला लिया. मनोज ने कांच की गुड़िया, वो कौन थी, क्रांति, पूरब और पश्चिम और शिरडी वाले साई बाबा में यादगार रोल निभाए. साल 1995 में मैदान ए जंग में की रिलीज के बाद मनोज ने एक्टिंग की दुनिया से तौबा कर लिया. साल 1999 में उन्होंने आखिरी फिल्म जय हिंद को डायरेक्ट किया था. फिल्मी करियर को विराम लगाते ही मनोज कुमार ने पॉलिटिक्स की दुनिया में कदम रखा था। </div>
<div> </div>
<div>मनोज कुमार को पद्मश्री और दादासाहेब फाल्के, किशोर कुमार अवॉर्ड से नवाजा गया था. वहीं उन्हें फिल्मफेयर की ओर से बेस्ट एक्टर के अवॉर्ड कई दफा मिले. मनोज कुमार को लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया था।</div>
<div> </div>
<div>देशभक्ति आधारित फिल्मों से मनोज कुमार का जुड़ाव 1965 में आयी शहीद से हुआ था, जिसमें उन्होंने सरदार भगत सिंह का किरदार निभाया था। प्रेम धवन रचित फिल्म का संगीत बेहद सफल रहा था और आज भी देशभक्ति के गीतों के लिए जाना जाता है। मेरा रंग दे बसंती चोला, सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, पगड़ी सम्भाल जट्टा और ऐ वतन ऐ वतन... बजते हैं तो आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। </div>
<div> </div>
<div>1967 मनोज कुमार के लिए काफी अच्छा साबित हुआ। रोमांटिक ड्रामा पत्थर के सनम और उपकार बड़ी हिट रही थीं। उपकार इसलिए भी खास है, क्योंकि इसके साथ उन्होंने निर्देशन में कदम रखा। इसी फिल्म के बाद से उन्हें भारत कुमार का नाम मिल गया।</div>
<div> </div>
<div>उपकार’ फिल्म उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के कहने पर बनाई थी। दरअसल, साल 1965 में जब भारत और पाकिस्तान का युद्ध हुआ था, तब इस युद्ध के बाद ही मनोज कुमार ने तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री से मुलाकात की थी, जिसमें उन्होंने अभिनेता से युद्ध से होने वाली परेशानियों पर एक फिल्म बनाने के लिए कहा था। हालांकि, इस फिल्म को खुद लाल बहादुर शास्त्री नहीं देख पाए थे।</div>
<div> </div>
<div>ताशकंद से लौटने के बाद लाल बहादुर शास्त्री इस फिल्म को देखने वाले थे, लेकिन ऐसा संभव नहीं हो पाया।मनोज कुमार की फिल्में लाल बहादुर शास्त्री और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं को भी काफी पसंद आती थीl उन्होंने उपकार फिल्म लाल बहादुर शास्त्री के नारे 'जय जवान, जय किसान' से प्रेरणा लेकर बनाई थी।</div>
<div> </div>
<div>दरअसल, देश में आपातकाल लगने के बाद मनोज कुमार ने इसका विरोध किया था. इससे सरकार नाराज हो गई थी. कहा जाता है कि जब तत्‍कालीन मंत्री विध्याचरण शुक्‍ला ने इंदिरा गांधी और उनके आपातकाल के फेवर में मनोज कुमार को प्रो-इमरजेंसी डॉक्‍यूमेंट्री बनाने का ऑफर दिया तो उन्‍होंने इनकार कर दिया था. इतना ही नहीं मनोज कुमार ने डॉक्‍यूमेंट्री के लेखक अमृता प्रीतम को फोन कर इतना तक कह दिया था कि क्‍या लेखक के तौर पर समझौता कर लिए हो।</div>
<div> </div>
<div>यही वजह रही कि मनोज कुमार के लिए इमरजेंसी का दौर चुनौतीपूर्ण रहा. उस दौर में उनकी फ‍िल्‍में भी फ्लाप हो गई थींइतना ही नहीं मनोज कुमार की एक फ‍िल्‍म दस नंबरी पर रोक तक लगा दी गई थी. इससे उनका करियर भी समाप्‍त होने का डर था, हालांकि वह डरे नहीं.   मनोज कुमार ने सरकार के खिलाफ केस तक कर दिया और वह केस जीत भी गए थे. वह एकलौते अभिनेता थे, जिन्‍होंने सरकार से केस जीता।</div>
<div> </div>
