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                <title>Indian knowledge tradition - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Indian knowledge tradition RSS Feed</description>
                
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                <title>परमाणु शक्ति संपन्न भारत में कब होगी बालिका शिक्षा शत-प्रतिशत।</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div dir="ltr" style="text-align:justify;">भारत विश्व की सबसे प्राचीन ज्ञान परंपराओं वाला देश रहा है। तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला और वल्लभी जैसे विश्वविद्यालयों ने विश्व को शिक्षा का प्रकाश दिया। वैदिक काल में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यक्ति के बौद्धिक, नैतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक विकास को सुनिश्चित करना था।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br /></div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"> गार्गी, मैत्रेयी और लोपामुद्रा जैसी विदुषी महिलाओं ने सिद्ध किया था कि भारतीय संस्कृति में नारी शिक्षा का गौरवशाली इतिहास रहा है। किंतु मध्यकालीन सामाजिक रूढ़ियों और औपनिवेशिक शासन के प्रभाव से बालिका शिक्षा पिछड़ती चली गई। 1835 में लॉर्ड मैकाले ने अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली लागू की। इसका उद्देश्य भारतीय समाज</div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181062/when-will-girls-education-be-100-in-nuclear-power-india"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/4.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div dir="ltr" style="text-align:justify;">भारत विश्व की सबसे प्राचीन ज्ञान परंपराओं वाला देश रहा है। तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला और वल्लभी जैसे विश्वविद्यालयों ने विश्व को शिक्षा का प्रकाश दिया। वैदिक काल में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यक्ति के बौद्धिक, नैतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक विकास को सुनिश्चित करना था।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br /></div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"> गार्गी, मैत्रेयी और लोपामुद्रा जैसी विदुषी महिलाओं ने सिद्ध किया था कि भारतीय संस्कृति में नारी शिक्षा का गौरवशाली इतिहास रहा है। किंतु मध्यकालीन सामाजिक रूढ़ियों और औपनिवेशिक शासन के प्रभाव से बालिका शिक्षा पिछड़ती चली गई। 1835 में लॉर्ड मैकाले ने अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली लागू की। इसका उद्देश्य भारतीय समाज में ऐसे कर्मचारियों का वर्ग तैयार करना था जो अंग्रेजी शासन के प्रशासनिक कार्यों को संचालित कर सके। आधुनिक विज्ञान और अंग्रेजी भाषा के प्रसार में इस शिक्षा प्रणाली का योगदान रहा, किंतु इसने भारतीय ज्ञान परंपरा, नैतिक शिक्षा और कौशल आधारित शिक्षण को काफी हद तक हाशिए पर पहुंचा दिया। उस समय महिलाओं की शिक्षा लगभग नगण्य थी। समाज में बाल विवाह, पर्दा प्रथा और लैंगिक असमानता जैसी कुरीतियां लड़कियों की शिक्षा में बड़ी बाधा थीं।<br />समाज सुधारकों का योगदान</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;">+<br />ऐसे कठिन समय में सावित्रीबाई फुले और महात्मा ज्योतिराव फुले ने बालिका शिक्षा की अलख जगाई। 1848 में उन्होंने लड़कियों के लिए पहला आधुनिक विद्यालय प्रारंभ किया।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने महिला शिक्षा और सामाजिक सुधारों को नई दिशा दी। बाद में महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव अंबेडकर तथा स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम माना।