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                <title>economic crisis - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>economic crisis RSS Feed</description>
                
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                <title>संपादकीय पेज के लिए आलेख </title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>बेरोजगारी गरीबी असमानता भ्रष्टाचार से दबा लोकतंत्र ! </strong></div>
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<div><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
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<div>  इन दिनों देश आजादी की 80वीं वर्षगांठ का जशन मना रहा है। हुक्मरानों के आह्वान पर देश में घर घर तिरंगा फहराया गया । राजपथ से लेकर जनपथ तक रोशनी की झालर जगमगा रही हैं लेकिन इस खुशहाल भारत के पीछे एक और हकीकत भी छिपी है यह है मुफलिसी, बेरोजगारी, गरीबी, भ्रष्टाचार, सामाजिक असमानता व सस्ते सुलभ न्याय से महरूम हिंदुस्तान, जिसमें आज भी  भूख है, बेगार करने और अन्याय सहने की मजबूरी है, पूंजीवाद के हाथों में जकड़ती लोकतांत्रिक व्यवस्था है इन सबसे इतर नारे हैं</div>
<div>बेरोजगारी</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/185256/article-for-editorial-page"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/img_20260727_151239.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>बेरोजगारी गरीबी असमानता भ्रष्टाचार से दबा लोकतंत्र ! </strong></div>
<div> </div>
<div><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div> </div>
<div> इन दिनों देश आजादी की 80वीं वर्षगांठ का जशन मना रहा है। हुक्मरानों के आह्वान पर देश में घर घर तिरंगा फहराया गया । राजपथ से लेकर जनपथ तक रोशनी की झालर जगमगा रही हैं लेकिन इस खुशहाल भारत के पीछे एक और हकीकत भी छिपी है यह है मुफलिसी, बेरोजगारी, गरीबी, भ्रष्टाचार, सामाजिक असमानता व सस्ते सुलभ न्याय से महरूम हिंदुस्तान, जिसमें आज भी  भूख है, बेगार करने और अन्याय सहने की मजबूरी है, पूंजीवाद के हाथों में जकड़ती लोकतांत्रिक व्यवस्था है इन सबसे इतर नारे हैं उम्मीद हैं और इनके बीच बेरोजगारी महंगाई भ्रष्टाचार से कराहता आम आदमी है।</div>
<div>बेरोजगारी </div>
<div> </div>
<div>हालिया आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत में बेरोजगारी दर लगभग 5.5% है, जो वैश्विक औसत (4.9%) के आसपास और कई प्रमुख जी-20 अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में स्थिर स्थिति में है, हालांकि युवाओं के बीच यह दर तुलनात्मक रूप से अधिक बनी हुई है।आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण के अनुसार देश में कुल बेरोजगारी दर स्थिस्थिर है, जिसमें ग्रामीण क्षेत्र की दर लगभग 5.1% और शहरी क्षेत्र की दर लगभग 6.4% से 6.6% के बीच दर्ज की गई है।युवा बेरोजगारी की समस्या चुनौती बनकठभारत में 15 से 29 आयु वर्ग के युवाओं में बेरोजगारी दर राष्ट्रीय औसत से अधिक (लगभग 15% से 16% के बीच) है, जो कौशल अंतराल और तकनीक-आधारित बदलावों को दर्शाती है। वैश्विक और भारतीय बाजारों में अनौपचारिक रोजगार और गुणवत्तापूर्ण पूर्णकालिक नौकरियों की उपलब्धता एक बड़ी चिंता बनी हुई है।</div>
<div> गरीबी की अंतहीन समस्या </div>
<div> </div>
<div>भारत में आज भी गरीबी की समस्या विकराल बनी हुई है। भारत में 20 करोड़ से भी ज्यादा लोग ऐसे हैं, जो गरीबी रेखा से नीचे हैं और काफी मुश्किल से अपना जीवन यापन कर रहे हैं। गरीबी से जुड़े कई ऐसे आंकड़े हैं, जो वाकई डराने वाले हैं। </div>
