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                <title>public policy - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>public policy RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>फर्जी मुकदमों की बढ़ती चुनौती: एससी-एसटी और पॉक्सो कानूनों के कथित दुरुपयोग पर उठे गंभीर सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">भारतीय न्याय व्यवस्था में देरी तो है ही पर इसके साथ बहुत से मामले ऐसे हैं जिनका दुरुपयोग बड़ी तेजी से हो रहा है। हम बात कर रहे हैं एससी-एसटी एक्ट और पॉक्सो मामलों की जिनमें आदमी अगर सतर्क नहीं रहा तो बहुत बुरी तरह से घिर जाता है। एससी-एसटी एक्ट और पॉक्सो एक्ट के बढ़ते मुकदमे इसकी गवाही दे रहे हैं। कुछ ऐसे संगठित गिरोह भी हैं जो महिलाओं के द्वारा आदमियों को फंसवाते देखे गए हैं। हालांकि उन गिरोहों का पर्दाफाश होता है लेकिन तब तक आरोपी को सज़ा काटनी ही पड़ती है। इसी तरह एससी-एसटी एक्ट के</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184359/growing-challenge-of-fake-cases-serious-questions-raised-on-alleged"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/rajeev.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारतीय न्याय व्यवस्था में देरी तो है ही पर इसके साथ बहुत से मामले ऐसे हैं जिनका दुरुपयोग बड़ी तेजी से हो रहा है। हम बात कर रहे हैं एससी-एसटी एक्ट और पॉक्सो मामलों की जिनमें आदमी अगर सतर्क नहीं रहा तो बहुत बुरी तरह से घिर जाता है। एससी-एसटी एक्ट और पॉक्सो एक्ट के बढ़ते मुकदमे इसकी गवाही दे रहे हैं। कुछ ऐसे संगठित गिरोह भी हैं जो महिलाओं के द्वारा आदमियों को फंसवाते देखे गए हैं। हालांकि उन गिरोहों का पर्दाफाश होता है लेकिन तब तक आरोपी को सज़ा काटनी ही पड़ती है। इसी तरह एससी-एसटी एक्ट के कानून का दुरुपयोग वर्षों से हो रहा है लेकिन आज तक कितनी ही सरकारें आईं हों इनमें संसोधन नहीं हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को समान न्याय का अधिकार देता है। इसी उद्देश्य से समय-समय पर ऐसे विशेष कानून बनाए गए जो समाज के कमजोर और संवेदनशील वर्गों को सुरक्षा प्रदान कर सकें। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम और पॉक्सो कानून भी इसी सोच का परिणाम हैं। इन कानूनों ने अनेक पीड़ितों को न्याय दिलाने का मार्ग प्रशस्त किया है और समाज में अपराधियों के विरुद्ध कठोर संदेश दिया है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एक दूसरा पक्ष भी लगातार चर्चा में रहा है। कई लोग आरोप लगाते हैं कि व्यक्तिगत दुश्मनी, संपत्ति विवाद, राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता या पारिवारिक संघर्ष में इन कानूनों का दुरुपयोग कर झूठे मुक़दमे दर्ज कराए जाते हैं। यह मुद्दा अदालतों, विधि विशेषज्ञों और समाज के बीच लगातार बहस का विषय बना हुआ है। क्या सचमुच फर्जी मुकदमों की बाढ़ है?</p>
<p style="text-align:justify;"><br />यह कहना कि अधिकांश एससी-एसटी या पॉक्सो के मामले फर्जी हैं, उपलब्ध आधिकारिक आँकड़ों के आधार पर उचित नहीं होगा। कई मामलों में जांच के बाद आरोप सिद्ध नहीं हो पाते, लेकिन इसका कारण हमेशा झूठा मुकदमा नहीं होता। कमजोर जांच, पर्याप्त साक्ष्यों का अभाव, गवाहों का मुकर जाना, समझौते का दबाव या लंबी न्यायिक प्रक्रिया भी इसके कारण हो सकते हैं। हालाँकि, विभिन्न उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय ने अलग-अलग मामलों में यह भी स्वीकार किया है कि कुछ मामलों में कानूनों का दुरुपयोग होने की शिकायतें सामने आई हैं। इसलिए यह विषय संतुलित दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है। निर्दोष व्यक्ति पर मुकदमे का प्रभाव- यदि कोई व्यक्ति वास्तव में झूठे मुकदमे में फँस जाता है, तो उसका प्रभाव केवल अदालत तक सीमित नहीं रहता। उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा प्रभावित होती है, नौकरी पर संकट आ सकता है, आर्थिक बोझ बढ़ जाता है और पूरा परिवार मानसिक तनाव से गुजरता है। वर्षों तक मुकदमा चलने के बाद यदि वह निर्दोष साबित भी हो जाए, तब भी खोया हुआ समय और सम्मान आसानी से वापस नहीं आता। दूसरी ओर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि एससी-एसटी कानून और पॉक्सो अधिनियम लाखों वास्तविक पीड़ितों की सुरक्षा के लिए बनाए गए हैं। भारत में जातीय उत्पीड़न और बच्चों के साथ यौन अपराध आज भी गंभीर समस्या