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                <title>constitutional rights - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>constitutional rights RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>हिरासत में मौत और पुलिसिया हिंसा के मामलों में अभियोजन मंजूरी जरूरी नहीं: ।मध्य प्रदेश हाईकोर्ट।</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज </span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि हिरासत में मौत या पुलिसिया हिंसा के मामलों में पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता (</span>CrPC) <span lang="hi" xml:lang="hi">की धारा 197 के तहत पूर्व सरकारी मंजूरी की आवश्यकता नहीं होती।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने दो पुलिस आरक्षकों की याचिका खारिज करते हुए कहा कि ऐसे कृत्यों का सरकारी कर्तव्य के निर्वहन से कोई उचित संबंध नहीं माना जा सकता। जस्टिस गजेंद्र सिंह की एकल पीठ इंदौर में वर्ष 2015 में हुई एक युवक की कथित हिरासत मौत से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181536/prosecution-sanction-is-not-necessary-in-cases-of-custodial-death"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas6.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज </span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि हिरासत में मौत या पुलिसिया हिंसा के मामलों में पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता (</span>CrPC) <span lang="hi" xml:lang="hi">की धारा 197 के तहत पूर्व सरकारी मंजूरी की आवश्यकता नहीं होती।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने दो पुलिस आरक्षकों की याचिका खारिज करते हुए कहा कि ऐसे कृत्यों का सरकारी कर्तव्य के निर्वहन से कोई उचित संबंध नहीं माना जा सकता। जस्टिस गजेंद्र सिंह की एकल पीठ इंदौर में वर्ष 2015 में हुई एक युवक की कथित हिरासत मौत से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही थी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">याचिकाकर्ता पुलिसकर्मियों ने तर्क दिया कि उनके खिलाफ अभियोजन चलाने से पहले सरकार की मंजूरी आवश्यक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि कथित घटनाएं उनके आधिकारिक कर्तव्यों से जुड़ी हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मामले के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुसूचित जाति समुदाय से संबंध रखने वाले 24 वर्षीय पंकज वैष्णव को 19 दिसंबर 2015 को स्कूटर चोरी के मामले में पूछताछ के लिए इंदौर के एमआईजी थाने लाया गया। उसी रात उसकी पुलिस हिरासत में मौत हो गई। पुलिस ने इसे आत्महत्या बताया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">घटना के बाद </span>CrPC <span lang="hi" xml:lang="hi">की धारा 176 के तहत स्वतंत्र जांच कराई गई। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा की गई जांच में निष्कर्ष निकाला गया कि यह मामला आपराधिक मानव वध का प्रतीत होता है।इसके बाद दो आरक्षकों और एक थाना प्रभारी के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अवैध निरुद्ध करने और झूठे साक्ष्य देने सहित विभिन्न आरोपों में आरोपपत्र दायर किया गया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 197 के संरक्षण का लाभ तभी मिल सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब आरोपित कृत्य और सरकारी कर्तव्य के निर्वहन के बीच स्पष्ट और उचित संबंध हो। लेकिन वर्तमान मामले में ऐसा कोई संबंध नहीं पाया गया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने कहा</span>, “<span lang="hi" xml:lang="hi">यह ऐसा मामला नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें पुलिसकर्मी किसी हिंसक भीड़ को नियंत्रित कर रहे थे और बल प्रयोग करते हुए अपनी सीमा से आगे बढ़ गए हों। यहां आरोपित बल प्रयोग उस समय किया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब मृतक पुलिस हिरासत में था और थाने के नियंत्रण में था। ऐसी स्थिति में बल प्रयोग या शारीरिक हमला करने का कोई औचित्य नहीं था।”