<div> </div>
<div>विभिन्न अंतरराष्ट्रीय और सरकारी रिपोर्टों के अनुसार, भारत में अभी भी लगभग 23.4 करोड़ लोग गरीबी के स्तर पर जीवन जीने को मजबूर हैं। यह संख्या इस बात पर निर्भर करती है कि गरीबी को मापने के लिए किस मानक या पैमाने का उपयोग किया जा रहा है। बहुआयामी गरीबी सूचकांक के संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक, स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर जैसे संकेतकों के आधार पर भारत में लगभग 23.4 करोड़ लोग घोर या बहुआयामी गरीबी में जी रहे हैं, जो दुनिया में सबसे अधिक है।विश्व बैंक के अत्यधिक गरीबी के आंकड़े बता रहे हैं कि विश्व बैंक के मानकों ($2.15 प्रतिदिन आय) के अनुसार, भारत में अत्यधिक गरीबी में जीने वाले लोगों की संख्या घटकर लगभग 7.5 करोड़ (75 मिलियन) रह गई है। पिछले एक दशक में लगभग 26.9 से 27 करोड़ लोग इस अत्यधिक गरीबी रेखा से बाहर आए हैं। यदि उच्च स्तर यानी लगभग $4.20 प्रतिदिन के मानक को देखा जाए, तो भारत की लगभग 23.9% आबादी (करीब 34.2 करोड़ लोग) आर्थिक सुरक्षा के उस दायरे से नीचे आती है।</div>
<div> </div>
<div><strong>                                                                                   भुखमरी </strong></div>
<div> </div>
<div>नवीनतम ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2025 रिपोर्ट के अनुसार, कुल 123 देशों की सूची में भारत को 102वां स्थान मिला है। इस सूचकांक में भारत का कुल स्कोर 25.8 है, जो देश में भूख और कुपोषण की स्थिति को 'गंभीर' श्रेणी में रखता है। 123 देशों की पड़ताल में भारत का स्थान 102 वां है इस के अनुसार 25.8श्रेणी गंभीर प्रमुख स्वास्थ्य व पोषण 12.0%बाल बौनापन उम्र के हिसाब से कम लंबाई 32.9%बाल कमज़ोरी लंबाई के हिसाब से कम वजन 18.7% रिपोर्ट में दूसरी सबसे अधिक बाल मृत्यु दर 2.8% है। </div>
<div> भुखमरी सूचकांक वर्ष 2020 में भारत 94वें स्थान पर था।भूख और कुपोषण पर नजर रखने वाली वैश्विक भुखमरी सूचकांक की वेबसाइट के अनुसार चीन, ब्राजील और कुवैत सहित अठारह देशों ने पांच से कम के जीएचआई स्कोर के साथ अग्रिम पंक्ति में है। </div>
<div> </div>
<div><strong>                                                                     भ्रष्टाचार </strong></div>
<div> </div>
<div> </div>
<div>भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक 2025 में भारत 182 देशों में 91वें स्थान पर है। भारत का कुल स्कोर 39 (100 में से) है, जो पिछले वर्ष (2024 में 96वीं रैंक) की तुलना में पाँच स्थानों का सुधार दर्शाता है। यह रिपोर्ट ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा जारी की जाती है।डेनमार्क, फिनलैंड और सिंगापुर सबसे कम भ्रष्ट देशों में शामिल हैं। भारत का प्रदर्शन (101रैंक)पाकिस्तान (136वीं रैंक), श्रीलंका (107वीं रैंक), और नेपाल (109वीं रैंक) से बेहतर है, लेकिन चीन (76वीं रैंक) और भूटान (18वीं रैंक) से पीछे है।</div>
<div> </div>
<div><strong>                                                                 गरीब अमीर के बीच खाई </strong></div>
<div> </div>
<div>विश्व असमानता रिपोर्ट 2026 (तीसरा संस्करण) पेरिस स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के द्वारा जारी की गई है। यह रिपोर्ट बताती है कि दुनिया के शीर्ष 10% सबसे अमीर लोगों के पास वैश्विक संपत्ति का तीन-चौथाई (लगभग 75%) हिस्सा है, जबकि सबसे निचले 50% हिस्से के पास केवल 2% संपत्ति है।भारत में शीर्ष 10% लोगों के पास राष्ट्रीय आय का 58% हिस्सा है, जबकि निचले 50% लोगों को केवल 15% ही मिलता है।देश के शीर्ष 1% अमीरों के पास कुल संपत्ति का लगभग 40% हिस्सा है, और शीर्ष 10% के पास करीब 65% संपत्ति है।भारत में केवल 15.7% महिलाएं नौकरी कर रही हैं, और कुल श्रम आय में उनका हिस्सा महज 20% के आसपास है।</div>