हैं। यदि इन कानूनों को कमजोर किया जाए या हर शिकायत को संदेह की दृष्टि से देखा जाए, तो वास्तविक पीड़ित न्याय पाने से वंचित हो सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />इसलिए चुनौती यह नहीं है कि कानून समाप्त कर दिए जाएँ, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि उनका सही और निष्पक्ष उपयोग हो। देश की अदालतों में करोड़ों मुकदमे लंबित हैं। विशेष कानूनों के अंतर्गत दर्ज मामलों की संख्या बढ़ने से न्यायिक व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। सुनवाई में देरी के कारण न तो पीड़ित को समय पर न्याय मिल पाता है और न ही निर्दोष व्यक्ति को शीघ्र राहत। तेज और वैज्ञानिक जांच, पर्याप्त न्यायाधीशों की नियुक्ति तथा समयबद्ध सुनवाई इस समस्या के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। सरकार की जिम्मेदारी केवल कठोर कानून बनाना नहीं है, बल्कि उनकी निष्पक्ष क्रियान्वयन व्यवस्था सुनिश्चित करना भी है। यदि कहीं झूठे मुकदमे दर्ज होते हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। वहीं यदि वास्तविक पीड़ित न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं तो उन्हें भी समय पर न्याय मिलना चाहिए। इस विषय पर कई विधि विशेषज्ञ निम्न सुधारों की आवश्यकता बताते हैं— निष्पक्ष और वैज्ञानिक पुलिस जांच। फॉरेंसिक साक्ष्यों का अधिक उपयोग। विशेष अदालतों की संख्या बढ़ाना।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />लंबित मामलों का समयबद्ध निस्तारण। यदि अदालत यह पाए कि शिकायत जानबूझकर झूठी और दुर्भावनापूर्ण थी, तो कानून के अनुसार उचित कार्रवाई। पुलिस और अभियोजन अधिकारियों का नियमित प्रशिक्षण। "सरकार और अदालतें धृतराष्ट्र बनी हुई हैं" जैसी अभिव्यक्ति एक राजनीतिक और भावनात्मक टिप्पणी हो सकती है, लेकिन वास्तविक समाधान तथ्यों और संस्थागत सुधारों में निहित है। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में दो सिद्धांत समान रूप से महत्वपूर्ण हैं—दोषी को दंड मिले और निर्दोष को अनावश्यक दंड या उत्पीड़न न झेलना पड़े। इसलिए आवश्यकता न तो कानूनों को कमजोर करने की है और न ही हर शिकायत को झूठा मानने की। आवश्यकता ऐसी न्याय व्यवस्था की है जो वास्तविक पीड़ितों को शीघ्र न्याय दिलाए, निर्दोष लोगों के अधिकारों की रक्षा करे और न्याय प्रणाली पर जनता का विश्वास मजबूत बनाए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 30 Jul 2026 22:55:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>मोदी सरकार में वो समस्याएं जो अभी तक नहीं सुधरीं</title>
                                    <description><![CDATA[<blockquote class="format1"><strong>राजीव शुक्ल-संपादक </strong></blockquote>
<p style="text-align:justify;">इस बात में कोई दो राय नहीं है कि 2014 के बाद से अब तक भारत ने काफी तरक्की की है लेकिन इसमें यह भी है कि अभी तक बहुत सी ऐसी समस्याएं हैं जिनमें सुधार होना बाकी है। 2014 से 2026 तक 12 साल की सत्ता में मोदी सरकार ने योजनाओं, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक छवि पर काम किया। लेकिन कुछ संरचनात्मक समस्याएं ऐसी हैं जो चुनावी नारों और सरकारी रिपोर्टों के बावजूद ज़मीन पर बनी हुई हैं। ये समस्याएं आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से सीधे जुड़ती हैं। इसमें सबसे पहले आती है बेरोज़गारी और</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181929/those-problems-which-have-not-been-improved-yet-in-modi"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/images-(2).jpeg" alt=""></a><br /><blockquote class="format1"><strong>राजीव शुक्ल-संपादक </strong></blockquote>
<p style="text-align:justify;">इस बात में कोई दो राय नहीं है कि 2014 के बाद से अब तक भारत ने काफी तरक्की की है लेकिन इसमें यह भी है कि अभी तक बहुत सी ऐसी समस्याएं हैं जिनमें सुधार होना बाकी है। 2014 से 2026 तक 12 साल की सत्ता में मोदी सरकार ने योजनाओं, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक छवि पर काम किया। लेकिन कुछ संरचनात्मक समस्याएं ऐसी हैं जो चुनावी नारों और सरकारी रिपोर्टों के बावजूद ज़मीन पर बनी हुई हैं। ये समस्याएं आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से सीधे जुड़ती हैं। इसमें सबसे पहले आती है बेरोज़गारी और अनौपचारिक क्षेत्र की अस्थिरता।