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                <title>politics - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>politics RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>भारत गौरव रत्न श्री सम्मान परिषद ने भव्य समारोह में दूरदर्शी व्यक्तित्वों को किया सम्मानित।</title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>नई दिल्ली- </strong>भारत गौरव रत्न श्री सम्मान परिषद ने नई दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित अशोक होटल में एक भव्य संगोष्ठी एवं पुरस्कार समारोह का आयोजन किया, जिसमें उन दूरदर्शी व्यक्तित्वों को सम्मानित किया गया जिनके योगदान ने समाज को गहराई से प्रभावित किया है। इस प्रतिष्ठित कार्यक्रम में नीतिनिर्माताओं, उद्योग जगत के नेताओं और प्रभावशाली व्यक्तित्वों ने भाग लिया, जिसमें उत्कृष्टता, नेतृत्व और सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन का उत्सव मनाया गया।</div>
<div>  </div>
<div>इस वर्ष के सम्मानित व्यक्तित्व राजनीति, खेल, कानून प्रवर्तन और शिक्षा सहित विभिन्न क्षेत्रों से आए, जो भारत गौरव रत्न श्री सम्मान अवार्ड से समानित कर उस मिशन को सशक्त</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/150275/bharat-gaurav-ratna-shri-samman-parishad-honored-visionary-personalities-at"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/img-20250323-wa0159.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>नई दिल्ली- </strong>भारत गौरव रत्न श्री सम्मान परिषद ने नई दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित अशोक होटल में एक भव्य संगोष्ठी एवं पुरस्कार समारोह का आयोजन किया, जिसमें उन दूरदर्शी व्यक्तित्वों को सम्मानित किया गया जिनके योगदान ने समाज को गहराई से प्रभावित किया है। इस प्रतिष्ठित कार्यक्रम में नीतिनिर्माताओं, उद्योग जगत के नेताओं और प्रभावशाली व्यक्तित्वों ने भाग लिया, जिसमें उत्कृष्टता, नेतृत्व और सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन का उत्सव मनाया गया।</div>
<div> </div>
<div>इस वर्ष के सम्मानित व्यक्तित्व राजनीति, खेल, कानून प्रवर्तन और शिक्षा सहित विभिन्न क्षेत्रों से आए, जो भारत गौरव रत्न श्री सम्मान अवार्ड से समानित कर उस मिशन को सशक्त बनाते हैं जो राष्ट्र के विकास में योगदान देने वाले व्यक्तियों को पहचान दिलाने के लिए समर्पित है। समारोह में उपस्थित प्रमुख हस्तियों में मीनाक्षी लेखी पूर्व विदेश एवं संस्कृति राज्य मंत्री, भारत सरकार, चंदन कुमार चौधरी दिल्ली विधान सभा के सदस्य, डॉ. विजय जोली वरिष्ठ राजनीतिज्ञ, रवि कुमार दहिया ओलंपिक पदक विजेता एवं भारतीय पेशेवर पहलवान, सतपाल सिंह ओबेरॉय कौंसल, बंगी, डॉ. अरविंद कुमार शर्मा कैबिनेट मंत्री, हरियाणा सरकार</div>
<div>डॉ. आलोक कुमार मिश्रा संयुक्त सचिव, भारतीय विश्वविद्यालय संघ श्रीमती किरण सेठी वरिष्ठ दिल्ली पुलिस अधिकारी शामिल थे।</div>
<div> </div>
<div>भारत गौरव रत्न श्री सम्मान संस्था के निदेशक डॉ. तपन कुमार राउतराय ने पुरस्कारों के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा, "यह मंच उन लोगों को समर्पित है जिन्होंने अपने कर्तव्य से आगे बढ़कर समाज में स्थायी प्रभाव डाला है। उनकी निष्ठा और समर्पण आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगी।"</div>
<div> </div>
<div>यह समारोह नेतृत्व, दृढ़ता और समाज के सामूहिक प्रयासों को समर्पित एक सशक्त संदेश था, जो राष्ट्र के उज्जवल भविष्य के निर्माण में सहायक सिद्ध होगा। भारत गौरव रत्न श्री सम्मान परिषद अपनी इस प्रतिबद्धता को बनाए रखेगा कि वह उत्कृष्ट योगदान देने वाले व्यक्तित्वों को पहचान दिलाए और आने वाली पीढ़ियों को सामाजिक और राष्ट्रीय विकास में योगदान देने के लिए प्रेरित करे।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>दिल्‍ली</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 23 Mar 2025 15:36:58 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>  गड़े मुर्दे उखाड़ते नफ़रत के ये सौदागर</title>
                                    <description><![CDATA[<div>विगत दस वर्षों से देश का सामाजिक ढांचा छिन्न भिन्न करने के सत्ता संरक्षित प्रयास जिस तरह से किये जा रहे हैं उन्हें देखकर तो अब यही लगने लगा है कि हमारे देश की राजनीति और सत्ता अपने मूल उद्देश्य से भटक चुकी है। सत्ता के चाहवानों के लिये देश की विकासोन्मुख योजनाऑन ,नागरिकों को मिलने वाली मूलभूत सुविधाएं,बिजली पानी सड़क रोज़गार स्वास्थ शिक्षा मंहगाई नियंत्रण से कहीं ज़्यादा ज़रूरी साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण बन चुका है। वैसे भी जिन लोगों को नित्य सूर्योदय के साथ ही हाथों में लठ देकर नफ़रत का पाठ पढ़ाया जाता हो, जिस विचारधारा का प्रतिनिधित्व करने</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/150018/%C2%A0%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/hate-driven-statements.jpg" alt=""></a><br /><div>विगत दस वर्षों से देश का सामाजिक ढांचा छिन्न भिन्न करने के सत्ता संरक्षित प्रयास जिस तरह से किये जा रहे हैं उन्हें देखकर तो अब यही लगने लगा है कि हमारे देश की राजनीति और सत्ता अपने मूल उद्देश्य से भटक चुकी है। सत्ता के चाहवानों के लिये देश की विकासोन्मुख योजनाऑन ,नागरिकों को मिलने वाली मूलभूत सुविधाएं,बिजली पानी सड़क रोज़गार स्वास्थ शिक्षा मंहगाई नियंत्रण से कहीं ज़्यादा ज़रूरी साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण बन चुका है। वैसे भी जिन लोगों को नित्य सूर्योदय के साथ ही हाथों में लठ देकर नफ़रत का पाठ पढ़ाया जाता हो, जिस विचारधारा का प्रतिनिधित्व करने वाले आरएसएस प्रमुख द्वितीय एम एस गोलवलकर स्वयं अपनी पुस्तक 'बंच ऑफ थॉट्स' में ये विचार व्यक्त कर चुके हों कि -'मुसलमान ईसाई और कम्युनिस्ट राष्ट्र के दुश्मन हैं।</div>
<div> </div>
<div>उस संगठन व उससे जुड़े अन्य संगठनों के लोगों से नफ़रत का ज़हर बोने के सिवा और क्या उम्मीद की जा सकती है ? इन्हें केवल मुसलमानों  ईसाइयों और कम्युनिस्ट विचार के लोगों से ही नहीं बल्कि हर उन लोगों से भी नफ़रत है जो इनके साम्प्रदायिकतावादी और नफ़रती एजेंडे के ख़िलाफ़ हो। इसकी एक बड़ी व महत्वपूर्ण वजह यह भी है कि इस विचारधारा के लोगों के स्वतंत्रता संग्राम के समय के स्वयं अपने 'ट्रैक रिकार्ड' इतने ख़राब व शर्मनाक हैं कि उन्हें छिपाने के लिये उनपर होने वाली चर्चाओं से ध्यान भटकाने के लिये ही यह शक्तियां मुसलमानों, ईसाइयों और कम्युनिस्टों के साथ साथ देश के उन बहुसंख्य धर्मनिरपेक्ष हिन्दुओं को भी निशाना बनाती हैं जो इनके मूल चरित्र व विध्वंसक इरादों से अच्छी तरह वाक़िफ़ हैं। इन अतिवादी शक्तियों का एक ही मक़सद है कि येन केन प्रकारेण यह सत्ता में बनी रहें। इसलिये इन्होंने साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को ही अपना सबसे आसान 'शस्त्र ' चुन लिया है। </div>
<div><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2025-03/protest.jpg" alt="protest" width="980" height="551"></img></div>
<div> यही वजह है कि इन्हें देश का महान नायक टीपू सुल्तान बुरा लगता है। इन्हें प्रत्येक मुग़ल शासक से नफ़रत है। इन्हें किसी भी मुग़ल शासक में सिवाय बुराई के कोई भी अच्छाई नज़र नहीं आती। इन्हें उर्दू से नफ़रत,शेरो शायरी से बैर,पीरों फ़क़ीरों की मज़ारों से आपत्ति,उनके स्मारकों से नफ़रत उनके नाम पर बने शहरों क़स्बों मुहल्लों गलियों व मार्गों से बैर। गोया यह विचारधारा देश की एक ऐसी संगठित विचारधारा है जिसका जन्म ही नफ़रत की बुनियाद पर हुआ है।</div>
<div> </div>
<div>और निश्चित रूप से यही विचारधारा और इसी दैनिक प्रातःकालीन नफ़रती शिक्षा का ही परिणाम था जिसने राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को हमसे असमय ही छीन लिया। केवल गाँधी को ही नहीं छीना बल्कि आज गाँधी का हत्यारा नाथू राम गोडसे इसी विचारधारा के लोगों के द्वारा महिमामंडित भी किया जाता है।</div>
<div> </div>
<div>कितना अफ़सोसनाक है कि इसी नफ़रती विचारधारा से जुड़े लोग गाँधी के हत्यारे की मूर्तियां भी लगाते दिखाई दे जाते हैं उस आतंकी हत्यारे की स्तुति भी करते हैं। और तो और गाँधी की हत्या का प्रदर्शन दोहरा कर उसका वीडियो भी वायरल कर दिया जाता है। जबकि ठीक इसके विपरीत अंग्रेज़ों की ख़ुशामद करने वाले, अंग्रेज़ों से मुआफ़ी मांगने तथा स्वतंत्रता सेनानियों की मुख़बिरी करने वाले लोग इनके आदर्श हैं ?</div>
<div> </div>
<div>विद्वेष व नकारात्मकता की इनकी राजनीति का आलम यह है कि इन्हें ख़ास समुदाय के ग़रीब मेहनती मज़दूरों,रेहड़ी ठेले रिक्शे वालों से नफ़रत है। रोज़गार उपलब्ध करना तो छोड़िये यह तो मुसलमान दुकानदारों का बहिष्कार करते दिखाई दे जायेंगे। इन्हें मुसलमानों के सोसाइटीज़ में फ़्लैट ख़रीदने से आपत्ति होती है। इन्हें नमाज़ पढ़ने रोज़ा इफ़्तार से एतराज़। मुसलमानों के हिन्दू त्योहारों में शिरकत से भी इन्हें आपत्ति है परन्तु इनकी उत्तेजक व आपत्तिजनक नारेबाज़ी व हुड़दंग की प्रिय जगह मस्जिद ही है।</div>
<div><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2025-03/protest1.webp" alt="protest1" width="1920" height="1080"></img></div>
<div>जब देखिये जहां देखिये मस्जिद के सामने डी जे व लाउडस्पीकर पर जानबूझकर शोर मचाते हैं भड़काऊ नारे लाउडस्पीकर पर लगाते हैं ताकि दूसरा पक्ष उत्तेजित होकर इनका जवाब दे और यह हुड़दंग साम्प्रदायिक उन्माद में बदल जाये। जहाँ देखिये इन्हें मस्जिदों में शिवलिंग नज़र आने लगता है। देश के संविधान व क़ानून की अनदेखी कर यह ऐसे विषयों को उन्माद में बदल देते हैं ताकि इन्हें साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का लाभ मिल सके।</div>
<div> </div>
<div> और इस साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के बाद हासिल सत्ता के माध्यम से इनके जो फ़ैसले हैं वह भी देश को गर्त में ले जाने वाले हैं। आज देश की सीमायें हर तरफ़ से असुरक्षित हैं। चीन हज़ारों किलोमीटर की ज़मीन क़ब्ज़ा किये बैठा है मगर इनकी रट यही रहती है कि हमारी ज़मीन में कोई नहीं घुसा है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप भारत के नागरिकों व भारतीय व्यवसायिक हितों को कितना नुक़्सान पहुंचा रहे हैं परन्तु मोदी एक शब्द भी बोलने का साहस नहीं करते।</div>
<div> </div>
<div>भारतीयों को कितने अपमानजनक तरीक़े से हथकड़ी बेड़ी पहनाकर अमेरिकी सैन्य विमान से भेजा गया इन्होंने कोई एतराज़ नहीं जताया जबकि अन्य किसी देश के नागरिकों के साथ अमेरिका ने ऐसा अपमानजनक व्यवहार नहीं किया। 'ट्रंप से दोस्ती' का क्या देश को यही सिला मिलना चाहिए था ? यदि आंतरिक मामलों को देखें तो इसी 'धर्म की अफ़ीम ' की बुनियाद पर बनी सरकार ने देश में नोटबंदी कर देश की अर्थव्यवस्था को ज़ोरदार आघात पहुँचाया।</div>
<div> </div>
<div>आज तक कोई अर्थशास्त्री इनके इस फ़लसफ़े के बारे में यह नहीं बता पाया कि 8 नवंबर 2016 को जब प्रधानमंत्री मोदी ने टी वी पर 'प्रकट' होकर अचानक 500 और 1000/- रूपये की नोट यह कहकर चलन से बाहर की थी कि इससे काले धन पर लगाम लगेगी । उसी समय मोदी ने यह भी कहा था कि भ्रष्टाचार,कालेधन और जाली नोट के कारोबार में लिप्त देश विरोधी व समाज विरोधी तत्वों के पास मौजूद 500 और हज़ार रूपये के पुराने नोट अब केवल एक काग़ज़ के टुकड़े के सामान रह जायेंगे। </div>
<div> </div>
<div>सवाल यह कि जब 500 व एक हज़ार की नोट से कालाधन व भ्रष्टाचार बढ़ता था फिर आख़िर दो हज़ार की नोट क्या सोचकर चलाई गयी थी ? और पुनः 500 की नोट चलाने व 2000 की नोट शुरू करने से भ्रष्टाचार, कालेधन और जाली नोट का चलन पहले से अधिक क्यों बढ़ गया ? और यह भी कि कुछ महीने बाद फिर 2000 की नोट बाज़ार से क्यों ग़ायब हो गयी ? इस 'निराली अर्थ नीति ' का आख़िर उद्देश्य क्या था ? क्या यह देश को जानने  का हक़ नहीं ? यू पी ए के समय बढ़ती मंहगाई पर विलाप करने व अर्धनग्न प्रदर्शन करने वालों की वर्तमान सरकार आज अनियंत्रित मंहगाई पर ख़ामोश है। बेरोज़गारी के आंकड़े अपना कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं। परन्तु इन जैसी वास्तविकताओं से मुंह फेर नफ़रत के ये सौदागर गड़े मुर्दे उखाड़ते फिर रहे हैं और समाज में नफ़रत का ज़हर बो रहे हैं।<span style="font-size:large;">  </span></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 19 Mar 2025 11:50:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मनमानी का लोकतंत्र, हर कोई परम स्वतंत्र</title>