<div>मनोज कुमार ने एचएल गोस्वामी और कृष्णा कुमारी गोस्वामी के घर जन्म लिया था. मनोज के एक भाई और बहन थे. मनोज ने शशि गोस्वामी से शादी रचाई, जिनसे उनके दो बच्चे कुणाल और साशा हुए. बता दें कि टीवी के जाने-माने प्रोड्यूसर मनीष गोस्वामी उनके कजिन हैं।</div>]]>
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                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 05 Apr 2025 16:56:03 +0530</pubDate>
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                <title>शाहरुख खान जब कैमरे के सामने सफेद झूठ बोले।नफरत हो जायेगी आपको।</title>
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                        <![CDATA[शाहरुख खान कहते हुए पाए गए कि उन्होंने अपनी ही तमाम फिल्में कभी नही देखी।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/131745/when-shahrukh-khan-lied-in-front-of-the-camera"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-07/11.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>स्वतंत्र प्रभात-</strong></p>
<p>एक इंटरव्यू में शाहरुख खान कहते हुए पाए गए कि उन्होंने अपनी ही तमाम फिल्में कभी नही देखी। जिसमें उन्होंने स्वदेश का नाम भी लिया।<br />कितना झूठा आदमी है, और झूठ बोलते इसे शर्म भी नही आती।</p>
<p>जो फ़िल्म उनको मिल नही रही थी, संयोग से मिली..  जो शायद उनके करियर की टॉप थ्री फिल्मों में से एक है. बड़े बड़े फ़िल्म विशेषज्ञ स्वदेश को टॉप 10 में भी मानते हैं।निःसन्देह फ़िल्म अच्छी है।</p>
<p><strong>अब आते हैं स्वदेश पर</strong></p>
<p>स्वदेश में हीरो का रोल पहले तो आमिर खान को आफर हुआ, लेकिन उन्होंने हल्की स्क्रिप्ट कहकर मना कर दिया। फिर आफर गया रितिक रोशन के पास, उन्होंने भी मना कर दिया।फिर ये शाहरुख को मिली। </p>
<p>हालांकि हुआ वही जो आमिर ने कहा था फ़िल्म पिट गयी। फ़िल्म भी समय के हिसाब से थोड़ा आगे की फ़िल्म थी... इसने सफलता के कोई झंडे नही गाड़े.. लेकिन फ़िल्म को सराहना बहुत मिली , अभिनय सराहा गया, कावेरी अम्मा का रोल याद किया जाएगा।</p>
<p><br />सराहना मिलने का एक कारण ये भी था कि ये फ़िल्म एक सच्ची बायोग्राफी थी। इसपर साउथ में भी फिल्म बनी थी और कुछ धारावाहिक भी आये थे।शाहरुख ने अवार्ड भी जीते और उनका अभिनय भी काबिले तारीफ रहा। यह पहली बॉलीवुड फ़िल्म थी जिसका कुछ हिस्सा नासा में शूट हुआ।</p>
<p> </p>
<p> फ़िल्म में उनका नाम भी गाँधी जी के नाम से प्रेरित था और  उनका किरदार में गांधीवाद की झलक थी, हीरो का विदेश में रहना फिर अपने देश में आकर बस जाना। इसलिये उनका नाम 'मोहन' था. अब ये झूठ किस तरह बोलते हैं समझ नही आता।</p>]]>
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                                                            <category>खेल मनोरंजन</category>
                                            <category>मनोरंजन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 03 Jul 2023 12:19:54 +0530</pubDate>
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                <title>जॉली एलएलबी के 10 साल: सौरभ शुक्ला याद करते हैं कि कैसे जॉली एलएलबी ने उन्हें फिर से अभिनय में दिलचस्पी लेने में मदद की</title>
