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                <title>indian history - Swatantra Prabhat</title>
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                            <item>
                <title>काकोरी ट्रेन एक्शन वर्षगांठ की तैयारियों का डीएम ने लिया जायजा</title>
                                    <description><![CDATA[<blockquote class="format1"><strong>लखनऊ, </strong></blockquote><p style="text-align:justify;"> आगामी 9 अगस्त को बाजनगर, काकोरी स्थित काकोरी स्मृति स्थल पर आयोजित होने वाले काकोरी ट्रेन एक्शन की वर्षगांठ के कार्यक्रम की तैयारियों का गुरुवार को जिलाधिकारी विशाख जी. ने स्थलीय निरीक्षण किया। उन्होंने कार्यक्रम स्थल, पहुंच मार्ग और आसपास की व्यवस्थाओं का जायजा लेते हुए सभी तैयारियां समयबद्ध एवं गुणवत्तापूर्ण ढंग से पूरी करने के निर्देश दिए।</p><p style="text-align:justify;">निरीक्षण के दौरान जिलाधिकारी ने कार्यक्रम स्थल पर साफ-सफाई, मरम्मत और सौंदर्यीकरण कार्यों की समीक्षा की। उन्होंने नगर पंचायत काकोरी, नगर निगम और जिला पंचायत राज विभाग के समन्वय से पर्याप्त सफाई व्यवस्था सुनिश्चित करने तथा प्रत्येक प्रमुख स्थान पर सफाई</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184318/dm-took-stock-of-preparations-for-kakori-train-action-anniversary"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/whatsapp-image-2026-07-30-at-19.16.37.jpeg" alt=""></a><br /><blockquote class="format1"><strong>लखनऊ, </strong></blockquote><p style="text-align:justify;"> आगामी 9 अगस्त को बाजनगर, काकोरी स्थित काकोरी स्मृति स्थल पर आयोजित होने वाले काकोरी ट्रेन एक्शन की वर्षगांठ के कार्यक्रम की तैयारियों का गुरुवार को जिलाधिकारी विशाख जी. ने स्थलीय निरीक्षण किया। उन्होंने कार्यक्रम स्थल, पहुंच मार्ग और आसपास की व्यवस्थाओं का जायजा लेते हुए सभी तैयारियां समयबद्ध एवं गुणवत्तापूर्ण ढंग से पूरी करने के निर्देश दिए।</p><p style="text-align:justify;">निरीक्षण के दौरान जिलाधिकारी ने कार्यक्रम स्थल पर साफ-सफाई, मरम्मत और सौंदर्यीकरण कार्यों की समीक्षा की। उन्होंने नगर पंचायत काकोरी, नगर निगम और जिला पंचायत राज विभाग के समन्वय से पर्याप्त सफाई व्यवस्था सुनिश्चित करने तथा प्रत्येक प्रमुख स्थान पर सफाई कर्मियों की तैनाती के निर्देश दिए। बारिश की संभावना को देखते हुए जलभराव से निपटने के लिए भी आवश्यक इंतजाम करने को कहा।</p><p style="text-align:justify;">डीएम ने अपर निदेशक संस्कृति को काकोरी स्मृति स्थल स्थित शहीद मंदिर की रंगाई-पुताई, पुष्प सज्जा, शहीदों के नाम की नई पट्टिकाएं लगाने तथा काकोरी ट्रेन एक्शन की थीम पर आधारित आकर्षक सेल्फी प्वाइंट विकसित करने के निर्देश दिए। संस्कृति विभाग ने बताया कि इस वर्ष 'हर घर तिरंगा' अभियान से संबंधित स्टॉल भी लगाए जाएंगे।</p><p style="text-align:justify;">इसके बाद जिलाधिकारी ने अमर शहीद उद्यान का निरीक्षण कर प्रस्तावित वृक्षारोपण कार्यक्रम की तैयारियों का भी जायजा लिया। उन्होंने वन विभाग को वृक्षारोपण स्थल का चिन्हांकन कर सभी आवश्यक व्यवस्थाएं समय से पूरी करने तथा उद्यान की साफ-सफाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 30 Jul 2026 21:46:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>देश की युवा पीढ़ी के महान आदर्श हैं - अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत की आज़ादी के अमर सेनानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महान क्रांतिकारी और अदम्य राष्ट्रभक्त शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद की आज </span>120<span lang="hi" xml:lang="hi">वीं जयंती</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  है। यह अवसर केवल उनके जन्म का स्मरण करने का नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उनके जीवन-दर्शन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र्भक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्याग और स्वाभिमान को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का भी है। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और अत्याधुनिक तकनीक के युग में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि देश की युवा पीढ़ी में कितने ऐसे युवा हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्होंने अपनी पाठ्य पुस्तकों से आगे बढ़कर चन्द्रशेखर आज़ाद के जीवन और उनके आदर्शों का गंभीर अध्ययन किया है। निस्संदेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने भी आज़ाद के</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183946/amar-shaheed-chandrashekhar-azad-is-a-great-role-model-for"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/785488f3bc3034b83ac6f9af149b0f6c.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत की आज़ादी के अमर सेनानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महान क्रांतिकारी और अदम्य राष्ट्रभक्त शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद की आज </span>120<span lang="hi" xml:lang="hi">वीं जयंती</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> है। यह अवसर केवल उनके जन्म का स्मरण करने का नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उनके जीवन-दर्शन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र्भक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्याग और स्वाभिमान को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का भी है। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और अत्याधुनिक तकनीक के युग में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि देश की युवा पीढ़ी में कितने ऐसे युवा हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्होंने अपनी पाठ्य पुस्तकों से आगे बढ़कर चन्द्रशेखर आज़ाद के जीवन और उनके आदर्शों का गंभीर अध्ययन किया है। निस्संदेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने भी आज़ाद के जीवन को पढ़ा और समझा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसने जाना है कि उनका संपूर्ण जीवन परिवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज और राष्ट्र के प्रति कर्तव्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मसम्मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्याग और बलिदान का अनुपम उदाहरण था। उन्होंने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण भारत माता की स्वतंत्रता के लिए समर्पित कर दिया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद का जन्म </span>23 <span lang="hi" xml:lang="hi">जुलाई </span>1906 <span lang="hi" xml:lang="hi">को तत्कालीन अलीराजपुर रियासत (वर्तमान मध्य प्रदेश) के भाबरा गांव में हुआ था। उनके पिता पंडित सीताराम तिवारी तथा माता जगरानी देवी थीं। भाभरा की पावन धरती पर ही उनका बचपन बीता। बाल्यकाल से ही उनमें स्वाभिमान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्भीकता और राष्ट्रप्रेम के संस्कार स्पष्ट दिखाई देते थे। यही कारण था कि मात्र दस-बारह वर्ष की आयु में उन्होंने घर-परिवार का मोह त्याग कर मातृभूमि की स्वतंत्रता को अपना जीवन-ध्येय बना लिया। आज जब पचास वर्ष के व्यक्ति को भी युवा कहा जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब यह कल्पना करना कठिन है कि एक दस बारह वर्ष का बालक अपनी जन्मभूमि की गलियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माता पिता के स्नेह और बचपन की निश्छल दुनिया को छोड़कर केवल इसलिए निकल पड़े कि उसकी भारत माता पराधीन है। यह केवल साहस नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि राष्ट्र के प्रति अद्वितीय समर्पण और असाधारण चरित्रबल का परिचायक था।