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                <title>इफको कॉर्डेट, में नैनो उर्वरकों पर सहकारी प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन।</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
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<div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात।</strong></div>
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<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज </strong></div>
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<div style="text-align:justify;">  इफको कॉर्डेट , फूलपुर, प्रयागराज में आज नैनो उर्वरकों के व्यापक प्रचार-प्रसार एवं किसानों के मध्य इनके प्रभावी उपयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से एक दिवसीय सहकारी प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में प्रयागराज मंडल के सहकारिता विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की तथा नैनो उर्वरकों के उपयोग, लाभ एवं भविष्य की संभावनाओं पर विस्तृत चर्चा की।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">कार्यक्रम के मुख्य अतिथि उप आयुक्त एवं उप निबंधक, सहकारिता प्रयागराज मंडल,  आशीष श्रीवास्तव रहे।</div>
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<div style="text-align:justify;">  विशिष्ट अतिथि के रूप में इफको राज्य कार्यालय, लखनऊ से राज्य विपणन प्रबंधक  यतेन्द्र कुमार तेवतिया उपस्थित रहे।</div>
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<div style="text-align:justify;">अपने</div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184063/organization-of-cooperative-training-program-on-nano-fertilizers-in-iffco"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/img-20260724-wa0065.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
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<div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात।</strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> इफको कॉर्डेट , फूलपुर, प्रयागराज में आज नैनो उर्वरकों के व्यापक प्रचार-प्रसार एवं किसानों के मध्य इनके प्रभावी उपयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से एक दिवसीय सहकारी प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में प्रयागराज मंडल के सहकारिता विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की तथा नैनो उर्वरकों के उपयोग, लाभ एवं भविष्य की संभावनाओं पर विस्तृत चर्चा की।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कार्यक्रम के मुख्य अतिथि उप आयुक्त एवं उप निबंधक, सहकारिता प्रयागराज मंडल,  आशीष श्रीवास्तव रहे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> विशिष्ट अतिथि के रूप में इफको राज्य कार्यालय, लखनऊ से राज्य विपणन प्रबंधक  यतेन्द्र कुमार तेवतिया उपस्थित रहे। इसके अतिरिक्त प्रयागराज मंडल के समस्त अपर जिला सहकारी अधिकारी, सहायक आयुक्त एवं सहायक निबंधक (सहकारिता) तथा विभिन्न जनपदों के सहकारिता विभाग के अधिकारी कार्यक्रम में सम्मिलित हुए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अपने संबोधन में मुख्य अतिथि  आशीष श्रीवास्तव ने कहा कि नैनो उर्वरक भारतीय कृषि के लिए एक क्रांतिकारी तकनीक है, जो कम लागत में अधिक उत्पादन, मृदा स्वास्थ्य संरक्षण तथा पर्यावरण संतुलन की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> उन्होंने किसानों से प्राप्त अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि जिन किसानों ने नैनो उर्वरकों का वैज्ञानिक ढंग से उपयोग किया है, उन्हें उत्पादन एवं गुणवत्ता दोनों में सकारात्मक परिणाम प्राप्त हुए हैं। उन्होंने कहा कि नैनो उर्वरकों को अधिकाधिक किसानों तक पहुँचाने के लिए सचिवों एवं किसानों के स्तर पर नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए, जिससे इनका व्यापक प्रचार-प्रसार सुनिश्चित हो सके।