</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"> </p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हाईकोर्ट ने कहा कि कानून पुलिस को कुछ विशेष परिस्थितियों में बल प्रयोग की अनुमति देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे हिंसक भीड़ को तितर-बितर करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गिरफ्तारी</span><span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों का भी उल्लेख किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें कहा गया कि हिरासत में हिंसा और मौत सभ्य समाज में सबसे गंभीर अपराधों में से हैं तथा यह व्यक्ति के मूल मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने आरक्षकों की पुनरीक्षण याचिका खारिज की और स्पष्ट किया कि हिरासत में मौत या पुलिसिया हिंसा जैसे मामलों में धारा 197 के तहत अभियोजन मंजूरी का संरक्षण उपलब्ध नहीं होगा।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 13:57:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मप्र नौकरशाही के भगवाकरण का श्रीगणेश</title>
                                    <description><![CDATA[<p>मध्य्प्रदेश में जो अब तक नहीं हुआ था,वो अब हो रहा है।  मध्य्प्रदेश में 2003  से अभी तक भाजपा की सरकार है। 19  महीने की कांग्रेस सरकार एक अपवाद थी। इस लंबे कार्यकाल में भाजपा ने प्रदेश में बहुत से नवाचार किये लेकिन पहली बार प्रदेश की नौकरशाही का भगवाकरण शुरू हुआ है वो भी सामंतों के शहर ग्वालियर से। ग्वालियर कलेक्टर श्रीमती रुचिका सिंह और निगमायुक्त संघप्रिय ने भाजपा द्वारा आयोजित होली मिलन समारोह में न सिर्फ भाग लिया बल्कि भाजपा नेताओं के साथ तस्वीरें खिंचवाईं और गले में भगवा दुपट्टे डलवाये।</p>
<p>मेरे पांच दशक की  पत्रकारिता के अनुभव</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149985/shri-ganesh-of-saffronisation-of-mp-bureaucracy"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/bhgwakarn.jpg" alt=""></a><br /><p>मध्य्प्रदेश में जो अब तक नहीं हुआ था,वो अब हो रहा है।  मध्य्प्रदेश में 2003  से अभी तक भाजपा की सरकार है। 19  महीने की कांग्रेस सरकार एक अपवाद थी। इस लंबे कार्यकाल में भाजपा ने प्रदेश में बहुत से नवाचार किये लेकिन पहली बार प्रदेश की नौकरशाही का भगवाकरण शुरू हुआ है वो भी सामंतों के शहर ग्वालियर से। ग्वालियर कलेक्टर श्रीमती रुचिका सिंह और निगमायुक्त संघप्रिय ने भाजपा द्वारा आयोजित होली मिलन समारोह में न सिर्फ भाग लिया बल्कि भाजपा नेताओं के साथ तस्वीरें खिंचवाईं और गले में भगवा दुपट्टे डलवाये।</p>
<p>मेरे पांच दशक की  पत्रकारिता के अनुभव में ऐसे दृश्य पहले कभी देखने को नहीं मिले ,इसलिए मै चौंका भी और मुझे कुछ अटपटा भी लगा।सवाल ये है कि क्या भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसरों को किसी राजनीतिक दल के कार्यक्रम में शामिल होने का संवैधानिक अधिकार है ? या लोकसेवकों की कोई आचार संहिता भी है जो उन्हें राजनीतिक दलों की गतिविधियों में शामिल होने से रोकती भी है।  सवाल ये नहीं है कि  प्रशासनिक अधिकारी सत्तारूढ़ दल के कार्यक्रम में शामिल हुए,सवाल ये है कि  क्या ऐसा कर उन्होंने कोई नजीर पैदा की है ? सवाल ये भी है कि  लोकसेवकों के इस आचारण का आम जनता पर,और प्रशासनिक कामकाज पर भी कोई असर पडेगा या नहीं ?</p>
<p>जहाँ तक मेरा ज्ञान है कि  लोक सेवा अधिनियम, 2007 (संशोधन, 2009) में जिन नैतिक मूल्यों पर बल दिया गया है, उन्हें नीति संहिता माना जा सकता है।इस नीति संहिता के मुताबिक लोकसेवक को संविधान की प्रस्तावना में आदर्शों के प्रति निष्ठा रखना।तटस्थता, निष्पक्षता बनाए रखना।</p>
<p>किसी राजनीतिक दल के प्रति सार्वजनिक निष्ठा न रखना। यदि किसी दल से लगाव हो तो भी अपने कार्यों पर प्रभाव न पड़ने देना।देश की सामाजिक-सांस्कृतिक विविधता के प्रति सम्मान का भाव रखते हुए वंचित समूहों (लिंग, जाति, वर्ग या अन्य कारणों से) के प्रति करुणा का भाव रखते हुए  निर्णयन प्रक्रिया में उत्तरदायित्व एवं पारदर्शिता के साथ-साथ उच्चतम सत्यनिष्ठा को बनाए रखना चाहिए।</p>