<div> </div>
<div>भारत में असमानता गहराई से जड़ें जमा चुकी है, जहाँ शीर्ष 10% राष्ट्रीय आय का 58% हिस्सा अर्जित करते हैं और शीर्ष 1% के पास देश की कुल संपत्ति का 40% हिस्सा है। इसे महिला श्रम शक्ति भागीदारी दर के 15.7% पर स्थिर बने रहने से और बढ़ावा मिलता है।</div>
<div>जलवायु असमानता के लिए सबसे धनी 10% लोग निजी पूंजी से होने वाले उत्सर्जन के 77% के लिये उत्तरदायी हैं; केवल शीर्ष 1% अकेले 41% योगदान करते हैं, जो असमान ज़िम्मेदारी और जोखिम को दर्शाता है।</div>
<div>                               न्याय बना अन्याय</div>
<div>देश में अदालतों में न्याय के लिए लम्बी लाइन लगीं है अगली पेशी अगले साल के चलते लाखों की संख्या में वादी व पीड़ित तारीख पर चक्कर काटते हुए दुनिया से चले जाते हैं पर न्याय नहीं मिलता। स्थिति यह है कि देशभर की अदालतों में निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कुल 5.64 करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित (पेंडिंग) हैं।अदालत के स्तर पर लंबित मामलों का विवरणसुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च अदालत): लगभग 96,000 से अधिक केस पेंडिंग हैं।हाई कोर्ट (उच्च न्यायालय): देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में लगभग 63.76 लाख मामले पेंडिंग हैं।जिला और अधीनस्थ अदालतें (निचली अदालतें): कुल पेंडिंग मामलों का सबसे बड़ा हिस्सा यानी करीब 4.98 करोड़ से अधिक मामले निचली अदालतों में अटके हैं, जो कुल लंबित मामलों का लगभग 85% से अधिक है।</div>
<div>साइबर अपराध </div>
<div>देश में अपराध की स्थिति भी बदतर है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अंतिम उपलब्ध आंकड़े बताते हैं राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की नवीनतम "क्राइम इन इंडिया" रिपोर्ट के अनुसार, पारंपरिक शारीरिक और हिंसक अपराधों में मामूली कमी दर्ज की गई है, जबकि डिजिटल व वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। देश में समग्र अपराध दर घटकर लगभग 418.9 प्रति लाख जनसंख्या पर आ गई है। विभिन्न डिजिटल और ऑनलाइन धोखाधड़ी में लगभग 17% से 18% की वृद्धि दर्ज की गई है। कुल साइबर मामलों में से लगभग 72% से अधिक का उद्देश्य वित्तीय ठगी रहा है महिलाओं के विरुद्ध मामलों में आंशिक (लगभग 1.5%) कमी आई है, जबकि बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में लगभग 7.8% की वृद्धि देखी गई है। हत्या के मामलों में लगभग 2.4% की गिरावट दर्ज की गई है, हालांकि अपहरण और अन्य विवादित मामलों की संख्या में क्षेत्रीय भिन्नता बनी हुई है। वित्तीय गबन और धोखाधड़ी से जुड़े आर्थिक अपराधों में करीब 4.6% की वृद्धि हुई है।</div>
<div>राष्ट्रीय चरित्र में गिरावट </div>
<div>भारतीयों के राष्ट्रीय चरित्र में गिरावट के प्रमुख लक्षणों में अनियंत्रित भ्रष्टाचार, सार्वजनिक संपत्ति के प्रति लापरवाही, नागरिक अनुशासन का अभाव और राष्ट्रहित की तुलना में व्यक्तिगत स्वार्थ को प्राथमिकता देना शामिल है। समाज में नैतिक मूल्यों और सहिष्णुता की कमी भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है।</div>