<br />डॉ. अंबेडकर का प्रसिद्ध संदेश</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />"शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो।"<br />स्वतंत्र भारत में शिक्षा का विकास</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत की साक्षरता दर लगभग 18 प्रतिशत थी। महिलाओं की साक्षरता तो 10 प्रतिशत से भी कम थी। संविधान निर्माताओं ने शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का मूल आधार माना।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />समय-समय पर कोठारी आयोग, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968, 1986, सर्व शिक्षा अभियान, शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 तथा नई शिक्षा नीति 2020 जैसे प्रयास किए गए। इन प्रयासों से शिक्षा का दायरा बढ़ा और लड़कियों की विद्यालयों तक पहुंच बेहतर हुई।.आज भारत की साक्षरता दर 77 प्रतिशत के आसपास पहुंच चुकी है, जबकि महिला साक्षरता दर 70 प्रतिशत से अधिक है। यह प्रगति उत्साहजनक है, किंतु अभी भी पुरुषों और महिलाओं की साक्षरता में अंतर बना हुआ है।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />विश्व के सर्वाधिक शिक्षित देशों से सीख<br />विश्व में फिनलैंड, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, जापान और नॉर्वे जैसे देशों की शिक्षा व्यवस्था विश्व में आदर्श मानी जाती है। फिनलैंड की शिक्षा व्यवस्था</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />फिनलैंड में शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में अंक प्राप्त करना नहीं, बल्कि जीवन कौशल विकसित करना है। वहां बच्चों पर अनावश्यक परीक्षा का दबाव नहीं होता। शिक्षकों को अत्यंत सम्मान और स्वायत्तता प्राप्त है।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br /></div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"> बालिका और बालक के बीच किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाता। सिंगापुर ने शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का सबसे बड़ा साधन बनाया। वहां विज्ञान, गणित, तकनीक और कौशल आधारित शिक्षा पर विशेष बल दिया जाता है। शिक्षा को उद्योगों और रोजगार से जोड़ा गया है।<br />जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में अनुशासन, नैतिकता, समयबद्धता और तकनीकी दक्षता पर विशेष ध्यान दिया जाता है। परिणामस्वरूप ये देश सीमित प्राकृतिक संसाधनों के बावजूद आर्थिक महाशक्ति बन गए।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;">भारत में प्रतिभा की कोई कमी कभी भी नहीं रही है, किंतु शिक्षा व्यवस्था अभी भी परीक्षा-केंद्रित बनी हुई है। रटंत प्रणाली, विद्यालयों की असमान गुणवत्ता, शिक्षकों की कमी और ग्रामीण क्षेत्रों में संसाधनों का अभाव आज भी चुनौतियां हैं।नई शिक्षा नीति 2020 ने इन समस्याओं के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। इसमें मातृभाषा आधारित शिक्षा, कौशल विकास, डिजिटल शिक्षण और बहुविषयक अध्ययन पर बल दिया गया है। किंतु इसके वास्तविक लाभ तभी मिलेंगे जब इसका प्रभावी क्रियान्वयन हो। बालिका शिक्षा का सत प्रतिशत होना इसलिए भी आवश्यक है कि शिक्षित बेटी, समृद्ध परिवार</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />एक शिक्षित महिला अपने परिवार को बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा और संस्कार प्रदान करती है। वह अगली पीढ़ी की प्रथम शिक्षिका होती है।सामाजिक कुरीतियों का अंत भी।