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                <title>constitutional rights - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>असहमति पर ‘दिमागी नक्सल’ का ठप्पा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">भारत जैसे बहुलतावादी लोकतंत्र में राजनीतिक भाषा केवल शब्दों का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह समाज के सार्वजनिक वातावरण को प्रभावित करती है। सत्ता में बैठे लोगों द्वारा इस्तेमाल किए गए शब्द प्रशासनिक संस्थाओं, राजनीतिक कार्यकर्ताओं, नागरिक समाज और आम जनता की सोच पर असर डालते हैं। इसलिए जब किसी राजनीतिक असहमति, विचारधारा या सरकार की आलोचना के संदर्भ में ‘दिमागी नक्सल’ जैसा शब्द सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनता है तो इसे महज राजनीतिक बयान मानकर छोड़ देना उचित नहीं होगा। इस शब्द के राजनीतिक अर्थ, संवैधानिक सीमाओं और लोकतांत्रिक प्रभाव पर गंभीरता से विचार आवश्यक है।<br /><br />स्वतंत्रता दिवस के</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/185965/dissent-labeled-as-mindless-naxal"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/1001039405.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत जैसे बहुलतावादी लोकतंत्र में राजनीतिक भाषा केवल शब्दों का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह समाज के सार्वजनिक वातावरण को प्रभावित करती है। सत्ता में बैठे लोगों द्वारा इस्तेमाल किए गए शब्द प्रशासनिक संस्थाओं, राजनीतिक कार्यकर्ताओं, नागरिक समाज और आम जनता की सोच पर असर डालते हैं। इसलिए जब किसी राजनीतिक असहमति, विचारधारा या सरकार की आलोचना के संदर्भ में ‘दिमागी नक्सल’ जैसा शब्द सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनता है तो इसे महज राजनीतिक बयान मानकर छोड़ देना उचित नहीं होगा। इस शब्द के राजनीतिक अर्थ, संवैधानिक सीमाओं और लोकतांत्रिक प्रभाव पर गंभीरता से विचार आवश्यक है।<br /><br />स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ‘दिमागी नक्सल’ शब्द के इस्तेमाल के बाद देश में राजनीतिक बहस तेज हुई। सत्ता पक्ष की दृष्टि में यह उन वैचारिक प्रवृत्तियों के लिए इस्तेमाल किया गया शब्द है जो देश की एकता, विकास और सुरक्षा के विरुद्ध वातावरण बनाती हैं। विपक्ष और आलोचकों ने इसे सरकार से असहमति रखने वालों को बदनाम करने वाली भाषा बताया। इस विवाद का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि भारत इस समय युवाओं के आंदोलनों, रोजगार, परीक्षा व्यवस्था, कथित प्रश्नपत्र लीक और शासन की जवाबदेही जैसे मुद्दों से भी जूझ रहा है।<br /><br />लोकतंत्र में सरकार की आलोचना और राष्ट्रविरोधी गतिविधि को एक ही श्रेणी में रखना गंभीर भूल होगी। भारतीय संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा का अधिकार देता है, हालांकि ये अधिकार युक्तिसंगत संवैधानिक प्रतिबंधों के अधीन हैं। अर्थात नागरिक को सरकार की नीतियों पर प्रश्न उठाने का अधिकार है, लेकिन हिंसा, सार्वजनिक व्यवस्था भंग करने या देश की संप्रभुता और अखंडता के विरुद्ध आपराधिक गतिविधियों की अनुमति नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्था की असली कसौटी इसी सीमा को स्पष्ट रखने में है।<br /><br />भारतीय न्याय संहिता की धारा 152 भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाली गतिविधियों से संबंधित है। इसमें अलगाववादी गतिविधियों, सशस्त्र विद्रोह तथा ऐसी गतिविधियों को उकसाने वाले कृत्यों को गंभीर अपराध माना गया है। लेकिन कानून की व्याख्या सरकार की नीतियों अथवा प्रशासनिक कदमों की वैधानिक माध्यम से आलोचना को स्वतः इस अपराध की श्रेणी में नहीं रखती। यही अंतर लोकतांत्रिक विमर्श के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। सरकार का विरोध करना और देश के विरुद्ध हिंसक गतिविधि करना समान नहीं है।<br /><br />हालिया युवा आंदोलनों ने इस प्रश्न को और प्रासंगिक बनाया है। परीक्षा व्यवस्था, रोजगार और सरकारी जवाबदेही से जुड़े मुद्दों को लेकर युवाओं ने विरोध प्रदर्शन किए। 20 जुलाई को दिल्ली में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव के बाद पुलिस कार्रवाई तथा प्रदर्शन के दौरान हिंसा के आरोप-प्रत्यारोप सामने आए। मामले की गंभीरता को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने जांच के लिए उच्चस्तरीय समिति गठित की। यह कदम इस बात का महत्वपूर्ण उदाहरण है कि विवादित घटनाओं का अंतिम निष्कर्ष राजनीतिक दावों से नहीं, बल्कि स्वतंत्र जांच और प्रमाणों से निकाला जाना चाहिए।<br /><br />यदि प्रदर्शनकारियों ने हिंसा की, पुलिस पर हमला किया या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन यदि सुरक्षा बलों ने आवश्यकता से अधिक या अनुपातहीन बल का इस्तेमाल किया तो उसकी भी निष्पक्ष जांच आवश्यक है। लोकतंत्र में कानून की विश्वसनीयता तभी बनी रहती है जब उसकी कसौटी व्यक्ति की राजनीतिक पहचान नहीं, बल्कि उसके वास्तविक कृत्य और उपलब्ध साक्ष्य हों।<br /><br />समस्या तब गंभीर हो जाती है जब राजनीतिक बहस में व्यक्ति के कृत्य से अधिक उसके विचार और पहचान को निशाना बनाया जाता है। ‘दिमागी नक्सल’ जैसा शब्द यदि वास्तविक हिंसक उग्रवाद और सामान्य राजनीतिक असहमति के बीच अंतर मिटाने लगे तो सार्वजनिक विमर्श अधिक स्पष्ट होने के बजाय अधिक ध्रुवीकृत हो सकता है। किसी व्यक्ति के विचार सरकार को अप्रिय हो सकते हैं, लेकिन केवल अप्रिय विचार किसी आपराधिक कृत्य का प्रमाण नहीं होते।<br /><br />भारत में विश्वविद्यालयों, मीडिया, नागरिक संगठनों और सामाजिक आंदोलनों की भूमिका इसी कारण महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र केवल चुनाव और संसद तक सीमित नहीं है। विश्वविद्यालयों में उठने वाले प्रश्न, पत्रकारों की पड़ताल, नागरिक समाज की आलोचना और युवाओं के शांतिपूर्ण आंदोलन लोकतांत्रिक चेतना के महत्वपूर्ण संकेतक हैं। युवाओं की प्रत्येक मांग सही हो, यह आवश्यक नहीं; लेकिन उनकी प्रत्येक मांग को सुनना और तथ्यों के आधार पर उत्तर देना शासन की जिम्मेदारी अवश्य है।<br /><br />इसी के साथ आंदोलनकारियों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। शांतिपूर्ण विरोध लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन हिंसा, आगजनी, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान या सुरक्षा बलों पर हमला किसी लोकतांत्रिक अधिकार का हिस्सा नहीं हो सकता। किसी आंदोलन का उद्देश्य कितना भी वैध क्यों न हो, हिंसक रास्ता उसकी नैतिक और लोकतांत्रिक वैधता को कमजोर करता है। इसलिए सरकार को संयम और प्रदर्शनकारियों को अनुशासन—दोनों की आवश्यकता है।<br /><br />संसद की कार्यवाही भी इसी व्यापक संवाद-संकट का संकेत देती है। हालिया मानसून सत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच लगातार टकराव तथा व्यवधानों के कारण कई महत्वपूर्ण विषयों पर अपेक्षित चर्चा प्रभावित हुई। संसद का मूल उद्देश्य ही असहमति को बहस में बदलना है। यदि सड़क पर आंदोलन और संसद के भीतर व्यवधान दोनों बढ़ते जाएं तो यह केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं, बल्कि संस्थागत संवाद की कमजोर होती क्षमता का संकेत भी माना जाना चाहिए।<br /><br />सत्ता पक्ष को समझना होगा कि आलोचना लोकतंत्र की बीमारी नहीं है। सरकार की नीतियों की समीक्षा, प्रशासनिक निर्णयों पर प्रश्न और सार्वजनिक संस्थाओं की जवाबदेही मांगना नागरिक जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है। दूसरी ओर विपक्ष को भी यह स्वीकार करना होगा कि हर सरकारी निर्णय को लोकतंत्र-विरोधी बताना उतना ही नुकसानदेह है। लोकतांत्रिक राजनीति में आरोप से अधिक महत्वपूर्ण प्रमाण और नारे से अधिक महत्वपूर्ण नीति-विमर्श है।<br /><br />राष्ट्रवाद को भी सरकार और राष्ट्र के बीच अंतर स्पष्ट रखते हुए समझना होगा। राष्ट्र केवल वर्तमान सरकार का नाम नहीं है। राष्ट्र संविधान, नागरिकों, संस्थाओं, विविध भाषाओं-संस्कृतियों और साझा भविष्य का व्यापक रूप है। कोई नागरिक सरकार की किसी नीति का विरोध करते हुए भी देश और संविधान के प्रति पूरी निष्ठा रख सकता है। उसी प्रकार राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर वास्तविक खतरों की उपेक्षा भी नहीं की जा सकती। यदि कोई संगठन सचमुच हिंसक उग्रवाद, सशस्त्र विद्रोह या अलगाववादी गतिविधियों में संलिप्त है तो राज्य को कठोर कार्रवाई करनी ही चाहिए। लेकिन ऐसी कार्रवाई का आधार राजनीतिक लेबल नहीं, प्रमाण और कानून होना चाहिए।