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि बेरोजगारी को कम करने के लिए सरकार ने बहुत प्रयास किए हैं लेकिन अभी कई प्रयास करने वाकी हैं। सरकारी आंकड़े कहते हैं कि बेरोज़गारी दर 2017 के मुकाबले घटी है। लेकिन हकीकत में समस्या की प्रकृति बदली है। गुणवत्तापूर्ण रोज़गार की कमी भारतीयों को खल रही है। हर साल 1.2 करोड़ युवा श्रम बाजार में आते हैं, लेकिन प्राइवेट सेक्टर में वेतन बढ़ोतरी धीमी है। आईटी और स्टार्टअप में छंटनी ने मिडिल क्लास की चिंता बढ़ाई है। अनौपचारिक क्षेत्र पर असर: नोटबंदी, GST और कोविड के बाद छोटे दुकानदार, ठेले वाले और दिहाड़ी मजदूर पूरी तरह उभर नहीं पाए। CMIE और NSSO के सर्वे बताते हैं कि स्वरोज़गार बढ़ा है, लेकिन ये ज़्यादातर मजबूरी का स्वरोज़गार है। कृषि संकट और किसान की आय के लिए बहुत समय से बात चल रही है लेकिन अभी तक इस पर कोई ठोस नीति नहीं बन सकी है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />2016 में सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य रखा था। 2026 तक वो लक्ष्य पूरा नहीं हुआ। MSP की सीमित पहुंच : सिर्फ गेहूं-धान के किसान ही MSP का फायदा ले पाते हैं। दाल, तिलहन, फल-सब्जी वाले किसान मंडी के भाव पर निर्भर हैं। कर्ज और जलवायु जोखिम: को लेकर किसान हमेशा से परेशान रहा है। फसल बीमा योजना ने कुछ राहत दी, लेकिन अतिवृष्टि, सूखा और आवारा पशु की समस्या बनी हुई है। तीन कृषि कानूनों के विरोध के बाद सरकार बैकफुट पर आ गई और बड़े कृषि सुधार रुके हुए हैं।<br />              शिक्षा और स्वास्थ्य में गुणवत्ता का अंतर</p>
<p style="text-align:justify;"><br />शिक्षा: NEP 2020 ने ढांचा बदला, लेकिन सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी, ड्रॉपआउट रेट और लर्निंग आउटकम अब भी कमजोर हैं। ASER रिपोर्ट लगातार बताती है कि कक्षा 5 का बच्चा कक्षा 2 का पाठ नहीं पढ़ पाता। इसी तरह स्वास्थ्य: आयुष्मान भारत ने कवरेज बढ़ाया, लेकिन ग्रामीण इलाकों में डॉक्टर, नर्स और दवाओं की कमी है। निजी अस्पताल महंगे हैं, और आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च भारत में अब भी GDP का 50% से ज्यादा है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />महंगाई का मध्यम वर्ग पर दबाव बहुत बढ़ता जा रहा है। तेल, सब्जी, दाल और किराये की कीमतों में उछाल ने मध्यम वर्ग को सबसे ज्यादा प्रभावित किया। सरकार ने टैक्स स्लैब बदले, लेकिन प्रत्यक्ष कर का बोझ अब भी वेतनभोगी वर्ग पर ज्यादा है।  <br />कोर महंगाई भले नियंत्रण में रही हो, लेकिन खाद्य महंगाई 2022-2024 में दो बार 10% पार कर गई। RBI के बार-बार रेपो रेट बढ़ाने से EMI बढ़ी और घर खरीदना मुश्किल हुआ। नौकरशाही और भ्रष्टाचार की जड़ें मजबूत हो रहीं हैं। DBT और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने बिचौलियों को कम किया, लेकिन ज़मीन-रजिस्ट्री, पुलिस, म्यूनिसिपल सर्विस में भ्रष्टाचार खत्म नहीं हुआ। विपक्ष का आरोप है कि ED, CBI जैसी एजेंसियों का राजनीतिक इस्तेमाल बढ़ा है। वहीं सरकार कहती है कि भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई हो रही है। नतीजा ये है कि आम आदमी का भरोसा सिस्टम पर आंशिक ही बहाल हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />सामाजिक ध्रुवीकरण और संवाद की कमी पिछले 12 साल में धार्मिक और क्षेत्रीय मुद्दे राष्ट्रीय बहस में हावी रहे। इससे विकास और रोज़गार जैसे मुद्दे कई बार बैकसीट पर चले गए। मीडिया और सिविल सोसाइटी का स्पेस सिकुड़ने की शिकायत विपक्ष और पत्रकार संगठनों से आती रही है। सरकार का पक्ष है कि फेक न्यूज़ और अस्थिरता रोकने के लिए नियम जरूरी हैं। राज्य-केंद्र संबंध और संघीय ढांचा<br />GST लागू होने के बाद राज्यों को मुआवज़ा देने का वादा 2022 में खत्म हो गया। अब कई राज्य कहते हैं कि उनका फिस्कल स्पेस सिकुड़ गया है।  केंद्रीय योजनाओं के नाम पर राज्यों की भूमिका सीमित हो गई है, जिससे संघीय संतुलन पर सवाल उठते हैं।  सुधार हुआ, पर असमान गति से मोदी सरकार ने बुनियादी सुविधाओं, डिजिटल ट्रांजैक्शन और इंफ्रास्ट्रक्चर में ठोस काम किया है। उज्ज्वला, जनधन, सड़क, रेल और UPI इसका उदाहरण हैं। लेकिन रोज़गार की गुणवत्ता, कृषि आय, शिक्षा-स्वास्थ्य की ग्राउंड लेवल क्वालिटी, और महंगाई जैसी समस्याएं अभी भी सिस्टम की कमज़ोरी दिखाती हैं। 