<div>कभी भारतीय लोगों का राष्ट्रीय चरित्र विविधता में एकता, सहिष्णुता, आतिथ्य-सत्कार, परिवार के प्रति अटूट जुड़ाव और कठिन परिस्थितियों में भी उच्च सहनशक्ति (लचीलेपन) पर आधारित है। यहाँ के समाज में धर्म, आध्यात्मिकता और सामूहिक जीवन की भावना गहराई तक समाई हुई है।लेकिन अब स्थिति भिन्न हो चली है। समाज में नैतिक और सामाजिक पतन की शुरुआत हो गई है। भ्रष्टाचार अब अपवाद नहीं बल्कि एक सामान्य और स्वीकृत बात बन गई है। लोग अपने अधिकारों के प्रति अत्यधिक जागरूक हैं, लेकिन अपने मूल कर्तव्यों को भूल रहे हैं। विभिन्न समूहों के बीच सहनशीलता घट रही है और असहिष्णुता बढ़ रही है। 'मेरा क्या फायदा' की सोच ने सामूहिक कल्याण और देशभक्ति की भावना को पीछे छोड़ दिया है।सरकारी संपत्तियों, पार्कों और धरोहरों को गंदा करना या नुकसान पहुँचाना आम हो गया है। यातायात नियमों और सामान्य कानूनों का पालन न करने को शान की बात समझा जाता है। अपराध या दुर्घटना के समय मदद करने के बजाय लोग वीडियो बनाने में व्यस्त रहते हैं।</div>
<div>भारत में राजनीतिक दलों की आपसी प्रतिद्वंद्विता अब इतना बढ़ गया है कि पिछले एक दशक में देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद में सबसे कम समय का उपयोग किया जाता है विपक्ष संसद को अखाड़ा बनाने पर तुला है और सत्ता धारी विपक्ष के साथ सूक्ष्मता आम सहमति बनाने में नाकाम रहे हैं। देश ने नीट पेपर लीक के मुद्दे पर हुए प्रदर्शन में जैनजी के भीतर आक्रोश को देखा वहीं जैनजी के कंधे का इस्तेमाल करने की राजनीति को भी देखा वहीं आंदोलन की आड़ में अराजकता अभद्रता असंयमित गालीबाजी को भी सहन किया। </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 17:13:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>विदेशी मुद्रा की तलाश में ‘हराम’ से समझौता, पाकिस्तान की मजबूरी, नीतियों की विफलता और डगमगाती अर्थव्यवस्था</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">इस्लामिक मूल्यों, सख्त धार्मिक कानूनों और सामाजिक पाबंदियों के लिए पहचाने जाने वाले देशों में जब शराब को लेकर फैसले बदलने लगें, तो यह केवल नीति परिवर्तन नहीं बल्कि गहरे आर्थिक संकट का संकेत होता है। हाल के दिनों में सऊदी अरब द्वारा गैर-मुस्लिमों को सीमित दायरे में शराब सेवन की छूट और अब पाकिस्तान द्वारा अपनी ऐतिहासिक मुरी ब्रेवरी को शराब निर्यात की अनुमति देना इसी कड़ी का हिस्सा है। यह फैसला जितना ऐतिहासिक है, उतना ही पाकिस्तान की मजबूरी और उसकी आर्थिक बदहाली का आईना भी है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">पाकिस्तान की शहबाज शरीफ सरकार ने करीब पचास वर्षों बाद मुरी</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/164370/pakistans-compulsion-to-compromise-with-haram-in-search-of-foreign"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-12/download-(2)2.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">इस्लामिक मूल्यों, सख्त धार्मिक कानूनों और सामाजिक पाबंदियों के लिए पहचाने जाने वाले देशों में जब शराब को लेकर फैसले बदलने लगें, तो यह केवल नीति परिवर्तन नहीं बल्कि गहरे आर्थिक संकट का संकेत होता है। हाल के दिनों में सऊदी अरब द्वारा गैर-मुस्लिमों को सीमित दायरे में शराब सेवन की छूट और अब पाकिस्तान द्वारा अपनी ऐतिहासिक मुरी ब्रेवरी को शराब निर्यात की अनुमति देना इसी कड़ी का हिस्सा है। यह फैसला जितना ऐतिहासिक है, उतना ही पाकिस्तान की मजबूरी और उसकी आर्थिक बदहाली का आईना भी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पाकिस्तान की शहबाज शरीफ सरकार ने करीब पचास वर्षों बाद मुरी ब्रेवरी पर लगे निर्यात प्रतिबंध को हटाकर उसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपने उत्पाद बेचने की इजाजत दे दी है। 