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">        देश की स्वतंत्रता का अलख जगाने का संकल्प लेकर निकले बालक आज़ाद ने वर्ष </span>1921 <span lang="hi" xml:lang="hi">में महात्मा गांधी द्वारा संचालित असहयोग आंदोलन में भाग लिया। अंग्रेजी शासन के विरुद्ध स्वर बुलंद करने पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। जब अंग्रेज़ न्यायाधीश ने उनका नाम पूछा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उन्होंने निर्भीक स्वर में उत्तर दिया </span>"<span lang="hi" xml:lang="hi">नाम — आज़ाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पिता का नाम — स्वतंत्र और निवास — जेल।"</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> यह उत्तर सुनकर न्यायाधीश क्रोधित हो उठा और उन्हें पंद्रह बेंतों की सजा सुनाई। किन्तु प्रत्येक बेंत के साथ बालक आज़ाद के मुख से </span>"<span lang="hi" xml:lang="hi">भारत माता की जय"</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> और </span>"<span lang="hi" xml:lang="hi">वंदे मातरम्"</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> का घोष गूँजता रहा। अंग्रेज़ी सत्ता की क्रूरता उनके साहस को डिगा नहीं सकी। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया और चन्द्रशेखर आज़ाद एक निर्भीक क्रांतिकारी के रूप में राष्ट्रीय चेतना के केंद्र बन गए। इसके बाद उनका संपर्क महान क्रांतिकारी पंडित रामप्रसाद बिस्मिल से हुआ। वे हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सक्रिय सदस्य बने और भारत की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। आज़ाद का स्पष्ट विश्वास था कि </span>"<span lang="hi" xml:lang="hi">दासता मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप है।"</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> यही विचार उनके जीवन का मूल मंत्र बन गया और अंतिम क्षण तक वे इसी अभिशाप के विरुद्ध संघर्ष करते रहे।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्रता संग्राम का वह दौर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशेषकर</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span>1920 <span lang="hi" xml:lang="hi">से </span>1930 <span lang="hi" xml:lang="hi">के बीच का दशक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंग्रेजी शासन के लिए सबसे कठिन समय था। क्रांतिकारियों की बढ़ती गतिविधियों ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींद उड़ा दी थी। यदि उस समय स्वतंत्रता आंदोलन की समस्त धाराएँ एकजुट हो जाती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो संभव था कि भारत को स्वतंत्रता बहुत पहले ही मिल जाती।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">क्रांतिकारी संगठन को संचालित करने और हथियारों की व्यवस्था के लिए धन की आवश्यकता थी। इसी उद्देश्य से पंडित रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">काकोरी कांड</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की योजना बनाई गई। सरकारी खजाना लूटकर अंग्रेजी शासन को यह संदेश दिया गया कि भारत के क्रांतिकारी अब केवल विरोध तक सीमित नहीं रहेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि अन्याय का उत्तर उसी की भाषा में देंगे।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">काकोरी कांड के बाद अंग्रेजी शासन बुरी तरह बौखला गया। देशभर में क्रांतिकारियों की धरपकड़ शुरू हुई। विडंबना यह रही कि जिन हजारों क्रांतिकारियों तक अंग्रेज़ नहीं पहुँच सके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनमें से अनेक अपने ही लोगों की विश्वासघात पूर्ण सूचनाओं के कारण गिरफ्तार हुए और फांसी के फंदे तक पहुँच गए। यह भारतीय इतिहास का सबसे पीड़ादायक अध्याय भी है कि विदेशी शासन से अधिक नुकसान अपनों की गद्दारी ने पहुँचाया।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पंडित रामप्रसाद बिस्मिल की शहादत के बाद</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बिखरने लगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किंतु चन्द्रशेखर आज़ाद ने परिस्थितियों के सामने घुटने नहीं टेके। उन्होंने संगठन की कमान अपने हाथों में ली और निराश साथियों में नया उत्साह भरते हुए क्रांतिकारी आंदोलन को पुनः संगठित किया। बाद में इसी संगठन को नए स्वरूप में आगे बढ़ाते हुए</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के रूप में विकसित किया गया।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी काल में आज़ाद और भगत सिंह की जोड़ी अंग्रेजी शासन के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन गई। दोनों ने देशभर के युवाओं में स्वतंत्रता की नई चेतना का संचार किया। भेष बदलकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थान बदलते हुए और गुप्त रूप से संगठन का विस्तार करते हुए उन्होंने अंग्रेजी शासन की जड़ों को लगातार चुनौती दी। जहाँ भी आज़ाद जाते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ ऐसे युवाओं की टोली तैयार कर देते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तत्पर रहती।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">संसाधनों का घोर अभाव होने के बावजूद आज़ाद का आत्मविश्वास कभी कम नहीं हुआ। उनके सामने उस ब्रिटिश साम्राज्य की शक्ति थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके बारे में कहा जाता था कि उसके राज्य में कभी सूर्यास्त नहीं होता। फिर भी यह अकेला क्रांतिकारी अंग्रेजी शासन के लिए इतना बड़ा खतरा बन चुका था कि उसकी गिरफ्तारी के लिए पूरे देश में जाल बिछा दिया गया। उसकी सूचना देने वालों के लिए इनाम घोषित किए गए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किंतु आज़ाद हर बार अंग्रेजों को चकमा देकर निकल जाते थे।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">उनका प्रिय उद्घोष आज भी हर भारतीय के हृदय में राष्ट्रभक्ति का संचार करता है—</span></p>
<p style="text-align:justify;" align="center">"<span lang="hi" xml:lang="hi">दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे</span>,<br /><span lang="hi" xml:lang="hi">आज़ाद ही रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज़ाद ही रहेंगे।"</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह केवल कविता की पंक्ति नहीं थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उनके जीवन का अटल संकल्प था। उन्होंने कभी जीवित अंग्रेज़ों के हाथों बंदी न बनने की प्रतिज्ञा की थी और जीवन के अंतिम क्षण तक उस प्रतिज्ञा का अक्षरशः पालन किया। जब भगत सिंह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजगुरु और सुखदेव गिरफ्तार कर लिए गए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब भी चन्द्रशेखर आज़ाद ने उनके साथियों को छुड़ाने के अनेक प्रयास किए। वे चाहते थे कि देश के सभी बड़े नेता वैचारिक मतभेदों से ऊपर उठकर स्वतंत्रता के इस निर्णायक संघर्ष में एकजुट हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किंतु परिस्थितियों उनके अनुकूल नहीं बन सकीं। इसके बावजूद उन्होंने अपने अभियान को कभी रुकने नहीं दिया और अंतिम क्षण तक अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष करते रहे।