<br /><br />‘दिमागी नक्सल’ विवाद इसलिए केवल एक शब्द का विवाद नहीं है। यह उस बड़े प्रश्न से जुड़ा है कि भारत अपने असहमत नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहता है। क्या आलोचना का उत्तर तर्क से दिया जाएगा या राजनीतिक ठप्पे से? क्या हिंसक गतिविधि और वैचारिक असहमति के बीच स्पष्ट अंतर रखा जाएगा? क्या पुलिस कार्रवाई और प्रदर्शनकारी हिंसा दोनों की निष्पक्ष जांच होगी? और क्या संसद जनता के असंतोष को लोकतांत्रिक संवाद में बदलने की अपनी भूमिका निभाएगी?<br /><br />लोकतंत्र की शक्ति सर्वसम्मति में नहीं, असहमति को संभालने की क्षमता में होती है। मजबूत लोकतंत्र वह नहीं जिसमें हर नागरिक सत्ता की प्रशंसा करे, बल्कि वह है जिसमें नागरिक कठिन प्रश्न पूछ सकें और सरकार उन प्रश्नों का तथ्यपूर्ण उत्तर देने के लिए तैयार रहे। यदि कोई आरोप गलत है तो तथ्य उसे गलत सिद्ध कर सकते हैं; यदि कोई नीति सही है तो उसके परिणाम उसका बचाव कर सकते हैं; और यदि कोई व्यक्ति वास्तव में कानून तोड़ता है तो न्यायिक प्रक्रिया उसके विरुद्ध कार्रवाई का रास्ता तय कर सकती है।<br /><br />इसलिए भारत को ऐसी राजनीतिक संस्कृति की आवश्यकता है जिसमें हिंसा के प्रति शून्य सहनशीलता हो, लेकिन शांतिपूर्ण असहमति के लिए पर्याप्त लोकतांत्रिक स्थान भी हो। सरकार को आलोचना से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं और नागरिकों को कानून से ऊपर होने का अधिकार नहीं। संस्थाओं को निष्पक्ष रहना होगा, संसद को संवाद का मंच बनना होगा और राजनीतिक दलों को शब्दों की जिम्मेदारी समझनी होगी।<br /><br />क्योंकि लोकतंत्र का सबसे बड़ा संकट वह नहीं जब नागरिक सरकार से प्रश्न पूछते हैं। वास्तविक संकट तब शुरू होता है जब नागरिक प्रश्न पूछने से डरने लगते हैं। राजनीतिक ठप्पे क्षणिक प्रभाव पैदा कर सकते हैं, लेकिन लोकतंत्र को स्थायी शक्ति संविधान, स्वतंत्र संस्थाओं, प्रमाण आधारित सार्वजनिक विमर्श और असहमति के सम्मान से मिलती है। भारत की लोकतांत्रिक परंपरा की रक्षा इसी संतुलन से होगी कि राष्ट्र की सुरक्षा भी सुरक्षित रहे और नागरिक की आवाज भी।<br /><br /><strong>अवनीश कुमार गुप्ता</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 21 Aug 2026 20:50:19 +0530</pubDate>
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                <title>फर्जी मुकदमों की बढ़ती चुनौती: एससी-एसटी और पॉक्सो कानूनों के कथित दुरुपयोग पर उठे गंभीर सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">भारतीय न्याय व्यवस्था में देरी तो है ही पर इसके साथ बहुत से मामले ऐसे हैं जिनका दुरुपयोग बड़ी तेजी से हो रहा है। हम बात कर रहे हैं एससी-एसटी एक्ट और पॉक्सो मामलों की जिनमें आदमी अगर सतर्क नहीं रहा तो बहुत बुरी तरह से घिर जाता है। एससी-एसटी एक्ट और पॉक्सो एक्ट के बढ़ते मुकदमे इसकी गवाही दे रहे हैं। कुछ ऐसे संगठित गिरोह भी हैं जो महिलाओं के द्वारा आदमियों को फंसवाते देखे गए हैं। हालांकि उन गिरोहों का पर्दाफाश होता है लेकिन तब तक आरोपी को सज़ा काटनी ही पड़ती है। इसी तरह एससी-एसटी एक्ट के</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184359/growing-challenge-of-fake-cases-serious-questions-raised-on-alleged"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/rajeev.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारतीय न्याय व्यवस्था में देरी तो है ही पर इसके साथ बहुत से मामले ऐसे हैं जिनका दुरुपयोग बड़ी तेजी से हो रहा है। हम बात कर रहे हैं एससी-एसटी एक्ट और पॉक्सो मामलों की जिनमें आदमी अगर सतर्क नहीं रहा तो बहुत बुरी तरह से घिर जाता है। एससी-एसटी एक्ट और पॉक्सो एक्ट के बढ़ते मुकदमे इसकी गवाही दे रहे हैं। कुछ ऐसे संगठित गिरोह भी हैं जो महिलाओं के द्वारा आदमियों को फंसवाते देखे गए हैं। हालांकि उन गिरोहों का पर्दाफाश होता है लेकिन तब तक आरोपी को सज़ा काटनी ही पड़ती है। इसी तरह एससी-एसटी एक्ट के कानून का दुरुपयोग वर्षों से हो रहा है लेकिन आज तक कितनी ही सरकारें आईं हों इनमें संसोधन नहीं हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को समान न्याय का अधिकार देता है। इसी उद्देश्य से समय-समय पर ऐसे विशेष कानून बनाए गए जो समाज के कमजोर और संवेदनशील वर्गों को सुरक्षा प्रदान कर सकें। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम और पॉक्सो कानून भी इसी सोच का परिणाम हैं। इन कानूनों ने अनेक पीड़ितों को न्याय दिलाने का मार्ग प्रशस्त किया है और समाज में अपराधियों के विरुद्ध कठोर संदेश दिया है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एक दूसरा पक्ष भी लगातार चर्चा में रहा है। कई लोग आरोप लगाते हैं कि व्यक्तिगत दुश्मनी, संपत्ति विवाद, राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता या पारिवारिक संघर्ष में इन कानूनों का दुरुपयोग कर झूठे मुक़दमे दर्ज कराए जाते हैं। यह मुद्दा अदालतों, विधि विशेषज्ञों और समाज के बीच लगातार बहस का विषय बना हुआ है। क्या सचमुच फर्जी मुकदमों की बाढ़ है?</p>
<p style="text-align:justify;"><br />यह कहना कि अधिकांश एससी-एसटी या पॉक्सो के मामले फर्जी हैं, उपलब्ध आधिकारिक आँकड़ों के आधार पर उचित नहीं होगा। कई मामलों में जांच के बाद आरोप सिद्ध नहीं हो पाते, लेकिन इसका कारण हमेशा झूठा मुकदमा नहीं होता। कमजोर जांच, पर्याप्त साक्ष्यों का अभाव, गवाहों का मुकर जाना, समझौते का दबाव या लंबी न्यायिक प्रक्रिया भी इसके कारण हो सकते हैं। हालाँकि, विभिन्न उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय ने अलग-अलग मामलों में यह भी स्वीकार किया है कि कुछ मामलों में कानूनों का दुरुपयोग होने की शिकायतें सामने आई हैं। इसलिए यह विषय संतुलित दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है। निर्दोष व्यक्ति पर मुकदमे का प्रभाव- यदि कोई व्यक्ति वास्तव में झूठे मुकदमे में फँस जाता है, तो उसका प्रभाव केवल अदालत तक सीमित नहीं रहता। उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा प्रभावित होती है, नौकरी पर संकट आ सकता है, आर्थिक बोझ बढ़ जाता है और पूरा परिवार मानसिक तनाव से गुजरता है। वर्षों तक मुकदमा चलने के बाद यदि वह निर्दोष साबित भी हो जाए, तब भी खोया हुआ समय और सम्मान आसानी से वापस नहीं आता। दूसरी ओर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि एससी-एसटी कानून और पॉक्सो अधिनियम लाखों वास्तविक पीड़ितों की सुरक्षा के लिए बनाए गए हैं। भारत में जातीय उत्पीड़न और बच्चों के साथ यौन अपराध आज भी गंभीर समस्या हैं। यदि इन कानूनों को कमजोर किया जाए या हर शिकायत को संदेह की दृष्टि से देखा जाए, तो वास्तविक पीड़ित न्याय पाने से वंचित हो सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />इसलिए चुनौती यह नहीं है कि कानून समाप्त कर दिए जाएँ, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि उनका सही और निष्पक्ष उपयोग हो। देश की अदालतों में करोड़ों मुकदमे लंबित हैं। विशेष कानूनों के अंतर्गत दर्ज मामलों की संख्या बढ़ने से न्यायिक व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। सुनवाई में देरी के कारण न तो पीड़ित को समय पर न्याय मिल पाता है और न ही निर्दोष व्यक्ति को शीघ्र राहत। तेज और वैज्ञानिक जांच, पर्याप्त न्यायाधीशों की नियुक्ति तथा समयबद्ध सुनवाई इस समस्या के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। सरकार की जिम्मेदारी केवल कठोर कानून बनाना नहीं है, बल्कि उनकी निष्पक्ष क्रियान्वयन व्यवस्था सुनिश्चित करना भी है। यदि कहीं झूठे मुकदमे दर्ज होते हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। वहीं यदि वास्तविक पीड़ित न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं तो उन्हें भी समय पर न्याय मिलना चाहिए। इस विषय पर कई विधि विशेषज्ञ निम्न सुधारों की आवश्यकता बताते हैं— निष्पक्ष और वैज्ञानिक पुलिस जांच। फॉरेंसिक साक्ष्यों का अधिक उपयोग। विशेष अदालतों की संख्या बढ़ाना।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />लंबित मामलों का समयबद्ध निस्तारण। यदि अदालत यह पाए कि शिकायत जानबूझकर झूठी और दुर्भावनापूर्ण थी, तो कानून के अनुसार उचित कार्रवाई। पुलिस और अभियोजन अधिकारियों का नियमित प्रशिक्षण। "सरकार और अदालतें धृतराष्ट्र बनी हुई हैं" जैसी अभिव्यक्ति एक राजनीतिक और भावनात्मक टिप्पणी हो सकती है, लेकिन वास्तविक समाधान तथ्यों और संस्थागत सुधारों में निहित है। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में दो सिद्धांत समान रूप से महत्वपूर्ण हैं—दोषी को दंड मिले और निर्दोष को अनावश्यक दंड या उत्पीड़न न झेलना पड़े। इसलिए आवश्यकता न तो कानूनों को कमजोर करने की है और न ही हर शिकायत को झूठा मानने की। आवश्यकता ऐसी न्याय व्यवस्था की है जो वास्तविक पीड़ितों को शीघ्र न्याय दिलाए, निर्दोष लोगों के अधिकारों की रक्षा करे और न्याय प्रणाली पर जनता का विश्वास मजबूत बनाए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 30 Jul 2026 22:55:39 +0530</pubDate>