1860 में ब्रिटिश शासन के दौरान स्थापित मुरी ब्रेवरी पाकिस्तान की सबसे पुरानी शराब निर्माता कंपनी है। एक मुस्लिम बहुल देश में, जहां शराब को हराम माना गया है और उसके सेवन व बिक्री पर कानूनी और सामाजिक पाबंदियां हैं, वहां इस कंपनी का दशकों तक टिके रहना अपने आप में एक असाधारण उदाहरण रहा है। अब इसे निर्यात लाइसेंस मिलना बताता है कि पाकिस्तान किस हद तक आर्थिक दबाव में है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मुरी ब्रेवरी के प्रमुख इस्फनग भंडारा का कहना है कि उनके दादा और पिता दोनों ने शराब निर्यात की अनुमति पाने के प्रयास किए थे, लेकिन तब की सरकारें धार्मिक और राजनीतिक दबाव के कारण पीछे हट गईं। आज वही सरकार, वही राज्य तंत्र, विदेशी मुद्रा की सख्त जरूरत के चलते उसी ‘हराम’ माने जाने वाले उत्पाद को अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचने की राह खोल रहा है। यह विरोधाभास नहीं बल्कि पाकिस्तान की बदहाल अर्थव्यवस्था की मजबूरी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पाकिस्तान इस समय गहरे आर्थिक संकट से गुजर रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार लगातार दबाव में है। आयात बढ़ते जा रहे हैं, जबकि निर्यात की क्षमता सीमित होती जा रही है। आईएमएफ से कर्ज, चीन से उधार और खाड़ी देशों से अस्थायी राहत के सहारे किसी तरह अर्थव्यवस्था को संभालने की कोशिश की जा रही है। ऐसे में सरकार को हर उस रास्ते पर विचार करना पड़ रहा है, जिससे डॉलर आ सके। शराब निर्यात का फैसला इसी सोच का परिणाम है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह केवल शराब तक सीमित मामला नहीं है, बल्कि यह पाकिस्तान की नीतिगत विफलताओं की कहानी भी कहता है। वर्षों तक देश को धार्मिक राज्य’ के रूप में पेश किया गया। नीतियां आस्था के नाम पर तय होती रहीं, लेकिन आर्थिक सुधार, औद्योगिक विकास, शिक्षा और मानव संसाधन पर उतना ध्यान नहीं दिया गया जितना जरूरी था। नतीजा यह हुआ कि आज पाकिस्तान के पास निर्यात के लिए गिने-चुने उत्पाद ही बचे हैं। टेक्सटाइल उद्योग संकट में है। कृषि उत्पादन महंगाई और जलवायु प्रभाव से जूझ रहा है। आईटी और सेवा क्षेत्र वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पिछड़ चुका है। ऐसे में सरकार को उन विकल्पों की ओर लौटना पड़ रहा है, जिन्हें कभी उसने खुद खारिज कर दिया था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आम पाकिस्तानी नागरिक के लिए हालात बेहद कठिन हो चुके हैं। महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। आटा 120 रुपये किलो तक पहुंच चुका है, जो गरीब और मध्यम वर्ग के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं है। सब्जियां, दालें, तेल और ईंधन की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। बिजली और गैस के बिल आम लोगों की आय से कहीं ज्यादा हो गए हैं। बेरोजगारी बढ़ रही है और रोजगार के अवसर सिकुड़ते जा रहे हैं। ऐसे में सरकार द्वारा शराब निर्यात से विदेशी मुद्रा लाने की बात जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसी लगती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सरकार की नीतियों पर नजर डालें तो साफ दिखता है कि तात्कालिक राहत के लिए दीर्घकालिक मूल्यों और सिद्धांतों से समझौता किया जा रहा है। एक ओर धार्मिक भावनाओं की बात की जाती है, दूसरी ओर उन्हीं भावनाओं के विपरीत फैसले लिए जा रहे हैं। इससे न केवल सरकार की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं, बल्कि