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">27 फरवरी 1931 का वह ऐतिहासिक दिन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के स्वर्णिम अध्यायों में सदैव अमर रहेगा। इलाहाबाद (वर्तमान प्रयागराज) के अल्फ्रेड पार्क में चन्द्रशेखर आज़ाद अपने साथियों की रिहाई और क्रांतिकारी गतिविधियों की भावी रणनीति पर चर्चा के लिए पहुँचे थे। वे अपने साथियों की प्रतीक्षा कर ही रहे थे कि एक विश्वासघाती की सूचना पर अंग्रेज़ी पुलिस ने पूरे पार्क को चारों ओर से घेर लिया। अचानक हुई इस घेराबंदी के बाद भी आज़ाद ने धैर्य और अद्भुत साहस का परिचय दिया। उन्होंने अपने साथियों को सुरक्षित निकल जाने का अवसर दिया और स्वयं अंग्रेज़ी सैनिकों से अकेले मोर्चा लेते रहे। जब तक उनकी पिस्तौल में गोलियाँ रहीं, वे दुश्मनों पर कहर बनकर टूटते रहे। अंततः जब उनके पास केवल एक अंतिम गोली शेष रह गई और गिरफ्तारी निश्चित दिखाई देने लगी, तब उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा निभाते हुए वही अंतिम गोली स्वयं को मार ली। इस प्रकार उन्होंने अपने प्राणों का बलिदान देकर यह सिद्ध कर दिया कि "आज़ाद जीवित पकड़ा नहीं जाएगा। "</span><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वाभिमान आज़ाद के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता थी। </span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वे जो संकल्प कर लेते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे हर परिस्थिति में पूरा करते थे। कठिनाइयाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्यास और मृत्यु का भय भी उन्हें अपने लक्ष्य से कभी विचलित नहीं कर सका। उनका जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि राष्ट्रभक्ति केवल शब्दों से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि त्याग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साहस और बलिदान से सिद्ध होती है! आज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब देश की नई पीढ़ी आधुनिकता और तकनीकी सुविधाओं के बीच अपना भविष्य गढ़ रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब उसे यह भी जानना चाहिए कि स्वतंत्र भारत की यह खुली हवा किसी संयोग का परिणाम नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि चन्द्रशेखर आज़ाद जैसे असंख्य अमर बलिदानियों के रक्त से सिंचित विरासत है। यदि नई पीढ़ी उनके जीवन से प्रेरणा ग्रहण करेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्तव्यबोध और स्वाभिमान की भावना और अधिक सशक्त होगी।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मात्र पच्चीस वर्ष की आयु में उन्होंने अपने रक्त से मातृभूमि की स्वतंत्रता का अभिषेक कर दिया। उनकी शहादत ने पूरे देश में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध विद्रोह की ज्वाला और प्रचंड कर दी। अंग्रेज़ी सरकार यह समझ चुकी थी कि यदि क्रांतिकारियों की विचारधारा को समय रहते नहीं रोका गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसका भारत पर शासन अधिक दिनों तक टिक नहीं सकेगा। यही कारण था कि कुछ ही दिनों बाद भगत सिंह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजगुरु और सुखदेव को भी निर्धारित तिथि से पहले गुप्त रूप से फांसी दे दी गई।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इन अमर बलिदानियों ने यह सिद्ध कर दिया कि मातृभूमि के सम्मान के लिए मृत्यु भी जीवन से अधिक गौरवशाली हो सकती है। उन्होंने सत्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धन और प्रलोभनों को ठुकराकर अपने प्राण राष्ट्र को समर्पित कर दिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए उनका बलिदान भारतीय इतिहास की सबसे उज्ज्वल धरोहर है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यह संकल्प लिया गया था कि देश अपने शहीदों के बलिदान को सदैव स्मरण रखेगा। समय-समय पर उनके सम्मान में कार्यक्रम आयोजित होंगे और नई पीढ़ी को उनके आदर्शों से परिचित कराया जाएगा। किंतु समय बीतने के साथ अनेक स्थानों पर शहीद स्मरण समारोह केवल औपचारिकता बनकर रह गए। कहीं वे राजनीतिक शक्ति-प्रदर्शन का मंच बन गए तो कहीं राष्ट्रभावना की अपेक्षा दलगत हित अधिक महत्वपूर्ण हो गए। यह स्थिति उन महान बलिदानियों के प्रति हमारी कृतज्ञता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज की सबसे बड़ी चिंता यह नहीं है कि युवा आधुनिक तकनीक से जुड़ रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह है कि वे अपने इतिहास और अपने राष्ट्र नायकों से दूर होते जा रहे हैं। वर्ष में केवल दो राष्ट्रीय पर्वों पर सोशल मीडिया पर संदेश या तिरंगे की तस्वीर लगा देना देशभक्ति का प्रमाण नहीं हो सकता। सच्ची राष्ट्रभक्ति तब जागृत होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब युवा अपने राष्ट्र के इतिहास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संविधान और उन महापुरुषों को जानता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनके त्याग के कारण वह स्वतंत्र भारत में सम्मानपूर्वक जीवन जी रहा है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">विडंबना यह भी है कि आज का युवा देश विदेश के पर्यटन स्थलों की यात्रा तो करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किंतु चन्द्रशेखर आज़ाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगत सिंह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रामप्रसाद बिस्मिल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुखदेव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजगुरु और अन्य महान क्रांतिकारियों की जन्मस्थलियों तथा स्मारकों तक पहुँचने की प्रेरणा उसके भीतर बहुत कम दिखाई देती है। </span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब तक नई पीढ़ी अपने वास्तविक नायकों को नहीं जानेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तक राष्ट्रप्रेम केवल नारों तक सीमित रहने का खतरा बना रहेगा।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल क्रांति के युग में सूचना का अभाव नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन प्रेरणा का संकट अवश्य दिखाई देता है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास और उसके महानायक केवल पाठ्य पुस्तकों तक सीमित न रहें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उन्हें शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मीडिया और सार्वजनिक जीवन के माध्यम से नई पीढ़ी के चरित्र निर्माण का आधार बनाया जाए।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सरकारों का भी यह दायित्व है कि अमर शहीदों के जीवन-दर्शन को विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में अधिक व्यापक रूप से स्थान दिया जाए। शहीद स्मारकों को केवल औपचारिक आयोजन स्थलों के बजाय राष्ट्रीय प्रेरणा केंद्र बनाया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां युवा पीढ़ी जाकर अपने इतिहास को अनुभव कर सके। राष्ट्र के लिए सर्वस्व न्योछावर करने वाले इन महानायकों की स्मृति राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय चेतना का स्थायी प्रतीक बननी चाहिए।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वास्तव में</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">चन्द्रशेखर आज़ाद का जीवन केवल भारत के युवाओं के लिए ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि संपूर्ण विश्व की युवा पीढ़ी के लिए साहस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वाभिमान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रनिष्ठा और चरित्रबल की अमर गाथा है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">उनके जीवन का प्रत्येक अध्याय यह सिखाता है कि राष्ट्र सबसे ऊपर है और व्यक्ति का सर्वोच्च धर्म अपने कर्तव्य का ईमानदारी से पालन करना है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि हम सचमुच चाहते हैं कि भारत की युवा पीढ़ी नशे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपराध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिंसा और नैतिक पतन से दूर रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसे आधुनिक तकनीक के साथ-साथ चन्द्रशेखर आज़ाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगत सिंह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रामप्रसाद बिस्मिल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुखदेव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजगुरु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ और अन्य अमर क्रांतिकारियों की शौर्यगाथाएँ भी सुनानी होंगी। यह केवल सरकार का नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि प्रत्येक परिवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज और जागरूक नागरिक का भी राष्ट्रीय दायित्व है। शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद की </span>120<span