2026 तक सरकार की सबसे बड़ी चुनौती ये है कि वो कल्याणकारी योजनाओं के साथ-साथ प्रोडक्टिविटी और प्राइवेट इन्वेस्टमेंट को भी तेज़ करे, ताकि ये समस्याएं चुनावी मुद्दे बनकर न रह जाएं बल्कि हल हों।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 17:33:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>टीईटी परीक्षा की अनिवार्यता के विरोध में शिक्षकों का दिया धरना और दिया ज्ञापन</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>प्रतापगढ़। </strong>अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के आह्वान पर गुरुवार को एन.आई.सी.परिसर में राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ (प्राथमिक संवर्ग), प्रतापगढ़ के जिलाध्यक्ष अशोक राय के नेतृत्व में विशाल भीड़ एकत्रित होकर जिलाधिकारी के माध्यम से प्रधानमंत्री,केन्द्रीय शिक्षा मंत्री तथा प्रदेश के मुख्यमंत्री  को सम्बोधित सेवारत शिक्षक शिक्षिकाओं को शिक्षक पात्रता परीक्षा की अनिवार्यता के विरोध में ज्ञापन सौंपा गया।  कार्यक्रमों का संचालन जिला महामंत्री जय प्रकाश पाण्डेय ने किया।</div>
<div style="text-align:justify;">उपस्थित शिक्षक समूह को सम्बोधित करते हुए जिलाध्यक्ष अशोक राय ने कहा कि उत्तर प्रदेश में 27जुलाई2011और केन्द्रीय सेवाओं में 23 अगस्त 2010 के पूर्व से कार्यरत शिक्षकों, शिक्षिकाओं के लिए भी</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181511/the-biggest-loss-in-democracy-is-the-breakdown-of-parties"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/img-20260618-wa0119.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>प्रतापगढ़। </strong>अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के आह्वान पर गुरुवार को एन.आई.सी.परिसर में राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ (प्राथमिक संवर्ग), प्रतापगढ़ के जिलाध्यक्ष अशोक राय के नेतृत्व में विशाल भीड़ एकत्रित होकर जिलाधिकारी के माध्यम से प्रधानमंत्री,केन्द्रीय शिक्षा मंत्री तथा प्रदेश के मुख्यमंत्री  को सम्बोधित सेवारत शिक्षक शिक्षिकाओं को शिक्षक पात्रता परीक्षा की अनिवार्यता के विरोध में ज्ञापन सौंपा गया।  कार्यक्रमों का संचालन जिला महामंत्री जय प्रकाश पाण्डेय ने किया।</div>
<div style="text-align:justify;">उपस्थित शिक्षक समूह को सम्बोधित करते हुए जिलाध्यक्ष अशोक राय ने कहा कि उत्तर प्रदेश में 27जुलाई2011और केन्द्रीय सेवाओं में 23 अगस्त 2010 के पूर्व से कार्यरत शिक्षकों, शिक्षिकाओं के लिए भी उच्चतम न्यायालय, द्वारा शिक्षक पात्रता परीक्षा अनिवार्य किया जाना सरासर अन्याय है और यह नैसर्गिक न्याय के विरुद्ध है। उन शिक्षकों पर टेट की अनिवार्यता एक जबर्दस्ती थोपी गई व्यवस्था है, जो कतई स्वीकार्य नहीं है।माध्यमिक संवर्ग के अध्यक्ष प्रभात त्रिपाठी ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 2017 के संसद के जिस संशोधन के आधार पर बेसिक शिक्षकों को बीस-पच्चीस साल तक नौकरी करने के बाद पुनः पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण करने का निर्णय दिया है , देश में वैसा उदाहरण मिलना असम्भव है। इसमें मानवीय पक्ष को पूरी तरह नकार दिया गया है।माध्यमिक संवर्ग के पूर्व प्रान्तीय कार्यकारी अध्यक्ष अरुण शुक्ल ने कहा कि संसद सर्वोच्च है और  उच्चतम न्यायालय के निर्णय से बड़ी विसंगति पैदा हो गई है।</div>
<div style="text-align:justify;">विशाल एकत्रीकरण कार्यक्रम एवं ज्ञापन कार्यक्रम में आज उपस्थित अन्य प्रमुख पदाधिकारियों में वरिष्ठ उपाध्यक्ष अशोक वैश्य, उपाध्यक्ष डा.राज श्री पाण्डेय,जिला महामंत्री जय प्रकाश पाण्डेय,सह संगठन मंत्री गौरव त्रिपाठी, जिला संयुक्त महामंत्री/सदर ब्लाक अध्यक्ष डा.अजय सिंह, जिला मंत्री/बाबा गंज महामंत्री अरूण द्विवेदी,जिला मंत्री/शिवगढ़ अध्यक्ष सुशील द्विवेदी, क्रीड़ा भारती के जिलाध्यक्ष ध्रुव शर्मा,ब्लॉक अध्यक्ष गण-सुरेन्द्र पाण्डेय,रामेन्द्र सिंह, देवेन्द्र पति तिवारी,डा.कामेश्वर मणि त्रिपाठी, रमेश सिंह,अखिलेश सिंह, जीतेन्द्र सिंह, विनोद शर्मा,भागवत प्रसाद, महामंत्री गण-धर्मेन्द्र सिंह, राकेश वर्मा,  मनोज मिश्र, बिहार, राजीव कौशल, मनोज मिश्र,कुण्डा,लालजी यादव विद्याशंकर,बालचन्द्र,अनीस हैदर रिजवी, प्राचार्य कृपाशंकर पाण्डेय,इन्द्र देव सिंह, मीना भारती, कुसुम कुमारी, अनुराधा उपाध्याय,मंजू चौरसिया,जय प्रकाश सिंह आदि रहे।