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                <title>hindu mushlim - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>देश की अखंडता और संप्रभुता पर सवाल उठाने वाले: धर्म और संप्रदाय में बंटता व्यक्ति विशेष</title>
                                    <description><![CDATA[<div>  </div>
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<div>  </div>
<div>भारत का गौरव उसकी अखंडता और संप्रभुता है। यह वह धरोहर है जिसने सदियों से हमें एकजुट रखा। लेकिन आज जब व्यक्ति विशेष अपने स्वार्थ, धर्म और संप्रदाय की सीमाओं में बँधकर राष्ट्रहित से ऊपर उठने से इंकार करता है, तब यह न केवल देश की एकता के लिए खतरा है बल्कि इतिहास की उन गलतियों को दोहराने जैसा है जिनसे हमें पहले भी कष्ट सहना पड़ा है।</div>
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<h4><strong>  अखंडता और संप्रभुता का अर्थ</strong></h4>
<div>  </div>
<div>अखंडता केवल भौगोलिक सीमाओं की बात नहीं करती, बल्कि यह हमारे विचार, संस्कृति और सामाजिक ताने-बाने की भी एकजुटता है। संप्रभुता का अर्थ है—किसी बाहरी दबाव के</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/154771/a-person-divided-into-religion-and-sect-questioning-the-integrity"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-09/1002855097.jpg" alt=""></a><br /><div> </div>
<div> </div>
<div> </div>
<div>भारत का गौरव उसकी अखंडता और संप्रभुता है। यह वह धरोहर है जिसने सदियों से हमें एकजुट रखा। लेकिन आज जब व्यक्ति विशेष अपने स्वार्थ, धर्म और संप्रदाय की सीमाओं में बँधकर राष्ट्रहित से ऊपर उठने से इंकार करता है, तब यह न केवल देश की एकता के लिए खतरा है बल्कि इतिहास की उन गलतियों को दोहराने जैसा है जिनसे हमें पहले भी कष्ट सहना पड़ा है।</div>
<div> </div>
<h4><strong> अखंडता और संप्रभुता का अर्थ</strong></h4>
<div> </div>
<div>अखंडता केवल भौगोलिक सीमाओं की बात नहीं करती, बल्कि यह हमारे विचार, संस्कृति और सामाजिक ताने-बाने की भी एकजुटता है। संप्रभुता का अर्थ है—किसी बाहरी दबाव के बिना स्वतंत्र निर्णय लेने की शक्ति।</div>
<div>डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान सभा में कहा था—</div>
<div>“हमारे राजनीतिक लोकतंत्र की सफलता तभी संभव है जब हम सामाजिक और आर्थिक जीवन में भी समानता और एकता बनाए रखें।”</div>
<div> </div>
<h4><strong> धर्म-संप्रदाय की आड़ में विभाजन</strong></h4>
<div> </div>
<div>
<blockquote class="format1">
<div>आज धर्म और संप्रदाय के नाम पर विभाजन की राजनीति और सामाजिक दरारें सबसे बड़ी चुनौती हैं।</div>
<div>कभी मंदिर-मस्जिद के विवाद को हवा दी जाती है।</div>
<div>कभी जातीय पहचान को चुनावी हथियार बनाया जाता है।</div>
<div>कभी क्षेत्रीय अस्मिता के नाम पर विद्वेष फैलाया जाता है।</div>
<div>यह सब केवल राष्ट्र की एकता को कमजोर करता है। महात्मा गांधी ने चेताया था—</div>
<div>“धर्मों के बीच नफ़रत फैलाना इंसानियत के खिलाफ सबसे बड़ा अपराध है।”</div>
</blockquote>
</div>
<div> </div>
<h4><strong> व्यक्ति विशेष का संकट</strong></h4>
<div> </div>
<div>व्यक्ति विशेष आज संकीर्ण पहचान में इतना उलझा है कि राष्ट्र की व्यापक पहचान को भूलने लगा है।</div>
<div>धर्म के नाम पर श्रेष्ठता की होड़,संप्रदाय की दीवारें,और जाति का बंधन—ये सब मिलकर इंसान को उसकी असली भूमिका से भटका देते हैं। इतिहास गवाह है कि जब व्यक्ति विशेष अपने समुदाय को राष्ट्र से ऊपर रखने लगा, तभी देश कमजोर हुआ।</div>
<div> </div>
<div> </div>
<h4><strong> इतिहास से सबक</strong></h4>
<div> </div>
<div>1. प्राचीन काल – महाभारत का युद्ध केवल ईर्ष्या और अहंकार का परिणाम था, जिसने समूचे आर्यावर्त को हिला दिया।</div>
<div> </div>