                                    <description><![CDATA[<p>भारत में लोकतंत्र अब मनमानी का पर्याय बन चुका है। यदि सत्ता प्रतिष्ठान आपके हाथों में है तो आप जो जी में आये कर सकते हैं ।  न ' लोक ' आपका हाथ पकड़ सकता है और न ' तंत्र ' । यानी लोकतंत्र में परम स्वतंत्र होने की आजादी इस देश की सियासत को वर्ष 2104  के बाद पूरी तरह से मिल चुकी है। 2014  से पहले ये आजादी आंशिक रूप से कांग्रेस के पास थी ।   जो सत्ता प्रतिष्ठान से बाहर हैं वे ही अब परतंत्र हैं ,क्योंकि उनका लोक ,उनका तंत्र अब बीमार हो चुका है।</p>
<p> </p>
<p>ये</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149886/democracy-of-arbitrariness-is-a-supreme-independent"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/nfrt3.jpg" alt=""></a><br /><p>भारत में लोकतंत्र अब मनमानी का पर्याय बन चुका है। यदि सत्ता प्रतिष्ठान आपके हाथों में है तो आप जो जी में आये कर सकते हैं ।  न ' लोक ' आपका हाथ पकड़ सकता है और न ' तंत्र ' । यानी लोकतंत्र में परम स्वतंत्र होने की आजादी इस देश की सियासत को वर्ष 2104  के बाद पूरी तरह से मिल चुकी है। 2014  से पहले ये आजादी आंशिक रूप से कांग्रेस के पास थी ।   जो सत्ता प्रतिष्ठान से बाहर हैं वे ही अब परतंत्र हैं ,क्योंकि उनका लोक ,उनका तंत्र अब बीमार हो चुका है।</p>
<p> अपनी बात के समर्थन में मेरे पास एक नहीं अनेक तथ्य हैं, तर्क हैं, दुर्भाग्य ये है कि आज के लोकतांत्र में न तथ्य काम आ रहे हैं और न तर्क। तर्कों का मुकाबला कुतर्कों से हो रहा है और तथ्यों का समाना झूठ से। देश में पहली बार हुआ है कि  भाजपा शासित राज्यों में सत्ता प्रतिष्ठान ने होली के मौके पर इबादतगाहों को कपडे या तिरपाल से ढंक दिया है। इबादतगाहें ढंकने की शुरुवात एक परम सभ्य प्रदेश से हुई जिसके मुखिया एक सन्यासी हैं ,लेकिन सत्ताधीश हैं। उन्होंने संविधान की परवाह किये बिना इबादतगाहों को ढंकने का फरमान जारी कर दिया और मशीनरी ने आनन-फानन में मस्जिदों को ढंक दिया।</p>
<p>ये कार्रवाई संविधान का मखौल है ,लेकिन योगी बाबा को न राष्ट्रपति ने रोका और न प्रधानमंत्री ने। वे रोकते भी कैसे ? दोनों खुद योगी कि अनुयायी हैं। योगी से ही  ' बंटोगे तो कटोगे '  का नारा उधार लेकर उसकी पैरोडी बनाते हैं। कहते हैं ' एक रहोगे तो सेफ ' रहोगे।</p>
<p> भाजपा की सरकारें एक दूसरे से प्रेरणा लेती रहतीं है।  योगी ने इबादतगाहें ढंकवाई तो मध्यप्रदेश की सरकार कहाँ पीछे रहने वाली थी । मध्यप्रदेश के पढ़े-लिखे मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने भी योगी की नकल करते हुए अपने यहां इबादतगाहों को ढंकने का फतवा जारी कर दिया। परम स्वतंत्र ,न सर पर कोई 'इसी को कहते हैं।  अब चूंकि सत्तारूढ़ दल में कोई अल्पसंख्यक विधायक है नहीं ,और होता भी तो वो इस कार्रवाई  का विरोध नहीं कर पाता और विपक्ष के विरूद्ध को विरोध माना नहीं जाता।  विपक्ष की परवाह कौन करता है ?</p>
<p> दुनिया में ये नए तरह का बहुसंख्यक आतंकवाद है। लोग रंगों से खुश होने के बजाय भयभीत हैं। अल्पसंख्यकों को को भगवा   रंग आतंकित कर रहा है तो बहुसंख्यकों को हरे रंग से चिढ हो रही है। अल्पयंख्यक अब बहुसंख्यकों  को आतंकवादी समझ रहे हैं और बहुसंख्यक, अल्पसंख्यंकों को आतंकवादी मान बैठे हैं । मान क्या बैठे हैं उनसे आतंकियों जैसा बर्ताव भी करने लगे हैं। नफरत केवल रंगों से ही नहीं है । नफरत भाषा तक जा पहुंची है । तमिलनाडु सरकार ने तो भारतीय रूपये के प्रतीक चिन्ह को ही बदल डाला है। नामुराद तमिलनाडु सरकार नहीं समझना चाहती कि  भारतीय रूपये पर तमिल पहले से दर्ज भाषा है।</p>
<p>आपको बता दें कि भारतीय नोट पर 17 भाषाएं मुद्रित होती हैं. इंग्लिश और हिंदी सामने की तरफ होती हैं तो नोट के पीछे की तरफ 15 भाषाएं दर्ज  होती हैं। दुर्भाग्य ये है की  भारतीय संविधान में किसी भी भाषा को राष्‍ट्रीय भाषा का दर्जा नहीं मिला और देश में 22 भाषाएं बोली जाती हैं. ऐसे में इन सभी भाषाओं को नोट पर प्राथमिकता दी गई है। एक देश ,एक चुनाव का नारा देने वाली सरकार भी भारत कि लिए एक भाषा पर अम्ल नहीं कर पायी। जो भाषाएं नोट पर छपी  होती हैं उनमें हिंदी और अंग्रेजी के अलावा असमी, बंगाली, गुजराती, कन्‍नड़, कश्‍मीरी, कोंकणी, मलयालम, मराठी, नेपाली, उड़‍िया, पंजाबी, संस्‍कृति, तमिल, तेलगु और उर्दू शामिल हैं।  इसके साथ ही 2000 रुपए के नोट पर ब्रेल लिपि भी छपी होती थी  जिससे उन लोगों को आसानी हो जो देख नहीं सकते हैं ,लेकिन ये नोट भी हमारी सरकार ने बंद करा दिया।</p>
<p> कहने का आशय ये है कि  न भाजपा सरकार को संविधान की परवाह है और न तमिलनाडु सरकार को। दोनों नफरत के मामले में एक जैसे है।  तमिलनाडु सरकार को हिंदी भाषा से चिढ है तो भाजपा की राज्य सरकारों को अल्पसंख्यक मुसलमानों से नफरत है। नफरत के इस माहौल में न संविधान सुरक्षित है और न लोकतंत्र। लेकिन इसकी चिंता किसी को नहीं है ।  सब अपना-अपना उल्लू सीधा करने में लगे हैं। गन्दी सियासत इसी को तो कहते हैं। मुझे आशंका होती है के  आने वाले दिनों में भाषायी नफरत कि चलते कहीं दक्षिण वाले अपना नोट खुद न छाप लें या  फिर वोटों की राजनीति कि चलते हमारी केंद्र सरकार खुद अलग-अलग प्रदेशों कि लिए अलग-अलग भाषा के नोट छपने पर मजबूर न हो जाये।</p>
<p>सवाल ये है कि जो सरकार अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए जम्मू-कश्मीर से धारा 370  हटा सकती है, जो सरकार अयोध्या में राम मंदिर बनवा सकती है  ,जो सरकार महाकुम्भ से लाखों करोड़ रूपये कमा सकती है।  वो मस्जिदों को ढंकने से नहीं रोक सकती क्या ? क्या उस सरकार के पास इतनी ताकत नहीं है कि  वो भारतीय रूपये का प्रतीक चिन्ह बदलने वाली तमिलनाडु सरकार को बर्खास्त कर दे ?</p>
<p> होली के मौके पर इस मुद्दे पर यदि आप होली मन से विचार करें तो ही बात बनेगी अन्यथा अब न सियासत ' होली ' बची है और न राष्ट्रीयता की पाकीजगी महफूज रह गयी है। आज का दिन मेरे लिए नियमित लिखने वाले हिंदी के धुरंधर लेखक स्वर्गीय वेद प्रताप वैदिक को याद करने का दिन भी है। आज ही के दिन उन्होंने देवलोक गमन किया था। उनके ही तरह मै भी बिना कोई अवकाश लिए पिछले पांच साल से लिखता आ रहा हूँ बिना किसी अपेक्षा  के । वैदिक जी के प्रति विनम्र श्रृद्धांजलि।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 15 Mar 2025 14:49:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
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                <title>बदरंग सियासत और जुमा की नमाज बनाम होली का रंग </title>
                                    <description><![CDATA[<div>जुमा साल में 52 बार आता है, लेकिन होली सिर्फ एक बार. मुसलमान रंग-गुलाल को बुरा मानते हैं, तो उन्हें घर में ही रहना चाहिए. अगर बाहर निकलें, तो रंग सहन करें. यही वह बयान है जिसको लेकर यूपी ही नहीं देश भर में धमाल मचा हुआ है। न सिर्फ सियासतदान इस बयान को लेकर दो खेमों में बंट गए हैं संभव के सीओ अनुज चौधरी के बयान को उत्तर प्रदेश के चीफ मिनिस्टर योगी आदित्यनाथ के दोहराने के बाद होली और रमजान को लेकर जबरदस्त बयानबाजी शुरू हुई है।</div>
<div>  </div>
<div>इस बयानबाजी ने सामुदायिक चेतना को आहत करने में कोई</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149870/badrang-politics-and-zumas-prayer-vs-holi-color%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/rajneeti.jpg" alt=""></a><br /><div>जुमा साल में 52 बार आता है, लेकिन होली सिर्फ एक बार. मुसलमान रंग-गुलाल को बुरा मानते हैं, तो उन्हें घर में ही रहना चाहिए. अगर बाहर निकलें, तो रंग सहन करें. यही वह बयान है जिसको लेकर यूपी ही नहीं देश भर में धमाल मचा हुआ है। न सिर्फ सियासतदान इस बयान को लेकर दो खेमों में बंट गए हैं संभव के सीओ अनुज चौधरी के बयान को उत्तर प्रदेश के चीफ मिनिस्टर योगी आदित्यनाथ के दोहराने के बाद होली और रमजान को लेकर जबरदस्त बयानबाजी शुरू हुई है।</div>
<div> </div>
<div>इस बयानबाजी ने सामुदायिक चेतना को आहत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है होली का रंग और रमजान के जुमे की नमाज एक साथ सम्पन्न कराना चुनौती है। इसे देखते हुए उत्तर प्रदेश में प्रशासन अलर्ट पर है।कम से कम 13 जिलों में मुस्लिम समाज ने जुमे की नमाज का वक्त बदला है। सैकड़ों मस्जिदों को रंग से बचाने के लिए तिरपाल से ढका गया है।प्रशासन ने संवेदनशील इलाकों में निगरानी बढ़ा दी ही और स्थिति पर नजर रखने के लिए ड्रोन और सीसीटीवी कैमरे तैनात किए गए हैं। </div>
<div> </div>
<div>इसी बीच इस मामले पर बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी अपनी प्रतिक्रिया दे दी है।चार बार यूपी की मुख्यमंत्री रह चुके मायावती ने आड़े हाथों लेते हुए कहा कि संभल की तरह अधिकारियों का गलत इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। बल्कि इन्हें कानून व्यवस्था पर विशेष ध्यान देना चाहिए।</div>
<div> </div>
<div>मायावती ने कहा कि इसकी आड़ में किसी भी मुद्दे को लेकर कोई भी राजनीति करना ठीक नहीं है। सभी धर्मों के अनुयायियों के मान-सम्मान का बराबर ध्यान रखना बहुत जरूरी है। मायावती ने पोस्ट के जरिये कहा कि जैसा कि मालूम है कि इस समय रमज़ान चल रहे हैं और इसी बीच जल्दी होली का भी त्योहार आ रहा है। जिसे मद्देनजर रखते हुये उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में सभी राज्य सरकारों को इसे आपसी भाईचारे में तब्दील करना चाहिए तो यह सभी के हित में होगा।</div>
<div> </div>
<div>उधर इस मुद्दे को लेकर समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, कांग्रेस नेता उदित राज आदि ने जिस तरह अनुज चौधरी के खिलाफ बयान देना शुरू किया जाहिर है कि उसकी प्रतिक्रिया तो होनी ही थी. उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार और महाराष्ट्र तक बयान वीर बिलों से बाहर आ गए जिस तरह की जहरीली बयानबाजी हो रही है उससे सबसे ज्यादा नुकसान उन मुस्लिम धर्मगुरुओं का हुआ है जिन लोगों ने शांति का रास्ता दिखाया।</div>
<div> </div>
<div>विपक्ष  इसे भारत की धार्मिक स्वतंत्रता और मुसलमानों के खिलाफ इस तरह बता रहे हैं कि जो शांतिपूर्ण लोग हैं वो भी रेडिकल हो जा रहे हैं. जब हमारे देश के कुछ नेता इस बयान पर राजनीति करके इसे मुसलमानों के खिलाफ बताने में जुटे हैं, ठीक उसी समय कई मुस्लिम धर्मगुरुओं ने कहा है कि वो अनुज चौधरी के बयान में कुछ भी गलत नहीं मानते और वो होली के दिन जुमे की नमाज़ का समय बदलने के लिए तैयार हैं। </div>
<div> </div>
<div> इस मुद्दे को लेकर तमाम सियासतदान हाथ सेंकने के लिए बयानबाजी करने लगे। यूपी के एक विधायक ने यहां तक कह दिया कि होली के रंग से अगर दिक्कत है मुस्लिम समुदाय को तो उनके लिए अस्पतालों में अलग वॉर्ड भी बनवाना चाहिए. आखिर जिसका धर्म रंग नहीं बर्दाश्त कर पा रहा है वो हिंदुओं के साथ किस तरह अस्पतालों में इलाज करवाएंगे. इसी तरह के बयान उत्तर प्रदेश के एक मंत्री रघुराज सिंह का भी आया कि जिन लोगों को होली के रंगों से दिक्कत है वो लोग बुरके की तरह का एक तिरपाल बनवा कर ओढ़ लें।</div>
<div> </div>
<div>बिहार के एक विधायक ने कहा मुस्लिम लोग उस दिन घर से बाहर ही न निकलें. बीजेपी विधायक हरिभूषण ठाकुर बचौल का कहना है कि अगर बाहर निकलना जरूरी हो, तो उन्हें 'कलेजा बड़ा' रखना होगा, क्योंकि होली के दौरान कोई रंग लग सकता है जिसे उन्हें सहन करना चाहिए. उन्होंने आगे कहा, 'जुमा साल में 52 बार आता है, लेकिन होली सिर्फ एक बार. मुसलमान रंग-गुलाल को बुरा मानते हैं, तो उन्हें घर में ही रहना चाहिए.</div>
<div>अगर बाहर निकलें, तो रंग सहन करें।</div>
<div> </div>
<div>इस सारे प्रकरण की शुरुआत तब हुयी जब शांति समिति की बैठक में सम्भल पुलिस के सर्किल ऑफिसर अनुज चौधरी ने केवल यही कहा था कि जुमे की नमाज़ साल में 52 बार पढ़ी जाती है और होली का त्योहार साल में एक बार मनाया जाता है. इसलिए जिन मुसलमानों को होली के रंगों से दिक्कत है, वो अपने घरों से उस दिन बाहर ना निकलें और अपने घरों पर रहकर ही जुमे की नमाज़ करें. कितनी सीधी बात थी. इस बात को तिल का ताड़ बना दिया गया. सीधी सी बात थी कि होली हर महीने और हर हफ्ते नहीं आती है।</div>