बाल विवाह, दहेज प्रथा, लैंगिक भेदभाव और घरेलू हिंसा जैसी समस्याओं को समाप्त करने में शिक्षा सबसे प्रभावी साधन है</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />विश्व बैंक सहित अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का मानना है कि महिलाओं की शिक्षा में निवेश किसी भी देश के आर्थिक विकास को तीव्र गति देता है। यदि भारत की प्रत्येक बेटी शिक्षित होगी तो देश की उत्पादकता और आर्थिक क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />शिक्षित महिलाएं स्वास्थ्य, पोषण और परिवार नियोजन के प्रति अधिक जागरूक होती हैं। इससे मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में कमी आती है।<br />आज महिलाएं विज्ञान, अंतरिक्ष, प्रशासन, राजनीति, सेना और उद्यमिता के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित कर रही हैं। शिक्षा उन्हें नेतृत्व और नवाचार की शक्ति प्रदान करती है।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />महापुरुषों की दृष्टि में नारी शिक्षा<br />स्वामी विवेकानंद ने कहा</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />"राष्ट्र की प्रगति का सबसे अच्छा मापदंड वहां की महिलाओं की स्थिति है।"डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का मत था कि<br />"महिलाओं का सशक्तिकरण और शिक्षा किसी राष्ट्र के विकास का सबसे प्रभावी माध्यम है।"पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था<br />"एक महिला को शिक्षित करना एक पीढ़ी को शिक्षित करना है।"</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />इक्कीसवीं सदी ज्ञान, विज्ञान और नवाचार की सदी है। विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा जब देश की प्रत्येक बेटी शिक्षित, आत्मनिर्भर और सशक्त बनेगी। शिक्षा केवल विद्यालय की चारदीवारी तक सीमित नहीं है; यह सामाजिक चेतना, आर्थिक समृद्धि और राष्ट्रीय विकास का आधार है। मैकाले की शिक्षा प्रणाली से लेकर नई शिक्षा नीति तक भारत ने लंबी यात्रा तय की है, किंतु अभी मंजिल दूर है। यदि सरकार, समाज, परिवार और शैक्षणिक संस्थान मिलकर बालिका शिक्षा को शत-प्रतिशत अनिवार्य बनाने का संकल्प लें, तो भारत न केवल विश्व की सबसे बड़ी युवा शक्ति बनेगा, बल्कि सबसे विकसित और ज्ञानवान राष्ट्रों की अग्रिम पंक्ति में भी खड़ा होगा।<br />क्योंकि किसी राष्ट्र का भविष्य उसके विद्यालयों में नहीं, बल्कि उसकी शिक्षित बेटियों की आंखों में स्वप्न बनकर पलता है।<br /><br />संजीव ठाकुर, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिंतक, स्तंभकार, रायपुर छत्तीसगढ़, 9009 415 415,<div>कविता,</div><div>संजीव-नी।<br />शिक्षा का कवच।<br /><br />शिक्षा का कवच।<br />कुछ देना ही तो आइये,<br />नन्हीं बालिकाओं को<br />स्वर्ण के गहने नहीं,<br />शिक्षा का कवच दें।<br />उनकी हथेलियों में<br />रोटी के साथ-साथ<br />कुछ अक्षर भी रख दें,<br />जो भूख से जुझतीं<br />उन्हें ज्ञान की कुंजी दें<br />अँधेरे बंद कमरों में<br />रोशन-दान बनती,<br />ज्ञान की रोशनी के लिए<br />बंद रास्तों पर<br />एक नया आकाश फैला देती,<br />उनकी आँखों में<br />सिर्फ़ स्वप्न ना रखें ,<br />उन तक पहुँचने के पंख भी दें।<br />उन्हें ज्ञान दें कि<br />अपने हिस्से की धूप<br />खुद चुन सकें।<br />किताबें जब उनके हांथों में होंगी,<br />तो सदियों के कई बोझ<br />आप उतर जाएँगे।<br />कलम उँगलियों से चलेंगीं<br />तक़दीर की कविता भी<br />लिखी जाएगी।<br />शिक्षित बालिका<br />अपना जीवन ही नहीं संवारती,<br />आने वाली पीढ़ियों के लिए<br />उजला दीप बन जाती।<br />आइये,<br />बेटी को शिक्षा का रक्षा-कवच दें,<br />ताकि वह<br />अपने सपनों, अपने अधिकारों<br />अपने अस्तित्व की रक्षा<br />स्वयं कर सके।<br /><br />संजीव ठाकुर, रायपुर छत्तीसगढ़, 9009 415 415,</div></div><div class="yj6qo" style="text-align:justify;"><br /></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div></div></div></div><div class="hq gt" style="text-align:justify;"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 12:57:59 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