<div>2. मध्यकाल – जब-जब राजाओं और रजवाड़ों ने आपसी झगड़े किए, तभी विदेशी आक्रमणकारियों को भारत में पाँव जमाने का मौका मिला।</div>
<div> </div>
<div>3. औपनिवेशिक काल – अंग्रेजों ने “फूट डालो और राज करो” की नीति अपनाई, और हम गुलामी के लंबे दौर में फँस गए।</div>
<div> </div>
<div>कबीर ने लिखा था—</div>
<div>“माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,</div>
<div>कर का मनका छोड़ दे, मन का मनका फेर।”</div>
<div>अर्थात असली बदलाव मन में होना चाहिए, वरना बाहरी कर्मकांड व्यर्थ है। यही संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है।</div>
<div> </div>
<h4><strong> आज के युग की चुनौतियाँ</strong></h4>
<div> </div>
<div>21वीं सदी में वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बीच भारत एक उभरती शक्ति है।</div>
<div>आर्थिक विकास, तकनीकी प्रगति और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति हमें नई ऊँचाइयों पर ले जा रही है।लेकिन आंतरिक विघटन और धर्म-संप्रदाय आधारित राजनीति इस यात्रा को कमजोर कर सकती है।यदि व्यक्ति विशेष अपने संप्रदाय को राष्ट्र से ऊपर रखेगा, तो भारत की अखंडता और संप्रभुता पर सीधा प्रहार होगा।</div>
<div> </div>
<h4><strong> राष्ट्रवाद की सच्ची परिभाषा</strong></h4>
<div> </div>
<div>सच्चा राष्ट्रवाद वह है जिसमें हर नागरिक अपने-अपने धर्म का पालन करते हुए भी राष्ट्र की एकता को सर्वोपरि मानता है।</div>
<div>स्वामी विवेकानंद ने कहा था—</div>
<div>“धर्म का उद्देश्य विभाजन नहीं, बल्कि समन्वय है। अगर कोई धर्म लोगों को तोड़ता है तो वह धर्म नहीं, अज्ञान है।”</div>
<div> </div>
<div> </div>
<h4><strong> साहित्य और संस्कृति की भूमिका</strong></h4>
<div> </div>
<div>भारतीय साहित्य हमेशा से अखंडता का प्रहरी रहा है। तुलसीदास, रहीम, कबीर, प्रेमचंद और निराला तक—सभी ने अपने लेखन में इंसानियत और एकता का संदेश दिया।</div>
<div> </div>
<div>कबीर ने हिंदू-मुस्लिम एकता पर बल दिया।</div>
<div>रहीम ने दान और उदारता का आदर्श प्रस्तुत किया।</div>
<div> </div>
<div>प्रेमचंद ने जातिवाद और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई।</div>
<div>यह साहित्य आज भी हमें याद दिलाता है कि व्यक्ति विशेष की पहचान धर्म या संप्रदाय में नहीं, बल्कि इंसानियत और राष्ट्रभक्ति में है।</div>
<div> </div>
<h4><strong> निष्कर्ष</strong></h4>
<div> </div>
<div>देश की अखंडता और संप्रभुता पर सवाल उठाना राष्ट्र की आत्मा पर सवाल उठाने जैसा है। धर्म और संप्रदाय में बँटा व्यक्ति विशेष राष्ट्र को कभी मजबूत नहीं बना सकता। आज की आवश्यकता यही है कि हम संकीर्णताओं से ऊपर उठें और “भारत” को सर्वोपरि मानें।</div>
<div>क्योंकि अंततः –</div>
<div>“न तो हिंदू, न मुसलमान,</div>
<div>न ही कोई ईसाई है,</div>
<div>भारत की संतानों के लिए</div>
<div>राष्ट्र ही सबसे बड़ी पहचान है।”</div>
<div> </div>
<div> </div>
<div><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2025-09/1002855097.jpg" alt="कबीर ने हिंदू-मुस्लिम एकता पर बल दिया।" width="177" height="258"></img></div>
<div> </div>
<div style="text-align:left;"><br />
<blockquote class="format2"><strong> लेखक – बृजभूषण तिवारी</strong></blockquote>
</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विचारधारा</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 Sep 2025 21:34:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सियासत से लेकर आरक्षण तक… जानें जाति जनगणना से क्या-क्या बदल जाएगा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>नयी दिल्ली </strong></p>
<p style="text-align:justify;">देश में जातिगत जनगणना कराए जाने की मांग को मंजूरी मिल गई है. केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि मोदी सरकार आगामी जनगणना के साथ जातिगत जनगणना कराने का फैसला लिया है. देश में लंबे समय से जातीय जनगणना की मांग की जा रही थी,</p>