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राज्य विपणन प्रबंधक  यतेन्द्र कुमार तेवतिया ने नैनो यूरिया, नैनो डीएपी एवं अन्य नैनो उर्वरकों की वैज्ञानिक उपयोगिता, उनकी कार्यप्रणाली तथा पारंपरिक उर्वरकों की तुलना में उनके लाभों की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने उपस्थित अपर जिला सहकारी अधिकारियों एवं सहकारिता विभाग के अधिकारियों से आह्वान किया कि वे सहकारी समितियों के माध्यम से नैनो उर्वरकों की उपलब्धता एवं बिक्री को बढ़ावा दें तथा किसानों को इनके उपयोग के लिए प्रेरित करें। उन्होंने कहा कि नैनो उर्वरकों का व्यापक उपयोग आत्मनिर्भर एवं टिकाऊ कृषि व्यवस्था की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कार्यक्रम के दौरान प्रयागराज मंडल के विभिन्न जनपदों से आए अधिकारियों ने भी अपने विचार व्यक्त किए तथा नैनो उर्वरकों के प्रचार-प्रसार एवं सहकारी समितियों के माध्यम से इनके व्यवसाय को सुदृढ़ बनाने के लिए अपने सुझाव प्रस्तुत किए। इस अवसर पर प्रयागराज जनपद से सहायक आयुक्त एवं सहायक निबंधक (सहकारिता)  साधना सिंह, कौशाम्बी जनपद से  श्याम लाल मौर्य तथा प्रतापगढ़ जनपद से  उमाकांत कुशवाहा सहित अन्य अधिकारियों ने नैनो उर्वरकों के उपयोग, किसानों में जागरूकता तथा सहकारी समितियों की भूमिका पर अपने विचार साझा किए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कार्यक्रम में उपस्थित अपर जिला सहकारी अधिकारियों एवं अन्य प्रतिभागियों ने इफको के नैनो उर्वरकों से संबंधित विभिन्न तकनीकी एवं व्यावसायिक विषयों पर प्रश्न पूछे, जिनका समाधान डॉ. डी.के. सिंह, क्षेत्रीय प्रबंधक, इफको प्रयागराज मंडल द्वारा विस्तारपूर्वक एवं सरल भाषा में किया गया। उन्होंने नैनो उर्वरकों की उपयोग विधि, किसानों को होने वाले लाभ, वैज्ञानिक तथ्यों तथा विपणन से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर भी प्रकाश डाला।</div>
<div style="text-align:justify;">इस अवसर पर कॉर्डेट फूलपुर , इफको के प्रधानाचार्य डॉ. विवेक दीक्षित ने संस्थान की प्रशिक्षण व्यवस्था, अनुसंधान गतिविधियों तथा कृषि क्षेत्र में किए जा रहे नवाचारों की विस्तृत जानकारी दी। कार्यक्रम के समापन पर सभी अधिकारियों ने कॉर्डेट परिसर का भ्रमण किया गया । </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कार्यक्रम के समापन पर सभी अधिकारियों ने इफको फूलपुर स्थित नैनो उर्वरक संयंत्र का भ्रमण किया तथा नैनो उर्वरकों के निर्माण की संपूर्ण प्रक्रिया का प्रत्यक्ष अवलोकन किया। अधिकारियों ने यह जाना कि नैनो उर्वरकों का निर्माण किस प्रकार आधुनिक तकनीक एवं वैज्ञानिक गुणवत्ता मानकों के अनुरूप किया जाता है। साथ ही उत्पादन प्रक्रिया, गुणवत्ता नियंत्रण, पैकेजिंग एवं संयंत्र की कार्यप्रणाली की विस्तृत जानकारी प्राप्त की। इस दौरान अधिकारियों ने संयंत्र में अपनाई जा रही अत्याधुनिक तकनीकों की सराहना की तथा इसे भारतीय कृषि के लिए एक महत्वपूर्ण नवाचार बताया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कार्यक्रम के अंत में इफको प्रयागराज के क्षेत्र प्रतिनिधि  प्रतीक चौबे द्वारा सभी अतिथियों, अधिकारियों एवं प्रतिभागियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया गया।</div>
</div>
<div class="yj6qo" style="text-align:justify;"> </div>
<div class="adL" style="text-align:justify;"> </div>
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</div>
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</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 25 Jul 2026 20:36:20 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ते कदम</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">देश में खेती का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। बढ़ती उत्पादन लागत, मिट्टी की घटती उर्वरता, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के दुष्प्रभाव तथा जलवायु परिवर्तन की गंभीर चुनौती ने किसानों को नई राह तलाशने के लिए प्रेरित किया है। यही कारण है कि आज बड़ी संख्या में किसान प्राकृतिक खेती की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। यह बदलाव केवल एक परंपरागत सोच की वापसी नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक शोध और व्यावहारिक अनुभवों से मजबूत हुआ एक नया कृषि आंदोलन बनता जा रहा है। गुजरात के जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय (जेएयू) के हालिया शोध ने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण आधार</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183198/steps-towards-natural-farming"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/images-(2)1.