lang="hi" xml:lang="hi">वीं जयंती पर उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके विचारों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्याग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वाभिमान और राष्ट्रप्रेम को आने वाली पीढ़ियों के मन-मस्तिष्क में अंकित करें। जिस दिन भारत का युवा आज़ाद के आदर्शों को अपने जीवन का मार्गदर्शन बना लेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी दिन स्वतंत्र भारत की वास्तविक आत्मा और अधिक सशक्त होकर विश्व के सामने खड़ी होगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अरविंद रावल</span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 22 Jul 2026 22:21:55 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>भारत की एकता और प्रगति के प्रति समर्पित एक जीवन-प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">आज, 6 जुलाई का दिन राष्ट्रवाद और निस्वार्थ सेवा के आदर्शों में विश्वास रखने वाले करोड़ों देशवासियों के लिए बहुत ही विशेष है। आज हम डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जन्म-जयंती मना रहे हैं। उनका जीवन साहस और मां भारती के प्रति अटूट समर्पण का प्रेरणादायक उदाहरण है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के व्यक्तित्व में विद्वता, जनसेवा और उच्च नैतिक मूल्यों का अद्भुत संगम था। आधुनिक भारत के कुछ ही नेताओं में इतने सारे गुण एक साथ देखने को मिलते हैं। </div>
<div style="text-align:justify;">श्यामा प्रसाद जी का जन्म ऐसे परिवार में हुआ था, जहां उन्हें सुख-सुविधाओं से भरपूर जीवन आसानी से</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182749/a-life-dedicated-to-the-unity-and-progress-of-india"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/whatsapp-image-2026-07-05-at-17.40.45.jpeg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">आज, 6 जुलाई का दिन राष्ट्रवाद और निस्वार्थ सेवा के आदर्शों में विश्वास रखने वाले करोड़ों देशवासियों के लिए बहुत ही विशेष है। आज हम डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जन्म-जयंती मना रहे हैं। उनका जीवन साहस और मां भारती के प्रति अटूट समर्पण का प्रेरणादायक उदाहरण है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के व्यक्तित्व में विद्वता, जनसेवा और उच्च नैतिक मूल्यों का अद्भुत संगम था। आधुनिक भारत के कुछ ही नेताओं में इतने सारे गुण एक साथ देखने को मिलते हैं। </div>
<div style="text-align:justify;">श्यामा प्रसाद जी का जन्म ऐसे परिवार में हुआ था, जहां उन्हें सुख-सुविधाओं से भरपूर जीवन आसानी से मिल सकता था। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी की गिनती अपने समय के महान शिक्षाविदों में होती थी। लेकिन तमाम सुविधाओं के बावजूद श्यामा प्रसाद जी ने त्याग और राष्ट्रसेवा का मार्ग चुना। उनका दृढ़ विश्वास था कि चाहे अंग्रेजी शासन का विरोध हो, सांप्रदायिकता से लड़ाई हो या मानवीय संकटों का सामना, वे अपने समय की इन चुनौतियों के सामने मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकते। इस सफर में उन्हें कई गहरे व्यक्तिगत दुख भी झेलने पड़े। पहले उन्होंने अपने छोटे बच्चे को खोया और बाद में पत्नी का भी निधन हो गया। लेकिन इन दुखद परिस्थितियों में भी उन्होंने अपने हौसले को कमजोर नहीं पड़ने दिया। उनका संकल्प और सशक्त हुआ, राष्ट्रसेवा के प्रति समर्पण और गहरा होता गया। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य भारत की एकता और अखंडता की रक्षा करना था। देश के विभाजन के समय उन्होंने पश्चिम बंगाल को भारत का अभिन्न अंग बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कुछ वर्षों बाद इसी उद्देश्य से उन्होंने जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर भी संघर्ष किया। जेल और नजरबंदी भी उन्हें रास्ते से डिगा नहीं सकी। जब नजरबंदी के दौरान उनका निधन हुआ, तब वे उन अनगिनत लोगों से बहुत दूर थे, जिनके लिए वे जीवनभर संघर्ष करते रहे। इतिहास में कुछ ऐसे पल आते हैं, जब किसी व्यक्ति का सर्वोच्च बलिदान राजनीति से ऊपर उठकर देश की स्मृति का हिस्सा बन जाता है। डॉ. मुखर्जी का बलिदान भी ऐसा ही था। आचार्य विनोबा भावे ने कहा था कि डॉ. मुखर्जी ने उस उद्देश्य के लिए अपना बलिदान दिया, जिस पर उन्हें पूरा विश्वास था। दशकों बाद, साल 2019 में आर्टिकल 370 और 35(A) को हटाया जाना उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि थी। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डॉ. मुखर्जी ने हमेशा राष्ट्रहित और भारतीय मूल्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। इसके लिए उन्होंने मजबूत संस्थानों का निर्माण किया और ऐसी व्यवस्थाएं बनाईं, जो उस समय की सोच से काफी आगे थीं। वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बने। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में ऐसे बदलाव किए, जो राष्ट्रहित और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप थे। शिक्षाविदों के एक सम्मेलन में डॉ. मुखर्जी ने कहा था, ‘’शिक्षण संस्थानों को केवल बाबू या कम वेतन वाले कर्मचारी तैयार करने की फैक्ट्री समझना गलत है। हमें विद्यार्थियों को ऐसे तैयार करना होगा ताकि वे नेतृत्व की भूमिका निभा सकें। हमारी स्वशासी संस्थाओं जैसे म्युनिसिपल कॉरपोरेशन्स, प्रांतीय और केंद्रीय विधायिकाओं में बड़ी जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार हो सकें। इसके साथ ही वे वित्त, व्यापार और उद्योग जैसे क्षेत्रों में भी अपनी प्रतिभा दिखा सकें।’’</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कलकत्ता विश्वविद्यालय में अपने नेतृत्व में उन्होंने कई महत्वपूर्ण कार्य किए। इनमें लाइब्रेरी की सुविधाओं में सुधार, विज्ञान में रिसर्च को बढ़ावा देना, ऐतिहासिक वस्तुओं के अध्ययन को प्रोत्साहित करना और कृषि से जुड़े पाठ्यक्रम शुरू करना शामिल था। उन्होंने खेलकूद, टीचर्स ट्रेनिंग और स्टूडेंट वेलफेयर जैसे क्षेत्रों पर भी विशेष ध्यान दिया। विद्यार्थियों में अपनी यूनिवर्सिटी के प्रति गर्व की भावना विकसित हो, इसके लिए उन्होंने 24 जनवरी को विश्वविद्यालय का स्थापना दिवस मनाने की परंपरा शुरू की। उन्होंने गुरुदेव टैगोर से विश्वविद्यालय के लिए एक गीत लिखने का अनुरोध भी किया था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उनके जीवन के बाद के वर्षों में इस भावना का एक और उदाहरण तब देखने को मिला, जब उन्होंने भारतीय जनसंघ बनाने का निर्णय लिया। उस समय देश में हर तरफ कांग्रेस पार्टी का ही बोलबाला था। ऐसे में उन्होंने महसूस किया कि देश को एक ऐसे नए विकल्प की बहुत जरूरत है, जो भारत की प्रगति की बात भी करे और हमारी सांस्कृतिक जड़ों से भी जुड़ा रहे। शायद इसी को ध्यान में रखते हुए पार्टी का चुनाव चिह्न 'दीपक' यानि मिट्टी का दीया रखा गया। एक अकेला दीया देखने में भले ही छोटा लगे, लेकिन उसमें अपने आस-पास के गहरे से गहरे अंधकार को मिटाने की अद्भुत शक्ति होती है। जनसंघ ने अपने सक्रिय काल में और उसके बाद भी बिल्कुल यही किया। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का भारत के पहले उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में कार्यकाल बेहद अहम रहा। उन्हें एक ऐसे राजनेता के रूप में याद किया जाता है, जिनका विजन बहुत विराट था। वे उद्योग को नए-नए आजाद हुए भारत के लोगों में सम्मान, अवसर और आत्मविश्वास का संचार करने का सशक्त माध्यम मानते थे। वे वेल्थ और वैल्यू क्रिएशन के महत्व को भली-भांति समझते थे। उन्होंने दामोदर वैली कॉरपोरेशन, सिंदरी उर्वरक संयंत्र और मजबूत औद्योगिक नीति जैसी ऐतिहासिक पहल की। इसके माध्यम से आधुनिक औद्योगिक भारत की नींव रखी। इसके साथ ही उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि भारत के पारंपरिक सामर्थ्य की कभी उपेक्षा न हो। वे हथकरघा, कुटीर उद्योग, कारीगरों और कपड़ा उद्योग से जुड़े श्रमिकों के हितों के भी प्रबल समर्थक थे।  </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यहां मैं अपना एक निजी अनुभव भी साझा करना चाहता हूं। आत्मनिर्भर भारत के स्पष्ट विजन के साथ जिस सिंदरी संयंत्र की स्थापना के लिए डॉ. मुखर्जी ने अथक प्रयास किए थे, उसकी कई दशकों तक सत्ता में रहने वाले लोगों ने घोर उपेक्षा की। मुझे इस बात का संतोष है कि हमारी सरकार को उसके पुनरुद्धार का सौभाग्य मिला। उस कार्यक्रम में उपस्थित होना मेरे सार्वजनिक जीवन के सबसे विशेष और अविस्मरणीय क्षणों में से एक बन गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत की प्राचीन परंपरा सदियों से संवाद और विचार-विमर्श का सम्मान करती आई है। डॉ. मुखर्जी इस लोकतांत्रिक भावना के सशक्त प्रतीक थे। उन्होंने पंडित नेहरू के मंत्रिमंडल में शामिल होना इसलिए स्वीकार किया, क्योंकि वे मानते थे कि देश की आजादी के शुरुआती वर्षों में राष्ट्र निर्माण का दायित्व राजनीतिक मतभेदों से कहीं ऊपर है। उन्होंने पूरी निष्ठा और रचनात्मक दृष्टिकोण के साथ अपनी जिम्मेदारियों को  निभाया। लेकिन जब उन्हें लगा कि राष्ट्रीय महत्व के कुछ प्रश्नों पर देशहित में अलग मार्ग अपनाना आवश्यक है, तो उन्होंने पूरी गरिमा के साथ अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन उस राजनीतिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए समर्पित कर दिया, जिसे वे राष्ट्र के लिए आवश्यक मानते थे।  </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">75 वर्ष पहले पंडित नेहरू पहला संविधान संशोधन लेकर आए। इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर सीधा प्रहार माना गया। तब डॉ. मुखर्जी इसके सबसे मुखर आलोचक रहे थे। वे भली-भांति समझ चुके थे कि कांग्रेस किस हद तक जा सकती है। समय के साथ उनकी यह आशंका सही साबित हुई। जो पार्टी 75 वर्ष पहले पहला संविधान संशोधन लेकर आई थी, उसी ने 1975 में देश पर आपातकाल थोपा। इतना ही नहीं, 50 वर्ष पहले 42वां संविधान संशोधन अधिनियम लाकर एक बार फिर लोकतांत्रिक मूल्यों की बुनियाद पर कुठाराघात किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डॉ. मुखर्जी अपनी मानवीय संवेदनाओं और सेवाभाव के लिए भी विशेष रूप से जाने जाते हैं। वर्ष 1943 में जब बंगाल भीषण अकाल की त्रासदी से जूझ रहा था, तब उन्होंने पीड़ितों की सेवा में स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर दिया था। उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि लोगों को भोजन मिल सके, जिसके लिए कई कैंटीन और रिलीफ सेंटर शुरू किए गए। एक ओर वे लोगों की पीड़ा से बहुत व्यथित थे, वहीं दूसरी ओर ब्रिटिश हुकूमत की असंवेदनशीलता से अत्यंत आक्रोशित भी थे। उन्होंने अपनी पीड़ा को व्यक्त करने के लिए पंचाशेर मन्वंतर नाम की एक किताब भी लिखी। 1942 में जब मेदिनीपुर में भीषण चक्रवात आया, तब उन्होंने प्रभावित क्षेत्रों में राहत कार्यों का नेतृत्व किया। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कोलकाता के एक कॉलेज में युवाओं को संबोधित करते हुए डॉ. मुखर्जी ने उनसे आग्रह किया था, ‘’आप जो भी कार्य करें, उसे पूरी गंभीरता, लगन और ईमानदारी से करें। किसी भी काम को कभी अधूरा न छोड़ें। तब तक स्वयं को संतुष्ट न मानें, जब तक आपने उसमें अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान न दे दिया हो।’’ आज हमारा देश विकसित भारत के लक्ष्य की ओर तेजी से आगे बढ़ रहा है। ऐसे में उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम प्रतिदिन उस भारत के निर्माण की दिशा में निरंतर प्रयास करें, जिसकी उन्होंने परिकल्पना की थी। एक ऐसा भारत जो सशक्त हो, एकजुट हो, आत्मविश्वास से भरपूर और संवेदनशील हो। देश के युवाओं पर मुझे पूरा विश्वास है कि वे इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए बढ़-चढ़कर भागीदारी करेंगे और इस संकल्प को साकार करने के लिए पूरी ऊर्जा के साथ जुट जाएंगे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<blockquote class="format1"><strong>प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी</strong></blockquote>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 05 Jul 2026 17:49:56 +0530</pubDate>
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                <title>डांसिंग गर्ल: जिसे ढककर हम खुद को उजागर कर बैठे</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इतिहास बदलने के लिए बड़े फैसलों की जरूरत नहीं होती</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी-कभी एक छोटी-सी शेडिंग ही काफी है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सिंधु घाटी सभ्यता की कांस्य प्रतिमा "डांसिंग गर्ल" आज इसी कारण विवाद में है। मोहनजोदड़ो से प्राप्त लगभग </span>4500 <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्ष पुरानी (</span>2500-2300 <span lang="hi" xml:lang="hi">ईसा पूर्व) यह प्रतिमा भारतीय पुरातत्व की महत्वपूर्ण धरोहरों में गिनी जाती है। एक हाथ कमर पर रखे आत्मविश्वास से खड़ी यह किशोरी केवल कलाकृति नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उस सभ्यता की सहजता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कलाबोध और आत्मविश्वास का प्रमाण है। हाल ही में एनसीईआरटी</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की कक्षा </span>9 <span lang="hi" xml:lang="hi">की कला शिक्षा पुस्तक ‘मधुरिमा’ में उसके नग्न धड़</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181457/the-dancing-girl-whom-we-covered-and-exposed-ourselves-to"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/dancing-girl.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इतिहास बदलने के लिए बड़े फैसलों की जरूरत नहीं होती</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी-कभी एक छोटी-सी शेडिंग ही काफी है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सिंधु घाटी सभ्यता की कांस्य प्रतिमा "डांसिंग गर्ल" आज इसी कारण विवाद में है। मोहनजोदड़ो से प्राप्त लगभग </span>4500 <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्ष पुरानी (</span>2500-2300 <span lang="hi" xml:lang="hi">ईसा पूर्व) यह प्रतिमा भारतीय पुरातत्व की महत्वपूर्ण धरोहरों में गिनी जाती है। एक हाथ कमर पर रखे आत्मविश्वास से खड़ी यह किशोरी केवल कलाकृति नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उस सभ्यता की सहजता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कलाबोध और आत्मविश्वास का प्रमाण है। हाल ही में एनसीईआरटी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की कक्षा </span>9 <span lang="hi" xml:lang="hi">की कला शिक्षा पुस्तक ‘मधुरिमा’ में उसके नग्न धड़ को शेडिंग से ढक दिया गया। मामूली दिखने वाला यह बदलाव राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया। सवाल प्रतिमा का नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस दृष्टि का है जिससे हम अपने अतीत को देख रहे हैं। क्या हम इतिहास को उसके वास्तविक रूप में स्वीकार कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या उसे अपने समय की नैतिक कसौटियों के अनुरूप बदल रहे हैं</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">डांसिंग गर्ल केवल प्रतिमा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक सभ्यता का आत्मविश्वास है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लॉस्ट-वैक्स तकनीक से बनी यह </span>10.5 <span lang="hi" xml:lang="hi">सेंटीमीटर कांस्य मूर्ति दिखाती है कि सिंधु सभ्यता धातु-कला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सौंदर्य-बोध और रचनात्मकता में कितनी विकसित थी। उसकी मुद्रा उस समाज की सहजता का प्रमाण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ शरीर संकोच का विषय नहीं था। दशकों तक यह प्रतिमा एनसीईआरटी की पुस्तकों में बिना बदलाव प्रकाशित होती रही और लाखों विद्यार्थियों ने इसे इतिहास के प्रमाण के रूप में देखा। ऐसे में अचानक इसे "उम्र के अनुकूल" बनाने की जरूरत क्यों महसूस हुई</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्या इतिहास को इतिहास की तरह