<p style="text-align:justify;">जिस पर फाइनल मुहर लग गई है. जातिगत जनगणना में सिर्फ जातियों की संख्या सामने नहीं आएगी बल्कि उनकी सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति का भी पता लगेगा. माना जा रहा है कि जातीय जनगणना के आंकड़े सामने आने के बाद आरक्षण ही नहीं देश की सियासत पर भी असर पड़ेगा?</p>
<h4 style="text-align:justify;"><br /><strong>ओबीसी</strong></h4>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/151578/from-politics-to-reservation%E2%80%A6-know-what-will-change-with-caste"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-05/whatsapp-image-2025-05-01-at-17.12.20_2b420dd6.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नयी दिल्ली </strong></p>
<p style="text-align:justify;">देश में जातिगत जनगणना कराए जाने की मांग को मंजूरी मिल गई है. केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि मोदी सरकार आगामी जनगणना के साथ जातिगत जनगणना कराने का फैसला लिया है. देश में लंबे समय से जातीय जनगणना की मांग की जा रही थी,</p>
<p style="text-align:justify;">जिस पर फाइनल मुहर लग गई है. जातिगत जनगणना में सिर्फ जातियों की संख्या सामने नहीं आएगी बल्कि उनकी सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति का भी पता लगेगा. माना जा रहा है कि जातीय जनगणना के आंकड़े सामने आने के बाद आरक्षण ही नहीं देश की सियासत पर भी असर पड़ेगा?</p>
<h4 style="text-align:justify;"><br /><strong>ओबीसी की आबादी का प्रमाणिक आंकड़ा</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">ओबीसी की आबादी का कोई प्रमाणिक आंकड़ा अभी नहीं है, जो भी बातें और तथ्य रखे जा रहे हैं, वो 1931 की जनगणना के आधार पर. 1931 की जनगणना में पिछड़ी जातियों की आबादी 52 फीसदी से अधिक बताई गई थी. ओबीसी को जिस मंडल आयोग की सिफारिशों पर आरक्षण मिला था, उसने भी ओबीसी की आबादी 52 फीसदी ही मानी थी.</p>
<p style="text-align:justify;">बिहार के जातीय सर्वेक्षण में ओबीसी की जगणना अति पिछड़ा वर्ग और पिछड़ा वर्ग के रूप में की गई. सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक दोनों की संयुक्त आबादी बिहार में 63.13 फीसदी है. इसी तरह तेलंगाना में ओबीसी की आबादी 65 फीसदी जाति सर्वे में सामने आई थी. अब देश में ओबीसी की कुल आबादी कितनी है और किस राज्य में कितनी है, उसका सही आंकड़ा जातिगत जनगणना के बाद सामने आ सकेगा.</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>आरक्षण की 50 फीसदी लिमिट पर पड़ेगा प्रभाव</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">जातिगत जनगणना का सबसे पहला प्रभाव आरक्षण की 50 फीसदी लिमिट पर पड़ेगा. सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण पर 50 फीसदी का कैप लगा रखा है. इसकी वजह से आरक्षण 50 फीसदी से अधिक नहीं हो सकता है. मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू किया गया था तो उस समय ओबीसी की संख्या का कोई प्रमाणिक आंकड़ा नहीं था. ऐसे में ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की गई थी,</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन जातिगत जनगणना के बाद सरकार के पास प्रमाणिक आंकड़ा होगा. ओबीसी की जातियां अपनी जनसंख्या के मुताबिक आरक्षण की मांग कर सकती है. एससी-एसटी को आरक्षण देते समय उनकी जनसंख्या देखी जाती है, लेकिन ओबीसी आरक्षण के साथ ऐसा नहीं है. यहां तक की गरीब सवर्णों को आरक्षण देते समय केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने उनकी जनसंख्या को लेकर कोई आंकड़ा नहीं पेश किया था.</p>