<div> </div>
<div>ऐसे मौके पर मुस्लिम समुदाय को खुद आगे आकर ये पहल करनी चाहिए थी. तमाम मुस्लिम धार्मिक नेताओं ने इस संबंध में सौहार्द बढ़ाने वाला बयान दिया भी. कई क्लैरिक्स ने तो जुमे की नमाज का टाइम भी बदलने की पहल की. लेकिन इस मुद्दे पर फिरकापरस्त नजरिया रखने वाले सियासतदानों को मौके की तलाश पूरी हो गयी और उन्होंने बयान के पक्ष विपक्ष में हो हल्ला मचा कर रंगों के त्योहार को बदरंग करना शुरू कर दिया।</div>
<div>आपको बता दें कि लखनऊ में ईदगाह मस्जिद के इमाम और इस्लामिक सेंटर आफ इंडिया के सदर ने ऐलान है कि 14 मार्च को जुमे की नमाज़ दोपहर 12 बजकर 45 मिनट पर नहीं बल्कि दो बजे पढ़ी जाएगी।</div>
<div> </div>
<div>इसी संस्था ने देश की दूसरी मस्जिदों से भी ये अपील की है कि वो हिन्दुओं के साथ अपने भाईचारे को कायम रखते हुए जुमे की नमाज़ के समय को आगे बढ़ा सकते हैं और ऐसा करने से नमाज़ का महत्व कम नहीं होगा. ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद रशीदी ने भी देश के सभी इमामों से जुमे की नमाज़ को देर से पढ़ाने की अपील की है. और मुसलमानों से ये भी कहा गया है कि वो होली के दिन दूर की मस्जिदों में नमाज़ पढ़ने के लिए ना जाएं और स्थानीय मस्जिदों में ही जुमे की नमाज़ को अता करें और इसे ही असली धर्मनिरपेक्षता और भाईचारा कहते हैं।</div>
<div> </div>
<div>उत्तर प्रदेश के संभल में होली के जुलूस मार्ग पर पड़ने वाली 10 मस्जिदों को तिरपाल से ढका गया है। इसमें शाही जामा मस्जिद भी शामिल है।अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक  श्रीशचंद्र ने कहा कि दोनों समुदायों के बीच समझौता होने के बाद होली जुलूस के पारंपरिक मार्ग से लगे धार्मिक स्थल ढके रहेंगे।ज्ञात हो कि संभल की जामा मस्जिद में मंदिर होने को लेकर विवाद चल रहा है।</div>
<div> </div>
<div>शाहजहांपुर में 67 मस्जिदों पर तिरपाल लगाई गई है और जुलूस मार्ग पर पड़ने वाली मस्जिदों में जुमे की नमाज का समय बदला गया है। जुलूस वाले मार्ग तैनाती के लिए दूसरी जगहों से 1,000 अतिरिक्त जवानों को बुलाया गया है।इसके अलावा जौनपुर, मिर्जापुर, ललितपुर, औरैया, लखनऊ, मुरादाबाद, उन्नाव, बरेली, अयोध्या समेत कई जगहों पर जुमे की नमाज का वक्त आगे बढ़ाया गया है, ताकि जुलूस खत्म होने के बाद नमाज अदा की जा सके।</div>
<div> </div>
<div>पुलिस टीमें संवेदनशील इलाकों में लगातार फ्लैग मार्च कर रही हैं। बाजारों, धार्मिक स्थलों और भीड़-भाड़ वाले इलाकों में गश्त की जा रही है और भीड़ को काबू करने के लिए बैरिकेड्स लगाए गए हैं। किसी भी भड़काऊ सामग्री या फर्जी खबरों पर नजर रखने के लिए सोशल मीडिया की भी निगरानी की जा रही है। पुलिस टीमें सार्वजनिक स्थानों और वाहनों के अंदर शराब पीने को रोकने के लिए औचक निरीक्षण कर रही हैं।</div>
<div> </div>
<div>बहरहाल इस सारे प्रकरण के मूल में वह प्रतिकार भी कहीं न कहीं उभार ले रहा है जो एक आजादी से पहले साढ़े आठ सौ साल के विधर्मी राज के दौरान बहुसंख्यकों की भावना को लगातार आहत करने की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है आजादी के बाद बनी मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति वाली सरकार के राज मे एक समुदाय को कानून की अवमानना कर मनमानी करने का भरपूर अवसर दिया गया जिसके चलते एक समुदाय के लोगों द्वारा खुद को कानून से ऊपर मानकर व्यवहार किया जाता रहा।</div>
<div> </div>
<div>अब दक्षिण पंथी राष्ट्रवादी विचारों की सरकारों के सत्ता में आने के बाद बहुसंख्यक समाज अपने समान लोक अधिकार आस्था और श्रद्धा के मुद्दे पर एक जुट होकर खड़ा हो रहा है यह शोषणकारी और तुष्टिकरण वाली राजनीति के लिए सहन करना कठिन है और यही एक वजह है कि कुछ सियासतदान रंगो में भीगने की नसीहत देने के स्थान पर रंगों से परहेज करने और साझी संस्कृति को बदरंग करने की जुगत कर रहे हैं लेकिन आम आदमी इस सियासत को जान चुका है और किसी उकसावे मे आने वाला नही है अतः रंग भी खेलेंगे और शांति पूर्वक जुमा की नमाज भी होगी।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 13 Mar 2025 15:41:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
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                <title> ना-रंगी ' जमात की ' औरंगी ' सियासत</title>
                                    <description><![CDATA[<p>सियासत  का कोई एक रंग होता  तो उसे आसानी से पहचाना जा सकता था,लेकिन मुल्क  की सियासत तो बहुरंगी है। इन तमाम रंगों के बीच  एक रंग ऐसा है जो नारंगी होकर भी ना-रंगी है। इस ना-रंगी सियासत  की जमात अलग है। फर्जी की तरह टेढ़ी-टेढ़ी चलती है ,जैसे प्यादे से फर्जी होकर फर्जी चलता है। मेरा ख्याल है कि अब आप समझ गए होंगे कि मैं किस सियासत की और किस जमात की बात कर रहा हूँ ?</p>
<p>दरअसल मुल्क में ना-रंगी सयासत ने नैतिकता की तमाम हदों को पार कर लिया है और अब नारंगी सियासत मुल्क में</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149783/%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/aurangzeb-grave2.png" alt=""></a><br /><p>सियासत  का कोई एक रंग होता  तो उसे आसानी से पहचाना जा सकता था,लेकिन मुल्क  की सियासत तो बहुरंगी है। इन तमाम रंगों के बीच  एक रंग ऐसा है जो नारंगी होकर भी ना-रंगी है। इस ना-रंगी सियासत  की जमात अलग है। फर्जी की तरह टेढ़ी-टेढ़ी चलती है ,जैसे प्यादे से फर्जी होकर फर्जी चलता है। मेरा ख्याल है कि अब आप समझ गए होंगे कि मैं किस सियासत की और किस जमात की बात कर रहा हूँ ?</p>
<p>दरअसल मुल्क में ना-रंगी सयासत ने नैतिकता की तमाम हदों को पार कर लिया है और अब नारंगी सियासत मुल्क में औरंगी सियासत पर उतर आयी है। औरंगी यानी औरंगजेबी  सियासत।  अब नारंगी सियासत  चाहती है कि इस मुल्क के इतिहास से न सिर्फ औरंगजेब को बल्कि इस मुल्क की धरती पर बनी औरनग्जेब की कब्र को भी तखलिया   कह दिया जाये,ताकि ' न रहे बांस और न बजे बांसुरी।'  नारंगी सियासत को लगता है कि जब तक इस मुल्क की जमीन पर औरंगजेब का नाम लेने वाली किताबें और लोग रहेंगे तब तक इस देश में नारंगियों की सियासत कामयाब नहीं हो सकती।</p>
<p>नारंगी सियासत देश की अर्थव्यव्स्थाकी दयनीय हालत,किसानों के आंदोलन ,कुपोषण,गरीबी से परेशान नहीं है।  उसे परेशानी नहीं है दुनिया के आधुनिक औरंगजेबों से जो मुल्क कि अस्मिता और समरभूता कि धज्जियां उदा रहे हैं। उसे परेशान किये हुए है चैन से दो गज जमीन के नीचे 300  साल से सोया हुआ औरंगजेब।</p>
<p>वो औरंगजेब  जो इसी मुल्क की सरजमीं पर पैदा हुआ और इसी मुल्क की सरजमीं में सुपुर्दे ख़ाक कर दिया गया। तीन सौ साल पहले चूंकि इस मुल्क में कोई नारंगी सियासत करने वाला नहीं था इसलिए औरंगजेब को दो गज जमीन भी मिल गयी वरना यदि औरंगजेब आज मरता तो उसे दफन होने के लिए बहादुर शाह जफर की तरह रंगून या एमएफ हुसैन की तरह कुवैत ले जाना पड़ता। क्योंकि नारंगी सियासत में औरंगी सियासत के लिए कोई जमीं नहीं है ।</p>
<p>ताजा खबर ये है कि ना-रंगी बिर्गेड मुगल सम्राट रहे औरंगजेब की कब्र तक खोद कर फेंक देना चाहती है। नारंगी ब्रिगेड की मांग पर महाराष्ट्र की महान सरकार कानूनी रास्ते भी खोजने में लग गयी है। औरंगजेब की कब्र पुराने औरंगाबाद में है, जिसे नारंगी ब्रिगेड ने बदलकर छत्रपति संभाजी नगर कर दिया है। अब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस ने भी इस मामले पर बयान दिया है।</p>
<p>फडणवीस ने कहा है कि सभी का मानना है कि छत्रपति संभाजीनगर में स्थित औरंगजेब की मजार को हटाया जाना चाहिए, लेकिन यह काम कानून के दायरे में किया जाना चाहिए।महाराष्ट्र की सतारा सीट से भाजपा के सांसद और मराठा राजा छत्रपति शिवाजी महाराज के वंशज उदयनराजे भोसले ने छत्रपति संभाजीनगर जिले में स्थित औरंगजेब के मजार को हटाने की मांग की थी।उदयनराजे से पहले उनके तमाम पुरखों के दिमाग में ये हल्का ख्याल कभी नहीं आया। वे ' ' बीती  ताहि बिसार दे ' के सिद्धांत पर अमल करते रहे।</p>
<p>इस शानदार मुल्क में नारंगी ब्रिगेड लम्बे इन्तजार के बाद सत्ता में आयी है। उसके दोनों और बैशाखियाँ लगीं हैं, लंगड़ाकर चलती है लेकिन अपनी हरकतों से बाज नहीं आना चाहती नारंगी ब्रिगेड। मुल्क के अमनो-अमान से उसे शायद चिढ है। नारंगी ब्रिगेड का ख्वाब तो इस मुल्क से 20  करोड़ मुसलमानों को देश निकला देने का है लेकिन वो ऐसा दस साल में नहीं कर पायी ,इसीलिए शायद अब औरंगजेब की कब्र हटाकर वो अपने ख्वाब में सांकेतिक रंग भरना चाहती है। यानि आप समझ सकते हैं कि घृणा मरकर भी नहीं मरती ।  तीन सौ साल बाद भी नहीं मरती घृणा अमर है अजर है। इसी घृणा के सहारे आजकल मुल्क की नारंगी सियासत चल रही है। भगवान श्रीराम भी इस घृणा को समूल  समाप्त नहीं कर सकते।</p>
<p>आने वाले दिन बेहद चुनौती भरे हैं। कुछ लोग हैं जो औरंगी राजनीती   के बहाने खून की होली खेलना चाहते हैं। खेल शुरू भी हो गया है।  कोई संभल में एक मसजिद का चेहरा पोतना चाहता   है तो कोई चैम्पियन ट्राफी जीतने के बहाने बजरंगबली के नारे लगाकर अपना मकसद पूरा करना चाहता है ,हालाँकि किसी ने बजरंगबली से इसके बारे में कोई इजाजत नहीं ली है। नारंगी ब्रिगेड की औरंगी  सियासत आजाद भारत की सबसे कड़वी ,काली और बदसूरत सियासत है।</p>
<p>अब ये मुल्क की अवाम को तय करना है कि वो इसी तरह की सियासत को पसंद करती है या नहीं ? इस तरह की सियासत के चलते खामोश रहना भी एक तरह का गुनाह है। आप इसके खिलाफ लिखकर, बोलकर ,सड़कों पर निकलकर बिरोध कीजिये।  और कुछ नहीं तो अपने मताधिकार के जरिये बोलिये। यदि आप सबने अपनी चुप्पी न तोड़ी तो तय मानिये कि ये नारंगियों की औरंगी  सियासत इस मुल्क को पूरी दुनिया में मुंह दिखने लायक नहीं छोड़ेगी।</p>
<p>बहरहाल औरंगजेब  की कब्र समभाजी नगर में रहे या उखाड़  फेंकी जाये इससे न औरंगजेब की रूह को कोई फर्क पढ़ना है और न औरंगजेब के वारिसों को ,वे तो कहीं पंचर जोड़ रहे होंगे या बढ़ईगिरी कर रहे होंगे। फर्क पडेगा इस मुल्क के आइन को ,उस आइन को जिसकी कसमें  खाते हमारे भाग्यविधाता नहीं थकते। आइन  यानि संविधान। यदि संविधान के रहते ये मुल्क एक तीन सौ साल पुरानी किसी मुगल की कब्र नहीं बचा सकता तो आम आदमी के हको-हुकूक को क्या ख़ाक बचाएगा ? फिर इस संविधान की जरूरत क्या है ?</p>
<p>मुझे इस बात में कोई संदेह यानि शक-सुब्हा नहीं है कि नारंगी ब्रिगेड औरंगजेब की कब्र को बख्श देगी। नारंगी ब्रिगेड इससे पहले बाबर के नाम से  तामीर एक मुर्दा इमारत को जमीदोज  कर चुकी है ,वो भी बिना किसी जेसीबी मशीन या बुलडोजर के। तो आप किसी दिन देखेंगे कि औरंगजेब की कब्र भी ठीक उसी तरह खोद फेंकी जाएगी हालांकि उस क्रूर बाशाह की कब्र किसी विवादास्पद जगह पर नहीं बनी है। ऊपर वाला नीचे हो रहे इस नाटक को रोक सके तो रोक ले अन्यथा नीचे रहने वाले भगवान तो खुद नारंगी और औरंगी सियासत के लंबरदार है। जय श्रीराम।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Tue, 11 Mar 2025 14:55:25 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>उचित नहीं है क्रूर शासक औरंगजेब का महिमामंडन ! </title>
                                    <description><![CDATA[<div>देश की राजनीति में मुगल शासक औरंगज़ेब चर्चा में है और समाजवादी पार्टी के नेता अबू आजमी के इसके महिमामंडन करने की कोशिश को लेकर विवाद बढ़ गया है. इतिहास में देखें तो सबसे विवादास्पद मुगल शासकों में सबसे बड़ा नाम औरंगजेब का है. औरंगज़ेब ने गैर-मुसलमानों पर जज़िया कर जैसी भेदभावपूर्ण नीतियां लागू कीं. औरंगज़ेब ने सिखों के गुरु तेग बहादुर का सिर कलम करवा दिया था. उसने गुरु गोविंद सिंह के बेटों को जिंदा दीवार में चुनवा दिया, वहीं संभाजी महाराज की आंखें फोड़ दीं और नाखून उखाड़ लिए. इसके शासन काल में भारत में शरियत के आधार</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149599/it-is-not-appropriate-to-glorify-the-brutal-ruler-aurangzeb"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/download-(22).jpg" alt=""></a><br /><div>देश की राजनीति में मुगल शासक औरंगज़ेब चर्चा में है और समाजवादी पार्टी के नेता अबू आजमी के इसके महिमामंडन करने की कोशिश को लेकर विवाद बढ़ गया है. इतिहास में देखें तो सबसे विवादास्पद मुगल शासकों में सबसे बड़ा नाम औरंगजेब का है. औरंगज़ेब ने गैर-मुसलमानों पर जज़िया कर जैसी भेदभावपूर्ण नीतियां लागू कीं. औरंगज़ेब ने सिखों के गुरु तेग बहादुर का सिर कलम करवा दिया था. उसने गुरु गोविंद सिंह के बेटों को जिंदा दीवार में चुनवा दिया, वहीं संभाजी महाराज की आंखें फोड़ दीं और नाखून उखाड़ लिए. इसके शासन काल में भारत में शरियत के आधार पर फतवा-ए-आलमगीरी लागू किया और बड़ी संख्या में हिंदू मंदिरों को नष्ट कर दिया गया. काशी सोमनाथ मंदिरों को कष्ट करवाया और लाखों हिंदुओं की हत्या करवाई।</div>