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">देश में खेती का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। बढ़ती उत्पादन लागत, मिट्टी की घटती उर्वरता, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के दुष्प्रभाव तथा जलवायु परिवर्तन की गंभीर चुनौती ने किसानों को नई राह तलाशने के लिए प्रेरित किया है। यही कारण है कि आज बड़ी संख्या में किसान प्राकृतिक खेती की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। यह बदलाव केवल एक परंपरागत सोच की वापसी नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक शोध और व्यावहारिक अनुभवों से मजबूत हुआ एक नया कृषि आंदोलन बनता जा रहा है। गुजरात के जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय (जेएयू) के हालिया शोध ने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण आधार प्रस्तुत किया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक अध्ययन से स्पष्ट हुआ है कि प्राकृतिक खेती न केवल मिट्टी की गुणवत्ता सुधारती है, बल्कि जल संरक्षण, कृषि उत्पादकता, पर्यावरण संतुलन और जलवायु परिवर्तन से मुकाबले में भी प्रभावी भूमिका निभाती है। जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय ने सौराष्ट्र क्षेत्र के विभिन्न जिलों में मिट्टी के नमूनों का वैज्ञानिक विश्लेषण कर प्राकृतिक खेती के प्रभावों का अध्ययन किया।  इस शोध में सामने आया कि जिन खेतों में लगातार पांच वर्षों तक प्राकृतिक खेती अपनाई गई, वहां मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन की मात्रा 0.45 प्रतिशत से बढ़कर 0.93 प्रतिशत तक पहुंच गई। किसी भी कृषि भूमि के लिए ऑर्गेनिक कार्बन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यही मिट्टी की उर्वरता, सूक्ष्मजीवों की सक्रियता और पौधों के पोषण का आधार होता है। ऑर्गेनिक कार्बन बढ़ने का अर्थ है कि मिट्टी अधिक जीवंत, उपजाऊ और दीर्घकाल तक उत्पादन देने में सक्षम हो रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">शोध में यह भी पाया गया कि प्राकृतिक खेती अपनाने वाले खेतों में वर्षा और सिंचाई का पानी पहले की तुलना में कहीं अधिक मात्रा में मिट्टी के भीतर समा रहा है। पानी के समाने की दर 6.50 सेंटीमीटर प्रति घंटा से बढ़कर 14.50 सेंटीमीटर प्रति घंटा हो गई। इससे वर्षा जल का बेहतर संरक्षण संभव हुआ और भूजल पुनर्भरण को भी बढ़ावा मिला। इसी प्रकार मिट्टी की नमी संग्रहण क्षमता 12.75 प्रतिशत से बढ़कर 19.84 प्रतिशत तक पहुंच गई। इसका सीधा लाभ किसानों को सूखे की स्थिति में मिलता है क्योंकि मिट्टी लंबे समय तक नमी बनाए रखती है और फसलों को बार-बार सिंचाई की आवश्यकता कम पड़ती है।</div>
<div style="text-align:justify;">मिट्टी की संरचना में भी उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया। प्राकृतिक खेती वाले खेतों में मिट्टी की छिद्रता 34.63 प्रतिशत से बढ़कर 41.08 प्रतिशत तक पहुंच गई, जिससे पौधों की जड़ों को पर्याप्त हवा और पानी मिलना संभव हुआ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वहीं मिट्टी का घनत्व भी कम हुआ, जिससे भूमि अधिक भुरभुरी और खेती के लिए अनुकूल बनी। ऐसी मिट्टी में जड़ों का विकास बेहतर होता है और पौधे अधिक स्वस्थ रहते हैं। सौराष्ट्र के विभिन्न जिलों में किए गए अध्ययन से यह भी सामने आया कि ऑर्गेनिक कार्बन की मात्रा हर जिले में अलग-अलग है। पोरबंदर की मिट्टी में सबसे अधिक 0.82 प्रतिशत ऑर्गेनिक कार्बन दर्ज किया गया, जबकि गिर सोमनाथ में 0.75 प्रतिशत और जूनागढ़ में 0.72 प्रतिशत पाया गया। दूसरी ओर सुरेंद्रनगर, भावनगर और जामनगर में यह मात्रा अपेक्षाकृत कम रही। पूरे सौराष्ट्र क्षेत्र का औसत ऑर्गेनिक कार्बन 0.57 प्रतिशत दर्ज किया गया। वैज्ञानिकों का मानना