<p style="text-align:justify;">आजादी से पहले 1931 तक जातिगत जनगणना होती रही है. स्वतंत्रता के बाद देश धार्मिक आधार पर दो हिस्सों में बंट गया था. सामाजिक तौर किसी तरह का बंटवारा न हो सके, इसके लिए भारत ने अंग्रेजों की जनगणना नीति में बदलाव कर दिया. आजादी के बाद 1951 से 2011 तक सात बार और भारत में कुल 15 बार जनगणना की जा चुकी है. जनगणना में अल्पसंख्यक, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की गणना की जाती है, लेकिन अन्य दूसरी जातियों की गिनती नहीं होती है. 94 साल के बाद मोदी सरकार ने जातिगत जनगणना कराने का फैसला किया है तो सवाल उठता है कि उसका सियासी प्रभाव क्या-क्या पड़ेगा?</p>
<p style="text-align:justify;"><br />बिहार, तेलंगाना और कर्नाटक में देखा गया है कि पहले जातिगत सर्वे कराए गए और आंकड़ा सामने आने के बाद आरक्षण की लिमिट को बढ़ाने का फैसला किया. बिहार से लेकर तेलंगाना तक में आरक्षण का दायरा बढ़ाया गया. कांग्रेस नेता राहुल गांधी लगातार आरक्षण की 50 फीसदी लिमिट को खत्म करने की मांग उठा रहे हैं. जाति जनगणना के बाद ओबीसी की जातियों को उनकी जनसंख्या के मुताबिक आरक्षण देने का रास्ता साफ हो सकता है. जातीय जनगणना होने से यह पता लगेगा कि देश में किस जाति की कितनी आबादी है. इसके बाद ओबीसी जातिया अपनी जनसंख्या के हिसाब से मांग कर सकती हैं.</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>सियायत की बदल जाएगी तस्वीर</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">जातिगत जनगणना का प्रभाव सियासत पर भी पड़ेगा. मंडल कमीशन लागू होने के बाद देश में ओबीसी जाति आधारित कई राजनीतिक दलों का उदय हुआ है, जिसमें सपा से लेकर आरजेडी, जेडीयू, अपना दल और बसपा जैसी पार्टियां शामिल हैं. यही वजह है कि जातिगत जनगणना के बाद उसका सियासी प्रभाव राजनीति पर भी पड़ेगा. ऐसे मेंसंसद और विधानसभाओं की तस्वीर भी बदल जाएगी, जनगणना में जिन जातियों की संख्या अधिक होगी, वो लामबंद होंगी. इसके बाद राजनीतिक दल चुनावों में उनको अधिक संख्या में उतार सकते हैं, जिससे उनका प्रतिनिधित्व बढ़ेगा. देश के जिन राज्यों में जाति सर्वे हुई हैं, उसमें ओबीसी की संख्या बढ़ाकर सामने आई है. इसके अलावा उच्च जाति खासकर ब्राह्मण और ठाकुरों की संख्या उनके दावे से कम आईं है. देश भर में देखा गया है कि सवर्ण जातियों के विधायक और सांसदों की संख्या घटी है तो दलित और ओबीसी जातियों की बढ़ी है.</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>सरकारी नौकरी से स्कूल-कॉलेज पर असर</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">जातिगत जनगणना के आंकड़े सामने आने के बाद आरक्षण की सीमा बढ़ने का दबाव सरकार पर पड़ेगा. जातिगत जनगणना पर मोदी सरकार के फैसला लेने के बाद राहुल गांधी ने आरक्षण की लिमिट बढ़ाने की मांग उठा दी है. इसके अलावा प्राइवेट संस्थानों में भी आरक्षण की व्यवस्था लागू करने की मांग रखी है. इस तरह से साफ है कि जातीय जनगणना के बाद आरक्षण की बढ़ाने की मांग के साथ-साथ प्राइवेट संस्थानों में भी आरक्षण की मांग जोर पकड़ सकती है. इसका सीधा असर स्कूल कॉलेजों में भी इसका असर दिखाई पड़ सकता है.</p>
<p style="text-align:justify;">आरक्षण की 50 फीसदी की लिमिट हटती है तो स्कूल कॉलेजों में पिछड़ी जातियों के छात्र-छात्राओं की संख्या अधिक दिखाई दे सकती है. वहीं आरक्षण की समय सीमा हटने के बाद से सरकारी नौकरियों में आरक्षण बदलेगा, इससे नई नौकरियों में उन जातियों की संख्या अधिक हो सकती है, जिन जातियों की संख्या सरकारी नौकरियों में कम है, उनकी संख्या बढ़ सकती है. इसके अलावा प्राइवेट संस्थानों में भी अगर आरक्षण लागू होता है तो दलित और ओबीसी समाज के लोग बड़ी संख्या में नजर आएंगे.</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>सीटों का समीकरण बदलेगा</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">जातिगत जनगणना के बाद देश का सियासी स्वरूप बदल सकता है. इसका सीधा असर विधानसभा और लोकसभा क्षेत्रों में भी देखने को मिलेगा. इससे ये पता चल सकेगा कि किस विधानसभा और किस लोकसभा क्षेत्र में किस जाति की कितनी आबादी है. ऐसे में जिस जाति की आबादी ज्यादा होगी, उस पर सियासी दल दांव लगाते हुए नजर आएंगे. इसके अलावा जिस समाज से अभी तक विधायक और सांसद चुने जाते रहे हैं, उनकी आबादी कम होगी तो उनसे सीट छिन सकती है. इसके अलावा दलितों और आदिवासी समुदाय के लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व है, जातिगत आंकड़े सामने आने के बाद उनके लिए आरक्षित सीटें बढ़ सकती है.