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                        <![CDATA[<p><strong>Bollywood: </strong>अभिनेता सौरभ शुक्ला के लिए, जॉली एलएलबी (2013) एक विशेष फिल्म है क्योंकि इसने उन्हें अभिनय में वापस ला दिया। बैंडिट क्वीन (1994), सत्या (1998) और अन्य जैसी फिल्मों के बाद भी उन्हें अच्छी भूमिकाएँ नहीं मिल रही थीं। “मैं अपने करियर में एक ऐसे दौर से गुज़र रहा था जहाँ लोग कहते थे कि मैं एक अच्छा अभिनेता हूँ लेकिन मुझे भावपूर्ण भूमिकाएँ नहीं देंगे। और इसीलिए मैंने लेखन से चिपके रहने का फैसला किया था और कोई अभिनय की नौकरी नहीं करना चाहता था, ”वह याद करते हैं।</p>
<p>लेकिन फिर बर्फी (2012) और जॉली एलएलबी आई और</p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/127898/10-years-of-jolly-llb-saurabh-shukla-recalls-how-jolly"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-03/sourab-shukla.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>Bollywood: </strong>अभिनेता सौरभ शुक्ला के लिए, जॉली एलएलबी (2013) एक विशेष फिल्म है क्योंकि इसने उन्हें अभिनय में वापस ला दिया। बैंडिट क्वीन (1994), सत्या (1998) और अन्य जैसी फिल्मों के बाद भी उन्हें अच्छी भूमिकाएँ नहीं मिल रही थीं। “मैं अपने करियर में एक ऐसे दौर से गुज़र रहा था जहाँ लोग कहते थे कि मैं एक अच्छा अभिनेता हूँ लेकिन मुझे भावपूर्ण भूमिकाएँ नहीं देंगे। और इसीलिए मैंने लेखन से चिपके रहने का फैसला किया था और कोई अभिनय की नौकरी नहीं करना चाहता था, ”वह याद करते हैं।</p>
<p>लेकिन फिर बर्फी (2012) और जॉली एलएलबी आई और उनके करियर की दिशा बदल दी। उन्होंने विस्तार से बताया, “सुभाष (कपूर; निर्देशक) ने मेरे साथ जॉली की पटकथा साझा की, और उन्होंने मुझे एक जज की भूमिका की पेशकश की, मेरा चेहरा उतर गया क्योंकि मुझे लगा कि यह भूमिका ज्यादा नहीं होगी। लेकिन नरेशन के बाद, मैंने अपना विचार बदल दिया क्योंकि स्क्रिप्ट में जज को कार्डबोर्ड कैरेक्टर के रूप में नहीं दिखाया गया था। मैंने उनसे कहा, 'कोई और नहीं करेगा ये रोल। आप किसी और एक्टर के पास नहीं जाएंगे'। फिल्म की शूटिंग के दौरान मेरा समय बहुत अच्छा बीता और लोगों ने फिल्म और मेरे किरदार को पसंद किया, जिसके लिए मुझे राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। इस तरह मुझे अभिनय में फिर से दिलचस्पी हुई।</p>
<p>फिल्म में अपने प्रदर्शन के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीतने पर पीछे मुड़कर देखते हुए, शुक्ला मानते हैं कि पुरस्कार "उत्साहजनक होते हैं, हालांकि सत्यापन एक बुरा शब्द है" लेकिन उन्हें लगता है कि "सेट पर प्रदर्शन का उच्च स्तर बेजोड़ है"। "जब आपको कोई पुरस्कार मिलता है तो आप दुनिया में शीर्ष पर महसूस करते हैं क्योंकि यह आपके विश्वास और विकल्पों की पुन: पुष्टि करता है। फिर भी, सच्चाई यह है कि एक दृश्य करते समय एक एड्रेनालाईन रश होता है जिसे किसी और चीज़ से मेल नहीं किया जा सकता है । यही असली सौदा है। एक और बात जो मुझे फिल्म के बारे में पसंद आई वह यह है कि यह कम नोट पर समाप्त नहीं हुई। इसने लोगों को आशा दी और प्रेरणादायक था, ”वह अंत करता है।</p>]]>
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                                                            <category>Featured</category>
                                            <category>मनोरंजन</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 15 Mar 2023 09:12:20 +0530</pubDate>
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