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                <title>rabindranath tagore - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>वंदे मातरम् पर विवाद देश की मूल भावना से खिलवाड़</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">इस से ज्यादा शर्मसार करने वाली बात क्या हो सकती है कि आज लोकतंत्र के पावन मंदिर में राष्ट्रगीत को लेकर खेमेबाजी हो रही है जबकि इस पर समूचे राष्ट्र को एकमत होना चाहिए था। वंदेमातरम् गीत के 150 वर्ष पर चर्चा होने के अवसर पर लोकसभा में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि 'वंदे मातरम्' गीत की गूंज ने न सिर्फ अंग्रेजों की नींद उड़ा दी थी बल्कि पूरे भारत में उत्साह का ऐसा माहौल तैयार किया था जो न सिर्फ स्वतंत्रता का मंत्र बना बल्कि आजाद भारत के लिए भी विजन बनकर सामने आया।</div>
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<div style="text-align:justify;">यह गीत आजादी का उद्‌गार</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/163135/controversy-over-vande-mataram-is-playing-with-the-basic-spirit"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-12/download2.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">इस से ज्यादा शर्मसार करने वाली बात क्या हो सकती है कि आज लोकतंत्र के पावन मंदिर में राष्ट्रगीत को लेकर खेमेबाजी हो रही है जबकि इस पर समूचे राष्ट्र को एकमत होना चाहिए था। वंदेमातरम् गीत के 150 वर्ष पर चर्चा होने के अवसर पर लोकसभा में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि 'वंदे मातरम्' गीत की गूंज ने न सिर्फ अंग्रेजों की नींद उड़ा दी थी बल्कि पूरे भारत में उत्साह का ऐसा माहौल तैयार किया था जो न सिर्फ स्वतंत्रता का मंत्र बना बल्कि आजाद भारत के लिए भी विजन बनकर सामने आया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह गीत आजादी का उद्‌गार बन गया था और हर देशवासी इस गीत से प्रेरित होकर अंग्रेजों के खिलाफ जंग लड़ रहा था। इस गीत से देश में बने नये माहौल को देखकर अंग्रेज बौखला गये थे इसलिए उन्होंने इस गीत पर प्रतिबंध लगा दिया और इसे गाने को अपराध मानकर लोगों पर जुल्म ढहाने शुरू कर दिए थे। प्रधानमंत्री ने कहा कि 'वंदे मातरम्' पर चर्चा में कोई पक्ष और प्रतिपक्ष नहीं है क्योंकि इसी गीत से मिली प्रेरणा के कारण हम सब यहां बैठे हैं और यह हम सबके लिए पावन पर्व है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको पता रहे वंदे मातरम को 1950 में भारत के संविधान सभा द्वारा भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया गया। वंदे मातरम की की रचना शुरू में स्वतंत्र रूप से की गई थी और बाद में इसे बंकिम चंद्र चटर्जी के 1882 में प्रकाशित उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया गया। इसे पहली बार रवींद्रनाथ टैगोर ने 1896 में कोलकाता में हुए कांग्रेस अधिवेशन में गाया था। एक राजनीतिक नारे के रूप में वंदे मातरम का पहली बार प्रयोग 7 अगस्त 1905 को हुआ था। इस वर्ष, 7 नवंबर 2025 को भारत के राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ थी, जिसका अनुवाद मां, मैं आपको नमन करता हूं, है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज 8 दिसंबर को सदन में इस पर चर्चा हुई। जिस पर सरकार एवं विपक्षियों ने अपनी अपनी राय रखी। यह रचना, एक चिरस्थायी गान ने स्वतंत्रता सेनानियों और राष्ट्र निर्माताओं की अनगिनत पीढ़ियों को प्रेरित किया है, जो भारत की राष्ट्रीय पहचान और सामूहिक भावना के स्थायी प्रतीक के रूप में खड़ा है। बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित, वंदे मातरम पहली बार साहित्यिक पत्रिका बंगदर्शन में 7 नवंबर 1875 को प्रकाशित हुआ था। बाद में, बंकिम चंद्र चटर्जी ने अपने अमर उपन्यास आनंदमठ में भजन को शामिल किया, जो 1882 में प्रकाशित हुआ था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसे रवींद्रनाथ टैगोर ने संगीतबद्ध किया था। यह राष्ट्र की सभ्यता, राजनीतिक और सांस्कृतिक चेतना का एक अभिन्न अंग बन गया है। इस मील के पत्थर को मनाने का अवसर एकता, बलिदान और भक्ति के कालातीत संदेश की पुष्टि करने का अवसर प्रदान करता है। बंदे मातरम पर संसद में आज 8 दिसंबर सोमवार को विशेष चर्चा हुई और, ये ऐसे दौर में हो रहा है जब विपक्ष एसआईआर पर चर्चा चाहता है। राज्यसभा बुलेटिन में वंदे मातरम को भी जय हिंद और दूसरे शब्दों के साथ शामिल किया गया है। ममता बनर्जी का भी इस मुद्दे पर मुखर हो जाना, वंदे मातरम के बंगाल कनेक्शन की तरफ खास इशारे कर रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">संसद में राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के 150 साल पूरे