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 20:43:54 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पार्टियों की टूट व टूटता भरोसा: लोकतंत्र में सबसे बड़ा नुकसान यही है</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">चुनाव बाद पार्टियों का टूटना या ये कहिए कि दलबदल होना अब आम बात हो चली है। यह दलबदल क्षेत्रीय पार्टियों में सबसे अधिक होती है। लेकिन यहां नेताओं से लोगों का भरोसा टूट चुका होता है। क्योंकि लोगों ने अपने नेता को दूसरी पार्टी में रहते वोट दिया था जबकि नेताजी चुनाव बाद अन्य पार्टी में शामिल हो जाते हैं। पिछले 10 साल में भारत में 25 से ज्यादा राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियां टूटीं। महाराष्ट्र में शिवसेना दो हिस्सों में बंटी, NCP दो फाड़ हुई, बिहार में JDU ने कई बार पाला बदला। हर बार कारण एक ही बताया</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181509/the-biggest-loss-in-democracy-is-the-breakdown-of-parties"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas3.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">चुनाव बाद पार्टियों का टूटना या ये कहिए कि दलबदल होना अब आम बात हो चली है। यह दलबदल क्षेत्रीय पार्टियों में सबसे अधिक होती है। लेकिन यहां नेताओं से लोगों का भरोसा टूट चुका होता है। क्योंकि लोगों ने अपने नेता को दूसरी पार्टी में रहते वोट दिया था जबकि नेताजी चुनाव बाद अन्य पार्टी में शामिल हो जाते हैं। पिछले 10 साल में भारत में 25 से ज्यादा राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियां टूटीं। महाराष्ट्र में शिवसेना दो हिस्सों में बंटी, NCP दो फाड़ हुई, बिहार में JDU ने कई बार पाला बदला। हर बार कारण एक ही बताया जाता है - "सिद्धांतों से समझौता", "जनता के हित में फैसला"। लेकिन नतीजा एक ही निकलता है - वोटर का भरोसा टूटना।</p><p style="text-align:justify;"><br />टूट क्यों रही हैं पार्टियां? इस पर हमारी सोच वही है जो लगभग सभी की होती है। सत्ता और पद का गणित- पार्टी टूटने का 80% कारण विधायकों और सांसदों की टिकट और मंत्री पद की भूख है। जब हाईकमान टिकट काटता है या किसी और को आगे बढ़ाता है, तो नाराज नेता दूसरी पार्टी या नई पार्टी बना लेते हैं। परिवारवाद और हाईकमान कल्चर-<br />कई क्षेत्रीय पार्टियां एक परिवार के इर्द-गिर्द घूमती हैं। जब दूसरी पीढ़ी तैयार होती है, तो पुराने नेता खुद को साइडलाइन महसूस करते हैं और बगावत करते हैं।</p><p style="text-align:justify;"><br />विचारधारा का कमजोर होना- पहले पार्टियों की पहचान किसी विचारधारा से होती थी। अब ज्यादातर पार्टियां "पावर ब्लॉक" बन गई हैं। विचारधारा बदलते देर नहीं लगती, क्योंकि एजेंडा सत्ता है। वोटर का भरोसा कैसे टूटता है?- जब तुमने 2019 में किसी पार्टी को वोट दिया था, तुमने उसके घोषणापत्र, नेता और विचारधारा पर भरोसा किया था। 2023 में वही विधायक दूसरी पार्टी में चला जाए और 2024 में तीसरी पार्टी में, तो सवाल उठता है। मैंने वोट किसको दिया था? व्यक्ति को, सिंबल को, या पार्टी को?</p><p style="text-align:justify;"><br />क्या मेरा वोट मायने रखता है? अगर चुनाव के बाद गठबंधन बदल जाए तो जनादेश का मतलब क्या रहा? सब एक जैसे हैं- ये सनक नहीं, टूटे भरोसे की उपज है। 2023 के कर्नाटक और महाराष्ट्र चुनाव के बाद CSDS के सर्वे में 47% लोगों ने कहा कि "दलबदल से लोकतंत्र कमजोर होता है"। इसका असर कहां दिखता है? चुनावी राजनीति पर- लोग अब स्थानीय उम्मीदवार देखने लगे हैं, पार्टी नहीं। "पार्टी कोई भी हो, मेरा काम करे" वाला ट्रेंड बढ़ रहा है। नीति निर्माण पर- सरकारें अस्थिर हो जाती हैं। 5 साल का प्लान 2 साल में बदल जाता है क्योंकि गठबंधन बदल गया। युवा राजनीति से दूर हो रहे हैं- कॉलेज चुनावों में भी भागीदारी घट रही है। युवाओं को लगता है कि राजनीति सिर्फ सौदेबाजी है। नोटा का बढ़ना- 2019 के बाद से कई सीटों पर नोटा को मिले वोट 2-3% तक पहुंच गए हैं। ये विरोध का साइलेंट तरीका है।</p><p style="text-align:justify;"><br />               दलबदल कानून कहां फेल हुआ?- 1985 में 52वां संविधान संशोधन लाकर दलबदल विरोधी कानून बनाया गया। मकसद था कि विधायक पार्टी न बदलें। लेकिन कानून में एक खामी छोड़ दी गई - अगर 2/3 विधायक साथ छोड़ दें तो वो "विलय" कहलाता है और अयोग्यता नहीं लगती। इसी खामी का फायदा लेकर महाराष्ट्र, गोवा, मध्य प्रदेश में सरकारें गिरीं। सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है कि स्पीकर का फैसला समय पर नहीं आता, जिससे कानून का मकसद ही खत्म हो जाता है। क्या हो सकता है समाधान?