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<div>इसकी क्रूरता के कारण करीब-करीब पूरे भारतीय उपमहादीप में मुगल साम्राज्य अपना सबसे ज्यादा विस्तार कर पाया. औरंगज़ेब की मृत्यु 1707 ईस्वी में हुई थी. कहा जाता है कि मौत से पहले इसको अपने किये पर पछताव था और औरंगज़ेब ने अपने बेटों, आजम शाह और काम बख्श को अपने खेद व्यक्त करने के लिए पत्र लिखे थे. इन पत्रों में उसने अपने पापों और असफलताओं के बारे में जिक्र किया। औरंगजेब ने अपने आखिरी पत्र में लिखा जो लिखा वह उसके पछतावे की कहानी कहता है. औरंगज़ेब ने मरने से पहले अपने बेटों को लिखी एक चिट्ठी में अपने पापों का ज़िक्र किया था. इस चिट्ठी में उन्होंने लिखा था कि उन्होंने लोगों का भला नहीं किया और उनका जीवन निरर्थक बीत गया. उन्होंने यह भी लिखा था कि उन्हें अपने पापों का परिणाम भुगतना होगा।</div>
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<div>राम कुमार वर्मा की लिखी किताब ‘औरंगजेब की आखिरी रात’ में औरंगजेब के खत का मजमून कुछ यूं जिक्र किया गया है. ”अब मैं बूढ़ा और दुर्बल हो गया हूं.मैं नहीं जानता मैं कौन हूं और इस संसार में क्यों आया. मैंने लोगों का भला नहीं किया, मेरा जीवन ऐसे ही निरर्थक बीत गया. भविष्य को लेकर मुझे कोई उम्मीद नहीं है, मेरा बुखार अब उतर गया है, लेकिन ऐसा लग रहा है कि शरीर पर केवल चमड़ी हो. दुनिया में कुछ लेकर नहीं आया था लेकिन अब पापों का भारी बोझ लेकर जा रहा हूं. मैं नहीं जानता कि अल्लाह मुझे क्या सजा देगा, मैंने लोगों को जितने भी दुख दिए हैं, वो हर पाप जो मुझसे हुआ है उसका परिणाम मुझे भुगतना होगा. बुराईयों में डूबा हुआ गुनाहगार हूं मैं.”।</div>
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<div>बता दें कि औरंगजेब के पिता शाहजहां थे. औरंगजेब ने अपने पिता पर भी काफी जुल्म किये थे. औरंगजेब ने अपने पिता शाहजहां को आगरा के किले में कैद करके रखा और उन्हें पानी के लिए तरसाया था. शाहजहां ने अपनी आत्मकथा ‘शाहजहांनामा’ में औरंगजेब के लिए बहुत कठोर शब्दों का प्रयोग किया था. शाहजहां ने लिखा कि खुदा करे कि ऐसी औलाद किसी के यहां पैदा ना हो. शाहजहां ने औरंगजेब की तुलना हिंदुओं से की, जो अपने माता-पिता की सेवा करते हैं और उनकी मृत्यु के बाद तर्पण करते हैं। उन्होंने लिखा है कि औरंगजेब से अच्छे तो हिंदू हैं, जो अपने माता-पिता की सेवा करते हैं और उनकी मृत्यु के बाद तर्पण करते हैं। </div>
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<div>सोशल मीडिया के ज़माने में लोग सुर्खियां बटोरने के लिए क्या-क्या नहीं करते ! कुछ नेताओं ने तो इसके जरिए प्रसिद्धि पाने का बढ़िया फॉर्मूला ढूंढ़ लिया है... 'कुछ भी उल्टा सीधा बोलें, सोशल मीडिया पर वीडियो  क्रूरता, बर्बरता और निर्दयता से शासन किया था, अब यह किसी से छिपा नहीं है। वास्तव में औरंगज़ेब कई बुराइयों का प्रतीक है। उसने अनगिनत हिंदू मंदिर तोड़े थे, जजिया कर लगाया था, तीर्थस्थलों का अपमान किया था। उसकी क्रूरता के निशान आज भी देखे जा सकते हैं।</div>
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<div>ऐसे शख्स के शासन काल की दो-चार बातों को आधार मानकर उसे इस तरह पेश करना कि गोया 'वह कोई महान हस्ती था', तो यह अस्वीकार्य है। अगर अर्थव्यवस्था की बेहतरी ही किसी शासक के श्रेष्ठ होने का प्रमाण है तो इस आधार पर हिटलर का भी गुणगान होने लगेगा, चूंकि जब उसने जर्मनी की बागडोर संभाली थी तो उद्योग-धंधों को काफी बढ़ावा मिला था। क्या इससे उसके गुनाहों को नज़र अंदाज़ किया जा सकता है? अबू आजमी यह भी कहते हैं कि औरंगजेब के शासन काल में भारत की। </div>
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<div>सीमा अफगानिस्तान और म्यांमार तक पहुंच गई थी। वे यह क्यों भूल जाते हैं कि औरंगज़ेब ने सीमा विस्तार से पहले क्या-क्या कांड किए थे? उसने अपने पिता और भाइयों के साथ कैसा सलूक किया था? दारा शिकोह की जिस तरह हत्या करवाई गई, उसका विवरण पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इस पर भी अबू आज़मी अपने फेसबुक पेज पर औरंगजेब का नाम बहुत ही आदर से लिखते हैं, जैसे उसने मानवता की बहुत बड़ी सेवा की थी! औरंगज़ेब के बारे में कुछ कथित इतिहासकारों ने बड़ी भ्रामक बातें फैला रखी हैं।</div>
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<div>ये विरोधाभासी भी हैं। एक तरफ कहा जाता है कि औरंगजेब टोपी सिलाई कर अपना खर्च चलाता था, दूसरी तरफ कहा जाता है कि वह राजकाज और सीमा विस्तार आदि में बहुत ज्यादा व्यस्त रहता था, उसकी ज़िंदगी का आखिरी हिरसा सैन्य अभियानों में ही गुजर गया था! ये दोनों बातें एकसाथ कैसे संभव हैं? एक तरफ कहा जाता है कि औरंगज़ेब अपने लिए राजकोष से कुछ नहीं लेता था, दूसरी तरफ कहा जाता है कि उसका बहुत रौब था, पांच दशक तक मजबूती से राज किया! सवाल है-कौन अधिकारी या इतिहासकार ऐसे बादशाह से हिसाब मांग सकता था? क्या उसे अपनी गर्दन सलामत नहीं चाहिए थी?</div>
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<div>जब प्राकृतिक संपदा और कीमती धातुओं से संपन्न देश पर कब्जा था तो खर्चे की किसे फिक्र थी, रोकने वाला कौन था? औरंगज़ेब के समर्थन में कहा जाता है कि कई हिंदू राजा और उनके सैनिक भी उसके पक्ष में लड़े थे... अगर वह इतना ही बुरा होता तो ये लोग उसके साथ क्यों थे? असल में यह बहुत बचकाना तर्क है। कई हिंदू राजा और उनके सैनिक तो परिस्थितिवश अंग्रेजों के साथ भी रहे थे। क्या इस आधार पर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के गुनाह भुलाए जा सकते हैं ? जो राजा अंग्रेजों के साथ थे, वे अपना राजपाट बचाने के लिए ऐसा कर रहे थे और जो सैनिक उनके झंडे तले खड़े थे, वे अपने सेनापति का आदेश मान रहे थे।</div>
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<div>यह न भूलें कि वर्ष 1857 में कई राज परिवार अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति में कूदे थे, कई सैनिकों ने अंग्रेजों पर धावा बोल दिया था। उनका एक ही मकसद था- 'अंग्रेजों के अत्याचारों से मुक्ति'। इसी तरह औरंगज़ेब के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए छत्रपति शिवाजी महाराज, गुरु गोबिंद सिंहजी महाराज जैसे दिव्य पुरुष आए थे। अब आप ही तय कीजिए कि हमारे आदर्श वीर महापुरुष होने के चाहिएं, या औरंगजेब जैसे कोई खूनी क्रूर अत्याचारी बादशाह।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 08 Mar 2025 16:00:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
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                <title>वनतारा के शेर और राजनीति के छावा</title>
                                    <description><![CDATA[<p>आज आप फिर कहेंगे  कि मै घूम-फिरकर शेरों और छावा पर आ गया ,सवाल ये है कि  मै करूँ  तो करूँ क्या ? मै डोनाल्ड ट्रम्प से चीन के राष्ट्रपति शी  जिन पिंग की तरह पंगा ले नहीं सकत।  नहीं कह सकता की ' टैरिफ वार हो या असली वार हम अंत तक लड़ने को तैयार हैं। शी जिन पिंग ने जो कहा यदि यही बात हमारे विश्वगुरु कहते तो मै उन्हें घी-शक्कर खिलाता,लेकिन उन्होंने तो कुछ कहने के बजाय वनतारा जाना पसंद किया। ये उनका निजी मामला है इसलिए मै कुछ कहना नहीं चाहता। आजकल राजनीति में इतिहास के</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149420/the-lion-of-vantara-and-the-politics-of-politics"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/wntara-1.jpg" alt=""></a><br /><p>आज आप फिर कहेंगे  कि मै घूम-फिरकर शेरों और छावा पर आ गया ,सवाल ये है कि  मै करूँ  तो करूँ क्या ? मै डोनाल्ड ट्रम्प से चीन के राष्ट्रपति शी  जिन पिंग की तरह पंगा ले नहीं सकत।  नहीं कह सकता की ' टैरिफ वार हो या असली वार हम अंत तक लड़ने को तैयार हैं। शी जिन पिंग ने जो कहा यदि यही बात हमारे विश्वगुरु कहते तो मै उन्हें घी-शक्कर खिलाता,लेकिन उन्होंने तो कुछ कहने के बजाय वनतारा जाना पसंद किया। ये उनका निजी मामला है इसलिए मै कुछ कहना नहीं चाहता। आजकल राजनीति में इतिहास के छावा तलाशे जा रहे हैं।  पहले डोनाल्ड ट्रम्प से टकराने वाले यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की मुझे राजनीति के छावा लगे  लेकिन अब इस फेहरिश्त में चीन के राष्ट्रपति शी जिन पिंग का नाम भी जुड़ गया है।</p>
<p>मामला राष्ट्रीय होकर भी अंतर्राष्ट्रीय हो गया है।  हमारे छावा आजकल ट्रम्प से भिड़ने का साहस जुटाने या दिखने के बजाय अपने गृहराज्य गुजरात में वनतारा के प्रवास पर हैं।  सिंहों की तस्वीरें उतार रहे हैं, सिंह शावकों यानि छावाओं को बोतल से दूध पिला रहे हैं। उनका दिल करुणा से सराबोर है।  वे किसानों से ज्यादा वन्य प्राणियों का ख्याल रखते हैं ,इसीलिए मै उनका हृदयतल से सम्मान करता हूँ। लेकिन ट्रम्प के समाने मुझे अपने नेता का भीगी बिल्ली बनना बिलकुल रास नहीं आता। आपको आता है तो मुझे कुछ नहीं कहना,किन्तु मै तो अपनी बात कर रहा हूँ। मेरी बात सबके मन की बात हो ये जरूरी नहीं। मन की बात ,मन की होती है जन-जन के मन की नहीं होती,ये हम मन की बात के 100  से ज्यादा एपिसोड देखकर जान गए हैं।</p>
<p>आपको पता है कि  इस समय अमेरिका के नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प  साहब ने सहित युद्ध के बजाय दुनिया को टैरिफ युद्ध की सौगात दी है। ट्रंप  ने कनाडा और मैक्सिको के साथ ही चीन पर ही नहीं हमारे भारत पर  भी अतिरिक्‍त टैरिफ लगाया है. अमेरिका  के इस कदम से चीन आगबबूला हो गया है।  लेकिन हमने अपने आपको आग-बबूला नहीं होने दिया। इधर जैसे ही अमेरिका ने चीन से निर्यात  होने वाले माल  पर  टैरिफ लगाने का ऐलान किया ,उधर बीजिंग की तरफ से भी जवाबी कार्रवाई की गई।  चीन भी अब अमेरिका से आने वाले  होने वाले सामान  पर 10 से 15 फीसद तक का टैरिफ लगाने जा रहा है।  इससे अब दुनिया की दो महाशक्तियों के बीच ऐलान -ऐ- ट्रेड वॉर शुरू हो गया है।  चीन  ने ट्रंप सरकार को खुले तौर पर युद्ध की भी धमकी दे डाली है।  चीन का कहना है कि अगर अमेरिका युद्ध चाहता है (चाहे वह टैरिफ युद्ध हो, व्यापार युद्ध हो या कोई और युद्ध) तो हम अंत तक लड़ने के लिए तैयार हैं।</p>
<p>दरअसल भारत और चीन में यही फर्क है। चीन का राष्ट्रवाद भारत और अमेरिका के राष्ट्रवाद से अलग है। हम संकट के समय में वनतारा में मन की शांति तलाश करते हैं लेकिन चीन मोर्चाबंदी करता है। हम या तो झूला झूलने में सिद्धहस्त हैं या सिंह शावकों को दूध पिलाने में।  हमें आँखें तरेरना आता ही नहीं। हम आँखें  तरेरते   भी हैं तो ले-देकर नेहरू,इंदिरा,राजीव और राहुल गाँधी पर। क्योंकि हमें पता है कि  हम ट्रम्प  साहब हों या शी जिन  पिंग साहब को आँखें नहीं दिखा सकते ।  उनसे ऑंखें नहीं मिला सकते  ,भले ही दोनों हमें आँखें दिखाएँ, हमारी बांह मरोड़ें या हमारी जमीन पर कब्जा कर लें।</p>
<p>आप हमारे छावा से तो सवाल नहीं कर सकते लेकिन अपने आपसे तो सवाल कर सकते हैं कि  जिस टोन में चीन अमेरिका को जबाब दे रहा है ,हम क्यों नहीं दे पा रहे ? क्या हमने माँ का दूध नहीं पिया ? क्या हम अमेरिका को छठी का दूध याद नहीं दिला सकते ? हमारी आबादी चीन से ज्यादा है। हम चीन  से बड़ा बाजार हैं।  अमेरिका की अर्थव्यवस्था का मेरुदंड हम भारतीय हैं। फिर भी हम शतुरमुर्ग   बने खड़े हैं। आप सवाल कर  सकते  हैं कि  हमने आपको देश का निगेहबान   कहें ,चौकीदार कहें या सेवक कहें इसलिए नहीं चुना कि  आप देश के स्वाभिमान की रक्षा करने के वजाय मोरों के साथ ,सिंह  शावकों के साथ या गाय-बछड़ों के साथ फोटो खिंचवाने में व्यस्त रहें ।  आपको जेलेंस्की और शी जिन पिंग की तरह काम करना चाहिए था।</p>