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                <title> एक विदूषक से घबड़ाती राजसत्ता</title>
                                    <description><![CDATA[<p>क्या जमाना आ गया है कि राजसत्ता एक अदने से विदूषक से घबड़ाने लगी है। मुंबई में कुणाल कामरा नाम के एक विदूषक की पैरोडी के बाद एक वर्णसंकर  सियासी दल के कार्यकर्ताओं ने कुणाल के दफ्तर में जिस तरह से तबाही मचाई उसे देखकर लगता है कि  राजसत्ता कितनी कमजोर और असहिष्णु है। कुणाल ने किसी का नाम नहीं लिया । किसी को गाली नहीं दी ,लेकिन कहते हैं न कि-' चोर की दाढ़ी में तिनका ' होता है ,सो चोरों ने कुणाल को निशाने पर ले लिये। अब महाराष्ट्र की पूरी राजसत्ता कुणाल के खिलाफ राजदंड लिए खड़ी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/150312/%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/kunal-1.jpg" alt=""></a><br /><p>क्या जमाना आ गया है कि राजसत्ता एक अदने से विदूषक से घबड़ाने लगी है। मुंबई में कुणाल कामरा नाम के एक विदूषक की पैरोडी के बाद एक वर्णसंकर  सियासी दल के कार्यकर्ताओं ने कुणाल के दफ्तर में जिस तरह से तबाही मचाई उसे देखकर लगता है कि  राजसत्ता कितनी कमजोर और असहिष्णु है। कुणाल ने किसी का नाम नहीं लिया । किसी को गाली नहीं दी ,लेकिन कहते हैं न कि-' चोर की दाढ़ी में तिनका ' होता है ,सो चोरों ने कुणाल को निशाने पर ले लिये। अब महाराष्ट्र की पूरी राजसत्ता कुणाल के खिलाफ राजदंड लिए खड़ी है।</p>
<p>कोई माने या न माने किन्तु ये कटु सत्य है कि  भाजपा जब से सत्ता में आयी है तभी से देश में असहिष्णुता ,साम्प्रदायिकता,संकीर्णता और बेसब्री सीमा से ज्यादा बढ़ गयी है।  भाजपा सनातन की बात करती है ,भारतीय शिक्षा और संस्कारों की बात करती है लेकिन इसके बारे में शायद जानती कुछ भी नहीं है ।  यदि जानती होती तो कुणाल कामरा के शो को लेकर तालिबानों की तरह उसके ऊपर टूट न पड़ती। कामरा के शो को लेकर बवाल शिव सेना [एकनाथ शिंदे ]ने किया है। शिंदे के बारे में कुणाल ने जो कहा वो कटु सत्य है कि  शिंदे ने न सिर्फ मूल शिव सेना से गद्दारी की बल्कि अपना सियासी बल्दियत भी बदली। बस यही वो दुखती रग थी जिसके ऊपर हाथ रखने से एकनाथ के कार्यकर्ता गुंडई पर उतर ए और उन्होंने कुणाल को सजा देने का दुस्साहस दिखा दिया।</p>
<p>शिवसेना हो या भाजपा या कांग्रेस जब भी सत्ता में आते हैं तब उनका चरित्र लगभग एक जैसा हो जाता है। कांग्रेस चूंकि लम्बे समय तक सत्ता में रही इसलिए इसने सब्र करना भी सीखा और हास्य बोध   भी पैदा किया ,अन्यथा कांग्रेस के राज में लक्ष्मण, शंकर, सुधीर तैलंग  या काक जैसे मशहूर व्यंग्य चित्रकार पनप न पाते।  न राग दरबारी लिखी जा सकती थी और न हरिशंकर परसाई जैसे लेखक जीवित रह पाते ।  परसाई जी को भी संघियों ने मारने की कोशिश की थी लेकिन वे अपनी कमर टूटने के बाद भी दशकों तक अपना काम करते रहे। शिवसेना को शायद ये पता नहीं है कि  शिवसेना का ट्रीटमेंट हो   या  संघ का ट्रीटमेंट, किसी विदूषक को,किसी व्यंग्यकार को किसी हास्य कलाकार को उसका काम करने से रोक नहीं सकता।</p>
<p>भारतीय ज्ञान परमपरा की वक़ालत करने वाले संघी और शिवसैनिक शायद भारतीय ज्ञान परंपरा को जानते ही नहीं है।  उन्हें पता  ही नहीं है कि  साहित्यमें ,नाटक में कितने रस होते हैं ? वे यदि ये सब जानते तो खुद अपने पुरखों की कला का सम्मान करते ।  शिवसेना के संस्थापक बाला साहब ठाकरे खुद  एक व्यग्यकार यानि विदूषकों की बिरादरी से आते थे।  व्यंग्य के लिए कलम हो,कूची हो या मंच हो एक सशक्त माध्यम होता है। हास्य कलाकर हिंदुस्तान में भी होते हैं और पाकिस्तान में भी।</p>