</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>महिला आरक्षण पर पड़ेगा असर</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">मोदी सरकार महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण का कानून पास करा चुकी है. इसके तहत सरकारी नौकरी और शिक्षण संस्थानों के साथ-साथ विधानसभा और लोकसभा में भी 33 फीसदी महिलाओं को आरक्षण का लाभ मिल सकेगा. जातिगत जनगणना के आंकड़े सामने आने के बाद महिला आरक्षण में ओबीसी, एससी और एसटी महिलाओं के लिए भी आरक्षण की मांग जोर पकड़ सकती है. विपक्ष के तमाम दल लगातार इस बात की मांग करते रहे हैं. कांग्रेस से लेकर सपा, आरजेडी और बसपा तक कोट के अंदर कोटा की मांग करते रहे हैं.</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>सामाजिक तानाबाना पर असर</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">जातिगत जनगणना के फायदों के साथ नुकसान भी हैं. इससे सामाजिक-राजनीतिक चुनौतियां पैदा हो सकती हैं. जातीय जनगणना के आंकड़े समाज में नए विभाजन पैदा कर सकते हैं. इससे समाज का जातिगत विभाजन और गहरा हो सकता है. यह विभाजन हिंसक भी साबित हो सकता है, क्योंकि नब्बे के दशक में मंडल कमीशन को लागू किया गया था और ओबीसी को आरक्षण देने का प्रावधान किया गया तो देश में बड़े पैमाने पर आंदोलन हुआ था. कई जगह लोगों से मारपीट की गई थी और कुछ लोगों ने आत्मदाह का भी प्रयास किया था. ओबीसी और सवर्ण जातियां आमने-सामने आ गई थी और कई जगह टकराव दिखा था. ऐसे में जातिगत जनगणना का असर सामाजिक तानाबना पर भी असर पड़ सकता है. ऐसे में सियासी दल अपने राजनीतिक हित साधने की कवायद कर सकते हैं.</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>वित्त आयोग की सिफारिशें</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">जातिगत जनगणना के वित्त आयोग पर असर कई मायनों में हो सकते हैं. एक तरफ, यह डेटा के आधार पर राज्यों को वित्तीय सहायता प्रदान करने में मदद कर सकता है, जिससे पिछड़े वर्गों के लिए उचित नीतियां बनाई जा सकें तो दूसरी ओर, इस डेटा के आधार पर आरक्षण की मांग बढ़ सकती है, जिससे सामाजिक अशांति भी हो सकती है. जातिगत जनगणना से पता चलेगा कि किन जातियों की स्थिति कैसी है. इससे सरकार को उन जातियों के लिए बेहतर नीतियां बनाने में मदद मिलेगी, ताकि उनकी शिक्षा, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति में सुधार हो सके.</p>
<p style="text-align:justify;">जनगणना के आंकड़े वित्त आयोग को राज्यों को अनुदान देने में मदद करेंगे. इससे राज्यों को सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए अधिक वित्तीय सहायता प्रदान करने में मदद मिलेगी. जातिगत जनगणना से सामाजिक न्याय को बढ़ावा मिलेगा, क्योंकि इससे सरकार को उन वर्गों की स्थिति का पता चल जाएगा जो सामाजिक रूप से पिछड़े हैं. इस जानकारी के आधार पर सरकार उन वर्गों के लिए विशेष योजनाएं बना सकती है, ताकि उन्हें समान अवसर मिल सकें.</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>भारत</category>
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                <pubDate>Thu, 01 May 2025 17:15:44 +0530</pubDate>
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                <title>अब व्यापार के लिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण : शर्बत भी बंटा हिन्दू और मुस्लिम में!</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="gmail_default" style="text-align:justify;"><strong>(आलेख : संजय पराते)</strong></div>