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                <title>जंतर-मंतर से उठते लोकतांत्रिक प्रश्न</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">लोकतंत्र की पहचान केवल इस बात से नहीं होती कि नागरिक हर पाँच वर्ष में मतदान करते हैं। उसकी वास्तविक शक्ति इस बात में निहित होती है कि नागरिकों को प्रश्न पूछने, सरकार से जवाब मांगने और शांतिपूर्ण ढंग से अपनी असहमति व्यक्त करने का कितना अवसर मिलता है। जब छात्र अपने भविष्य को लेकर चिंतित हों, सामाजिक कार्यकर्ता सार्वजनिक नीतियों पर संवाद की मांग करें और नागरिक समूह लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा की बात उठाएँ, तब किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी परीक्षा आरंभ होती है। हाल के दिनों में जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शनों, सोनम वांगचुक के</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183902/democratic-questions-arising-from-jantar-mantar"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/images-(1)9.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">लोकतंत्र की पहचान केवल इस बात से नहीं होती कि नागरिक हर पाँच वर्ष में मतदान करते हैं। उसकी वास्तविक शक्ति इस बात में निहित होती है कि नागरिकों को प्रश्न पूछने, सरकार से जवाब मांगने और शांतिपूर्ण ढंग से अपनी असहमति व्यक्त करने का कितना अवसर मिलता है। जब छात्र अपने भविष्य को लेकर चिंतित हों, सामाजिक कार्यकर्ता सार्वजनिक नीतियों पर संवाद की मांग करें और नागरिक समूह लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा की बात उठाएँ, तब किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी परीक्षा आरंभ होती है। हाल के दिनों में जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शनों, सोनम वांगचुक के अनशन तथा शिक्षा और शासन से जुड़े मुद्दों ने इसी प्रकार की व्यापक राष्ट्रीय बहस को जन्म दिया है।<br /><br />जंतर-मंतर भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में केवल एक स्थान नहीं, बल्कि जन-अभिव्यक्ति का एक प्रतीक रहा है। अनेक दशकों से विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक मुद्दों पर अपनी बात रखने के लिए नागरिक यहाँ एकत्रित होते रहे हैं। इस परंपरा ने यह संदेश दिया कि लोकतंत्र केवल संसद के भीतर नहीं, बल्कि नागरिक समाज की सक्रिय भागीदारी से भी संचालित होता है। इसलिए जब जंतर-मंतर किसी नए आंदोलन का केंद्र बनता है, तो वह केवल एक प्रदर्शन नहीं बल्कि लोकतांत्रिक विमर्श का संकेत भी होता है।<br /><br />हाल के विरोध प्रदर्शनों में विभिन्न छात्र समूहों, सामाजिक संगठनों और नागरिक कार्यकर्ताओं ने शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, संस्थागत जवाबदेही और सार्वजनिक संवाद जैसे मुद्दे उठाए। प्रतियोगी परीक्षाओं, भर्ती प्रक्रियाओं, पेपर लीक और प्रशासनिक पारदर्शिता को लेकर लंबे समय से व्यक्त की जा रही चिंताओं ने इन आंदोलनों को व्यापक सामाजिक समर्थन दिलाया। अनेक छात्रों का कहना है कि वर्षों की तैयारी के बाद यदि परीक्षा प्रणाली की निष्पक्षता पर प्रश्न उठने लगें तो केवल व्यक्तिगत भविष्य ही नहीं, बल्कि सार्वजनिक संस्थाओं पर भरोसा भी प्रभावित होता है।<br /><br />इसी संदर्भ में सोनम वांगचुक की भूमिका ने इस विमर्श को और अधिक राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया। शिक्षा, पर्यावरण और हिमालयी क्षेत्रों से जुड़े उनके लंबे सार्वजनिक कार्यों के कारण उनके वक्तव्यों और शांतिपूर्ण विरोध ने व्यापक चर्चा को जन्म दिया। विभिन्न समाचार रिपोर्टों के अनुसार, उनके अनशन, स्वास्थ्य और प्रदर्शन के दौरान हुई प्रशासनिक कार्रवाइयों को लेकर अलग-अलग दावे और आधिकारिक प्रतिक्रियाएँ सामने आईं। इन घटनाओं ने नागरिक अधिकारों, संवाद और राज्य की भूमिका पर नई बहस को जन्म दिया।<br /><br />लोकतंत्र में किसी भी सरकार का दायित्व केवल कानून लागू करना नहीं होता। शासन की वैधता इस बात से भी तय होती है कि वह आलोचना को किस दृष्टि से देखता है। जब बड़ी संख्या में छात्र, शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता या नागरिक किसी नीति या व्यवस्था पर प्रश्न उठाते हैं, तो पहला उत्तर संवाद होना चाहिए। कानून-व्यवस्था बनाए रखना निस्संदेह प्रशासन की जिम्मेदारी है, किंतु लोकतांत्रिक व्यवस्था में सार्वजनिक असहमति को केवल सुरक्षा के दृष्टिकोण से देखना पर्याप्त नहीं माना जाता। यदि नागरिकों के मन में यह धारणा बनने लगे कि उनकी आवाज़ सुनी नहीं जा रही, तो यह संस्थागत विश्वास को कमजोर कर सकता है।<br /><br />यह भी उतना ही आवश्यक है कि किसी भी आंदोलन का संचालन शांतिपूर्ण और संवैधानिक सीमाओं के भीतर हो। लोकतांत्रिक अधिकारों के साथ उत्तरदायित्व भी जुड़ा होता है। विरोध की वैधता उसकी अहिंसक प्रकृति, तथ्यों पर आधारित मांगों और संवाद की इच्छा से मजबूत होती है। यदि आंदोलन हिंसा, उकसावे या सार्वजनिक संपत्ति की क्षति का रूप ले लें, तो उनका नैतिक आधार कमजोर पड़ सकता है। इसलिए लोकतंत्र दोनों पक्षों—राज्य और नागरिक—से संयम, संवाद और संवैधानिक मर्यादा की अपेक्षा करता है।<br /><br />शिक्षा व्यवस्था के संदर्भ में यह आंदोलन केवल परीक्षा प्रणाली तक सीमित नहीं है। यह युवाओं के विश्वास, अवसरों की समानता और संस्थागत विश्वसनीयता से जुड़ा प्रश्न भी है। भारत जैसे युवा देश में शिक्षा और रोजगार केवल आर्थिक विषय नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय विकास की आधारशिला हैं। यदि बार-बार होने वाले विवाद छात्रों के मन में असुरक्षा उत्पन्न करें, तो इसका प्रभाव केवल व्यक्तिगत करियर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज की उत्पादकता और भविष्य पर पड़ता है।<br /><br />लोकतांत्रिक शासन का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत उत्तरदायित्व है। सार्वजनिक संस्थाओं पर जितना अधिक विश्वास होगा, शासन उतना ही प्रभावी होगा। विश्वास केवल घोषणाओं से नहीं बनता; वह पारदर्शी जांच, समयबद्ध निर्णय, स्पष्ट संवाद और निष्पक्ष प्रक्रियाओं से निर्मित होता है। जब सरकारें कठिन प्रश्नों का उत्तर तथ्यों, सुधारों और संस्थागत उपायों से देती हैं, तब लोकतंत्र मजबूत होता है। इसके विपरीत यदि संवाद की जगह अविश्वास ले ले, तो राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ सकता है।<br /><br />मीडिया की भूमिका भी इस पूरे परिदृश्य में अत्यंत महत्वपूर्ण है। समाचार माध्यम लोकतंत्र के प्रहरी माने जाते हैं। उनकी जिम्मेदारी केवल घटनाओं का प्रसारण करना नहीं, बल्कि तथ्यों का सत्यापन, विभिन्न पक्षों को स्थान देना और सार्वजनिक हित के प्रश्नों को सामने लाना भी है। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब मीडिया सत्ता से भी प्रश्न पूछे और आंदोलनों के दावों की भी निष्पक्ष जांच करे। तथ्य और संतुलन किसी भी जिम्मेदार पत्रकारिता की आधारशिला हैं।