- 2/3 वाली छूट हटाओ- अगर पार्टी टूटती है तो सबको अयोग्य ठहराओ। फिर जनता के पास जाओ और दोबारा चुनाव लड़ो।</p><p style="text-align:justify;"><br />फंडिंग में पारदर्शिता-  चुनाव आयोग को हर लेन-देन का हिसाब मिले ताकि नेताओं को खरीद-फरोख्त न हो सके। आंतरिक लोकतंत्र-  पार्टियों में चुनाव हों, युवा और कार्यकर्ताओं की सुनवाई हो। जब अंदर लोकतंत्र होगा तो बाहर टूट कम होगी। वोटर एजुकेशन-  लोगों को समझाना होगा कि वोट सिंबल को जाता है, व्यक्ति को नहीं। ये बात स्कूल और कॉलेज में पढ़ाई जाए। स्थानीय मुद्दों पर वोट-  लोग अब पानी, सड़क, स्कूल को देखकर वोट कर रहे हैं, न कि बड़े नेता के नाम पर। सोशल मीडिया पर जवाबदेही- विधायक अगर पाला बदलता है तो अगले 6 महीने तक ट्रोल होता है। ये डर कुछ हद तक काम कर रहा है। नए विकल्प की तलाश AAP जैसे दल इसी भरोसे के संकट से पैदा हुए। पार्टियों का टूटना लोकतंत्र में स्वाभाविक है, लेकिन जब हर 2 साल में गठबंधन और दल बदल जाएं, तो जनता को लगता है कि उसका वोट सिर्फ सत्ता का सीढ़ी है।</p><p style="text-align:justify;"><br />लोकतंत्र सिर्फ चुनाव नहीं है, ये भरोसे का कॉन्ट्रैक्ट है। जब पार्टियां उस कॉन्ट्रैक्ट को तोड़ती हैं, तो नुकसान वोटर को होता है। और एक बार भरोसा टूट जाए, तो उसे दोबारा जोड़ने में 10 साल लग जाते हैं।<br />अगली बार जब कोई नेता पाला बदले, तो सवाल पूछो: "तुम पार्टी बदले, मेरी समस्या बदली क्या?"</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 20:39:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>प्रभारी मंत्री सूर्य प्रताप शाही द्वारा केंद्र सरकार के 12 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर सर्किट हाउस में आयोजित मीडिया संवाद कार्यक्रम</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
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<div style="text-align:justify;"><strong>बस्ती।</strong> प्रदेश सरकार के कृषि, कृषि शिक्षा एवं कृषि अनुसंधान मंत्री/जनपद के प्रभारी मंत्री सूर्य प्रताप शाही द्वारा केंद्र सरकार के 12 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर सर्किट हाउस में आयोजित मीडिया संवाद कार्यक्रम के अन्तर्गत कहा कि मा0 प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश एवं प्रदेश की प्रगति तथा विकास के हर क्षेत्र में किए गए ऐतिहासिक एवं सराहनीय कार्यों द्वारा आम जनमानस का जीवन स्तर ऊंचा उठाने हेतु सतत् प्रयास किया गया है। </div>
<div style="text-align:justify;">उन्होने कहा कि सुशासन को समर्पित प्रधानमंत्री के द्वारा 140 करोड़ भारतीयों की निरन्तर सेवा के 12 वर्ष पूर्ण हो चुके है। इसी</div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181135/media-interaction-program-organized-by-minister-in-charge-surya-pratap-shahi"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/img-20260613-wa0097.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
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<div style="text-align:justify;"><strong>बस्ती।</strong> प्रदेश सरकार के कृषि, कृषि शिक्षा एवं कृषि अनुसंधान मंत्री/जनपद के प्रभारी मंत्री सूर्य प्रताप शाही द्वारा केंद्र सरकार के 12 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर सर्किट हाउस में आयोजित मीडिया संवाद कार्यक्रम के अन्तर्गत कहा कि मा0 प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश एवं प्रदेश की प्रगति तथा विकास के हर क्षेत्र में किए गए ऐतिहासिक एवं सराहनीय कार्यों द्वारा आम जनमानस का जीवन स्तर ऊंचा उठाने हेतु सतत् प्रयास किया गया है। </div>