<div class="gmail_quote">
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<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">रामदेव के संघी झुकाव के बारे में सब जानते हैं। सब जानते है कि उसके भगवा चोले के अंदर एक कॉर्पोरेट बैठा हुआ है। रामदेव संघ-भाजपा की हिंदुत्व और कॉर्पोरेट गठजोड़ की राजनीति का नमूना भी है और उसका उत्पाद भी। इस रामदेव को लोगों ने सलवार-कुर्ता में डरकर भागते भी देखा है। इस पहनावे को आम तौर पर मुस्लिमों का पहनावा माना जाता है। कहा जा सकता है कि रामदेव के कायर हिंदुत्व को बचाया मुस्लिम पहनावे ने ही था। लेकिन यही रामदेव आज इस्लाम और मुस्लिमों के बारे में नफरत और डर फैलाने के</div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/150993/now-communal-polarization-sorbet-for-business-is-also-divided-into"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-04/screenshot_2025-04-13-02-50-19-08_a23b203fd3aafc6dcb84e438dda678b6.jpg" alt=""></a><br /><div class="gmail_default" style="text-align:justify;"><strong>(आलेख : संजय पराते)</strong></div>
<div class="gmail_quote">
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<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">रामदेव के संघी झुकाव के बारे में सब जानते हैं। सब जानते है कि उसके भगवा चोले के अंदर एक कॉर्पोरेट बैठा हुआ है। रामदेव संघ-भाजपा की हिंदुत्व और कॉर्पोरेट गठजोड़ की राजनीति का नमूना भी है और उसका उत्पाद भी। इस रामदेव को लोगों ने सलवार-कुर्ता में डरकर भागते भी देखा है। इस पहनावे को आम तौर पर मुस्लिमों का पहनावा माना जाता है। कहा जा सकता है कि रामदेव के कायर हिंदुत्व को बचाया मुस्लिम पहनावे ने ही था। लेकिन यही रामदेव आज इस्लाम और मुस्लिमों के बारे में नफरत और डर फैलाने के उस्ताद बन गए हैं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उनका ताजा बयान है : ''शरबत के नाम पर एक कंपनी है, जो शरबत तो देती है, लेकिन शरबत से जो पैसा मिलता है, उससे मदरसे और मस्जिदें बनवाती है। अगर आप वो शरबत पिएंगे, तो मस्जिद और मदरसे बनेंगे और पतंजलि का शरबत पिएंगे, तो गुरुकुल बनेंगे, आचार्य कुलम बनेगा, पतंजलि विश्वविद्यालय और भारतीय शिक्षा बोर्ड आगे बढ़ेगा। इसलिए मैं कहता हूं ये शरबत जिहाद है. जैसे लव जिहाद, वोट जिहाद चल रहा है, वैसे ही शरबत जिहाद भी चल रहा है।" </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2025-04/screenshot_2025-03-16-17-17-12-03_965bbf4d18d205f782c6b8409c5773a4.jpg" alt="अब व्यापार के लिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण : शर्बत भी बंटा हिन्दू और मुस्लिम में!" width="351" height="373"></img></div>
<div style="text-align:justify;">रामदेव का यह बयान सोशल मीडिया में एक वीडियो के रूप में तैर रहा है। इस बयान में उनका इशारा रूह आफ़ज़ा की ओर है, लेकिन इसकी गुणवत्ता को वे कोई चुनौती नहीं दे रहे हैं। यह एक गैर-एल्कोहोलिक पेय है, जिसे ब्रिटिश भारत के अंतर्गत 1906 में गाजियाबाद में हकीम हाफिज अब्दुल मजीद द्वारा तैयार किया गया था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वे यूनानी दवाओं के विशेषज्ञ थे और उन्होंने कुछ यूनानी जड़ी-बूटियों और सिरप की मदद से एक घोल (शरबत) तैयार किया, जो लोगों को गर्मियों में लू से काफी राहत देता था। लेकिन इस शरबत का मुख्य अवयव गुलाब था। अब इसका निर्माण हमदर्द फार्मास्युटिकल द्वारा किया जा रहा है, जो आज एक नामी-गिरामी कंपनी है। इसके बोतल से जानकारी मिलती है कि आज इसे 8 प्रकार की जड़ी-बूटियों और 8 प्रकार के फलों और सब्जियों के अर्क से बनाया जा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अपने 115 वर्षों की यात्रा के दौरान इसकी गुणवत्ता पर अभी तक कोई आंच नहीं आई है। रूह आफ़ज़ा के समानांतर दिल आफ़्ज़ा नाम का एक भ्रामक उत्पाद भी बाजार में उतारा गया था, जिसकी बिक्री पर दिल्ली हाई कोर्ट ने रोक लगा दी थी, जिसकी पुष्टि बाद ने सुप्रीम कोर्ट ने भी की।