<br /><br />भारतीय संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा का अधिकार प्रदान करता है। साथ ही, कानून-व्यवस्था, सार्वजनिक सुरक्षा और अन्य संवैधानिक उद्देश्यों के लिए युक्तिसंगत प्रतिबंधों की भी व्यवस्था करता है। इसलिए हर लोकतांत्रिक परिस्थिति में चुनौती यही रहती है कि इन दोनों उद्देश्यों—स्वतंत्रता और व्यवस्था—के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। किसी भी लोकतंत्र की गुणवत्ता इसी संतुलन की परिपक्वता से आंकी जाती है।<br /><br />इतिहास बताता है कि अनेक महत्वपूर्ण सामाजिक और नीतिगत परिवर्तन शांतिपूर्ण जन-आंदोलनों और सार्वजनिक विमर्श के माध्यम से हुए हैं। इसी प्रकार यह भी सच है कि स्थायी परिवर्तन अंततः संस्थागत प्रक्रियाओं, संवाद और लोकतांत्रिक सहमति से ही आते हैं। इसलिए सरकार और नागरिक समाज दोनों की साझा जिम्मेदारी है कि वे मतभेदों को टकराव में बदलने के बजाय समाधान की दिशा में आगे बढ़ाएँ।<br /><br />आज आवश्यकता राजनीतिक विजय की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विश्वास की पुनर्स्थापना की है। छात्रों की वास्तविक चिंताओं का समाधान, परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता को मजबूत करना, सार्वजनिक संस्थाओं में पारदर्शिता बढ़ाना, संवाद की संस्कृति को प्रोत्साहित करना और शांतिपूर्ण विरोध के लोकतांत्रिक अधिकार की रक्षा करना—ये ऐसे कदम हैं जो किसी भी सरकार की विश्वसनीयता को सुदृढ़ कर सकते हैं। इसी प्रकार आंदोलनों को भी तथ्य, संवैधानिक प्रक्रियाओं और अहिंसक जनभागीदारी को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए।<br /><br />लोकतंत्र में असहमति कोई संकट नहीं होती; वह शासन के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत होती है। जब नागरिक प्रश्न पूछते हैं, तब शासन को उत्तर देने का अवसर मिलता है। जब सरकार सुनती है, तब विश्वास बनता है। जब संस्थाएँ निष्पक्ष दिखाई देती हैं, तब लोकतंत्र मजबूत होता है। और जब संवाद जीवित रहता है, तब मतभेद भी लोकतांत्रिक शक्ति में बदल सकते हैं।<br /><br />जंतर-मंतर, छात्र आंदोलन और सोनम वांगचुक से जुड़ी हालिया घटनाएँ अंततः एक बड़े प्रश्न की ओर संकेत करती हैं—क्या भारत अपनी लोकतांत्रिक परंपरा को और अधिक संवादात्मक, उत्तरदायी और पारदर्शी बना सकता है? इस प्रश्न का उत्तर किसी एक आंदोलन, किसी एक सरकार या किसी एक राजनीतिक दल के पास नहीं है। इसका उत्तर उन संस्थाओं, नागरिकों और लोकतांत्रिक मूल्यों में निहित है जो भारत के संवैधानिक ढांचे की आधारशिला हैं। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति सत्ता का केंद्रीकरण नहीं, बल्कि नागरिकों का विश्वास है। और विश्वास तभी टिकाऊ बनता है जब संवाद, उत्तरदायित्व, संवैधानिक मर्यादा और संस्थागत पारदर्शिता साथ-साथ चलें। यही किसी भी परिपक्व लोकतंत्र की वास्तविक पहचान है।<br /><br /><strong>अवनीश कुमार गुप्ता</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 21 Jul 2026 22:02:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वांगचुक को जबरन इलाज, जिम्मेदारी या स्वतंत्रता पर हस्तक्षेप</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
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<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक को उनकी बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति के बीच पुलिस द्वारा अस्पताल ले जाना और उसके बाद शुरू हुआ विवाद केवल एक व्यक्ति के इलाज का मामला नहीं है। इसने भारतीय लोकतंत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यायपालिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नागरिक अधिकारों और राज्य की जिम्मेदारियों से जुड़े कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> दिल्ली हाई कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया था कि वांगचुक के स्वास्थ्य की प्रतिदिन सरकारी डॉक्टरों से निगरानी कराई जाए और यदि डॉक्टर आवश्यक समझें तो चिकित्सा हस्तक्षेप किया जाए। अदालत ने यह भी कहा कि</span></p></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183663/forced-treatment-of-wangchuk-as-interference-with-responsibility-or-freedom"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas6.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
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<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक को उनकी बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति के बीच पुलिस द्वारा अस्पताल ले जाना और उसके बाद शुरू हुआ विवाद केवल एक व्यक्ति के इलाज का मामला नहीं है। इसने भारतीय लोकतंत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यायपालिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नागरिक अधिकारों और राज्य की जिम्मेदारियों से जुड़े कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> दिल्ली हाई कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया था कि वांगचुक के स्वास्थ्य की प्रतिदिन सरकारी डॉक्टरों से निगरानी कराई जाए और यदि डॉक्टर आवश्यक समझें तो चिकित्सा हस्तक्षेप किया जाए। अदालत ने यह भी कहा कि "हर नागरिक का जीवन बहुमूल्य है और उसे बचाने के लिए हर संभव प्रयास होना चाहिए। इसके बाद जब वांगचुक की हालत और बिगड़ी तो दिल्ली पुलिस उन्हें सफदरजंग अस्पताल ले गई।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> पुलिस ने इसे अदालत के निर्देशों और डॉक्टरों की सलाह के अनुरूप उठाया गया कदम बताया। वहीं वांगचुक के समर्थकों और परिवार ने आरोप लगाया कि उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध अस्पताल ले जाया गया और बिना सहमति इलाज की कोशिश की गई। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि अदालत ने "जबरन अस्पताल ले जाने" का स्पष्ट आदेश नहीं दिया था। अदालत ने सरकार से कहा था कि स्वास्थ्य की नियमित निगरानी हो और डॉक्टरों की राय के अनुसार आवश्यक चिकित्सा हस्तक्षेप किया जाए। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बाद में प्रशासन ने इसी आधार पर अस्पताल ले जाने का निर्णय लिया। क्या चिकित्सा हस्तक्षेप का अर्थ व्यक्ति की इच्छा के विरुद्ध अस्पताल में भर्ती करना भी हो सकता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">या फिर इसके लिए अलग कानूनी प्रक्रिया और स्पष्ट सहमति आवश्यक है</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"> <span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय संविधान का अनुच्छेद </span>21<span lang="hi" xml:lang="hi"> जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता दोनों की रक्षा करता है। यदि कोई व्यक्ति पूरी मानसिक क्षमता में है और स्वयं कोई निर्णय ले रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो सामान्य परिस्थितियों में उसकी इच्छा का सम्मान किया जाना चाहिए। दूसरी ओर यदि लंबे अनशन के कारण जीवन पर तत्काल खतरा उत्पन्न हो जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो राज्य पर भी नागरिक का जीवन बचाने की जिम्मेदारी होती है। यही वह बिंदु है जहां नैतिक और कानूनी दोनों प्रकार का टकराव उत्पन्न होता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">क्या जबरन इलाज उचित है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रश्न का कोई सीधा उत्तर नहीं है। जबरन इलाज के पक्ष में यह तर्क दिया जाता है कि सरकार किसी नागरिक को मरते हुए नहीं देख सकती। यदि जीवन बचाया जा सकता है तो प्रशासन को हस्तक्षेप करना चाहिए। अदालत ने भी जीवन की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता बताया है। वहीं विरोध करने वालों का कहना है कि</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शांतिपूर्ण अनशन लोकतांत्रिक विरोध का संवैधानिक माध्यम है। यदि व्यक्ति मानसिक रूप से सक्षम है तो उसकी इच्छा सर्वोपरि होनी चाहिए। बिना सहमति चिकित्सा हस्तक्षेप व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन माना जा सकता है। परिवार की आपत्ति ने बढ़ाया विवाद वांगचुक की पत्नी ने सार्वजनिक रूप से कहा कि उनकी अनुमति के बिना कोई उपचार न किया जाए। इससे विवाद और गहरा गया क्योंकि अब मामला केवल प्रशासन और प्रदर्शनकारियों के बीच नहीं रहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि परिवार की सहमति का प्रश्न भी सामने आ गया। इस घटनाक्रम