दिखाना अब पर्याप्त नहीं है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यह बदलाव केवल चित्र का नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उस सोच का है जो अतीत को उसकी वास्तविकता से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि वर्तमान की असहजताओं से परिभाषित करती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह बदलाव केवल संपादन नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इतिहास की पुनर्रचना जैसा है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इतिहासकार मिशेल डैनिनो ने इसकी कड़ी आलोचना करते हुए इसे "सेंसरशिप" और "फर्जी कलाकृति" का निर्माण बताया। उनका तर्क था कि किसी ऐतिहासिक वस्तु का मूल रूप बदलने पर विद्यार्थी वास्तविक इतिहास नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उसका संपादित संस्करण देखते हैं—यह बौद्धिक अन्याय है। उन्होंने इसे प्राचीन भारत पर विक्टोरियन नैतिकता थोपने की कोशिश भी कहा। विडंबना यह है कि जिस सभ्यता ने कला को सहज स्वीकार किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके प्रतीकों पर आज कृत्रिम शालीनता लादी जा रही है। जबकि इतिहास का काम सुविधा के अनुसार बदलना नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि असुविधाजनक सच्चाइयों से रूबरू कराना है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह विवाद भारतीय सांस्कृतिक परंपरा की समझ पर सवाल खड़ा करता है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">खजुराहो के मंदिर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोणार्क का सूर्य मंदिर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अजंता-एलोरा की चित्रकला और गुप्तकालीन मूर्तिशिल्प बताते हैं कि भारतीय कला में मानव शरीर सदैव सौंदर्य और अभिव्यक्ति का माध्यम रहा है। यहाँ नग्नता को अश्लीलता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि स्वाभाविकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सृजन और सौंदर्य का प्रतीक माना गया। कामसूत्र की परंपरा वाली इस सभ्यता में यदि आज अपनी ही कलात्मक विरासत पर असहजता होने लगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो प्रश्न उठता है—बदल इतिहास रहा है या हमारी दृष्टि</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">डांसिंग गर्ल की नग्नता अश्लीलता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस युग की सांस्कृतिक सहजता का प्रमाण है। उसे ढकने का प्रयास उस समझ को ढकने जैसा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने उस कला को जन्म दिया था।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस विवाद की एक और परत भीतर का विरोधाभास खोलती है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एनसीईआरटी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की कक्षा </span>6 <span lang="hi" xml:lang="hi">की सामाजिक विज्ञान पुस्तक में यही प्रतिमा अपने मूल रूप में है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि कक्षा </span>9 <span lang="hi" xml:lang="hi">की कला शिक्षा पुस्तक में उसका संशोधित रूप दिखाया गया है। एक ही संस्था की दो पुस्तकों में एक ही ऐतिहासिक वस्तु के दो अलग-अलग रूप शिक्षा की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाते हैं। क्या हम छात्रों को इतिहास पढ़ा रहे हैं या उसे अपने वर्तमान मानकों के अनुसार ढाल रहे हैं</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यह केवल एक चित्र का मामला नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उस प्रवृत्ति का संकेत है जहाँ पाठ्यक्रम संशोधन के नाम पर इतिहास और पुरातत्व पर वैचारिक दबाव दिखने लगता है। जब तथ्य बदलते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो शिक्षा का आधार कमजोर पड़ता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सांस्कृतिक संवेदनशीलता का तर्क नकारा नहीं जा सकता।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ अभिभावक और शिक्षक मानते हैं कि किशोर विद्यार्थियों के सामने नग्नता का प्रदर्शन सावधानी से होना चाहिए। लेकिन सवाल यह है—समाधान समझाना है या छिपाना</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा का दायित्व संदर्भ देना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि तथ्य बदलना। यदि किसी कलाकृति में नग्नता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो छात्रों को बताया जा सकता है कि प्राचीन कला में उसका अर्थ आधुनिक दृष्टि से अलग था—वह शक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सौंदर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्रता और स्वाभाविकता का प्रतीक भी हो सकती है। हर असहज तथ्य पर शेडिंग चढ़ाते रहेंगे तो अगली पीढ़ी इतिहास नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका सुविधाजनक संस्करण पढ़ेगी। तब पाठ्यपुस्तकें दस्तावेज़ कम और कल्पना अधिक बन जाएँगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा मंत्रालय के स्पष्टीकरण और सार्वजनिक आलोचना के बाद एनसीईआरटी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ने मूल छवि बहाल करने का निर्णय लिया।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल संस्करण में तुरंत संशोधन हुआ और भविष्य की मुद्रित प्रतियों में भी मूल प्रतिमा प्रकाशित करने की घोषणा की गई। यह कदम स्वागत योग्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन सवाल छोड़ता है कि शुरुआत में यह परिवर्तन क्यों किया गया। यह निर्णय दिखाता है कि पाठ्यपुस्तकें अब केवल शैक्षणिक सामग्री नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि वैचारिक संघर्ष का भी हिस्सा बन चुकी हैं। यह घटना याद दिलाती है कि संवेदनशीलता और सेंसरशिप की रेखा बहुत पतली है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और उसे पार करने पर संस्थाओं पर भरोसा कमजोर पड़ सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">डांसिंग गर्ल विवाद किसी प्रतिमा का नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे आत्मविश्वास का है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय संग्रहालय में रखी यह डांसिंग गर्ल हर वर्ष असंख्य विद्यार्थी और पर्यटक देखते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और कोई उसे अश्लीलता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भारतीय सभ्यता की उपलब्धि मानता है। यदि हम अपनी विरासत को उसके वास्तविक रूप में स्वीकार नहीं कर सकते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसके गौरव पर गर्व भी अधूरा है। इतिहास को ढक देने से वह बदलता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल हमारी समझ सीमित होती है। पाठ्यपुस्तकें ज्ञान की खिड़कियाँ हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नैतिकता की दीवारें नहीं। डांसिंग गर्ल को उसकी पूर्ण वास्तविकता के साथ स्वीकार करना ही उस सभ्यता का सच्चा सम्मान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने हजारों वर्ष पहले आत्मविश्वास को कांस्य में ढाल दिया था।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 17:40:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>शौर्य दिवस' पर गूंजी सशस्त्र सलामी, 'विस्मृति से स्मृति' तक पहुंचा इतिहास</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div><div style="text-align:justify;"><strong>बस्ती। </strong>बस्ती जिले में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम 1857 की अमर गाथा और गुमनाम शहीदों की स्मृति को समर्पित तीन दिवसीय "महुआ डाबर महोत्सव-2026" का समापन बुधवार को ऐतिहासिक क्रांति स्थल पर गरिमामय कार्यक्रमों के साथ हुआ। महुआ डाबर संग्रहालय द्वारा आयोजित महोत्सव का तीसरा एवं अंतिम दिन 'शौर्य दिवस' के रूप में मनाया गया।