समाज में भी भ्रम और असंतोष बढ़ता है। सवाल यह है कि अगर शराब निर्यात से ही अर्थव्यवस्था को बचाना था, तो फिर दशकों तक इसे ‘हराम’ कहकर प्रतिबंधित क्यों रखा गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">चीन के साथ पाकिस्तान की गहरी मित्रता भी उसकी आर्थिक मजबूरी को और जटिल बना रही है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा बड़े सपनों के साथ शुरू किया गया था, लेकिन समय के साथ यह परियोजना पाकिस्तान के लिए कर्ज का बोझ बनती जा रही है। चीनी कंपनियों को विशेष रियायतें दी गईं। स्थानीय उद्योगों को अपेक्षित लाभ नहीं मिला। यहां तक कि 2017 में पाकिस्तान ने एक चीनी कंपनी को शराब उत्पादन की अनुमति दी थी, जो मुख्य रूप से चीन के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में काम कर रहे कर्मचारियों के लिए थी। यह निर्णय भी घरेलू उद्योगों और स्थानीय नियमों के साथ भेदभाव का उदाहरण बना।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">चीन के साथ असंतुलित आर्थिक संबंधों का असर यह हुआ कि पाकिस्तान की नीति-निर्माण प्रक्रिया में आत्मनिर्भरता की जगह निर्भरता बढ़ती गई। सस्ते कर्ज और निवेश के बदले दीर्घकालिक रणनीतिक और आर्थिक दबाव स्वीकार किए गए। आज हालत यह है कि पाकिस्तान अपनी आर्थिक जरूरतों के लिए न तो पूरी तरह पश्चिम पर भरोसा कर सकता है, न ही चीन के सहारे स्थायी समाधान निकाल पा रहा है। शराब निर्यात की अनुमति इसी असमंजस की उपज है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंतरराष्ट्रीय उदाहरण देखें तो कई देश आर्थिक संकट में अपने परंपरागत नियमों में ढील देते रहे हैं। सऊदी अरब का उदाहरण सामने है, जहां हाल ही में गैर-मुस्लिमों को सीमित दायरे में शराब पीने की छूट दी गई। इसका मकसद पर्यटन, निवेश और वैश्विक छवि को मजबूत करना बताया गया। हालांकि सऊदी अरब ने यह कदम एक व्यापक आर्थिक सुधार और विविधीकरण की नीति के तहत उठाया। पाकिस्तान का मामला इससे अलग है। यहां कोई दीर्घकालिक विजन नहीं, बल्कि तत्काल विदेशी मुद्रा जुटाने की हड़बड़ी दिखाई देती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मुरी ब्रेवरी को निर्यात लाइसेंस मिलना निश्चित रूप से उसके लिए एक कारोबारी उपलब्धि है, लेकिन यह पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए स्थायी समाधान नहीं हो सकता। शराब निर्यात से कुछ विदेशी मुद्रा जरूर आएगी, लेकिन इससे न तो महंगाई कम होगी, न बेरोजगारी घटेगी और न ही खाद्यान्न संकट का समाधान निकलेगा। यह केवल एक अस्थायी सहारा है, जो गहरी बीमारी पर लगाया गया मरहम भर है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पाकिस्तान की मौजूदा आर्थिक हालत यह बताती है कि देश को मूलभूत सुधारों की जरूरत है। शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग और शासन प्रणाली में सुधार के बिना कोई भी तात्कालिक फैसला देश को संकट से बाहर नहीं निकाल सकता। विदेशी मुद्रा के लिए हराम’ और हलालके बीच झूलती नीतियां न तो जनता का भरोसा जीत सकती हैं और न ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थायी सम्मान दिला सकती हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसलिए शराब निर्यात का फैसला पाकिस्तान की मजबूरी का प्रतीक है। यह बताता है कि जब नीतियां दूरदर्शिता से नहीं बनतीं और अर्थव्यवस्था को राजनीतिक और वैचारिक प्रयोगशाला बना दिया जाता है, तो एक दिन वही राज्य अपने ही घोषित सिद्धांतों से समझौता करने को मजबूर हो जाता है। आज पाकिस्तान इसी मोड़ पर खड़ा है, जहां विदेशी मुद्रा की तलाश में उसे अपने अतीत, अपनी नीतियों और अपने दावों पर नए सिरे से सवाल करना पड़ रहा है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 26 Dec 2025 17:18:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>फीस जमा न होने पर बच्चे को तीन घंटे धूप में बिठाया</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>मथुरा।