के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दीं। कुछ ने इसे जीवन बचाने की आवश्यक कार्रवाई बताया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि अन्य ने इसे शांतिपूर्ण आंदोलन को कमजोर करने की कोशिश कहा। अस्पताल ले जाने के दौरान पुलिस कार्रवाई पर भी सवाल उठाए गए। लोकतंत्र केवल विरोध का अधिकार नहीं देता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि राज्य पर नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी डालता है। इसलिए ऐसे मामलों में संतुलन बनाना सबसे कठिन कार्य होता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि सरकार हस्तक्षेप नहीं करती और कोई अप्रिय घटना हो जाती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसी सरकार पर लापरवाही का आरोप लगता। वहीं हस्तक्षेप करने पर व्यक्तिगत स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों पर सवाल उठते हैं। सोनम वांगचुक का मामला केवल एक अनशन या एक अदालत के आदेश तक सीमित नहीं है। इसने यह बहस फिर से जीवित कर दी है कि किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्यक्ति की स्वायत्तता और राज्य की संरक्षणकारी भूमिका के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। उपलब्ध जानकारी के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने नियमित चिकित्सकीय निगरानी और आवश्यकता पड़ने पर चिकित्सा हस्तक्षेप का निर्देश दिया था</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्पताल ले जाने और उसके तरीके को लेकर अलग-अलग पक्ष अपनी-अपनी व्याख्या कर रहे हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"> </p>
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<div class="hq gt" style="text-align:justify;"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/183663/forced-treatment-of-wangchuk-as-interference-with-responsibility-or-freedom</link>
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                <pubDate>Sat, 18 Jul 2026 21:04:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बराक घाटी में स्थायी हाईकोर्ट बेंच की मांग को मिला जनसमर्थन, श्रीभूमि में 300 से अधिक लोगों ने किए हस्ताक्षर।</title>
                                    <description><![CDATA[<div>
<blockquote class="format1"><strong>श्रीभूमि असम संवाददाता स्वतंत्र प्रभात : </strong></blockquote>
</div>
<div>  </div>
<div>असम के गुवाहाटी हाईकोर्ट की एक स्थायी बेंच बराक घाटी के किसी उपयुक्त स्थान पर स्थापित किए जाने की मांग के समर्थन में आज 27 जून शनिवार को श्रीभूमि जिले के बिपिन पाल स्मृति भवन में एक महत्वपूर्ण जन-जागरूकता सभा आयोजित की गई। रवींद्र सदन महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. सब्यसाची राय की पहल पर आयोजित इस बैठक में बराक घाटी में स्थायी हाईकोर्ट बेंच की संवैधानिक आवश्यकता, न्याय तक समान पहुंच तथा इस मांग को एक संगठित जनआंदोलन का रूप देने के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई।</div>
<div>  </div>
<div>बैठक की शुरुआत हाईकोर्ट</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182175/the-demand-for-a-permanent-high-court-bench-in-barak"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/1001579962-(1).jpg" alt=""></a><br /><div>
<blockquote class="format1"><strong>श्रीभूमि असम संवाददाता स्वतंत्र प्रभात : </strong></blockquote>
</div>
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<div>असम के गुवाहाटी हाईकोर्ट की एक स्थायी बेंच बराक घाटी के किसी उपयुक्त स्थान पर स्थापित किए जाने की मांग के समर्थन में आज 27 जून शनिवार को श्रीभूमि जिले के बिपिन पाल स्मृति भवन में एक महत्वपूर्ण जन-जागरूकता सभा आयोजित की गई। रवींद्र सदन महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. सब्यसाची राय की पहल पर आयोजित इस बैठक में बराक घाटी में स्थायी हाईकोर्ट बेंच की संवैधानिक आवश्यकता, न्याय तक समान पहुंच तथा इस मांग को एक संगठित जनआंदोलन का रूप देने के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई।</div>
<div> </div>
<div>बैठक की शुरुआत हाईकोर्ट बेंच मांग कार्यान्वयन समिति के महासचिव निखिल पाल के स्वागत भाषण से हुई। उन्होंने इस महत्वपूर्ण आयोजन के लिए डॉ. सब्यसाची राय का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि बराक घाटी के लोगों की लंबे समय से चली आ रही इस न्यायसंगत मांग को पूरा करने के लिए समाज के सभी वर्गों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की जागरूकता सभाएं जनमत तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।</div>
<div> </div>
<div>सभा में पूर्व सांसद मिशन रंजन दास, करीमगंज महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य राधिका रंजन चक्रवर्ती, बंग साहित्य एवं संस्कृति सम्मेलन की केंद्रीय समिति के अध्यक्ष सतु राय, सांस्कृतिक हस्ती सुलेखा दत्त चौधरी, प्रोफेसर विश्वतोष चौधरी, शिक्षाविद विभाष देव, महासचिव निखिल पाल, रसराज दास, धर्मानंद देव, अधिवक्ता देवोमिता चक्रवर्ती, अधिवक्ता तुहिना शर्मा, अधिवक्ता दुर्गा पुरकायस्थ, अधिवक्ता अर्चना दत्त सहित जिले के अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। इसके अलावा विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और नाट्य संगठनों के प्रतिनिधियों ने भी चर्चा में भाग लिया।</div>
<div> </div>
<div>वक्ताओं ने कहा कि बराक घाटी के लाखों लोगों को न्याय के लिए गुवाहाटी तक लंबी दूरी तय करनी पड़ती है, जो अत्यंत महंगा, समय लेने वाला और कठिन है। आर्थिक तथा भौगोलिक बाधाओं के कारण अनेक लोग प्रभावी रूप से न्याय प्राप्त करने से वंचित रह जाते हैं। इसलिए बराक घाटी के किसी उपयुक्त स्थान पर गुवाहाटी हाईकोर्ट की स्थायी बेंच की स्थापना समय की मांग है और यह संविधान में निहित समानता एवं न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप है।</div>
<div> </div>
<div>उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह कोई क्षेत्रीय या राजनीतिक मांग नहीं है, बल्कि नागरिकों के संवैधानिक न्याय के अधिकार को सुनिश्चित करने की एक उचित मांग है। इस मांग को बराक घाटी के सभी वर्गों का व्यापक समर्थन प्राप्त है और सरकार तथा संबंधित अधिकारियों से इस दिशा में शीघ्र सकारात्मक कदम उठाने की अपील की गई।</div>
<div> </div>
<div>सभा के अंत में गुवाहाटी हाईकोर्ट की स्थायी बेंच की स्थापना के समर्थन में हस्ताक्षर अभियान चलाया गया, जिसमें लगभग 300 से अधिक नागरिकों ने हस्ताक्षर कर अपना समर्थन दर्ज कराया। यह इस मांग के प्रति जनता के व्यापक समर्थन का प्रमाण माना गया।</div>
<div> </div>
<div>बैठक में सर्वसम्मति से बराक घाटी में शीघ्र स्थायी हाईकोर्ट बेंच स्थापित करने की मांग दोहराई गई तथा समाज के सभी वर्गों से लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से इस जनआंदोलन को और मजबूत बनाने का आह्वान किया गया।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>असम हिमाचल प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 27 Jun 2026 22:03:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बराक घाटी में स्थायी हाईकोर्ट बेंच की मांग को मिला जनसमर्थन, श्रीभूमि में 300 से अधिक लोगों ने किए हस्ताक्षर।</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">
<blockquote class="format1"><strong>  श्रीभूमि संवाददाता स्वतंत्र प्रभात :</strong></blockquote>
</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">            असम के गुवाहाटी हाईकोर्ट की एक स्थायी बेंच बराक घाटी के किसी उपयुक्त स्थान पर स्थापित किए जाने की मांग के समर्थन में आज 27 जून शनिवार को श्रीभूमि जिले के बिपिन पाल स्मृति भवन में एक महत्वपूर्ण जन-जागरूकता सभा आयोजित की गई। रवींद्र सदन महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. सब्यसाची राय की पहल पर आयोजित इस बैठक में बराक घाटी में स्थायी हाईकोर्ट बेंच की संवैधानिक आवश्यकता, न्याय तक समान पहुंच तथा इस मांग को एक संगठित जनआंदोलन का रूप देने के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">बैठक की शुरुआत हाईकोर्ट बेंच</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182146/the-demand-for-a-permanent-high-court-bench-in-barak"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/1001579962.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">