</div><div style="text-align:justify;">इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि 10 जून 1857 को महुआ डाबर के वीर पुरखों ने 6 ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों को मार गिराकर ईस्ट इंडिया कंपनी के अत्याचार के विरुद्ध निर्णायक विद्रोह का बिगुल फूंका था। इसी घटना के प्रतिशोध में 3 जुलाई को अंग्रेजों</div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181124/armed-salute-echoed-on-bravery-day-history-reached-memory-from"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/img-20260613-wa0087.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div><div style="text-align:justify;"><strong>बस्ती। </strong>बस्ती जिले में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम 1857 की अमर गाथा और गुमनाम शहीदों की स्मृति को समर्पित तीन दिवसीय "महुआ डाबर महोत्सव-2026" का समापन बुधवार को ऐतिहासिक क्रांति स्थल पर गरिमामय कार्यक्रमों के साथ हुआ। महुआ डाबर संग्रहालय द्वारा आयोजित महोत्सव का तीसरा एवं अंतिम दिन 'शौर्य दिवस' के रूप में मनाया गया।</div><div style="text-align:justify;">इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि 10 जून 1857 को महुआ डाबर के वीर पुरखों ने 6 ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों को मार गिराकर ईस्ट इंडिया कंपनी के अत्याचार के विरुद्ध निर्णायक विद्रोह का बिगुल फूंका था। इसी घटना के प्रतिशोध में 3 जुलाई को अंग्रेजों ने पूरे गांव को जलाकर लगभग 5000 नागरिकों का नरसंहार किया और महुआ डाबर को 'गैर-चिरागी' घोषित कर दिया था।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">'शौर्य दिवस' के अवसर पर प्रातः 8 बजे क्रांति स्थल पर अमर क्रांतिवीरों की स्मृति में राजकीय सम्मान के साथ सशस्त्र सलामी दी गई। सलामी गारद दल में उपनिरीक्षक नन्हेलाल के नेतृत्व में मुख्य आरक्षी गुलाब चौधरी, संतोष सिंह, प्रभुनाथ चौरसिया, आरक्षी संजीत कुमार यादव, मनोज कुमार, पुष्कर यादव, राजन कुमार, मोहम्मद शकील और रणविजय शामिल रहे। इस दौरान बहादुर चौकी प्रभारी तेज प्रताप सिंह, उपनिरीक्षक विपिन कुमार भट्ट, आरक्षी सचिन यादव, आशीष कुमार राजपूत सहित भारी पुलिस बल मुस्तैद रहा।</div><div style="text-align:justify;">समारोह में भाग लेने आए सैकड़ों लोगों ने महुआ डाबर संग्रहालय का अवलोकन किया। संग्रहालय में रखी 'ट्रेजरी ऑफ नॉलेज' दिखाते हुए निदेशक डॉ. शाह आलम राना ने कहा कि आज आप यहां 'विस्मृति से स्मृति' तक की यात्रा पर हैं। उत्खनन में मिली जली हुई ईंटें, सिक्के, औजार, 1857 के मुकदमों की कार्यवाही और दुर्लभ पुस्तकें दशकों की तपस्या का फल हैं। यह संग्रहालय 5000 शहीदों की स्मृति का जीवंत दस्तावेज है।</div><div style="text-align:justify;">समापन सत्र में 'विरासत संरक्षण संकल्प सभा' का आयोजन किया गया। वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त करते हुए आमजन के पास संरक्षित ब्रिटिशकालीन धरोहरों को महुआ डाबर संग्रहालय को सौंपकर इस ऐतिहासिक धरोहर को और समृद्ध बनाने की अपील की। साथ ही भावी पीढ़ियों को स्वतंत्रता संग्राम के इस गौरवशाली इतिहास से जोड़ने का आह्वान किया।</div><div style="text-align:justify;">कार्यक्रम के अंतिम चरण में महोत्सव को सफल बनाने में योगदान देने वाली उत्कृष्ट प्रतिभाओं, लोक कलाकारों, स्वयंसेवकों एवं सहयोगियों को अंगवस्त्र और प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया। महुआ डाबर की शहीद गाथा पर आधारित लोकगीतों की भावपूर्ण प्रस्तुतियों ने माहौल को भावुक कर दिया।</div><div style="text-align:justify;">अंत में दीप प्रज्वलन कर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। राष्ट्रगान के साथ तीन दिवसीय  गरिमापूर्ण समापन हो गया।</div><div style="text-align:justify;">इस ऐतिहासिक आयोजन में क्षेत्र के गणमान्य नागरिकों, इतिहास प्रेमियों, शोधार्थियों, युवाओं एवं समाजसेवियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया और कार्यक्रम को सफल बनाने में अपना योगदान दिया।</div></div><div class="yj6qo" style="text-align:justify;"><br /></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div></div></div></div><div class="hq gt"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 13 Jun 2026 18:52:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>शांति में शिव हैं हम अशांति में प्रचंड रुद्र </title>
                                    <description><![CDATA[<p><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत, वह पवित्र भूमि जिसने सहस्राब्दियों से शांति, सह-अस्तित्व और संयम को अपनी आत्मा का आधार बनाया है। यह वही देश है जिसने विश्व को</span>  ‘<span lang="hi" xml:lang="hi">वसुधैव कुटुम्बकम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का उदात्त संदेश दिया, जिसने युद्ध के मैदानों में भी मानवता की मर्यादा को सर्वोपरि रखा, और जिसने अपने शत्रुओं को क्षमा करके यह सिद्ध किया कि सच्ची शक्ति विनाश में नहीं, बल्कि संयम और नियंत्रण में निहित है। परंतु इतिहास इस बात का भी साक्षी है कि जब-जब भारत की इस सहनशीलता को कमजोरी समझने की भूल की गई, तब-तब इस शांतिप्रिय राष्ट्र ने रुद्र का रौद्र रूप धारण कर</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/151750/shiva-is-shiva-in-peace"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-05/hindi-divas.jpg" alt=""></a><br /><p><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत, वह पवित्र भूमि जिसने सहस्राब्दियों से शांति, सह-अस्तित्व और संयम को अपनी आत्मा का आधार बनाया है। यह वही देश है जिसने विश्व को</span> ‘<span lang="hi" xml:lang="hi">वसुधैव कुटुम्बकम्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का उदात्त संदेश दिया, जिसने युद्ध के मैदानों में भी मानवता की मर्यादा को सर्वोपरि रखा, और जिसने अपने शत्रुओं को क्षमा करके यह सिद्ध किया कि सच्ची शक्ति विनाश में नहीं, बल्कि संयम और नियंत्रण में निहित है। परंतु इतिहास इस बात का भी साक्षी है कि जब-जब भारत की इस सहनशीलता को कमजोरी समझने की भूल की गई, तब-तब इस शांतिप्रिय राष्ट्र ने रुद्र का रौद्र रूप धारण कर अपने शत्रुओं को उनकी औकात दिखाई है। आज समय फिर उसी मोड़ पर खड़ा है, जब भारत को अपनी शक्ति, शौर्य और संकल्प का परिचय देना पड़ रहा है।</span></p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"> यह परिचय है ऑपरेशन सिंदूर—एक ऐसा अभियान जो भारत की शांति की पुकार को रुद्र तांडव में बदलने की क्षमता रखता है। भारत के सुदर्शन चक्र </span>S 400 <span lang="hi" xml:lang="hi">की ताकत दुनिया देख रही है और आगे भी देखेगी। पाकिस्तान ने युद्ध छेड़ा जरूर है, पर इसे खत्म भारत करेगा। कराची, लाहौर, इस्लामाबाद इत्यादि शहरों में हुई बर्बादी का जिम्मेदार पाकिस्तान स्वयं है। उसने भारत पर ड्रोन और मिसाइल हमला करने की भूल की है। जिसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ेगा। हम शांति और अहिंसा के पुजारी हैं। परन्तु इसका अर्थ दुश्मन यह न निकाले कि हम कमजोर हैं, क्योंकि शांति में शिव हैं हम, अशांति में प्रचंड रुद्र। अपनी पर आएं तो हम तांडव मचा सकते हैं।</span></p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत का इतिहास केवल युद्धों और विजयों की गाथा नहीं, बल्कि शांति और सौहार्द की कहानी है। प्राचीन काल से ही भारत ने विश्व को अहिंसा का मार्ग दिखाया। भगवान बुद्ध और महावीर के उपदेशों से लेकर महात्मा गांधी के सत्याग्रह तक, भारत ने हमेशा संवाद और शांति को प्राथमिकता दी। लेकिन यह वही भारत है जिसने चाणक्य की कूटनीति, शिवाजी के गोरिल्ला युद्ध और रानी लक्ष्मीबाई के अदम्य साहस से यह भी सिद्ध किया कि जब बात मातृभूमि की रक्षा की आती है, तो यह राष्ट्र न केवल शस्त्र उठाता है, बल्कि उसे विजय तक ले जाता है।</span></p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"> आज का भारत एक उभरती हुई वैश्विक शक्ति है, जिसकी आवाज न केवल एशिया में, बल्कि विश्व मंच पर भी गूंजती है। भारत की अर्थव्यवस्था, उसकी तकनीकी प्रगति और उसकी सांस्कृतिक विरासत ने उसे विश्व में एक अनूठा स्थान दिलाया है। परंतु इसके साथ ही भारत की सीमाओं पर चुनौतियां भी बढ़ी हैं। आतंकवाद, सीमापार घुसपैठ और कायराना हमले भारत की शांति को भंग करने की साजिशें हैं। ऐसे में भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह शांति का पुजारी है, पर रुद्र रूप धारण करने से भी नहीं हिचकता।