होने पर चर्चा हुई। पक्ष और विपक्ष दोनों ने इस विषय पर अपनी राय रखी। वंदे मातरम् पर यह बहस केवल एक रस्म नहीं है बल्कि यह ऐसे समय पर हो रही है जब इस गीत को लेकर राजनीति गरम है। नवंबर महीने में इस गीत के 150 साल पूरे होने पर पीएम मोदी ने कहा था कि कांग्रेस ने 1937 के अधिवेशन में राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के कुछ जरूरी हिस्से हटा दिए। कांग्रेस का यह कदम विभाजन के बीज बोने जैसा था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पीएम मोदी का आरोप था कि राष्ट्रगीत को टुकड़ों में बांटकर इसकी मूल भावना कमजोर कर दी गई है। सबसे पहले वंदे मातरम् की रचना की बात करें तो बॉकम चंद्र चटर्जी ने इस राष्ट्रगीत की रचना की थी। इसे पहली बार सात नवंबर 1875 को साहित्यिक पत्रिका बंगदर्शन में प्रकाशित किया गया था। उस दिन से लेकर आजतक यह गीत करोड़ों देशवासियों के हृदय में देशभक्ति को अलख जगा रहा है। मातृभूमि की आराधना के प्रतीक इस गीत को सुनते ही ब्रिटिश अफसरों के कान खड़े हो जाते। अंग्रेजों द्वारा वंदे मातरम् गीत को गाने या छापने पर भी बैन लगा दिया गया था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आगे चलकर यह छह छंदों वाला गीत मूल रूप से बंकिम चंद्र चटर्जी के उपन्यास आनंदमठ का हिस्सा बना जो 1882 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में सन्यासी विद्रोह की कहानी के माध्यम से बंकिम ने ने भारत को मां दुर्गा के रूप में चित्रित किया इसमें सुफला, सुफला, मलयजशीतलाम...। यह गीत गुलामी की जंजीरों में जकड़े भारत को समृद्धि और शक्ति का सपना दिखाता था। 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में इस गीत को एक नई पहचान मिली। रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे संगीतमय रूप दिया और इसे कलकत्ता के अधिवेशन में गाया। संगीतमय प्रस्तुति ने इस गीत को अमर कर दिया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह गीत जनमानस में तेजी से लोकप्रिय होने लगा। हर तरफ वंदे मातरम् की गूंज सुनाई देने लगी। तब ब्रिटिश राज ने इसे अपनी सरकार के खिलाफ खतरनाक मान लिया। उसके बाद 1905 के बंगाल विभाजन के दौरान स्वदेशी आंदोलन में यह नारा बन गया। कालांतर में इस गीत को लेकर मुसलमानों की तरफ से आपत्ति जताई जाने लगी। 1923 में कांग्रेस अधिवेशन में वंदे मातरम् गायन के समय तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष मोहम्मद अली जौहर मंच से उठकर चले गए थे। इस गीत को लेकर मुस्लिम पक्ष की आपत्ति है कि वंदे मातरम् के जरिए उन पर हिंदू देवी देवताओं की पूजा का दवाव डाला जा रहा है। वंदे मातरम् में मंदिर और दुर्गा शब्दों का इस्तेमाल हुआ है। कांग्रेस कार्यसमिति ने 1937 में तय किया कि राष्ट्रीय आयोजनों में इस गीत के केवल पहले दो पद ही गाए जाएंगे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यही कारण रहा कि 1937 में पंडित जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में हुए कांग्रेस अधिवेशन में वंदे मातरम् के केवल दो छंद ही गाए गए। उस समय से इसी नियम का पालन किया जाने लगा। आजादी के बाद इसे नियम बनाते हुए 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत घोषित कर दिया। वंदे मातरम् को आज भी आधिकारिक रूप से राष्ट्रीय गीत का दर्जा मिला हुआ है। लेकिन सरकारी समारोहों में इसके पहले के दो छंदों का ही गायन होता है। हालांकि बाल कया था। गंगाधर तिलक ने इसे राष्ट्रीय प्रार्थना और अरविंदो घोष घोष ने मंत्र कहते हुए इसे राष्ट्रगान का दर्जा देने की की मांग की थी। यह गीत राष्ट्र गान की जगह तो नहीं ले सका लेकिन राष्ट्रगीत के तौर पर आज भी करोड़ों देशवासियों को प्रेरणा दे रहा है। अब इसके 150 साल पूरे होने पर संसद में चर्चा कराई गई।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बंदे मातरम आनंद मठ के संतानों द्वारा गाया जाने वाला गीत है। यह देशभक्ति के धर्म के प्रतीक के रूप में खड़ा था, जो आनंद मठ का केंद्रीय विषय था। अपने मंदिर में, उन्होंने मातृभूमि का प्रतिनिधित्व करने वाली मां की तीन मूर्तियां स्थापित कीं। बंदे मातरम के रचयिता बंकिम चंद्र चटर्जी (1838-1894) 19वीं सदी के के बंगाल बंगाल के के सब सबसे प्रमुख व्यक्तियों में से एक थे। उन्नीसवीं सदी के दौरान बंगाल के बौद्धिक और साहित्यिक इतिहास में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। एक प्रतिष्ठित उपन्यासकार, कवि और निबंधकार के रूप में, उनके योगदान ने आधुनिक बंगाली गद्य के विकास और उभरते भारतीय रष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आनंदमठ (1882), दुर्गेशनंदिनी (1865), कपालकुंडला (1866) और देवी चौधरानी (1884) सहित उनकी उल्लेखनीय रचनाएं, आत्म-पहचान के लिए प्रयासरत एक उपनिवेशित समाज की सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक चिंताओं को दर्शाती हैं। वंदे मातरम की रचना को राष्ट्रवादी चिंतन में एक मील का पत्थर माना जाता है, जो मातृभूमि के प्रति समर्पण और आध्यात्मिक आदर्शवाद के संश्लेषण का प्रतीक है। वंदे मातरम में उन्होंने देश को मातृभूमि का दर्शन कराया, जिसे माता का रूप दिया गया। अक्टूबर 1905 में, मातृभूमि को एक मिशन और धार्मिक जुनून के रूप में बढ़ावा देने के लिए उत्तरी कोलकाता में एक बंदे मातरम् संप्रदाय की स्थापना की गई थी। हर रविवार को, समाज के सदस्य प्रभात फेरी में निकलते थे, वंदे मातरम् गाते थे और मातृभूमि के समर्थन में लोगों से स्वैच्छिक योगदान स्वीकार करते थे। रवींद्रनाथ टैगोर भी कभी-कभी कभी संप्रदाय की प्रभात फेरी में शामिल होते थे। 20 मई 1906 को, बारीसाल (अब बांग्लादेश में) में, एक अभूतपूर्व वंदे मातरम जुलूस निकला। इसमें दस हजार से अधिक प्रतिभागियों, हिंदू और मुस्लिम दोनों ने भाग लिया था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इतिहास गवाह है कि जिन्ना को खुश करने के लिए पं. जवाहर लाल नेहरू ने उन द्वारा उठाई आपत्तियों के उत्तर में लिखा था कि कांग्रेस ने वंदे मातरम् को भी राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार नहीं किया, जबकि सत्य यह है कि आनंदमठ के संन्यासी भवानन्द की तरह आज भी देशप्रेमियों के रगों में वंदे मातरम् गीत उबाल ला देता है और मां भूमि के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार हो जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जिस देश के पीछे न जाने कितनी मां की गोद सूनी हो गई, कितनी महिलाओं की मांग के सिंदूर धुल गए, बंग-भंग आन्दोलन के समय जो गीत धरती से आकाश तक गूंज उठा, बंगाल की खाड़ी से जिसकी लहरें इंगलिश चैनर पार कर ब्रिटिश पार्लियामेंट तक पहुंच गईं, जिस गीत के कारण बंगाल का बंटवारा नहीं हो सका, उसी गीत को अल्पसंख्यकों की तुष्टि के लिए खंडित किया गया। यहां तक कि उन्हें प्रसन्न करने के लिए मातृभूमि को खंडित किया गया। उसके बाद भी जनमानस को उद्वेलित करने वाले इस गीत को प्रमुख राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार नहीं किया गया।इस से बड़ा दुर्भाग्य कुछ नहीं हो सकता है। आज संसद में वंदेमातरम को लेकर जो खींचतान पक्ष विपक्ष कर रहा है वह भी वंदेमातरम की गरिमा से खिलवाड़ से अधिक कुछ नहीं है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 Dec 2025 16:57:55 +0530</pubDate>
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                <title>भगत सिंह की जेल नोटबुक की कहानी </title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">भगत सिंह और उनके साथी सुखदेव और राजगुरु के शहादत दिवस </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी महीने में है। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भगत सिंह की जेल डायरी </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के दिलचस्प इतिहास को समझने का प्रयास इस लेख में मैंने किया है। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यह डायरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो आकार में एक स्कूल नोटबुक के समान थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जेल अधिकारियों द्वारा </span>12<span lang="hi" xml:lang="hi">  सितंबर</span>, 1929<span lang="hi" xml:lang="hi">  को भगत सिंह को दी गई थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिस पर लिखा था “भगत सिंह के लिए </span>404<span lang="hi" xml:lang="hi">  पृष्ठ।” अपनी कैद के दौरान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने इस डायरी में </span>108<span lang="hi" xml:lang="hi">  विभिन्न लेखकों द्वारा लिखी गई </span>43<span lang="hi" xml:lang="hi">  पुस्तकों के आधार पर नोट्स बनाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें कार्ल मार्क्स</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फ्रेडरिक एंगेल्स</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/150272/story-of-bhagat-singhs-jail-notebook%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/51gjjqfwzcl._ac_uf1000,1000_ql80_.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">भगत सिंह और उनके साथी सुखदेव और राजगुरु के शहादत दिवस </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी महीने में है। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भगत सिंह की जेल डायरी </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के दिलचस्प इतिहास को समझने का प्रयास इस लेख में मैंने किया है। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यह डायरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो आकार में एक स्कूल नोटबुक के समान थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जेल अधिकारियों द्वारा </span>12<span lang="hi" xml:lang="hi"> सितंबर</span>, 1929<span lang="hi" xml:lang="hi"> को भगत सिंह को दी गई थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिस पर लिखा था “भगत सिंह के लिए </span>404<span lang="hi" xml:lang="hi"> पृष्ठ।” अपनी कैद के दौरान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने इस डायरी में </span>108<span lang="hi" xml:lang="hi"> विभिन्न लेखकों द्वारा लिखी गई </span>43<span lang="hi" xml:lang="hi"> पुस्तकों के आधार पर नोट्स बनाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें कार्ल मार्क्स</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फ्रेडरिक एंगेल्स और लेनिन शामिल थे। उन्होंने इतिहास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दर्शन और अर्थशास्त्र पर व्यापक नोट्स लिए। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">भगत सिंह का ध्यान न केवल उपनिवेशवाद के खिलाफ संघर्ष पर था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सामाजिक विकास से संबंधित मुद्दों पर भी था। वे विशेष रूप से पश्चिमी विचारकों को पढ़ने के प्रति झुकाव रखते थे। राष्ट्रवादी संकीर्णता से परे जाकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने आधुनिक वैश्विक दृष्टिकोणों के माध्यम से मुद्दों को हल करने की वकालत की। यह वैश्विक दृष्टिकोण उनके समय के केवल कुछ नेताओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे महात्मा गांधी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जवाहरलाल नेहरू और डॉ. बी.आर. अंबेडकर के पास था। </span></p>
<p class="MsoNormal">1968<span lang="hi" xml:lang="hi"> में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय इतिहासकार जी. देवल को भगत सिंह के भाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुलबीर सिंह के साथ भगत सिंह की जेल डायरी की मूल प्रति देखने का अवसर मिला। अपने नोट्स के आधार पर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देवल ने पत्रिका ‘पीपल्स पाथ’ में भगत सिंह के बारे में एक लेख लिखा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें उन्होंने </span>200<span lang="hi" xml:lang="hi"> पृष्ठ की डायरी का उल्लेख किया।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> अपने लेख में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जी. देवल ने उल्लेख किया कि भगत सिंह ने पूंजीवाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाजवाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राज्य की उत्पत्ति</span>,  <span lang="hi" xml:lang="hi">मार्क्सवाद</span>,  <span lang="hi" xml:lang="hi">साम्यवाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दर्शन और क्रांतियों के इतिहास जैसे विषयों पर टिप्पणियाँ की थीं। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि डायरी को प्रकाशित किया जाना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन यह साकार नहीं हुआ। </span></p>
<p class="MsoNormal"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2025-03/jail-notebook.jpeg" alt="jail notebook" width="538" height="815"></img>1977<span lang="hi" xml:lang="hi"> में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रूसी विद्वान एल.वी. मित्रोखोव को इस डायरी के बारे में जानकारी मिली। कुलबीर सिंह से विवरण एकत्र करने के बाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने एक लेख लिखा जो बाद में </span>1981<span lang="hi" xml:lang="hi"> में उनकी पुस्तक ‘लेनिन एंड इंडिया’ में एक अध्याय के रूप में शामिल किया गया। </span>1990<span lang="hi" xml:lang="hi"> में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">‘</span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेनिन एंड इंडिया’ का हिंदी में अनुवाद किया गया और प्रगति प्रकाशन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मॉस्को द्वारा ‘लेनिन और भारत’ शीर्षक के तहत प्रकाशित किया गया। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरी ओर</span>, 1981<span lang="hi" xml:lang="hi"> में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जी.बी. कुमार हूजा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो उस समय गुरुकुल कांगड़ी के कुलपति थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ने दिल्ली के तुगलकाबाद के पास गुरुकुल इंद्रप्रस्थ का दौरा किया। प्रशासक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शक्तिवेश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ने उन्हें गुरुकुल के तहखाने में संग्रहीत कुछ ऐतिहासिक दस्तावेज दिखाए। जी.बी. कुमार हूजा ने इस नोटबुक की एक प्रति कुछ दिनों के लिए उधार ली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन वे इसे वापस नहीं कर सके क्योंकि शक्तिवेश की कुछ समय बाद हत्या कर दी गई। </span></p>