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दूसरी बात, रूह आफ़ज़ा के बारे में अभी तक ऐसी कोई अधिकृत रिपोर्ट नहीं है कि इसकी बिक्री से होने वाली आय से इसके निर्माताओं ने मस्जिद या मदरसे का निर्माण किया है, जिसका आरोप रामदेव लगा रहे हैं। उन्हें अपने आरोप का सबूत भी पेश करना चाहिए था। सार्वजनिक रूप से जो जानकारी उपलब्ध है, उसके अनुसार, इस पेय की निर्माता कंपनी हमदर्द एक गैर लाभकारी ट्रस्ट द्वारा संचालित है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह धर्मनिरपेक्ष रुख अपनाती है, क्योंकि यह होली और ईद दोनों पर उत्सव का आयोजन करती है। वर्ष 2008 में इस कम्पनी ने जूही चावला को अपना ब्रांड एम्बेस्डर बनाया था। यदि इसका रुख इस्लाम-आधारित होता, तो वह जूही चावला को कभी भी अपना ब्रांड एंबेसडर नहीं बनाती।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तीसरी बात, रामदेव यह स्पष्ट रूप से कह रहे हैं कि उनके शर्बत से होने वाली आय का उपयोग उस शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए होगा, जिसे संघी गिरोह प्रमोट करना चाहता है, और निश्चित ही, यह शिक्षा वैज्ञानिक मानसिकता पैदा करने से कोसों दूर होगी और वर्णाश्रम आधारित होगी। ऐसी शिक्षा संविधान के बुनियादी मूल्यों के खिलाफ जाती है और रामदेव अपने मुनाफे का उपयोग इस देश की धर्मनिरपेक्षता और संवैधानिक मूल्यों की जड़ों को खोदने के लिए करने के लिए जा रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अब आईए, कुछ बातें रामदेव के पतंजलि के बारे में कर लें। यह कंपनी वर्ष 2006 में रामदेव और उनके चेले बालकृष्ण ने शुरू की थी और आज यह कंपनी टूथपेस्ट से लेकर स्किन केयर तक और बुखार से लेकर टायफाइड तक लगभग सारे उत्पाद बनाती-बेचती है और आज यह कंपनी 10,000 करोड़ रुपये से अधिक की हो गयी है। पतंजलि की विकास गाथा टीवी पर योग के प्रचार से एक कॉर्पोरेट में रामदेव के बदलने की कहानी है। इस बदलाव में लुटेरे और परजीवी पूंजीवाद के छल-कपट-धोखाधड़ी के सारे तत्व मौजूद है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अपने उत्पादों, जिसकी गुणवत्ता हमेशा संदेह के घेरे में और विवादित रही है, को प्रोजेक्ट करने के लिए रामदेव आधुनिक चिकित्सा पद्धति और एलोपैथी को हमेशा गरियाते रहे हैं। कोरोना संकट के समय उनका दावा था कि लाखों मरीजों की मौत एलोपैथी से ट्रीटमेंट के कारण हुई और इसकी जगह उन्होंने वर्ष 2020 में अपनी कोरोनिल को प्रोजेक्ट किया, जो निष्प्रभावी पाई गई और मोदी सरकार के आयुष मंत्रालय को भी इस दवा के 'घटिया होने' के तथ्य को स्वीकार करते हुए इसे प्रतिबंधित करना पड़ा है। इसके पहले, वर्ष 2016 में उनकी पतंजलि कंपनी का आंवला रस जांच में गुणवत्ताहीन पाया गया था और सेना की कैंटीनों से उसे वापस किया गया था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उनके गाय के घी की गुणवत्ता पर भी सवालिया निशान लगा है और वर्ष 2006 में तो माकपा नेता वृंदा करात ने रामदेव पर अपनी दवाओं में इंसानों और जानवरों की हड्डियों को मिलाने का आरोप ही लगा दिया था। यह जानकारी रामदेव के कारखाने में काम करने वाले मजदूरों ने ही उन्हें दी थी। इन मजदूरों का आरोप था कि न तो उन्हें न्यूनतम मजदूरी दी जाती है और न ही श्रम कानूनों का पालन ही किया जाता है। श्रम विभाग की जांच के बाद मजदूरों के ये आरोप सही पाए गए थे। इस प्रकार, रामदेव की संपत्ति मजदूरों की आह और उनके खून-पसीने में लिथड़ी संपत्ति है और पतंजलि का मुनाफा नकली और भ्रामक उत्पादों को बेचकर अर्जित किया गया अनैतिक मुनाफा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">रूह आफ़ज़ा के बरक्स रामदेव जिस गुलाब शर्बत को पेश कर रहे हैं, उसमें भी पतंजलि की कोई खोज या अनुसंधान नहीं है, क्योंकि इसका असली तत्व