<blockquote class="format1"><strong> श्रीभूमि संवाददाता स्वतंत्र प्रभात :</strong></blockquote>
</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">      असम के गुवाहाटी हाईकोर्ट की एक स्थायी बेंच बराक घाटी के किसी उपयुक्त स्थान पर स्थापित किए जाने की मांग के समर्थन में आज 27 जून शनिवार को श्रीभूमि जिले के बिपिन पाल स्मृति भवन में एक महत्वपूर्ण जन-जागरूकता सभा आयोजित की गई। रवींद्र सदन महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. सब्यसाची राय की पहल पर आयोजित इस बैठक में बराक घाटी में स्थायी हाईकोर्ट बेंच की संवैधानिक आवश्यकता, न्याय तक समान पहुंच तथा इस मांग को एक संगठित जनआंदोलन का रूप देने के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बैठक की शुरुआत हाईकोर्ट बेंच मांग कार्यान्वयन समिति के महासचिव निखिल पाल के स्वागत भाषण से हुई। उन्होंने इस महत्वपूर्ण आयोजन के लिए डॉ. सब्यसाची राय का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि बराक घाटी के लोगों की लंबे समय से चली आ रही इस न्यायसंगत मांग को पूरा करने के लिए समाज के सभी वर्गों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की जागरूकता सभाएं जनमत तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सभा में पूर्व सांसद मिशन रंजन दास, करीमगंज महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य राधिका रंजन चक्रवर्ती, बंग साहित्य एवं संस्कृति सम्मेलन की केंद्रीय समिति के अध्यक्ष सतु राय, सांस्कृतिक हस्ती सुलेखा दत्त चौधरी, प्रोफेसर विश्वतोष चौधरी, शिक्षाविद विभाष देव, महासचिव निखिल पाल, रसराज दास, धर्मानंद देव, अधिवक्ता देवोमिता चक्रवर्ती, अधिवक्ता तुहिना शर्मा, अधिवक्ता दुर्गा पुरकायस्थ, अधिवक्ता अर्चना दत्त सहित जिले के अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। इसके अलावा विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और नाट्य संगठनों के प्रतिनिधियों ने भी चर्चा में भाग लिया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वक्ताओं ने कहा कि बराक घाटी के लाखों लोगों को न्याय के लिए गुवाहाटी तक लंबी दूरी तय करनी पड़ती है, जो अत्यंत महंगा, समय लेने वाला और कठिन है। आर्थिक तथा भौगोलिक बाधाओं के कारण अनेक लोग प्रभावी रूप से न्याय प्राप्त करने से वंचित रह जाते हैं। इसलिए बराक घाटी के किसी उपयुक्त स्थान पर गुवाहाटी हाईकोर्ट की स्थायी बेंच की स्थापना समय की मांग है और यह संविधान में निहित समानता एवं न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह कोई क्षेत्रीय या राजनीतिक मांग नहीं है, बल्कि नागरिकों के संवैधानिक न्याय के अधिकार को सुनिश्चित करने की एक उचित मांग है। इस मांग को बराक घाटी के सभी वर्गों का व्यापक समर्थन प्राप्त है और सरकार तथा संबंधित अधिकारियों से इस दिशा में शीघ्र सकारात्मक कदम उठाने की अपील की गई।</div>
<div style="text-align:justify;">सभा के अंत में गुवाहाटी हाईकोर्ट की स्थायी बेंच की स्थापना के समर्थन में हस्ताक्षर अभियान चलाया गया, जिसमें लगभग 300 से अधिक नागरिकों ने हस्ताक्षर कर अपना समर्थन दर्ज कराया। यह इस मांग के प्रति जनता के व्यापक समर्थन का प्रमाण माना गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बैठक में सर्वसम्मति से बराक घाटी में शीघ्र स्थायी हाईकोर्ट बेंच स्थापित करने की मांग दोहराई गई तथा समाज के सभी वर्गों से लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से इस जनआंदोलन को और मजबूत बनाने का आह्वान किया गया।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>असम हिमाचल प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 27 Jun 2026 19:49:33 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कांग्रेस ने वोट देने के अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा देने की मांग की।</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</span></strong></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कांग्रेस ने रविवार को वोट देने के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाने की मांग की। पार्टी का तर्क है कि ऐसा करने से वोटरों को दबाने और मनमाने ढंग से अयोग्य ठहराने के खिलाफ़ मज़बूत सुरक्षा मिलेगी। स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (</span>SIR) <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रक्रिया के तहत अलग-अलग राज्यों में बड़ी संख्या में ऐसे मामले सामने आए हैं।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि भारत के चुनाव आयोग का "साफ़ तौर पर पक्षपाती कामकाज" - जिसके बारे में उन्होंने आरोप लगाया कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के इशारे पर काम कर</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181819/congress-demanded-that-the-right-to-vote-be-given-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas20.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</span></strong></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कांग्रेस ने रविवार को वोट देने के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाने की मांग की। पार्टी का तर्क है कि ऐसा करने से वोटरों को दबाने और मनमाने ढंग से अयोग्य ठहराने के खिलाफ़ मज़बूत सुरक्षा मिलेगी। स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (</span>SIR) <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रक्रिया के तहत अलग-अलग राज्यों में बड़ी संख्या में ऐसे मामले सामने आए हैं।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि भारत के चुनाव आयोग का "साफ़ तौर पर पक्षपाती कामकाज" - जिसके बारे में उन्होंने आरोप लगाया कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के इशारे पर काम कर रहा था - "पूरी तरह से बेनकाब" हो गया है। उन्होंने कहा कि अब वोट देने के अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा देने का समय आ गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि इसे न्यायिक समीक्षा और सुरक्षा का सर्वोच्च स्तर मिल सके।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रमेश ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले का ज़िक्र किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें दो जजों की बेंच ने फुटपाथ पर चलने के अधिकार को संविधान के तहत मौलिक अधिकार घोषित किया था। उन्होंने सवाल किया कि वोट देने के अधिकार को - जिसे उन्होंने लोकतंत्र के लिए बहुत ज़रूरी बताया - वैसी ही मान्यता क्यों नहीं मिलनी चाहिए।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कांग्रेस नेता ने याद दिलाया कि संविधान सभा ने सरदार पटेल की अध्यक्षता में मौलिक अधिकारों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अल्पसंख्यकों और आदिवासी व बहिष्कृत क्षेत्रों पर एक सलाहकार समिति बनाई थी। </span>21-22<span lang="hi" xml:lang="hi"> अप्रैल</span>, 1947<span lang="hi" xml:lang="hi"> को हुई बैठक के दौरान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समिति ने इस बात पर विस्तार से चर्चा की थी कि क्या वोट देने के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाया जाना चाहिए।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रमेश के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ. बी.आर. अंबेडकर और बाबू जगजीवन राम ने वोट देने के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाने का ज़ोरदार समर्थन किया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि सरदार पटेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सी. राजगोपालाचारी और अन्य लोगों का तर्क था कि ऐसा करने से रियासतें भारतीय संघ में शामिल होने में हिचकिचा सकती हैं। उनका मानना था कि संविधान में सभी वयस्कों को वोट देने का अधिकार (यूनिवर्सल एडल्ट फ्रेंचाइजी) देना ही काफ़ी होगा।