है कि जिन क्षेत्रों में प्राकृतिक खेती का विस्तार होगा, वहां यह स्तर आने वाले वर्षों में और बेहतर हो सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्राकृतिक खेती का सबसे बड़ा लाभ केवल खेत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का सीमित उपयोग, फसल अवशेषों का पुनर्चक्रण, जीवामृत और अन्य प्राकृतिक घोलों का प्रयोग तथा न्यूनतम जुताई जैसी तकनीकों से मिट्टी में कार्बन संग्रहण की क्षमता बढ़ती है। शोध के अनुसार प्राकृतिक खेती के माध्यम से प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष चार से आठ टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य का जलवायु लाभ प्राप्त किया जा सकता है। इससे ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी आती है और खेती जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में सहयोगी बनती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यही कारण है कि आज प्राकृतिक खेती को केवल वैकल्पिक कृषि पद्धति नहीं बल्कि "क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर" के रूप में देखा जा रहा है। बदलते मौसम, अनियमित वर्षा, बढ़ते तापमान और जल संकट जैसी परिस्थितियों में प्राकृतिक खेती किसानों के लिए अधिक सुरक्षित और टिकाऊ विकल्प बनकर उभर रही है। कम लागत, स्थानीय संसाधनों का उपयोग और मिट्टी की दीर्घकालिक उर्वरता इसे भविष्य की कृषि व्यवस्था का मजबूत आधार बना रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">देशभर में प्राकृतिक खेती के प्रति किसानों की रुचि लगातार बढ़ रही है। उत्तर प्रदेश, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और आंध्र प्रदेश सहित कई राज्यों में हजारों किसान इस पद्धति को अपना चुके हैं। केंद्र और राज्य सरकारें भी प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करने के लिए प्रशिक्षण, जागरूकता अभियान और वित्तीय सहायता उपलब्ध करा रही हैं। किसानों के सफल अनुभव दूसरे किसानों के लिए प्रेरणा बन रहे हैं। जो किसान पहले रासायनिक खेती छोड़ने को लेकर आशंकित थे, वे अब प्राकृतिक खेती के सकारात्मक परिणाम देखकर इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्राकृतिक खेती का आर्थिक पक्ष भी किसानों के लिए आकर्षण का केंद्र बन रहा है। रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और महंगे कृषि रसायनों पर निर्भरता कम होने से खेती की लागत घटती है। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध गोबर, गोमूत्र, जैविक अवशेष और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग किसानों की आय बढ़ाने में सहायक सिद्ध हो रहा है। इसके साथ ही प्राकृतिक तरीके से उत्पादित खाद्यान्न, फल और सब्जियों की बाजार में मांग भी बढ़ रही है, जिससे किसानों को बेहतर मूल्य मिलने की संभावना बन रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी प्राकृतिक खेती का महत्व लगातार बढ़ रहा है। रासायनिक अवशेषों से मुक्त खाद्यान्न उपभोक्ताओं को सुरक्षित और पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराते हैं। बढ़ती स्वास्थ्य जागरूकता के कारण लोग प्राकृतिक और जैविक उत्पादों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। इससे किसानों के लिए नए बाजार और अतिरिक्त आय के अवसर भी पैदा हो रहे हैं। जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय का शोध यह स्पष्ट संदेश देता है कि प्राकृतिक खेती केवल भावनात्मक या पारंपरिक विचार नहीं, बल्कि वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित एक प्रभावी कृषि प्रणाली है। मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने, जल संरक्षण करने, कार्बन उत्सर्जन घटाने, खेती की लागत कम करने और किसानों की आय बढ़ाने जैसे अनेक क्षेत्रों में इसके सकारात्मक परिणाम सामने आ चुके हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत ने वर्ष 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने में कृषि क्षेत्र की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। यदि देश में प्राकृतिक खेती का दायरा लगातार बढ़ता है, तो यह केवल किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं करेगी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, खाद्य सुरक्षा और सतत विकास के राष्ट्रीय उद्देश्यों को भी नई दिशा देगी। जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय का यह शोध इसी परिवर्तन की मजबूत वैज्ञानिक पुष्टि है और यह विश्वास जगाता है कि भविष्य की समृद्ध खेती प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर ही संभव है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत </strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 11 Jul 2026 22:09:50 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>*जिलाधिकारी ने परशुरामपुर में क्राप कटिंग कराकर परखी फसल की उत्पादकता, सुनी जन समस्याएं</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>भदोही -  </strong>जिलाधिकारी विशाल सिंह ने विकास खण्ड ज्ञानपुर अन्तर्गत ग्राम पंचायत परशुरामपुर में क्षेत्रीय लेखपाल के साथ गेहूं की क्राप कटिंग कराकर फसल उत्पादकता को परखा। जिलाधिकारी द्वारा अपनी देखरेख में कृषक रमाकांत के खेत में गेहूं की क्राप कटिंग कराया गया । चयनित भूखंड के 43.33 वर्ग मीटर में क्राप कटाई कराई गई। फसल का वजन 12.250 किग्रा पाया गया ।जिलाधिकारी ने फसल का वजन कराकर पैदावार की जांच की। चौड़ीकरण हो रहे सड़क के किनारे स्थित होने के कारण इस खेत में उत्पादकता कम रही।</p>
<p>उन्होने बताया कि पैदावार के आकलन करने हेतु पूरे जनपद में फसल</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/150710/the-district-magistrate-heard-public-problems-of-the-crop-by"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-04/img-20250402-wa0752.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>भदोही -  </strong>जिलाधिकारी विशाल सिंह ने विकास खण्ड ज्ञानपुर अन्तर्गत ग्राम पंचायत परशुरामपुर में क्षेत्रीय लेखपाल के साथ गेहूं की क्राप कटिंग कराकर फसल उत्पादकता को परखा। जिलाधिकारी द्वारा अपनी देखरेख में कृषक रमाकांत के खेत में गेहूं की क्राप कटिंग कराया गया । चयनित भूखंड के 43.33 वर्ग मीटर में क्राप कटाई कराई गई। फसल का वजन 12.250 किग्रा पाया गया ।जिलाधिकारी ने फसल का वजन कराकर पैदावार की जांच की। चौड़ीकरण हो रहे सड़क के किनारे स्थित होने के कारण इस खेत में उत्पादकता कम रही।</p>
<p>उन्होने बताया कि पैदावार के आकलन करने हेतु पूरे जनपद में फसल गेहूं पर क्राप कटिंग प्रयोग CCE एग्री ऐप के माध्यम से शत-प्रतिशत करायी जा रही हैं ताकि  उत्पादन के सही-सही, गुणवत्तापूर्ण एवं विश्वसनीय आंकड़े प्राप्त हो सके।<br /><br />परशुरामपुर में उपस्थित ग्रामीणों की समस्याओं को भी जिलाधिकारी ने सुना। इसी क्रम में ग्रामवासी गोपाल तिवारी और मनोज के बीच रास्ते के विवाद के संदर्भ में डीएम ने बीडीओ ज्ञानपुर को निर्देशित किया कि नियमानुसार खड़जा बिछवा दीजिए। एक महिला द्वारा शिकायत की गई कि उसको प्राप्त पट्टे की जमीन पर एक दबंग व्यक्ति ने कब्जा कर रखा है और वही व्यक्ति आरआरसी निर्माण में भी अवरोध पैदा कर रहा है, जिस पर तुरंत डीएम ने एसओ गोपीगंज को टेलीफोनिक  निर्देश दिया कि संबंधित अवरोधक व्यक्ति पर एफआईआर दर्ज करते हुए उसे जेल में बंद करें।<br /><br />सूच्य हो कि जिलाधिकारी के निर्देशानुसार जनपद के राजस्व, विकास एवं कृषि विभाग के कुल 32 अधिकारियों को फसल गेहूं पर कटाई के अनिवार्य निरीक्षण हेतु कुल 64 ग्रामों का आवंटन किया गया है। इसी क्रम में 01 अप्रैल की शाम को अपर जिलाधिकारी न्यायिक शिव नारायण कुमार द्वारा तहसील ज्ञानपुर के ग्राम पंचायत गिरधरपुर में क्रॉप कटिंग कराई गई। क्रॉप कटिंग प्रयोग सीसीई एग्री ऐप के माध्यम से सफलतापूर्वक संपन्न कराया गया।<br /><br />इस मौके पर उपनिदेशक कृषि डॉ अश्वनी सिंह, जिला कृषि अधिकारी सतीश पांडेय ,जिला सूचना अधिकारी डॉ.पंकज कुमार ,खंड विकास अधिकारी ज्ञानपुर, तहसीलदार अजय कुमार सिंह, अपर सांखिकीय अधिकारी रवि प्रकाश ,बीमा प्रतिनिधि विपिन कुमार, क्षेत्रीय राजस्व निरीक्षक एवं लेखपाल, प्रधान रेखा देवी आदि उपस्थित रहे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 02 Apr 2025 17:10:47 +0530</pubDate>
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