<p>जो काम हमारे आज के नेता कर रहे हैं वो तो आज के नेताओं की आँख की किरकिरी रहे  नेहरू,गाँधी भी कर चुके हैं। इसीलिए   आपको ऐसा करने से रोका जाना पूर्वाग्रह माना जाएगा ,इसलिए आप शौक से सिंह शावकों को बोतल से दूध पिलाइये ,लेकिन देख लीजिये कि देश की अर्थ व्यवस्था भी अब घोर कुपोषण का शिकार  है।  शेयर बाजार औंधे   मुंह पड़ा हुआ है।  इन्हें भी दूध से बोतल पिलाये जाने की जरूरत है अन्यथा ये दोनों ही दम तोड़  देंगे। जो बात मै अपने आज के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता के लिए कह रहा हूँ वो ही बात मै गांधियों से भी कहता बाशर्त कि  वे सत्ता प्रतिष्ठान में होते। वे तो विपक्ष में है।  वे तो बिखरे हुए हैं। असहाय हैं। अमेरका से पंगा नहीं ले सकते। वे तो आपसे ही पंगा लेकर हलाकान हैं।</p>
<p>बहरहाल चूंकि हमारे राष्ट्र नायक ने वनतारा  का प्रमोशन किया है तो मै भी निकट भविष्य में वनतारा  जाकर कुछ दिन वहां बिताऊंगा । अनंत अम्बानी साहब को भी बधाई दूंगा। लेकिन अभी तो मेरी नींद उडी हुई है। सपने में कभी ट्रम्प साहब आते हैं तो कभी जेलेंसिकी। अब तो शी जिन पिंग   साहब भी आने लगे हैं। कल रात ही मेरे सपने में मोदी जी अपने सिंह शावकों को दूध पिलाते नजर आये।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 05 Mar 2025 15:42:43 +0530</pubDate>
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                <title>अपनी जेब के बजाय औरंगजेब पर रार</title>
                                    <description><![CDATA[<p>हिन्दुस्तानी यानि सनातनी बेमिसाल होते हैं .आजकल हम हिन्दुस्तानी अपनी लगातार काटी जा रही जेब की फ़िक्र करने के बजाय उस औरंगजेब  को लेकर आपस में कट -मर रहे हैं जिसे हम में से किसी ने भी देखा नहीं. देखते भी कैसे ,क्योंकि  उसे दुनिया से गए सैकड़ों साल हो चुके हैं .आज की राजनीति ने औरंगजेब को एक बार फिर ज़िंदा कर दिया है .अब औरंगजेब सत्ताप्रतिष्ठांन  और उससे बाबस्ता दलों और संगठनों के काम आ रहा है .कोई औरंगजेब के कसीदे पढ़ रहाहै तो कोई उसकी क्रूरता के किस्से सुना-सुनाकर हिंदुस्तान में मौजूद हर मुसलमान को औरंगजेब बनाये</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149340/raz-on-aurangzeb-instead-of-your-pocket"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/mughal-story-why-mughal-emperor-aurangzeb-was-buried-in-aurangabad-not-delhi.webp" alt=""></a><br /><p>हिन्दुस्तानी यानि सनातनी बेमिसाल होते हैं .आजकल हम हिन्दुस्तानी अपनी लगातार काटी जा रही जेब की फ़िक्र करने के बजाय उस औरंगजेब  को लेकर आपस में कट -मर रहे हैं जिसे हम में से किसी ने भी देखा नहीं. देखते भी कैसे ,क्योंकि  उसे दुनिया से गए सैकड़ों साल हो चुके हैं .आज की राजनीति ने औरंगजेब को एक बार फिर ज़िंदा कर दिया है .अब औरंगजेब सत्ताप्रतिष्ठांन  और उससे बाबस्ता दलों और संगठनों के काम आ रहा है .कोई औरंगजेब के कसीदे पढ़ रहाहै तो कोई उसकी क्रूरता के किस्से सुना-सुनाकर हिंदुस्तान में मौजूद हर मुसलमान को औरंगजेब बनाये दे रहा है ।</p>
<p>यकीनन बात हैरानी की है ,लेकिन हिंदुस्तान में बहुसंख्यक लोग हैं जो औरंगजेब के मुद्दे पर आपस में जूझने की वकालत कर रहे हैं .बहुत से कूढ़ मगज हैं जो आजकल औरंगजेब की तस्वीरें सार्वजनिक गुसलखानों और पाखानों पर लगाकर अपने राष्ट्रवादी होने का प्रमाण दे रहे हैं .ये सब देखकर औरंगजेब जहाँ भी होगा हंस ही रहा होगा . हिन्दू तालिबानियों  ने औरंगजेब को गुसलखानों और पखानों से लेकर फ़िल्मी दुनिया के जरिये एक बार फर जिन्दा कर दिया है .आजकल वो ' छावा ' फिल्म का लोकप्रिय खलनायक है .दर्शक औरंगजेब की भूमिका करने वाले अक्षय खन्ना के अभिनय की भूरि  -भूरि   प्रशंसा कर रहे हैं।</p>
<p>आप मानें या न माने किन्तु ये सच है कि आज की सियासत में भी औरंगजेबों की कमी नहीं है .मैंने  तो औरंगजेब को देखा नहीं, किताबें के जरिये ही जाना है .इसलिए मैं उसके बारे में आधिकारिक रूप से कुछ कहने का अधिकारी नहीं हूँ ,किन्तु जो औरंगजेब को ज़िंदा कर सियासत  कर रहे हैं वे शायद उसके बारे में मुझसे ज्यादा जानकारी रखते हैं .न रखते होते तो औरंगजेब को आज की सियासत का औजार भी नहीं बनाते .अब औरंगजेब ज़िंदा हो ही गया है तो रोजाना कटती अपनी जेब की चर्चा कौन करे ? जेब कतरी की चर्चा न हो ये भी औरंगजेब को जिन्दा करने की एक वजह हो सकती है।</p>
<p>आज की तारीख में लोग जितना देश के प्रधानमंत्री के बारे में या लोकसभा में विपक्ष के नेता के बारे में या अपने खुद के पुरखों के बारे में नहीं जानते जितना की 318 साल पहले 3 मार्च के रोज दिवंगत  हुए औरंगजेब के बारे में जानते हैं .औरंगजेब के बारे में जिसके पास जो भी जानकारी है वो इतिहास की किताबों से ही आयी है .अब आज की सरकार और आज की सरकार चलने वाली भाजपा और उसके अनुषांगिक संगठन कहते हैं कि औरंगजेब के बारे में इतिहास सच नहीं बताता .मुमकिन है कि ऐसा हो भी और न भी हो ,लेकिन सवाल ये है कि तीन सौ साल से भी ज्यादा पुराने किरदार की  आज की सियासत में क्या जगह है ? कौन से मुकाम पर हमें औरंगजेब कोई जरूरत पड़ गयी ?</p>
<p>आप यकीन मानिये कि औरंगजेब न मणिपुर की समस्या सुलझाने के काम आ सकते हैं और न रूस और यूक्रेन के बीच  की जंग समाप्त करने में कोई भूमिका अदा कर सकते हैं. वे दो गज जमीन के नीचे  318 साल से खामोशी के साथ सोये पड़े हैं ,फिर उन्हें क्यों परेशान किया जा रहा है  ? देश के अल्पसंख्यक मुसलमानों को लज्जित करने के लिए .उन्हें देशद्रोही बताने के लिए ? दुनिया में कितने देशों में गड़े मुर्दे उखाड़कर राजनीति की जाती है मुझे नहीं मालूम लेकिन मैं इतना जानता हूँ कि आजकल देश एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जिसमें केवल और केवल एक उन्माद है .ऐसा उन्माद जिसकी न आँखें हैं और न कान .उसे न किसी की बात सुनाई देती है और न हकीकत दिखाई देती है ।</p>
<p>अब सुना है कि औरंगजेब को खलनायक मानने वाले लोग पूरे  मुल्क के मुसलमानों को भी औरंगजेब मानने लगे हैं. वे आने वाली होली पर मुसलमानों को अपने पास फटकने भी नहीं देंगे. गले लगाने और रंग-अबीर का इस्तेमाल करना तो दूर है .ये औरंगजेबी घृणा का ज्वार मथुरा से उठा है उसी मथुरा से जहाँ रसखान कृष्ण भक्ति में सराबोर रहा करते थे .ये गुबार देश की उस गंगा जमुनी साझा विरासत को फूंक से उड़ा देने की कोशिश है .आम मुसलमान को औरंगजेब मानने वाले हिन्दू तालिबानियों की नजर में हिंदुस्तान में कोई गंगा-जमुनी संस्कृति थी ही नहीं ,ये तो अर्बन नक्सलियों द्वारा पैदा किया गया एक मिथक है।</p>
<p>इतिहास एक ऐसी चीज है जो बदली नहीं जा सकती. इतिहास के जरिये आप अपना वर्तमान और भविष्य बना और बिगाड़  सकते हैं ,लेकिन इतिहास का बाल -बांका नहीं कर सकते,फिर चाहे वो इतिहास किसी अंग्रेज ने लिखा हो,किसी मुग़ल ने लिखा हो या किसी भटियारे ने . इतिहास को बदलने की कोशिश जो लोग करते हैं उन्हें इतिहास कूड़ेदान में डाल देता है .दुर्भाग्य ये है कि हम न वर्तमान को लेकर फिक्रमंद हैं और न भविष्य को लेकर .हमारी परेशानी वो इतिहास है जो अब इतिहास हो चुका है .वो हमारा कुछ भी भला-बुरा नहीं कर सकता .हाँ हम जरूर इतिहास को जेरे बहस लेकर अपने पांवों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं .मुमकिन है कि आप मेरी बात से इत्तेफाक न रखते हों लेकिन क्या एक भी तर्क है जो आप इस पक्ष में दे सकें ? क्या आप बता सकते हैं कि गुसलखानों और पाखानों  पर औरंगजेब की तस्वीरें लगाकर हम औरंगजेब का कुछ बिगाड़ लेंगे ?</p>
<p>आज की सियासत में कोई औरंगजेब नहीं हो सकता. कोई औरंगजेब की तरह मुल्क पर आधी सदी तक राज नहीं कर सकता ,क्योंकि अब हर पांच साल में चुनाव होते हैं .आज यदि औरंगजेब भी होता तो उसे भी चुनाव लड़ना पड़ता और मुमकिन था कि उसे भी एके-दो चुनाव के बाद जनता ख़ारिज कर देती .औरंगजेब   खुशनसीब  था  जो  उसके  जमाने  में  आरएसएस और भाजपा नहीं थी,यदि  होती तो उसे कभी का देश निकाला दे चुकी होती .संघ के और भाजपा के रहते देश किसी सूरत में गुलाम हो ही नहीं सकता था .लेकिन हम सब बदनसीब हैं कि हमारे दौर में औरंगजेब न सही लेकिन उसकी मानसिकता के लोग हमारे बीच हैं।</p>
<p>मुहिउद्दीन मोहम्मद कहें या  औरंगज़ेब या आलमगीर यदि चाहता तो पचास साल के शासन में देश को हिन्दू विहीन कर देता लेकिन उसने ऐसा नहीं चाहा. उसकी चाहत आज के शासकों जैसी शायद नहीं रही होगी. जो देश को कांग्रेस विहीन ,मुसलमान विहीन करना चाहते हैं .उसने हिन्दुओं पर भी राज किया और मुसलमानों पर भी ,लेकिन आज के शासक केवल हिन्दू पदशाही चाहते हैं. वे न मुसलमानों पर राज करना चाहते हैं और न उन्हें राजसत्ता में भागीदारी करने देना चाहते हैं ,इसीलिए एक-एक कर विधानसभाओं से लेकर संसद तक में उनकी सहभागिता  को कम करते जा रहे हैं ,औरंगजेब को छोड़िये जैसे अकबर के दरबार में दिखावे के लिए जो नवरत्न थे वैसे ही आज की सरकार में दिखावे के लिए भी एक मुसलमान न संसद है और न मंत्री .अब आप समझ सकते हैं की औरंगजेब कौन है ?</p>
<p>मेरे अवचेतन में भी औरंगजेब की वही क्रूर  छवि  है जो आम हिन्दुस्तानी,आम सनातनी,आम कांग्रेसी ,आम भाजपाई के जेहन में है ,लेकिन मैं औरंगजेब को लेकर आज अपनी जेब की दुर्दशा को नहीं भुला सकता .मेरी या आपकी जेब किसी औरंगजेब ने नहीं काटी. हमारी जेब हमारी सरकार काट रही है ,हालाँकि हमारे मुखिया औरंगजेब नहीं हैं लेकिन वे और उनके कारनामें औरंगजेब जैसे जरूर नजर आ रहे हैं .इसलिए मैं बार-बार कहता हूँ कि औरंगजेब को भाड़ में जाने दीजिये. देश के हर मुसलमान को औरंगजेब मत समझिये .मुसलमान को लेकर इतनी नफरत पैदा मत कीजिये की एक और विभाजन की त्रासदी से इस खूबसूरत मुल्क को दो -चार होना पड़े ।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Tue, 04 Mar 2025 15:18:13 +0530</pubDate>
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                <title>हिंदी विरोध को बनाना चाहते हैं सत्ता बचाने का हथियार </title>
                                    <description><![CDATA[<div>देश में नई शिक्षा नीति  और त्रिभाषा फॉर्मूले को लेकर तमिलनाडु के नेता जिस प्रकार का बयान दे रहे हैं, वह सिर्फ भड़‌काऊ होने के साथ ही राजनीतिक स्वार्थ से ओत-प्रोत है। भाषा को लेकर संकीर्ण सोच से ऊपर उठने के बजाय राज्य के नेता इस मुद्दे पर राजनीति चमकाने में जुटे हैं, इसके पीछे उनका सिर्फ एक ही मकसद है वोट बैंक की राजनीति। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने इस विवाद को बड़ा फलक देते हुए यहां तक कह दिया है कि तमिलनाडु 'एक और भाषा युद्ध' के लिए तैयार है। उनके अनुसार केंद्र अगर तमिलनाडु में</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149338/want-to-make-hindi-opposition-to-the-weapon-to-save"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/hindi-divas6.jpg" alt=""></a><br /><div>देश में नई शिक्षा नीति  और त्रिभाषा फॉर्मूले को लेकर तमिलनाडु के नेता जिस प्रकार का बयान दे रहे हैं, वह सिर्फ भड़‌काऊ होने के साथ ही राजनीतिक स्वार्थ से ओत-प्रोत है। भाषा को लेकर संकीर्ण सोच से ऊपर उठने के बजाय राज्य के नेता इस मुद्दे पर राजनीति चमकाने में जुटे हैं, इसके पीछे उनका सिर्फ एक ही मकसद है वोट बैंक की राजनीति। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने इस विवाद को बड़ा फलक देते हुए यहां तक कह दिया है कि तमिलनाडु 'एक और भाषा युद्ध' के लिए तैयार है। उनके अनुसार केंद्र अगर तमिलनाडु में नई शिक्षा नीति लागू करता है, तो उसे 2000 करोड़ रुपये मिलेंगे।</div>
<div> </div>
<div>लेकिन 2000 करोड़ क्या अगर केंद्र 10000 करोड़ रुपये भी देती है, तो हम नई शिक्षा नीति नहीं लागू करेंगे। राज्य सरकार हिंदी को लागू करने की अनुमति नहीं देगी और तमिल भाषा और संस्कृति की रक्षा करेगी। डीएमके सरकार का दावा है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत तीन-भाषा फॉर्मूले के जरिए हिंदी थोपने की कोशिश की जा रही है। साथ ही स्टालिन ने आरोप लगाया कि 25 से अधिक उत्तर भारतीय भाषाओं को हिंदी और संस्कृत के प्रभुत्व के कारण नुकसान हुआ है।</div>
<div> </div>
<div>उनका दावा है कि यदि तमिलनाडु तीन-भाषा नीति को स्वीकार कर लेता है, तो तमिल को नजरअंदाज कर दिया जाएगा और भविष्य में संस्कृत का दबदबा रहेगा। हालांकि, केंद्र सरकार ने इन आरोपों को खारिज किया है। सीएम स्टालिन ने अपने पत्र में कहा कि बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में मैथिली, ब्रजभाषा, बुंदेलखंडी और अवधी जैसी भाषाओं को हिंदी के प्रभुत्व ने खत्म कर दिया है। केंद्र का कहना है कि एनईपी के जरिये किसी राज्य पर कोई भाषा नहीं थोपी जा रही है। किसी भी राज्य या समुदाय पर कोई भी भाषा थोपने का सवाल ही नहीं उठता।</div>