<p>इंग्लैंड  में भी होते हैं और अमरीका में भी। जीवन में यदि हास्य और व्यंग्य न हो तो जीवन न सिर्फ नीरस हो बल्कि नर्क बन जाये ।  हास्य-व्यंग्य कलाकार या लेख जीवन को सरस् बनाता है। कटु सत्य को शक्कर में पागकर आपके सामने पेश करता है और ऐसा करना दुनिया के किसी भी मुल्क में अपराध नहीं है । केवल तालिबानी संस्कृति में हसने,व्यंग्य करने पर स्थाई रोक होती है।</p>
<p>भारत की राजनीती में हास्य बोध   लगभग मर चुका है ,हमारे नेता अब व्यंग्य करने वले को,व्यंग्य लिखने वाले को अपना दुश्मन मानने लगे हैं यही वजह है कि  पिछले एक दशक में कुणाल कामरा हों या कीकू सभी को धमकियों का समाना करना पड़ता है ,जेल जाना पड़ता है। लेकिन परसाई के वंशज कभी हार नहीं मानते ।  कुणाल ने भी हार नहीं मानी है। उसे हार मानना भी  नहीं चाहिए। भाजपाई और शिवसेना के कार्यकर्ता शायद न चार्ली चैप्लिन को जानते   हैं और न हमारे यहां के बीरबल को ।</p>
<p> वे मुल्ला नसरुद्दीन को भी नहीं जानते उन्होंने मुंगेरीलाल के बारे में भी पढ़ा और सुना नहीं है। वे तो यदि कुछ सीखे हैं तो तालिबानियों से सीखे हैं / भाजपा को मुसलमानों से नफरत   है तो शिवसेना को बिहारियों और गैर मराठियों से। दोनों कानून को अपने हाथ में लेने में कोई संकोच नहीं करते,खासतौर पर वहां ,जहां उनकी अपनी सरकार हो। कुणाल कि हाथ में संविधान की प्रति देख उन्हें लगा की मंच पर कुणालंहिं राहुल गाँधी खड़े हैं।</p>
<p>हमारे यहां जो तमाम शब्द लोकभाषा में प्रचलित और स्वीकार्य शब्द थे उन्हें भाजपा ने सत्ता में आते ही असंसदीय घोषित कर दिया। अर्थात आप उनका इस्तेमाल संसद के भीतर नहीं करसकते,किन्तु संसद  के बाहर सड़क या किसी और मंच पर इनका इस्तेमाल न अपराध है और न इन्हें प्रतिबंधित किया गया है।  कुणाल ने जिस ' गद्दार ' शब्द का इस्तेमाल अपने गीत में किया वो भी सरकार की नजर में असंसदीय है ।</p>
<p> संसद  की बुकलेट में ‘गद्दार’, ‘घड़ियाली आंसू’, ‘जयचंद’, ‘शकुनी’, ‘जुमलाजीवी’, ‘शर्मिंदा’, ‘धोखा’, ‘भ्रष्ट’, ‘नाटक’, ‘पाखंड’, ‘लॉलीपॉप’, ‘चाण्डाल चौकड़ी’, ‘अक्षम’, ‘गुल खिलाए’ और ‘पिठ्ठू’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल अब लोकसभा और राज्यसभा में अब असंसदीय माना गया है। मेरा तो एक उपन्यास ही ' गद्दार ' नाम से है।गनीमत है की कांग्रेस से भाजपाई हो चुके सिंधिया समर्थकों ने इस पर कोई बखेड़ा खड़ा नहीं किया। वैसे भी  राजनीति में गद्दारी और बाप बदलना एक आम मुहावरा है।  इसे सुनकर यदि कोई बमकता है तो उसे राजनीति छोड़ देना चाहिए।</p>
<p>कुणाल कामरा कोई साहित्यकार नहीं है।  वे एक स्टेंडअप कॉमेडियन हैं। ये उनका व्यवसाय है।  ये व्यवसाय गैर कानूनी नहीं है ,इसलिए उनके ऊपर हुए हमले की ,उन्हें दी जाने वाली धमकियों की घोर निंदा की जाना चाहिए। हमारे यहां तो निंदकों तक को नियरे रखने की सलाह दी जाती है क्योंकि वे स्वभाव को बिना पानी-साबुन कि निर्मल करने का माद्दा रखते हैं। एक सभ्य समाज में यदि हास्य-व्यंग्य को लेकर सरकार की और से असहिष्णुता का प्रदर्शन किया जायेगा, कलाकारों को धमकाया जायेगा ,उन्हें जेलों में डाला जाएगा    तो लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता। हास्य-व्यंग्य कोई गाली नहीं हैं।</p>
<p>ये अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है ठीक उसी तरह जिस तरह की टीवी है,रेडियो है सोशल मीडिया है। इन सभी माध्यमों की सुरक्षा अनिवार्य है। इस मामले में देश की सरकार को ही नहीं बल्कि देश की सर्वोच्च न्यायपीठ को भी हस्तक्षेप करना चाहिए और कुणाल को ही नहीं  बल्कि हरिशंकर परसाई परम्परा को सांरक्षण देन चाहिए। अन्यथा वो दिन दूर नहीं जबआपको ताश के 52  पत्तों में से जोकर गायब नजर आये ।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 25 Mar 2025 11:49:50 +0530</pubDate>
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