गुलाब ही है, जिसकी खोज हकीम हाफिज अब्दुल मजीद ने 115 साल पहले ही कर ली थी। इसलिए यह रूह आफ़ज़ा की नकल भर है और पुरानी शर्बत से यह उन्नीस ही बैठेगी, बीस नहीं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लेकिन विवाद नकली और असली या उन्नीस और बीस पेय का नहीं है। विवाद है, पतंजलि के गुलाब शर्बत को प्रोजेक्ट करने के तरीके पर। हमारे संविधान का कोई भी प्रावधान और कानून इसकी इजाजत किसी को नहीं देता कि आप अपने उत्पाद को प्रोजेक्ट करते हुए और अपने व्यवसाय के मुनाफे को बढ़ाने के लिए धर्म के आधार पर नफरत फैलाने, गलतबयानी करने की बात करें और किसी भी पेय को हिंदू पेय और मुस्लिम पेय में बांटने की हिमाकत करें और अपने शर्बत को बेचने के लिए मुस्लिमों पर शर्बत जेहाद फैलाने का आरोप लगाएं। यह वह चालबाजी है, जिसे अंग्रेजों ने अपनाया था और आज रामदेव अपना रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एक स्वतंत्र पत्रकार संजीव शुक्ल ने अपने एक आलेख 'हिंदू शर्बत और मुस्लिम शर्बत' में एक अद्भुत घटना का जिक्र किया है। उनके शब्दों में :</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">"बात तब की है, जब लाल किले पर आजाद हिंद फौज के सैनिकों पर मुकदमा चल रहा था। सभी सैनिकों को यहीं कैद किया गया था। कर्नल सहगल, ढिल्लन और शाहनवाज पर मुकदमा चलाया गया। ये सैनिक भारत के स्वाभिमान के प्रतीक बन चुके थे। पूरा देश इनके साथ खड़ा था। कांग्रेस आजाद हिंद फौज डिफेंस कमेटी बनाकर इन सैनिकों के बचाव में खड़ी हो गई। भिन्न राह होने के बावजूद पूरी कांग्रेस सुभाष बाबू के फौज के सेनानायकों के साथ थी। नेताजी की अनुपस्थिति में नेहरू अपनी जिम्मेदारी से वाकिफ थे। अरसे बाद उन्होंने वकील का चोगा पहना। इन सैनिकों की गिरफ्तारी और उन पर मुकदमा चलाए जाने से पूरा देश आंदोलित था। धर्म और जाति की दीवारें टूट चुकी थीं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पर सरकार इस एकता को तोड़ना चाहती थी। सरकार हमेशा की तरह “बांटो और राज करो” की नीति के तहत राष्ट्रीय एकता को सांप्रदायिक रंग देकर खंडित करना चाहती थी। सैनिकों के लिए सुबह जो चाय आती, उसे हिंदू चाय और मुस्लिम चाय का नाम दिया गया, जबकि सभी सैनिक इस तरह के बंटवारे के सख्त खिलाफ थे। पर सरकार का हुक्म था कि हर हाल में हिंदू चाय अलग बनेगी, मुस्लिम चाय अलग बनेगी और इसी नाम से बांटी जाएगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सुबह-सुबह हांक लगती थी – “हिंदू चाय… मुस्लिम चाय...!” क्रांतिकारी भी इस नफरती व्यवहार को न मानने के लिए कटिबद्ध थे। सो, सुबह चाय आती और क्रांतिकारी उसे एक बड़े बर्तन में मिला देते। फिर बांटकर पी लेते। यह एकता की अद्भुत मिसाल थी।"</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हमारे देश के स्वाधीनता आंदोलन ने धर्म और जाति की जिन दीवारों को तोड़ दिया था, संघ-भाजपा और उसका समर्थक कॉर्पोरेट आज उन्हीं दीवारों को फिर से खड़ा करने में जुटा है, ताकि अपने मुनाफे को अधिकतम और सुरक्षित कर सकें। आज की राजनैतिक चुनौती यही है कि हिंदुत्व की राजनीति के साथ कॉरपोरेटों के इस अपवित्र गठबंधन को मात दी जाएं और इसके लिए जन पक्षधर नीतियों के आधार पर शोषित-उत्पीड़ितों का, आदिवासी-दलितों का, मजदूर-किसानों का एक व्यापक संयुक्त गठबंधन खड़ा किया जाएं। इसमें जितना देर लगेगा, देश की एकता और अखंडता का, शांति और सांप्रदायिक सौहार्द्र का, सामाजिक न्याय, समानता और भाईचारे का उतना ही नुकसान होगा, क्योंकि संघी गिरोह और उनका रामदेव ठीक इन्हीं मूल्यों के खिलाफ खड़ा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
</div>
</div>]]></content:encoded>
                
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                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 14 Apr 2025 16:21:13 +0530</pubDate>
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