<div> </div>
<div>एनईपी 2020 भाषायी स्वतंत्रता के सिद्धांत को कायम रखता है और यह सुनिशित करता है कि छात्र अपनी पसंद की भाषा में सीखना जारी रखें। भाषा को लेकर संकीर्ण सोच से ऊपर उठने के बजाय राज्य के नेता इस मुद्दे पर राजनीति चमकाने में जुटे हैं। तमिलनाडु में हिंदी विरोध का लंबा इतिहास है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी ने दक्षिण भारत में वर्ष 1918 में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना की थी। वे हिंदी को भारतीयों को एकजुट करने वाली भाषा मानते थे।</div>
<div> </div>
<div>तब ही तमिलनाडु में हिंदी विरोध शुरू हो गया था। ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में तमिलनाडु को मद्रास प्रेसिडेंसी कहा जाता था। तब 1937 में सी. राजगोपालाचारी की सरकार ने स्कूलों में हिंदी को अनिवार्य किया, तो तमिलनाडु में इसके खिलाफ तीन साल तक आंदोलन चला। फैसला वापस लेने पर आंदोलन तो खत्म हो गया, पर इसने राज्य में हिंदी विरोध के जो बीज बोए थे, वे जब-तब अंकुरित होने लगते हैं। क्षेत्रीय पार्टियां राजनीतिक फायदे के लिए इन्हें खाद-पानी मुहैया कराती रहती हैं। तमिलनाडु के स्कूलों में 1967 से दो-भाषा फॉर्मूले (तमिल और अंग्रेजी) का पालन किया जा रहा है।</div>
<div> </div>
<div>त्रिभाषा फॉर्मूले के तहत हिंदी वहां क्षेत्रीय पार्टियों के लिए आंख की किरकिरी बनी हुई है। शिक्षा प्रणाली को आधुनिक बनाने के इस नीति के मकसद के बावजूद ये पार्टियां पुराना राग नहीं छोड़ना चाहतीं। द्रमुक की मौजूदा सरकार पर केंद्र की यह चेतावनी भी बेअसर रही कि जब तक तमिलनाडु एनईपी को पूरी तरह लागू नहीं करेगा, उसे समग्र शिक्षा निधि की 2952 करोड़ रुपए की राशि जारी नहीं की जाएगी। तमिलनाडु सरकार हिंदी के पठन-पाठन के दरवाजे इसलिए बंद रखना चाहती है, क्योंकि उसे लगता है कि एक बार दरवाजे खुले तो राजनीति का रंग-रोगन बदल जाएगा।</div>
<div> </div>
<div>नई शिक्षा नीति हिंदी थोपने के बजाय विद्यार्थियों को एक अतिरिक्त भाषा सीखने का अवसर दे रही है। हकिकत यह है कि नई शिक्षा नीति में हमने क्षेत्रीय भाषाओं को महत्व दिया है। यह हर क्षेत्रीय भाषा के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। नई शिक्षा के माध्यम के रूप में मातृभाषा के उपयोग की सिफारिश को लागू किया गया है। इसमें मातृभाषा, स्थानीय भाषा या क्षेत्रीय भाषा का विकल्प भी दिया गया है। भाषा नीति का मूल आधार त्रिभाषा फार्मूला है, जिसके अनुसार स्कूली विद्यार्थियों को तीन भाषाओं का ज्ञान अनिवार्य रूप से होना चाहिए। इसके साथ ही तमिल, तेलगू, कनड़, फारसी, संस्कृत और शास्त्रीय भाषाओं के अध्ययन पर जोर दिया गया है।</div>
<div> </div>
<div>शिक्षा के माध्यम के रूप में अंग्रेजी की वकालत करने वाला तबका जिसमें देश भर में कुकुरमुत्तों की तरह फैले अंग्रेजी माध्यम के स्कूल भी हैं, शिक्षा नीति के उस प्रावधान का विरोध करता नजर आया, जिसमें प्राथमिक शिक्षा के लिए पढ़ाई का माध्यम मातृभाषा या स्थानीय भाषा में कराने की बात कही गई है। दुनिया भर के शिक्षाविद यह मानते हैं कि बच्चे का सर्वाधिक प्रारंभिक विकास और सौखने की प्रवृत्ति उसी भाषा में बढ़ती है, जो उसके घर में बोली जाने वाली भाषा होती है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का भी मानना था कि मातृभाषा का स्थान कोई दूसरी भाषा नहीं ले सकती, उनके अनुसार 'गाय का दूध भी मां का दूध नहीं हो सकता।'</div>
<div> </div>
<div>केंद्र सरकार भी मातृ भाषा को ज्यादा महत्व दे रही है, मगर जिस प्रकार से हिंदी का विरोध किया जा रहा है, वह अनावश्यक है। ये हकीकत है कि तमिलनाडु की राजनीति हिंदी विरोध के आसपास घूमती रहती थी है। ये बहुत ही सस्ता और इंस्टैंट रिफ्रेशिंग पॉलिटिक्स है। मगर, दूसरे समाज की तरह तमिलनाडु के नौजवानों के लिए भाषा से ज्यादा जरूरत रोजी-रोजगार की है। शायद सत्ताधारी पार्टी के पास उसे लेकर कोई मजबूत ब्लूप्रिंट नहीं है। लिहाजा, भावनात्मक मुद्दों के सहारे 2026 का चुनाव साधने की कोशिशों में जुटी है। सभी भाषाओं को बराबरी का दर्जा देकर ही हम देश की सांस्कृतिक एकता मजबूत कर सकते हैं। हिंदी बोलने वाले लोग देश के हर कोने में मिल जाते हैं।</div>
<div> </div>
<div>कोई राज्य अगर अपनी मातृभाषा को महत्व देता है, तो उसकी भावना का सम्मान किया जाना चाहिए। मगर किसी राज्य विशेष का नागरिक दूसरे राज्यों में जाता है, तो हिंदी के बिना उसका काम नहीं चलता। भाषाएं तो एक दूसरे से जुड़ कर ही आगे बढ़ती हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में त्रिभाषा फार्मूले को लेकर चल रही सियासी बयानबाजी के बीच स्टालिन का विरोध नाहक ही है कि हिंदी से उनकी मातृभाषा नष्ट हो सकती है। दरअसल, उन्होंने अपने स्वर तीखे करते हुए साफ कर दिया है कि वे उन्हीं पुराने आंदोलनों के वशंज है, जिसमें हिंदी को लेकर उपेक्षा का गहरा भाव है।</div>
<div> </div>
<div>स्टालिन यह भूल गए हैं कि हिंदी दिलों को जोड़ने की भाषा है। यह आज भारत ही नहीं, दुनिया के कई देशों में समझी और बोली जाती है। इसलिए इस मुद्दे पर राजनीति की बजाय गंभीरता से विचार होना जरूरी है। क्योंकि यह मसला राजनीति से बहुत बड़ा है। आखिरकार यहां सवाल हमारे भविष्य का है, हमारी अगली पीढ़ी का है। और सवाल व्यक्तिगत पसंद नापसंद का भी है। बच्चों को भाषा चुनने की आजादी मिलनी चाहिए। लेकिन हमारे राजनीतिक लोगों को रोटी सेकने के लिए मुद्दे की तलाश रहती है फिर चाहे राष्ट्रभाषा हिंदी का विरोध करना ही क्यों न हो। लेकिन यह मानसिकता ठीक नहीं है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 04 Mar 2025 15:08:00 +0530</pubDate>
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                <title>दागी नेताओं के चुनाव लड़ने के मामले पर केंद्र का रवैया निराशा जनक</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal"><span lang="en-in" style="font-size:11pt;font-family:Arial, 'sans-serif';color:#000000;" xml:lang="en-in">  </span><span lang="hi" style="font-size:11pt;font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">देश का प्रत्येक नागरिक स्वयं को सच्चा देशभक्त मानता है। वह राजनीति, समाज और अर्थव्यवस्था से जुड़ी नीतियों पर बड़े ज्ञानवर्धक विचार प्रकट करता है और देश में फैले भ्रष्टाचार, अनैतिकता, बेईमानी व रिश्वतखोरी पर कठोर आक्रोश व्यक्त करता है, मानो उससे बड़ा राष्ट्रहितैषी कोई और नहीं। किन्तु, विडंबना यह है कि उसे ये सारी बुराइयाँ केवल दूसरों में ही दिखाई देती हैं, स्वयं में नहीं। वह अपने आपको ईमानदार, सत्यनिष्ठ, निष्कलंक और आदर्शवादी मानता है, जबकि उसके विचार और कर्म प्रायः इसके विपरीत होते हैं। ऐसे व्यक्तित्व के लोग अपने दोहरे मापदंडों के कारण राजनीति में बड़ी सफलता प्राप्त</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149255/centers-attitude-on-the-matter-of-tainted-leaders-contesting-elections"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/download-(3)1.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal"><span lang="en-in" style="font-size:11pt;font-family:Arial, 'sans-serif';color:#000000;" xml:lang="en-in"> </span><span lang="hi" style="font-size:11pt;font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">देश का प्रत्येक नागरिक स्वयं को सच्चा देशभक्त मानता है। वह राजनीति, समाज और अर्थव्यवस्था से जुड़ी नीतियों पर बड़े ज्ञानवर्धक विचार प्रकट करता है और देश में फैले भ्रष्टाचार, अनैतिकता, बेईमानी व रिश्वतखोरी पर कठोर आक्रोश व्यक्त करता है, मानो उससे बड़ा राष्ट्रहितैषी कोई और नहीं। किन्तु, विडंबना यह है कि उसे ये सारी बुराइयाँ केवल दूसरों में ही दिखाई देती हैं, स्वयं में नहीं। वह अपने आपको ईमानदार, सत्यनिष्ठ, निष्कलंक और आदर्शवादी मानता है, जबकि उसके विचार और कर्म प्रायः इसके विपरीत होते हैं। ऐसे व्यक्तित्व के लोग अपने दोहरे मापदंडों के कारण राजनीति में बड़ी सफलता प्राप्त करते हैं। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम जिस नैतिकता की अपेक्षा दूसरों से रखते हैं, उसी को अपने आचरण में अपनाने से कतराते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="en-in" xml:lang="en-in"> </span></p>
<p style="margin:0in;margin-bottom:0.0001pt;text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:11pt;font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">हमारे देश का लोकतंत्र विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्रों में से एक है, जिसकी नींव संविधान और विधि के शासन पर टिकी हुई है। यह प्रणाली नागरिकों को समान अधिकार, स्वतंत्रता और न्याय की गारंटी देती है। लेकिन जब अपराधी प्रवृत्ति के लोग राजनीति में प्रवेश करते हैं और कानून बनाने की शक्ति प्राप्त कर लेते हैं, तो यह व्यवस्था के मूल्यों पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न लगा देता है। हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि दागी नेताओं पर आजीवन चुनाव लड़ने से प्रतिबंध लगाने की मांग पर विचार होना चाहिए, जबकि केंद्र सरकार ने इसका विरोध किया। यह विवाद एक बड़े प्रश्न को जन्म देता है—क्या आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों को चुनाव लड़ने से रोका जाना चाहिए? या उन्हें संसद और विधानसभाओं में भेजकर कानून बनाने की शक्ति दे देनी चाहिए?</span><span lang="en-in" style="font-size:11pt;font-family:Arial, 'sans-serif';color:#000000;" xml:lang="en-in"> </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="en-in" xml:lang="en-in"> </span></p>
<p style="margin:0in;margin-bottom:0.0001pt;text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:11pt;font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">लोकतंत्र का आधार 'जनता द्वारा, जनता के लिए और जनता की सरकार' की अवधारणा पर टिका होता है। इसमें प्रत्येक नागरिक को मताधिकार और अपनी पसंद का प्रतिनिधि चुनने का अधिकार होता है। भारतीय संविधान में यह सुनिश्चित किया गया है कि कोई भी नागरिक, जब तक वह कानूनी रूप से अयोग्य घोषित नहीं किया गया हो, चुनाव लड़ सकता है और जनता का प्रतिनिधित्व कर सकता है। हालांकि, यदि जनता के प्रतिनिधि स्वयं गंभीर आपराधिक मामलों में लिप्त हों, तो क्या वे समाज में कानून और न्याय की स्थापना कर सकते हैं? संविधान का उद्देश्य योग्य, ईमानदार और जनसेवा को समर्पित लोगों को शासन में शामिल करना है, न कि वे लोग जो स्वयं कानून तोड़ते हैं।</span><span lang="en-in" style="font-size:11pt;font-family:Arial, 'sans-serif';color:#000000;" xml:lang="en-in"> </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="en-in" xml:lang="en-in"> </span></p>
<p style="margin:0in;margin-bottom:0.0001pt;text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:11pt;font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">आज चुनाव लड़ना गरीब व्यक्ति के लिए एक असंभव सपना बन गया है। गांव की सबसे निचली प्रशासनिक इकाई, पंचायत, में सरपंच बनने के लिए भी प्रत्याशी लाखों रुपये खर्च करते हैं, तो विधायक और सांसद बनने के लिए करोड़ों की जरूरत होती है। धन के अभाव में एक आम नागरिक चाहकर भी चुनावी राजनीति में प्रवेश नहीं कर सकता।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="en-in" xml:lang="en-in"> </span></p>