<p>मेरे सम्पर्क में ऐसे बहुत से लोकसेवक रहे हैं जिनकी अपनी राजनीतिक निष्ठाएं थीं लेकिन वे कभी खुलकर किसी राजनीतिक दल के किसी कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए। एक आईपीएस थे अयोध्यानाथ पाठक ,वे तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के अंधभक्त थे ।  उन्होंने 1983  में महाराज बाड़ा पर एक संगठन की आमसभा में आरएसएस के खिलाफ खुलकर भाषण दिए थे। उनकी इस कार्रवाई पर विधानसभा में जमकर हंगामा हुआ था और पाठक जी को सफाई देना पड़ी थी।पाठक जी प्रदेश कि पुलिस महानिदेशक बनर सेवनिवृर्त  हुए लेकिन किसी दल में शामिल नहीं हो पाए।  </p>
<p>एक आईएएस अफसर थे एसके मिश्रा वे बुधनी उपचुनाव के समय  भाजपा की एक चुनाव सभा में कलेक्टर की हैसियत से तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के सामने घुटनों के बल बैठे देखे गए तो उनके खिलाफ फौरन कार्रवाई की गयी। एक थीं शशि कर्णावत वे तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के आगे-पीछे घूमती ही नहीं थीं बल्कि शासकीय कार्यक्रमों में भी कांग्रेस की बात करतीं थीं,आज उनका आता-पता नहीं है।<br />ग्वालियर कलेक्टर श्रीमती रुचिका सिंह और संघप्रिय भी इसी तरह राजनीतिक निष्ठाओं से बंधे लोकसेवक के रूप में चिन्हित किये गए हैं।</p>
<p>इन दोनों के समाने विकल्प था कि  ये दोनों भाजपा के होली मिलन समारोह में शामिल होने से इंकार कर सकते थे ,लेकिन इन दोनों ने ऐसानहीं किया। क्योंकि इन्हें लगा कि  वे कुछ गलत नहीं कर रहे है।  एक तरह से ये गलत है भी नहीं।  किन्तु एक लोकसेवक के नाते इन दोनों का आचरण सवालों के घेरे में तो आता ही है।  मुमकिन है कि  इन दोनों ने सोचा हो की जब केंद्र सरकार ने शासकीय कर्मचारियों को आरएसएस के कार्यक्रमों में शामिल होने की छूट दे दी है तो फिर भाजपा के कार्यकक्रमों में शामिल होने से क्या हर्ज है ?</p>
<p>मुझे लगता है कि  भाजपा की प्रदेश सरकार ग्वालियर के इन दोनों दुस्साहसी लिकसेवकों के आचरण के लिए इन्हें दण्डित करने के बजाय पुरस्कृत करेगी। इन दोनों ने पूरे प्रदेश की नौकरशाही के लिए एक नजीर पेश की है। अब मुमकिन है कि  हर जिले में आपको प्रशासनिक अफसर सत्तारूढ़ दल के कार्यक्रमों में भगवा दुपट्टा डाले नजर आने लगें। शैक्षणिक संस्थानों में तो भवकरण अब पुरानी बात हो गयी है ,केवल एक प्रशासन इससे बचा था जो इस होली पर खुद भगवा हो गया।</p>
<p>वर्तमान समय में सिविल सेवकों के लिए आचार मानकों को भारतीय संविधान के अनुच्छेद-309 के तह्ठत सिविल सर्विस (कंडक्ट) रूल्स में उल्लिख़ित आचरण नियमों के आधार पर किया जाता है। इस पर एक कानून की आवश्यकता को समझकर ही भारत सरकार द्वारा सिविल सर्विस स्टैंडर्ड्स, परफॉरमेन्स एंड अकाउंटिबिलिटी बिल,2010 को लाया गया, जिसमें सिविल सेवकों को बहुआयामी ढंग से कार्यकुशल बनाने के लिए प्रावधान किए गए हैं।लेकिन अब ये तमाम प्रावधान मुझे निरर्थक होते दिखाई दे रहे हैं।</p>
<p>मै ग्वालियर जिले  की कलेक्टर और ग्वालियर नगर निगम के आयुक्त को बधाई तो नहीं दूंगा किन्तु उनके दुस्साहस को सलाम जरूर करूंगा ।  मुझे प्रतीक्षा रहेगी प्रदेश के मुख्य सचिव अनुराग जैन के भावी व्यवहार और निर्णय की किए  वे अपने मातहतों के भगवाकरण को लेकर संज्ञान लेते हैं या इसकी अनदेखी करते हैं ? वैसे मुख्य सचिव को अभी तक तो किसी ने मैदान में विचरते देखा नहीं है।</p>
<p>मेरा अनुभव है कि  तमाम लोकसेवकों के मन में एक अतृप्त कामना होती है नेतागिरी करने की ।  वे अनपढ़ नेताओं के सामने जब अपने  आपको निरीह अवस्था में पाते हैं ,तब उन्हें लगता है कि  क्या ही अच्छा होकि वे खुद राजनीती में आ जाएँ।  जो दुस्साहसी हैं वे नौकरी छोड़कर राजनीती में आ ही जाते हैं और जो संकोची हैं वे सेवानिवृत्ति का इंतजार करते हैं।  मप्र के एक पूर्व मंत्री पटवारी थे,नौकरी छोड़कर राजनीति में आये थे ।</p>
<p> डॉ भगीरथ प्रसाद ,सरदार सिंह डंगस  जैसे अनेक आईएएस अफसरों ने बाद में राजनीति की ही शरण ली ही और विधानसभाओं तथा संसद तक में पहुंचे। श्रीमती रुचिका सिंह और संघप्रिय ने भी सरकार के सामने अपनी रूचि का प्रदर्शन कर दिया है। अब आपको ,सबको इंतजार करना पड़ेगा इन दोनों को राजनेता के रूप में ढलते देखने का।  हमारी शुभकामनायें।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 18 Mar 2025 13:19:18 +0530</pubDate>
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