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रमेश ने कहा</span>, "<span lang="hi" xml:lang="hi">सरदार पटेल का खुद यह मानना था कि सभी वयस्कों को वोट देने का अधिकार अपने आप में एक अंतर्निहित मौलिक अधिकार है। यही अनुच्छेद </span>326<span lang="hi" xml:lang="hi"> की पृष्ठभूमि है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो सभी वयस्कों को वोट देने के अधिकार के आधार पर चुनाव कराने का प्रावधान करता है।" उन्होंने कहा कि वोट देने का अधिकार </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">जन प्रतिनिधित्व अधिनियम</span>, 1951' <span lang="hi" xml:lang="hi">के तहत एक कानूनी अधिकार है या एक स्पष्ट मौलिक अधिकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस पर बहस सात दशकों से ज़्यादा समय से चल रही है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रमेश ने कहा</span>, "<span lang="hi" xml:lang="hi">अलग-अलग राय सामने आई हैं। हाल ही में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मार्च </span>2023<span lang="hi" xml:lang="hi"> के </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">मामले में जस्टिस अजय रस्तोगी ने अपनी असहमति वाली राय में कहा कि वोट देने का अधिकार एक मौलिक अधिकार है।"</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने आगे कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने वोटिंग से जुड़े कई अधिकारों को पहले ही मान्यता दी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें उम्मीदवारों के आपराधिक बैकग्राउंड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके आर्थिक हितों और राजनीतिक फंडिंग के स्रोतों को जानने का मतदाताओं का अधिकार शामिल है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने तर्क दिया</span>, "<span lang="hi" xml:lang="hi">इसने वोट की गोपनीयता की रक्षा की है और </span>NOTA <span lang="hi" xml:lang="hi">के ज़रिए सभी उम्मीदवारों को खारिज करने के अधिकार को मान्यता दी है। इसलिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह और भी अजीब बात है कि वोट देने का अधिकार अभी भी सिर्फ़ एक कानूनी अधिकार बना हुआ है। इससे जुड़े सभी अधिकारों को मौलिक घोषित किया गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन मुख्य अधिकार - जिसके बिना बाकी अधिकार मौजूद नहीं रह सकते - अभी भी कानूनी अधिकार ही बना हुआ है।"रमेश ने कहा कि वोट देने के अधिकार का दर्जा बढ़ाने से लोकतांत्रिक सुरक्षा उपाय मज़बूत होंगे।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने कहा</span>, "<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री के इशारे पर काम करने वाले भारत के चुनाव आयोग के खुले तौर पर पक्षपाती कामकाज के बुरी तरह बेनकाब होने के बाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब समय आ गया है कि वोट देने के अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे इसे न्यायिक समीक्षा और सुरक्षा का उच्चतम स्तर मिल सके।"</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रमेश ने आगे कहा</span>, "<span lang="hi" xml:lang="hi">यह मतदाताओं को दबाने या मनमाने ढंग से अयोग्य ठहराने के खिलाफ़ सुरक्षा उपाय लागू करने की दिशा में एक मज़बूत कदम होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो </span>SIR (<span lang="hi" xml:lang="hi">विशेष गहन संशोधन) प्रक्रिया के तहत अलग-अलग राज्यों में बहुत बड़ी संख्या में हुए हैं। इसका मतलब यह भी होगा कि चुनाव आयोग के कामकाज पर सुप्रीम कोर्ट की ज़्यादा निगरानी रहेगी।"</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 21 Jun 2026 19:24:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हिरासत में मौत और पुलिसिया हिंसा के मामलों में अभियोजन मंजूरी जरूरी नहीं: ।मध्य प्रदेश हाईकोर्ट।</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज </span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि हिरासत में मौत या पुलिसिया हिंसा के मामलों में पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता (</span>CrPC) <span lang="hi" xml:lang="hi">की धारा 197 के तहत पूर्व सरकारी मंजूरी की आवश्यकता नहीं होती।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने दो पुलिस आरक्षकों की याचिका खारिज करते हुए कहा कि ऐसे कृत्यों का सरकारी कर्तव्य के निर्वहन से कोई उचित संबंध नहीं माना जा सकता। जस्टिस गजेंद्र सिंह की एकल पीठ इंदौर में वर्ष 2015 में हुई एक युवक की कथित हिरासत मौत से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181536/prosecution-sanction-is-not-necessary-in-cases-of-custodial-death"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas7.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज </span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि हिरासत में मौत या पुलिसिया हिंसा के मामलों में पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता (</span>CrPC) <span lang="hi" xml:lang="hi">की धारा 197 के तहत पूर्व सरकारी मंजूरी की आवश्यकता नहीं होती।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने दो पुलिस आरक्षकों की याचिका खारिज करते हुए कहा कि ऐसे कृत्यों का सरकारी कर्तव्य के निर्वहन से कोई उचित संबंध नहीं माना जा सकता। जस्टिस गजेंद्र सिंह की एकल पीठ इंदौर में वर्ष 2015 में हुई एक युवक की कथित हिरासत मौत से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही थी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">याचिकाकर्ता पुलिसकर्मियों ने तर्क दिया कि उनके खिलाफ अभियोजन चलाने से पहले सरकार की मंजूरी आवश्यक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि कथित घटनाएं उनके आधिकारिक कर्तव्यों से जुड़ी हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मामले के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुसूचित जाति समुदाय से संबंध रखने वाले 24 वर्षीय पंकज वैष्णव को 19 दिसंबर 2015 को स्कूटर चोरी के मामले में पूछताछ के लिए इंदौर के एमआईजी थाने लाया गया। उसी रात उसकी पुलिस हिरासत में मौत हो गई। पुलिस ने इसे आत्महत्या बताया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">घटना के बाद </span>CrPC <span lang="hi" xml:lang="hi">की धारा 176 के तहत स्वतंत्र जांच कराई गई। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा की गई जांच में निष्कर्ष निकाला गया कि यह मामला आपराधिक मानव वध का प्रतीत होता है।इसके बाद दो आरक्षकों और एक थाना प्रभारी के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अवैध निरुद्ध करने और झूठे साक्ष्य देने सहित विभिन्न आरोपों में आरोपपत्र दायर किया गया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 197 के संरक्षण का लाभ तभी मिल सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब आरोपित कृत्य और सरकारी कर्तव्य के निर्वहन के बीच स्पष्ट और उचित संबंध हो। लेकिन वर्तमान मामले में ऐसा कोई संबंध नहीं पाया गया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने कहा</span>, “<span lang="hi" xml:lang="hi">यह ऐसा मामला नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें पुलिसकर्मी किसी हिंसक भीड़ को नियंत्रित कर रहे थे और बल प्रयोग करते हुए अपनी सीमा से आगे बढ़ गए हों। यहां आरोपित बल प्रयोग उस समय किया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब मृतक पुलिस हिरासत में था और थाने के नियंत्रण में था। ऐसी स्थिति में बल प्रयोग या शारीरिक हमला करने का कोई औचित्य नहीं था।”</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"> </p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हाईकोर्ट ने कहा कि कानून पुलिस को कुछ विशेष परिस्थितियों में बल प्रयोग की अनुमति देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे हिंसक भीड़ को तितर-बितर करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गिरफ्तारी</span><span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों का भी उल्लेख किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें कहा गया कि हिरासत में हिंसा और मौत सभ्य समाज में सबसे गंभीर अपराधों में से हैं तथा यह व्यक्ति के मूल मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने आरक्षकों की पुनरीक्षण याचिका खारिज की और स्पष्ट किया कि हिरासत में मौत या पुलिसिया हिंसा जैसे मामलों में धारा 197 के तहत अभियोजन मंजूरी का संरक्षण उपलब्ध नहीं होगा।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/181536/prosecution-sanction-is-not-necessary-in-cases-of-custodial-death</link>