<p style="margin:0in;margin-bottom:0.0001pt;text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:11pt;font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">इसके विपरीत, अपराधी प्रवृत्ति के लोग भ्रष्टाचार और अवैध साधनों से अर्जित धन के बल पर न केवल चुनाव लड़ते हैं, बल्कि जेल में रहते हुए भी जीत हासिल कर लेते हैं। विडंबना यह है कि गरीब और शोषित वर्ग, जो स्वयं व्यवस्था परिवर्तन का इच्छुक होता है, भय और दबाव में आकर ऐसे दागी प्रत्याशियों को ही अपना नेता चुन लेता है। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के मूल्यों को क्षीण कर रही है और चुनावी प्रक्रिया को धनबल एवं बाहुबल का खेल बना रही है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="en-in" xml:lang="en-in"> </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" style="font-size:11pt;font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">देश में कई ऐसे राजनेता हैं जिन पर गंभीर आपराधिक आरोप लगे हुए हैं। 2019 के लोकसभा चुनावों में लगभग 43% सांसदों पर आपराधिक मामले लंबित थे, जिनमें से कई संगीन अपराधों से जुड़े थे, जैसे हत्या, बलात्कार, अपहरण और भ्रष्टाचार। यह न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों को ठेस पहुंचाता है, बल्कि जनता का विश्वास भी कम करता है। यदि कोई आम नागरिक मामूली अपराध में भी दोषी पाया जाता है, तो उसे सरकारी नौकरी से वंचित कर दिया जाता है। वहीं, जिन पर हत्या, दंगा और घोटालों के आरोप हैं, वे चुनाव लड़ सकते हैं और संसद या विधानसभा का हिस्सा बन सकते हैं। यह असमानता एक गंभीर चिंता का विषय है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="en-in" xml:lang="en-in"> </span></p>
<p style="margin:0in;margin-bottom:0.0001pt;text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:11pt;font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि चुनावी राजनीति में आपराधिक तत्वों की भागीदारी को रोकने के लिए कठोर नियम बनाए जाने चाहिए। इस पर केंद्र सरकार ने आपत्ति जताते हुए कहा कि अगर दागी नेताओं पर आजीवन चुनाव लड़ने से प्रतिबंध लगाया गया, तो यह विधायिका को कमजोर कर देगा और कानून निर्माण की प्रक्रिया को प्रभावित करेगा। यह तर्क कुछ गले से नहीं उतरता। क्या अपराधी लोगों को राजनीति में रोकने से राजनीति गंदा होने से नहीं बचेगी? अपराधी प्रवृत्ति के लोग किस प्रकार के कानून का समर्थन करेंगे, यह जगजाहिर है।</span><span lang="en-in" style="font-size:11pt;font-family:Arial, 'sans-serif';color:#000000;" xml:lang="en-in"> </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="en-in" xml:lang="en-in"> </span></p>
<p style="margin:0in;margin-bottom:0.0001pt;text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:11pt;font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">सत्य यही है कि केंद्र सरकार का यह तर्क लोकतंत्र की भावना के अनुरूप प्रतीत नहीं होता। संसद और विधानसभा में बैठने वाले प्रतिनिधियों का नैतिक और कानूनी रूप से स्वच्छ होना आवश्यक है। यदि किसी व्यक्ति को गंभीर आपराधिक मामलों में दोषी ठहराया गया है, तो उसे जनता की सेवा करने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए। मिल भी कैसे सकता है, जो स्वयं अपराधी हो वह समाजसेवा कैसे कर सकता है।</span><span lang="en-in" style="font-size:11pt;font-family:Arial, 'sans-serif';color:#000000;" xml:lang="en-in"> </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="en-in" xml:lang="en-in"> </span></p>
<p style="margin:0in;margin-bottom:0.0001pt;text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:11pt;font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">आजीवन प्रतिबंध लगाने का विरोध करने वाले यह तर्क देते हैं कि चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक अधिकारों का हिस्सा है और किसी भी व्यक्ति को राजनीतिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी सजा पूरी कर चुका है, तो उसे पुनः समाज में योगदान देने का अवसर मिलना चाहिए।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="en-in" xml:lang="en-in"> </span></p>
<p style="margin:0in;margin-bottom:0.0001pt;text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:11pt;font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">लेकिन, राजनीति कोई साधारण नौकरी नहीं है; यह देश और समाज की सेवा का एक पवित्र कार्य है। यदि सरकारी सेवाओं में नौकरी करने के लिए किसी व्यक्ति का चरित्र प्रमाणपत्र आवश्यक होता है, तो विधायिका में प्रवेश के लिए भी नैतिकता और कानूनी स्वच्छता की कसौटी होनी चाहिए।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="en-in" xml:lang="en-in"> </span></p>
<p style="margin:0in;margin-bottom:0.0001pt;text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:11pt;font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">चुनाव आयोग को और अधिक शक्तियां दी जानी चाहिए, जिससे वह आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों पर सख्त निर्णय ले सके। ऐसे नेताओं पर चलने वाले मामलों को विशेष न्यायालयों में रखा जाए, ताकि फैसले शीघ्रता से हों और दोषी पाए जाने पर उन्हें तुरंत अयोग्य घोषित किया जा सके। नेताओं के लिए शिक्षा, ईमानदारी और नैतिकता को अनिवार्य किया जाए। जो नेता स्वयं ईमानदार और देश और संविधान के प्रति निष्ठावान नहीं होगा तो वह जनता के लिए कैसे और किस प्रकार आदर्श सिद्ध हो सकता है।</span><span lang="en-in" style="font-size:11pt;font-family:Arial, 'sans-serif';color:#000000;" xml:lang="en-in"> </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="en-in" xml:lang="en-in"> </span></p>
<p style="margin:0in;margin-bottom:0.0001pt;text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:11pt;font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">चुनाव आयोग और स्वयंसेवी संस्थाएं मतदाताओं को जागरूक करें कि उन्हें बिना किसी लालच में आए स्वच्छ छवि वाले उम्मीदवारों को ही चुनना चाहिए। जो भी उम्मीदवार या दल उन्हें किसी प्रकार का लालच या प्रलोभन दें उनकी शिकायत चुनाव आयोग से करें।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="en-in" xml:lang="en-in"> </span></p>
<p style="margin:0in;margin-bottom:0.0001pt;text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:11pt;font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">लोकतंत्र की सफलता उसके नेताओं की स्वच्छता और जनता के विश्वास पर निर्भर करती है। यदि राजनीति अपराधियों का अड्डा बन जाएगी, तो यह पूरे शासन तंत्र को भ्रष्ट कर देगी। इसलिए, यह आवश्यक है कि दागी नेताओं पर आजीवन चुनाव लड़ने से प्रतिबंध लगाया जाए, ताकि लोकतंत्र की गरिमा बनी रहे और जनता का विश्वास मजबूत हो।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 03 Mar 2025 14:41:59 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
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                <title>भारतीय सियासत का ' छावा ' कौन</title>
                                    <description><![CDATA[<p>इन दिनों रजतपट पर विक्की कौशल और 'छावा' दोनों ही धमाल मचा रहे हैं।   ऐतिहासिक फिल्म ' छावा ' बॉक्स ऑफिस पर पूरे जोश में आगे बढ़ रही है और इसकी रफ़्तार धीमी होने का नाम ही नहीं ले रही है। सिनेमाघरों में नौ दिनों तक चलने के बाद, अब यह फि ल्म 300 करोड़ रुपये की बड़ी कमाई करने की ओर बढ़ गई है। खचाखच भरे सिनेमाघरों, जोरदार तालियों और रिकॉर्ड तोड़ कमाई के साथ, 'छावा' ने खुद को साल की सबसे बड़ी हिट फिल्मों में से एक बना दिया है।</p>
<p>लेकिन सवाल ये है की भारतीय राजनीति का</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/148979/who-is-the-printing-of-indian-politics"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-02/chhaava-starting-politics-in-maharashtra.webp" alt=""></a><br /><p>इन दिनों रजतपट पर विक्की कौशल और 'छावा' दोनों ही धमाल मचा रहे हैं।   ऐतिहासिक फिल्म ' छावा ' बॉक्स ऑफिस पर पूरे जोश में आगे बढ़ रही है और इसकी रफ़्तार धीमी होने का नाम ही नहीं ले रही है। सिनेमाघरों में नौ दिनों तक चलने के बाद, अब यह फि ल्म 300 करोड़ रुपये की बड़ी कमाई करने की ओर बढ़ गई है। खचाखच भरे सिनेमाघरों, जोरदार तालियों और रिकॉर्ड तोड़ कमाई के साथ, 'छावा' ने खुद को साल की सबसे बड़ी हिट फिल्मों में से एक बना दिया है।</p>
<p>लेकिन सवाल ये है की भारतीय राजनीति का ' छावा ' कौन है ? भारतीय राजनीति में भी इतिहास   बदलने की होड़ में लगे अनेक किरदार हैं लेकिन ' असली ' छावा ' का पता नहीं चल पा रहा है। कभी छावा की भूमिका में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नजर आते हैं तो कभी अमित शाह ।  कभी योगी आदित्यनाथ तो कभी राहुल गाँधी ।  कभी एकनाथ शिंदे तो कभी शरद पंवार। सियासत में हर कोई छावा बनकर छा जाना चाहता है। लेकिन देश की फ़िक्र किसी सियासी छावा को नहीं है। सबको अपनी-अपनी पड़ी है।<br /> </p>
<p>कहते हैं कि 'छावा' में औरंगजेब बने अक्षय खन्ना की 27 साल में 22 फ्लॉप फिल्में, दी हैं। उनकी फ़ीस भी 2.5 करोड़  रूपये है अक्षय की  नेटवर्थ विक्की कौशल से अधिक है।  अक्षय खन्ना 'छावा' में औरंगजेब का रोल करके हर किसी की नजर में एक बार फिर से आ गए हैं। अक्षय के काम की खूब तारीफ हो रही है। औरंगजेब के किरदार में उनकी कलाकारी को देखकर हर कोई दंग रह गया है और उन्हें बेस्ट एक्टर्स में से एक के तौर पर काउंट किया जा रहा है।</p>
<p>लक्ष्मण उटेकर के निर्देशन  में बनी 'छावा' महान मराठा शासक छत्रपति संभाजी महाराज के जीवन पर आधारित एक पीरियड ड्रामा है। विक्की मराठा साम्राज्य के संस्थापक के सबसे बड़े बेटे छत्रपति संभाजी महाराज के रोल में हैं। रश्मिका मंदाना उनकी पत्नी येसुबाई भोंसले का किरदार निभा रही हैं। अक्षय खन्ना, आशुतोष राणा और दिव्या दत्ता भी लीड रोल में हैं।</p>
<p>आइये अब बात करते हैं भारतीय सियासत के छावा और औरंगजेब की ।  भारतीय राजनीति में भाजपा ने प्रधामनंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी को छावा और लोकसभामें विपक्ष के नेता राहुल गांधी को औरंगजेब बना दिया है। दोनों अपने-अपने किरदार में जान फूंकने की कोशिश कर रहे है।  दुर्भाग्य से सियासी छावा में कोई येशुबाई  भैंसले नहीं है। मोदी रणछोड़दास हैं और राहुल ने अभी तक घर नहीं बसाया है। पिछले एक दशक से सियासी छावा और औरंगजेब में ठनी हुई है। मोदी खुद चक्रवर्ती सम्राट बनना चाहते हैं लेकिन राहुल गाँधी बीच-बीच में उनका रथ रोक लेते हैं। लेकिन मैदान किसी ने भी नहीं छोड़ा है।</p>
<p>भारतीय सियासत की फिल्म छावा में मोदी और गाँधी के अलावा  दूसरे किरदार भी  हैं। आप इन्हें ए-1  और ए-2 भी कह सकते हैं और अडानी तथा अम्बानी भी कह सकते हैं इन किरदारों की धूम भारत की सीमाओं के बाहर भी है ।  एक को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित किया जाता है तो दूसरे के खिलाफ अमेरिका की अदालत से वारंट जारी किये जाते हैं। भारतीय सियासत के छावा की नींद 21  करोड़ अमेरिकी डालर की कथित अमेरिकी मदद की खबर भी उड़ा देती है। पहले इस मदद को लेकर कांग्रेस निशाने पर थी अब ये निशाना बदल गया है। निशाने पर मोदी थे किन्तु वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण जी ने ट्रम्प की तोप का मुंह दूसरी और मोड़ दिया।</p>
<p>बैशाखियों और तांगों के सहारे दिल्ली और महाराष्ट्र में सरकार चलाने वाली भाजपा के लिए  औरंगजेब केवल राहुल गाँधी ही नहीं बल्कि दुसरे भी हैं।  बिहार  में डिप्टी चीफ मिनिस्टर एकनाथ शिंदे ने मोदी -शाह की जोड़ी को साफ़ ढका दिया है की उन्हें हल्के में न लिया जाये।मोदी जी को तांगेवाले से बचने के लिए महाराष्ट्र की राजनीती के बूढ़े छावा शरद पाँवर के समाने विनम्रता का स्वांग करना पड़ रहा है ।  वे कभी शाह की कुर्सी पीछे खिसकाते दिखाई देते हैं तो कभी उनका गिलास भरते नजर आ रहे हैं। कोशिश ये है की बिहार विधानसभा चुनाव तक कोई औरंजेब सर न उठा पाए ,फिर चाहे वो राहुल गाँधी हो या एकनाथ शिंदे।</p>
<p>सत्ता में बने रहने के लिए सभी को साधना आज के सियासत के  छावा की मजबूरी है। उसे मसखरा शास्त्री भी साधना पड़ रहा है ,और अपनी ताकत बढ़ाने के लिए कांग्रेस के असंतोष पर नजरें रखना पड़ रही हैं। सीएसी छावा को शास्त्री भी चाहिए और थरूर भी। सिहायसि फिल्म में बिदूषक न हो तो मुष्किल होती है।  एक अकेला हीरो और खलनायक तो बन सकता है किन्तु उसे बिदूषक की जरूरत क्यों पड़ती है। बिना बिदूषक के कोई सियासी फील या ड्रामा कामयाब नहीं हो सकता।</p>