</strong> सरकारी शिक्षा व्यवस्था से मोह भंग होना अभिभावकों के साथ बच्चों को भी भारी पड रहा है। ऐसे अभिभावकों की तादात बहुतायत में है जिनके पास ठीक रोजगार नहीं है। नियमित पगार नहीं मिलती, ऐसे में उनके सामने कभी भी आर्थिक संकट खडा हो जाता है। इसका खामियाजा उनके पाल्यों को भी भुगतना पडता है। इसका उन बच्चों की मानसिक अवस्था पर विपरीत असर पड रहा है। राया कस्बे की एक निजी शिक्षण संस्था में मंगलवार को एक बच्चे को इसी तरह की विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पडा।</p>
<p>छात्र की फीस जमा न हो पाने के कारण उसे</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/150024/the-child-was-made-in-the-sun-for-three-hours"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/download-(6)4.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>मथुरा।</strong> सरकारी शिक्षा व्यवस्था से मोह भंग होना अभिभावकों के साथ बच्चों को भी भारी पड रहा है। ऐसे अभिभावकों की तादात बहुतायत में है जिनके पास ठीक रोजगार नहीं है। नियमित पगार नहीं मिलती, ऐसे में उनके सामने कभी भी आर्थिक संकट खडा हो जाता है। इसका खामियाजा उनके पाल्यों को भी भुगतना पडता है। इसका उन बच्चों की मानसिक अवस्था पर विपरीत असर पड रहा है। राया कस्बे की एक निजी शिक्षण संस्था में मंगलवार को एक बच्चे को इसी तरह की विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पडा।</p>
<p>छात्र की फीस जमा न हो पाने के कारण उसे परीक्षा से बाहर कर दिया गया और परीक्षा समय के तीन घंटे तक धूप में बिठाए रखा गया। कृष्णा एक प्राइवेट स्कूल में कक्षा आठ का छात्र है। उसके पिता टिंकू मथुरा में प्राइवेट नौकरी कर परिवार की आजीविका चलते हैं। पिता को विगत चार माह से पगार नहीं मिली, जिसके कारण वह टिंकू की फीस जमा नहीं कर सके। इस बीच विद्यालय प्रबंधन द्वारा लगातार छात्र के अभिभावकों को फीस के लिए सूचित किया जाता रहा।</p>
<p>कृष्णा की मां ने विद्यालय प्रबंधन को आश्वासन दिया कि वह 21 मार्च को किसी भी तरह बच्चे की फीस जमा कर देंगे। यह आश्वासन संभवतः इस बिना पर था कि कृष्णा के पिता को पगार मिल जाएगी। इससे पहले ही मंगलवार को विद्यालय प्रबंधन ने कडा फैसला ले लिया। बच्चे को परीक्षा से वंचित करने के साथ ही तीन घंटे तक धूप में बैठने के लिए मजबूर किया जिससे वह अभिभावकों पर फीस जमा करने के लिए घर जाकर दबाव बनाए।</p>
<p>छात्र के परिजनों ने विद्यालय प्रबंधन पर बच्चे को मानसिक रूप से उत्पीड़न करने का आरोप लगाया है। विद्यालय के प्रधानाचार्य उमेश सारस्वत का कहना है कि फीस को लेकर पिछले पांच महीने से परिजनों को लगातार सूचनाएं भेजी जा रही थीं लेकिन हर बार जबाव मिलता अगले माह फीस जमा करा दी जाएगी लेकिन फीस जमा नहीं किये जाने पर बच्चे को कुछ समय के लिए कक्षा से बाहर किया गया था लेकिन पुनः उसे बिठा कर परीक्षा कराई गई थी। कृष्णा के परिजनों ने विद्यालय प्रबंधन पर जो आरोप लगाए है गलत हैं। जिसकी बाद में उन्होंने माफी भी मांगी है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>जन समस्याएं</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 19 Mar 2025 12:18:56 +0530</pubDate>
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