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                <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 13:57:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मप्र नौकरशाही के भगवाकरण का श्रीगणेश</title>
                                    <description><![CDATA[<p>मध्य्प्रदेश में जो अब तक नहीं हुआ था,वो अब हो रहा है।  मध्य्प्रदेश में 2003  से अभी तक भाजपा की सरकार है। 19  महीने की कांग्रेस सरकार एक अपवाद थी। इस लंबे कार्यकाल में भाजपा ने प्रदेश में बहुत से नवाचार किये लेकिन पहली बार प्रदेश की नौकरशाही का भगवाकरण शुरू हुआ है वो भी सामंतों के शहर ग्वालियर से। ग्वालियर कलेक्टर श्रीमती रुचिका सिंह और निगमायुक्त संघप्रिय ने भाजपा द्वारा आयोजित होली मिलन समारोह में न सिर्फ भाग लिया बल्कि भाजपा नेताओं के साथ तस्वीरें खिंचवाईं और गले में भगवा दुपट्टे डलवाये।</p>
<p>मेरे पांच दशक की  पत्रकारिता के अनुभव</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149985/shri-ganesh-of-saffronisation-of-mp-bureaucracy"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/bhgwakarn.jpg" alt=""></a><br /><p>मध्य्प्रदेश में जो अब तक नहीं हुआ था,वो अब हो रहा है।  मध्य्प्रदेश में 2003  से अभी तक भाजपा की सरकार है। 19  महीने की कांग्रेस सरकार एक अपवाद थी। इस लंबे कार्यकाल में भाजपा ने प्रदेश में बहुत से नवाचार किये लेकिन पहली बार प्रदेश की नौकरशाही का भगवाकरण शुरू हुआ है वो भी सामंतों के शहर ग्वालियर से। ग्वालियर कलेक्टर श्रीमती रुचिका सिंह और निगमायुक्त संघप्रिय ने भाजपा द्वारा आयोजित होली मिलन समारोह में न सिर्फ भाग लिया बल्कि भाजपा नेताओं के साथ तस्वीरें खिंचवाईं और गले में भगवा दुपट्टे डलवाये।</p>
<p>मेरे पांच दशक की  पत्रकारिता के अनुभव में ऐसे दृश्य पहले कभी देखने को नहीं मिले ,इसलिए मै चौंका भी और मुझे कुछ अटपटा भी लगा।सवाल ये है कि क्या भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसरों को किसी राजनीतिक दल के कार्यक्रम में शामिल होने का संवैधानिक अधिकार है ? या लोकसेवकों की कोई आचार संहिता भी है जो उन्हें राजनीतिक दलों की गतिविधियों में शामिल होने से रोकती भी है।  सवाल ये नहीं है कि  प्रशासनिक अधिकारी सत्तारूढ़ दल के कार्यक्रम में शामिल हुए,सवाल ये है कि  क्या ऐसा कर उन्होंने कोई नजीर पैदा की है ? सवाल ये भी है कि  लोकसेवकों के इस आचारण का आम जनता पर,और प्रशासनिक कामकाज पर भी कोई असर पडेगा या नहीं ?</p>
<p>जहाँ तक मेरा ज्ञान है कि  लोक सेवा अधिनियम, 2007 (संशोधन, 2009) में जिन नैतिक मूल्यों पर बल दिया गया है, उन्हें नीति संहिता माना जा सकता है।इस नीति संहिता के मुताबिक लोकसेवक को संविधान की प्रस्तावना में आदर्शों के प्रति निष्ठा रखना।तटस्थता, निष्पक्षता बनाए रखना।</p>
<p>किसी राजनीतिक दल के प्रति सार्वजनिक निष्ठा न रखना। यदि किसी दल से लगाव हो तो भी अपने कार्यों पर प्रभाव न पड़ने देना।देश की सामाजिक-सांस्कृतिक विविधता के प्रति सम्मान का भाव रखते हुए वंचित समूहों (लिंग, जाति, वर्ग या अन्य कारणों से) के प्रति करुणा का भाव रखते हुए  निर्णयन प्रक्रिया में उत्तरदायित्व एवं पारदर्शिता के साथ-साथ उच्चतम सत्यनिष्ठा को बनाए रखना चाहिए।</p>
<p>मेरे सम्पर्क में ऐसे बहुत से लोकसेवक रहे हैं जिनकी अपनी राजनीतिक निष्ठाएं थीं लेकिन वे कभी खुलकर किसी राजनीतिक दल के किसी कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए। एक आईपीएस थे अयोध्यानाथ पाठक ,वे तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के अंधभक्त थे ।  उन्होंने 1983  में महाराज बाड़ा पर एक संगठन की आमसभा में आरएसएस के खिलाफ खुलकर भाषण दिए थे। उनकी इस कार्रवाई पर विधानसभा में जमकर हंगामा हुआ था और पाठक जी को सफाई देना पड़ी थी।पाठक जी प्रदेश कि पुलिस महानिदेशक बनर सेवनिवृर्त  हुए लेकिन किसी दल में शामिल नहीं हो पाए।  </p>
<p>एक आईएएस अफसर थे एसके मिश्रा वे बुधनी उपचुनाव के समय  भाजपा की एक चुनाव सभा में कलेक्टर की हैसियत से तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के सामने घुटनों के बल बैठे देखे गए तो उनके खिलाफ फौरन कार्रवाई की गयी। एक थीं शशि कर्णावत वे तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के आगे-पीछे घूमती ही नहीं थीं बल्कि शासकीय कार्यक्रमों में भी कांग्रेस की बात करतीं थीं,आज उनका आता-पता नहीं है।<br />ग्वालियर कलेक्टर श्रीमती रुचिका सिंह और संघप्रिय भी इसी तरह राजनीतिक निष्ठाओं से बंधे लोकसेवक के रूप में चिन्हित किये गए हैं।</p>
<p>इन दोनों के समाने विकल्प था कि  ये दोनों भाजपा के होली मिलन समारोह में शामिल होने से इंकार कर सकते थे ,लेकिन इन दोनों ने ऐसानहीं किया। क्योंकि इन्हें लगा कि  वे कुछ गलत नहीं कर रहे है।  एक तरह से ये गलत है भी नहीं।  किन्तु एक लोकसेवक के नाते इन दोनों का आचरण सवालों के घेरे में तो आता ही है।  मुमकिन है कि  इन दोनों ने सोचा हो की जब केंद्र सरकार ने शासकीय कर्मचारियों को आरएसएस के कार्यक्रमों में शामिल होने की छूट दे दी है तो फिर भाजपा के कार्यकक्रमों में शामिल होने से क्या हर्ज है ?</p>
<p>मुझे लगता है कि  भाजपा की प्रदेश सरकार ग्वालियर के इन दोनों दुस्साहसी लिकसेवकों के आचरण के लिए इन्हें दण्डित करने के बजाय पुरस्कृत करेगी। इन दोनों ने पूरे प्रदेश की नौकरशाही के लिए एक नजीर पेश की है। अब मुमकिन है कि  हर जिले में आपको प्रशासनिक अफसर सत्तारूढ़ दल के कार्यक्रमों में भगवा दुपट्टा डाले नजर आने लगें। शैक्षणिक संस्थानों में तो भवकरण अब पुरानी बात हो गयी है ,केवल एक प्रशासन इससे बचा था जो इस होली पर खुद भगवा हो गया।</p>
<p>वर्तमान समय में सिविल सेवकों के लिए आचार मानकों को भारतीय संविधान के अनुच्छेद-309 के तह्ठत सिविल सर्विस (कंडक्ट) रूल्स में उल्लिख़ित आचरण नियमों के आधार पर किया जाता है। इस पर एक कानून की आवश्यकता को समझकर ही भारत सरकार द्वारा सिविल सर्विस स्टैंडर्ड्स, परफॉरमेन्स एंड अकाउंटिबिलिटी बिल,2010 को लाया गया, जिसमें सिविल सेवकों को बहुआयामी ढंग से कार्यकुशल बनाने के लिए प्रावधान किए गए हैं।लेकिन अब ये तमाम प्रावधान मुझे निरर्थक होते दिखाई दे रहे हैं।</p>
<p>मै ग्वालियर जिले  की कलेक्टर और ग्वालियर नगर निगम के आयुक्त को बधाई तो नहीं दूंगा किन्तु उनके दुस्साहस को सलाम जरूर करूंगा ।  मुझे प्रतीक्षा रहेगी प्रदेश के मुख्य सचिव अनुराग जैन के भावी व्यवहार और निर्णय की किए  वे अपने मातहतों के भगवाकरण को लेकर संज्ञान लेते हैं या इसकी अनदेखी करते हैं ? वैसे मुख्य सचिव को अभी तक तो किसी ने मैदान में विचरते देखा नहीं है।</p>
<p>मेरा अनुभव है कि  तमाम लोकसेवकों के मन में एक अतृप्त कामना होती है नेतागिरी करने की ।  वे अनपढ़ नेताओं के सामने जब अपने  आपको निरीह अवस्था में पाते हैं ,तब उन्हें लगता है कि  क्या ही अच्छा होकि वे खुद राजनीती में आ जाएँ।  जो दुस्साहसी हैं वे नौकरी छोड़कर राजनीती में आ ही जाते हैं और जो संकोची हैं वे सेवानिवृत्ति का इंतजार करते हैं।  मप्र के एक पूर्व मंत्री पटवारी थे,नौकरी छोड़कर राजनीति में आये थे ।</p>
<p> डॉ भगीरथ प्रसाद ,सरदार सिंह डंगस  जैसे अनेक आईएएस अफसरों ने बाद में राजनीति की ही शरण ली ही और विधानसभाओं तथा संसद तक में पहुंचे। श्रीमती रुचिका सिंह और संघप्रिय ने भी सरकार के सामने अपनी रूचि का प्रदर्शन कर दिया है। अब आपको ,सबको इंतजार करना पड़ेगा इन दोनों को राजनेता के रूप में ढलते देखने का।  हमारी शुभकामनायें।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 18 Mar 2025 13:19:18 +0530</pubDate>
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