<p>भाजपा की मैं इस बात के लिए हमेशा तारीफ करता हूँ की -भाजपा  भ्रम फैलाकर सियासत करती है। इस भ्रमजाल में जो फंस   गया उसका लोप हो जाता है। उमा भारती ,शतुघ्न सिन्हा ,यशवंत सिन्हा इस बात के ज्वलंत उदाहरण हैं।फ़िलहाल भाजपा की सियासी फिम छावा में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का नाम सबसे ऊपर है उन्होंने कुम्भ को महाकुम्भ बनाकर फ़िल्मी  कारोबार  को भी पीछे छोड़ दिया है। उन्हें इस समय न राम से काम है और न राम की गंगा के मैलेपन से। उन्हें डुबकियों से मतलब है। वे देश की आधी आबादी को वे कुम्भ में डुबकियां लगवा चुके हैं। इसमें वे लोग शामिल हैं की नहीं जो पांच किलो मुफ्त के राशन पर पल रहे हैं। रजतपट की छावा सियासी छावा को गति देने का ाएक उपक्रम मात्र है। पहले भी भाजपा फिल्मों के माध्यम से ये कोशिश कर चुकी है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 24 Feb 2025 17:06:50 +0530</pubDate>
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                <title>कुर्सी का काला खेल, संगीत का उजला मेल</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">ज़िंदगी मानो</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">दो परस्पर विरोधी धाराओं का अखाड़ा है—एक ओर वह जो सत्ता की पिपासा में अपने कंठ को फाड़कर चीखता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरी ओर वह जो अपने सुरों की मल्हार</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">से</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">रूह को अमृतपान कराता है। राजनीति वह दलदल है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ साज़िशों की बेलें विषवृक्ष बनकर लहराती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गठबंधनों का सौदा होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और अवसर मिलते ही विश्वसनीयता को तिलांजलि दे दी जाती है। इसके ठीक विपरीत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संगीत एक ऐसी निर्झरिणी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो लोभ-मोह की मर्यादाओं से परे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिना किसी छल-प्रपंच के हृदयों को सुरों की अटूट डोर में बाँध देती है। न</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/148926/black-game-of-black-game-music"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-02/download-(1)5.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">ज़िंदगी मानो</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">दो परस्पर विरोधी धाराओं का अखाड़ा है—एक ओर वह जो सत्ता की पिपासा में अपने कंठ को फाड़कर चीखता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरी ओर वह जो अपने सुरों की मल्हार</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">से</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">रूह को अमृतपान कराता है। राजनीति वह दलदल है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ साज़िशों की बेलें विषवृक्ष बनकर लहराती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गठबंधनों का सौदा होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और अवसर मिलते ही विश्वसनीयता को तिलांजलि दे दी जाती है। इसके ठीक विपरीत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संगीत एक ऐसी निर्झरिणी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो लोभ-मोह की मर्यादाओं से परे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिना किसी छल-प्रपंच के हृदयों को सुरों की अटूट डोर में बाँध देती है। न विश्वासघात</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न छलावा—बस एक ऐसी रागिनी जो आत्मा को मधुर आलिंगन में भर लेती है। किंतु विधि का यह कटु सत्य है कि सत्ता का भूत जब किसी पर सवार होता है कि</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भाई-भाई</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पीठ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">में</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">छुरा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">घोंप</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">देता</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि सुरों का सच्चा साधक अपने शिष्य को स्वर-सिंधु में डुबोकर उसे अनंत ऊँचाइयों तक पहुँचा देता है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">राजनीति का असली मज़ा तो उसकी बेशर्मी में छुपा है। कल जो एक दरबार में चरणों में लोट रहे थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज दूसरे की चप्पलें चूमते नज़र आते हैं। कोई </span><span lang="hi" xml:lang="hi">“</span><span lang="hi" xml:lang="hi">बड़ा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> भाई</span><span lang="hi" xml:lang="hi">”</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> बनकर पीठ में खंजर मारता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कोई मुलायम की चौखट छोड़कर मोदी के डेरे में ठुमके लगाता है। यहाँ न गुरु-शिष्य की मर्यादा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कोई पवित्र रिश्ता—बस सौदेबाज़ी की सुई टनटनाती रहती है। मगर संगीत की दुनिया में ऐसा कहाँ</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ उस्ताद चट्टान-सा अडिग खड़ा रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और शागिर्द उसकी छाँव में पनपता-चमकता है। उस्ताद कोई ढोंगी बाबा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो गले में तावीज़ टाँगे घूमे</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वह तो सुरों का जादूगर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो ऐसी माला गूँथता है कि सीधे ऊपरवाले के दरबार में पहुँच जाए।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">राजनीति का ढोल ऐसा बेसुरा कि मज़हब के नाम पर चिंगारियाँ भड़काए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और उसकी राख से अपनी गंदी दुकान चलाए। किसी शानदार निशानी को अपने हिसाब से रंग दो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी बुलंद छाया को ज़मीन में मिलाने की साज़िश रचो—ये सब इनके घटिया तमाशे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बस भीड़ को ठगने का धंधा। मगर ज़रा संगीत की तरफ़ आँख उठाकर दिखाओ! किसी उस्ताद की शहनाई को मज़हब की तलवार से चीरो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी सितार की झंकार को हिंदू-मुसलमान की कसौटी पर कसो—है हिम्मत तो करो! तानसेन की रागिनियों में आग की लपटें सुलगाओ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रसखान की बाँसुरी छीनकर उसकी धुन को कुचल दो—सुरों का ज़ोर नहीं टूटेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुम्हारी गर्दन की अकड़ ज़रूर धूल चाटेगी। आत्मा को अमर का ख़िताब दो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर रूह को जूतों तले रौंदने की गुस्ताख़ी करो—किसी रानी के जज़्बे को गंदे लफ़्ज़ों से तोलो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मगर मियाँ की तोड़ी की लय को तोड़ने का दुस्साहस करके दिखाओ!</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">ये कुर्सी के दीवाने हरियाली को अपने झंडे की ओट में ढाँपते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुनहरे रंग को अपनी चादर में लपेटकर नचाते हैं। मगर इस खुले आसमान में ये रंग आज़ाद लहराते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्हें कौन अपनी गंदी मुट्ठी में क़ैद कर लेगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">चाँद को अपने मज़हब का बंधक बनाने की ख़्वाहिश पालो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूरज को अपनी खेती का ढोंगी नौकर बनाओ—मगर ये दोनों तो सबके साथी हैं। चाँद कभी ईद का हमनवाज़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी करवा चौथ का साक्षी</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">सूरज कभी संक्रांति का मेहमान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी गुरु का चमकता चेहरा—इनके सामने तुम्हारी सारी चालें बेमानी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बस हवा में फुसफुसाती रह जाती हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">ज़िंदगी का असली मज़ा तो जुगलबंदी में छुपा है। कोई स्वर की मिठास बिखेरे या कोई गायक की गहराई से रूह को थामे—दोनों मिलकर दिल को लट्टू कर देते हैं। चाहे कोई पंडित तान छेड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चाहे कोई खान धुन उड़ाए—सुरों की दुनिया में ऊँच-नीच का झमेला कहाँ</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">सितार की तारें हों या तबले की थाप—जब साथ में गूँजते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो मुँह से बस </span><span lang="hi" xml:lang="hi">“</span><span lang="hi" xml:lang="hi">वाह</span><span lang="hi" xml:lang="hi">-वाह</span><span lang="hi" xml:lang="hi">”</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> ही फूटता है। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">“</span><span lang="hi" xml:lang="hi">रैना</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> बीती जाए</span><span lang="hi" xml:lang="hi">”</span><span lang="hi" xml:lang="hi">—ये</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> मियाँ की तोड़ी का ऐसा जादू है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे कुर्सी का कोई पहलवान अपनी भैंस की ताकत से भी नहीं मिटा सकता।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुबह की ताज़गी हो मियाँ की तोड़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या बारिश की बूँदों में मेघ मल्हार—ये ज़िंदगी के सुर हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो रग-रग में बसते हैं। शिवरंजनी की चुलबुली शरारत हो या यमन की रूहानी सैर—हर साज़ में एक ही रंग समाता है। मालकौंस की धुन बजे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो मन हरि के पीछे नाचने को बेकरार हो जाए। चाहे सरोद की गहरी आवाज़ हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चाहे शहनाई की सीधी आत्मा तक की पुकार—सब एक ही राग में डूबते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और वो है देस का राग। ये राग न कुर्सी की चापलूसी का गुलाम है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न वोटों की ठेकेदारी का भिखारी। ये तो बस यूँ ही बहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे बादल बिना किसी रोक-टोक के बरसते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब ज़रा राजनीति के ढोल को देखो—शोर मचाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिल्ल-पों करे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मगर सुर की एक लकीर भी न पकड़ सके। कुर्सी के नीचे से ज़मीन खिसक जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो ये सारे बादशाह मुँह के बल धड़ाम से गिर पड़ते हैं। मगर संगीत</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">वो तो ज़मीन पर कदम जमाकर आसमान को भी सलाम ठोकने पर मजबूर कर देता है। एक तरफ़ कुर्सी का तमाशा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ मज़हब के नाम पर तलवारें लहराई जाती हैं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरी तरफ़ सुरों का जहान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ दिलों के किवाड़ खुलते हैं। अब फैसला तुम्हारे हाथ—कुर्सी की कर्कश चीखों में कान फोड़ोगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या सुरों के सुकून में गोते लगाओगे</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि जहाँ राजनीति की चिल्लाहट थम जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ संगीत का आलाप गूँज उठता है—और वो कभी थमने का नाम नहीं लेता।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 23 Feb 2025 17:31:37 +0530</pubDate>
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