<div style="text-align:justify;">उन्होने कहा कि सुशासन को समर्पित प्रधानमंत्री के द्वारा 140 करोड़ भारतीयों की निरन्तर सेवा के 12 वर्ष पूर्ण हो चुके है। इसी के उपलक्ष्य में विश्वास, विकास के जनकल्याणकारी योजनाओं से लोगों को संतृप्त किया जा रहा है। मा0 मंत्री ने प्रेस-वार्ता के दौरान कहा कि प्रधानमंत्री के इस स्वर्णिम कार्यकाल में अबतक किए गये जनहित कार्यो से भारत की तस्वीर व तकदीर दोनो बदली है। उन्होने कहा कि वर्ष 2014 में यह सरकार बनी है तब से सरकार ने सबका साथ-सबका विकास-सबका विश्वास के आधार पर जनहितकारी कार्य किया है, बिना किसी भेदभाव के योजनाओं का लाभ पात्रता के आधार पर दिया जा रहा है। सुशासन के लिए जनसुझावों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। सरकार ने 10 करोड़ करीब परिवारों को उज्ज्वला गैस कनेक्शन देकर उनके जीवन में खुशहाली लाने का प्रयास किया है। मा0 मंत्री ने कहा कि केन्द्र सरकार द्वारा गर्भवती महिलाओं व शिशुओं की सुरक्षा, नियमित टीकाकरण, सुरक्षित प्रसव एवं समुचित चिकित्सा हेतु तत्परतापूर्वक कार्य किया है। पी.एम. कुशुम, पी.एम. सूर्यघर, मृदा स्वास्थ्य कार्ड, सड़को एवं सम्पर्क मार्गो का विस्तारीकरण, रेलवे, बिजली उत्पादन एवं आपूर्ति, एयरपोर्ट, रक्षा एवं अनुसंधान, एक्सप्रेस-वे, आधुनिक एवं वैज्ञानिक तकनीक एआई जैसे अभिनव प्रयोग कर आम जनमानस को सामाजिक, आर्थिक रूप से विकसित करने का सतत् कार्य किया गया है। देश में भ्रष्टाचार एवं आतंकवाद को समाप्त करने के लिए अभियान चलाकर कार्य किया गया है। </div>
<div style="text-align:justify;"> मा0 मंत्री ने कहा कि जनपद में किसान सम्मान निधि, प्रधानमंत्री आवास (ग्रामीण व शहरी), प्रधानमंत्री मातृ वंदन, प्रधानमंत्री जनधन, पी.एम. स्वनिधि,, प्रधानमंत्री जन आरोगय, जलजीवन मिशन ग्रामीण, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविकास मिशन, व्यक्तिगत व सामूहिक शौचलयों का निर्माण, वृद्धा, निराश्रित महिला व दिव्यांग पेंशन, कन्या सुमंगला योजनाओं सहित अन्य संचालित योजनाओं द्वारा पात्र लाभार्थियों को आच्छादित किया गया है।  </div>
<div style="text-align:justify;">उन्होने कहा कि विगत 12 वर्षों में देश को नई दिशा, नई ऊर्जा और नई पहचान मिली है। भारत आज दुनिया की तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्थाओं में से एक है तथा हम वैश्विक मंच पर मजबूत नेतृत्व के रूप में उभरे हैं। मा0 प्रधानमंत्री के नेतृत्व में हमेशा गरीबों, मजदूरों, किसानों, महिलाओं, अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोगों तथा सभी वर्गों के लिए कार्य किया गया है। आज हम खाद्यान्न, रक्षा, चिकित्सा, आयुध उपकरणों के निर्माण में पहले से अधिक आत्मनिर्भर हैं, आज देश में शांति एवं कानून व्यवस्था का राज स्थापित है, हम सभी निडर होकर पहले से अधिक सम्मान से राष्ट्र के निर्माण में प्रगति कर रहे है।  </div>
<div style="text-align:justify;">इस अवसर पर जिलाध्यक्ष भाजपा विवेकानन्द मिश्रा, पूर्व सांसद हरीश द्विवेदी, पूर्व विधायक दयाराम चौधरी, रवि सोनकर, चन्द्र प्रकाश शुक्ला, संजय प्रताप जायसवाल, अपना दल के विवेक चौधरी, गोपेश्वर त्रिपाठी, मीडिया प्रभारी अजय सिंह, मुख्य विकास अधिकारी सार्थक अग्रवाल, सीआरओ कीर्ति प्रकाश भारती, एसडीएम सदर हिमांशु कुमार, डीएसटीओ मनोज कुमार श्रीवास्तव, डीपीओ राजेश कुमार, उप निदेशक कृषि, अशोक कुमार, उप निदेशक कृषि एवं रक्षा रामबचन राम तथा जिला कृषि अधिकारी डा. बी.आर. मौर्य सहित जनप्रतिनिधि एवं प्रेस प्रतिनिधिगण उपस्थित रहे।</div>
</div>
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<div class="adL" style="text-align:justify;"> </div>
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                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 13 Jun 2026 19:07:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पॉलिसी संवाद द्वारा जनजातीय कल्याण के लिए लोक नीति पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन </title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>नई दिल्ली-</strong> भारत की पहली द्विभाषी लोक नीति पत्रिका पॉलिसी संवाद ने इंस्टीट्यूट फॉर पब्लिक पॉलिसी रिसर्च एंड डेवलपमेंट ट्रस्ट (IPPRDT) एवं महामना मदन मोहन मालवीय मेमोरियल ट्रस्ट के तत्वावधान में एक ज्ञानवर्धक कार्यशाला का आयोजन किया। "भविष्य का वित्तपोषण: जनजातीय कल्याण और समावेशी विकास के लिए सार्वजनिक नीति और वित्त" विषयक यह कार्यक्रम मालवीय स्मृति भवन, नई दिल्ली में संपन्न हुआ।</div>
<div>  </div>