<p class="MsoNormal">1989<span lang="hi" xml:lang="hi"> में</span>, 23<span lang="hi" xml:lang="hi"> मार्च के शहादत दिवस के अवसर पर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिंदुस्तानी मंच की कुछ बैठकें आयोजित की गईं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें जी.बी. कुमार हूजा ने भाग लिया। वहाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने इस डायरी के बारे में जानकारी साझा की। इसके महत्व से प्रभावित होकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिंदुस्तानी मंच ने इसे प्रकाशित करने का निर्णय घोषित किया। जिम्मेदारी भारतीय पुस्तक क्रॉनिकल (जयपुर) के संपादक भूपेंद्र हूजा को दी गई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें हिंदुस्तानी मंच के महासचिव सरदार ओबेरॉय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आर.पी. भटनागर और डॉ. आर.सी. भारतीय का समर्थन था।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi"> <img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2025-03/jail-diary-54.png" alt="भगत सिंह की जेल नोटबुक की कहानी " width="600" height="916"></img>हालांकि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाद में दावा किया गया कि वित्तीय कठिनाइयों ने इसके प्रकाशन को रोक दिया। यह स्पष्टीकरण अविश्वसनीय लगता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि यह संभावना नहीं है कि उपरोक्त शिक्षित मध्यम वर्ग के व्यक्तियों उस समय कुछ प्रतियां छापने का खर्च नहीं उठा सकते थे जब लागत अपेक्षाकृत कम थी। यह अधिक संभावना है कि या तो वे इसके महत्व को पहचानने में विफल रहे या बस रुचि की कमी थी। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">लगभग उसी समय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ. प्रकाश चतुर्वेदी ने मॉस्को अभिलेखागार से एक टाइप की गई फोटोकॉपी प्राप्त की और इसे डॉ. आर.सी. भारतीय को दिखाया। मॉस्को की प्रति गुरुकुल इंद्रप्रस्थ के तहखाने से प्राप्त हस्तलिखित प्रति के साथ शब्दशः समान पाई गई। कुछ महीनों बाद</span>, 1991<span lang="hi" xml:lang="hi"> में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूपेंद्र हूजा ने ‘भारतीय पुस्तक क्रॉनिकल’ में इस नोटबुक के अंश प्रकाशित करना शुरू किया। यह पहली बार था जब शहीद भगत सिंह की जेल नोटबुक पाठकों तक पहुंची। इसके साथ ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. चमनलाल ने हूजा को सूचित किया कि उन्होंने दिल्ली के नेहरू स्मारक संग्रहालय में एक समान प्रति देखी थी। </span></p>
<p class="MsoNormal">1994<span lang="hi" xml:lang="hi"> में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जेल नोटबुक को अंततः ‘भारतीय पुस्तक क्रॉनिकल’ द्वारा पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें भूपेंद्र हूजा और जी.बी. हूजा द्वारा लिखित एक प्रस्तावना थी। हालांकि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनमें से किसी को भी यह पता नहीं था कि पुस्तक की मूल प्रति भगत सिंह के भाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुलबीर सिंह के पास थी। वे जी. देवल के लेख (</span>1968) <span lang="hi" xml:lang="hi">और मित्रोखिन की पुस्तक (</span>1981) <span lang="hi" xml:lang="hi">से भी अनभिज्ञ थे। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके अलावा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगत सिंह की बहन बीबी अमर कौर के बेटे डॉ. जगमोहन सिंह ने कभी भी इस जेल नोटबुक का उल्लेख नहीं किया। इसी तरह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगत सिंह के भाई कुलतार सिंह की बेटी वीरेंद्र संधू ने भगत सिंह पर दो पुस्तकें लिखीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उन्होंने भी इस डायरी का संदर्भ नहीं दिया। इससे पता चलता है कि भगत सिंह के परिवार के सदस्य या तो नोटबुक के अस्तित्व से अनभिज्ञ थे या उसमें कोई रुचि नहीं रखते थे। हालांकि कुलबीर सिंह के पास डायरी थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उन्होंने कभी भी इसे इतिहासकारों के साथ साझा करने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने या समाचार पत्रों में जारी करने का प्रयास नहीं किया। उनकी वित्तीय स्थिति इतनी खराब नहीं थी कि वे इसे स्वयं प्रकाशित नहीं कर सकते थे। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2025-03/jail-notebook.jpeg" alt="jail notebook" width="917" height="1264"></img><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2025-03/bhagatsingh's-jail-dairy-pages_a.jpeg" alt="Bhagatsingh's Jail Dairy pages_a" width="917" height="1264"></img>यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारतीय इतिहासकारों ने इस महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज की उपेक्षा की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और इसे पहली बार एक रूसी लेखक द्वारा प्रकाशित किया गया। कांग्रेस पार्टी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो सबसे लंबे समय तक सत्ता में रही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ने स्वतंत्रता आंदोलन में भगत सिंह के बौद्धिक और वैचारिक योगदान के बारे में कोई जिज्ञासा नहीं दिखाई। उनके साथ वैचारिक मतभेद शायद यही कारण रहे होंगे कि उन्होंने कभी भी भगत सिंह के विचारों और कार्यों पर शोध करने पर ध्यान नहीं दिया। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">भगत सिंह अनुसंधान समिति की स्थापना के बाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगत सिंह के भतीजे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ. जगमोहन सिंह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और जेएनयू के भारतीय भाषा केंद्र के प्रोफेसर चमनलाल ने </span>1986<span lang="hi" xml:lang="hi"> में पहली बार भगत सिंह और उनके साथियों के लेखन को संकलित और प्रकाशित किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका शीर्षक था ‘भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज’। उस प्रकाशन में भी जेल नोटबुक का कोई उल्लेख नहीं था। यह केवल </span>1991<span lang="hi" xml:lang="hi"> में प्रकाशित दूसरे संस्करण में संदर्भित किया गया था। वर्तमान में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस पुस्तक का तीसरा संस्करण उपलब्ध है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें दोनों विद्वानों ने कई दुर्लभ जानकारी को जोड़ने और पाठकों को प्रस्तुत करने का अमूल्य कार्य किया है। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस नोटबुक में भगत सिंह द्वारा लिए गए नोट्स स्पष्ट रूप से उनके दृष्टिकोण को दर्शाते हैं। स्वतंत्रता के लिए उनकी बेचैन लालसा ने उन्हें बायरन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्हिटमैन और वर्ड्सवर्थ के स्वतंत्रता पर विचारों को लिखने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने इब्सेन के नाटक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फ्योदोर दोस्तोयेव्स्की के प्रसिद्ध उपन्यास ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और विक्टर ह्यूगो के ‘लेस मिजरेबल्स’ को पढ़ा। उन्होंने चार्ल्स डिकेंस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैक्सिम गोर्की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जे.एस. मिल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वेरा फिग्नर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शार्लोट पर्किंस गिलमैन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चार्ल्स मैके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जॉर्ज डे हेसे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऑस्कर वाइल्ड और सिंक्लेयर के कार्यों को भी पढ़ा। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">जुलाई </span>1930<span lang="hi" xml:lang="hi"> में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी कैद के दौरान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने लेनिन की ‘द कोलैप्स ऑफ द सेकंड इंटरनेशनल’ और ‘"लेफ्ट-विंग" कम्युनिज्म: एन इन्फेंटाइल डिसऑर्डर’</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रोपोटकिन की ‘म्यूचुअल एड’</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और कार्ल मार्क्स की ‘द सिविल वॉर इन फ्रांस’ को पढ़ा। उन्होंने रूसी क्रांतिकारियों वेरा फिग्नर और मोरोज़ोव के जीवन के एपिसोड पर नोट्स लिए। उनकी नोटबुक में उमर खय्याम की कविताएँ भी थीं। अधिक पुस्तकें प्राप्त करने के लिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने जयदेव गुप्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाऊ कुलबीर सिंह और अन्य को लगातार पत्र लिखे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनसे पढ़ने की सामग्री भेजने का अनुरोध किया। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी नोटबुक के पृष्ठ </span>21<span lang="hi" xml:lang="hi"> पर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने अमेरिकी समाजवादी यूजीन वी. डेब्स का उद्धरण लिखा: </span>“<span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ कहीं निचला वर्ग है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं वहाँ हूँ</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ कहीं आपराधिक तत्व हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं वहाँ हूँ</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">अगर कोई कैद है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो मैं स्वतंत्र नहीं हूँ।”  उन्होंने रूसो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">थॉमस जेफरसन और पैट्रिक हेनरी के स्वतंत्रता संघर्षों पर भी नोट्स बनाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही मानव के अहस्तांतरणीय अधिकारों पर भी। इसके अतिरिक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने लेखक मार्क ट्वेन का प्रसिद्ध उद्धरण दर्ज किया:</span>“<span lang="hi" xml:lang="hi">हमें सिखाया गया है कि लोगों का सिर काटना कितना भयानक है। लेकिन हमें यह नहीं सिखाया गया है कि सभी लोगों पर जीवनभर गरीबी और अत्याचार थोपने से होने वाली मृत्यु और भी अधिक भयानक है।” </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">पूंजीवाद को समझने के लिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगत सिंह ने इस नोटबुक में अनेक गणनाएँ कीं। उस समय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने ब्रिटेन में असमानता को दर्ज किया – आबादी के एक-नौवें हिस्से ने उत्पादन का आधा हिस्सा नियंत्रित किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि केवल एक-सातवाँ (</span>14%) <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्पादन का दो-तिहाई (</span>66.67%) <span lang="hi" xml:lang="hi">लोगों के बीच वितरित किया गया। अमेरिका में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सबसे धनी </span>1%<span lang="hi" xml:lang="hi"> के पास </span>67<span lang="hi" xml:lang="hi"> अरब डॉलर की संपत्ति थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि </span>70%<span lang="hi" xml:lang="hi"> आबादी के पास केवल </span>4%<span lang="hi" xml:lang="hi"> संपत्ति थी। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने रवींद्रनाथ टैगोर के एक कथन का भी उल्लेख किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें जापानी लोगों की धन की लालसा को "मानव समाज के लिए एक भयानक खतरा" बताया गया था। इसके अलावा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने मौरिस हिलक्विट की ‘मार्क्स टू लेनिन’ से बुर्जुआ पूंजीवाद का संदर्भ दिया। एक नास्तिक होने के नाते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगत सिंह ने "धर्म - स्थापित व्यवस्था का समर्थक: दासता" शीर्षक के तहत दर्ज किया कि "बाइबल के पुराने और नए नियम में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दासता का समर्थन किया गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और भगवान की शक्ति इसे निंदा नहीं करती।" धर्म की उत्पत्ति और उसके कार्यप्रणाली के कारणों को समझने की कोशिश करते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने कार्ल मार्क्स की ओर रुख किया। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">अपने लेखन ‘हेगेल के न्याय दर्शन के संश्लेषण के प्रयास’ में</span>, "<span lang="hi" xml:lang="hi">मार्क्स के धर्म पर विचार" शीर्षक के तहत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे लिखते हैं: </span>"<span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य धर्म का निर्माण करता है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म मनुष्य का निर्माण नहीं करता। मानव होना का अर्थ है मानव दुनिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राज्य और समाज का हिस्सा होना। राज्य और समाज मिलकर धर्म की विकृत विश्वदृष्टि को जन्म देते हैं..." </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">उनका दृष्टिकोण एक </span><span lang="hi" xml:lang="hi">क्रांतिकारी और </span><span lang="hi" xml:lang="hi">स</span><span lang="hi" xml:lang="hi">मा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ज सुधार</span><span lang="hi" xml:lang="hi">क</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> का है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका उद्देश्य पूंजीवाद को उखाड़ फेंकना और शास्त्रीय समाजवाद की स्थापना करना है। अपनी नोटबुक में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी के घोषणापत्र से कई उद्धरण शामिल किए हैं। उन्होंने ‘द इंटरनेशनेल’ के गान की पंक्तियाँ भी दर्ज कीं। फ्रेडरिक एंगेल्स के कार्य में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जर्मनी में क्रांति और प्रतिक्रांति से संबंधित उद्धरणों के माध्यम से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे अपने साथियों के सतही क्रांतिकारी विचारों का विरोध करते हुए दिखाई देते हैं। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जाति और गाय के नाम पर भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसक घटनाओं - लिंचिंग - की एक श्रृंखला शुरू हो गई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और टी. पेन की ‘राइट्स ऑफ मैन’ से उनके द्वारा उठाए गए संदर्भ आज भी प्रासंगिक हैं। उनकी नोटबुक में लिखा है: "वे इन चीजों को उसी सरकारों से सीखते हैं जिनके तहत वे रहते हैं। बदले में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे दूसरों पर वही सजा थोपते हैं जिसके वे आदी हो गए हैं... जनता के सामने प्रदर्शित क्रूर दृश्यों का प्रभाव ऐसा होता है कि या तो यह उनकी संवेदनशीलता को कुंद कर देता है या प्रतिशोध की इच्छा को उकसाता है। तर्क के बजाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे आतंक के माध्यम से लोगों पर शासन करने की इन आधारहीन और झूठी धारणाओं के आधार पर अपनी छवि का निर्माण करते हैं।" </span></p>
<p class="MsoNormal">"<span lang="hi" xml:lang="hi">प्राकृतिक और नागरिक अधिकारों" के बारे में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने नोट किया</span>, "<span lang="hi" xml:lang="hi">यह केवल मनुष्य के प्राकृतिक अधिकार ही हैं जो सभी नागरिक अधिकारों का आधार बनाते हैं।" उन्होंने जापानी बौद्ध भिक्षु कोको होशी के शब्दों को भी दर्ज किया: "एक शासक के लिए यह उचित है कि कोई भी व्यक्ति ठंड या भूख से पीड़ित न हो। जब एक व्यक्ति के पास जीने के लिए बुनियादी साधन भी नहीं होते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वह नैतिक मानकों को बनाए नहीं रख सकता।" </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने समाजवाद का उद्देश्य (क्रांति)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व क्रांति का उद्देश्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक एकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और कई अन्य मुद्दों पर विभिन्न लेखकों के संदर्भ प्रदान किए। भगत सिंह के सहयोगियों ने उल्लेख किया है कि जेल में रहते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने चार पुस्तकें लिखीं। उनके शीर्षक हैं: </span>1. <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मकथा</span>, 2. <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत में क्रांतिकारी आंदोलन</span>, 3. <span lang="hi" xml:lang="hi">समाजवाद के आदर्श</span>, 4. <span lang="hi" xml:lang="hi">मृत्यु के द्वार पर। ये पुस्तकें जेल से रिहा होने के बाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रिटिश अधिकारियों के प्रतिशोध के डर से नष्ट कर दी गईं। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">भगत सिंह का दृष्टिकोण स्वतंत्रता के बाद के युग में एक न्यायपूर्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाजवादी भारत के निर्माण की ओर निर्देशित था - जो जातिवाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सांप्रदायिकता और असमानता से मुक्त हो। उनके लेखन और लेख स्पष्ट रूप से इस दृष्टि को दर्शाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और जेल नोटबुक उनके गहन अध्ययन का प्रमाण है। भगत सिंह की जेल नोटबुक न केवल उनके क्रांतिकारी विचारों और बौद्धिक खोजों का रिकॉर्ड है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि स्वतंत्रता के संघर्ष में उनकी स्थायी विरासत का भी प्रमाण है। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">नोटबुक विभिन्न विषयों पर उनके सूक्ष्म चिंतन को प्रकट करती है - प्राकृतिक और नागरिक अधिकारों से लेकर उनके समय की अंतर्निहित असमानताओं तक। यह सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजनीतिक और धार्मिक मुद्दों पर उनके गहन विश्लेषण को भी उजागर करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो एक न्यायपूर्ण और समतावादी समाज के लिए उनकी दृष्टि पर जोर देती है। </span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 23 Mar 2025 15:24:38 +0530</pubDate>
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