</span></p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi">ऑपरेशन सिंदूर भारत की सैन्य रणनीति का वह स्वरूप है, जो शांति के प्रति भारत की प्रतिबद्धता और आतंकवाद के प्रति उसकी जीरो टॉलरेंस नीति को दर्शाता है। यह कोई साधारण सैन्य अभियान नहीं, बल्कि एक सुनियोजित, लक्षित और प्रभावी कार्रवाई है, जिसका उद्देश्य सीमापार बैठे उन आतंकी ठिकानों को ध्वस्त करना है, जो भारत की धरती पर खून की होली खेलने की साजिश रचते हैं। यह अभियान उन निर्दोष नागरिकों के आंसुओं का प्रतिशोध है, जो आतंकवाद की भेंट चढ़े। यह उन वीर सैनिकों को श्रद्धांजलि है, जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा में अपने प्राण न्योछावर किए।</span></p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"> ऑपरेशन सिंदूर का नाम ही अपने आप में प्रतीकात्मक है।</span> ‘<span lang="hi" xml:lang="hi">सिंदूर</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय संस्कृति में मंगलसूचक और शक्ति का प्रतीक है। यह वह चिह्न है जो भारतीय नारी अपने माथे पर लगाती है, जो उसके सौभाग्य और सम्मान का प्रतीक है। यह वही चिह्न है जिसे मिटाने की कायराना कोशिश गत 22 अप्रैल को आतंकियों ने की थी। सिंदूर जब अपना बदला लेता है तो आतंकियों और उनके आकाओं को मुंह छिपाने की भी जगह नहीं मिलती। ……..और यही तो हुआ। ऑपरेशन सिंदूर भारत की अस्मिता, सम्मान और संप्रभुता की रक्षा का प्रतीक है। यह अभियान उन आतंकियों के माथे पर काल के क्रूर पंजे का तिलक है, जो उनके अंत की शुरुआत करता है।</span></p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi">आज का भारत वह भारत नहीं, जो 1962 के युद्ध में हर आक्रमण का जवाब शांति वार्ताओं से देता था। यह वह भारत है, जिसने 2016 में सर्जिकल स्ट्राइक और 2019 में बालाकोट एयर स्ट्राइक के माध्यम से विश्व को अपनी सैन्य शक्ति और संकल्प का परिचय दिया। ऑपरेशन सिंदूर इस नई सैन्य नीति का अगला कदम है। भारत की नीति अब केवल रक्षात्मक नहीं, बल्कि सक्रिय रक्षात्मक हो चुकी है। इसका अर्थ है कि भारत अब दुश्मन के हमले का इंतजार नहीं करता; वह आतंक की साजिशों को उनके जन्मस्थान पर ही नष्ट कर देता है।</span></p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi">यह नीति भारत की रक्षा तंत्र की परिपक्वता को दर्शाती है। भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना आज विश्व की सबसे आधुनिक और प्रशिक्षित सेनाओं में शुमार हैं। स्वदेशी हथियारों जैसे तेजस लड़ाकू विमान, ब्रह्मोस मिसाइल और अर्जुन टैंक ने भारत को आत्मनिर्भरता की दिशा में एक मजबूत कदम बढ़ाने में मदद की है। इसके साथ ही, भारत की खुफिया एजेंसियां जैसे रॉ और आईबी आतंकवाद के खिलाफ सूचनाओं के आदान-प्रदान में अहम भूमिका निभा रही हैं। ऑपरेशन सिंदूर इन सभी तत्वों का एक समन्वित प्रयास है, जो भारत की सैन्य रणनीति को और सशक्त बनाता है।</span></p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत ने विश्व को बार-बार यह संदेश दिया है कि वह किसी भी देश के खिलाफ युद्ध नहीं चाहता। भारत अपने पड़ोसियों की संप्रभुता का सम्मान करता है और क्षेत्रीय शांति के लिए प्रतिबद्ध है। परंतु यदि भारत की धरती पर आतंक फैलाने की कोशिश की गई, तो भारत चुप नहीं बैठेगा। ऑपरेशन सिंदूर इसी संदेश का प्रतीक है। यह अभियान उन आतंकियों के लिए एक चेतावनी है, जो यह समझते हैं कि वे सीमापार बैठकर भारत को अस्थिर कर सकते हैं। </span></p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आतंकी जहाँ भी छिपे हों, चाहे वह पहाड़ों की गुफाओं में हों या घने जंगलों में, भारतीय सेना उन्हें ढूंढ निकालेगी और उनके लिए यह धरती श्मशान बन जाएगी।यह अभियान किसी धर्म, जाति या देश के खिलाफ नहीं है। भारत का विरोध आतंकवाद से है, न कि किसी संस्कृति या समुदाय से। भारत ने हमेशा विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों को गले लगाया है, और यही उसकी ताकत है। ऑपरेशन सिंदूर का लक्ष्य केवल आतंकवाद को समाप्त करना है, ताकि भारत के नागरिक निडर होकर जी सकें।</span></p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय सेना विश्व की उन गिनी-चुनी सेनाओं में से है, जो हर परिस्थिति में अपने कर्तव्य का निर्वहन करती है। चाहे वह हिमालय की बर्फीली चोटियां हों, थार के तपते रेगिस्तान हों, या पूर्वोत्तर के घने जंगल, भारतीय सैनिक हर मोर्चे पर डटकर मुकाबला करते हैं। वे न त्योहार देखते हैं, न मौसम, न अपनी व्यक्तिगत सुख-सुविधाएं। उनके लिए केवल एक लक्ष्य है—भारत माता की रक्षा।ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय सेना ने जिस साहस और समर्पण का परिचय दिया है, वह हर भारतवासी के लिए गर्व का विषय है। इस अभियान में शामिल जवान केवल सैनिक नहीं, बल्कि भारत की आत्मा के रक्षक हैं। उन्होंने यह ठान लिया है कि आतंकवाद को उसकी जड़ों से उखाड़ फेंकना है, और इसके लिए वे किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।</span></p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi">जब भारतीय सेना सीमाओं पर आतंकवाद के खिलाफ लड़ रही है, तब देश के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह अपने स्तर पर राष्ट्र के प्रति निष्ठा और एकता का परिचय दे। देशभक्ति केवल सोशल मीडिया पर तिरंगा लगाने या नारे लगाने तक सीमित नहीं है। यह तब प्रकट होती है, जब हम सेना के बलिदानों को सम्मान देते हैं, जब हम देश के दुश्मनों के खिलाफ एकजुट होते हैं, और जब हम उन ताकतों का बहिष्कार करते हैं जो भारत को कमजोर करने की साजिश रचती हैं।देशवासियों को चाहिए कि वे अफवाहों से बचें, सेना पर पूर्ण विश्वास रखें और उन तत्वों को पहचानें जो आतंकवाद का प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन करते हैं। हमें यह भी समझना होगा कि आतंकवाद के खिलाफ यह लड़ाई केवल सेना की नहीं, बल्कि हर भारतवासी की है। जब एक सैनिक शहीद होता है, तो एक परिवार उजड़ता है, लेकिन एक राष्ट्र और भी दृढ़ होकर उभरता है।</span></p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत ने विश्व को यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि वह शांति का पुजारी है, पर यदि उसे विवश किया गया, तो वह युद्धभूमि में रुद्र तांडव करने से पीछे नहीं हटेगा। ऑपरेशन सिंदूर इस संदेश का जीवंत प्रमाण है। भारत अब वह राष्ट्र नहीं, जो हर हमले का जवाब चुप्पी से दे। यह वह भारत है, जो आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करता है।हमारे शत्रुओं को यह समझ लेना चाहिए कि भारत शांति चाहता है, पर यदि उसकी शांति को कमजोरी समझा गया, तो उसका जवाब इतना प्रचंड होगा कि पीढ़ियां उसे याद रखेंगी। भारत का यह तांडव न केवल आतंकियों के लिए, बल्कि उन ताकतों के लिए भी चेतावनी है, जो भारत की एकता और अखंडता को चुनौती देने की हिमाकत करते हैं।</span></p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत कोई आक्रांता नहीं, न ही विस्तारवादी राष्ट्र है। भारत वह देश है, जो विश्व शांति की कामना करता है, जो सभी देशों के साथ मित्रता और सहयोग का हाथ बढ़ाता है। परंतु जब बात उसकी संप्रभुता, उसके नागरिकों की सुरक्षा और उसकी अस्मिता की आती है, तो भारत रुद्र बन जाता है। ऑपरेशन सिंदूर इस रुद्र रूप का प्रतीक है। यह भारत की उस अटल प्रतिबद्धता का प्रमाण है, जो आतंकवाद को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेगी।आज हर भारतवासी को गर्व है कि हमारी सेना, हमारी सरकार और हमारा राष्ट्र आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होकर लड़ रहा है। यह समय है एकता का, यह समय है संकल्प का, और यह समय है भारत के शौर्य को विश्व के सामने प्रदर्शित करने का।</span> </p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Fri, 09 May 2025 16:35:37 +0530</pubDate>
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