<div>कार्यशाला का उद्घाटन पॉलिसी संवाद के संपादक और लोक नीति विश्लेषक गौरव कुमार द्वारा अतिथि सत्कार के साथ किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित श्री अंतर सिंह आर्य, अध्यक्ष, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग, ने</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/150554/one-day-workshop-on-public-policy-for-tribal-welfare-by"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/img-20250328-wa0226.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>नई दिल्ली-</strong> भारत की पहली द्विभाषी लोक नीति पत्रिका पॉलिसी संवाद ने इंस्टीट्यूट फॉर पब्लिक पॉलिसी रिसर्च एंड डेवलपमेंट ट्रस्ट (IPPRDT) एवं महामना मदन मोहन मालवीय मेमोरियल ट्रस्ट के तत्वावधान में एक ज्ञानवर्धक कार्यशाला का आयोजन किया। "भविष्य का वित्तपोषण: जनजातीय कल्याण और समावेशी विकास के लिए सार्वजनिक नीति और वित्त" विषयक यह कार्यक्रम मालवीय स्मृति भवन, नई दिल्ली में संपन्न हुआ।</div>
<div> </div>
<div>कार्यशाला का उद्घाटन पॉलिसी संवाद के संपादक और लोक नीति विश्लेषक गौरव कुमार द्वारा अतिथि सत्कार के साथ किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित श्री अंतर सिंह आर्य, अध्यक्ष, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग, ने अपने संबोधन में लोक नीति के क्षेत्र में सकारात्मक संवाद और इस विषय पर जागरूकता बढ़ाने में पॉलिसी संवाद की भूमिका की सराहना की। उन्होंने राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की।</div>
<div> </div>
<div>उन्होंने वर्तमान केंद्रीय बजट में जनजाति कल्याण के लिए किए गए विभिन्न प्रावधानों की सराहना करते हुए कहा कि केंद्र सरकार ने जनजातीय समुदायों के समावेशी विकास हेतु कई प्रभावी कदम उठाए हैं।इसी क्रम में, विशिष्ट अतिथि श्री निरुपम चाकमा, सदस्य, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग, ने अनुसूचित जनजातियों के समग्र और समावेशी विकास में लोक वित्त और उसके प्रभावी प्रबंधन की आवश्यकता पर जोर दिया।</div>
<div> </div>
<div>श्रीमती विजया भारती सयानी, पूर्व कार्यवाहक अध्यक्ष एवं सदस्य, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, ने भी कार्यशाला के विषय पर अपने बहुमूल्य विचार साझा किए। श्री हरिशंकर सिंह, राष्ट्रीय अध्यक्ष, महामना मालवीय मिशन ने भी अपने संबोधन में जनजातीय कल्याण और नीति निर्माण की भूमिका पर प्रकाश डाला।</div>
<div>इसके अलावा, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के संयुक्त सचिव अमित निर्मल ने अपने विशेष व्याख्यान में जनजातीय कल्याण और समावेशी विकास के लिए सार्वजनिक नीति और वित्त की भूमिका पर अपने विचार प्रस्तुत किए।</div>
<div> </div>
<div>जनजातीय कल्याण की चुनौतियों और अवसरों की खोज करते हुए डोमेन विशेषज्ञों, नीति पेशेवरों और हितधारकों के बीच विचार-विमर्श हुआ। प्रख्यात विद्वानों और विशेषज्ञों के पैनल ने अनुसूचित जनजाति विकास के अतीत, वर्तमान और भविष्य पर चर्चा को समृद्ध किया। प्रमुख वक्ताओं में डॉ. प्रकाश चंद कांडपाल (प्रोफेसर, जेएनयू), प्रो. पवनेश कुमार (इग्नू), श्री चक्षु रॉय (पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च), श्री बिनय कुमार सिंह (वरिष्ठ शोधकर्ता, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी फाउंडेशन), ए. के. चौबे (महासचिव, भारतीय आदिम जाति सेवक संघ), श्री प्रकाश उईके (पूर्व न्यायाधीश), और डॉ. अभिषेक श्रीवास्तव (असिस्टेंट प्रोफेसर, जेएनयू) शामिल रहे।</div>
<div> </div>
<div>कार्यक्रम के दौरान ही पॉलिसी संवाद के दसवें अंक का विमोचन मुख्य एवं विशिष्ट अतिथियों द्वारा किया गया। प्रतिष्ठित प्रोफेसरों और विश्लेषकों के एक संपादकीय बोर्ड द्वारा संपादित यह पत्रिका शासन, सामाजिक-आर्थिक विकास और नीति विश्लेषण पर अंतर्दृष्टि प्रदान करती रही है। पॉलिसी संवाद भारत के नीति परिदृश्य के भविष्य को आकार देने वाले विद्वानों के प्रभावशाली संवाद के लिए एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में काम कर रहा है।</div>
<div> </div>
<div>कार्यक्रम का समापन डॉ. प्रवीण कुमार झा द्वारा दिए गए धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। इस अवसर पर पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के लैंप फैलो, विभिन्न विश्वविद्यालयों के छात्र, लोक नीति से जुड़े प्रशासनिक अधिकारी व शोधार्थी उपस्थित रहे।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>दिल्‍ली</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/150554/one-day-workshop-on-public-policy-for-tribal-welfare-by</link>
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                <pubDate>Sat, 29 Mar 2025 14:41:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
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